03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 441–450

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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सृक्किणी लेलिहानस्य बाष्पमुत्सृजतो मुहुः ॥ २ ९ ॥

उद्दिश्य नागान् पततः कुर्वतो भैरवान् रवान् ।

प्रतीपं पततो मत्तान् कुञ्जरान् प्रतिगर्जतः ॥ ३० ॥

विगाह्य रथमार्गेषु वरानुद्दिश्य निघ्नतः ।

अग्नेः प्रज्वलितस्येव अपि मुच्येत मे प्रजा ॥ ३१ ॥

भीमसेन जब क्रोधजनित आँसू बहाता और बारंबार अपने ओष्ठप्रान्तको चाटता हुआ गदा घुमा- घुमाकर हाथियोंके मस्तक विदीर्ण करने लगेगा, सामने भयंकर गर्जना करनेवाले गजराजोंको लक्ष्य करके उनकी ओर दौड़ेगा, प्रतिकूल दिशाकी ओर भागनेवाले मदोन्मत्त हाथियोंकी गर्जनाके उत्तरमें स्वयं भी सिंहनाद करेगा और मेरे रथियोंकी सेनाओंमें घुसकर श्रेष्ठ वीरोंको चुन-चुनकर मारने लगेगा, उस समय अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले भीमके हाथसे मेरे पुत्र कैसे जीवित बचेंगे? ॥ २ ९ –३१ ॥

वीथीं कुर्वन् महाबाहुर्द्रावयन् मम वाहिनीम् ।

नृत्यन्निव गदापाणिर्युगान्तं दर्शयिष्यति ॥ ३२ ॥

महाबाहु भीम मेरी सेनामें घुसकर अपने रथके लिये रास्ता बनाता, मेरी विशाल वाहिनीको खदेड़ता और हाथमें गदा लिये नृत्य- सा करता हुआ जब आगे बढ़ेगा, तब प्रलयकालका दृश्य उपस्थित कर देगा ॥ ३२ ॥

प्रभिन्न इव मातङ्गः प्रभञ्जन् पुष्पितान् द्रुमान् ।

प्रवेक्ष्यति रणे सेनां पुत्राणां मे वृकोदरः ॥ ३३ ॥

जैसे मदकी धारा बहानेवाला मतवाला हाथी फूले हुए वृक्षोंको तोड़ता हुआ आगे बढ़ता है, उसी प्रकार भीमसेन समरभूमिमें मेरे पुत्रोंकी सेनाके भीतर प्रवेश करेगा ॥ ३३ ॥

कुर्वन् रथान् विपुरुषान् विसारथिहयध्वजान् ।

आरुजन् पुरुषव्याघ्रो रथिनः सादिनस्तथा ॥ ३४ ॥

गङ्गावेग इवानूपांस्तीरजान् विविधान् द्रुमान् ।

प्रभङ्क्ष्यति रणे सेनां पुत्राणां मम संजय ॥ ३५ ॥

संजय! वह पुरुषसिंह भीम रथोंको रथी, सारथि, अश्व तथा ध्वजाओंसे शून्य कर देगा एवं रथियों और घुड़सवारोंके अंग- भंग कर डालेगा। जैसे गंगाजीका बढ़ता हुआ वेग जलमय प्रदेशमें स्थित हुए नाना प्रकारके तटवर्ती वृक्षोंको गिराकर नष्ट कर देता है, उसी प्रकार भीम युद्धभूमिमें आकर मेरे पुत्रोंकी सेनाका संहार कर डालेगा ॥ ३४-३५ ॥

दिशो नूनं गमिष्यन्ति भीमसेनभयार्दिताः ।

मम पुत्राश्च भृत्याश्च राजानश्चैव संजय ॥ ३६ ॥

संजय! निश्चय ही भीमसेनके भयसे पीड़ित हो मेरे पुत्र, सेवक तथा सहायक नरेश विभिन्न दिशाओंमें भाग जायँगे ॥ ३६ ॥

येन राजा महावीर्यः प्रविश्यान्तःपुरं पुरा ।

पृष्ठ 442

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वासुदेवसहायेन जरासंधो निपातितः ॥ ३७ ॥

कृत्स्नेयं पृथिवी देवी जरासंधेन धीमता ।

मागधेन्द्रेण बलिना वशे कृत्वा प्रतापिता ॥ ३८ ॥

परम बुद्धिमान् और बलवान् महाबली मगधराज जरासंधने यह सारी पृथिवी अपने वशमें करके इसे पीड़ा देना प्रारम्भ किया था, परंतु भीमसेनने भगवान् श्रीकृष्णके साथ उसके अन्तःपुरमें जाकर उस महापराक्रमी नरेशको मार गिराया ॥ ३७-३८ ॥

भीष्मप्रतापात् कुरवो नयेनान्धकवृष्णयः ।

यन्न तस्य वशे जग्मुः केवलं दैवमेव तत् ॥ ३ ९ ॥

भीष्मजीके प्रतापसे कुरुवंशी और नीतिबलसे अंधक - वृष्णिवंशके लोग जो जरासंधके वशमें नहीं पड़े, वह केवल दैवयोग था ॥ ३ ९ ॥

स गत्वा पाण्डुपुत्रेण तरसा बाहुशालिना ।

अनायुधेन वीरेण निहतः किं ततोऽधिकम् ॥ ४० ॥

परंतु अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले वीर पाण्डुपुत्र भीमने वेगपूर्वक वहाँ जाकर बिना किसी अस्त्र - शस्त्रके ही उस जरासंधको यमलोक पहुँचा दिया, इससे बढ़कर पराक्रम और क्या होगा? ॥ ४० ॥

दीर्घकालसमासक्तं विषमाशीविषो यथा ।

स मोक्ष्यति रणे तेजः पुत्रेषु मम संजय ॥ ४१ ॥

संजय! जैसे विषधर सर्प बहुत दिनोंसे संचित किये हुए विषको किसीपर उगलता है, उसी प्रकार भीमसेन भी दीर्घकालसे संचित अपने तेजको रणभूमिमें मेरे पुत्रोंपर छोड़ेगा ॥ ४१ ॥

महेन्द्र इव वज्रेण दानवान् देवसत्तमः ।

भीमसेनो गदापाणिः सूदयिष्यति मे सुतान् ॥ ४२ ॥

जैसे देवश्रेष्ठ इन्द्र वज्रसे दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार हाथमें गदा लिये भीमसेन मेरे पुत्रोंका संहार कर डालेगा ॥ ४२ ॥

अविषह्यमनावार्यं तीव्रवेगपराक्रमम् ।

पश्यामीवातिताम्राक्षमापतन्तं वृकोदरम् ॥ ४३ ॥

उसका आक्रमण दुःसह है । उसकी गतिको कोई रोक नहीं सकता । उसका वेग और पराक्रम तीव्र है । मैं प्रत्यक्ष देख- सा रहा हूँ कि वह भीम क्रोधसे अत्यन्त लाल आँखें किये इधर ही दौड़ा आ रहा है ॥ ४३ ॥

अगदस्याप्यधनुषो विरथस्य विवर्मणः ।

बाहुभ्यां युद्धयमानस्य कस्तिष्ठेदग्रतः पुमान् ॥ ४४ ॥

यदि वह गदा, धनुष, रथ और कवचको छोड़कर केवल दोनों भुजाओंसे युद्ध करे तो भी उसके सामने कौन पुरुष ठहर सकता है? ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 443

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भीष्मो द्रोणश्च विप्रोऽयं कृपः शारद्वतस्तथा ।

जानन्त्येते यथैवाहं वीर्यज्ञस्तस्य धीमतः ॥ ४५ ॥

उस बुद्धिमान् भीमके बल और पराक्रमको जैसे मैं जानता हूँ, उसी प्रकार ये भीष्म, विप्रवर द्रोणाचार्य तथा शरद्वान्के पुत्र कृप भी जानते हैं ॥ ४५ ॥

आर्यव्रतं तु जानन्तः संगरान्तं विधित्सवः ।

सेनामुखेषु स्थास्यन्ति मामकानां नरर्षभाः ॥ ४६ ॥

तथापि ये नरश्रेष्ठ शिष्ट पुरुषोंके व्रतको जानते हैं, इसलिये युद्धमें प्राणत्याग करनेकी इच्छासे मेरे पुत्रोंकी सेनाके अग्रभागमें डटे रहेंगे ॥ ४६ ॥

बलीयः सर्वतो दिष्टं पुरुषस्य विशेषतः ।

पश्यन्नपि जयं तेषां न नियच्छामि यत् सुतान् ॥ ४७ ॥

पुरुषका भाग्य ही सबसे विशेष प्रबल है, क्योंकि मैं पाण्डवोंकी विजय समझकर भी अपने पुत्रोंको रोक नहीं पाता हूँ ॥ ४७ ॥

ते पुराणं महेष्वासा मार्गमैन्द्रं समास्थिताः ।

त्यक्ष्यन्ति तुमुले प्राणान् रक्षन्तः पार्थिवं यशः ॥ ४८ ॥

पृष्ठ 444

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धृतराष्ट्रकी सभामें संजय पाण्डवोंका सन्देश सुना रहे हैं Gmail भीमसेनका बल बखानते हुए धृतराष्ट्रका विलाप

पृष्ठ 445

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वे महाधनुर्धर भीष्म आदि पुरातन स्वर्गीय मार्गका आश्रय ले पार्थिव यशकी रक्षा करते हुए घमासान युद्धमें अपने प्राण त्याग देंगे ॥ ४८ ॥

यथैषां मामकास्तात तथैषां पाण्डवा अपि ।

पौत्रा भीष्मस्य शिष्याश्च द्रोणस्य च कृपस्य च ॥ ४ ९ ॥

तात! इनके लिये जैसे मेरे पुत्र हैं, वैसे ही पाण्डव भी हैं । दोनों ही भीष्मके पौत्र तथा द्रोण और कृपके शिष्य हैं ॥ ४ ९ ॥

यदस्मदाश्रयं किंचिद् दत्तमिष्टं च संजय ।

तस्यापचितिमार्यत्वात् कर्तारः स्थविरास्त्रयः ॥ ५० ॥

संजय! भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य – ये तीनों वृद्ध श्रेष्ठ पुरुष हैं; अतः हमारे आश्रयमें रहकर इन्होंने जो कुछ भी दान-यज्ञ आदि किया है, ये उसका बदला चुकायेंगे ( युद्धमें दुर्योधनका ही साथ देंगे ) ॥ ५० ॥

आददानस्य शस्त्रं हि क्षत्रधर्मं परीप्सतः ।

निधनं क्षत्रियस्याजौ वरमेवाहुरुत्तमम् ॥ ५१ ॥

जो अस्त्र- शस्त्र धारण करके क्षात्रधर्मकी रक्षा करना चाहता है, उस क्षत्रियके लिये संग्राममें होनेवाली मृत्युको ही श्रेष्ठ एवं उत्तम माना गया है ॥ ५१ ॥

स वै शोचामि सर्वान् वै ये युयुत्सन्ति पाण्डवैः ।

विक्रुष्टं विदुरेणादौ तदेतद् भयमागतम् ॥ ५२ ॥

जो लोग पाण्डवोंसे युद्ध करना चाहते हैं, उन सबके लिये मुझे बड़ा शोक हो रहा है । विदुरने पहले ही उच्चस्वरसे जिसकी घोषणा की थी, वही यह भय आज आ पहुँचा है ॥ ५२ ॥

न तु मन्ये विघाताय ज्ञानं दुःखस्य संजय ।

भवत्यतिबलं ह्येतज्ज्ञानस्याप्युपघातकम् ॥ ५३ ॥

संजय! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि ज्ञान दुःखका नाश नहीं कर सकता, अपितु प्रबल दुःख ही ज्ञानका भी नाश करनेवाला बन जाता है ॥ ५३ ॥

ऋषयो ह्यपि निर्मुक्ताः पश्यन्तो लोकसंग्रहान् ।

सुखैर्भवन्ति सुखिनस्तथा दुःखेन दुःखिताः ॥ ५४ ॥

जीवन्मुक्त महर्षि भी लोकव्यवहारकी ओर दृष्टि रखकर सुखके साधनोंसे सुखी और दुःखसे दुःखी होते हैं ॥ ५४ ॥

किं पुनर्मोहमासक्तस्तत्र तत्र सहस्रधा ।

पुत्रेषु राज्यदारेषु पौत्रेष्वपि च बन्धुषु ॥ ५५ ॥

फिर जो पुत्र, राज्य, पत्नी, पौत्र तथा बन्धु बान्धवोंमें जहाँ-तहाँ सहस्रों प्रकारसे मोहवश आसक्त हो रहा है, उसकी तो बात ही क्या है? ॥ ५५ ॥

संशये तु महत्यस्मिन् किं नु मे क्षममुत्तरम् ।

पृष्ठ 446

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विनाशं ह्येव पश्यामि कुरूणामनुचिन्तयन् ॥ ५६ ॥

इस महान् संकटके विषयमें मैं क्या उचित प्रतीकार कर सकता हूँ? मुझे तो बार- बार विचार करनेपर कौरवोंका विनाश ही दिखायी पड़ता है ॥ ५६ ॥

द्यूतप्रमुखमाभाति कुरूणां व्यसनं महत् ।

मन्देनैश्वर्यकामेन लोभात् पापमिदं कृतम् ॥ ५७ ॥

द्यूतक्रीड़ा आदिकी घटनाएँ ही कौरवोंपर भारी विपत्ति लानेका कारण प्रतीत होती हैं ।

ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले मूर्ख दुर्योधनने लोभवश यह पाप किया है ॥ ५७ ॥

मन्ये पर्यायधर्मोऽयं कालस्यात्यन्तगामिनः ।

चक्रे प्रधिरिवासक्तो नास्य शक्यं पलायितुम् ॥ ५८ ॥

मैं समझता हूँ कि अत्यन्त तीव्र गतिसे चलनेवाले कालका ही यह क्रमशः प्राप्त होनेवाला नियम है । इस कालचक्रमें उसकी नेमिके समान मैं जुड़ा हुआ हूँ, अतः मेरे लिये इससे दूर भागना सम्भव नहीं है ॥ ५८ ॥

किंनु कुर्यां कथं कुर्यां क्व नु गच्छामि संजय ।

एते नश्यन्ति कुरवो मन्दाः कालवशं गताः ॥ ५ ९ ॥

संजय! क्या करूँ, कैसे करूँ और कहाँ चला जाऊँ? ये मूर्ख कौरव कालके वशीभूत होकर नष्ट होना चाहते हैं ॥ ५ ९ ॥

अवशोऽहं तदा तात पुत्राणां निहते शते ।

श्रोष्यामि निनदं स्त्रीणां कथं मां मरणं स्पृशेत् ॥ ६० ॥

तात! मेरे सौ पुत्र यदि युद्धमें मारे गये, तब विवश होकर मैं इनकी अनाथ स्त्रियोंका

करुण क्रन्दन सुनूँगा । हाय! मेरी मृत्यु किस प्रकार हो सकती है? ॥ ६० ॥

यथा निदाघे ज्वलनः समिद्धो दहेत् कक्षं वायुना चोद्यमानः । गदाहस्तः पाण्डवो वै तथैव हन्ता मदीयान् सहितोऽर्जुनेन ॥ ६१ ॥

जैसे गर्मीमें प्रज्वलित हुई अग्नि हवाका सहारा पाकर घास- फूस एवं जंगलको भी जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनसहित पाण्डुनन्दन भीम गदा हाथमें लेकर मेरे सब पुत्रोंको मार डालेगा ॥ ६१ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपवमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

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पृष्ठ 447

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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः धृतराष्ट्रद्वारा अर्जुनसे प्राप्त होनेवाले भयका वर्णन धृतराष्ट्रउवाच

यस्य वै नानृता वाचः कदाचिदनुशुश्रुम ।

त्रैलोक्यमपि तस्य स्याद् योद्धा यस्य धनंजयः ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले — संजय! जिनके मुँहसे कभी कोई झूठ बात निकलती हमने नहीं सुनी है तथा जिनके पक्षमें धनंजय जैसे योद्धा हैं, उन धर्मराज युधिष्ठिरको ( भूमण्डलका कौन कहे, ) तीनों लोकोंका राज्य भी प्राप्त हो सकता है ॥ १ ॥

तस्यैव च न पश्यामि युधि गाण्डीवधन्वनः ।

अनिशं चिन्तयानोऽपि यः प्रतीयाद् रथेन तम् ॥ २ ॥

मैं निरन्तर सोचने - विचारनेपर भी युद्धमें गाण्डीवधारी अर्जुनका ही सामना करनेवाले किसी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो रथपर आरूढ़ हो उनके सम्मुख जा सके ॥

अस्यतः कर्णिनालीकान् मार्गणान् हृदयच्छिदः ।

प्रत्येता न समः कश्चिद् युधि गाण्डीवधन्वनः ॥ ३ ॥

जो हृदयको विदीर्ण कर देनेवाले कर्णी और नालीक आदि बाणोंकी निरन्तर वर्षा करते हैं, उन गाण्डीवधन्वा अर्जुनका युद्धमें सामना करनेवाला कोई भी समकक्ष योद्धा नहीं है ॥ ३ ॥

द्रोणकर्णौ प्रतीयातां यदि वीरौ नरर्षभौ ।

कृतास्त्रौ बलिनां श्रेष्ठौ समरेष्वपराजितौ ॥ ४ ॥

महान् स्यात् संशयो लोके न त्वस्ति विजयो मम ।

घृणी कर्णः प्रमादी च आचार्यः स्थविरो गुरुः ॥ ५ ॥

यदि बलवानोंमें श्रेष्ठ, अस्त्रविद्याके पारंगत विद्वान् तथा युद्धमें कभी पराजित न होनेवाले, मनुष्योंमें अग्रगण्य वीरवर द्रोणाचार्य और कर्ण अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ें तो भी मुझे अर्जुनपर विजय प्राप्त होनेमें महान् संदेह रहेगा । मैं तो देखता हूँ मेरी विजय होगी ही नहीं; क्योंकि कर्ण दयालु और प्रमादी है और आचार्य द्रोण वृद्ध होनेके साथ ही अर्जुनके गुरु हैं ॥ ४-५ ॥

समर्थो बलवान् पार्थो दृढधन्वा जितक्लमः ।

भवेत् सुतुमुलं युद्धं सर्वशोऽप्यपराजयः ॥ ६ ॥

कुन्तीपुत्र अर्जुन समर्थ और बलवान् हैं । उनका धनुष भी सुदृढ़ है । वे आलस्य और थकावटको जीत चुके हैं, अतः उनके साथ जो अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ेगा, उसमें सब प्रकारसे उनकी ही विजय होगी ॥ ६ ॥

पृष्ठ 448

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सर्वे ह्यस्त्रविदः शूराः सर्वे प्राप्ता महद् यशः ।

अपि सर्वामरैश्वर्यं त्यजेयुर्न पुनर्जयम् ॥ ७ ॥

समस्त पाण्डव अस्त्रविद्याके ज्ञाता, शूरवीर तथा महान् यशको प्राप्त हैं । वे समस्त देवताओंका ऐश्वर्य छोड़ सकते हैं, परंतु अपनी विजयसे मुँह नहीं मोड़ेंगे ॥ ७ ॥

वधे नूनं भवेच्छान्तिस्तयोर्वा फाल्गुनस्य च ।

न तु हन्तार्जुनस्यास्ति जेता चास्य न विद्यते ॥ ८ ॥

मन्युस्तस्य कथं शाम्येन्मन्दान् प्रति य उत्थितः । निश्चय ही द्रोणाचार्य और कर्णका वध हो जानेपर हमारे पक्षके लोग शान्त हो जायँगे अथवा अर्जुनके मारे जानेपर पाण्डव शान्त हो बैठेंगे, परंतु अर्जुनका वध करने वाला तो कोई है ही नहीं, उन्हें जीतनेवाला भी संसारमें कोई नहीं है । मेरे मन्दबुद्धि पुत्रोंके प्रति उनके हृदयमें जो क्रोध जाग उठा है, वह कैसे शान्त होगा? ॥ ८३ ॥

अन्येऽप्यस्त्राणि जानन्ति जीयन्ते च जयन्ति च ॥ ९ ॥

एकान्तविजयस्त्वेव श्रूयते फाल्गुनस्य ह । दूसरे योद्धा भी अस्त्र चलाना जानते हैं, परंतु वे कभी हारते हैं और कभी जीतते भी हैं । केवल अर्जुन ही ऐसे हैं, जिनकी निरन्तर विजय ही सुनी जाती है ॥ त्रयस्त्रिंशत् समाहूय खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् ॥ १० ॥

जिगाय च सुरान् सर्वान् नास्य विद्मः पराजयम् । खाण्डवदाहके समय अर्जुनने ( मुख्य-मुख्य) तैंतीस* देवताओंको युद्धके लिये ललकारकर अग्नि- देवको तृप्त किया और सभी देवताओंको जीत लिया । उनकी कभी पराजय हुई हो, इसका पता हमें आजतक नहीं लगा ॥ १०३ ॥

यस्य यन्ता हृषीकेशः शीलवृत्तसमो युधि ॥ ११ ॥

ध्रुवस्तस्य जयस्तात यथेन्द्रस्य जयस्तथा । तात! साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण, जिनका स्वभाव और आचार- व्यवहार भी अर्जुनके ही समान है, अर्जुनका रथ हाँकते हैं, अतः इन्द्रकी विजयकी भाँति उनकी भी विजय निश्चित है ॥ ११३ ॥

कृष्णावेकरथे यत्तावधिज्यं गाण्डिवं धनुः ॥ १२ ॥

युगपत् त्रीणि तेजांसि समेतान्यनुशुश्रुम । श्रीकृष्ण और अर्जुन एक रथपर उपस्थित हैं और गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचा चढ़ी हुई है, इस प्रकार ये तीनों तेज एक ही साथ एकत्र हो गये हैं, यह हमारे सुननेमें आया है ॥ १२ ॥ नैवास्ति नो धनुस्तादृक् न योद्धा न च सारथिः ॥ १३ ॥

तच्च मन्दा न जानन्ति दुर्योधनवशानुगाः ।

पृष्ठ 449

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हमलोगोंके यहाँ न तो वैसा धनुष है, न अर्जुन- जैसा पराक्रमी योद्धा है और न श्रीकृष्णके समान सारथि ही है, परंतु दुर्योधनके वशीभूत हुए मेरे मूर्ख पुत्र इस बातको नहीं समझ पाते ॥ १३३ ॥

शेषयेदशनिर्दीप्तो विपतन् मूर्ध्नि संजय ॥। १४ ॥ न तु शेषं शरास्तात कुर्युरस्ताः किरीटिना । तात संजय! अपने तेजसे जलता हुआ वज्र किसीके मस्तकपर पड़कर सम्भव है, उसके जीवनको बचा दे, परंतु किरीटधारी अर्जुनके चलाये हुए बाण जिसे लग जायँगे, उसे जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥ १४ ॥

अपि चास्यन्निवाभाति निघ्नन्निव धनंजयः ॥ १५ ॥

उद्धरन्निव कायेभ्यः शिरांसि शरवृष्टिभिः । मुझे तो वीर धनंजय युद्धमें बाणोंको चलाते, योद्धाओंके प्राण लेते और अपनी बाणवर्षाद्वारा उनके शरीरोंसे मस्तकोंको काटते हुए - से प्रतीत हो रहे हैं ॥ अपि बाणमयं तेजः प्रदीप्तमिव सर्वतः ॥ १६ ॥

गाण्डीवोत्थं दहेताजी पुत्राणां मम वाहिनीम् । क्या गाण्डीव धनुषसे प्रकट हुआ बाणमय तेज सब ओर प्रज्वलित- सा होकर मेरे पुत्रोंकी ( विशाल) वाहिनीको युद्धमें जलाकर भस्म कर डालेगा? ॥ १६३ ॥

अपि सारथ्यघोषेण भयार्ता सव्यसाचिनः ॥ १७ ॥

वित्रस्ता बहुधा सेना भारती प्रतिभाति मे । मुझे स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि श्रीकृष्णके रथ- संचालनकी आवाज सुनकर भरतवंशियोंकी यह सेना सव्यसाची अर्जुनके भयसे पीड़ित और नाना प्रकारसे आतंकित हो जायगी ॥ १७३ ॥

यथा कक्षं महानग्निः प्रदहेत् सर्वतश्चरन् ।

महार्चिरनिलोद्धूतस्तद्वद् धक्ष्यति मामकान् ॥ १८ ॥

जैसे वायुके वेगसे बढ़ी हुई आग सब ओर फैलकर प्रचण्ड लपटोंसे युक्त हो घास -फूस अथवा जंगलको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार अर्जुन मेरे पुत्रोंको दग्ध कर डालेंगे ॥ १८ ॥

यदोद्वमन् निशितान् बाणसंघां- स्तानाततायी समरे किरीटी । सृष्टोऽन्तकः सर्वहरो विधात्रा यथा भवेत् तद्वदपारणीयः ॥ १ ९ ॥ जिस समय शस्त्रपाणि किरीटधारी अर्जुन समर- भूमिमें रोषपूर्वक पैने बाणसमूहोंकी वर्षा करेंगे, उस समय विधाताके रचे हुए सर्वसंहारक कालके समान उनसे पार पाना असम्भव हो जायगा ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 450

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तदा ह्यभीक्ष्णं सुबहून् प्रकारान् श्रोतास्मि तानावसथे कुरूणाम् । तेषां समन्ताच्च तथा रणाग्रे क्षयः किलायं भरतानुपैति ॥ २० ॥

उस समय मैं महलोंमें बैठा हुआ बार- बार कौरवोंकी विविध अवस्थाओंकी कथा सुनता रहूँगा । अहो! युद्धके मुहानेपर निश्चय ही सब ओरसे यह भरतवंशका विनाश आ पहुँचा है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

* कुछ विद्वान् ‘ त्रयस्त्रिंशत् समाऽऽहूय ' ऐसा पाठ मानकर आर्ष संधिकी कल्पना करके यह अर्थ करते हैं कि तैंतीस वर्षकी अवस्था बीत जानेपर अर्जुनने अग्निदेवको खाण्डववनमें बुलाकर तृप्त किया था ।