03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 521–530
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 521–530
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एकस्य च बहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ १५ ॥
विराटनगरमें तुम्हारे भाइयोंसहित जो सारी सेना युद्धके लिये गयी थी, वह वहाँकी समस्त गौओंको छोड़कर अत्यन्त भयभीत हो तुम्हारे सामने ही भाग खड़ी हुई थी । उस नगरमें जो एक ( अर्जुन) - का बहुतोंके साथ अत्यन्त अद्भुत युद्ध हुआ सुना जाता है; वह एक ही दृष्टान्त ( उसकी प्रबलता और अजेयताके लिये ) पर्याप्त है ॥ १४-१५ ॥
अर्जुनस्तत् तथाकार्षीत् किं पुनः सर्व एव ते ।
स भ्रातॄनभिजानीहि वृत्त्या तं प्रतिपादय ॥ १६ ॥
देखो, जब अकले अर्जुनने इतना अद्भुत कार्य कर डाला, तब वे सब भाई मिलकर क्या नहीं कर सकते? अतः तुम पाण्डवोंको अपना भाई ही समझो और उनकी वृत्ति ( स्वत्व ) उन्हें देकर उनके साथ भ्रातृत्व बढ़ाओ ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
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षट्षष्टितमोऽध्यायः संजयका धृतराष्ट्रको अर्जुनका संदेश सुनाना वैशम्पायनउवाच
एवमुक्त्वा महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रः सुयोधनम् ।
पुनरेव महाभागः संजयं पर्यपृच्छत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! दुर्योधनसे ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् महाभाग धृतराष्ट्रने संजयसे पुनः प्रश्न किया— ॥ १ ॥
ब्रूहि संजय यच्छेषं वासुदेवादनन्तरम् ।
यदर्जुन उवाच त्वां परं कौतूहलं हि मे ॥ २ ॥
‘ संजय! बताओ, भगवान् श्रीकृष्णके पश्चात् अर्जुनने जो अन्तिम संदेश दिया था, उसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ' ॥ २ ॥
संजय उवाच
वासुदेववचः श्रुत्वा कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
उवाच काले दुर्धर्षो वासुदेवस्य शृण्वतः ॥३ ॥
संजयने कहा – महाराज! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी बात सुनकर दुर्धर्ष वीर कुन्तीकुमार अर्जुनने उनके सुनते - सुनते यह समयोचित बात कही- ॥ ३ ॥
पितामहं शान्तनवं धृतराष्ट्रं च संजय ।
द्रोणं कृपं च कर्णं च महाराजं च बाह्निकम् ॥ ४ ॥
द्रौणिं च सोमदत्तं च शकुनिं चापि सौबलम् ।
दुःशासनं शलं चैव पुरुमित्रं विविंशतिम् ॥ ५ ॥
विकर्णं चित्रसेनं च जयत्सेनं च पार्थिवम् ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दुर्मुखं चापि कौरवम् ॥ ६ ॥
सैन्धवं दुःसहं चैव भूरिश्रवसमेव च ।
भगदत्तं च राजानं जलसन्धं च पार्थिवम् ॥ ७ ॥
ये चाप्यन्ये पार्थिवास्तत्र योद्धुं समागताः कौरवाणां प्रियार्थम् । मुमूर्षवः पाण्डवाग्नौ प्रदीप्ते समानीता धार्तराष्ट्रेण होतुम् ॥ ८ ॥
यथान्यायं कौशलं वन्दनं च समागता मद्वचनेन वाच्याः ।
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इदं ब्रूयाः संजय राजमध्ये सुयोधनं पापकृतां प्रधानम् ॥ ९ ॥
अमर्षणं दुर्मतिं राजपुत्रं पापात्मानं धार्तराष्ट्रं सुलुब्धम् । सर्वं ममैतद् वचनं समग्रं सहामात्यं संजय श्रावयेथाः ॥ १० ॥
‘ संजय! तुम शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, राजा धृतराष्ट्र, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, महाराज बाह्लीक, अश्वत्थामा, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, शल, पुरुमित्र, विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, राजा जयत्सेन, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, कौरवयोद्धा दुर्मुख, सिंधुराज जयद्रथ, दुःसह, भूरिश्रवा, राजा भगदत्त, भूपाल जलसन्ध तथा अन्य जो- जो नरेश कौरवोंका प्रिय करनेके लिये युद्धके उद्देश्यसे वहाँ एकत्र हुए हैं, जिनकी मृत्यु बहुत ही निकट है, जिन्हें दुर्योधनने पाण्डवरूपी प्रज्वलित अग्निमें होमनेके लिये बुलाया है, उन सबसे मिलकर मेरी ओरसे यथायोग्य प्रणाम आदि कहकर उनका कुशल - मंगल पूछना । संजय! तत्पश्चात् उन राजाओंके समुदायमें ही पापात्माओंमें प्रधान, असहिष्णु, दुर्बुद्धि, पापाचारी और अत्यन्त लोभी राजकुमार दुर्योधन और उसके मन्त्रियोंको मेरी कही हुई ये सारी बातें सुनाना' ॥ ४–१० ॥ एवं प्रतिष्ठाप्य धनंजयो मां ततोऽर्थवद् धर्मवच्चापि वाक्यम् । प्रोवाचेदं वासुदेवं समीक्ष्य पार्थो धीमाँल्लोहितान्तायताक्षः ॥ ११ ॥
इस प्रकार मुझे हस्तिनापुर जानेकी अनुमति देकर, जिनके विशाल नेत्रोंका कोना कुछ लाल रंगका है, उन परम बुद्धिमान् कुन्तीकुमार अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखकर यह धर्म और अर्थसे युक्त वचन कहा- ॥ ११ ॥
यथा श्रुतं ते वदतो महात्मनो मधुप्रवीरस्य वचः समाहितम् । तथैव वाच्यं भवता हि मद्वचः समागतेषु क्षितिपेषु सर्वशः ॥ १२ ॥
‘ संजय! मधुवंशके प्रमुख वीर महात्मा श्रीकृष्णने एकाग्रचित्त होकर जो बात कही है और तुमने इसे जैसा सुना है, वह सब ज्यों -का - त्यों सुना देना । फिर समस्त समागत भूपालोंकी मण्डलीमें मेरी यह बात कहना- ॥ १२ ॥
शराग्निधूमे रथनेमिनादिते धनुःस्रुवेणास्त्रबलप्रसारिणा । यथा न होमः क्रियते महामृधे
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समेत्य सर्वे प्रयतध्वमादृताः ॥ १३ ॥
‘ राजाओ! महान् युद्धरूपी यज्ञमें जहाँ बाणोंके टकरानेसे पैदा होनेवाली आगका धुआँ फैलता रहता है, रथोंकी घर्घराहट ही वेदमन्त्रोंकी ध्वनिका काम देती है, ( शास्त्रबलसे सम्पादित होनेवाले यज्ञकी भाँति) अस्त्रबलसे ही फैलनेवाले धनुषरूपी स्रुवाके द्वारा मुझे जिस प्रकार कौरवसैन्यरूपी हविष्यकी आहुति न देनी पड़े, उसके लिये तुम सब लोग सादर प्रयत्न करो ॥ १३ ॥
न चेत् प्रयच्छध्वममित्रघातिनो युधिष्ठिरस्य समभीप्सितं स्वकम् । नयामि वः साश्वपदातिकुञ्जरान् _दिशं पितॄणामशिवां शितैः शरैः ॥ १४ ॥
'यदि तुमलोग शत्रुघाती महाराज युधिष्ठिरका अपना अभीष्ट राज्यभाग नहीं लौटाओगे तो मैं तुम्हें अपने तीखे बाणोंद्वारा घोड़े, पैदल तथा हाथीसवारोंसहित यमलोककी अमंगलमयी दिशामें भेज दूँगा' ॥ १४ ॥
ततोऽहमामन्त्र्य तदा धनंजयं चतुर्भुजं चैव नमस्य सत्वरः । जवेन सम्प्राप्त इहामरद्युते तवान्तिकं प्रापयितुं वचो महत् ॥ १५ ॥
देवताओंके समान तेजस्वी महाराज! इसके बाद मैं अर्जुनसे विदा ले चतुर्भुज भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करके उनका वह महत्त्वपूर्ण संदेश आपके पास पहुँचानेके लिये बड़े वेगसे तुरंत यहाँ चला आया हूँ ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
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सप्तषष्टितमोऽध्यायः धृतराष्ट्रके पास व्यास और गान्धारीका आगमन तथा व्यासजीका संजयको श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्बन्धमें कुछ कहनेका आदेश वैशम्पायन उवाच
दुर्योधने धार्तराष्ट्रे तद् वचो नाभिनन्दति ।
तूष्णीम्भूतेषु सर्वेषु समुत्तस्थुर्नरर्षभाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने जब श्रीकृष्ण और अर्जुनके उस कथनका कुछ भी आदर नहीं किया और सब लोग चुप्पी साधकर रह गये, तब वहाँ बैठे हुए समस्त नरश्रेष्ठ भूपालगण वहाँसे उठकर चले गये ॥ १ ॥
उत्थितेषु महाराज पृथिव्यां सर्वराजसु ।
रहिते संजयं राजा परिप्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ २ ॥
आशंसमानो विजयं तेषां पुत्रवशानुगः ।
आत्मनश्च परेषां च पाण्डवानां च निश्चयम् ॥ ३ ॥
महाराज! भूमण्डलके सब राजा जब सभाभवनसे उठ गये, तब अपने पुत्रोंकी विजय चाहनेवाले तथा उन्हींके वशमें रहनेवाले राजा धृतराष्ट्रने वहाँ एकान्तमें अपनी, दूसरोंकी और पाण्डवोंकी जय - पराजयके विषयमें संजयका निश्चित मत जाननेके लिये उनसे कुछ और बातें पूछनी प्रारम्भ की ॥ २-३ ॥ धृतराष्ट्रउवाच गावल्गणे ब्रूहि नः सारफल्गु स्वसेनायां यावदिहास्ति किंचित् । त्वं पाण्डवानां निपुणं वेत्थ सर्वं किमेषां ज्यायः किमु तेषां कनीयः ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्र बोले — गवल्गणपुत्र संजय! यहाँ अपनी सेनामें जो कुछ भी प्रबलता या दुर्बलता है, उसका हमसे वर्णन करो । इसी प्रकार पाण्डवोंकी भी सारी बातें तुम अच्छी तरह जानते हो, अतः बताओ; ये किन बातोंमें बढ़े - चढ़े हैं और उनमें कौन - कौन - सी त्रुटियाँ हैं? ॥ ४ ॥
त्वमेतयोः सारवित् सर्वदर्शी धर्मार्थयोर्निपुणो निश्चयज्ञः । स मे पृष्टः संजय ब्रूहि सर्वं
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युध्यमानाः कतरेऽस्मिन् न सन्ति ॥ ५ ॥
संजय! तुम इन दोनों पक्षोंके बलाबलको जाननेवाले, सर्वदर्शी, धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण तथा निश्चित सिद्धान्तके ज्ञाता हो; अतः मेरे पूछनेपर सब बातें साफ - साफ कहो । युद्धमें प्रवृत्त होनेपर किस पक्षके लोग इस लोकमें जीवित नहीं रह सकते? ॥ ५ ॥
संजय उवाच न त्वां ब्रूयां रहिते जातु किंचि- सूया हि त्वां प्रविशेत राजन् । आनयस्व पितरं महाव्रतं गान्धारी च महिषीमाजमीढ ॥ ६ ॥
संजयने कहा- राजन्! एकान्तमें तो मैं आपसे कभी कोई बात नहीं कह सकता, क्योंकि इससे आपके हृदयमें दोषदर्शनकी भावना उत्पन्न होगी । अजमीढनन्दन! आप अपने महान् व्रतधारी पिता व्यासजी और महारानी गान्धारीको भी यहाँ बुलवा लीजिये ॥ ६ ॥
तौ तेऽसूयां विनयेतां नरेन्द्र धर्मज्ञौ तौ निपुणौ निश्चयज्ञौ । तयोस्तु त्वां संनिधौ तद् वदेयं कृत्स्नं मतं केशवपार्थयोर्यत् ॥ ७ ॥
नरेन्द्र! वे दोनों धर्मके ज्ञाता, विचारकुशल तथा सिद्धान्तको समझनेवाले हैं; अतः वे आपकी दोषदृष्टिका निवारण करेंगे । उन दोनोंके समीप मैं आपको श्रीकृष्ण और अर्जुनका जो विचार है, वह पूरा - पूरा बता दूँगा ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तेन च गान्धारी व्यासश्चात्राजगाम ह ।
आनीतौ विदुरेणेह सभां शीघ्रं प्रवेशितौ ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! संजयके ऐसा कहनेपर ( धृतराष्ट्रकी प्रेरणासे ) गान्धारी तथा महर्षि व्यास वहाँ आये । विदुरजी उन्हें यहाँ बुलाकर ले आये और सभाभवनमें शीघ्र ही उनका प्रवेश कराया ॥ ८ ॥
ततस्तन्मतमाज्ञाय संजयस्यात्मजस्य च ।
अभ्युपेत्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ९ ॥
तदनन्तर परम ज्ञानी श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास सभा भवनमें पहुँचकर संजय तथा अपने पुत्र धृतराष्ट्रके उस विचारको जानकर इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥
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व्यास उवाच सम्पृच्छते धृतराष्ट्राय संजय आचक्ष्व सर्वं यावदेषोऽनुयुङ्क्ते । सर्वं यावत् वेत्थ तस्मिन् यथावद् याथातथ्यं वासुदेवेऽर्जुने च ॥ १० ॥
व्यासजीने कहा — संजय! धृतराष्ट्र तुमसे जो कुछ जानना चाहते हैं, वह सब इन्हें बताओ । ये भगवान् श्रीकृष्ण तथा अर्जुनके विषयमें जो कुछ पूछते हैं, वह सब, जितना तुम जानते हो, उसके अनुसार यथार्थरूपसे कहो ॥ १० ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि व्यासगान्धार्यागमने सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें व्यास और गान्धारीके आगमनसे सम्बन्ध रखनेवाला सरसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ //
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अष्टषष्टितमोऽध्यायः संजयका धृतराष्ट्रको भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा बतलाना संजय उवाच
अर्जुनो वासुदेवश्च धन्विनौ परमार्चितौ ।
कामादन्यत्र सम्भूतौ सर्वभावाय सम्मितौ ॥ १ ॥
संजयने कहा- राजन्! अर्जुन तथा भगवान् श्रीकृष्ण दोनों बड़े सम्मानित धनुर्धर हैं । वे ( यद्यपि सदा साथ रहनेवाले नर और नारायण हैं, तथापि ) लोककल्याणकी कामनासे पृथक् - पृथक् प्रकट हुए हैं और सब कुछ करनेमें समर्थ हैं ॥ १ ॥
व्यामान्तरं समास्थाय यथामुक्तं मनस्विनः ।
चक्रं तद् वासुदेवस्य मायया वर्तते विभो ॥ २ ॥
प्रभो! उदारचेता भगवान् वासुदेवका सुदर्शन नामक चक्र उनकी मायासे अलक्षित होकर उनके पास रहता है । उसके मध्यभागका विस्तार लगभग साढ़े तीन हाथका है । वह भगवान्के संकल्पके अनुसार (विशाल एवं तेजस्वी रूप धारण करके शत्रुसंहारके लिये ) प्रयुक्त होता है ॥ २ ॥
सापह्नवं कौरवेषु पाण्डवानां सुसम्मतम् ।
सारासारबलं ज्ञातुं तेजःपुञ्जावभासितम् ॥ ३ ॥
कौरवोंपर उसका प्रभाव प्रकट नहीं है । पाण्डवोंको वह अत्यन्त प्रिय है । वह सबके सार- असारभूत बलको जाननेमें समर्थ और तेजःपुंजसे प्रकाशित होनेवाला है ॥
नरकं शम्बरं चैव कंसं चैद्यं च माधवः ।
जितवान् घोरसंकाशान् क्रीडन्निव महाबलः ॥ ४ ॥
महाबली भगवान् श्रीकृष्णने अत्यन्त भयंकरप्रतीत होनेवाले नरकासुर, शम्बरसुर, कंस तथा शिशुपालको भी खेल- ही खेलमें जीत लिया ॥ ४ ॥
पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव पुरुषोत्तमः ।
मनसैव विशिष्टात्मा नयत्यात्मवशं वशी ॥ ५ ॥
पूर्णतः स्वाधीन एवं श्रेष्ठस्वरूप पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण मनके संकल्पमात्रसे ही भूतल, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोकको भी अपने अधीन कर सकते हैं ॥ ५ ॥
भूयो भूयो हि यद् राजन् पृच्छसे पाण्डवान् प्रति ।
सारासारबलं ज्ञातुं तत् समासेन मे शृणु ॥ ६ ॥
राजन्! आप जो बारंबार पाण्डवोंके विषयमें, उनके सार या असारभूत बलको जाननेके लिये मुझसे पूछते रहते हैं, वह सब आप मुझसे संक्षेपमें सुनिये ॥ एकतो वा जगत् कृत्स्नमेकतो वा जनार्दनः ।
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सारतो जगतः कृत्स्नादतिरिक्तो जनार्दनः ॥ ७ ॥
एक ओर सम्पूर्ण जगत् हो और दूसरी ओर अकेले भगवान् श्रीकृष्ण हों तो सारभूत बलकी दृष्टिसे वे भगवान् जनार्दन ही सम्पूर्ण जगत्से बढ़कर सिद्ध होंगे ॥
भस्म कुर्याज्जगदिदं मनसैव जनार्दनः ।
न तु कृत्स्नं जगच्छक्तं भस्म कर्तुं जनार्दनम् ॥ ८ ॥
श्रीकृष्ण अपने मानसिक संकल्पमात्रसे इस सम्पूर्ण जगत्को भस्म कर सकते हैं; परंतु उन्हें भस्म करनेमें यह सारा जगत् समर्थ नहीं हो सकता ॥ ८ ॥
यतः सत्यं यतो धर्मो यतो हीरार्जवं यतः ।
ततो भवति गोविन्दो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ ९ ॥
जिस ओर सत्य, धर्म, लज्जा और सरलता है, उसी ओर भगवान् श्रीकृष्ण रहते हैं और जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है ॥ ९ ॥
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च पुरुषोत्तमः ।
विचेष्टयति भूतात्मा क्रीडन्निव जनार्दनः ॥ १० ॥
समस्त प्राणियोंके आत्मा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण खेल- सा करते हुए ही पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोकका संचालन करते हैं ॥ १० ॥
स कृत्वा पाण्डवान् सत्रं लोकं सम्मोहयन्निव ।
अधर्मनिरतान् मूढान् दग्धुमिच्छति ते सुतान् ॥ ११ ॥
वे इस समय समस्त लोकको मोहित- सा करते हुए पाण्डवोंके मिससे आपके अधर्मपरायण मूढ़ पुत्रोंको भस्म करना चाहते हैं ॥ ११ ॥
कालचक्रं जगच्चक्रं युगचक्रं च केशवः ।
आत्मयोगेन भगवान् परिवर्तयतेऽनिशम् ॥ १२ ॥
ये भगवान् केशव ही अपनी योगशक्तिसे निरन्तर कालचक्र, संसारचक्र तथा युगचक्रको घुमाते रहते हैं ॥ १२ ॥
कालस्य च हि मृत्योश्च जङ्गमस्थावरस्य च ।
ईशते भगवानेकः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १३ ॥
मैं आपसे यह सच कहता हूँ कि एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण ही काल, मृत्यु तथा चराचर जगत्के स्वामी एवं शासक हैं ॥ १३ ॥
ईशन्नपि महायोगी सर्वस्य जगतो हरिः ।
कर्माण्यारभते कर्तुं कीनाश इव वर्धनः ॥ १४ ॥
महायोगी श्रीहरि सम्पूर्ण जगत्के स्वामी एवं ईश्वर होते हुए भी खेतीको बढ़ानेवाले किसानकी भाँति सदा नये - नये कर्मोंका आरम्भ करते रहते हैं ॥ १४ ॥
तेन वञ्चयते लोकान् मायायोगेन केशवः ।
ये तमेव प्रपद्यन्ते न ते मुह्यन्ति मानवाः ॥ १५ ॥
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भगवान् केशव अपनी मायाके प्रभावसे सब लोगोंको मोहमें डाले रहते हैं; किंतु जो मनुष्य केवल उन्हींकी शरण ले लेते हैं, वे उनकी मायासे मोहित नहीं होते हैं ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्येऽष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ६८ ॥