03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 531–540

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540

पृष्ठ 531

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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः संजयका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्ण-प्राप्ति एवं तत्त्वज्ञानका साधन बताना धृतराष्ट्रउवाच

कथं त्वं माधवं वेत्थ सर्वलोकमहेश्वरम् ।

कथमेनं न वेदाहं तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा — संजय! मधुवंशी भगवान् श्रीकृष्ण समस्त लोकोंके महान् ईश्वर हैं, इस बातको तुम कैसे जानते हो? और मैं इन्हें इस रूपमें क्यों नहीं जानता? इसका रहस्य मुझे बताओ ॥ १ ॥

संजय उवाच

शृणु राजन् न ते विद्या मम विद्या न हीयते ।

विद्याहीनस्तमोध्वस्तो नाभिजानाति केशवम् ॥ २ ॥

संजयने कहा — राजन्! सुनिये, आपको तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं है और मेरी ज्ञानदृष्टि कभी लुप्त नहीं होती है । जो मनुष्य तत्त्वज्ञानसे शून्य है और जिसकी बुद्धि अज्ञानान्धकारसे विनष्ट हो चुकी है, वह श्रीकृष्णके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान सकता ॥ २ ॥

विद्यया तात जानामि त्रियुगं मधुसूदनम् ।

कर्तारमकृतं देवं भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥ ३ ॥

तात! मैं ज्ञानदृष्टिसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाश करनेवाले त्रियुगस्वरूप भगवान् मधुसूदनको, जो सबके कर्ता हैं, परंतु किसीके कार्य नहीं हैं, जानता हूँ ॥ ३ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

गावल्गणेऽत्र का भक्तिर्या ते नित्या जनार्दने ।

यया त्वमभिजानासि त्रियुगं मधुसूदनम् ॥ ४ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा — संजय! भगवान् श्रीकृष्णमें जो तुम्हारी नित्य भक्ति है, उसका स्वरूप क्या है? जिससे तुम त्रियुगस्वरूप भगवान् मधुसूदनके तत्त्वको जानते हो ॥ ४ ॥

संजय उवाच

मायां न सेवे भद्रं ते न वृथा धर्ममाचरे ।

शुद्धभावं गतो भक्त्या शास्त्राद् वेद्मि जनार्दनम् ॥ ५ ॥

पृष्ठ 532

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संजयने कहा – महाराज! आपका कल्याण हो । मैं कभी माया ( छल- कपट ) -का सेवन नहीं करता । व्यर्थ ( पाखण्डपूर्ण) धर्मका आचरण नहीं करता । भगवान्की भक्तिसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है; अतः मैं शास्त्रके वचनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपको यथावत् जानता हूँ ॥ ५ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

दुर्योधन हृषीकेशं प्रपद्यस्व जनार्दनम् ।

आप्तो नः संजयस्तात शरणं गच्छ केशवम् ॥ ६ ॥

यह सुनकर धृतराष्ट्रने दुर्योधनसे कहा- बेटा दुर्योधन! संजय हमलोगोंका विश्वासपात्र है । इसकी बातोंपर श्रद्धा करके तुम सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णका आश्रय लो; उन्हींकी शरणमें जाओ ॥ ६ ॥

दुर्योधन उवाच

भगवान् देवकीपुत्रो लोकांश्चेन्निहनिष्यति ।

प्रवदन्नर्जुने सख्यं नाहं गच्छेऽद्य केशवम् ॥७ ॥

दुर्योधन बोला- पिताजी! माना कि देवकीनन्दन श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं और वे इच्छा करते ही सम्पूर्ण लोकोंका संहार कर डालेंगे, तथापि वे अपनेको अर्जुनका मित्र बताते हैं; अतः अब मैं उनकी शरणमें नहीं जाऊँगा ॥ ७ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

अवाग् गान्धारि पुत्रस्ते गच्छत्येष सुदुर्मतिः ।

ईर्षुर्दुरात्मा मानी च श्रेयसां वचनातिगः ॥ ८ ॥

तब धृतराष्ट्रने गान्धारीसे कहा - गान्धारी! तुम्हारा दुर्बुद्धि, दुरात्मा, ईर्ष्यालु और अभिमानीपुत्र श्रेष्ठ पुरुषोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके नरककी ओर जा रहा है ॥ ८ ॥

गान्धार्युवाच

ऐश्वर्यकाम दुष्टात्मन् वृद्धानां शासनातिग ।

ऐश्वर्यजीविते हित्वा पितरं मां च बालिश ॥ ९ ॥

वर्धयन् दुर्हृदां प्रीतिं मां च शोकेन वर्धयन् ।

निहतो भीमसेनेन स्मर्तासि वचनं पितुः ॥ १० ॥

गान्धारी बोली – दुष्टात्मा दुर्योधन! तू ऐश्वर्यकी इच्छा रखकर अपने बड़े - बूढ़ोंकी आज्ञाका उल्लंघन करता है! अरे मूर्ख! इस ऐश्वर्य, जीवन, पिता और मुझ माताको भी त्यागकर शत्रुओंकी प्रसन्नता और मेरा शोक बढ़ाता हुआ जब तू भीमसेनके हाथों मारा जायगा, उस समय तुझे पिताकी बातें याद आयेंगी ॥ ९ -१० ॥ व्यास उवाच

पृष्ठ 533

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प्रियोऽसि राजन् कृष्णस्य धृतराष्ट्र निबोध मे ।

यस्य ते संजयो दूतो यस्त्वां श्रेयसि योक्ष्यते ॥ ११ ॥

तदनन्तर व्यासजीने कहा- राजा धृतराष्ट्र! मेरी बातोंपर ध्यान दो । वास्तवमें तुम श्रीकृष्णके प्रिय हो, तभी तो तुम्हें संजय -जैसा दूत मिला है, जो तुम्हें कल्याण- साधनमें लगायेगा ॥ ११ ॥

जानात्येष हृषीकेशं पुराणं यच्च वै परम् ।

शुश्रूषमाणमेकाग्रं मोक्ष्यते महतो भयात् ॥ १२ ॥

यह संजय पुराणपुरुष भगवान् श्रीकृष्णको जानता है और उनका जो परमतत्त्व है, वह भी इसे ज्ञात है । यदि तुम एकाग्रचित्त होकर इसकी बातें सुनोगे तो यह तुम्हें महान् भयसे मुक्त कर देगा ॥ १२ ॥

वैचित्रवीर्य पुरुषाः क्रोधहर्षसमावृताः ।

सिता बहुविधैः पाशैर्ये न तुष्टाः स्वकैर्धनैः ॥ १३ ॥

यमस्य वशमायान्ति काममूढाः पुनः पुनः ।

अन्धनेत्रा यथैवान्धा नीयमानाः स्वकर्मभिः ॥ १४ ॥

विचित्रवीर्यकुमार! जो मनुष्य अपने धनसे संतुष्ट नहीं हैं और काम आदि विविध प्रकारके बन्धनोंसे बँधकर हर्ष और क्रोधके वशीभूत हो रहे हैं, वे काममोहित पुरुष अंधोंके नेतृत्वमें चलनेवाले अंधोंकी भाँति अपने कर्मोंद्वारा प्रेरित होकर बारंबार यमराजके वशमें आते हैं ॥ १३-१४ ॥

एष एकायनः पन्था येन यान्ति मनीषिणः ।

तं दृष्ट्वा मृत्युमत्येति महांस्तत्र न सज्जति ॥ १५ ॥

यह ज्ञानमार्ग एकमात्र परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है । जिसपर मनीषी ( ज्ञानी ) पुरुष चलते हैं, उस मार्गको देख या जान लेनेपर मनुष्य जन्म- मृत्युरूप संसारको लाँघ जाता है और वह महात्मा पुरुष कभी इस संसारमें आसक्त नहीं होता है ॥ १५ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

अङ्ग संजय मे शंस पन्थानमकुतोभयम् ।

येन गत्वा हृषीकेशं प्राप्नुयां सिद्धिमुत्तमाम् ॥ १६ ॥

धृतराष्ट्र बोले- वत्स संजय! तुम मुझे वह निर्भय मार्ग बताओ, जिससे चलकर मैं सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी परममोक्षस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त कर सकूँ ॥ १६ ॥

संजय उवाच

नाकृतात्मा कृतात्मानं जातु विद्याज्जनार्दनम् ।

आत्मनस्तु क्रियोपायो नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् ॥ १७ ॥

पृष्ठ 534

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संजयने कहा – महाराज! जिसने अपने मनको वशमें नहीं किया है, वह कभी नित्यसिद्ध परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको नहीं पा सकता । अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें किये बिना दूसरा कोई कर्म उन परमात्माकी प्राप्तिका उपाय नहीं हो सकता ॥ १७ ॥

इन्द्रियाणामुदीर्णानां कामत्यागोऽप्रमादतः ।

अप्रमादोऽविहिंसा च ज्ञानयोनिरसंशयम् ॥ १८ ॥

विषयोंकी ओर दौड़नेवाली इन्द्रियोंकी भोग- कामनाओंका पूर्ण सावधानीके साथ त्याग कर देना, प्रमादसे दूर रहना तथा किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना —ये तीन निश्चय ही तत्त्वज्ञानकी उत्पत्तिमें कारण हैं ॥ १८ ॥

इन्द्रियाणां यमे यत्तो भव राजन्नतन्द्रितः ।

बुद्धिश्च ते मा च्यवतु नियच्छैनां यतस्ततः ॥ १ ९ ॥

राजन्! आप आलस्य छोड़कर इन्द्रियोंके संयममें तत्पर हो जाइये और अपनी बुद्धिको जैसे भी सम्भव हो, नियन्त्रणमें रखिये, जिससे वह अपने लक्ष्यसे भ्रष्ट न हो ॥ १ ९ ॥

एतज्ज्ञानं विदुर्विप्रा ध्रुवमिन्द्रियधारणम् ।

एतज्ज्ञानं च पन्थाश्च येन यान्ति मनीषिणः ॥ २० ॥

इन्द्रियोंको दृढ़तापूर्वक संयममें रखना चाहिये । विद्वान् ब्राह्मण इसीको ज्ञान मानते हैं । यह ज्ञान ही वह मार्ग है, जिससे मनीषी पुरुष चलते हैं ॥ २० ॥

अप्राप्यः केशवो राजन्निन्द्रियैरजितैर्नृभिः ।

आगमाधिगमाद् योगाद् वशी तत्त्वे प्रसीदति ॥ २१ ॥

राजन्! मनुष्य अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किये बिना भगवान् श्रीकृष्णको नहीं पा सकते । जिसने शास्त्रज्ञान और योगके प्रभावसे अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें कर रखा है, वही तत्त्वज्ञान पाकर प्रसन्न होता है ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ९ ॥

पृष्ठ 535

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सप्ततितमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णके विभिन्न नामोंकी व्युत्पत्तियोंका कथन धृतराष्ट्रउवाच

भूयो मे पुण्डरीकाक्षं संजयाचक्ष्व पृच्छतः ।

नामकर्मार्थवित् तात प्राप्नुयां पुरुषोत्तमम् ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले- संजय! तुम भगवान् श्रीकृष्णके नाम और कर्मोंका अभिप्राय जानते हो, अतः मेरे प्रश्नके अनुसार एक बार पुनः कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णका वर्णन करो ॥ १ ॥

संजय उवाच

श्रुतं मे वासुदेवस्य नामनिर्वचनं शुभम् ।

यावत् तत्राभिजानेऽहमप्रमेयो हि केशवः ॥ २ ॥

संजयने कहा — राजन्! मैंने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके नामोंकी मंगलमयी व्युत्पत्ति सुन रखी है, उसमें जितना मुझे स्मरण है, उतना बता रहा हूँ । वास्तवमें तो भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंकी पहुँचसे परे हैं ॥ २ ॥

वसनात् सर्वभूतानां वसुत्वाद् देवयोनितः ।

वासुदेवस्ततो वेद्यो बृहत्त्वाद् विष्णुरुच्यते ॥ ३ ॥

भगवान् समस्त प्राणियोंके निवासस्थान हैं तथा वे सब भूतोंमें वास करते हैं, इसलिये ‘ वसु’ हैं एवं देवताओंकी उत्पत्तिके स्थान होनेसे और समस्त देवता उनमें वास करते हैं, इसलिये उन्हें ‘ देव ' कहा जाता है । अतएव उनका नाम ' वासुदेव ' है, ऐसा जानना चाहिये । बृहत् अर्थात् व्यापक होनेके कारण वे ही ' विष्णु' कहलाते हैं ॥ ३ ॥

मौनाद् ध्यानाच्च योगाच्च विद्धि भारत माधवम् ।

सर्वतत्त्वमयत्वाच्च मधुहा मधुसूदनः ॥ ४ ॥

भारत! मौन, ध्यान और योगसे उनका बोध अथवा साक्षात्कार होता है; इसलिये आप उन्हें ‘ माधव ' समझें । मधु शब्दसे प्रतिपादित पृथ्वी आदि सम्पूर्ण तत्त्वोंके उपादान एवं अधिष्ठान होनेके कारण मधुसूदन श्रीकृष्णको ' मधुहा' कहा गया है ॥ ४ ॥

कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः ।

विष्णुस्तद्भावयोगाच्च कृष्णो भवति सात्वतः ॥ ५ ॥

‘ कृष्’ धातु सत्ता अर्थका वाचक है और ' ण' शब्द आनन्द अर्थका बोध कराता है, इन दोनों भावोंसे युक्त होनेके कारण यदुकुलमें अवतीर्ण हुए नित्य आनन्दस्वरूप श्रीविष्णु 'कृष्ण' कहलाते हैं ॥ ५ ॥

पृष्ठ 536

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पुण्डरीकं परं धाम नित्यमक्षयमव्ययम् ।

तद्भावात् पुण्डरीकाक्षो दस्युत्रासाज्जनार्दनः ॥ ६ ॥

नित्य, अक्षय, अविनाशी एवं परम भगवद्धामका नाम पुण्डरीक है । उसमें स्थित होकर जो अक्षतभावसे विराजते हैं, वे भगवान् ' पुण्डरीकाक्ष ' कहलाते हैं । ( अथवा पुण्डरीक— कमलके समान उनके अक्षि- नेत्र हैं, इसलिये उनका नाम पुण्डरीकाक्ष है ) । दस्युजनोंको त्रास ( अर्दन या पीड़ा ) देनेके कारण उनको 'जनार्दन' कहते हैं ॥

यतः सत्त्वान्न च्यवते यच्च सत्त्वान्न हीयते ।

सत्त्वतः सात्वतस्तस्मादार्षभाद् वृषभेक्षणः ॥ ७ ॥

वे सत्यसे कभी च्युत नहीं होते और न सत्त्वसे अलग ही होते हैं, इसलिये सद्भावके सम्बन्धसे उनका नाम ' सात्वत ' है । आर्ष कहते हैं वेदको, उससे भासित होनेके कारण भगवान्का एक नाम ‘ आर्षभ ' है । आर्षभके योगसे ही वे ' वृषभेक्षण ' कहलाते हैं ( वृषभका अर्थ है वेद, वही ईक्षण - नेत्रके समान उनका ज्ञापक है; इस व्युत्पत्तिके अनुसार वृषभेक्षण नामकी सिद्धि होती है ) ॥

न जायते जनित्रायमजस्तस्मादनीकजित् ।

देवानां स्वप्रकाशत्वाद् दमाद् दामोदरो विभुः ॥ ८ ॥

शत्रुसेनाओंपर विजय पानेवाले ये भगवान् श्रीकृष्ण किसी जन्मदाताके द्वारा जन्म ग्रहण नहीं करते हैं, इसलिये ' अज' कहलाते हैं । देवता स्वयंप्रकाशरूप होते हैं, अतः उत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित होनेके कारण भगवान् श्रीकृष्णको ' उदर' कहा गया है और दम ( इन्द्रियसंयम ) नामक गुणसे सम्पन्न होनेके कारण उनका नाम ' दाम ' है । इस प्रकार दाम और उदर— इन दोनों शब्दोंके संयोगसे वे ' दामोदर' कहलाते हैं ॥ ८ ॥

हर्षात् सुखात् सुखैश्वर्याद्धृषीकेशत्वमश्नुते ।

बाहुभ्यां रोदसी बिभ्रन्महाबाहुरिति स्मृतः ॥ ९ ॥

वे हर्ष अर्थात् सुखसे युक्त होनेके कारण हृषीक हैं और सुख- ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके कारण ' ईश ' कहे गये हैं । इस प्रकार वे भगवान् ' हृषीकेश ' नाम धारण करते हैं । अपनी दोनों बाहुओंद्वारा भगवान् इस पृथ्वी और आकाशको धारण करते हैं, इसलिये उनका नाम ' महाबाहु ' है ॥ ९ ॥

अधो न क्षीयते जातु यस्मात् तस्मादधोक्षजः ।

नराणामयनाच्चापि ततो नारायणः स्मृतः ॥ १० ॥

श्रीकृष्ण कभी नीचे गिरकर क्षीण नहीं होते, अतः ( ' अधो न क्षीयते जातु ' –इस व्युत्पत्तिके अनुसार ) ‘ अधोक्षज ' कहलाते हैं । वे नरों ( जीवात्माओं ) - के अयन ( आश्रय ) हैं, इसलिये उन्हें ‘ नारायण' भी कहते हैं ॥ १० ॥

पूरणात् सदनाच्चापि ततोऽसौ पुरुषोत्तमः ।

असतश्च सतश्चैव सर्वस्य प्रभवाप्ययात् ॥ ११ ॥

पृष्ठ 537

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सर्वस्य च सदा ज्ञानात् सर्वमेतं प्रचक्षते । वे सर्वत्र परिपूर्ण हैं तथा सबके निवासस्थान हैं, इसलिये ' पुरुष' हैं और सब पुरुषोंमें उत्तम होनेके कारण उनकी ' पुरुषोत्तम' संज्ञा है । वे सत् और असत् सबकी उत्पत्ति और लयके स्थान हैं तथा सर्वदा उन सबका ज्ञान रखते हैं; इसलिये उन्हें ' सर्व' कहते हैं ॥ ११३ || सत्ये प्रतिष्ठितः कृष्णः सत्यमत्र प्रतिष्ठितम् ॥ १२ ॥

सत्यात् सत्यं तु गोविन्दस्तस्मात् सत्योऽपि नामतः । श्रीकृष्ण सत्यमें प्रतिष्ठित हैं और सत्य उनमें प्रतिष्ठित है । वे भगवान् गोविन्द सत्यसे

भी उत्कृष्ट सत्य हैं । अतः उनका एक नाम ' सत्य ' भी है ॥ १२३ ॥

विष्णुर्विक्रमणाद् देवो जयनाज्जिष्णुरुच्यते ॥ १३ ॥

शाश्वतत्वादनन्तश्च गोविन्दो वेदनाद् गवाम् । विक्रमण ( वामनावतारमें तीनों लोकोंको आक्रान्त ) करनेके कारण वे भगवान् ‘ विष्णु ’ कहलाते हैं । वे सबपर विजय पानेसे ' जिष्णु ', शाश्वत ( नित्य) होनेसे ‘ अनन्त ' तथा गौओं ( इन्द्रियों ) -के ज्ञाता और प्रकाशक होनेके कारण ( गां विन्दति ) इस व्युत्पत्तिके अनुसार ‘ गोविन्द ' कहलाते हैं ॥ १३३ ॥

अतत्त्वं कुरुते तत्त्वं तेन मोहयते प्रजाः ॥ १४ ॥

वे अपनी सत्ता- स्फूर्ति देकर असत्यको भी सत्य- सा कर देते हैं और इस प्रकार सारी प्रजाको मोहमें डाल देते हैं ॥ १४ ॥

एवंविधो धर्मनित्यो भगवान् मधुसूदनः ।

आगन्ता हि महाबाहुरानृशंस्यार्थमच्युतः ॥ १५ ॥

निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले उन भगवान् मधुसूदनका स्वरूप ऐसा ही है । अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण कौरवोंपर कृपा करनेके लिये यहाँ पधारनेवाले हैं ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥

पृष्ठ 538

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एकसप्ततितमोऽध्यायः धृतराष्ट्रके द्वारा भावद्गुणगान धृतराष्ट्रउवाच चक्षुष्मतां वै स्पृहयामि संजय द्रक्ष्यन्ति ये वासुदेवं समीपे । विभ्राजमानं वपुषा परेण प्रकाशयन्तं प्रदिशो दिशश्च ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले- संजय! जो लोग परम उत्तम श्रीअंगोंसे सुशोभित तथा दिशा-विदिशाओंको प्रकाशित करते हुए वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका निकटसे दर्शन करेंगे, उन सफल नेत्रोंवाले मनुष्योंके सौभाग्यको पानेकी मैं भी अभिलाषा रखता हूँ ॥ १ ॥

ईरयन्तं भारतीं भारताना- मभ्यर्चनीयां शङ्करीं सृजयानाम् । बुभूषद्भिर्ग्रहणीयामनिन्द्यां परासूनामग्रहणीयरूपाम् ॥ २ ॥

भगवान् अत्यन्त मनोहर वाणीमें जो प्रवचन करेंगे, वह भरतवंशियों तथा सृ॑जयोंके लिये कल्याणकारी तथा आदरणीय होगा । ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंके लिये भगवान्की वह वाणी अनिन्द्य और शिरोधार्य होगी; परंतु जो मृत्युके निकट पहुँच चुके हैं, उन्हें वह अग्राह्य प्रतीत होगी ॥ २ ॥

समुद्यन्तं सात्वतमेकवीरं प्रणेतारमृषभं यादवानाम् । निहन्तारं क्षोभणं शात्रवाणां मुञ्चन्तं च द्विषतां वै यशांसि ॥ ३ ॥

संसारके अद्वितीय वीर, सात्वतकुलके श्रेष्ठ पुरुष, यदुवंशियोंके माननीय नेता, शत्रुपक्षके योद्धाओंको क्षुब्ध करके उनका संहार करनेवाले तथा वैरियोंके यशको बलपूर्वक छीन लेनेवाले वे भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उदित होंगे ( और नेत्रवाले लोग उनका दर्शन करके धन्य हो जायँगे ) ॥ ३ ॥

द्रष्टारो हि कुरवस्तं समेता महात्मानं शत्रुहणं वरेण्यम् । ब्रुवन्तं वाचमनृशंसरूपां वृष्णिश्रेष्ठं मोहयन्तं मदीयान् ॥ ४ ॥

पृष्ठ 539

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महात्मा, शत्रुहन्ता तथा सबके वरण करनेयोग्य वे वृष्णिकुलभूषण श्रीकृष्ण यहाँ आकर कृपापूर्ण कोमल वाक्य बोलेंगे और हमारे पक्षवर्ती राजाओंको मोहित करेंगे; इस अवस्थामें समस्त कौरव उन्हें देखेंगे ॥ ४ ॥

ऋषिं सनातनतमं विपश्चितं वाचः समुद्रं कलशं यतीनाम् । अरिष्टनेमिं गरुडं सुपर्णं हरिं प्रजानां भुवनस्य धाम ॥ ५ ॥

सहस्रशीर्षं पुरुषं पुराण- मनादिमध्यान्तमनन्तकीर्तिम् । शुक्रस्य धातारमजं च नित्यं परं परेषां शरणं प्रपद्ये ॥ ६ ॥

जो अत्यन्त सनातन ऋषि, ज्ञानी, वाणीके समुद्र और प्रयत्नशील साधकोंको कलशके जलकी भाँति सुलभ होनेवाले हैं, जिनके चरण समस्त विघ्नोंका निवारण करनेवाले हैं, सुन्दर पंखोंसे युक्त गरुड़ जिनके स्वरूप हैं, जो प्रजाजनोंके पाप-ताप हर लेनेवाले तथा जगत्के आश्रय हैं, जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो पुराणपुरुष हैं, जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जो अक्षय कीर्तिसे सुशोभित, बीज एवं वीर्यको धारण करनेवाले, अजन्मा, नित्य तथा परात्पर परमेश्वर हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५-६ ॥ त्रैलोक्यनिर्माणकरं जनित्रं

देवासुराणामथ नागरक्षसाम् ।

नराधिपानां विदुषां प्रधान- मिन्द्रानुजं तं शरणं प्रपद्ये ॥ ७ ॥

जो तीनों लोकोंका निर्माण करनेवाले हैं, जिन्होंने देवताओं, असुरों, नागों तथा राक्षसोंको भी जन्म दिया है तथा जो ज्ञानी नरेशोंके प्रधान हैं, इन्द्रके छोटे भाई वामन-स्वरूप उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 540

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(भगवद्यानपर्व) द्विसप्ततितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप वैशम्पायन उवाच संजये प्रतियाते तु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

( अर्जुनं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ च भारत ।

विराटद्रुपदौ चैव केकयानां महारथान् ॥

अब्रवीदुपसङ्गम्य शङ्खचक्रगदाधरम् ॥

अभियाचामहे गत्वा प्रयातुं कुरुसंसदम् । वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! इधर संजयके चले जानेपर धर्मराज युधिष्ठिरने भीमसेन, अर्जुन, माद्रीकुमार नकुल सहदेव, विराट, द्रुपद तथा केकयदेशीय महारथियोंके पास जाकर कहा — ‘ हमलोग शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके

पास चलकर उनसे कौरवसभामें जानेके लिये प्रार्थना करें ' ।

यथा भीष्मेण द्रोणेन बाह्लीकेन च धीमता ॥

अन्यैश्च कुरुभिः सार्धं न युध्येमहि संयुगे । ‘ वे वहाँ जाकर ऐसा प्रयत्न करें, जिससे हमें भीष्म, द्रोण, बुद्धिमान् बाह्लीक तथा अन्य

कुरुवंशियोंके साथ रणक्षेत्रमें युद्ध न करना पड़े ।

एष नः प्रथमः कल्प एतन्नः श्रेय उत्तमम् ॥

एवमुक्ताः सुमनसस्तेऽभिजग्मुर्जनार्दनम् । ' यही हमारा पहला ध्येय है और यही हमारे लिये परम कल्याणकी बात है । ' राजा

युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर वे सब लोग प्रसन्नचित्त होकर भगवान् श्रीकृष्णके समीप गये ।

पाण्डवैः सह राजानो मरुत्वन्तमिवामराः ॥

तदा च दुःसहाः सर्वे सदस्यास्ते नरर्षभाः । उस समय शत्रुओंके लिये दुःसह प्रतीत होनेवाले वे सभी नरश्रेष्ठ सभासद् भूपालगण पाण्डवोंके साथ श्रीकृष्णके निकट उसी प्रकार गये, जैसे देवता इन्द्रके पास जाते हैं ।