03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 631–640

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640

पृष्ठ 631

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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि दुर्योधनवाक्ये अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें दुर्योधनवाक्यविषयक अट्ठासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥

पृष्ठ 632

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एकोननवतितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका स्वागत, धृतराष्ट्र तथा विदुरके घरोंपर उनका आतिथ्य वैशम्पायन उवाच

प्रातरुत्थाय कृष्णस्तु कृतवान् सर्वमाह्निकम् ।

ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः प्रययौ नगरं प्रति ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ( उधर वृकस्थलमें) प्रातःकाल उठकर भगवान् श्रीकृष्णने सारा नित्यकर्म पूर्ण किया । फिर ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर वे हस्तिनापुरकी ओर चले ॥ १ ॥

तं प्रयान्तं महाबाहुमनुज्ञाप्य महाबलम् ।

पर्यवर्तन्त ते सर्वे वृकस्थलनिवासिनः ॥ २ ॥

तब वहाँसे जाते हुए महाबाहु महाबली श्रीकृष्णकी आज्ञा ले सम्पूर्ण वृकस्थलनिवासी वहाँसे लौट गये ॥

धार्तराष्ट्रास्तमायान्तं प्रत्युज्जग्मुः स्वलंकृताः ।

दुर्योधनादृते सर्वे भीष्मद्रोणकृपादयः ॥ ३ ॥

दुर्योधनके सिवा धृतराष्ट्रके सभी पुत्र तथा भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदि यथायोग्य वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हो हस्तिनापुरकी ओर आते हुए श्रीकृष्णकी अगवानीके लिये गये ॥ ३ ॥

पौराश्च बहुला राजन् हृषीकेशं दिदृक्षवः ।

यानैर्बहुविधैरन्यैः पद्भिरेव तथा परे ॥ ४ ॥

राजन्! श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये बहुत से नागरिक भी नाना प्रकारकी सवारियोंपर बैठकर तथा अन्य कुछ लोग पैदल ही चलकर गये ॥ ४ ॥

स वै पथि समागम्य भीष्मेणाक्लिष्टकर्मणा ।

द्रोणेन धार्तराष्ट्रैश्च तैर्वृतो नगरं ययौ ॥ ५ ॥

अनायास ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले भीष्म तथा द्रोणाचार्यसे मार्गमें ही मिलकर धृतराष्ट्रपुत्रोंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्णने नगरमें प्रवेश किया ॥ ५ ॥

कृष्णसम्माननार्थं च नगरं समलंकृतम् ।

बभूव राजमार्गश्च बहुरत्नसमाचितः ॥ ६ ॥

श्रीकृष्णके स्वागत- सत्कारके लिये हस्तिनापुरको खूब सजाया गया था । वहाँका राजमार्ग भी अनेक प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित किया गया था ॥ ६ ॥

पृष्ठ 633

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न च कश्चिद् गृहे राजंस्तदाऽऽसीद् भरतर्षभ ।

न स्त्री न वृद्धो न शिशुर्वासुदेवदिदृक्षया ॥ ७ ॥

भरतश्रेष्ठ! उस समय भगवान् वासुदेवके दर्शनकी तीव्र इच्छाके कारण स्त्री, बालक अथवा वृद्ध कोई भी घरमें नहीं ठहर सका ॥ ७ ॥

राजमार्गे नरास्तस्मिन् संस्तुवन्त्यवनिं गताः ।

तस्मिन् काले महाराज हृषीकेशप्रवेशने ॥ ८ ॥

महाराज! जब श्रीकृष्ण नगरमें प्रवेश कर रहे थे, तब राजमार्गमें भूमिपर खड़े हुए मनुष्य उनकी स्तुति करने लगे ॥ ८ ॥

आवृतानि वरस्त्रीभिर्गृहाणि सुमहान्त्यपि ।

प्रचलन्तीव भारेण दृश्यन्ते स्म महीतले ॥ ९ ॥

( भगवान् श्रीकृष्णको देखनेके लिये एकत्रित हुई) सुन्दरी स्त्रियोंसे भरे हुए बड़े - बड़े महल भी उनके भारसे इस भूतलपर विचलित होते - से दिखायी देते थे ॥ ९ ॥

तथा च गतिमन्तस्ते वासुदेवस्य वाजिनः ।

प्रणष्टगतयोऽभूवन् राजमार्गे नरैर्वृते ॥ १० ॥

वहाँकी प्रधान सड़क लोगोंसे ऐसी खचाखच भर गयी थी कि श्रीकृष्णके वेगपूर्वक चलनेवाले घोड़ोंकी गति भी अवरुद्ध हो गयी ॥ १० ॥

स गृह धृतराष्ट्रस्य प्राविशच्छत्रुकर्शनः ।

पाण्डुरं पुण्डरीकाक्षः प्रासादैरुपशोभितम् ॥ ११ ॥

शत्रुओंको क्षीण करनेवाले कमलनयन श्रीकृष्णने राजा धृतराष्ट्रके अट्टालिकाओंसे सुशोभित उज्ज्वल भवनमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥

तिस्रः कक्ष्या व्यतिक्रम्य केशवो राजवेश्मनः ।

वैचित्रवीर्यं राजानमभ्यगच्छदरिंदमः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 634

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उस राजभवनकी तीन ड्यौढ़ियोंको पार करके शत्रुसूदन केशव विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके समीप गये ॥ १२ ॥

अभ्यागच्छति दाशार्हे प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः ।

सहैव द्रोणभीष्माभ्यामुदतिष्ठन्महायशाः ॥ १३ ॥

श्रीकृष्णके आते ही महायशस्वी प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्र द्रोणाचार्य तथा भीष्मजीके साथ ही अपने आसनसे उठकर खड़े हो गये ॥ १३ ॥

कृपश्च सोमदत्तश्च महाराजश्च बाह्लिकः ।

आसनेभ्योऽचलन् सर्वे पूजयन्तो जनार्दनम् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 635

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धृतराष्ट्रके द्वारा श्रीकृष्णका स्वागत

पृष्ठ 636

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कृपाचार्य, सोमदत्त तथा महाराज बाह्लिक — ये सब लोग जनार्दनका सम्मान करते हुए अपने आसनोंसे उठ गये ॥ १४ ॥

ततो राजानमासाद्य धृतराष्ट्रं यशस्विनम् ।

स भीष्मं पूजयामास वार्ष्णेयो वाग्भिरञ्जसा ॥ १५ ॥

तब वृष्णिनन्दन श्रीकृष्णने यशस्वी राजा धृतराष्ट्रसे मिलकर अपने उत्तम वचनोंद्वारा भीष्मजीका आदर किया ॥ १५ ॥

तेषु धर्मानुपूर्वी तां प्रयुज्य मधुसूदनः ।

यथावयः समीयाय राजभिः सह माधवः ॥ १६ ॥

यदुकुलतिलक मधुसूदन उन सबकी धर्मानुकूल पूजा करके अवस्थाक्रमके अनुसार वहाँ आये हुए समस्त राजाओंसे मिले ॥ १६ ॥

अथ द्रोणं सबाह्लीकं सपुत्रं च यशस्विनम् ।

कृपं च सोमदत्तं च समीयाय जनार्दनः ॥ १७ ॥

तत्पश्चात् जनार्दन पुत्रसहित यशस्वी द्रोणाचार्य, बाह्लीक, कृपाचार्य तथा सोमदत्तसे मिले ॥ १७ ॥

तत्रासीदूर्जितं मृष्टं काञ्चनं महदासनम् ।

शासनाद् धृतराष्ट्रस्य तत्रोपाविशदच्युतः ॥ १८ ॥

वहाँ एक स्वच्छ और जगमगाता हुआ सुवर्णका विशाल सिंहासन रखा हुआ था ।

धृतराष्ट्रकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्ण उसीपर विराजमान हुए ॥ १८ ॥

अथ गां मधुपर्कं चाप्युदकं च जनार्दने ।

उपजहुर्यथान्यायं धृतराष्ट्रपुरोहिताः ॥ १ ९ ॥

तदनन्तर धृतराष्ट्रके पुरोहितलोग भगवान् जनार्दनके आतिथ्यसत्कारके लिये उत्तम गौ, मधुपर्क तथा जल ले आये ॥ १ ९ ॥

कृतातिथ्यस्तु गोविन्दः सर्वान् परिहसन् कुरून् ।

आस्ते साम्बन्धिकं कुर्वन् कुरुभिः परिवारितः ॥ २० ॥

उनका आतिथ्य ग्रहण करके भगवान् गोविन्द हँसते हुए कौरवोंके साथ बैठ गये और सबसे अपने सम्बन्धके अनुसार यथायोग्य व्यवहार करते हुए कौरवोंसे घिरे हुए कुछ देर बैठे रहे ॥ २० ॥

सोऽर्चितो धृतराष्ट्रेण पूजितश्च महायशाः ।

राजानं समनुज्ञाप्य निरक्रामदरिंदमः ॥ २१ ॥

धृतराष्ट्रसे पूजित एवं सम्मानित हो महायशस्वी शत्रुदमन श्रीकृष्ण उनकी अनुज्ञा ले उस राजभवनसे बाहर निकले ॥ २१ ॥

तैः समेत्य यथान्यायं कुरुभिः कुरुसंसदि ।

विदुरावसथं रम्यमुपातिष्ठत माधवः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 637

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फिर कौरवसभामें यथायोग्य सबसे मिल-जुलकर यदुवंशी श्रीकृष्णने विदुरजीके रमणीय गृहमें पदार्पण किया ॥ २२ ॥

विदुरः सर्वकल्याणैरभिगम्य जनार्दनम् ।

अर्चयामास दाशार्हं सर्वकामैरुपस्थितम् ॥ २३ ॥

विदुरजीने अपने घर पधारे हुए दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके निकट जाकर समस्त मनोवांछित भोगों तथा सम्पूर्ण मांगलिक वस्तुओंद्वारा उनका पूजन किया ( और इस प्रकार कहा— ) ॥ २३ ॥

या मे प्रीतिः पुष्कराक्ष त्वद्दर्शनसमुद्भवा ।

सा किमाख्यायते तुभ्यमन्तरात्मासि देहिनाम् ॥ २४ ॥

‘ कमलनयन! आपके दर्शनसे मुझे जो प्रसन्नता हुई है, उसका आपसे क्या वर्णन किया जाय; आप तो समस्त देहधारियोंके अन्तर्यामी आत्मा हैं ( आपसे क्या छिपा है? ) ' ॥ २४ ॥

कृतातिथ्यं तु गोविन्दं विदुरः सर्वधर्मवित् ।

कुशलं पाण्डुपुत्राणामपृच्छन्मधुसूदनम् ॥ २५ ॥

पृष्ठ 638

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मधुसूदन श्रीकृष्ण जब उनका आतिथ्य ग्रहण कर चुके, तब सब धर्मोंके ज्ञाता विदुरजीने उनसे पाण्डवोंका कुशल- समाचार पूछा ॥ २५ ॥

प्रीयमाणस्य सुहृदो विदुरो बुद्धिसत्तमः ।

धर्मार्थनित्यस्य सतो गतरोषस्य धीमतः ॥ २६ ॥

तस्य सर्वं सविस्तारं पाण्डवानां विचेष्टितम् ।

क्षत्तुराचष्ट दाशार्हः सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ २७ ॥

विदुरजी बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ थे । सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले श्रीकृष्णने सदा धर्ममें ही तत्पर रहनेवाले, रोषशून्य प्रेमी सुहृद् बुद्धिमान् विदुरसे पाण्डवोंकी सारी चेष्टाएँ विस्तारपूर्वक कह सुनायीं ॥ २६-२७ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि धृतराष्ट्रगृहप्रवेशपूर्वकं श्रीकृष्णस्य विदुरगृहप्रवेशे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णका धृतराष्ट्रगृहमें प्रवेशपूर्वक विदुरके गृहमें पदार्पणविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥

पृष्ठ 639

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नवतितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल- समाचार पूछकर अपने दुःखोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना वैशम्पायन उवाच

अथोपगम्य विदुरमपराह्णे जनार्दनः ।

पितृष्वसारं स पृथामभ्यगच्छदरिंदमः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! शत्रुदमन श्रीकृष्ण विदुरजीसे मिलनेके पश्चात् तीसरे पहरमें अपनी बुआ कुन्तीदेवीके पास गये ॥ १ ॥

सा दृष्ट्वा कृष्णमायान्तं प्रसन्नादित्यवर्चसम् ।

कण्ठे गृहीत्वा प्राक्रोशत् स्मरन्ती तनयान् पृथा ॥ २ ॥

निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी श्रीकृष्णको आते देख कुन्तीदेवी उनके गले लग गयीं और अपने पुत्रोंको याद करके फूट- फूटकर रोने लगीं ॥ २ ॥

तेषां सत्त्ववतां मध्ये गोविन्दं सहचारिणम् ।

चिरस्य दृष्ट्वा वार्ष्णेयं बाष्पमाहारयत् पृथा ॥ ३ ॥

अपने उन शक्तिशाली पुत्रोंके बीचमें रहकर उनके साथ विचरनेवाले वृष्णिकुलनन्दन गोविन्दको दीर्घकालके पश्चात् देखकर कुन्तीदेवी आँसुओंकी वर्षा करने लगीं ॥ ३ ॥

साब्रवीत् कृष्णमासीनं कृतातिथ्यं युधां पतिम् ।

बाष्पगद्गदपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता ॥ ४ ॥

उन्होंने योद्धाओंके स्वामी श्रीकृष्णका अतिथि सत्कार किया । जब वे आतिथ्य ग्रहण करके आसनपर विराजमान हुए, तब सूखे मुँह और अश्रुगद्गद कण्ठसे कुन्तीदेवी इस प्रकार बोलीं- ॥ ४ ॥

ये ते बाल्यात् प्रभृत्येव गुरुशुश्रूषणे रताः ।

परस्परस्य सुहृदः सम्मताः समचेतसः ।

निकृत्या भ्रंशिता राज्याज्जनार्हा निर्जनं गताः ॥ ५ ॥

वत्स! मेरे पुत्र पाण्डव, जो बाल्यकालसे ही गुरुजनोंकी सेवा- शुश्रूषामें तत्पर रहते, परस्पर स्नेह रखते, सर्वत्र सम्मान पाते और मनमें सबके प्रति समानभाव रखते थे, शत्रुओंकी शठताके शिकार होकर राज्यसे हाथ धो बैठे और जनसमुदायमें रहनेयोग्य होकर भी निर्जन वनमें चले गये ॥ ५ ॥

विनीतक्रोधहर्षाश्च ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ।

पृष्ठ 640

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त्यक्त्वा प्रियसुखे पार्था रुदतीमपहाय माम् ॥ ६ ॥

' मेरे बेटे हर्ष और क्रोधको जीत चुके थे । वे ब्राह्मणोंका हित साधन करनेवाले तथा सत्यवादी थे; तथापि ( शत्रुओंके अन्यायसे विवश हो ) प्रियजन एवं सुखभोगसे मुँह मोड़ मुझे रोती - बिलखती छोड़कर वे वनकी ओर चल दिये ॥ ६ ॥

अहार्षुश्च वनं यान्तः समूलं हृदयं मम ।

अतदर्हा महात्मानः कथं केशव पाण्डवाः ॥ ७ ॥

‘ केशव! वन जाते समय महात्मा पाण्डव मेरे हृदयको जड़ मूलसहित खींचकर अपने साथ ले गये । वे वनवासके योग्य कदापि नहीं थे । फिर उन्हें यह कष्ट कैसे प्राप्त हुआ? ॥ ७ ॥

ऊषुर्महावने तात सिंहव्याघ्रगजाकुले ।

बाला विहीनाः पित्रा ते मया सततलालिताः ॥ ८ ॥

अपश्यन्तश्च पितरौ कथमूषुर्महावने । ' तात! वे बचपनमें ही पिताके प्यारसे वंचित हो गये थे । मैंने ही सदा उनका लालन-पालन किया । मेरे पुत्र सिंह, व्याघ्र और हाथियोंसे भरे हुए उस विशाल वनमें कैसे रहे होंगे? माता-- पिताको न देखते हुए उन्होंने उस महान् वनमें किस प्रकार निवास किया होगा? ॥ शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्मृदङ्गैर्वेणुनिस्वनैः ॥ ९ ॥

पाण्डवाः समबोध्यन्त बाल्यात् प्रभृति केशव । ‘ केशव! बाल्यावस्थासे ही पाण्डव शंख और दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनिसे, मृदंगोंके मधुर नादसे तथा बाँसुरीकी सुरीली तानसे जगाये जाते थे ॥ ९ ३ ॥ ये स्म वारणशब्देन हयानां हेषितेन च ॥ १० ॥

रथनेमिनिनादैश्च व्यबोध्यन्त तदा गृहे ।

शङ्खभेरीनिनादेन वेणुवीणानुनादिना ॥ ११ ॥

पुण्याहघोषमिश्रेण पूज्यमाना द्विजातिभिः ।

वस्त्रै रत्नैरलंकारैः पूजयन्तो द्विजन्मनः ॥ १२ ॥

गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिर्ब्राह्मणानां महात्मनाम् ।

अर्चितैरर्चनार्हंश्च स्तुवद्भिरभिनन्दिताः ॥ १३ ॥

प्रासादाग्रेष्वबोध्यन्त राङ्कवाजिनशायिनः ।

क्रूरं च निनदं श्रुत्वा श्वापदानां महावने ॥ १४ ॥

न स्मोपयान्ति निद्रां ते न तदर्हा जनार्दन ।