03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 811–820

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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भ्रातॄणामथ भृत्यानां मित्राणां च परंतप ॥ १४ ॥

‘ परंतप! यदि तुम उस अनर्थकारी दुराग्रहको छोड़ दो तो अपने कल्याणके साथ ही भाइयों, सेवकों तथा मित्रोंका भी महान् हित- साधन करोगे ॥ १४ ॥

अधर्म्यादयशस्याच्च कर्मणस्त्वं प्रमोक्ष्यसे ।

प्राज्ञैः शूरैर्महोत्साहैरात्मवद्भिर्बहुश्रुतैः ॥ १५ ॥

संधत्स्व पुरुषव्याघ्र पाण्डवैर्भरतर्षभ । ' ऐसा करनेपर तुम्हें अधर्म और अपयशकी प्राप्ति करानेवाले कर्मसे छुटकारा मिल जायगा । अतः भरतकुल- भूषण पुरुषसिंह! तुम ज्ञानी, परम उत्साही, शूरवीर, मनस्वी एवं अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ॥ १५३ ॥

तद्धितं च प्रियं चैव धृतराष्ट्रस्य धीमतः ॥ १६ ॥

पितामहस्य द्रोणस्य विदुरस्य महामतेः ।

कृपस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः ॥ १७ ॥

अश्वत्थाम्नो विकर्णस्य संजयस्य विविंशतेः ।

ज्ञातीनां चैव भूयिष्ठं मित्राणां च परंतप ॥ १८ ॥

‘ यही परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रको भी प्रिय एवं हितकर जान पड़ता है । परंतप! पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, महामति विदुर, कृपाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान् बाह्लीक, अश्वत्थामा, विकर्ण, संजय, विविंशति तथा अन्यान्य कुटुम्बीजनों एवं मित्रोंको भी यही अधिक प्रिय है ॥ १६–१८ ॥ शमे शर्म भवेत् तात सर्वस्य जगतस्तथा ।

ह्रीमानसि कुले जातः श्रुतवाननृशंसवान् ।

तिष्ठ तात पितुः शास्त्रे मातुश्च भरतर्षभ ॥ १ ९ ॥

‘ तात! संधि होनेपर ही सम्पूर्ण जगत्का भला हो सकता है । तुम श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न, लज्जाशील, शास्त्रज्ञ और क्रूरतासे रहित हो । अतः भरतश्रेष्ठ! तुम पिता और माताके शासनके अधीन रहो ॥ १ ९ ॥

एतच्छ्रेयो हि मन्यन्ते पिता यच्छास्ति भारत ।

उत्तमापद्गतः सर्वः पितुः स्मरति शासनम् ॥ २० ॥

‘ भारत! पिता जो कुछ शिक्षा देते हैं, उसीको श्रेष्ठ पुरुष अपने लिये कल्याणकारी मानते हैं । भारी आपत्तिमें पड़नेपर सब लोग अपने पिताके उपदेशका ही स्मरण करते हैं ॥ २० ॥

रोचते ते पितुस्तात पाण्डवैः सह संगमः ।

सामात्यस्य कुरुश्रेष्ठ तत् तुभ्यं तात रोचताम् ॥ २१ ॥

‘ तात! मन्त्रियोंसहित तुम्हारे पिताको पाण्डवोंके साथ संधि कर लेना ही अच्छा जान पड़ता है । कुरुश्रेष्ठ! यही तुम्हें भी पसंद आना चाहिये ॥ २१ ॥

पृष्ठ 812

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श्रुत्वा यः सुहृदां शास्त्रं मर्त्यो न प्रतिपद्यते ।

विपाकान्ते दहत्येनं किम्पाकमिव भक्षितम् ॥ २२ ॥

'जो मनुष्य सुहृदोंके मुखसे शास्त्रसम्मत उपदेश सुनकर भी उसे स्वीकार नहीं करता है, उसका यह अस्वीकार उसे परिणाममें उसी प्रकार शोकदग्ध करता है, जैसे खाया हुआ इन्द्रायण फल पाचनके अन्तमें दाह उत्पन्न करनेवाला होता है ॥ २२ ॥

यस्तु निःश्रेयसं वाक्यं मोहान्न प्रतिपद्यते ।

स दीर्घसूत्र हीनार्थः पश्चात्तापेन युज्यते ॥ २३ ॥

' जो मोहवश अपने हितकी बात नहीं मानता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य अपने स्वार्थसे भ्रष्ट होकर केवल पश्चात्तापका भागी होता है ॥ २३ ॥

यस्तु निःश्रेयसं श्रुत्वा प्राक् तदेवाभिपद्यते ।

आत्मनो मतमुत्सृज्य स लोके सुखमेधते ॥ २४ ॥

‘ जो मानव अपने कल्याणकी बात सुनकर अपने मतका आग्रह छोड़कर पहले उसीको ग्रहण करता है, वह संसारमें सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है ॥ २४ ॥

योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते ।

शृणोति प्रतिकूलानि द्विषतां वशमेति सः ॥ २५ ॥

'जो अपनी ही भलाई चाहनेवाले अपने सुहृद्के वचनोंको मनके प्रतिकूल होनेके कारण नहीं सहन करता है और उन असुहृदोंके प्रतिकूल कहे हुए वचनोंको ही सुनता है, वह शत्रुओंके अधीन हो जाता है ॥ २५ ॥

सतां मतमतिक्रम्य योऽसतां वर्तते मते ।

शोचन्ते व्यसने तस्य सुहृदो नचिरादिव ॥ २६ ॥

‘जो मनुष्य सत्पुरुषोंकी सम्मतिका उल्लंघन करके दुष्टोंके मतके अनुसार चलता है, उसके सुहृद् उसे शीघ्र ही विपत्तिमें पड़ा देख शोकके भागी होते हैं ॥

मुख्यानमात्यानुत्सृज्य योनिहीनान् निषेवते ।

स घोरामापदं प्राप्य नोत्तारमधिगच्छति ॥ २७ ॥

' जो अपने मुख्य मन्त्रियोंको छोड़कर नीच प्रकृतिके लोगोंका सेवन करता है, वह भयंकर विपत्तिमें फँसकर अपने उद्धारका कोई मार्ग नहीं देख पाता है ॥ २७ ॥

योऽसत्सेवी वृथाचारो न श्रोता सुहृदां सताम् ।

परान् वृणीते स्वान् द्वेष्टि तं गौस्त्यजति भारत ॥ २८ ॥

‘ भारत! जो दुष्ट पुरुषोंका संग करनेवाला और मिथ्याचारी होकर अपने श्रेष्ठ सुहृदोंकी बात नहीं सुनता है, दूसरोंको अपनाता और आत्मीयजनोंसे द्वेष रखता है, उसे यह पृथ्वी त्याग देती है ॥ २८ ॥

स त्वं विरुध्य तैर्वीरैरन्येभ्यस्त्राणमिच्छसि ।

अशिष्टेभ्योऽसमर्थेभ्यो मूढेभ्यो भरतर्षभ ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 813

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‘ भरतश्रेष्ठ! तुम उन वीर पाण्डवोंसे विरोध करके दूसरे अशिष्ट, असमर्थ और मूढ़ मनुष्योंसे अपनी रक्षा चाहते हो ॥ २ ९ ॥

को हि शक्रसमान् ज्ञातीनतिक्रम्य महारथान् ।

अन्येभ्यस्त्राणमाशंसेत् त्वदन्यो भुवि मानवः ॥ ३० ॥

'इस भूतलपर तुम्हारे सिवा दूसरा कौन मनुष्य है, जो इन्द्रके समान पराक्रमी एवं महारथी बन्धु - बान्धवोंको त्यागकर दूसरोंसे अपनी रक्षाकी आशा करेगा? ॥ ३० ॥

जन्मप्रभृति कौन्तेया नित्यं विनिकृतास्त्वया ।

न च ते जातु कुप्यन्ति धर्मात्मानो हि पाण्डवाः ॥ ३१ ॥

' तुमने जन्मसे ही कुन्तीपुत्रोंके साथ सदा शठतापूर्ण बर्ताव किया है, परंतु वे इसके लिये कभी कुपित नहीं हुए हैं; क्योंकि पाण्डव धर्मात्मा हैं ॥ ३१ ॥

मिथ्योपचरितास्तात जन्मप्रभृति बान्धवाः ।

त्वयि सम्यङ्महाबाहो प्रतिपन्ना यशस्विनः ॥ ३२ ॥

‘ तात महाबाहो! यद्यपि तुमने अपने ही भाई पाण्डवोंके साथ जन्मसे ही छल- कपटका बर्ताव किया है, तथापि वे यशस्वी पाण्डव तुम्हारे प्रति सदा सद्भाव ही रखते आये हैं ॥ ३२ ॥

त्वयापि प्रतिपत्तव्यं तथैव भरतर्षभ ।

स्वेषु बन्धुषु मुख्येषु मा मन्युवशमन्वगाः ॥ ३३ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! तुम्हें भी अपने उन श्रेष्ठ बन्धुओंके प्रति वैसा ही बर्ताव करना चाहिये । तुम क्रोधके वशीभूत न होओ ॥ ३३ ॥

त्रिवर्गयुक्तः प्राज्ञानामारम्भो भरतर्षभ ।

धर्मार्थावनुरुध्यन्ते त्रिवर्गासम्भवे नराः ॥ ३४ ॥

'भरतभूषण! विद्वान् एवं बुद्धिमान् पुरुषोंका प्रत्येक कार्य धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंकी सिद्धिके अनुकूल ही होता है । यदि तीनोंकी सिद्धि असम्भव हो तो बुद्धिमान् मानव धर्म और अर्थका ही अनुसरण करते हैं ॥ ३४ ॥

पृथक् च विनिविष्टानां धर्मं धीरोऽनुरुध्यते ।

मध्यमोऽर्थं कलिं बालः काममेवानुरुध्यते ॥ ३५ ॥

‘ पृथक् - पृथक् स्थित हुए धर्म, अर्थ और काममेंसे किसी एकको चुनना हो तो धीर पुरुष धर्मका ही अनुसरण करता है, मध्यम श्रेणीका मनुष्य कलहके कारणभूत अर्थको ही ग्रहण करता है और अधम श्रेणीका अज्ञानी पुरुष कामको ही पाना चाहता है ॥ ३५ ॥

इन्द्रियैः प्राकृतो लोभाद् धर्मं विप्रजहाति यः ।

कामार्थावनुपायेन लिप्समानो विनश्यति ॥ ३६ ॥

' जो अधम मनुष्य इन्द्रियोंके वशीभूत होकर लोभवश धर्मको छोड़ देता है, वह अयोग्य उपायोंसे अर्थ और कामकी लिप्सामें पड़कर नष्ट हो जाता है ॥

पृष्ठ 814

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कामार्थौ लिप्समानस्तु धर्ममेवादितश्चरेत् ।

न हि धर्मादपैत्यर्थः कामो वापि कदाचन ॥ ३७ ॥

' जो अर्थ और काम प्राप्त करना चाहता हो, उसे पहले धर्मका ही आचरण करना चाहिये; क्योंकि अर्थ या काम कभी धर्मसे पृथक् नहीं होता है ॥ ३७ ॥

उपायं धर्ममेवाहुस्त्रिवर्गस्य विशाम्पते ।

लिप्समानो हि तेनाशु कक्षेऽग्निरिव वर्धते ॥ ३८ ॥

‘ प्रजानाथ! विद्वान् पुरुष धर्मको ही त्रिवर्गकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय बताते हैं । अतः जो धर्मके द्वारा अर्थ और कामको पाना चाहता है, वह शीघ्र ही उसी प्रकार उन्नतिकी दिशामें आगे बढ़ जाता है, जैसे सूखे तिनकोंमें लगी हुई आग बढ़ जाती है ॥ ३८ ॥

स त्वं तातानुपायेन लिप्ससे भरतर्षभ ।

आधिराज्यं महद् दीप्तं प्रथितं सर्वराजसु ॥ ३ ९ ॥

‘ तात भरतश्रेष्ठ! तुम समस्त राजाओंमें विख्यात इस विशाल एवं उज्ज्वल साम्राज्यको अनुचित उपायसे पाना चाहते हो ॥ ३ ९ ॥

आत्मानं तक्षति ह्येष वनं परशुना यथा ।

यः सम्यग्वर्तमानेषु मिथ्या राजन् प्रवर्तते ॥ ४० ॥

‘ राजन्! जो उत्तम व्यवहार करनेवाले सत्पुरुषोंके साथ असद्व्यवहार करता है, वह कुल्हाड़ीसे जंगलकी भाँति उस दुर्व्यवहारसे अपने - आपको ही काटता है ॥ न तस्य हि मतिं छिन्द्याद् यस्य नेच्छेत् पराभवम् ।

अविच्छिन्नमतेरस्य कल्याणे धीयते मतिः ।

आत्मवान् नावमन्येत त्रिषु लोकेषु भारत ॥ ४१ ॥

अप्यन्यं प्राकृतं किंचित् किमु तान् पाण्डवर्षभान् ।

अमर्षवशमापन्नो न किंचिद् बुध्यते जनः ॥ ४२ ॥

‘ मनुष्य जिसका पराभव न करना चाहे, उसकी बुद्धिका उच्छेद न करे । जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं हुई है, उसी पुरुषका मन कल्याणकारी कार्योंमें प्रवृत्त होता है । भरतनन्दन! मनस्वी पुरुषको चाहिये कि वह तीनों लोकोंमें किसी प्राकृत ( निम्न श्रेणीके ) पुरुषका भी अपमान न करे, फिर इन श्रेष्ठ पाण्डवोंके अपमान की तो बात ही क्या है? ईर्ष्याके वशमें रहनेवाला मनुष्य किसी बातको ठीकसे समझ नहीं पाता ॥ ४१-४२ ॥

छिद्यते ह्याततं सर्वं प्रमाणं पश्य भारत ।

श्रेयस्ते दुर्जनात् तात पाण्डवैः सह संगतम् ॥ ४३ ॥

‘ भरतनन्दन! देखो, ईर्ष्यालु मनुष्यके समक्ष प्रस्तुत किये हुए सम्पूर्ण विस्तृत प्रमाण भी उच्छिन्न - से हो जाते हैं । तात! किसी दुष्ट मनुष्यका साथ करनेकी अपेक्षा पाण्डवोंके साथ मेल- मिलाप रखना तुम्हारे लिये विशेष कल्याणकारी है ॥ ४३ ॥

तैर्हि सम्प्रीयमाणस्त्वं सर्वान् कामानवाप्स्यसि ।

पृष्ठ 815

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पाण्डवैर्निर्मितां भूमिं भुञ्जानो राजसत्तम ॥ ४४ ॥

पाण्डवान् पृष्ठतः कृत्वा त्राणमाशंससेऽन्यतः । ‘ पाण्डवोंसे प्रेम रखनेपर तुम सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लोगे । नृपश्रेष्ठ! तुम पाण्डवोंद्वारा स्थापित राज्यका उपभोग कर रहे हो, तो भी उन्हींको पीछे करके अर्थात् उनकी अवहेलना करके दूसरोंसे अपनी रक्षाकी आशा रखते हो ॥ ४४ ॥

दुःशासने दुर्विषहे कर्णे चापि ससौबले ॥ ४५ ॥

एतेष्वैश्वर्यमाधाय भूतिमिच्छसि भारत । ' भारत! तुम दुःशासन, दुर्विषह, कर्ण और शकुनि- इन सबपर अपने ऐश्वर्यका भार रखकर उन्नतिकी इच्छा रखते हो? ॥ ४५३ ॥

न चैते तव पर्याप्ता ज्ञाने धर्मार्थयोस्तथा ॥ ४६ ॥

विक्रमे चाप्यपर्याप्ताः पाण्डवान् प्रति भारत । 'भरतनन्दन! ये तुम्हें ज्ञान, धर्म और अर्थकी प्राप्ति करानेमें समर्थ नहीं हैं और पाण्डवोंके सामने पराक्रम प्रकट करनेमें भी ये असमर्थ ही हैं ॥ ४६ ॥

न ही सर्वराजानः पर्याप्ताः सहितास्त्वया ॥ ४७ ॥

क्रुद्धस्य भीमसेनस्य प्रेक्षितुं मुखमाहवे । 'तुम्हारे सहित ये सब राजालोग भी युद्धमें कुपित हुए भीमसेनके मुखकी ओर आँख उठाकर देख ही नहीं सकते हैं ॥ ४७ ॥

इदं संनिहितं तात समग्रं पार्थिवं बलम् ॥ ४८ ॥

अयं भीष्मस्तथा द्रोणः कर्णश्चायं तथा कृपः ।

भूरिश्रवाः सौमदत्तिरश्वत्थामा जयद्रथः ॥ ४ ९ ॥

अशक्ताः सर्व एवैते प्रतियोद्धुं धनंजयम् । ‘ तात! तुम्हारे निकट जो यह समस्त राजाओंकी सेना एकत्र हुई है, यह तथा भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, अश्वत्थामा और जयद्रथ – ये सभी मिलकर भी अर्जुनका सामना करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥ ४८-४९ ॥

अजेयो ह्यर्जुनः संख्ये सर्वैरपि सुरासुरैः ।

मानुषैरपि गन्धर्वैर्मा युद्धे चेत आधिथाः ॥ ५० ॥

' सम्पूर्ण देवता और असुर भी युद्धमें अर्जुनको जीत नहीं सकते । वे समस्त मनुष्यों और गन्धर्वोंके द्वारा भी अजेय हैं, अतः तुम युद्धका विचार मत करो ॥ ५० ॥

दृश्यतां वा पुमान् कश्चित् समग्रे पार्थिवे बले ।

योऽर्जुनं समरे प्राप्य स्वस्तिमानाव्रजेद् गृहान् ॥ ५१ ॥

' राजाओंकी इन सम्पूर्ण सेनाओंमें किसी ऐसे पुरुषपर दृष्टिपात तो करो, जो युद्धमें अर्जुनका सामना करके कुशलपूर्वक अपने घर लौट सके? ॥ ५१ ॥

किं ते जनक्षयेणेह कृतेन भरतर्षभ ।

पृष्ठ 816

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यस्मिञ्जिते जितं तत् स्यात् पुमानेकः स दृश्यताम् ॥ ५२ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! यह नरसंहार करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? तुम अपने पक्षमें किसी ऐसे पुरुषको ढूँढ़ निकालो, जो उस अर्जुनपर विजय पा सके, जिसके जीते जानेपर तुम्हारे पक्षकी विजय मान ली जाय ॥ ५२ ॥

यः स देवान् सगन्धर्वान् सयक्षासुरपन्नगान् ।

अजयत् खाण्डवप्रस्थे कस्तं युध्येत मानवः ॥ ५३ ॥

‘ जिन्होंने खाण्डववनमें गन्धर्वों, यक्षों, असुरों और नागोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको जीत लिया था, उन अर्जुनके साथ कौन मनुष्य युद्ध कर सकेगा? ॥ ५३ ॥

तथा विराटनगरे श्रूयते महदद्भुतम् ।

एकस्य च बहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ ५४ ॥

‘ इसके सिवा विराटनगरमें जो बहुत- से महारथी योद्धाओंके साथ एक अर्जुनके युद्धकी अत्यन्त अद्भुत घटना सुनी जाती है, वह एक ही युद्धके भावी परिणामको बतानेके लिये पर्याप्त है ॥ ५४ ॥

युद्धे येन महादेवः साक्षात् संतोषितः शिवः ।

तमजेयमनाधृष्यं विजेतुं जिष्णुमच्युतम् ।

आशंससीह समरे वीरमर्जुनमूर्जितम् ॥ ५५ ॥

‘ जिन्होंने युद्धमें साक्षात् महादेव शिवको अपने पराक्रमसे संतुष्ट किया है, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले उन अजेय, दुर्धर्ष एवं विजयशील बलशाली वीर अर्जुनको तुम युद्धमें जीतनेकी आशा रखते हो, यह बड़े आश्चर्यकी बात है! ॥ ५५ ॥

मद् द्वितीयं पुनः पार्थं कः प्रार्थयितुमर्हति ।

युद्धे प्रतीपमायान्तमपि साक्षात् पुरंदरः ॥ ५६ ॥

‘ फिर मैं जिसका सारथि बनकर साथ रहूँ और वह अर्जुन प्रतिपक्षी होकर युद्धके लिये आये, उस समय साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हों, कौन अर्जुनके साथ युद्ध करना चाहेगा? ॥ ५६ ॥

बाहुभ्यामुद्वहेद् भूमिं दहेत् क्रुद्ध इमाः प्रजाः ।

पातयेत् त्रिदिवाद् देवान् योऽर्जुनं समरे जयेत् ॥ ५७ ॥

' जो समरभूमिमें अर्जुनको जीत सकता है, वह मानो अपनी दोनों भुजाओंपर पृथ्वीको उठा सकता है, कुपित होनेपर इस समस्त प्रजाको दग्ध कर सकता है और देवताओंको स्वर्गसे नीचे गिरा सकता है ॥ ५७ ॥

पश्य पुत्रांस्तथा भ्रातॄञ्ज्ञातीन् सम्बन्धिनस्तथा ।

त्वत्कृते न विनश्येयुरिमे भरतसत्तमाः ॥ ५८ ॥

'दुर्योधन! अपने इन पुत्रों, भाइयों, कुटुम्बीजनों और सगे- सम्बन्धियोंकी ओर तो देखो । ये श्रेष्ठ भरत- वंशी तुम्हारे कारण नष्ट न हो जायँ ॥ ५८ ॥

पृष्ठ 817

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अस्तु शेषं कौरवाणां मा पराभूदिदं कुलम् कुलघ्न इति नोच्येथा नष्टकीर्तिर्नराधिप ॥ ५ ९ ॥ ‘ नरेश्वर! कौरववंश बचा रहे, इस कुलका पराभव न हो और तुम भी अपनी कीर्तिका नाश करके कुलघाती न कहलाओ ॥ ५ ९ ॥

त्वामेव स्थापयिष्यन्ति यौवराज्ये महारथाः ।

महाराज्येऽपि पितरं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ ६० ॥

' महारथी पाण्डव तुम्हींको युवराजके पदपर स्थापित करेंगे और तुम्हारे पिता राजा धृतराष्ट्रको महाराजके पदपर बनाये रखेंगे ॥ ६० ॥

मा तात श्रियमायान्तीमवमंस्थाः समुद्यताम् ।

अर्धं प्रदाय पार्थेभ्यो महतीं श्रियमाप्नुहि ॥ ६१ ॥

‘ तात! अपने घरमें आनेको उद्यत हुई राजलक्ष्मीका अपमान न करो । कुन्तीके पुत्रोंको आधा राज्य देकर स्वयं विशाल सम्पत्तिका उपभोग करो ॥ ६१ ॥

पाण्डवैः संशमं कृत्वा कृत्वा च सुहृदां वचः ।

सम्प्रीयमाणो मित्रैश्च चिरं भद्राण्यवाप्स्यसि ॥ ६२ ॥

‘ पाण्डवोंके साथ संधि करके और अपने हितैषी सुहृदोंकी बात मानकर मित्रोंके साथ प्रसन्नता- पूर्वक रहते हुए तुम दीर्घकालतक कल्याणके भागी बने रहोगे ' ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भगवद्वाक्ये चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भगवद्वाक्यसम्बन्धी एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥

[ दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ६२३ श्लोक हैं । ] Fard

पृष्ठ 818

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पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना वैशम्पायन उवाच

ततः शान्तनवो भीष्मो दुर्योधनममर्षणम् ।

केशवस्य वचः श्रुत्वा प्रोवाच भरतर्षभ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका पूर्वोक्त वचन सुनकर शान्तनुनन्दन भीष्मने ईर्ष्या और क्रोधमें भरे रहनेवाले दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

कृष्णेन वाक्यमुक्तोऽसि सुहृदां शममिच्छता ।

अन्वपद्यस्व तत् तात मा मन्युवशमन्वगाः ॥ २ ॥

‘ तात! भगवान् श्रीकृष्णने सुहृदोंमें परस्पर शान्ति बनाये रखनेकी इच्छासे जो बात

कही है, उसे स्वीकार करो । क्रोधके वशीभूत न होओ ॥ २ ॥

अकृत्वा वचनं तात केशवस्य महात्मनः ।

श्रेयो न जातु न सुखं न कल्याणमवाप्स्यसि ॥ ३ ॥

‘ तात! महात्मा केशवकी बात न माननेसे तुम कभी श्रेय, सुख और कल्याण नहीं पा सकोगे ॥ ३ ॥

धर्म्यमर्थ्यं महाबाहुराह त्वां तात केशवः ।

तदर्थमभिपद्यस्व मा राजन् नीनशः प्रजाः ॥ ४ ॥

‘ वत्स! महाबाहु केशवने तुमसे धर्म और अर्थके अनुकूल ही बात कही है । राजन्! तुम उसे स्वीकार कर लो; प्रजाका विनाश न करो ॥ ४ ॥

ज्वलितां त्वमिमां लक्ष्मीं भारतीं सर्वराजसु ।

जीवतो धृतराष्ट्रस्य दौरात्म्याद् भ्रंशयिष्यसि ॥ ५ ॥

' बेटा! यह भरतवंशकी राजलक्ष्मी समस्त राजाओंमें प्रकाशित हो रही है; किंतु मैं देखता हूँ कि तुम अपनी दुष्टताके कारण इसे धृतराष्ट्रके जीते- जी ही नष्ट कर दोगे ॥ ५ ॥

आत्मानं च सहामात्यं सपुत्रभ्रातृबान्धवम् ।

अहमित्यनया बुद्धया जीविताद् भ्रंशयिष्यसि ॥ ६ ॥

‘ साथ ही अपनी इस अहंकारयुक्त बुद्धिके कारण तुम पुत्र, भाई, बान्धवजन तथा मन्त्रियोंसहित अपने - आपको भी जीवनसे वंचित कर दोगे ॥ ६ ॥

अतिक्रामन् केशवस्य तथ्यं वचनमर्थवत् ।

पितुश्च भरतश्रेष्ठ विदुरस्य च धीमतः ॥ ७ ॥

मा कुलघ्नः कुपुरुषो दुर्मतिः कापथं गमः ।

पृष्ठ 819

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 819 का मूल पृष्ठ
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मातरं पितरं चैव मा मज्जीः शोकसागरे ॥ ८ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! केशवका वचन सत्य और सार्थक है। तुम उनके, अपने पिताके तथा बुद्धिमान् विदुरके वचनोंकी अवहेलना करके कुमार्गपर न चलो । कुलघाती, कुपुरुष और कुबुद्धिसे कलंकित न बनो तथा माता-पिताको शोकके समुद्रमें न डुबाओ ' ॥ ७-८ ॥

अथ द्रोणोऽब्रवीत् तत्र दुर्योधनमिदं वचः ।

अमर्षवशमापन्नं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ॥ ९ ॥

तदनन्तर रोषके वशीभूत होकर बारंबार लंबी साँस खींचनेवाले दुर्योधनसे द्रोणाचार्यने इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥

धर्मार्थयुक्तं वचनमाह त्वां तात केशवः ।

तथा भीष्मः शान्तनवस्तज्जुषस्व नराधिप ॥ १० ॥

‘तात! भगवान् श्रीकृष्ण और शान्तनुनन्दन भीष्मने धर्म और अर्थसे युक्त बात कही है ।

नरेश्वर! तुम उसे स्वीकार करो ॥ १० ॥

प्राज्ञौ मेधाविनौ दान्तावर्थकामौ बहुश्रुतौ ।

आहतुस्त्वां हितं वाक्यं तज्जुषस्व नराधिप ॥ ११ ॥

‘ राजन्! ये दोनों महापुरुष विद्वान्, मेधावी, जितेन्द्रिय, तुम्हारा भला चाहनेवाले और अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता हैं । इन्होंने तुमसे हितकी ही बात कही है, अतः तुम इसका सेवन करो ॥ ११ ॥

अनुतिष्ठ महाप्राज्ञ कृष्णभीष्मौ यदूचतुः । ( मा वचो लघुबुद्धीनां समास्थास्त्वं परंतप । ) माधवं बुद्धिमोहेन मावमंस्थाः परंतप ॥ १२ ॥

‘ महामते! श्रीकृष्ण और भीष्मने जो कुछ कहा है, उसका पालन करो । परंतप! तुम तुच्छ बुद्धिवाले लोगोंकी बातपर आस्था मत रखो । शत्रुदमन! अपनी बुद्धिके मोहसे माधवका तिरस्कार न करो ॥ १२ ॥

ये त्वां प्रोत्साहयन्त्येते नैते कृत्याय कर्हिचित् ।

वैरं परेषां ग्रीवायां प्रतिमोक्ष्यन्ति संयुगे ॥ १३ ॥

' जो लोग तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित कर रहे हैं, ये कभी तुम्हारे काम नहीं आ सकते । ये युद्धका अवसर आनेपर वैरका बोझ दूसरेके कंधेपर डाल देंगे ॥

मा जीघनः प्रजाः सर्वाः पुत्रान् भ्रातॄंस्तथैव च ।

वासुदेवार्जुनौ यत्र विद्धयजेयानलं हि तान् ॥ १४ ॥

‘ समस्त प्रजाओं, पुत्रों और भाइयोंकी हत्या न कराओ । जिनकी ओर भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं, उन्हें युद्धमें अजेय समझो ॥ १४ ॥

एतच्चैव मतं सत्यं सुहृदोः कृष्णभीष्मयोः ।

यदि नादास्यसे तात पश्चात् तप्स्यसि भारत ॥ १५ ॥

पृष्ठ 820

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‘तात! भरतनन्दन! तुम्हारा वास्तविक हित चाहनेवाले श्रीकृष्ण और भीष्मका यही यथार्थ मत है । यदि तुम इसे ग्रहण नहीं करोगे तो पीछे पछताओगे ॥ १५ ॥

यथोक्तं जामदग्न्येन भूयानेष ततोऽर्जुनः ।

कृष्णो हि देवकीपुत्रो देवैरपि सुदुःसहः ।

किं ते सुखप्रियेणेह प्रोक्तेन भरतर्षभ ॥ १६ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं यथेच्छसि तथा कुरु ।

न हि त्वामुत्सहे वक्तुं भूयो भरतसत्तम ॥ १७ ॥

‘जमदग्निनन्दन परशुरामजीने जैसा बताया है, ये अर्जुन उससे भी महान् हैं और देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण तो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुःसह हैं । भरतश्रेष्ठ! तुम्हें सुखद और प्रिय लगनेवाली अधिक बातें कहनेसे क्या लाभ? ये सब बातें जो हमें कहनी थीं, मैंने कह दीं । अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो । भरतवंशविभूषण! अब तुमसे और कुछ कहनेके लिये मेरे मनमें उत्साह नहीं है ' ॥ १६-१७ ॥ वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् वाक्यान्तरे वाक्यं क्षत्तापि विदुरोऽब्रवीत् ।

दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य धार्तराष्ट्रममर्षणम् ॥ १८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब द्रोणाचार्य अपनी बात कह रहे थे, उसी समय विदुरजी भी अमर्षमें भरे हुए धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनकी ओर देखकर बीचमें ही कहने लगे – ॥ १८ ॥

दुर्योधन न शोचामि त्वामहं भरतर्षभ ।

इमौ तु वृद्धौ शोचामि गान्धारीं पितरं च ते ॥ १ ९ ॥

‘ भरतभूषण दुर्योधन! मैं तुम्हारे लिये शोक नहीं करता । मुझे तो तुम्हारे इन बूढ़े माता-पिता गान्धारी और धृतराष्ट्रके लिये भारी शोक हो रहा है ॥ १ ९ ॥

यावनाथौ चरिष्येते त्वया नाथेन दुर्हृदा ।

मित्र हतामात्यौ लूनपक्षाविवाण्डजौ ॥ २० ॥

‘ क्योंकि ये दोनों तुम - जैसे दुष्ट सहायकके कारण मित्रों और मन्त्रियोंके मारे जानेपर पंख कटे हुए पक्षियोंकी भाँति अनाथ (असहाय ) होकर विचरेंगे ॥

भिक्षुको विचरिष्येते शोचन्तौ पृथिवीमिमाम् ।

कुलघ्नमीदृशं पापं जनयित्वा कुपूरुषम् ॥ २१ ॥

' तुम्हारे - जैसे पापी और कुलघाती कुपुरुष पुत्रको जन्म देनेके कारण ये दोनों शोकमग्न हो भिक्षुककी भाँति इस पृथ्वीपर इधर- उधर भटकते फिरेंगे ' ॥ २१ ॥

अथ दुर्योधनं राजा धृतराष्ट्रोऽभ्यभाषत ।

आसीनं भ्रातृभिः सार्धं राजभिः परिवारितम् ॥ २२ ॥