03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 821–830

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

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तत्पश्चात् राजा धृतराष्ट्रने राजाओंसे घिरकर भाइयोंके साथ बैठे हुए दुर्योधनसे कहा - ॥ २२ ॥

दुर्योधन निबोधेदं शौरिणोक्तं महात्मना ।

आदत्स्व शिवमत्यन्तं योगक्षेमवदव्ययम् ॥ २३ ॥

' दुर्योधन! मेरी इस बातपर ध्यान दो । महात्मा श्रीकृष्णने जो बात बतायी है, वह अत्यन्त कल्याणकारक, योगक्षेमकी प्राप्ति करानेवाली तथा दीर्घकालतक स्थिर रहनेवाली है, तुम इसे स्वीकार करो ॥ २३ ॥

न हि सहायेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।

इष्टान् सर्वानभिप्रायान् प्राप्स्यामः सर्वराजसु ॥ २४ ॥

‘ अनायास ही महान् कर्म करनेवाले इन भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे हमलोग समस्त राजाओंमें सम्मानित रहकर अपने सभी अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त कर लेंगे ॥ २४ ॥

सुसंहतः केशवेन तात गच्छ युधिष्ठिरम् ।

चर स्वस्त्ययनं कृत्स्नं भरतानामनामयम् ॥ २५ ॥

‘ तात! भगवान् श्रीकृष्णसे मिलकर तुम युधिष्ठिरके पास जाओ और पूर्णरूपसे मंगल सम्पादन करो, जिससे भरतवंशियोंको कोई क्षति न उठानी पड़े ॥ २५ ॥

वासुदेवेन तीर्थेन तात गच्छस्व संशमम् ।

कालप्राप्तमिदं मन्ये मा त्वं दुर्योधनातिगाः ॥ २६ ॥

‘ तात! भगवान् श्रीकृष्णको मध्यस्थ बनाकर अब शान्ति धारण करो | मैं तुम्हारे लिये

यही समयोचित कर्तव्य मानता हूँ । दुर्योधन! तुम मेरी इस आज्ञाका उल्लंघन न करो ॥

शमं चेद् याचमानं त्वं प्रत्याख्यास्यसि केशवम् ।

त्वदर्थमभिजल्पन्तं न तवास्त्यपराभवः ॥ २७ ॥

‘ यदि तुम शान्तिके लिये प्रार्थना करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णका जो तुम्हारे हितकी बात बता रहे हैं, तिरस्कार करोगे - इनकी आज्ञा नहीं मानोगे तो तुम्हारा पराभव हुए बिना नहीं रह सकता' ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भीष्मादिवाक्ये पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भीष्म आदिके वचनोंसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका आधा श्लोक मिलाकर कुल २७३ श्लोक हैं । ] OFFL FULL

पृष्ठ 822

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षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्म और द्रोणका दुर्योधनको पुनः समझाना वैशम्पायन उवाच

धृतराष्ट्रवचः श्रुत्वा भीष्मद्रोणौ समव्यथौ ।

दुर्योधनमिदं वाक्यमूचतुः शासनातिगम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धृतराष्ट्रका कथन सुनकर युद्धमें जनसंहारकी सम्भावनासे समान - रूपसे दुःखका अनुभव करनेवाले भीष्म और द्रोणाचार्यने गुरुजनोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाले दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

यावत् कृष्णावसंनद्धौ यावत् तिष्ठति गाण्डिवम् ।

यावद् धौम्यो न मेधाग्नौ जुहोतीह द्विषद्बलम् ॥ २ ॥

यावन्न प्रेक्षते क्रुद्धः सेनां तव युधिष्ठिरः ।

ह्रीनिषेवो महेष्वासस्तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥ ३ ॥

‘ वत्स! जबतक श्रीकृष्ण और अर्जुन कवच धारण करके युद्धके लिये उद्यत नहीं होते हैं, जबतक गाण्डीव धनुष घरमें रखा हुआ है, जबतक धौम्य मुनि यज्ञाग्निमें शत्रुओंकी सेनाके विनाशके लिये आहुति नहीं डालते हैं और जबतक लज्जाशील महाधनुर्धर युधिष्ठिर तुम्हारी सेनापर क्रोधपूर्ण दृष्टि नहीं डालते हैं, तभीतक यह भावी जनसंहार शान्त हो जाना चाहिये ॥ २-३ ॥

यावन्न दृश्यते पार्थः स्वेऽप्यनीके व्यवस्थितः ।

भीमसेनो महेष्वासस्तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥ ४ ॥

'जबतक कुन्तीपुत्र महाधनुर्धर भीमसेन अपनी सेनाके अग्रभागमें खड़े नहीं दिखायी देते हैं, तभीतक यह मार- काटका संकल्प शान्त हो जाना चाहिये ॥ ४ ॥

यावन्न चरते मार्गान् पृतनामभिधर्षयन् ।

भीमसेनो गदापाणिस्तावत् संशाम्य पाण्डवैः ॥ ५ ॥

' दुर्योधन! जबतक हाथमें गदा लिये भीमसेन तुम्हारी सेनाका संहार करते हुए युद्धके विभिन्न मार्गोंमें विचरण नहीं कर रहे हैं, तभीतक तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ॥ ५ ॥

यावन्न शातयत्याजौ शिरांसि गजयोधिनाम् ।

गदया वीरघातिन्या फलानीव वनस्पतेः ॥ ६ ॥

कालेन परिपक्वानि तावच्छाम्यतु वैशसम् । ‘ जबतक भीमसेन अपनी वीरघातिनी गदाके द्वारा समयानुसार पके हुए वृक्षके फलोंकी भाँति संग्राम - भूमिमें गजारोही योद्धाओंके मस्तकोंको काट- काटकर नहीं गिरा रहे हैं, तभीतक तुम्हारा युद्धविषयक संकल्प शान्त हो जाना चाहिये ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 823

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नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ७ ॥

विराटश्च शिखण्डी च शैशुपालिश्च दंशिताः ।

यावन्न प्रविशन्त्येते नक्रा इव महार्णवम् ॥ ८ ॥

कृतास्त्राः क्षिप्रमस्यन्तस्तावच्छाम्यतु वैशसम् । ‘नकुल, सहदेव, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, विराट, शिखण्डी तथा शिशुपालपुत्र धृष्टकेतु — ये अस्त्रविद्यामें निपुण महान् वीर कवच धारण करके महासागरमें घुसे हुए ग्राहोंकी भाँति तुम्हारी सेनाके भीतर जबतक प्रवेश नहीं करते हैं, तभीतक यह जनसंहारका संकल्प शान्त हो जाना चाहिये ॥ ७-८३ ॥ यावन्न सुकुमारेषु शरीरेषु महीक्षिताम् ॥ ९ ॥

गार्ध्रपत्राः पतन्त्युग्रास्तावच्छाम्यतु वैशसम् । ‘ जबतक इन भूमिपालोंके सुकुमार शरीरोंपर गीधकी पाँखोंसे युक्त भयंकर बाण नहीं गिर रहे हैं, तभीतक युद्धका संकल्प शान्त हो जाय ॥ ९ ३ ॥

चन्दनागुरुदिग्धेषु हारनिष्कधरेषु च ।

नोरःसु यावद् योधानां महेष्वासैर्महेषवः ॥ १० ॥

कृतास्त्रैः क्षिप्रमस्यद्भिर्दूरपातिभिरायसाः ।

अभिलक्ष्यैर्निपात्यन्ते तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥ ११ ॥

‘ सामने आते ही लक्ष्यको मार गिरानेवाले, शीघ्रतापूर्वक बाण चलाने और दूरतकका लक्ष्य बींधनेवाले, अस्त्रविद्याके पारंगत महाधनुर्धर विपक्षी वीर जबतक तुम्हारे योद्धाओंके चन्दन और अगुरुसे चर्चित तथा हार और निष्क धारण करनेवाले वक्षःस्थलोंपर विशाल बाणोंकी वर्षा नहीं करते, तभीतक तुम्हें युद्धका विचार त्याग देना चाहिये ॥ १०-११ ॥

अभिवादयमानं त्वां शिरसा राजकुञ्जरः ।

पाणिभ्यां प्रतिगृह्णातु धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥

' हम चाहते हैं कि नृपश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर तुम्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करते देख दोनों हाथोंसे पकड़ ( कर हृदयसे लगा लें ॥ १२ ॥

ध्वजाङ्कुशपताकाङ्कं दक्षिणं ते सुदक्षिणः ।

स्कन्धे निक्षिपतां बाहुं शान्तये भरतर्षभ ॥ १३ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! उत्तम दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर ध्वजा, अंकुश और पताकाओंके चिह्नसे सुशोभित अपनी दाहिनी भुजाको जगत्में शान्ति स्थापित करनेके लिये तुम्हारे कंधेपर रखें ॥ १३ ॥

रत्नौषधिसमेतेन रक्ताङ्गुलितलेन च ।

उपविष्टस्य पृष्ठं ते पाणिना परिमार्जतु ॥ १४ ॥

' तथा तुम्हें पास बिठाकर रत्न एवं ओषधियोंसे युक्त लाल हथेलीवाले हाथसे तुम्हारी पीठको धीरे - धीरे सहलायें ॥

पृष्ठ 824

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शालस्कन्धो महाबाहुस्त्वां स्वजानो वृकोदरः ।

साम्नाभिवदतां चापि शान्तये भरतर्षभ ॥ १५ ॥

‘ भरतभूषण! शालवृक्षके तनेके समान ऊँचे डील-डौलवाले महाबाहु भीमसेन भी शान्तिके लिये तुम्हें हृदयसे लगाकर तुमसे मीठी - मीठी बातें करें ॥ १५ ॥

अर्जुनेन यमाभ्यां च त्रिभिस्तैरभिवादितः ।

मूर्ध्नि तान् समुपाघ्राय प्रेम्णाभिवद पार्थिव ॥ १६ ॥

‘ राजन्! अर्जुन और नकुल सहदेव – ये तीनों भाई तुम्हें प्रणाम करें और तुम उनके मस्तक सूँघकर उनके साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप करो ॥ १६ ॥

दृष्ट्वा त्वां पाण्डवैर्वीरैर्भ्रातृभिः सह संगतम् ।

यावदानन्दजाश्रूणि प्रमुञ्चन्तु नराधिपाः ॥ १७ ॥

' तुम्हें अपने वीर भाई पाण्डवोंके साथ मिला हुआ देख ये सब नरेश अपने नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहायें ॥ १७ ॥

घुष्यतां राजधानीषु सर्वसम्पन्महीक्षिताम् ।

पृथिवी भ्रातृभावेन भुज्यतां विज्वरो भव ॥ १८ ॥

‘ राजाओंकी सभी राजधानियोंमें यह घोषणा करा दी जाय कि कौरव - पाण्डवोंका सारा झगड़ा समाप्त होकर परस्पर प्रेमपूर्वक उनका समस्त कार्य सम्पन्न हो गया । फिर तुम और युधिष्ठिर परस्पर भ्रातृभाव रखते हुए इस राज्यका समानरूपसे उपभोग करो, तुम्हारी सारी चिन्ताएँ दूर हो जायँ ' ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भीष्मद्रोणवाक्ये षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भीष्म और द्रोणके वाक्यसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२६ ॥

पृष्ठ 825

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सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः श्रीकृष्णको दुर्योधनका उत्तर, उसका पाण्डवोंको राज्य न देनेका निश्चय वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा दुर्योधनो वाक्यमप्रियं कुरुसंसदि ।

प्रत्युवाच महाबाहुं वासुदेवं यशस्विनम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कौरवसभामें यह अप्रिय वचन सुनकर दुर्योधनने यशस्वी महाबाहु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको इस प्रकार उत्तर दिया – ॥

प्रसमीक्ष्य भवानेतद् वक्तुमर्हति केशव ।

मामेव हि विशेषेण विभाष्य परिगर्हसे ॥ २ ॥

‘ केशव! आपको अच्छी तरह सोच-विचारकर ऐसी बातें कहनी चाहिये । आप तो विशेषरूपसे मुझे ही दोषी ठहराकर मेरी निन्दा कर रहे हैं ॥ २ ॥

भक्तिवादेन पार्थानामकस्मान्मधुसूदन ।

भवान् गर्हयते नित्यं किं समीक्ष्य बलाबलम् ॥ ३ ॥

‘मधुसूदन! आप पाण्डवोंके प्रेमकी दुहाई देकर जो अकारण ही सदा हमारी निन्दा करते रहते हैं, इसका क्या कारण है? क्या आप हमलोगोंके बलाबलका विचार करके ऐसा करते हैं? ॥ ३ ॥

भवान् क्षत्ता च राजा वाप्याचार्यो वा पितामहः ।

मामेव परिगर्हन्ते नान्यं कंचन पार्थिवम् ॥ ४ ॥

‘ मैं देखता हूँ, आप, विदुरजी, पिताजी, आचार्य अथवा पितामह भीष्म सभी लोग केवल मुझपर ही दोषारोपण करते हैं; दूसरे किसी राजापर नहीं ॥ ४ ॥

न चाहं लक्षये कंचिद् व्यभिचारमिहात्मनः ।

अथ सर्वे भवन्तो मां विद्विषन्ति सराजकाः ॥ ५ ॥

‘ परंतु मुझे यहाँ अपना कोई दोष नहीं दिखायी देता है। इधर राजा धृतराष्ट्रसहित आप सब लोग अकारण ही मुझसे द्वेष रखने लगे हैं ॥ ५ ॥

न चाहं कंचिदत्यर्थमपराधमरिंदम ।

विचिन्तयन् प्रपश्यामि सुसूक्ष्ममपि केशव ॥ ६ ॥

‘ शत्रुदमन केशव! मैं अत्यन्त सोच -विचारकर दृष्टि डालता हूँ, तो भी मुझे अपना कोई सूक्ष्म - से - सूक्ष्म अपराध भी नहीं दृष्टिगोचर होता है ॥ ६ ॥

प्रियाभ्युपगते द्यूते पाण्डवा मधुसूदन ।

पृष्ठ 826

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जिताः शकुनिना राज्यं तत्र किं मम दुष्कृतम् ॥ ७ ॥

‘मधुसूदन! पाण्डवोंको एका खेल बड़ा प्रिय था । इसीलिये वे उसमें प्रवृत्त हुए । फिर यदि मामा शकुनिने उनका राज्य जीत लिया तो इसमें मेरा क्या अपराध हो गया? ॥ ७ ॥

यत् पुनर्द्रविणं किंचित् तत्राजीयन्त पाण्डवाः ।

तेभ्य एवाभ्यनुज्ञातं तत् तदा मधुसूदन ॥ ८ ॥

‘ मधुसूदन! उस जूएमें पाण्डवोंने जो कुछ भी धन हारा था, वह सब उसी समय उन्हींको लौटा दिया गया था ॥ ८ ॥

अपराधो न चास्माकं यत् ते द्यूते पराजिताः ।

अजेया जयतां श्रेष्ठ पार्थाः प्रव्राजिता वनम् ॥ ९ ॥

‘ विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! यदि अजेय पाण्डव जूएमें पुनः पराजित हो गये और वनमें जानेको विवश हुए तो यह हमलोगोंका अपराध नहीं है ॥ ९ ॥

केन वाप्यपराधेन विरुद्धयन्त्यरिभिः सह ।

अशक्ताः पाण्डवाः कृष्ण प्रहृष्टाः प्रत्यमित्रवत् ॥ १० ॥

' कृष्ण! हमारे किस अपराधसे असमर्थ पाण्डव शत्रुओंके साथ मिलकर हमारा विरोध करते हैं और ऐसा करके भी सहज शत्रुकी भाँति प्रसन्न हो रहे हैं ॥ १० ॥

किमस्माभिः कृतं तेषां कस्मिन् वा पुनरागसि ।

धार्तराष्ट्रान् जिघांसन्ति पाण्डवाः सृजयैः सह ॥ ११ ॥

'हमने उनका क्या बिगाड़ा है? वे पाण्डव हमारे किस अपराधपर सृजयोंके साथ मिलकर हम धृतराष्ट्र- पुत्रोंका वध करना चाहते हैं? ॥ ११ ॥

न चापि वयमुग्रेण कर्मणा वचनेन वा ।

प्रभ्रष्टाः प्रणमामेह भयादपि शतक्रतुम् ॥ १२ ॥

‘ हमलोग किसीके भयंकर कर्म अथवा भयानक वचनसे भयभीत हो क्षत्रियधर्मसे च्युत होकर साक्षात् इन्द्रके सामने भी नतमस्तक नहीं हो सकते ॥ १२ ॥

न च तं कृष्ण पश्यामि क्षत्रधर्ममनुष्ठितम् ।

उत्सहेत युधा जेतुं यो नः शत्रुनिबर्हण ॥ १३ ॥

' शत्रुओंका संहार करनेवाले श्रीकृष्ण! मैं क्षत्रिय धर्मका अनुष्ठान करनेवाले किसी भी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो युद्धमें हम सब लोगोंको जीतनेका साहस कर सके ॥ १३ ॥

न हि भीष्मकृपद्रोणाः सकर्णा मधुसूदन ।

देवैरपि युधा जेतुं शक्याः किमुत पाण्डवैः ॥ १४ ॥

' मधुसूदन! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और कर्णको तो देवता भी युद्धमें नहीं जीत सकते; फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है? ॥ १४ ॥

स्वधर्ममनुपश्यन्तो यदि माधव संयुगे ।

अस्त्रेण निधनं काले प्राप्स्यामः स्वर्ग्यमेव तत् ॥ १५ ॥

पृष्ठ 827

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' माधव! अपने धर्मपर दृष्टि रखते हुए यदि हमलोग युद्धमें किसी समय अस्त्रोंके आघातसे मृत्युको प्राप्त हो जायँ तो वह भी हमारे लिये स्वर्गकी ही प्राप्ति करानेवाली होगी ॥ १५ ॥

मुख्यश्चैवैष नो धर्मः क्षत्रियाणां जनार्दन ।

यच्छयीमहि संग्रामे शरतल्पगता वयम् ॥ १६ ॥

‘ जनार्दन! हम क्षत्रियोंका यही प्रधान धर्म है कि संग्राममें हमें बाण- शय्यापर सोनेका अवसर प्राप्त हो ॥ १६ ॥

ते वयं वीरशयनं प्राप्स्यामो यदि संयुगे ।

अप्रणम्यैव शत्रूणां न नस्तप्स्यन्ति माधव ॥ १७ ॥

‘ अतः माधव! हम अपने शत्रुओंके सामने नतमस्तक न होकर यदि युद्धमें वीरशय्याको प्राप्त हों तो इससे हमारे भाई- बन्धुओंको संताप नहीं होगा ॥ १७ ॥

कश्च जातु कुले जातः क्षत्रधर्मेण वर्तयन् ।

भयाद् वृत्तिं समीक्ष्यैवं प्रणमेदिह कर्हिचित् ॥ १८ ॥

'उत्तम कुलमें उत्पन्न होकर क्षत्रियधर्मके अनुसार जीवननिर्वाह करनेवाला कौन ऐसा महापुरुष होगा, जो क्षत्रियोचित वृत्तिपर दृष्टि रखते हुए भी इस प्रकार भयके कारण कभी शत्रुके सामने मस्तक झुकायेगा? ॥

उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम् ।

अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कर्हिचित् ॥ १ ९ ॥

' वीर पुरुषको चाहिये कि वह सदा उद्योग ही करे, किसीके सामने नतमस्तक न हो; क्योंकि उद्योग करना ही पुरुषका कर्तव्य - पुरुषार्थ है । वीर पुरुष असमयमें ही नष्ट भले ही हो जाय, परंतु कभी शत्रुके सामने सिर न झुकावे ॥ १ ९ ॥

इति मातङ्गवचनं परीप्सन्ति हितेप्सवः ।

धर्माय चैव प्रणमेद् ब्राह्मणेभ्यश्च मद्विधः ॥ २० ॥

‘ अपना हित चाहनेवाले मनुष्य मातंग मुनिके उपर्युक्त वचनको ही ग्रहण करते हैं; अतः मेरे-जैसा पुरुष केवल धर्म तथा ब्राह्मणको ही प्रणाम कर सकता है ( शत्रुओंको नहीं ) ॥ २० ॥

अचिन्तयन् कंचिदन्यं यावज्जीवं तथाऽऽचरेत् ।

एष धर्मः क्षत्रियाणां मतमेतच्च मे सदा ॥ २१ ॥

‘ वह दूसरे किसीको कुछ भी न समझकर जीवनभर ऐसा ही आचरण ( उद्योग) करता रहे; यही क्षत्रियोंका धर्म है और सदाके लिये मेरा मत भी यही है ॥ २१ ॥

राज्यांशश्चाभ्यनुज्ञातो यो मे पित्रा पुराभवत् ।

न स लभ्यः पुनर्जातु मयि जीवति केशव ॥ २२ ॥

पृष्ठ 828

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‘ केशव! मेरे पिताजीने पूर्वकालमें जो राज्यभाग मेरे अधीन कर दिया है, उसे कोई मेरे जीते - जी फिर कदापि नहीं पा सकता ॥ २२ ॥

यावच्च राजा ध्रियते धृतराष्ट्रो जनार्दन ।

न्यस्तशस्त्रा वयं ते वाप्युपजीवाम माधव ।

अप्रदेयं पुरा दत्तं राज्यं परवतो मम ॥ २३ ॥

अज्ञानाद् वा भयाद् वापि मयि बाले जनार्दन ।

न तदद्य पुनर्लभ्यं पाण्डवैर्वृष्णिनन्दन ॥ २४ ॥

‘ जनार्दन! जबतक राजा धृतराष्ट्र जीवित हैं, तबतक हमें और पाण्डवोंको हथियार न उठाकर शान्तिपूर्वक जीवन बिताना चाहिये । वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! पहले भी जो पाण्डवोंको राज्यका अंश दिया गया था, वह उन्हें देना उचित नहीं था; परंतु मैं उन दिनों बालक एवं पराधीन था, अतः अज्ञान अथवा भयसे जो कुछ उन्हें दे दिया गया था, उसे अब पाण्डव पुनः नहीं पा सकते ॥ २३-२४ ॥ ध्रियमाणे महाबाहौ मयि सम्प्रति केशव ।

यावद्धि तीक्ष्णया सूच्या विध्येदग्रेण केशव ।

तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्नः पाण्डवान् प्रति ॥ २५ ॥

‘ केशव! इस समय मुझ महाबाहु दुर्योधनके जीते - जी पाण्डवोंको भूमिका उतना अंश भी नहीं दिया जा सकता, जितना कि एक बारीक सूईकी नोकसे छिद सकता है ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि दुर्योधनवाक्ये सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें दुर्योधनवाक्यविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥

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पृष्ठ 829

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अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः श्रीकृष्णका दुर्योधनको फटकारना और उसे कुपित होकर सभासे जाते देख उसे कैद करनेकी सलाह देना वैशम्पायन उवाच

ततः प्रशम्य दाशार्हः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ।

दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीत् कुरुसंसदि ॥ १ ॥

वेशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! दुर्योधनकी बातें सुनकर श्रीकृष्णके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । वे कुछ विचार करके कौरवसभामें दुर्योधनसे पुनः इस प्रकार बोले – ॥

लप्स्यसे वीरशयनं काममेतदवाप्स्यसि ।

स्थिरो भव सहामात्यो विमर्दो भविता महान् ॥ २ ॥

' दुर्योधन! तुझे रणभूमिमें वीर शय्या प्राप्त होगी । तेरी यह इच्छा पूर्ण होगी । तू

मन्त्रियोंसहित धैर्यपूर्वक रह । अब बहुत बड़ा नरसंहार होनेवाला है ॥ २ ॥

यच्चैवं मन्यसे मूढ न मे कश्चिद् व्यतिक्रमः ।

पाण्डवेष्विति तत् सर्वं निबोधत नराधिपाः ॥ ३ ॥

'मूढ़! तू जो ऐसा मानता है कि पाण्डवोंके प्रति मेरा कोई अपराध ही नहीं है तो इसके

सम्बन्धमें मैं सब बातें बताता हूँ । राजाओ! आपलोग भी ध्यान देकर सुनें ॥

श्रिया संतप्यमानेन पाण्डवानां महात्मनाम् ।

त्वया दुर्मन्त्रितं द्यूतं सौबलेन च भारत ॥ ४ ॥

‘ भारत! महात्मा पाण्डवोंकी बढ़ती हुई समृद्धिसे संतप्त होकर तूने ही शकुनिके साथ यह खोटा विचार किया था कि पाण्डवोंके साथ जूआ खेला जाय ॥ ४ ॥

कथं च ज्ञातयस्तात श्रेयांसः साधुसम्मताः ।

अथान्याय्यमुपस्थातुं जिह्येनाजिह्मचारिणः ॥ ५ ॥

‘ तात! अन्यथा सदा सरलतापूर्ण बर्ताव करनेवाले और साधु - सम्मानित तेरे श्रेष्ठ बन्धु पाण्डव यहाँ तुम - जैसे कपटीके साथ अन्याययुक्त द्यूतके लिये कैसे उपस्थित हो सकते थे? ॥ ५ ॥

अक्षद्यूतं महाप्राज्ञ सतां मतिविनाशनम् ।

असतां तत्र जायन्ते भेदाश्च व्यसनानि च ॥ ६ ॥

‘ महामते! जूएका खेल तो सत्पुरुषोंकी बुद्धिको भी नाश करनेवाला है और यदि दुष्ट पुरुष उसमें प्रवृत्त हों तो उनमें बड़ा भारी कलह होता है तथा उन सबपर बहुत - से संकट छा जाते हैं ॥ ६ ॥

पृष्ठ 830

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तदिदं व्यसनं घोरं त्वया द्यूतमुखं कृतम् ।

असमीक्ष्य सदाचारान् सार्धं पापानुबन्धनैः ॥ ७ ॥

' तूने ही सदाचारकी ओर लक्ष्य न रखकर पापासक्त पुरुषोंके सहित भयंकर विपत्तिके कारणभूत ये द्यूतक्रीड़ा आदि कार्य किये हैं ॥ ७ ॥

कश्चान्यो भ्रातृभार्यां वै विप्रकर्तुं तथार्हति ।

आनीय च सभां व्यक्तं यथोक्ता द्रौपदी त्वया ॥ ८ ॥

‘ तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा अधम होगा, जो अपने बड़े भाईकी पत्नीको सभामें लाकर उसके साथ वैसा अनुचित बर्ताव करेगा । जैसा कि तूने द्रौपदीके प्रति स्पष्टरूपसे न कहने योग्य बातें कहकर दुर्व्यवहार किया है ॥ ८ ॥

कुलीना शीलसम्पन्ना प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।

महिषी पाण्डुपुत्राणां तथा विनिकृता त्वया ॥ ९ ॥

'द्रौपदी उत्तम कुलमें उत्पन्न, शील और सदाचारसे सम्पन्न तथा पाण्डवोंके लिये प्राणोंसे भी अधिक आदरणीय उन सबकी महारानी है । तथापि तूने उसके प्रति अत्याचार किया ॥ ९ ॥

जानन्ति कुरवः सर्वे यथोक्ताः कुरुसंसदि ।

दुःशासनेन कौन्तेयाः प्रव्रजन्तः परंतपाः ॥ १० ॥

'जिस समय शत्रुओंको संताप देनेवाले कुन्तीकुमार पाण्डव वनको जा रहे थे, उस समय दुःशासनने कौरवसभामें उनके प्रति जैसी कठोर बातें कही थीं, उन्हें सभी कौरव जानते हैं ॥ १० ॥

सम्यग्वृत्तेष्वलुब्धेषु सततं धर्मचारिषु ।

स्वेषु बन्धुषु कः साधुश्चरेदेवमसाम्प्रतम् ॥ ११ ॥

‘ सदा धर्ममें ही तत्पर रहनेवाले लोभरहित सदाचारी अपने बन्धुओंके प्रति कौन साधु पुरुष ऐसा अयोग्य बर्ताव करेगा? ॥ ११ ॥

नृशंसानामनार्याणां पुरुषाणां च भाषणम् ।

कर्णदुःशासनाभ्यां च त्वया च बहुशः कृतम् ॥ १२ ॥

' दुर्योधन! तूने कर्ण और दुःशासनके साथ अनेक बार निर्दयी तथा अनार्य पुरुषोंकी - सी बातें कही हैं ॥ १२ ॥

सह मात्रा प्रदग्धुं तान् बालकान् वारणावते ।

आस्थितः परमं यत्नं न समृद्धं च तत् तव ॥ १३ ॥

' तूने वारणावत नगरमें बाल्यावस्थामें पाण्डवोंको उनकी मातासहित जला डालनेका महान् प्रयत्न किया था, परंतु तेरा वह उद्देश्य सफल न हो सका ॥ १३ ॥

ऊषुश्च सुचिरं कालं प्रच्छन्नाः पाण्डवास्तदा ।

मात्रा सहैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ १४ ॥