03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 961–970

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970

पृष्ठ 961

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प्रजानाथ! अब तुम्हें भी जो उचित जान पड़े, वह करो । भारत! कौरवसभामें भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी तथा धृतराष्ट्रने मेरे सामने जो बातें कही थीं, वे सब आपको सुना दीं । राजन्! यही वहाँका वृत्तान्त है ॥ ६-७ ॥

साम्यमादौ प्रयुक्तं मे राजन् सौभ्रात्रमिच्छता ।

अभेदायास्य वंशस्य प्रजानां च विवृद्धये ॥ ८ ॥

राजन्! मैंने सब भाइयोंमें उत्तम बन्धुजनोचित प्रेम बने रहनेकी इच्छासे पहले सामनीतिका प्रयोग किया था, जिससे इस वंशमें फूट न हो और प्रजाजनोंकी निरन्तर उन्नति होती रहे ॥ ८ ॥

पुनर्भेदश्च मे युक्तो यदा साम न गृह्यते ।

कर्मानुकीर्तनं चैव देवमानुषसंहितम् ॥ ९ ॥

जब वे सामनीति न ग्रहण कर सके, तब मैंने भेदनीतिका प्रयोग किया ( उनमें फूट डालनेकी चेष्टा की ) । पाण्डवोंके देव- मनुष्योचित कर्मोंका बारंबार वर्णन किया ॥ ९ ॥

यदा नाद्रियते वाक्यं सामपूर्वं सुयोधनः ।

तदा मया समानीय भेदिताः सर्वपार्थिवाः ॥ १० ॥

जब मैंने देखा दुर्योधन मेरे सान्त्वनापूर्ण वचनोंका पालन नहीं कर रहा है, तब मैंने सब राजाओंकोबुलाकरउनमें फूट डालनेका प्रयत्न किया ॥ १० ॥

अद्भुतानि च घोराणि दारुणानि च भारत ।

अमानुषाणि कर्माणि दर्शितानि मया विभो ॥ ११ ॥

भारत! वहाँ मैंने बहुत- से अद्भुत, भयंकर, निष्ठुर एवं अमानुषिक कर्मोंका प्रदर्शन किया ॥ ११ ॥

निर्भर्त्सयित्वा राज्ञस्तांस्तृणीकृत्य सुयोधनम् ।

राधेयं भीषयित्वा च सौबलं च पुनः पुनः ॥ १२ ॥

द्यूततो धार्तराष्ट्राणां निन्दां कृत्वा तथा पुनः ।

भेदयित्वा नृपान् सर्वान् वाग्भिर्मन्त्रेण चासकृत् ॥ १३ ॥

पुनः सामाभिसंयुक्तं सम्प्रदानमथाब्रुवम् ।

अभेदात् कुरुवंशस्य कार्ययोगात् तथैव च ॥ १४ ॥

समस्त राजाओंको डाँट बताकर दुर्योधनको तिनकेके समान समझकर तथा राधानन्दन कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिको बार-बार डराकर जूएसे धृतराष्ट्रपुत्रोंकी निन्दा करके वाणी तथा गुप्त मन्त्रणाद्वारा सब राजाओंके मनमें अनेक बार भेद उत्पन्न करनेके पश्चात् फिर सामसहित दानकी बात उठायी, जिससे कुरुवंशकी एकता बनी रहे और अभीष्ट कार्यकी सिद्धि हो जाय ॥ १२–१४ ॥

ते शूरा धृतराष्ट्रस्य भीष्मस्य विदुरस्य च ।

तिष्ठेयुः पाण्डवाः सर्वे हित्वा मानमधश्चराः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 962

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प्रयच्छन्तु च ते राज्यमनीशास्ते भवन्तु च ।

यथाऽऽह राजा गाङ्गेयो विदुरश्च हितं तव ॥ १६ ॥

सर्वं भवतु ते राज्यं पञ्च ग्रामान् विसर्जय ।

अवश्यं भरणीया हि पितुस्ते राजसत्तम ॥ १७ ॥

मैंने कहा — नृपश्रेष्ठ! यद्यपि पाण्डव शौर्यसे सम्पन्न हैं, तथापि वे सब - के - सब अभिमान छोड़कर भीष्म, धृतराष्ट्र और विदुरके नीचे रह सकते हैं । वे अपना राज्य भी तुम्हींको दे दें और सदा तुम्हारे अधीन होकर रहें। राजा धृतराष्ट्र, भीष्म और विदुरजीने तुम्हारे हितके लिये जैसी बात कही है, वैसा ही करो । सारा राज्य तुम्हारे ही पास रहे । तुम पाण्डवोंको पाँच ही गाँव दे दो; क्योंकि तुम्हारे पिताके लिये पाण्डवोंका भरण- पोषण करना भी परम आवश्यक है ॥ १५–१७ ॥

एवमुक्तोऽपि दुष्टात्मा नैव भागं व्यमुञ्चत ।

दण्डं चतुर्थं पश्यामि तेषु पापेषु नान्यथा ॥ १८ ॥

मेरे इस प्रकार कहनेपर भी उस दुष्टात्माने राज्यका कोई भाग तुम्हारे लिये नहीं छोड़ा अर्थात् देना नहीं स्वीकार किया । अब तो मैं उन पापियोंपर चौथे उपाय दण्डके प्रयोगकी ही आवश्यकता देखता हूँ, अन्यथा उन्हें मार्गपर लाना असम्भव है ॥ १८ ॥

निर्याताश्च विनाशाय कुरुक्षेत्रं नराधिपाः ।

एतत् ते कथितं राजन् यद् वृत्तं कुरुसंसदि ॥ १ ९ ॥

सब राजा अपने विनाशके लिये कुरुक्षेत्रको प्रस्थान कर चुके हैं । राजन्! कौरव - सभामें जो कुछ हुआ था, वह सारा वृत्तान्त मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ १ ९ ॥

न ते राज्यं प्रयच्छन्ति विना युद्धेन पाण्डव ।

विनाशहेतवः सर्वे प्रत्युपस्थितमृत्यवः ॥ २० ॥

पाण्डुनन्दन! वे कौरव बिना युद्ध किये तुम्हें राज्य नहीं देंगे । उन सबके विनाशका कारण जुट गया है और उनका मृत्युकाल भी आ पहुँचा है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौपचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५० ॥

पृष्ठ 963

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( सैन्यनिर्याणपर्व) एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवपक्षके सेनापतिका चुनाव तथा पाण्डव सेनाका कुरुक्षेत्रमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच

जनार्दनवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

भ्रातॄनुवाच धर्मात्मा समक्षं केशवस्य ह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर धर्ममें ही मन लगाये रखनेवाले धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान्‌के सामने ही अपने भाइयोंसे कहा — ॥ १ ॥

श्रुतं भवद्भिर्यद् वृत्तं सभायां कुरुसंसदि ।

केशवस्यापि यद् वाक्यं तत् सर्वमवधारितम् ॥ २ ॥

‘ कौरवसभामें जो कुछ हुआ है वह सब वृत्तान्त तुमलोगोंने सुन लिया । फिर भगवान् श्रीकृष्णने भी जो बात कही है, उसे भी अच्छी तरह समझ लिया होगा ॥ २ ॥

तस्मात् सेनाविभागं मे कुरुध्वं नरसत्तमाः ।

अक्षौहिण्यश्च सप्तैताः समेता विजयाय वै ॥ ३ ॥

‘ अतः नरश्रेष्ठ वीरो! अब तुमलोग भी अपनी सेनाका विभाग करो । ये'सात अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हो गयी हैं, जो अवश्य ही हमारी विजय करानेवाली होंगी ॥ ३ ॥

तासां ये पतयः सप्त विख्यातास्तान् निबोधत ।

द्रुपदश्च विराटश्च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ॥ ४ ॥

सात्यकिश्चेकितानश्च भीमसेनश्च वीर्यवान् ।

एते सेनाप्रणेतारो वीराः सर्वे तनुत्यजः ॥ ५ ॥

‘ इन सातों अक्षौहिणियोंके जो सात विख्यात सेनापति हैं, उनके नाम बताता हूँ, सुनो । द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सात्यकि, चेकितान और पराक्रमी भीमसेन । ये सभी वीर हमारे लिये अपने शरीरका भी त्याग कर देनेको उद्यत हैं; अतः ये ही पाण्डवसेनाके संचालक होनेयोग्य हैं ॥ ४-५ ॥

सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः ।

ह्रीमन्तो नीतिमन्तश्च सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 964

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‘ ये सब - के - सब वेदवेत्ता, शूरवीर, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, लज्जाशील, नीतिज्ञ और युद्धकुशल हैं ॥ ६ ॥

इष्वस्त्रकुशलाः सर्वे तथा सर्वास्त्रयोधिनः ।

सप्तानामपि यो नेता सेनानां प्रविभागवित् ॥ ७ ॥

यः सहेत रणे भीष्मं शरार्चिः पावकोपमम् ।

तं तावत् सहदेवात्र प्रब्रूहि कुरुनन्दन ।

स्वमतं पुरुषव्याघ्र को नः सेनापतिः क्षमः ॥ ८ ॥

‘ इन सबने धनुर्वेदमें निपुणता प्राप्त की है तथा ये सब प्रकारके अस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेमें समर्थ हैं । अब यह विचार करना चाहिये कि इन सातोंका भी नेता कौन हो? जो सभी सेना-विभागोंको अच्छी तरह जानता हो तथा युद्धमें बाणरूपी ज्वालाओंसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी भीष्मका आक्रमण सह सकता हो। पुरुषसिंह कुरुनन्दन सहदेव! पहले तुम

अपना विचार प्रकट करो । हमारा प्रधान सेनापति होनेयोग्य कौन है ॥ ७-८ ॥

सहदेव उवाच

संयुक्त एकदुःखश्च वीर्यवांश्च महीपतिः ।

यं समाश्रित्य धर्मज्ञं स्वमंशमनुयुञ्ज्महे ॥ ९ ॥

मत्स्यो विराटो बलवान् कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः ।

प्रसहिष्यति संग्रामे भीष्मं तांश्च महारथान् ॥ १० ॥

सहदेव बोले — जो हमारे सम्बन्धी हैं, दुःखमें हमारे साथ एक होकर रहनेवाले और पराक्रमी भूपाल हैं, जिन धर्मज्ञ वीरका आश्रय लेकर हम अपना राज्यभाग प्राप्त कर सकते हैं तथा जो बलवान्, अस्त्रविद्यामें निपुण और युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले हैं, वे मत्स्यनरेश विराट संग्रामभूमिमें भीष्म तथा अन्य महारथियोंका सामना अच्छी तरह सहन कर सकेंगे ॥ ९ -१० ॥ वैशम्पायन उवाच

तथोक्ते सहदेवेन वाक्ये वाक्यविशारदः ।

नकुलोऽनन्तरं तस्मादिदं वचनमाददे ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सहदेवके इस प्रकार कहनेपर प्रवचनकुशल नकुलने उनके बाद यह बात कही- ॥ ११ ॥

वयसा शास्त्रतो धैर्यात् कुलेनाभिजनेन च ।

ह्रीमान् बलान्वितः श्रीमान् सर्वशास्त्रविशारदः ॥ १२ ॥

वेद चास्त्रं भरद्वाजाद् दुर्धर्षः सत्यसङ्गरः ।

यो नित्यं स्पर्धते द्रोणं भीष्मं चैव महाबलम् ॥ १३ ॥

श्लाघ्यः पार्थिववंशस्य प्रमुखे वाहिनीपतिः ।

पृष्ठ 965

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पुत्रपौत्रैः परिवृतः शतशाख इव द्रुमः ॥ १४ ॥

यस्तताप तपो घोरं सदारः पृथिवीपतिः ।

रोषाद् द्रोणविनाशाय वीरः समितिशोभनः ॥ १५ ॥

पितेवास्मान् समाधत्ते यः सदा पार्थिवर्षभः ।

श्वशुरो द्रुपदोऽस्माकं सेनाग्रं स प्रकर्षतु ॥ १६ ॥

स द्रोणभीष्मावायातौ सहेदिति मतिर्मम ।

स हि दिव्यास्त्रविद् राजा सखा चाङ्गिरसो नृपः ॥ १७ ॥

‘जो अवस्था, शास्त्रज्ञान, धैर्य, कुल और स्वजनसमूह सभी दृष्टियों से बड़े हैं, जिनमें लज्जा, बल और श्री तीनों विद्यमान हैं, जो समस्त शास्त्रोंके ज्ञानमें प्रवीण हैं, जिन्हें महर्षि भरद्वाजसे अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त हुई है, जो सत्यप्रतिज्ञ एवं दुर्धर्ष योद्धा हैं, महाबली भीष्म और द्रोणाचार्यसे सदा स्पर्धा रखते हैं, जो समस्त राजाओंके समूहकी प्रशंसाके पात्र हैं और युद्धके मुहानेपर खड़े हो समस्त सेनाओंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, बहुत- से पुत्र - पौत्रोंद्वारा घिरे रहनेके कारण जिनकी सैकड़ों शाखाओंसे सम्पन्न वृक्षकी भाँति शोभा होती है, जिन महाराजने रोषपूर्वक द्रोणाचार्यके विनाशके लिये पत्नीसहित घोर तपस्या की है, जो संग्रामभूमिमें सुशोभित होनेवाले शूरवीर हैं और हमलोगोंपर सदा ही पिताके समान स्नेह रखते हैं, वे हमारे श्वशुर भूपालशिरोमणि द्रुपद हमारी सेनाके प्रमुख भागका संचालन करें । मेरे विचारसे राजा द्रुपद ही युद्धके लिये सम्मुख आये हुए द्रोणाचार्य और भीष्मपितामहका सामना कर सकते हैं; क्योंकि वे दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और द्रोणाचार्यके सखा हैं ॥ १२– १७ ॥

माद्रीसुताभ्यामुक्ते तु स्वमते कुरुनन्दनः ।

वासविर्वासवसमः सव्यसाच्यब्रवीद् वचः ॥ १८ ॥

माद्रीकुमारोंके इस प्रकार अपना विचार प्रकट करनेपर कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले इन्द्रके समान पराक्रमी, इन्द्रपुत्र सव्यसाची अर्जुनने इस प्रकार कहा— ॥ १८ ॥

योऽयं तपःप्रभावेण ऋषिसंतोषणेन च ।

दिव्यः पुरुष उत्पन्नो ज्वालावर्णो महाभुजः ॥ १ ९ ॥

धनुष्मान् कवची खड्गी रथमारुह्य दंशितः ।

दिव्यैर्हयवरैर्युक्तमग्निकुण्डात् समुत्थितः ॥ २० ॥

गर्जन्निव महामेघो रथघोषेण वीर्यवान् ।

सिंहसंहननो वीरः सिंहतुल्यपराक्रमः ॥ २१ ॥

सिंहोरस्कः सिंहभुजः सिंहवक्षा महाबलः ।

सिंहप्रगर्जनो वीरः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः ॥ २२ ॥

सुभ्रूः सुदंष्ट्रः सुहनुः सुबाहुः सुमुखोऽकृशः ।

सुजत्रुः सुविशालाक्षः सुपादः सुप्रतिष्ठितः ॥ २३ ॥

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अभेद्यः सर्वशस्त्राणां प्रभिन्न इव वारणः ।

जज्ञे द्रोणविनाशाय सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥ २४ ॥

धृष्टद्युम्नमहं मन्ये सहेद् भीष्मस्य सायकान् ।

वज्राशनिसमस्पर्शान् दीप्तास्यानुरगानिव ॥ २५ ॥

‘जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान् महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा- प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्षःस्थल, बाहु, कंधे और गर्जना- ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान् वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट - पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े-बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र- शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ । पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज्र और अशनिके समान दुःसह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है ॥ १ ९ –२५ ॥

यमदूतसमान् वेगे निपाते पावकोपमान् ।

रामेणाजौ विषहितान् वज्रनिष्पेषदारुणान् ॥ २६ ॥

पुरुषं तं न पश्यामि यः सहेत महाव्रतम् ।

धृष्टद्युम्नमृते राजन्निति मे धीयते मतिः ॥ २७ ॥

‘पितामह भीष्मके बाण आघात करनेमें अग्निके समान तेजस्वी एवं यमदूतोंके समान प्राणोंका हरण करनेवाले हैं । वज्रकी गड़गड़ाहटके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उन बाणोंको पहले युद्धमें परशुरामजीने ही सहा था । राजन्! मैं धृष्टद्युम्नके सिवा ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता, जो महान् व्रतधारी भीष्मका वेग सह सके । मेरा तो यही निश्चय है ॥ २६-२७ ॥

क्षिप्रहस्तश्चित्रयोधी मतः सेनापतिर्मम ।

अभेद्यकवचः श्रीमान् मातङ्ग इव यूथपः ॥ २८ ॥

‘जो शीघ्रतापूर्वक हस्तसंचालन करनेवाला, विचित्र पद्धतिसे युद्ध करनेमें कुशल, अभेद्य कवचसे सम्पन्न एवं यूथपति गजराजकी भाँति सुशोभित होनेवाला है, मेरी सम्मतिमें वह श्रीमान् धृष्टद्युम्न ही सेनापति होनेके योग्य है ' ॥ २८ ॥

(वैशम्पायन उवाच

पृष्ठ 967

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अर्जुनेनैवमुक्ते तु भीमो वाक्यं समाददे ॥ ) वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर भीमसेनने अपना विचार इस प्रकार प्रकट किया । भीमसेनउवाच

वधार्थं यः समुत्पन्नः शिखण्डी द्रुपदात्मजः ।

वदन्ति सिद्धा राजेन्द्र ऋषयश्च समागताः ॥ २ ९ ॥

यस्य संग्राममध्ये तु दिव्यमस्त्रं प्रकुर्वतः ।

रूपं द्रक्ष्यन्ति पुरुषा रामस्येव महात्मनः ॥ ३० ॥

न तं युद्धे प्रपश्यामि यो भिन्द्यात् तु शिखण्डिनम् ।

शस्त्रेण समरे राजन् संनद्धं स्यन्दने स्थितम् ॥ ३१ ॥

द्वैरथे समरे नान्यो भीष्मं हन्यान्महाव्रतम् ।

शिखण्डिनमृते वीरं स मे सेनापतिर्मतः ॥ ३२ ॥

भीमसेनने कहा — राजेन्द्र! द्रुपदकुमार शिखण्डी पितामह भीष्मका वध करनेके लिये ही उत्पन्न हुआ है । यह बात यहाँ पधारे हुए सिद्धों एवं महर्षियोंने बतायी है! संग्रामभूमिमें जब वह अपना दिव्यास्त्र प्रकट करता है, उस समय लोगोंको उसका स्वरूप महात्मा परशुरामके समान दिखायी देता है । मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो युद्धमें शिखण्डीको मार सके । राजन्! जब महाव्रती भीष्म रथपर बैठकर अस्त्र- शस्त्रोंसे सुसज्जित हो सामने आयेंगे, उस समय द्वैरथ युद्धमें शूरवीर शिखण्डीके सिवा दूसरा कोई योद्धा उन्हें नहीं मार सकता । अतः मेरे मतमें वही प्रधान सेनापति होनेके योग्य है ॥ २ ९– ३२ ॥ युधिष्ठिर उवाच

सर्वस्य जगतस्तात सारासारं बलाबलम् ।

सर्वं जानाति धर्मात्मा मतमेषां च केशवः ॥ ३३ ॥

युधिष्ठिर बोले — तात! धर्मात्मा भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्के समस्त सारासार और बलाबलको जानते हैं तथा इस विषयमें इन सब राजाओंका क्या मत है - इससे भी ये पूर्ण परिचित हैं ॥ ३३ ॥

माह कृष्णो दाशार्हः सोऽस्तु सेनापतिर्मम ।

कृतास्त्रोऽप्यकृतास्त्रो वा वृद्धो वा यदि वा युवा ॥ ३४ ॥

अतः दशार्हकुलभूषण श्रीकृष्ण जिसका नाम बतावें, वही हमारी सेनाका प्रधान सेनापति हो । फिर वह अस्त्र - विद्यामें निपुण हो या न हो, वृद्ध हो या युवा हो ( इसकी चिन्ता अपने लोगोंको नहीं करनी चाहिये ) ॥ ३४ ॥

एष नो विजये मूलमेष तात विपर्यये ।

पृष्ठ 968

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अत्र प्राणाश्च राज्यं च भावाभावौ सुखासुखे ॥ ३५ ॥

तात! ये भगवान् ही हमारी विजय अथवा पराजयके मूल कारण हैं । हमारे प्राण, राज्य, भाव, अभाव तथा सुख और दुःख इन्हींपर अवलम्बित हैं ॥ ३५ ॥

एष धाता विधाता च सिद्धिरत्र प्रतिष्ठिता ।

यमाह कृष्णो दाशार्हः सोऽस्तु नो वाहिनीपतिः ॥ ३६ ॥

यही सबके कर्ता - धर्ता हैं । हमारे समस्त कार्योंकी सिद्धि इन्हींपर निर्भर करती है । अतः भगवान् श्रीकृष्ण जिसके लिये प्रस्ताव करें, वही हमारी विशाल वाहिनीका प्रधान अधिनायक हो ॥ ३६ ॥

ब्रवीतु वदतां श्रेष्ठो निशा समभिवर्तते ।

ततः सेनापतिं कृत्वा कृष्णस्य वशवर्तिनः ॥ ३७ ॥

रात्रेः शेषे व्यतिक्रान्ते प्रयास्यामो रणाजिरम् ।

अधिवासितशस्त्राश्च कृतकौतुकमङ्गलाः ॥ ३८ ॥

अतः वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण अपना विचार प्रकट करें । इस समय रात्रि है । हम अभी सेनापतिका निर्वाचन करके रात बीतनेपर अस्त्र- शस्त्रोंका अधिवासन ( गन्ध आदि उपचारोंद्वारा पूजन ), कौतुक (रक्षाबन्धन आदि ) तथा मंगलकृत्य ( स्वस्तिवाचन आदि) करनेके अनन्तर श्रीकृष्णके अधीन हो समरांगणकी यात्रा करेंगे ॥ ३७-३८ ॥ वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः ।

अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षो धनंजयमवेक्ष्य ह ॥ ३९ ॥

ममाप्येते महाराज भवद्भिर्य उदाहृताः ।

नेतारस्तव सेनाया मता विक्रान्तयोधिनः ॥ ४० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी ओर देखते हुए कहा-' महाराज! आपलोगोंने जिन - जिन वीरोंके नाम लिये हैं, ये सभी मेरी रायमें भी सेनापति होनेके योग्य हैं; क्योंकि ये सभी बड़े पराक्रमी योद्धा हैं ॥ ३ ९ -४० ॥

सर्व एव समर्था हि तव शत्रुं प्रबाधितुम् ।

इन्द्रस्यापि भयं ह्येते जनयेयुर्महाहवे ॥ ४१ ॥

किं पुनर्धार्तराष्ट्राणां लुब्धानां पापचेतसाम् । ' आपके शत्रुओंको परास्त करनेकी शक्ति इन सबमें विद्यमान है । ये महान् संग्राममें इन्द्रके मनमें भी भय उत्पन्न कर सकते हैं; फिर पापात्मा और लोभी धृतराष्ट्रपुत्रोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ४१ ॥

मयापि हि महाबाहो त्वत्प्रियार्थं महाहवे ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 969

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कृतो यत्नो महांस्तत्र शमः स्यादिति भारत ।

धर्मस्य गतमानृण्यं न स्म वाच्या विवक्षताम् ॥ ४३ ॥

‘महाबाहु भरतनन्दन! मैंने भी महान् युद्धकी सम्भावना देखकर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये शान्ति- स्थापनके निमित्त महान् प्रयत्न किया था । इससे हमलोग धर्मके ऋणसे भी उऋण हो गये हैं । दूसरोंके दोष बतानेवाले लोग भी अब हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं कर सकते ॥ ४२-४३ ॥

कृतास्त्रं मन्यते बाल आत्मानमविचक्षणः ।

धार्तराष्ट्रो बलस्थं च पश्यत्यात्मानमातुरः ॥ ४४ ॥

' धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन युद्धके लिये आतुर हो रहा है । वह मूर्ख और अयोग्य होकर भी अपनेको अस्त्रविद्यामें पारंगत मानता है और दुर्बल होकर भी अपनेको बलवान् समझता है ॥ ४४ ॥

युज्यतां वाहिनी साधु वधसाध्या हि मे मताः ।

न धार्तराष्ट्राः शक्ष्यन्ति स्थातुं दृष्ट्वा धनंजयम् ॥ ४५ ॥

भीमसेनं च संक्रुद्धं यमौ चापि यमोपमौ ।

युयुधानद्वितीयं च धृष्टद्युम्नममर्षणम् ॥ ४६ ॥

अभिमन्युं द्रौपदेयान् विराटद्रुपदावपि ।

अक्षौहिणीपतींश्चान्यान् नरेन्द्रान् भीमविक्रमान् ॥ ४७ ॥

‘ अतः आप अपनी सेनाको युद्धके लिये अच्छी तरहसे सुसज्जित कीजिये; क्योंकि मेरे मतमें वे शत्रुवधसे ही वशीभूत हो सकते हैं । वीर अर्जुन, क्रोधमें भरे हुए भीमसेन, यमराजके समान नकुल सहदेव, सात्यकिसहित अमर्षशील धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, विराट, द्रुपद तथा अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति अन्यान्य भयंकर पराक्रमी नरेशोंको युद्धके लिये उद्यत देखकर धृतराष्ट्रके पुत्र रणभूमिमें टिक नहीं सकेंगे ॥ ४५— ४७ ॥

सारवद् बलमस्माकं दुष्प्रधर्षं दुरासदम् ।

धार्तराष्ट्रबलं संख्ये हनिष्यति न संशयः ॥ ४८ ॥

धृष्टद्युम्नमहं मन्ये सेनापतिमरिंदम । ' हमारी सेना अत्यन्त शक्तिशाली, दुर्धर्ष और दुर्गम है । वह युद्धमें धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाका संहार कर डालेगी, इसमें संशय नहीं है । शत्रुदमन! मैं धृष्टद्युम्नको ही प्रधान सेनापति होनेयोग्य मानता हूँ' ॥ ४८३ ॥

वैशम्पायन उवाच एवमुक्ते तु कृष्णेन सम्प्राहृष्यन्नरोत्तमाः ॥ ४ ९ ॥ तेषां प्रहृष्टमनसां नादः समभवन्महान् ।

पृष्ठ 970

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योग इत्यथ सैन्यानां त्वरतां सम्प्रधावताम् ॥ ५० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए । फिर तो युद्धके लिये ' सुसज्जित हो जाओ, सुसज्जित हो जाओ' ऐसा कहते हुए समस्त सैनिक बड़ी उतावलीके साथ दौड़ - धूप करने लगे । उस समय प्रसन्न चित्तवाले उन वीरोंका महान् हर्षनाद सब ओर गूँज उठा ॥ ४ ९ -५० ॥

हयवारणशब्दाश्च नेमिघोषाश्च सर्वतः ।

शङ्खदुन्दुभिघोषाश्च तुमुलाः सर्वतोऽभवन् ॥ ५१ ॥

सब ओर घोड़े, हाथी और रथोंका घोष होने लगा । सभी ओर शंख और दुन्दुभियोंकी भयानक ध्वनि गूँजने लगी ॥ ५१ ॥

तदुग्रं सागरनिभं क्षुब्धं बलसमागमम् ।

रथपात्तिगजोदग्रं महोर्मिभिरिवाकुलम् ॥ ५२ ॥

रथ, पैदल और हाथियोंसे भरी हुई वह भयंकर सेना उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त महासागरके समान क्षुब्ध हो उठी ॥ ५२ ॥

धावतामाह्वयानानां तनुत्राणि च बध्नताम् ।

प्रयास्यतां पाण्डवानां ससैन्यानां समन्ततः ॥ ५३ ॥

गङ्गेव पूर्णा दुर्धर्षा समदृश्यत वाहिनी । रणयात्राके लिये उद्यत हुए पाण्डव और उनके सैनिक सब ओर दौड़ते, पुकारते और कवच बाँधते दिखायी दिये । उनकी वह विशाल वाहिनी जलसे परिपूर्ण गंगाके समान दुर्गम दिखायी देती थी ॥ ५३ ॥

अग्रानीके भीमसेनो माद्रीपुत्रौ च दंशितौ ॥ ५४ ॥

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।

प्रभद्रकाश्च पञ्चाला भीमसेनमुखा ययुः ॥ ५५ ॥

सेनाके आगे- आगे भीमसेन, कवचधारी माद्रीकुमार नकुल सहदेव, सुभद्राकुमार अभिमन्यु, द्रौपदीके सभी पुत्र, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, प्रभद्रकगण और पांचालदेशीय क्षत्रिय वीर चले । इन सबने भीमसेनको अपने आगे कर लिया था ॥ ५४-५५ ॥

ततः शब्दः समभवत् समुद्रस्येव पर्वणि ।

हृष्टानां सम्प्रयातानां घोषो दिवमिवास्पृशत् ॥ ५६ ॥

तदनन्तर जैसे पूर्णिमाके दिन बढ़ते हुए समुद्रका कोलाहल सुनायी देता है, उसी प्रकार हर्ष और उत्साहमें भरकर युद्धके लिये यात्रा करनेवाले उन सैनिकोंका महान् घोष सब ओर फैलकर मानो स्वर्गलोकतक जा पहुँचा ॥ ५६ ॥

प्रहृष्टा दंशिता योधाः परानीकविदारणाः ।

तेषां मध्ये ययौ राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ५७ ॥