श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 971–980

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980

पृष्ठ 971

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हर्षमें भरे हुए और कवच आदिसे सुसज्जित वे समस्त सैनिक शत्रु सेनाको विदीर्ण करनेका उत्साह रखते थे । कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर समस्त सैनिकोंके बीचमें होकर चले ॥ ५७ ॥

शकटापणवेशाश्च यानयुग्यं च सर्वशः ।

कोशं यन्त्रायुधं चैव ये च वैद्याश्चिकित्सकाः ॥ ५८ ॥

सामान ढोनेवाली गाड़ी, बाजार, डेरे- तम्बू, रथ आदि सवारी, खजाना, यन्त्रचालित अस्त्र और चिकित्साकुशल वैद्य भी उनके साथ- साथ चले ॥ ५८ ॥

फल्गु यच्च बलं किंचिद् यच्चापि कृशदुर्बलम् ।

तत् संगृह्य ययौ राजा ये चापि परिचारकाः ॥ ५ ९ ॥

राजा युधिष्ठिरने जो कोई भी सेना सारहीन, कृशकाय अथवा दुर्बल थी, सबको एवं अन्य परिचारकोंको उपप्लव्यमें एकत्र करके वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ५ ९ ॥

उपप्लव्ये तु पाञ्चाली द्रौपदी सत्यवादिनी ।

सह स्त्रीभिर्निववृते दासीदाससमावृता ॥ ६० ॥

पांचालराजकुमारी सत्यवादिनी द्रौपदी दास-दासियोंसे घिरी हुई कुछ दूरतक महाराजके साथ गयी । फिर सभी स्त्रियोंके साथ उपप्लव्य नगरमें लौट आयी ॥ ६० ॥

कृत्वा मूलप्रतीकारं गुल्मैः स्थावरजङ्गमैः ।

स्कन्धावारेण महता प्रययुः पाण्डुनन्दनाः ॥ ६१ ॥

पाण्डवलोग दुर्गकी रक्षाके लिये आवश्यक स्थावर ( परकोटे और खाईं आदि ) तथा जंगम ( पहरेदार सैनिकोंकी नियुक्ति आदि) उपायोंद्वारा स्त्रियों और धन आदिकी सुरक्षाकी समुचित व्यवस्था करके बहुत- से खेमे और तम्बू आदि साथ लेकर प्रस्थित हुए ॥ ६१ ॥

ददतो गां हिरण्यं च ब्राह्मणैरभिसंवृताः ।

स्तूयमाना ययू राजन् रथैर्मणिविभूषितैः ॥ ६२ ॥

राजन्! ब्राह्मणलोग चारों ओरसे घेरकर पाण्डवोंके गुण गाते और पाण्डवलोग उन्हें गौओं तथा सुवर्ण आदिका दान देते थे । इस प्रकार वे मणिभूषित रथोंपर बैठकर यात्रा कर रहे थे ॥ ६२ ॥

केकया धृष्टकेतुश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ।

श्रेणिमान् वसुदानश्च शिखण्डी चापराजितः ॥ ६३ ॥

हृष्टास्तुष्टाः कवचिनः सशस्त्राः समलंकृताः ।

राजानमन्वयुः सर्वे परिवार्य युधिष्ठिरम् ॥ ६४ ॥

( पाँचों भाई) केकयराजकुमार, धृष्टकेतु, काशिराजके पुत्र अभिभू, श्रेणिमान्, वसुदान और अपराजित वीर शिखण्डी – ये सब लोग आभूषण और कवच धारण करके हाथोंमें शस्त्र लिये हर्ष और उल्लासमें भरकर राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर उनके साथ-साथ जा रहे थे ॥ ६३-६४ ॥

पृष्ठ 972

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जघनार्धे विराटश्च याज्ञसेनिश्च सौमकिः ।

सुधर्मा कुन्तिभोजश्च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजाः ॥ ६५ ॥

रथायुतानि चत्वारि हयाः पञ्चगुणास्तथा ।

पत्तिसैन्यं दशगुणं गजानामयुतानि षट् ॥ ६६ ॥

सेनाके पिछले आधे भागमें राजा विराट, सोमकवंशी द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, सुधर्मा, कुन्तिभोज और धृष्टद्युम्नके पुत्र जा रहे थे । इनके साथ चालीस हजार रथ, दो लाख घोड़े, चार लाख पैदल और साठ हजार हाथी थे ॥ ६५-६६ ॥

अनाधृष्टिश्चेकितानो धृष्टकेतुश्च सात्यकिः ।

परिवार्य ययुः सर्वे वासुदेवधनंजयौ ॥ ६७ ॥

अनाधृष्टि, चेकितान, धृष्टकेतु तथा सात्यकि– ये सब लोग भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनको घेरकर चल रहे थे ॥ ६७ ॥

आसाद्य तु कुरुक्षेत्रं व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।

पाण्डवाः समदृश्यन्त नर्दन्तो वृषभा इव ॥ ६८ ॥

इस प्रकार सेनाकी व्यूहरचना करके प्रहार करनेके लिये उद्यत हुए पाण्डवसैनिक कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर साँड़ोंके समान गर्जन करते हुए दिखायी देने लगे ॥ ६८ ॥

तेऽवगाह्य कुरुक्षेत्रं शङ्खान् दध्मुररिंदमाः ।

तथैव दध्मतुः शङ्खं वासुदेवधनंजयौ ॥ ६ ९ ॥

उन शत्रुदमन वीरोंने कुरुक्षेत्रकी सीमामें पहुँचकर अपने - अपने शंख बजाये । इसी प्रकार श्रीकृष्ण और अर्जुनने भी शंखध्वनि की ॥ ६ ९ ॥

पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ।

निशम्य सर्वसैन्यानि समहृष्यन्त सर्वशः ॥ ७० ॥

बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान पांचजन्यका गम्भीर घोष सुनकर सब ओर फैले हुए समस्त पाण्डवसैनिक हर्षसे उल्लसित एवं रोमांचित हो उठे ॥ ७० ॥

शङ्खदुन्दुभिसंसृष्टः सिंहनादस्तरस्विनाम् ।

पृथिवीं चान्तरिक्षं च सागरांश्चान्वनादयत् ॥ ७१ ॥

शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिला हुआ वेगवान् वीरोंका सिंहनाद पृथ्वी, आकाश तथा समुद्रोंतक फैलकर उन सबको प्रतिध्वनित करने लगा ॥ ७१ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि कुरुक्षेत्रप्रवेशे एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें पाण्डवसेनाका कुरुक्षेत्रमें प्रवेशविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १५१ ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ७१३ श्लोक हैं । ]

पृष्ठ 973

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पृष्ठ 974

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः कुरुक्षेत्रमें पाण्डव - सेनाका पड़ाव तथा शिविर- निर्माण वैशम्पायन उवाच

ततो देशे समे स्निग्धे प्रभूतयवसेन्धने ।

निवेशयामास तदा सेनां राजा युधिष्ठिरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने एक चिकने और समतल प्रदेशमें जहाँ घास और ईंधनकी अधिकता थी, अपनी सेनाका पड़ाव डाला ॥ ||

परिहृत्य श्मशानानि देवतायतनानि च ।

आश्रमांश्च महर्षीणां तीर्थान्यायतनानि च ॥ २ ॥

मधुरानूषरे देशोशुचौ पुण्ये महामतिः ।

निवेशं कारयामास कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥

- श्मशान, देवमन्दिर, महर्षियोंके आश्रम, तीर्थ और सिद्धक्षेत्र – इन सबका परित्याग करके उन स्थानोंसे बहुत दूर ऊसररहित मनोहर शुद्ध एवं पवित्र स्थानमें जाकर कुन्तीपुत्र महामति युधिष्ठिरने अपनी सेनाको ठहराया ॥ २-३ ॥

ततश्च पुनरुत्थाय सुखी विश्रान्तवाहनः ।

प्रययौ पृथिवीपालैर्वृतः शतसहस्रशः ॥ ४ ॥

विद्राव्य शतशो गुल्मान् धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान् ।

पर्यक्रामत् समन्ताच्च पार्थेन सह केशवः ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् समस्त वाहनोंके विश्राम कर लेनेपर स्वयं भी विश्रामसुखका अनुभव करके भगवान् श्रीकृष्ण उठे और सैकड़ों- हजारों भूमिपालोंसे घिरकर कुन्तीपुत्र अर्जुनके साथ आगे बढ़े । उन्होंने दुर्योधनके सैकड़ों सैनिक दलोंको दूर भगाकर वहाँ सब ओर विचरण करना प्रारम्भ किया ॥ ४-५ ॥

शिबिरं मापयामास धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।

सात्यकिश्च रथोदारो युयुधानः प्रतापवान् ॥ ६ ॥

द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न तथा प्रतापशाली एवं उदाररथी सत्यकपुत्र युयुधानने शिविर बनानेयोग्य भूमि नापी ॥ ६ ॥

आसाद्य सरितं पुण्यां कुरुक्षेत्रे हिरण्वतीम् ।

सूपतीर्थां शुचिजलां शर्करापङ्कवर्जिताम् ॥ ७ ॥

खानयामास परिखां केशवस्तत्र भारत ।

गुप्त्यर्थमपि चादिश्य बलं तत्र न्यवेशयत् ॥ ८ ॥

पृष्ठ 975

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विधिर्यः शिबिरस्यासीत् पाण्डवानां महात्मनाम् ।

तद्विधानि नरेन्द्राणां कारयामास केशवः ॥ ९ ॥

भरतनन्दन जनमेजय! कुरुक्षेत्रमें हिरण्वती नामक एक पवित्र नदी है, जो स्वच्छ एवं विशुद्ध जलसे भरी है । उसके तटपर अनेक सुन्दर घाट हैं । उस नदीमें कंकड़, पत्थर और कीचड़का नाम नहीं है । उसके समीप पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने खाईं खुदवायी और उसकी रक्षाके लिये पहरेदारोंको नियुक्त करके वहीं सेनाको ठहराया । महात्मा पाण्डवोंके लिये शिविरका निर्माण जिस विधिसे किया गया था, उसी प्रकारके भगवान् केशवने अन्य राजाओंके लिये शिविर बनवाये ॥ ७– ९ ॥

प्रभूततरकाष्ठानि दुराधर्षतराणि च ।

भक्ष्यभोज्यान्नपानानि शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १० ॥

शिबिराणि महार्हाणि राज्ञां तत्र पृथक् पृथक् ।

विमानानीव राजेन्द्र निविष्टानि महीतले ॥ ११ ॥

राजेन्द्र! उस समय राजाओंके लिये सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दुर्धर्ष एवं बहुमूल्य शिविर पृथक् - पृथक् बनवाये गये थे । उनके भीतर बहुत - से काष्ठों तथा प्रचुर मात्रामें भक्ष्य-भोज्य अन्न एवं पान - सामग्रीका संग्रह किया गया था । वे समस्त शिविर भूतलपर रहते हुए विमानोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १०-११ ॥

तत्रासन् शिल्पिनः प्राज्ञाः शतशो दत्तवेतनाः ।

सर्वोपकरणैर्युक्ता वैद्याः शास्त्रविशारदाः ॥ १२ ॥

वहाँ सैकड़ों विद्वान् शिल्पी और शास्त्रविशारद वैद्य वेतन देकर रखे गये थे, जो समस्त आवश्यक उपकरणोंके साथ वहाँ रहते थे ॥ १२ ॥

ज्याधनुर्वर्मशस्त्राणां तथैव मधुसर्पिषोः ।

ससर्जरसपांसूनां राशयः पर्वतोपमाः ॥ १३ ॥

प्रत्येक शिविरमें प्रत्यंचा, धनुष, कवच, अस्त्र- शस्त्र, मधु, घी तथा रालका चूरा — इन सबके पहाड़ों - जैसे ढेर लगे हुए थे ॥ १३ ॥

बहूदकं सुयवसं तुषाङ्गारसमन्वितम् ।

शिबिरे शिबिरे राजा संचकार युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥

राजा युधिष्ठिरने प्रत्येक शिविरमें प्रचुर जल, सुन्दर घास, भूसी और अग्निका संग्रह करा रखा था ॥ १४ ॥

महायन्त्राणि नाराचास्तोमराणि परश्वधाः ।

धनूंषि कवचादीनि ऋष्टयस्तूणसंयुताः ॥ १५ ॥

बड़े - बड़े यन्त्र, नाराच, तोमर, फरसे, धनुष, कवच, ऋष्टि और तरकस – ये सब वस्तुएँ भी उन सभी शिविरोंमें संगृहीत थीं ॥ १५ ॥

गजाः कण्टकसंनाहा लोहवर्मोत्तरच्छदाः ।

पृष्ठ 976

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दृश्यन्ते तत्र गिर्याभाः सहस्रशतयोधिनः ॥ १६ ॥

वहाँ लाखों योद्धाओंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ पर्वतोंके समान विशालकाय बहुत--से हाथी दिखायी देते थे, जो काँटेदार साज- सामान, लोहेके कवच तथा लोहेकी ही झूल धारण किये हुए थे ॥ १६ ॥

निविष्टान् पाण्डवांस्तत्र ज्ञात्वा मित्राणि भारत ।

अभिसस्रुर्यथादेशं सबलाः सहवाहनाः ॥ १७ ॥

भारत! पाण्डवोंने कुरुक्षेत्रमें जाकर अपनी सेनाका पड़ाव डाल दिया है, यह जानकर उनसे मित्रता रखनेवाले बहुत - से राजा अपनी सेना और सवारियोंके साथ उनके पास, जहाँ वे ठहरे थे, आये ॥ १७ ॥

चरितब्रह्मचर्यास्ते सोमपा भूरिदक्षिणाः ।

जयाय पाण्डुपुत्राणां समाजग्मुर्महीक्षितः ॥ १८ ॥

जिन्होंने यथासमय ब्रह्मचर्यव्रतका पालन, यज्ञोंमें सोमरसका पान तथा प्रचुर दक्षिणाओंका दान किया था, ऐसे भूपालगण पाण्डवोंकी विजयके लिये कुरुक्षेत्रमें पधारे ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि शिबिरादिनिर्माणे द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें शिविर आदिका निर्माणविषयक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १५२ ॥

पृष्ठ 977

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त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः दुर्योधनका सेनाको सुसज्जित होने और शिविर- निर्माण करनेके लिये आज्ञा देना तथा सैनिकोंकी रणयात्राके लिये तैयारी जनमेजय उवाच

युधिष्ठिरं सहानीकमुपायान्तं युयुत्सया ।

संनिविष्टं कुरुक्षेत्रे वासुदेवेन पालितम् ॥ १ ॥

विराटद्रुपदाभ्यां च सपुत्राभ्यां समन्वितम् ।

केकयैर्वृष्णिभिश्चैव पार्थिवैः शतशो वृतम् ॥ २ ॥

महेन्द्रमिव चादित्यैरभिगुप्तं महारथैः ।

श्रुत्वा दुर्योधनो राजा किं कार्यं प्रत्यपद्यत ॥ ३ ॥

जनमेजयने पूछा – मुने! दुर्योधनने जब यह सुना कि राजा युधिष्ठिर युद्धकी इच्छासे सेनाओंके साथ यात्रा करके भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित हो कुरुक्षेत्रमें पहुँच गये और वहाँ सेनाका पड़ाव डाले बैठे हैं, पुत्रोंसहित राजा विराट और द्रुपद भी उनके साथ हैं, केकयराजकुमार, वृष्णिवंशी योद्धा तथा सैकड़ों भूपाल उन्हें घेरे रहते हैं तथा वे आदित्योंसहित घिरे हुए देवराज इन्द्रकी भाँति अनेक महारथी योद्धाओंद्वारा सुरक्षित हैं, तब उसने क्या किया? ॥ १–३ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामते ।

सम्भ्रमे तुमुले तस्मिन् यदासीत् कुरुजाङ्गले ॥ ४ ॥

महामते! कुरुक्षेत्रके उस भयंकर समारोहमें जो कुछ हुआ हो वह सब मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

व्यथयेयुरिमे देवान् सेन्द्रानपि समागमे ।

पाण्डवा वासुदेवश्च विराटद्रुपदौ तथा ॥ ५ ॥

धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः शिखण्डी च महारथः ।

युधामन्युश्च विक्रान्तो देवैरपि दुरासदः ॥ ६ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ।

कुरूणां पाण्डवानां च यद् यदासीद् विचेष्टितम् ॥ ७ ॥

तपोधन! पाण्डव, भगवान् श्रीकृष्ण, विराट, द्रुपद, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, महारथी शिखण्डी तथा देवताओंके लिये भी दुर्जय महापराक्रमी युधामन्यु —ये सब तो संग्राममें एकत्र होनेपर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंको भी पीड़ित कर सकते हैं; अतः वहाँ

पृष्ठ 978

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कौरवों तथा पाण्डवोंने जो - जो कर्म किया था वह सब विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी इच्छा है ॥ ५–७ ॥ वैशम्पायन उवाच

प्रतियाते तु दाशार्हे राजा दुर्योधनस्तदा ।

कर्णं दुःशासनं चैव शकुनिं चाब्रवीदिदम् ॥ ८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर उस समय राजा दुर्योधनने कर्ण, दुःशासन और शकुनिसे इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥

अकृतेनैव कार्येण गतः पार्थानधोक्षजः ।

स एनान्मन्युनाऽऽविष्टो ध्रुवं धक्ष्यत्यसंशयम् ॥ ९ ॥

' श्रीकृष्ण यहाँसे कृतकार्य होकर नहीं गये हैं । इसके लिये वे क्रोधमें भरकर पाण्डवोंको निश्चय ही युद्धके लिये उत्तेजित करेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ ९ ॥

इष्टो हि वासुदेवस्य पाण्डवैर्मम विग्रहः ।

भीमसेनार्जुनौ चैव दाशार्हस्य मते स्थितौ ॥ १० ॥

' वास्तवमें श्रीकृष्ण यही चाहते हैं कि पाण्डवोंके साथ मेरा युद्ध हो । भीमसेन और अर्जन - से दोनों भाई तो श्रीकृष्णके ही मतमें रहनेवाले हैं ॥ १० ॥

अजातशत्रुरत्यर्थं भीमसेनवशानुगः ।

निकृतश्च मया पूर्वं सह सर्वैः सहोदरैः ॥ ११ ॥

‘ अजातशत्रु युधिष्ठिर भी अधिकतर भीमसेनके वशमें रहा करते हैं । इसके सिवा मैंने पहले सब भाइयोंसहित उनका तिरस्कार भी किया है ॥ ११ ॥

विराटद्रुपदौ चैव कृतवैरौ मया सह ।

तौ च सेनाप्रणेतारौ वासुदेववशानुगौ ॥ १२ ॥

'विराट और द्रुपद तो मेरे साथ पहलेसे ही वैर रखते हैं । वे दोनों पाण्डव- सेनाके संचालक तथा श्रीकृष्णकी आज्ञाके अधीन रहनेवाले हैं ॥ १२ ॥

भविता विग्रहः सोऽयं तुमुलो लोमहर्षणः ।

तस्मात् सांग्रामिकं सर्वं कारयध्वमतन्द्रिताः ॥ १३ ॥

‘ अतः अब हमलोगोंका पाण्डवोंके साथ होनेवाला यह युद्ध बड़ा ही भयंकर और रोमांचकारी होगा । इसलिये राजाओ! आप सब लोग आलस्य छोड़कर युद्धकी सारी तैयारी करें ॥ १३ ॥

शिबिराणि कुरुक्षेत्रे क्रियन्तां वसुधाधिपाः ।

सुपर्याप्तावकाशानि दुरादेयानि शत्रुभिः ॥ १४ ॥

आसन्नजलकाष्ठानि शतशोऽथ सहस्रशः ।

अच्छेद्याहारमार्गाणि बन्धोच्छ्रयचितानि च ॥ १५ ॥

पृष्ठ 979

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' भूमिपालो! आप कुरुक्षेत्रमें सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें ऐसे शिविर तैयार करावें, जिनमें अपनी आवश्यकताके अनुसार पर्याप्त अवकाश हों तथा शत्रुलोग जिनपर अधिकार न कर सकें । उनमें पास ही जल और काष्ठ आदि मिलनेकी सुविधाएँ हों । उनमें ऐसे मार्ग होने चाहिये जिनके द्वारा खाद्यसामग्री सुविधासे लायी जा सके और शत्रुलोग उसे नष्ट न कर सकें तथा उनके चारों तरफ किलेबन्दी कर देनी चाहिये ॥ १४-१५ ॥

विविधायुधपूर्णानि पताकाध्वजवन्ति च ।

समाश्च तेषां पन्थानः क्रियन्तां नगराद् बहिः ॥ १६ ॥

' उन शिविरोंको नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंसे भरपूर तथा ध्वजा- पताकाओंसे सुशोभित रखना चाहिये । शिविरोंका जो नगर बसाया जाय, उससे बाहर अनेक सीधे तथा समतल मार्ग उन शिविरोंमें जानेके लिये बनाये जायँ ॥ १६ ॥

प्रयाणं घुष्यतामद्य श्वोभूत इति मा चिरम् ।

ते तथेति प्रतिज्ञाय श्वोभूते चक्रिरे तथा ॥ १७ ॥

हृष्टरूपा महात्मानो निवासाय महीक्षिताम् । ' आज ही यह घोषणा करा दी जाय कि कल सबेरे ही युद्धके लिये प्रस्थान करना है । इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये । ' दुर्योधनका यह आदेश सुनकर 'बहुत अच्छा – ऐसा ही होगा ' यह प्रतिज्ञा करके महामना कर्ण आदिने अत्यन्त प्रसन्न होकर सबेरा होते ही राजाओंके निवासके लिये शिविर बनवाने आरम्भ कर दिये ॥ १७३ ॥

ततस्ते पार्थिवाः सर्वे तच्छ्रुत्वा राजशासनम् ॥ १८ ॥

आसनेभ्यो महार्हेभ्य उदतिष्ठन्नमर्षिताः ।

बाहून् परिघसंकाशान् संस्पृशन्तः शनैः शनैः ॥ १ ९ ॥

काञ्चनाङ्गददीप्तांश्च चन्दनागुरुभूषितान् । तदनन्तर वहाँ आये हुए सब नरेश राजा दुर्योधनकी यह आज्ञा सुनकर रोषावेशसे परिपूर्ण हो चन्दन और अगुरुसे चर्चित तथा सोनेके भुजबंदोंसे प्रकाशित अपनी परिघके समान मोटी भुजाओंका धीरे- धीरे स्पर्श करते हुए बहुमूल्य आसनोंसे उठकर खड़े हो गये ॥ १८-१९ ॥

उष्णीषाणि नियच्छन्तः पुण्डरीकनिभैः करैः ।

अन्तरीयोत्तरीयाणि भूषणानि च सर्वशः ॥ २० ॥

उन्होंने अपने कमलसदृश करोंसे मस्तकपर पगड़ी बाँध ली; फिर धोती, चादर और सब प्रकारके आभूषण धारण कर लिये ॥ २० ॥

ते रथान् रथिनः श्रेष्ठा हयांश्च हयकोविदाः ।

सज्जयन्ति स्म नागांश्च नागशिक्षास्वनुष्ठिताः ॥ २१ ॥

श्रेष्ठ रथी अपने रथोंको, अश्वसंचालनकी कलामें कुशल योद्धा घोड़ोंको और हस्तिशिक्षामें निपुण सैनिक हाथियोंको सुसज्जित करने लगे ॥ २१ ॥

पृष्ठ 980

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अथ वर्माणि चित्राणि काञ्चनानि बहूनि च ।

विविधानि च शस्त्राणि चक्रुः सर्वाणि सर्वशः ॥ २२ ॥

उन्होंने सोनेके बने हुए बहुत- से विचित्र कवच तथा सब प्रकारके विभिन्न अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण कर लिये ॥ २२ ॥

पदातयश्च पुरुषाः शस्त्राणि विविधानि च ।

उपाजहुः शरीरेषु हेमचित्राण्यनेकशः ॥ २३ ॥

पैदल योद्धाओंने भी अपने अंगोंमें सुवर्णजटित कवच तथा भाँति- भाँतिके अनेक अस्त्र- शस्त्र धारण कर लिये ॥ २३ ॥

तदुत्सव इवोदग्रं सम्प्रहृष्टनरावृतम् ।

नगरं धार्तराष्ट्रस्य भारतासीत् समाकुलम् ॥ २४ ॥

जनमेजय! दुर्योधनका वह हस्तिनापुर नगर मानो वहाँ कोई उत्सव हो रहा हो, इस प्रकार समृद्ध और हर्षोत्फुल्ल मनुष्योंसे भर गया था, इससे वहाँ बड़ी हलचल मच गयी थी ॥ २४ ॥

जनौघसलिलावर्तो रथनागाश्वमीनवान् ।

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः कोशसंचयरत्नवान् ॥ २५ ॥

चित्राभरणवर्मोर्मिः शस्त्रनिर्मलफेनवान् ।

प्रासादमालाद्रिवृतो रथ्यापणमहाह्रदः ॥ २६ ॥

योधचन्द्रोदयोद्भूतः कुरुराजमहार्णवः ।

व्यदृश्यत तदा राजंश्चन्द्रोदय इवोदधिः ॥ २७ ॥

राजन्! जैसे चन्द्रोदयकालमें समुद्र उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त हो जाता है, उसी प्रकार कुरुराज दुर्योधनरूपी महासागर सैनिक समुदायरूपी चन्द्रमाके उदयसे अत्यन्त उल्लसित दिखायी देने लगा । सब ओर घूमता हुआ जनसमुदाय ही वहाँ जलमें उठनेवाली भँवरोंके समान जान पड़ता था । रथ, हाथी और घोड़े उसमें मछलीके समान प्रतीत होते थे । शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनि ही उस कुरुराजरूपी समुद्रकी गर्जना थी । खजानोंका संग्रह ही रत्नराशिका प्रतिनिधित्व कर रहा था । योद्धाओंके विचित्र आभूषण और कवच ही उस समुद्रकी उठती हुई तरंगोंके समान जान पड़ते थे । चमकीले शस्त्र ही निर्मल फेन - से प्रतीत होते थे । महलोंकी पंक्तियाँ ही तटवर्ती पर्वत - सी जान पड़ती थीं । सड़कोंपर स्थित दूकानें ही मानो गुफाएँ थीं ॥ २५–२७ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि दुर्योधनसैन्यसज्जकरणे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें 'दुर्योधनका अपनी सेनाको सुसज्जित करना' इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौतिरपनवाँ अध्याय पूरा