04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1321–1330

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1321–1330

पृष्ठ 1321

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सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन और अलायुधका घोर युद्ध संजय उवाच

तमागतमभिप्रेक्ष्य भीमकर्माणमाहवे ।

हर्षमाहारयांचक्रुः कुरवः सर्व एव ते ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! युद्धस्थलमें भयंकर कर्म करनेवाले अलायुधको आया हुआ देख सभी कौरव - योद्धा बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥

तथैव तव पुत्रास्ते दुर्योधनपुरोगमाः ।

अप्लवाः प्लवमासाद्य तर्तुकामा इवार्णवम् ॥ २ ॥

उसी प्रकार आपके दुर्योधन आदि पुत्रोंको भी बड़ा हर्ष हुआ, मानो समुद्रके पार जानेकी इच्छावाले नौकाहीन पुरुषोंको जहाज मिल गया हो ॥ २ ॥

पुनर्जातमिवात्मानं मन्वानाः पुरुषर्षभाः ।

अलायुधं राक्षसेन्द्रं स्वागतेनाभ्यपूजयन् ॥ ३ ॥

वे पुरुषप्रवर कौरव अपना नया जन्म हुआ मानने लगे । उन्होंने राक्षसराज अलायुधका स्वागतपूर्वक सत्कार किया ॥ ३ ॥

तस्मिंस्त्वमानुषे युद्धे वर्तमाने महाभये ।

कर्णराक्षसयोर्नक्तं दारुणप्रतिदर्शने ॥ ४ ॥

(न द्रौणिर्न कृपो द्रोणो न शल्यो न च माधवः । एक एव तु तेनासीद् योद्धा कर्णो रणे वृषा ॥ ) उस रात्रिकालमें जब कर्ण और घटोत्कचका अत्यन्त भयंकर और दारुण अमानुषिक युद्ध चल रहा था । उस समय न तो अश्वत्थामा, न कृपाचार्य, न द्रोणाचार्य, न शल्य और न कृतवर्मा ही घटोत्कचका सामना कर सके । अकेला दानवीर कर्ण ही रणभूमिमें उसके साथ जूझ रहा था ॥ ४ ॥

उपप्रैक्षन्त पञ्चालाः स्मयमानाः सराजकाः ।

तथैव तावका राजन् वीक्षमाणास्ततस्ततः ॥ ५ ॥

राजन्! पांचाल योद्धा अन्यान्य राजाओंके साथ विस्मित होकर वह युद्ध देखने लगे ।

उसी प्रकार आपके सैनिक भी इधर - उधरसे उसी युद्धका दृश्य देख रहे थे ॥ ५ ॥

चुक्रुशुर्नेदमस्तीति द्रोणद्रौणिकृपादयः ।

तत् कर्म दृष्ट्वा सम्भ्रान्ता हैडिम्बस्य रणाजिरे ॥ ६ ॥

समरांगणमें हिडिम्बाकुमार घटोत्कचका वह अलौकिक कर्म देखकर घबराये हुए द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कृपाचार्य आदि चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे कि ‘ अब हमारी

पृष्ठ 1322

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यह सेना नहीं बचेगी' ॥ ६ ॥

सर्वमाविग्नमभवद्धाहाभूतमचेतनम् ।

तव सैन्यं महाराज निराशं कर्णजीविते ॥ ७ ॥

महाराज! कर्णके जीवनसे निराश होकर आपकी सारी सेना उद्विग्न हो उठी थी । सर्वत्र

हाहाकार मचा था । सबके होश उड़ गये थे ॥ ७ ॥

दुर्योधनस्तु सम्प्रेक्ष्य कर्णमार्तिं परां गतम् ।

अलायुधं राक्षसेन्द्रं समाहूयेदमब्रवीत् ॥ ८ ॥

उस समय कर्णको बड़े भारी संकटमें पड़ा देख दुर्योधनने राक्षसराज अलायुधको बुलाकर इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥

एष वैकर्तनः कर्णो हैडिम्बेन समागतः ।

कुरुते कर्म सुमहद् यदस्यौपयिकं मृधे ॥ ९ ॥

‘ वीरवर! देखो, यह सूर्यपुत्र कर्ण हिडिम्बाकुमार घटोत्कचके साथ जूझ रहा है । युद्धस्थलमें जहाँतक इसके प्रयत्नसे होना सम्भव है, वहाँतक यह महान् पराक्रम प्रकट कर रहा है ॥ ९ ॥

पश्यैतान् पार्थिवान् शूरान् निहतान् भैमसेनिना ।

नानाशस्त्रैरभिहतान् पादपानिव दन्तिना ॥ १० ॥

‘ भीमसेनके पुत्रने नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा जिन शूरवीर नरेशोंको घायल करके मार डाला है, वे हाथीके गिराये हुए वृक्षोंके समान यहाँ पड़े हैं, इन्हें देखो ॥ १० ॥

तवैष भागः समरे राजमध्ये मया कृतः ।

तवैवानुमते वीर तं विक्रम्य निबर्हय ॥ ११ ॥

' वीर! तुम्हारी अनुमतिसे ही समरांगणमें सम्पूर्ण राजाओंके बीच इस घटोत्कचको मैंने तुम्हारा भाग नियत किया है, अतः तुम पराक्रम करके इसे मार डालो ॥ ११ ॥

पुरा वैकर्तनं कर्णमेष पापो घटोत्कचः ।

मायाबलं समाश्रित्य कर्षयत्यरिकर्शन ॥ १२ ॥

' शत्रुसूदन! कहीं ऐसा न हो कि यह पापी घटोत्कच मायाबलका आश्रय ले वैकर्तन कर्णको पहले ही नष्ट कर दे ' ॥ १२ ॥

एवमुक्तः स राज्ञा तु राक्षसो भीमविक्रमः ।

तथेत्युक्त्वा महाबाहुर्घटोत्कचमुपाद्रवत् ॥ १३ ॥

राजा दुर्योधनके ऐसा कहनेपर उस भयंकर पराक्रमी महाबाहु राक्षसने ' बहुत अच्छा ’ कहकर घटोत्कचपर धावा किया ॥ १३ ॥

ततः कर्णं समुत्सृज्य भैमसेनिरपि प्रभो ।

प्रत्यमित्रमुपायान्तमर्दयामास मार्गणैः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1323

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प्रभो! तब घटोत्कचने भी कर्णको छोड़कर अपने समीप आते हुए शत्रुको बाणोंद्वारा पीड़ित करना आरम्भ किया ॥ १४ ॥

तयोः समभवद् युद्धं क्रुद्धयो राक्षसेन्द्रयोः ।

मत्तयोर्वासिताहेतोर्द्विपयोरिव कानने ॥ १५ ॥

फिर तो क्रोधमें भरे हुए उन दोनों राक्षसराजोंमें वनके भीतर हथिनीके लिये लड़नेवाले दो मतवाले हाथियोंके समान घोर युद्ध होने लगा ॥ १५ ॥

रक्षसा विप्रमुक्तस्तु कर्णोऽपि रथिनां वरः ।

अभ्यद्रवद् भीमसेनं रथेनादित्यवर्चसा ॥ १६ ॥

राक्षससे छूटनेपर रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने भी सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा भीमसेनपर धावा किया ॥ १६ ॥

तमायान्तमनादृत्य दृष्ट्वा ग्रस्तं घटोत्कचम् ।

अलायुधेन समरे सिंहेनेव गवां पतिम् ॥ १७ ॥

रथेनादित्यवपुषा भीमः प्रहरतां वरः ।

किरन् शरौघान् प्रययावलायुधरथं प्रति ॥ १८ ॥

आते हुए कर्णकी उपेक्षा करके समरांगणमें सिंहके चंगुलमें फँसे हुए साँड़की भाँति घटोत्कचको अलायुधका ग्रास बनते देख योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीमसेन सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए अलायुधके रथकी ओर बड़े वेगसे बढ़े ॥ १७-१८ ॥

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य स तदालायुधः प्रभो ।

घटोत्कचं समुत्सृज्य भीमसेनं समाह्वयत् ॥ १ ९ ॥

प्रभो! उस समय उन्हें आते देख अलायुधने घटोत्कचको छोड़कर भीमसेनको ललकारा ॥ १ ९ ॥

तं भीमः सहसाभ्येत्य राक्षसान्तकरः प्रभो ।

सगणं राक्षसेन्द्रं तं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ २० ॥

राजन्! राक्षसोंका विनाश करनेवाले भीमने सहसा निकट जाकर सैनिकगणोंसहित राक्षसराज अलायुधको अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ २० ॥

तथैवालायुधो राजन् शिलाधौतैरजिह्मगैः ।

अभ्यवर्षत कौन्तेयं पुनः पुनररिंदम ॥ २१ ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! उसी प्रकार अलायुध भी कुन्तीकुमार भीमसेनपर शिलापर तेज किये हुए बाणोंकी बारंबार वर्षा करने लगा ॥ २१ ॥

तथा ते राक्षसाः सर्वे भीमसेनमुपाद्रवन् ।

नानाप्रहरणा भीमास्त्वत्सुतानां जयैषिणः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1324

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आपके पुत्रोंकी विजय चाहनेवाले वे समस्त भयंकर राक्षस हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्र लेकर भीमसेनपर टूट पड़े ॥ २२ ॥

स ताड्यमानो बहुभिर्भीमसेनो महाबलः ।

पञ्चभिः पञ्चभिः सर्वांस्तानविध्यच्छितैः शरैः ॥ २३ ॥

बहुत- से योद्धाओंकी मार खाकर महाबली भीमसेनने उन सबको पाँच-पाँच तीखे बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २३ ॥

ते वध्यमाना भीमेन राक्षसाः क्रूरबुद्धयः ।

विनेदुस्तुमुलान्नादान् दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥ २४ ॥

भीमसेनके बाणोंकी चोट खाकर वे क्रूरबुद्धि राक्षस भयंकर चीत्कार करने और दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ २४ ॥

तांस्त्रास्यमानान् भीमेन दृष्ट्वा रक्षो महाबलम् ।

अभिदुद्राव वेगेन शरैश्चैनमवाकिरत् ॥ २५ ॥

भीमके द्वारा उन राक्षसोंको भयभीत होते देख महाबली राक्षस अलायुधने बड़े वेगसे भीमसेनपर धावा किया और उन्हें बाणोंसे ढक दिया ॥ २५ ॥

तं भीमसेनः समरे तीक्ष्णाग्रैरक्षिणोच्छरैः ।

अलायुधस्तु तानस्तान् भीमेन विशिखान् रणे ॥ २६ ॥

चिच्छेद कांश्चित् समरे त्वरया कांश्चिदग्रहीत् । तब भीमसेनने समरांगणमें तीखी धारवाले बाणोंसे अलायुधको क्षत- विक्षत कर दिया । अलायुधने भीमसेनके चलाये हुए कुछ बाणोंको रणभूमिमें काट दिया और कुछ बड़ी शीघ्रताके साथ हाथसे पकड़ लिया ॥ २६३ ॥

स तं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रं भीमो भीमपराक्रमः ॥ २७ ॥

गदां चिक्षेप वेगेन वज्रपातोपमां तदा । भयंकर पराक्रमी भीमसेनने राक्षसराज अलायुधको ऐसा पराक्रम करते देख उस समय उसके ऊपर वज्रपातके समान अपनी भयंकर गदा बड़े वेगसे चलायी ॥ २७३ ॥

तामापतन्तीं वेगेन गदां ज्वालाकुलां ततः ॥ २८ ॥

गदया ताडयामास सा गदा भीममाव्रजत् । ज्वालासे व्याप्त हुई उस गदाको वेगसे आती देख अलायुधने उसपर अपनी गदासे आघात किया । फिर वह गदा भीमके पास ही लौट आयी ॥ २८३ ॥

स राक्षसेन्द्रं कौन्तेयः शरवर्षैरवाकिरत् ॥ २ ९ ॥ तानप्यस्याकरोन्मोघान् राक्षसो निशितैः शरैः । फिर कुन्तीकुमार भीमसेनने राक्षसराज अलायुधपर बाणोंकी झड़ी लगा दी; परंतु उस राक्षसने अपने तीखे बाणोंद्वारा उनके वे सभी बाण व्यर्थ कर दिये ॥ २ ९ ३ ॥ ते चापि राक्षसाः सर्वे रजन्यां भीमरूपिणः ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1325

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शासनाद् राक्षसेन्द्रस्य निजघ्नू रथकुञ्जरान् । उस रातमें भयंकर रूपधारी सम्पूर्ण राक्षसोंने भी राक्षसराज अलायुधकी आज्ञासे कितने ही रथों और हाथियोंको नष्ट कर दिया ॥ ३० ॥

पञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव वाजिनः परमद्विपाः ॥ ३१ ॥

न शान्तिं लेभिरे तत्र राक्षसैर्भृशपीडिताः । उन राक्षसोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर पांचाल और सृजयवंशी क्षत्रिय तथा उनके घोड़े और बड़े - बड़े हाथी भी शान्ति न पा सके ॥ ३१३ ॥

तं तु दृष्ट्वा महाघोरं वर्तमानं महाहवम् ॥ ३२ ॥

अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षो धनंजयमिदं वचः ।

पश्य भीमं महाबाहुं राक्षसेन्द्रवशं गतम् ॥ ३३ ॥

पदमस्यानुगच्छ त्वं मा विचारय पाण्डव । उस महाभयंकर वर्तमान महायुद्धको देखकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे इस प्रकार कहा — ‘ पाण्डुनन्दन! देखो, महाबाहु भीमसेन राक्षसराज अलायुधके वशमें पड़ गये हैं । तुम शीघ्र उन्हींके मार्गपर चलो । कोई दूसरा विचार मनमें न लाओ ॥ ३२-३३३ ॥ धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च युधामन्यूत्तमौजसौ ॥ ३४ ॥

सहितौ द्रौपदेयाश्च कर्णं यान्तु महारथाः । ' धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, साथ रहनेवाले युधामन्यु और उत्तमौजा तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र —ये सभी महारथी एक साथ होकर कर्णपर धावा करें ॥ ३४३ ॥

नकुलः सहदेवश्च युयुधानश्च वीर्यवान् ॥ ३५ ॥

इतरान् राक्षसान् घ्नन्तु शासनात् तव पाण्डव । ‘पाण्डुपुत्र! नकुल, सहदेव और पराक्रमी सात्यकि– ये तुम्हारे आदेशसे अन्य राक्षसोंका वध करें ॥ ३५३ ॥

त्वमपीमां महाबाहो चमूं द्रोणपुरस्कृताम् ॥ ३६ ॥

वारयस्व नरव्याघ्र महद्धि भयमागतम् । 'महाबाहु! तुम भी द्रोण जिसके अगुआ हैं, इस कौरव सेनाको आगे बढ़नेसे रोको; क्योंकि नरव्याघ्र! पाण्डव - सेनापर महान् भय आ पहुँचा है ' ॥ ३६३ ॥

एवमुक्ते तु कृष्णेन यथोद्दिष्टा महारथाः ॥ ३७ ॥

जग्मुर्वैकर्तनं कर्णं राक्षसांश्चैव तान् रणे । श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर वे सभी महारथी उनके आदेशके अनुसार रणभूमिमें वैकर्तन कर्ण तथा उन राक्षसोंका सामना करनेके लिये चले गये ॥ ३७३ ॥

अथ पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैराशीविषोपमैः ॥ ३८ ॥

धनुश्चिच्छेद भीमस्य राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।

पृष्ठ 1326

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तदनन्तर प्रतापी राक्षसराज अलायुधने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंद्वारा भीमसेनके धनुषको काट डाला ॥ ३८३ ॥

हयांश्चास्य शितैर्बाणैः सारथिं च महाबलः ॥ ३ ९ ॥ जघान मिषतः संख्ये भीमसेनस्य राक्षसः । साथ ही, उस महाबली निशाचरने युद्धमें भीमसेनके देखते - देखते पैने बाणोंद्वारा उनके सारथि और घोड़ोंको भी मार डाला ॥ ३ ९ ॥ सोऽवतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वो हतसारथिः ॥ ४० ॥

तस्मै गुर्वीं गदां घोरां विनदन्नुत्ससर्ज ह । घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर रथकी बैठकसे नीचे उतरकर गर्जते हुए भीमसेनने उस राक्षसपर अपनी भारी एवं भयंकर गदा दे मारी ॥ ४० ॥

ततस्तां भीमनिर्घोषामापतन्तीं महागदाम् ॥ ४१ ॥

गदया राक्षसो घोरो निजघान ननाद च ।

पृष्ठ 1327

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भयानक शब्द करनेवाली उस विशाल गदाको आती देख भयंकर राक्षस अलायुधने अपनी गदासे उसपर आघात किया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ४१३ ॥

तद् दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य घोरं कर्म भयावहम् ॥ ४२ ॥

भीमसेनः प्रहृष्टात्मा गदामाशु परामृशत् । राक्षसराज अलायुधके उस भयदायक घोर कर्मको देखकर भीमसेनका हृदय हर्ष और उत्साहसे भर गया और उन्होंने शीघ्र ही गदा हाथमें ले ली ॥ ४२ ॥

तयोः समभवद् युद्धं तुमुलं नररक्षसोः ॥ ४३ ॥

गदानिपातसंह्रादैर्भुवं कम्पयतोर्भृशम् । फिर गदाओंके टकरानेकी आवाजसे भूतलको अत्यन्त कम्पित करते हुए उन दोनों मनुष्य और राक्षसोंमें वहाँ भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ४३३ ॥

गदाविमुक्तौ तौ भूयः समासाद्येतरेतरम् ॥ ४४ ॥

मुष्टिभिर्वज्रसंह्रादैरन्योन्यमभिजघ्नतुः । गदासे छूटते ही वे दोनों फिर एक- दूसरेसे गुथ गये और वज्रपातकी - सी आवाज करनेवाले मुक्कोंसे एक- दूसरेको मारने लगे ॥ ४४ ॥

रथचक्रैर्युगैरक्षैरधिष्ठानैरुपस्करैः ॥ ४५ ॥

यथासन्नमुपादाय निजघ्नतुरमर्षणौ । तत्पश्चात् अमर्षमें भरकर वे दोनों रथके पहियों, जूओं, धुरों, बैठकों और अन्य उपकरणोंसे तथा जो भी वस्तु समीप मिल जाती, उसीको लेकर एक- दूसरेपर चोट करने लगे ॥ ४५३ ॥

तौ विक्षरन्तौ रुधिरं समासाद्येतरेतरम् ॥ ४६ ॥

मत्ताविव महानागौ चकृषाते पुनः पुनः । वे मदस्रावी मतवाले गजराजोंके समान अपने अंगोंसे रुधिरकी धारा बहाते हुए एक-दूसरेसे भिड़कर बारंबार खींचातानी करने लगे ॥ ४६३ ॥

तदपश्यद्हृषीकेशः पाण्डवानां हिते रतः ।

स भीमसेनरक्षार्थं हैडिम्बिं पर्यचोदयत् ॥ ४७ ॥

पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने जब वह युद्ध देखा, तब भीमसेनकी रक्षाके लिये हिडिम्बाकुमार घटोत्कचको भेजा ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धेऽलायुधयुद्धे सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें अलायुधयुद्धविषयक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १७७ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४८ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 1328

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अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः दोनों सेनाओंमें परस्पर घोर युद्ध और घटोत्कचके द्वारा अलायुधका वध एवं दुर्योधनका पश्चात्ताप संजय उवाच

संदृश्य समरे भीमं रक्षसा ग्रस्तमन्तिकात् ।

वासुदेवोऽब्रवीद् राजन् घटोत्कचमिदं वचः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! समरभूमिमें राक्षसके चंगुलमें फँसे हुए भीमसेनको निकटसे देखकर भगवान् श्रीकृष्णने घटोत्कचसे यह बात कही- ॥ १ ॥

पश्य भीमं महाबाहो रक्षसा ग्रस्तमाहवे ।

पश्यतां सर्वसैन्यानां तव चैव महाद्युते ॥ २ ॥

' महातेजस्वी महाबाहु वीर! देखो, युद्धस्थलमें उस राक्षसने सम्पूर्ण सेनाके और तुम्हारे देखते -देखते भीमसेनको वशमें कर लिया है ॥ २ ॥

स कर्णं त्वं समुत्सृज्य राक्षसेन्द्रमलायुधम् ।

जहि क्षिप्रं महाबाहो पश्चात् कर्णं वधिष्यसि ॥ ३ ॥

‘ महाबाहो! अतः तुम कर्णको छोड़कर पहले राक्षसराज अलायुधको शीघ्रतापूर्वक मार डालो । पीछे कर्णका वध करना' ॥ ३ ॥

स वार्ष्णेयवचः श्रुत्वा कर्णमुत्सृज्य वीर्यवान् ।

युयुधे राक्षसेन्द्रेण वकभ्रात्रा घटोत्कचः ॥ ४ ॥

भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर पराक्रमी वीर घटोत्कचने कर्णको छोड़कर वकके भाई राक्षसराज अलायुधके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ४ ॥

तयोः सुतुमुलं युद्धं बभूव निशि रक्षसोः ।

अलायुधस्य चैवोग्रं हैडिम्बेश्चापि भारत ॥ ५ ॥

भरतनन्दन! उस रात्रिके समय अलायुध और हिडिम्बाकुमार घटोत्कच दोनों राक्षसोंमें अत्यन्त भयंकर एवं घमासान युद्ध होने लगा ॥ ५ ॥

अलायुधस्य योधांश्च राक्षसान् भीमदर्शनान् ।

वेगेनापततः शूरान् प्रगृहीतशरासनान् ॥ ६ ॥

आत्तायुधः सुसंक्रुद्धो युयुधानो महारथः ।

नकुलः सहदेवश्च चिच्छिदुर्निशितैः शरैः ॥ ७ ॥

अलायुधके सैनिक राक्षस देखनेमें बड़े भयंकर और शूरवीर थे। वे हाथमें धनुष लेकर बड़े वेगसे आक्रमण करते थे । परंतु अस्त्र- शस्त्रोंसे सुसज्जित हो अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए

पृष्ठ 1330

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महारथी युयुधान, नकुल और सहदेवने उन सबको अपने पैने बाणोंसे काट डाला ॥ ६-७ ॥

सर्वांश्च समरे राजन् किरीटी क्षत्रियर्षभान् ।

परिचिक्षेप बीभत्सुः सर्वतः प्रकिरन् शरान् ॥ ८ ॥

राजन्! किरीटधारी अर्जुनने समरांगणमें सब ओर बाणोंकी वर्षा करके कौरवपक्षके समस्त क्षत्रिय- शिरोमणियोंको मार भगाया ॥ ८ ॥

कर्णश्च समरे राजन् व्यद्रावयत पार्थिवान् ।

धृष्टद्युम्नशिखण्ड्यादीन् पञ्चालानां महारथान् ॥ ९ ॥

नरेश्वर! कर्णने भी रणभूमिमें धृष्टद्युम्न और शिखण्डी आदि पांचाल महारथी नरेशोंको दूर भगा दिया ॥ ९ ॥

तान् वध्यमानान् दृष्ट्वाथ भीमो भीमपराक्रमः ।

अभ्ययात् त्वरितः कर्णं विशिखान् प्रकिरन् रणे ॥ १० ॥

उन सबको बाणोंकी मारसे पीड़ित होते देख भयंकर पराक्रमी भीमसेनने युद्धस्थलमें अपने बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ तुरंत ही कर्णपर आक्रमण किया ॥

ततस्तेऽप्याययुर्हत्वा राक्षसान् यत्र सूतजः ।

नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः ॥ ११ ॥

तत्पश्चात् वे नकुल, सहदेव और महारथी सात्यकि भी राक्षसोंको मारकर वहीं आ पहुँचे, जहाँ सूतपुत्र कर्ण था ॥ ११ ॥

ते कर्णं योधयामासुः पञ्चाला द्रोणमेव तु ।

अलायुधस्तु संक्रुद्धो घटोत्कचमरिंदमम् ।

परिघेणातिकायेन ताडयामास मूर्धनि ॥ १२ ॥

वे तीनों योद्धा कर्णके साथ युद्ध करने लगे और पांचालदेशीय वीरोंने द्रोणाचार्यका सामना किया । उधर क्रोधमें भरे हुए अलायुधने एक विशाल परिघके द्वारा शत्रुदमन घटोत्कचके मस्तकपर आघात किया ॥ १२ ॥

स तु तेन प्रहारेण भैमसेनिर्महाबलः ।

ईषन्मूर्च्छितमात्मानमस्तम्भयत वीर्यवान् ॥ १३ ॥

उस प्रहारसे भीमसेनपुत्र घटोत्कचको कुछ मूर्छा आ गयी । परंतु उस महाबली और पराक्रमी वीरने पुनः अपने - आपको सँभाल लिया ॥ १३ ॥

ततो दीप्ताग्निसंकाशां शतघण्टामलंकृताम् ।

चिक्षेप तस्मै समरे गदां काञ्चनभूषिताम् ॥ १४ ॥

तदनन्तर घटोत्कचने समरांगणमें प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्विनी, एक सौ घंटियोंसे अलंकृत और सुवर्णभूषित अपनी गदा उसके ऊपर चलायी ॥ १४ ॥

सा हयांश्च रथं चास्य सारथिं च महास्वना ।