04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1331–1340

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1331–1340

पृष्ठ 1331

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चूर्णयामास वेगेन विसृष्टा भीमकर्मणा ॥ १५ ॥

भयंकर कर्म करनेवाले उस राक्षसद्वारा वेगपूर्वक फेंकी गयी उस भारी आवाज करनेवाली गदाने अलायुधके रथ, सारथि और घोड़ोंको चूर- चूर कर दिया ॥ १५ ॥

स भग्नहयचक्राक्षाद् विशीर्णध्वजकूबरात् ।

उत्पपात रथात् तूर्णं मायामास्थाय राक्षसीम् ॥ १६ ॥

जिसके घोड़े, पहिये और धुरे नष्ट हो गये थे, ध्वज और कूबर बिखर गये थे, उस रथसे अलायुध राक्षसी मायाका आश्रय लेकर तुरंत ही ऊपरको उड़ गया ॥ १६ ॥

स समास्थाय मायां तु ववर्ष रुधिरं बहु ।

विद्युद्विभ्राजितं चासीत् तुमुलाभ्राकुलं नभः ॥ १७ ॥

उसने मायाका आश्रय लेकर बहुत रक्तकी वर्षा की । उस समय आकाशमें भयंकर मेघोंकी घटा घिर आयी थी और बिजली चमक रही थी ॥ १७ ॥

ततो वज्रनिपाताश्च साशनिस्तनयित्नवः ।

महांश्चटचटाशब्दस्तत्रासीच्च महाहवे ॥ १८ ॥

तत्पश्चात् उस महासमरमें वज्रपात, मेघगर्जनाके साथ विद्युत्की गड़गड़ाहट तथा महान् चट- चट शब्द होने लगे ॥ १८ ॥

तां प्रेक्ष्य महतीं मायां राक्षसो राक्षसस्य च ।

ऊर्ध्वमुत्पत्य हैडिम्बिस्तां मायां माययावधीत् ॥ १ ९ ॥

राक्षसकी उस विशाल मायाको देखकर राक्षसजातीय हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने ऊपर उड़कर अपनी मायासे उस मायाको नष्ट कर दिया ॥ १ ९ ॥

सोऽभिवीक्ष्य हतां मायां मायावी माययैव हि ।

अश्मवर्षं सुतुमुलं विससर्ज घटोत्कचे ॥ २० ॥

अपनी मायाको मायासे ही नष्ट हुई देखकर मायावी अलायुध घटोत्कचपर पत्थरोंकी भयंकर वर्षा करने लगा ॥ २० ॥

अश्मवर्षं स तं घोरं शरवर्षेण वीर्यवान् ।

दिक्षु विध्वंसयामास तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २१ ॥

किंतु पराक्रमी घटोत्कचने बाणोंकी वृष्टि करके उस भयंकर प्रस्तरवर्षाका उन-उन

दिशाओंमें ही विध्वंस कर दिया । वह अद्भुत- सा कार्य हुआ ॥ २१ ॥

ततो नानाप्रहरणैरन्योन्यमभिवर्षताम् ।

आयसैः परिघैः शूलैर्गदामुसलमुद्गरैः ॥ २२ ॥

पिनाकैः करवालैश्च तोमरप्रासकम्पनैः ।

नाराचैर्निशितैर्भल्लैः शरैश्चक्रैः परश्वधैः ।

अयोगुडैर्भिन्दिपालैर्गोशीर्षोलूखलैरपि ॥ २३ ॥

उत्पाटितैर्महाशाखैर्विविधैर्जगतीरुहैः ।

पृष्ठ 1332

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शमीपीलुकदम्बैश्च चम्पकैश्चैव भारत ॥ २४ ॥

इङ्गुदैर्बदरीभिश्च कोविदारैश्च पुष्पितैः ।

पलाशैश्चारिमेदैश्च प्लक्षन्यग्रोधपिप्पलैः ॥ २५ ॥

महद्भिः समरे तस्मिन्नन्योन्यमभिजघ्नतुः ।

विपुलैः पर्वताग्रैश्च नानाधातुभिराचितैः ॥ २६ ॥

भारत! तत्पश्चात् वे एक- दूसरेपर नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे । लोहेके परिघ, शूल, गदा, मुसल, मुद्गर, पिनाक, खड्ग, तोमर, प्रास, कम्पन, तीखे नाराच, भल्ल, बाण, चक्र, फरसे, लोहेकी गोली, भिन्दिपाल, गोशीर्ष, उलूखल, बड़ी - बड़ी शाखाओंवाले उखाड़े हुए नाना प्रकारके वृक्ष - शमी, पीलु, कदम्ब, चम्पा, इंगुद, बेर, विकसित कोविदार, पलाश, अरिमेद, बड़े - बड़े पाकड़, बरगद और पीपल – इन सबके द्वारा उस महासमरमें वे एक- दूसरेपर चोट करने लगे । नाना प्रकारकी धातुओंसे व्याप्त विशाल पर्वतशिखरोंद्वारा भी वे परस्पर आघात करते थे ॥ २२–२६ ॥

तेषां शब्दो महानासीद् वज्राणां भिद्यतामिव ।

युद्धं समभवद् घोरं भैम्यलायुधयोर्नृप ॥ २७ ॥

हरीन्द्रयोर्यथा राजन् वालिसुग्रीवयोः पुरा । उन पर्वत- शिखरोंके टकरानेसे ऐसा महान् शब्द होता था, मानो वज्र फट पड़े हों । नरेश्वर! घटोत्कच और अलायुधका वह भयंकर युद्ध वैसा ही हो रहा था, जैसे पहले त्रेतायुगमें वानरराज बाली और सुग्रीवका युद्ध सुना गया है ॥ २७ ॥

तौ युद्ध्वा विविधैर्घोरैरायुधैर्विशिखैस्तथा ।

प्रगृह्य च शितौ खड्गावन्योन्यमभिपेततुः ॥ २८ ॥

नाना प्रकारके भयंकर आयुधों और बाणोंसे युद्ध करके वे दोनों राक्षस तीखी तलवारें लेकर एक- दूसरेपर टूट पड़े ॥ २८ ॥

तावन्योन्यमभिद्रुत्य केशेषु सुमहाबलौ ।

भुजाभ्यां पर्यगृह्णीतां महाकायौ महाबलौ ॥ २ ९ ॥

उन दोनों महाबली और विशालकाय राक्षसोंने परस्पर आक्रमण करके दोनों हाथोंसे दोनोंके केश पकड़ लिये ॥

तौ स्विन्नगात्रौ प्रस्वेदं सुस्रुवाते जनाधिप ।

रुधिरं च महाकायावतिवृष्टाविवाम्बुदौ ॥ ३० ॥

नरेश्वर! अत्यन्त वर्षा करनेवाले दो मेघोंके समान उन विशालकाय राक्षसोंके शरीर पसीनेसे तर हो रहे थे । वे अपने अंगोंसे पसीनोंके साथ- साथ खून भी बहा रहे थे ॥

अथाभिपत्य वेगेन समुद्भ्राम्य च राक्षसम् ।

बलेनाक्षिप्य हैडिम्बिश्चकर्तास्य शिरो महत् ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1333

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तदनन्तर बड़े वेगसे झपटकर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने उस राक्षसको पकड़ लिया और उसे घुमाकर बलपूर्वक पटक दिया । फिर उसके विशाल मस्तकको उसने काट डाला ॥ ३१ ॥

सोऽपहृत्य शिरस्तस्य कुण्डलाभ्यां विभूषितम् ।

तदा सुतुमुलं नादं ननाद सुमहाबलः ॥ ३२ ॥

इस प्रकार महाबली घटोत्कचने उसके कुण्डलमण्डित मस्तकको काटकर उस समय बड़ी भयानक गर्जना की ॥ ३२ ॥

हतं दृष्ट्वा महाकायं वकज्ञातिमरिंदमम् ।

पञ्चालाः पाण्डवाश्चैव सिंहनादान् विनेदिरे ॥ ३३ ॥

बकासुरके विशालकाय भ्राता शत्रुदमन अलायुधको मारा गया देख पांचाल और पाण्डव सिंहनाद करने लगे ॥

ततो भेरीसहस्राणि शङ्खानामयुतानि च ।

अवादयन् पाण्डवेया राक्षसे निहते युधि ॥ ३४ ॥

युद्धस्थलमें उस राक्षसके मारे जानेपर पाण्डवदलके सैनिकोंने सहस्रों नगाड़े और हजारों शंख बजाये ॥ ३४ ॥

अतीव सा निशा तेषां बभूव विजयावहा ।

विद्योतमाना विबभौ समन्ताद् दीपमालिनी ॥ ३५ ॥

चारों ओरसे दीपावलियोंद्वारा प्रकाशित होनेवाली वह रात्रि उनके लिये विजयदायिनी होकर अत्यन्त शोभा पाने लगी ॥ ३५ ॥

अलायुधस्य तु शिरो भैमसेनिर्महाबलः ।

दुर्योधनस्य प्रमुखे चिक्षेप गतचेतसः ॥ ३६ ॥

उस समय दुर्योधन अचेत- सा हो रहा था । महाबली घटोत्कचने अलायुधका वह मस्तक दुर्योधनके सामने फेंक दिया ॥ ३६ ॥

अथ दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा हतमलायुधम् ।

बभूव परमोद्विग्नः सह सैन्येन भारत ॥ ३७ ॥

भारत! अलायुधको मारा गया देख सेनासहित राजा दुर्योधन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा ॥ ३७ ॥

तेन ह्यस्य प्रतिज्ञातं भीमसेनमहं युधि ।

हन्तेति स्वयमागम्य स्मरता वैरमुत्तमम् ॥ ३८ ॥

अलायुधने अपने भारी वैरीको याद करते हुए स्वयं आकर दुर्योधनके सामने यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं युद्धमें भीमसेनको मार डालूँगा ॥ ३८ ॥

ध्रुवं स तेन हन्तव्य इत्यमन्यत पार्थिवः ।

जीवितं चिरकालं हि भ्रातॄणां चाप्यमन्यत ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 1334

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इससे राजा दुर्योधन यह मान बैठा था कि अलायुध निश्चय ही भीमसेनको मार डालेगा और यही सोचकर उसने यह भी समझ लिया था कि अभी मेरे भाइयोंका जीवन चिरस्थायी है ॥ ३ ९ ॥

स तं दृष्ट्वा विनिहतं भीमसेनात्मजेन वै ।

प्रतिज्ञां भीमसेनस्य पूर्णामेवाभ्यमन्यत ॥ ४० ॥

परंतु भीमसेनपुत्र घटोत्कचके द्वारा अलायुधको मारा गया देख उसने यह निश्चित रूपसे मान लिया कि अब भीमसेनकी प्रतिज्ञा पूरी होकर ही रहेगी ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धेऽलायुधवधेऽष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय अलायुधका वधविषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥

पृष्ठ 1335

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एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः घटोत्कचका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा चलायी हुई इन्द्रप्रदत्त शक्तिसे उसका वध संजय उवाच

निहत्यालायुधं रक्षः प्रहृष्टात्मा घटोत्कचः ।

ननाद विविधान् नादान् वाहिन्याः प्रमुखे तव ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! राक्षस अलायुधका वध करके घटोत्कच मन-ही- मन बड़ा प्रसन्न हुआ और वह आपकी सेनाके सामने खड़ा हो नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगा ॥ १ ॥

तस्य तं तुमुलं शब्दं श्रुत्वा कुञ्जरकम्पनम् ।

तावकानां महाराज भयमासीत् सुदारुणम् ॥ २ ॥

महाराज! उसकी वह भयंकर गर्जना हाथियोंको भी कँपा देनेवाली थी । उसे सुनकर आपके योद्धाओंके मनमें अत्यन्त दारुण भय समा गया ॥ २ ॥

अलायुधविषक्तं तु भैमसेनिं महाबलम् ।

दृष्ट्वा कर्णो महाबाहुः पञ्चालान् समुपाद्रवत् ॥ ३ ॥

जिस समय महाबली घटोत्कच अलायुधके साथ उलझा हुआ था, उस समय उसे उस अवस्थामें देखकर महाबाहु कर्णने पांचालोंपर धावा किया ॥ ३ ॥

दशभिर्दशभिर्बाणैर्धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।

दृढैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्बिभेद नतपर्वभिः ॥ ४ ॥

उसने पूर्णतः खींचकर छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले दस- दस सुदृढ़ बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्न और शिखण्डीको घायल कर दिया ॥ ४ ॥

ततः परमनाराचैर्युधामन्यूत्तमौजसौ ।

सात्यकिं च रथोदारं कम्पयामास मार्गणैः ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् उसने अच्छे- अच्छे नाराचोंद्वारा युधामन्यु और उत्तमौजाको तथा अनेक बाणोंसे उदार महारथी सात्यकिको भी कम्पित कर दिया ॥ ५ ॥

तेषामप्यस्यतां संख्ये सर्वेषां सव्यदक्षिणम् ।

मण्डलान्येव चापानि व्यदृश्यन्त जनाधिप ॥ ६ ॥

नरेश्वर! वे सात्यकि आदि भी बायें- दायें बाण चला रहे थे । उस समय उन सबके धनुष भी मण्डलाकार ही दिखायी देते थे ॥ ६ ॥

तेषां ज्यातलनिर्घोषो रथनेमिस्वनश्च ह ।

पृष्ठ 1336

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मेघानामिव घर्मान्ते बभूव तुमुलो निशि ॥ ७ ॥

उस रात्रिके समय उनकी प्रत्यंचाकी टंकार तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटका शब्द वर्षाकालके मेघोंकी गर्जनाके समान भयंकर जान पड़ता था ॥ ७ ॥

ज्यानेमिघोषस्तनयित्नुमान् वै धनुस्तडिन्मण्डलकेतुशृङ्गः । शरौघवर्षाकुलवृष्टिमांश्च संग्राममेघः स बभूव राजन् ॥ ८ ॥

राजन्! वह संग्राम वर्षाकालीन मेघके समान प्रतीत होता था । प्रत्यंचाकी टंकार और पहियोंकी घर्घराहटका शब्द ही उस मेघकी गर्जनाके समान था । धनुष ही विद्युन्मण्डलके समान प्रकाशित होता था और ध्वजाका अग्रभाग ही उस मेघका उच्चतम शिखर था तथा बाण- समूहोंकी वृष्टि ही उसके द्वारा की जानेवाली वर्षा थी ॥ ८ ॥

तदद्भुतं शैल इवाप्रकम्पो वर्षं महाशैलसमानसारः । विध्वंसयामास रणे नरेन्द्र वैकर्तनः शत्रुगणावमर्दी ॥ ९ ॥

नरेन्द्र! महान् पर्वतके समान शक्तिशाली एवं अविचल रहनेवाले शत्रुदलसंहारक सूर्यपुत्र कर्णने रणभूमिमें उस अद्भुत बाणवर्षाको नष्ट कर दिया ॥ ९ ॥

ततोऽतुलैर्वज्रनिपातकल्पैः शितैः शरैः काञ्चनचित्रपुङ्खैः । शत्रून् व्यपोहत् समरे महात्मा वैकर्तनः पुत्रहिते रतस्ते ॥ १० ॥

तत्पश्चात् आपके पुत्रके हितमें तत्पर रहनेवाले महामनस्वी वैकर्तन कर्णने समरांगणमें सोनेके विचित्र पंखोंसे युक्त एवं वज्रपातके तुल्य भयंकर, तुलनारहित तीखे बाणोंद्वारा शत्रुओंका संहार आरम्भ किया ॥ १० ॥

संछिन्नभिन्नध्वजिनश्च केचित् केचिच्छरैरर्दितभिन्नदेहाः । केचिद् विसूता विहयाश्च केचिद् वैकर्तनेनाशु कृता बभूवुः ॥ ११ ॥

वैकर्तन कर्णने वहाँ शीघ्र ही किन्हींकी ध्वजाके टुकड़े -टुकड़े कर दिये, किन्हींके शरीरोंको बाणोंसे पीड़ित करके विदीर्ण कर डाला, किन्हींके सारथि नष्ट कर दिये और किन्हींके घोड़े मार डाले ॥ ११ ॥

अविन्दमानास्त्वथ शर्म संख्ये यौधिष्ठिरं ते बलमभ्यपद्यन् ।

पृष्ठ 1337

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तान् प्रेक्ष्य भग्नान् विमुखीकृतांश्च घटोत्कचो रोषमतीव चक्रे ॥ १२ ॥

योद्धालोग युद्धमें किसी तरह चैन न पाकर युधिष्ठिरकी सेनामें घुसने लगे । उन्हें तितर-बितर और युद्धसे विमुख हुआ देख घटोत्कचको बड़ा रोष हुआ ॥ आस्थाय तं काञ्चनरत्नचित्रं रथोत्तमं सिंहवत् संननाद । वैकर्तनं कर्णमुपेत्य चापि विव्याध वज्रप्रतिमैः पृषत्कैः ॥ १३ ॥

वह सुवर्ण एवं रत्नोंसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभायुक्त उत्तम रथपर आरूढ़ हो सिंहके समान गर्जना करने लगा और वैकर्तन कर्णके पास जाकर उसे वज्रतुल्य बाणोंद्वारा बींधने लगा ॥ १३ ॥

तौ कर्णिनाराचशिलीमुखैश्च नालीकदण्डासनवत्सदन्तैः । वराहकर्णैः सविपाठशृङ्गैः क्षुरप्रवर्षैश्च विनेदतुः खम् ॥ १४ ॥

वे दोनों कर्णी, नाराच, शिलीमुख, नालीक, दण्ड, असन, वत्सदन्त, वाराहकर्ण, विपाठ, सींग तथा क्षुरप्रोंकी वर्षा करते हुए अपनी गर्जनासे आकाशको गुँजाने लगे ॥ १४ ॥

तद् बाणधारावृतमन्तरिक्षं

तिर्यग्गताभिः समरे रराज ।

सुवर्णपुङ्खज्वलितप्रभाभि- र्विचित्रपुष्पाभिरिव स्रजाभिः ॥ १५ ॥

समरांगणमें बाणधाराओंसे भरा हुआ आकाश उन बाणोंके सुवर्णमय पंखोंकी तिरछी दिशामें फैलनेवाली देदीप्यमान प्रभाओंसे ऐसी शोभा पा रहा था, मानो वह विचित्र पुष्पोंवाली मनोहर मालाओंसे अलंकृत हो ॥ १५ ॥

समाहितावप्रतिमप्रभावा- वन्योन्यमाजघ्नतुरुत्तमास्त्रैः । तयोर्हि वीरोत्तमयोर्न कश्चिद् ददर्श तस्मिन् समरे विशेषम् ॥ १६ ॥

दोनोंके ही चित्त एकाग्र थे; दोनों ही अनुपम प्रभावशाली थे और उत्तम अस्त्रोंद्वारा एक- दूसरेको चोट पहुँचा रहे थे । उन दोनों वीरशिरोमणियोंमेंसे कोई भी युद्धमें अपनी विशेषता न दिखा सका ॥ १६ ॥

अतीव तच्चित्रमतुल्यरूपं

पृष्ठ 1338

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बभूव युद्धं रविभीमसून्वोः । समाकुलं शस्त्रनिपातघोरं दिवीव राह्वंशुमतोः प्रमत्तम् ॥ १७ ॥

सूर्यपुत्र कर्ण और भीमकुमार घटोत्कचका वह अत्यन्त विचित्र एवं घमासान युद्ध आकाशमें राहु और सूर्यके उन्मत्त संग्राम-सा प्रतीत होता था । उसकी कहीं तुलना नहीं थी । शस्त्रोंके प्रहारसे वह बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ १७ ॥

संजय उवाच

घटोत्कचं यदा कर्णो न विशेषयते नृप ।

ततः प्रादुश्चकारोग्रमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ १८ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! जब अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कर्ण घटोत्कचसे अपनी विशेषता न दिखा सका, तब उसने एक भयंकर अस्त्र प्रकट किया ॥ १८ ॥

तेनास्त्रेणावधीत् तस्य रथं सहयसारथिम् ।

विरथश्चापि हैडिम्बिः क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १ ९ ॥

उस अस्त्रके द्वारा उसने घटोत्कचके रथको घोड़े और सारथिसहित नष्ट कर दिया ।

रथहीन होनेपर घटोत्कच शीघ्र ही वहाँसे अदृश्य हो गया ॥ १ ९ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

तस्मिन्नन्तर्हिते तूर्णं कूटयोधिनि राक्षसे ।

मामकैः प्रतिपन्नं यत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २० ॥

धृतराष्ट्रने पूछा- संजय! बताओ, माया- युद्ध करनेवाले उस राक्षसके तत्काल अदृश्य हो जानेपर मेरे पुत्रोंने क्या सोचा और क्या किया? ॥ २० ॥

संजय उवाच अन्तर्हितं राक्षसेन्द्रं विदित्वा सम्प्राक्रोशन् कुरवः सर्व एव । कथं नायं राक्षसः कूटयोधी हन्यात् कर्णं समरेऽदृश्यमानः ॥ २१ ॥

संजयने कहा – महाराज! राक्षसराज घटोत्कचको अदृश्य हुआ जानकर समस्त कौरवयोद्धा चिल्ला -चिल्लाकर कहने लगे ' मायाद्वारा युद्ध करनेवाला यह निशाचर जब रणभूमिमें स्वयं दिखायी ही नहीं देता है, तब कर्णको कैसे नहीं मार डालेगा? ' ॥ २१ ॥

ततः कर्णो लघुचित्रास्त्रयोधी सर्वा दिशः प्रावृणोद् बाणजालैः । न वै किञ्चित् प्रापतत् तत्र भूतं

पृष्ठ 1339

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तमोभूते सायकैरन्तरिक्षे ॥ २२ ॥

तब शीघ्रतापूर्वक विचित्र रीतिसे अस्त्रयुद्ध करनेवाले कर्णने अपने बाणोंके समूहसे सम्पूर्ण दिशाओंको ढक दिया । उस समय बाणोंसे आकाशमें अँधेरा छा गया था तो भी वहाँ कोई प्राणी ऊपरसे मरकर गिरा नहीं ॥ २२ ॥

नैवाददानो न च संदधानो न चेषुधीः स्पृश्यमानः कराग्रैः । अदृश्यद् वै लाघवात् सूतपुत्रः सर्वं बाणैश्छादयानोऽन्तरिक्षम् ॥ २३ ॥

सूतपुत्र कर्ण जब शीघ्रतापूर्वक बाणोंद्वारा समूचे आकाशको आच्छादित कर रहा था, उस समय यह नहीं दिखायी देता था कि वह कब अपने हाथकी अंगुलियोंसे तरकसको छूता है, कब बाण निकालता है और कब उसे धनुषपर रखता है ॥ २३ ॥

ततो मायां दारुणामन्तरिक्षे घोरां भीमां विहितां राक्षसेन । अपश्याम लोहिताभ्रप्रकाशां देदीप्यन्तीमग्निशिखामिवोग्राम् ॥ २४ ॥

तदनन्तर हमने अन्तरिक्षमें उस राक्षसद्वारा रची गयी घोर, दारुण एवं भयंकर माया देखी । पहले तो वह लाल रंगके बादलोंके रूपमें प्रकाशित हुई, फिर आगकी भयंकर लपटोंके समान प्रज्वलित हो उठी ॥ २४ ॥

ततस्तस्यां विद्युतः प्रादुरास- न्नुल्काश्चापि ज्वलिताः कौरवेन्द्र । घोषश्चास्याः प्रादुरासीत् सुघोरः सहस्रशो नदतां दुन्दुभीनाम् ॥ २५ ॥

कौरवराज! तत्पश्चात् उससे बिजलियाँ प्रकट हुईं और जलती हुई उल्काएँ गिरने लगीं ।

साथ ही हजारों दुन्दुभियोंके बजनेके समान बड़ी भयानक आवाज होने लगी ॥ २५ ॥

ततः शराः प्रापतन् रुक्मपुङ्खाः शक्त्यृष्टिप्रासमुसलान्यायुधानि । परश्वधास्तैलधौताश्च खड्गाः प्रदीप्ताग्रास्तोमराः पट्टिशाश्च ॥ २६ ॥

मयूखिनः परिघा लोहबद्धा गदाश्चित्राः शितधाराश्च शूलाः । गुयों गदा हेमपट्टावनद्धाः शतघ्न्यश्च प्रादुरासन् समन्तात् ॥ २७ ॥

पृष्ठ 1340

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फिर उससे सोनेके पंखवाले बाण गिरने लगे । शक्ति, ऋष्टि, प्रास, मुसल आदि आयुध, फरसे, तेलमें साफ किये गये खड्ग, चमचमाती हुई धारवाले तोमर, पट्टिश, तेजस्वी परिघ, लोहेसे बँधी हुई विचित्र गदा, तीखी धारवाले शूल, सोनेके पत्रसे मढ़ी गयी भारी गदाएँ और शतघ्नियाँ चारों ओर प्रकट होने लगीं ॥ २६-२७ ॥ महाशिलाश्चापतंस्तत्र तत्र सहस्रशः साशनयश्च वज्राः । चक्राणि चानेकशतक्षुराणि प्रादुर्बभूवुर्ज्वलनप्रभाणि ॥ २८ ॥

जहाँ- तहाँ हजारों बड़ी- बड़ी शिलाएँ गिरने लगीं, बिजलियोंसहित वज्र पड़ने लगे और अग्निके समान दीप्तिमान् कितने ही चक्रों तथा सैकड़ों छुरोंका प्रादुर्भाव होने लगा ॥ २८ ॥

तां शक्तिपाषाणपरश्वधानां प्रासासिवज्राशनिमुद्गराणाम् । वृष्टिं विशालां ज्वलितां पतन्तीं कर्णः शरौघैर्न शशाक हन्तुम् ॥ २ ९ ॥ शक्ति, प्रस्तर, फरसे, प्रास, खड्ग, वज्र, बिजली और मुद्गरोंकी गिरती हुई उस ज्वालापूर्ण विशाल वर्षाको कर्ण अपने बाणसमूहोंद्वारा नष्ट न कर सका ॥ शराहतानां पततां हयानां वज्राहतानां च तथा गजानाम् । शिलाहतानां च महारथानां महान् निनादः पततां बभूव ॥ ३० ॥

बाणोंसे घायल होकर गिरते हुए घोड़ों, वज्रसे आहत होकर धराशायी होते हुए हाथियों तथा शिलाओंकी मार खाकर गिरते हुए महारथियोंका महान् आर्तनाद वहाँ सुनायी देता था ॥ ३० ॥

सुभीमनानाविधशस्त्रपातै- र्घटोत्कचेनाभिहतं समन्तात् ।

दौर्योधनं वै बलमार्तरूप- मावर्तमानं ददृशे भ्रमत् तत् ॥ ३१ ॥

घटोत्कचके द्वारा चलाये हुए अत्यन्त भयंकर एवं नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंके प्रहारसे हताहत हुई दुर्योधनकी सेना आर्त होकर चारों ओर घूमती और चक्कर काटती दिखायी देने लगी ॥ ३१ ॥

हाहाकृतं सम्परिवर्तमानं संलीयमानं च विषण्णरूपम् ।