04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1351–1360
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1351–1360
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‘ घटोत्कचको मारा गया देख हमारी सेनाएँ यहाँ युद्धसे विमुख होकर भागी जा रही हैं ।
हिडिम्बाकुमारके धराशायी होनेसे हमलोग भी अत्यन्त उद्विग्न हो उठे हैं ॥ ७ ॥
नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति जनार्दन ।
तदद्य शंस मे पृष्टः सत्यं सत्यवतां वर ॥ ८ ॥
‘ परंतु जनार्दन! आपको जो इतनी खुशी हो रही है उसका कोई छोटा - मोटा कारण न होगा । वही मैं आपसे पूछता हूँ । सत्यवक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप इसका मुझे यथार्थ कारण बताइये ॥ ८ ॥
यद्येतन्न रहस्यं ते वक्तुमर्हस्यरिंदम ।
धैर्यस्य वैकृतं ब्रूहि त्वमद्य मधुसूदन ॥ ९ ॥
‘ शत्रुदमन! यदि कोई गोपनीय बात न हो तो मुझे अवश्य बतावें। मधुसूदन! आपके इस हर्ष-प्रदर्शनसे आज हमारा धैर्य छूटा जा रहा है, अतः आप इसका कारण अवश्य बतावें ॥ ९ ॥
समुद्रस्येव संशोषं मेरोरिव विसर्पणम् ।
तथैतदद्य मन्येऽहं तव कर्म जनार्दन ॥ १० ॥
'जनार्दन! जैसे समुद्रका सूखना और मेरु पर्वतका विचलित होना आश्चर्यकी बात है, उसी प्रकार आज मैं आपके इस हर्षप्रकाशनरूपी कर्मको आश्चर्यजनक मानता हूँ' ॥ १० ॥
श्रीवासुदेव उवाच
अतिहर्षमिमं प्राप्तं शृणु मे त्वं धनंजय ।
अतीव मनसः सद्यः प्रसादकरमुत्तमम् ॥ ११ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा - धनंजय! आज वास्तवमें मुझे यह अत्यन्त हर्षका अवसर प्राप्त हुआ है, इसका क्या कारण है, यह तुम मुझसे सुनो । मेरे मनको तत्काल अत्यन्त प्रसन्नता प्रदान करनेवाला वह उत्तम कारण इस प्रकार है ॥ ११ ॥
शक्तिं घटोत्कचेनेमां व्यंसयित्वा महाद्युते ।
कर्णं निहतमेवाजौ विद्धि सद्यो धनंजय ॥ १२ ॥
महातेजस्वी धनंजय! इन्द्रकी दी हुई शक्तिको घटोत्कचके द्वारा कर्णके हाथसे दूर कराकर अब तुम युद्धमें कर्णको शीघ्र मरा हुआ ही समझो ॥ १२ ॥
शक्तिहस्तं पुनः कर्णं को लोकेऽस्ति पुमानिह ।
य एनमभितस्तिष्ठेत् कार्तिकेयमिवाहवे ॥ १३ ॥
इस संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो युद्धस्थलमें कार्तिकेयके समान शक्तिशाली कर्णके सामने खड़ा हो सके ॥ १३ ॥
दिष्ट्यापनीतकवचो दिष्ट्यापहृतकुण्डलः ।
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दिष्ट्या सा व्यंसिता शक्तिरमोघास्य घटोत्कचे ॥ १४ ॥
सौभाग्यकी बात है कि कर्णका दिव्य कवच उतर गया, सौभाग्यसे ही उसके कुण्डल छीने गये तथा सौभाग्यसे ही उसकी वह अमोघशक्ति घटोत्कचपर गिरकर उसके हाथसे निकल गयी ॥ १४ ॥
यदि हि स्यात् सकवचस्तथैव स्यात् सकुण्डलः ।
सामरानपि लोकांस्त्रीनेकः कर्णो जयेद् रणे ॥ १५ ॥
यदि कर्ण कवच और कुण्डलोंसे सम्पन्न होता तो वह अकेला ही रणभूमिमें देवताओंसहित तीनों लोकोंको जीत सकता था ॥ १५ ॥
वासवो वा कुबेरो वा वरुणो वा जलेश्वरः ।
यमो वा नोत्सहेत् कर्णं रणे प्रतिसमासितुम् ॥ १६ ॥
उस अवस्थामें इन्द्र, कुबेर, जलेश्वर वरुण अथवा यमराज भी रणभूमिमें कर्णका सामना नहीं कर सकते थे ॥ १६ ॥
गाण्डीवमुद्यम्य भवांश्चक्रं चाहं सुदर्शनम् ।
न शक्तौ स्वो रणे जेतुं तथायुक्तं नरर्षभम् ॥ १७ ॥
तुम गाण्डीव उठाकर और मैं सुदर्शनचक्र लेकर दोनों एक साथ जाते तो भी समरांगणमें कवच - कुण्डलोंसे युक्त नरश्रेष्ठ कर्णको नहीं जीत सकते थे ॥ १७ ॥
त्वद्धितार्थं तु शक्रेण मायापहृतकुण्डलः ।
विहीनकवचश्चायं कृतः परपुरंजयः ॥ १८ ॥
तुम्हारे हितके लिये इन्द्रने शत्रु- नगरीपर विजय पानेवाले कर्णके दोनों कुण्डल मायासे हर लिये और उसे कवचसे भी वंचित कर दिया ॥ १८ ॥
उत्कृत्य कवचं यस्मात् कुण्डले विमले च ते ।
प्रादाच्छक्राय कर्णो वै तेन वैकर्तनः स्मृतः ॥ १९ ॥
कर्णने कवच तथा उन निर्मल कुण्डलोंको स्वयं ही अपने शरीरसे कुतरकर इन्द्रको दे दिया था; इसीलिये उसका नाम वैकर्तन हुआ ॥ १ ९ ॥
आशीविष इव क्रुद्धो नृभितो मन्त्रतेजसा ।
तथाद्य भाति कर्णो मे शान्तज्वाल इवानलः ॥ २० ॥
जैसे क्रोधमें भरे हुए सर्पको मन्त्रके तेजसे स्तब्ध कर दिया जाय तथा प्रज्वलित आगकी ज्वालाको बुझा दिया जाय, शक्तिसे वंचित हुआ कर्ण भी आज मुझे वैसा ही प्रतीत होता है ॥ २० ॥
यदाप्रभृति कर्णाय शक्तिर्दत्ता महात्मना ।
वासवेन महाबाहो क्षिप्ता यासै घटोत्कचे ॥ २१ ॥
कुण्डलाभ्यां निमायाथ दिव्येन कवचेन च ।
तां प्राप्यामन्यत वृषः सततं त्वां हतं रणे ॥ २२ ॥
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महाबाहो! जबसे महात्मा इन्द्रने कर्णको उसके दिव्य कवच और कुण्डलोंके बदलेमें अपनी शक्ति दी थी, जिसे उसने घटोत्कचपर चला दिया है, उस शक्तिको पाकर धर्मात्मा कर्ण सदा तुम्हें रणभूमिमें मारा गया ही मानता था ॥ २१-२२ ॥
एवंगतोऽपि शक्योऽयं हन्तुं नान्येन केनचित् ।
ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र शपे सत्येन चानघ ॥ २३ ॥
पुरुषसिंह! आज ऐसी अवस्थामें आकर भी कर्ण तुम्हारे सिवा किसी दूसरे योद्धासे नहीं मारा जा सकता । अनघ! मैं सत्यकी शपथ खाकर यह बात कहता हूँ ॥ २३ ॥
ब्रह्मण्यः सत्यवादी च तपस्वी नियतव्रतः ।
रिपुष्वपि दयावांश्च तस्मात् कर्णो वृषः स्मृतः ॥ २४ ॥
कर्ण ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, तपस्वी, नियम और व्रतका पालक तथा शत्रुओंपर भी दया करनेवाला है; इसीलिये उसे वृष ( धर्मात्मा) कहा गया है ॥ २४ ॥
युद्धशौण्डो महाबाहुर्नित्योद्यतशरासनः ।
केसरीव वने नर्दन् मातङ्ग इव यूथपान् ॥ २५ ॥
विमदान् रथशार्दूलान् कुरुते रणमूर्धनि । महाबाहु कर्ण युद्धमें कुशल है । उसका धनुष सदा उठा ही रहता है। वनमें दहाड़नेवाले सिंहके समान वह सदा गर्जता रहता है । जैसे मतवाला हाथी कितने ही यूथपतियोंको मदरहित कर देता है, उसी प्रकार कर्ण युद्धके मुहानेपर सिंहके समान पराक्रमी महारथियोंका भी घमंड चूर कर देता है ॥ २५३ ॥
मध्यं गत इवादित्यो यो न शक्यो निरीक्षितुम् ॥ २६ ॥
त्वदीयैः पुरुषव्याघ्र योधमुख्यैर्महात्मभिः ।
शरजालसहस्रांशुः शरदीव दिवाकरः ॥ २७ ॥
पुरुषसिंह! तुम्हारे महामनस्वी श्रेष्ठ योद्धा दोपहरके तपते हुए सूर्यकी भाँति कर्णकी ओर देख भी नहीं सकते । जैसे शरद् ऋतुके निर्मल आकाशमें सूर्य अपनी सहस्रों किरणें बिखेरता है, उसी प्रकार कर्ण युद्धमें अपने बाणोंका जाल- सा बिछा देता है ॥ २६-२७ ॥
तपान्ते जलदो यद्वच्छरधाराः क्षरन् मुहुः ।
दिव्यास्त्रजलदः कर्णः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ २८ ॥
जैसे वर्षाकालमें बरसनेवाला मेघ पानीकी धारा गिराता है, उसी प्रकार दिव्यास्त्ररूपी जल प्रदान करनेवाला कर्णरूपी मेघ बारंबार बाणधाराकी वर्षा करता रहता है ॥ २८ ॥
त्रिदशैरपि चास्यद्भिः शरवर्षं समन्ततः ।
अशक्यस्तदयं जेतुं स्रवद्भिर्मांसशोणितम् ॥ २ ९ ॥
चारों ओर बाणोंकी वृष्टि करके शत्रुओंके शरीरोंसे रक्त और मांस बहानेवाले देवता भी कर्णको परास्त नहीं कर सकते ॥ २ ९ ॥ कवचेन विहीनश्च कुण्डलाभ्यां च पाण्डव ।
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सोऽद्य मानुषतां प्राप्तो विमुक्तः शक्रदत्तया ॥ ३० ॥
पाण्डुनन्दन! कर्ण कवच और कुण्डलसे हीन तथा इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे शून्य होकर अब साधारण मनुष्यके समान हो गया है ॥ ३० ॥
एको हि योगोऽस्य भवेद् वधाय च्छिद्रे ह्येनं स्वप्रमत्तः प्रमत्तम् । कृच्छ्रं प्राप्तं रथचक्रे विमग्ने हन्याः पूर्वं त्वं तु संज्ञां विचार्य ॥ ३१ ॥
इतनेपर भी इसके वधका एक ही उपाय है । कोई छिद्र प्राप्त होनेपर जब वह असावधान हो, तुम्हारे साथ युद्ध होते समय जब कर्णके रथका पहिया ( शापवश ) धरतीमें धँस जाय और वह संकटमें पड़ जाय, उस समय तुम पूर्ण सावधान हो मेरे संकेतपर ध्यान देकर उसे पहले ही मार डालना ॥ ३१ ॥
न ह्युद्यतास्त्रं युधि हन्यादजय्य- मप्येकवीरो बलभित् सवज्रः । जरासंधश्चेदिराजो महात्मा महाबाहुश्चैकलव्यो निषादः ॥ ३२ ॥
एकैकशो निहताः सर्व एते योगैस्तैस्तैस्त्वद्धितार्थं मयैव । अन्यथा जब वह युद्धके लिये अस्त्र उठा लेगा, उस समय उस अजेय वीर कर्णको त्रिलोकीके एकमात्र शूरवीर वज्रधारी इन्द्र भी नहीं मार सकेंगे । मगधराज जरासंध, महामनस्वी चेदिराज शिशुपाल और निषादजातीय महाबाहु एकलव्य - इन सबको मैंने ही तुम्हारे हितके लिये विभिन्न उपायोंद्वारा एक-एक करके मार डाला है ॥ ३२ ॥
अथापरे निहता राक्षसेन्द्रा हिडिम्बकिर्मीरवकप्रधानाः । अलायुधः परचक्रावमर्दी घटोत्कचश्चोग्रकर्मा तरस्वी ॥ ३३ ॥
इनके सिवा हिडिम्ब, किर्मीर और बक आदि दूसरे दूसरे राक्षसराज, शत्रुदलका संहार करनेवाला अलायुध और भयंकर कर्म करनेवाला वेगशाली घटोत्कच भी तुम्हारे हितके लिये ही मारे और मरवाये गये हैं ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे घटोत्कचवधे श्रीकृष्णहर्षेऽशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय घटोत्कचका वध होनेपर श्रीकृष्णका हर्षविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा
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हुआ ॥ १८० ॥
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एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको जरासंध आदि धर्मद्रोहियोंके वध करनेका कारण बताना अर्जुनउवाच
कथमस्मद्धितार्थं ते कैश्च योगैर्जनार्दन ।
जरासंधप्रभृतयो घातिताः पृथिवीश्वराः ॥ १ ॥
अर्जुनने पूछा – जनार्दन! आपने हमलोगोंके हितके लिये कैसे किन - किन उपायोंसे जरासंध आदि राजाओंका वध कराया है? ॥ १ ॥
श्रीवासुदेव उवाच
जरासंधश्चेदिराजो नैषादिश्च महाबलः ।
यदि स्युर्न हताः पूर्वमिदानीं स्युर्भयंकराः ॥ २ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा - अर्जुन! जरासंध, शिशुपाल और महाबली एकलव्य यदि ये पहले ही मारे न गये होते तो इस समय बड़े भयंकर सिद्ध होते ॥ २ ॥
दुर्योधनस्तानवश्यं वृणुयाद् रथसत्तमान् ।
तेऽस्मासु नित्यविद्विष्टाः संश्रयेयुश्च कौरवान् ॥ ३ ॥
दुर्योधन उन श्रेष्ठ रथियोंसे अपनी सहायताके लिये अवश्य प्रार्थना करता और वे हमसे सर्वदा द्वेष रखनेके कारण निश्चय ही कौरवोंका पक्ष लेते ॥ ३ ॥
ते हि वीरा महेष्वासाः कृतास्त्रा दृढयोधिनः ।
धार्तराष्ट्रां चमूं कृत्स्नां रक्षेयुरमरा इव ॥ ४ ॥
वे वीर महाधनुर्धर, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा दृढ़तापूर्वक युद्ध करनेवाले थे; अतः दुर्योधनकी सारी सेनाकी देवताओंके समान रक्षा कर सकते थे ॥ ४ ॥
सूतपुत्रो जरासंधश्चेदिराजो निषादजः ।
सुयोधनं समाश्रित्य जयेयुः पृथिवीमिमाम् ॥ ५ ॥
सूतपुत्र कर्ण, जरासंध, चेदिराज शिशुपाल और निषादनन्दन एकलव्य — ये चारों मिलकर यदि दुर्योधनका पक्ष लेते तो इस पृथ्वीको अवश्य ही जीत लेते ॥ ५ ॥
योगैरपि हता यैस्ते तन्मे शृणु धनंजय ।
अजय्या हि विना योगैर्मृधे ते दैवतैरपि ॥ ६ ॥
धनंजय! वे जिन उपायोंसे मारे गये हैं, उन्हें बतलाता हूँ, मुझसे सुनो । बिना उपाय किये तो उन्हें युद्धमें देवता भी नहीं जीत सकते थे ॥ ६ ॥
एकैको हि पृथक् तेषां समस्तां सुरवाहिनीम् ।
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योधयेत् समरे पार्थ लोकपालाभिरक्षिताम् ॥ ७ ॥
कुन्तीनन्दन! उनमेंसे अलग- अलग एक-एक वीर ऐसा था, जो लोकपालोंसे सुरक्षित समस्त देवसेनाके साथ समरांगणमें अकेला ही युद्ध कर सकता था ॥ ७ ॥
जरासंधो हि रुषितो रौहिणेयप्रधर्षितः ।
अस्मद्वधार्थं चिक्षेप गदां वै सर्वघातिनीम् ॥ ८ ॥
एक समयकी बात है, रोहिणीनन्दन बलरामजीने युद्धमें जरासंधको पछाड़ दिया था । इससे कुपित होकर जरासंधने हमलोगोंके वधके लिये अपनी सर्वघातिनी गदाका प्रहार किया ॥ ८ ॥
सीमन्तमिव कुर्वाणा नभसः पावकप्रभा ।
अदृश्यतापतन्ती सा शक्रमुक्ता यथाशनिः ॥ ९ ॥
अग्निके समान प्रज्वलित वह गदा इन्द्रके चलाये हुए वज्रकी भाँति आकाशमें सीमान्त-रेखा - सी बनाती हुई वहाँ गिरती दिखायी दी ॥ ९ ॥
तामापतन्तीं दृष्ट्वैव गदां रोहिणिनन्दनः ।
प्रतिघातार्थमस्त्रं वै स्थूणाकर्णमवासृजत् ॥ १० ॥
वहाँ गिरती हुई उस गदाको देखते ही उसके प्रतिघात ( निवारण ) - के लिये रोहिणीनन्दन बलरामजीने स्थूणाकर्ण नामक अस्त्रका प्रयोग किया ॥ १० ॥
अस्त्रवेगप्रतिहता सा गदा प्रापतद् भुवि ।
दारयन्ती धरां देवीं कम्पयन्तीव पर्वतान् ॥ ११ ॥
उस अस्त्रके वेगसे प्रतिहत होकर वह गदा पृथ्वीदेवीको विदीर्ण करती और पर्वतोंको कँपाती हुई- सी भूतलपर गिर पड़ी ॥ ११ ॥
तत्र सा राक्षसी घोरा जरानाम्नी सुविक्रमा ।
संदधे सा हि संजातं जरासंधमरिंदमम् ॥ १२ ॥
जिस स्थानपर गदा गिरी, वहाँ उत्तम बल पराक्रमसे सम्पन्न जरा नामक एक भयंकर राक्षसी रहती थी । उसीने जन्मके पश्चात् शत्रुदमन जरासंधके शरीरको जोड़ा था ॥ १२ ॥
द्वाभ्यां जातो हि मातृभ्यामर्धदेहः पृथक् पृथक् ।
जरया संधितो यस्माज्जरासंधस्ततोऽभवत् ॥ १३ ॥
उसका आधा - आधा शरीर अलग- अलग दो माताओंके पेटसे पैदा हुआ था । जराने उसे जोड़ा था; इसीलिये उसका नाम जरासंध हुआ ॥ १३ ॥
सा तु भूमिं गता पार्थ हता ससुतबान्धवा ।
गदया तेन चास्त्रेण स्थूणाकर्णेन राक्षसी ॥ १४ ॥
पार्थ! भूमिके भीतर रहनेवाली वह राक्षसी उस गदासे तथा स्थूणाकर्ण नामक अस्त्रके आघातसे पुत्र और बन्धु - बान्धवोंसहित मारी गयी ॥ १४ ॥
विनाभूतः स गदया जरासंधो महामृधे ।
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निहतो भीमसेनेन पश्यतस्ते धनंजय ॥। १५ ॥ धनंजय! उस महासमरमें जरासंध बिना गदाके हो गया था; इसीलिये तुम्हारे देखते-देखते भीमसेनने उसे मार डाला ॥ १५ ॥
यदि हि स्याद् गदापाणिर्जरासंधः प्रतापवान् ।
सेन्द्रा देवा न तं हन्तुं रणे शक्ता नरोत्तम ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! यदि प्रतापी जरासंधके हाथमें वह गदा होती तो इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी उसे युद्धमें मार नहीं सकते थे ॥ १६ ॥
त्वद्धितार्थं च नैषादिरङ्गुष्ठेन वियोजितः ।
द्रोणेनाचार्यकं कृत्वा छद्मना सत्यविक्रमः ॥ १७ ॥
तुम्हारे हितके लिये ही द्रोणाचार्यने सत्यपराक्रमी एकलव्यका आचार्यत्व करके छलपूर्वक उसका अँगूठा कटवा दिया था ॥ १७ ॥
स तु बद्धाङ्गुलित्राणो नैषादिर्दृढविक्रमः ।
अतिमानी वनचरो बभौ राम इवापरः ॥ १८ ॥
सुदृढ़ पराक्रमसे सम्पन्न अत्यन्त अभिमानी एकलव्य जब हाथोंमें दस्ताने पहनकर वनमें विचरता, उस समय दूसरे परशुरामके समान जान पड़ता था ॥ १८ ॥
एकलव्यं हि साङ्गुष्ठमशक्ता देवदानवाः ।
सराक्षसोरगाः पार्थ विजेतुं युधि कर्हिचित् ॥ १९ ॥
कुन्तीकुमार! यदि एकलव्यका अँगूठा सुरक्षित होता तो देवता, दानव, राक्षस और नाग - ये सब मिलकर भी युद्धमें उसे कभी परास्त नहीं कर सकते थे ॥ १ ९ ॥
किमु मानुषमात्रेण शक्यः स्यात् प्रतिवीक्षितुम् ।
दृढमुष्टिः कृती नित्यमस्यमानो दिवानिशम् ॥ २० ॥
फिर कोई मनुष्यमात्र तो उसकी ओर देख ही कैसे सकता था? उसकी मुट्ठी मजबूत थी । वह अस्त्र- विद्याका विद्वान् था और सदा दिन- रात बाण चलानेका अभ्यास करता था ॥ २० ॥
त्वद्धितार्थं तु स मया हतः संग्राममूर्धनि ।
चेदिराजश्च विक्रान्तः प्रत्यक्षं निहतस्तव ॥ २१ ॥
तुम्हारे हितके लिये मैंने ही युद्धके मुहानेपर उसे मार डाला था । पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल तो तुम्हारी आँखोंके सामने ही मारा गया था ॥ २१ ॥
स चाप्यशक्यः संग्रामे जेतुं सर्वसुरासुरैः ।
वधार्थं तस्य जातोऽहमन्येषां च सुरद्विषाम् ॥ २२ ॥
त्वत्सहायो नरव्याघ्र लोकानां हितकाम्यया ।
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वह भी संग्राममें सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंद्वारा जीता नहीं जा सकता था । नरव्याघ्र! मैं सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये और शिशुपाल एवं अन्य देवद्रोहियोंका वध करनेके लिये ही तुम्हारे साथ इस जगत्में अवतीर्ण हुआ हूँ ॥ २२ ॥
हिडिम्बवककिर्मीरा भीमसेनेन पातिताः ॥ २३ ॥
रावणेन समप्राणा ब्रह्मयज्ञविनाशनाः । हिडिम्ब, वक और किर्मीर — ये रावणके समान बलवान् थे और ब्राह्मणों तथा यज्ञोंका
विनाश किया करते थे । इन तीनोंको भीमसेनने मार गिराया है ॥ २३३ ॥
हतस्तथैव मायावी हैडिम्बेनाप्यलायुधः ॥ २४ ॥
हैडिम्बश्चाप्युपायेन शक्त्या कर्णेन घातितः । मायावी अलायुध घटोत्कचके हाथसे मारा गया है और घटोत्कचको भी मैंने ही युक्ति लगाकर कर्णकी चलायी हुई शक्तिसे मरवा दिया है ॥ २४ ॥
यदि ह्येनं नाहनिष्यत् कर्णः शक्त्या महामृधे ॥ २५ ॥
मया वध्योऽभविष्यत् स भैमसेनिर्घटोत्कचः । यदि महासमरमें कर्ण अपनी शक्तिद्वारा भीमसेनपुत्र घटोत्कचको नहीं मारता तो एक दिन मुझे उसका वध करना पड़ता ॥ २५३ ॥
मया न निहतः पूर्वमेष युष्मत्प्रियेप्सया ॥ २६ ॥
एष हि ब्राह्मणद्वेषी यज्ञद्वेषी च राक्षसः ।
धर्मस्य लोप्ता पापात्मा तस्मादेष निपातितः ॥ २७ ॥
तुमलोगोंका प्रिय करनेकी इच्छासे ही मैंने इसे पहले नहीं मारा था । यह ब्राह्मणों और यज्ञोंसे द्वेष रखनेवाला तथा धर्मका लोप करनेवाला पापात्मा राक्षस था; इसीलिये इसे मरवा दिया है ॥ २६-२७ ॥
व्यंसिता चाप्युपायेन शक्रदत्ता मयानघ ।
ये हि धर्मस्य लोप्तारो वध्यास्ते मम पाण्डव ॥ २८ ॥
निष्पाप पाण्डुनन्दन! इसी उपायसे मैंने इन्द्रकी दी हुई शक्ति भी कर्णके हाथसे दूर कर दी है । धर्मका लोप करनेवाले सभी प्राणी मेरे वध्य हैं ॥ २८ ॥
धर्मसंस्थापनार्थं हि प्रतिज्ञैषा ममाव्यया ।
ब्रह्म सत्यं दमः शौचं धर्मो ह्रीः श्रीर्धृतिः क्षमा ॥ २ ९ ॥
यत्र तत्र रमे नित्यमहं सत्येन ते शपे । धर्मकी स्थापनाके लिये ही मैंने यह अटल प्रतिज्ञा कर रखी है, मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, जहाँ वेद, सत्य, दम, शौच, धर्म, लज्जा, श्री, धृति और क्षमाका निवास है, वहीं मैं सदा सुखपूर्वक रहता हूँ ॥ न विषादस्त्वया कार्यः कर्णं वैकर्तनं प्रति ॥ ३० ॥
उपदेक्ष्याम्युपायं ते येन तं प्रसहिष्यसि ।
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तुम्हें वैकर्तन कर्णके विषयमें चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है । मैं तुम्हें ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे तुम उसका सामना कर सकोगे ॥ ३०३ ॥
सुयोधनं चापि रणे हनिष्यति वृकोदरः ॥ ३१ ॥
तस्यापि च वधोपायं वक्ष्यामि तव पाण्डव । पाण्डुनन्दन! युद्धमें दुर्योधनका भी वध भीमसेन करेंगे । उसके वधका उपाय भी मैं तुम्हें बताऊँगा ॥ वर्धते तुमुलस्त्वेष शब्दः परचमूं प्रति ॥ ३२ ॥
विद्रवन्ति च सैन्यानि त्वदीयानि दिशो दश । शत्रुओंकी सेनामें यह भयंकर गर्जनाका शब्द बढ़ता जा रहा है और तुम्हारे सैनिक दसों दिशाओंमें भाग रहे हैं ॥ ३२३ ॥
लब्धलक्ष्या हि कौरव्या विधमन्ति चमूं तव ।
दहत्येष च वः सैन्यं द्रोणः प्रहरतां वरः ॥ ३३ ॥
कौरवोंका निशाना अचूक हो रहा है । वे तुम्हारी सेनाका विनाश कर रहे हैं । इधर ये योद्धाओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य तुम्हारे सैनिकोंको दग्ध किये देते हैं ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे कृष्णवाक्ये एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रि- युद्धके समय श्रीकृष्णका कथनविषयक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८१ ॥