04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 141–150
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150
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ततो गदाग्राभिहतौ क्षणेन रुधिरोक्षितौ ।
ददृशाते महात्मानौ किंशुकाविव पुष्पितौ ॥ २३ ॥
एक ही क्षणमें गदाके अग्रभागसे घायल होकर वे दोनों महामनस्वी वीर खूनसे लथपथ हो फूलोंसे भरे हुए दो पलाश वृक्षोंके समान दिखायी देने लगे ॥ २३ ॥
शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तयोः पुरुषसिंहयोः ।
गदाभिघातसंह्रादः शक्राशनिरवोपमः ॥ २४ ॥
उन दोनों पुरुषसिंहोंकी गदाओंके टकरानेका शब्द इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान सम्पूर्ण दिशाओंमें सुनायी देता था ॥ २४ ॥
गदया मद्रराजेन सव्यदक्षिणमाहतः ।
नाकम्पत तदा भीमो भिद्यमान इवाचलः ॥ २५ ॥
उस समय मद्रराजकी गदासे बायें दायें चोट खाकर भी भीमसेन विचलित नहीं हुए ।
जैसे पर्वत वज्रका आघात सहकर भी अविचलभावसे खड़ा रहता है ॥ २५ ॥
तथा भीमगदावेगैस्ताड्यमानो महाबलः ।
धैर्यान्मद्राधिपस्तस्थौ वज्रैर्गिरिरिवाहतः ॥ २६ ॥
इसी प्रकार भीमसेनकी गदाके वेगसे आहत होकर महाबली मद्रराज वज्राघातसे पीड़ित पर्वतकी भाँति धैर्यपूर्वक खड़े रहे ॥ २६ ॥
आपेततुर्महावेगौ समुच्छ्रितगदावुभौ ।
पुनरन्तरमार्गस्थौ मण्डलानि विचेरतुः ॥ २७ ॥
वे दोनों महावेगशाली वीर गदा उठाये एक- दूसरेपर टूट पड़े । फिर अन्तर्मार्गमें स्थित हो मण्डलाकार गतिसे विचरने लगे ॥ २७ ॥
अथाप्लुत्य पदान्यष्टौ संनिपत्य गजाविव ।
सहसा लोहदण्डाभ्यामन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् आठ पग चलकर दोनों दो हाथियोंकी भाँति परस्पर टूट पड़े और सहसा लोहेके डंडोंसे एक- दूसरेको मारने लगे ॥ २८ ॥
तौ परस्परवेगाच्च गदाभ्यां च भृशाहतौ ।
युगपत् पेततुर्वीरौ क्षिताविन्द्रध्वजाविव ॥ २ ९ ॥
वे दोनों वीर परस्परके वेगसे और गदाओंद्वारा अत्यन्त घायल हो दो इन्द्रध्वजोंके समान एक ही समय पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २ ९ ॥
ततो विह्वलमानं तं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ।
शल्यमभ्यपतत् तूर्णं कृतवर्मा महारथः ॥ ३० ॥
उस समय शल्य अत्यन्त विह्वल होकर बारंबार लम्बी साँस खींच रहे थे । इतनेहीमें महारथी कृतवर्मा तुरंत राजा शल्यके पास आ पहुँचा ॥ ३० ॥
दृष्ट्वा चैनं महाराज गदयाभिनिपीडितम् ।
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विचेष्टन्तं यथा नागं मूर्च्छयाभिपरिप्लुतम् ॥ ३१ ॥
महाराज! आकर उसने देखा कि राजा शल्य गदासे पीड़ित एवं मूर्च्छासे अचेत हो आहत हुए नागकी भाँति छटपटा रहे हैं ॥ ३१ ॥
ततः स्वरथमारोप्य मद्राणामधिपं रणे ।
अपोवाह रणात् तूर्णं कृतवर्मा महारथः ॥ ३२ ॥
यह देख महारथी कृतवर्मा युद्धस्थलमें मद्रराज शल्यको अपने रथपर बिठाकर तुरंत ही रणभूमिसे बाहर हटा ले गया ॥ ३२ ॥
क्षीबवद् विह्वलो वीरो निमेषात् पुनरुत्थितः ।
भीमोऽपि सुमहाबाहुर्गदापाणिरदृश्यत ॥ ३३ ॥
तदनन्तर महाबाहु वीर भीमसेन भी मदोन्मत्तकी भाँति विह्वल हो पलक मारते - मारते उठकर खड़े हो गये और हाथमें गदा लिये दिखायी देने लगे ॥ ३३ ॥
ततो मद्राधिपं दृष्ट्वा तव पुत्राः पराङ्मुखम् ।
सनागपत्त्यश्वरथाः समकम्पन्त मारिष ॥ ३४ ॥
आर्य! उस समय मद्रराज शल्यको युद्धसे विमुख हुआ देख हाथी, घोड़े, रथ और पैदल - सेनाओंसहित आपके सारे पुत्र भयसे काँप उठे ॥ ३४ ॥
ते पाण्डवैरर्द्यमानास्तावका जितकाशिभिः ।
भीता दिशोऽन्वपद्यन्त वातनुन्ना घना इव ॥ ३५ ॥
विजयसे सुशोभित होनेवाले पाण्डवोंद्वारा पीड़ित हो आपके सभी सैनिक भयभीत हो हवाके उड़ाये हुए बादलोंकी भाँति चारों दिशाओंमें भाग गये ॥ ३५ ॥
निर्जित्य धार्तराष्ट्रांस्तु पाण्डवेया महारथाः ।
व्यरोचन्त रणे राजन् दीप्यमाना इवाग्नयः ॥ ३६ ॥
राजन्! इस प्रकार आपके पुत्रोंको जीतकर महारथी पाण्डव प्रज्वलित अग्नियोंकी भाँति रणक्षेत्रमें प्रकाशित होने लगे ॥ ३६ ॥
सिंहनादान् भृशं चक्रुः शङ्खान् दध्मुश्च हर्षिताः ।
भेरीश्च वादयामासुर्मृदङ्गांश्चानकैः सह ॥ ३७ ॥
उन्होंने हर्षित होकर बारंबार सिंहनाद किये और बहुत - से शंख बजाये; साथ ही उन्होंने भेरी, मृदंग और आनक आदि वाद्योंको भी बजवाया ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि शल्यापयाने पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गतद्रोणाभिषेकपर्वमें शल्यका पलायनविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
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षोडशोऽध्यायः वृषसेनका पराक्रम, कौरव पाण्डववीरोंका तुमुल युद्ध, द्रोणाचार्यके द्वारा पाण्डवपक्षके अनेक वीरोंका वध तथा अर्जुनकी विजय संजय उवाच
तद् बलं सुमहद् दीर्णं त्वदीयं प्रेक्ष्य वीर्यवान् ।
दधारैको रणे राजन् वृषसेनोऽस्त्रमायया ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — महाराज! आपकी विशाल सेनाको तितर-बितर हुई देख एकमात्र पराक्रमी वृषसेनने अपने अस्त्रोंकी मायासे रणक्षेत्रमें उसे धारण किया ( भागनेसे रोका ) ॥ १ ॥
शरा दश दिशो मुक्ता वृषसेनेन संयुगे ।
विचेरुस्ते विनिर्भिद्य नरवाजिरथद्विपान् ॥ २ ॥
उस युद्धस्थलमें वृषसेनके छोड़े हुए बाण हाथी, घोड़े, रथ और मनुष्योंको विदीर्ण करते हुए दसों दिशाओंमें विचरने लगे ॥ २ ॥
तस्य दीप्ता महाबाणा विनिश्चेरुः सहस्रशः ।
भानोरिव महाराज धर्मकाले मरीचयः ॥ ३ ॥
महाराज! जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यसे निकलकर सहस्रों किरणें सब ओर फैलती हैं, उसी प्रकार वृषसेनके धनुषसे सहस्रों तेजस्वी महाबाण निकलने लगे ॥ ३ ॥
तेनार्दिता महाराज रथिनः सादिनस्तथा ।
निपेतुरुर्व्यां सहसा वातभग्ना इव द्रुमाः ॥ ४ ॥
राजन्! जैसे प्रचण्ड आँधीसे सहसा बड़े - बड़े वृक्ष टूटकर गिर जाते हैं, उसी प्रकार वृषसेनके द्वारा पीड़ित हुए रथी और अन्य योद्धागण सहसा धरतीपर गिरने लगे ॥ ४ ॥
हयौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च महारथः ।
अपातयद् रणे राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! उस महारथी वीरने रणभूमिमें घोड़ों, रथों और हाथियोंके सैकड़ों -हजारों समूहों को मार गिराया ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा तमेकं समरे विचरन्तमभीतवत् ।
सहिताः सर्वराजानः परिवव्रुः समन्ततः ॥ ६ ॥
उसे अकेले ही समरभूमिमें निर्भय विचरते देख सब राजाओंने एक साथ आकर सब ओरसे घेर लिया ॥ ६ ॥
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नाकुलिस्तु शतानीको वृषसेनं समभ्ययात् ।
विव्याध चैनं दशभिर्नाराचैर्मर्मभेदिभिः ॥ ७ ॥
इसी समय नकुलके पुत्र शतानीकने वृषसेनपर आक्रमण किया और दस मर्मभेदी नाराचोंद्वारा उसे बींध डाला ॥ ७ ॥
तस्य कर्णात्मजश्चापं छित्त्वा केतुमपातयत् ।
तं भ्रातरं परीप्सन्तो द्रौपदेयाः समभ्ययुः ॥ ८ ॥
तब कर्णके पुत्रने शतानीकके धनुषको काटकर उनके ध्वजको भी गिरा दिया । यह देख अपने भाईकी रक्षा करनेके लिये द्रौपदीके दूसरे पुत्र भी वहाँ आ पहुँचे ॥ ८ ॥
कर्णात्मजं शरव्रातैरदृश्यं चक्रुरञ्जसा ।
तान् नदन्तोऽभ्यधावन्त द्रोणपुत्रमुखा रथाः ॥ ९ ॥
छादयन्तो महाराज द्रौपदेयान् महारथान् ।
शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पर्वताञ्जलदा इव ॥ १० ॥
उन्होंने अपने बाणसमूहोंकी वर्षासे कर्णकुमार वृषसेनको अनायास ही आच्छादित करके अदृश्य कर दिया । महाराज! यह देख अश्वत्थामा आदि महारथी सिंहनाद करतेहुए उनपर टूट पड़े और जैसे मेघ पर्वतोंपर जलकी धारा गिराते हैं, उसी प्रकार वे नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए तुरंत ही महारथी द्रौपदीपुत्रोंको आच्छादित करने लगे ॥ ९-१० ॥
तान् पाण्डवाः प्रत्यगृह्मंस्त्वरिताः पुत्रगृद्धिनः ।
पञ्चालाः केकया मत्स्याः सृञ्जयाश्चोद्यतायुआः ॥ ११ ॥
तब पुत्रोंकी प्राणरक्षा चाहनेवाले पाण्डवोंने तुरंत आकर उन कौरव महारथियोंको रोका । पाण्डवोंके साथ पांचाल, केकय, मत्स्य और सृजयदेशीय योद्धा भी अस्त्र- शस्त्र लिये उपस्थित थे ॥ ११ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं सुमहल्लोमहर्षणम् ।
त्वदीयैः पाण्डुपुत्राणां देवानामिव दानवैः ॥ १२ ॥
राजन्! फिर तो दानवोंके साथ देवताओंकी भाँति आपके सैनिकोंके साथ पाण्डवोंका अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ १२ ॥
एवं युयुधिरे वीराः संरब्धाः कुरुपाण्डवाः ।
परस्परमुदीक्षन्तः परस्परकृतागसः ॥ १३ ॥
इस प्रकार एक- दूसरेके अपराध करनेवाले कौरव- पाण्डववीर परस्पर क्रोधपूर्ण दृष्टिसे देखते हुए युद्ध करने लगे ॥ १३ ॥
तेषां ददृशिरे कोपाद् वपूंष्यमिततेजसाम् ।
युयुत्सूनामिवाकाशे पतत्त्रिवरभोगिनाम् ॥ १४ ॥
क्रोधवश युद्ध करते हुए उन अमित तेजस्वी राजाओंके शरीर आकाशमें युद्धकी इच्छासे एकत्र हुए पक्षिराज गरुड़ तथा नागोंके समान दिखायी देते थे ॥ १४ ॥
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भीमकर्णकृपद्रोणद्रौणिपार्षतसात्यकैः ।
बभासे स रणोद्देशः कालसूर्य इवोदितः ॥ १५ ॥
भीम, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोण, अश्वत्थामा, धृष्टद्युम्न तथा सात्यकि आदि वीरोंसे वह रणक्षेत्र ऐसी शोभा पा रहा था, मानो वहाँ प्रलयकालके सूर्यका उदय हुआ हो ॥ १५ ॥
तदाऽऽसीत् तुमुलं युद्धं निघ्नतामितरेतरम् ।
महाबलानां बलिभिर्दानवानां यथा सुरैः ॥ १६ ॥
उस समय एक- दूसरेपर प्रहार करनेवाले उन महाबली वीरोंमें वैसा ही भयंकर युद्ध हो रहा था, जैसे पूर्वकालमें बलवान् देवताओंके साथ महाबली दानवोंका संग्राम हुआ था ॥ १६ ॥
ततो युधिष्ठिरानीकमुद्धतार्णवनिःस्वनम् ।
त्वदीयमवधीत् सैन्यं सम्प्रद्रुतमहारथम् ॥ १७ ॥
तदनन्तर उत्ताल तरंगोंसे युक्त महासागरकी भाँति गर्जना करती हुई युधिष्ठिरकी सेना आपकी सेनाका संहार करने लगी । इससे कौरव - सेनाके बड़े - बड़े रथी भाग खड़े हुए ॥ १७ ॥
तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा शत्रुभिर्भृशमर्दितम् ।
अलं द्रुतेन वः शूरा इति दोणोऽभ्यभाषत ॥ १८ ॥
शत्रुओंके द्वारा अच्छी तरह रौंदी गयी आपकी सेनाको भागती देख द्रोणाचार्यने कहा -' शूरवीरो! तुम भागो मत, इससे कोई लाभ न होगा ' ॥ १८ ॥
( भारद्वाजममर्षश्च विक्रमश्च समाविशत् ।
समुद्धृत्य निषङ्गाच्च धनुर्ज्यामवमृज्य च ॥
महाशरधनुष्पाणिर्यन्तारमिदमब्रवीत् । उस समय द्रोणाचार्यमें अमर्ष और पराक्रम दोनोंका समावेश हुआ । उन्होंने धनुषकी प्रत्यंचाको पोंछकर तूणीरसे बाण निकाला और उस महान् बाण एवं धनुषको हाथमें लेकर सारथिसे इस प्रकार कहा । द्रोणउवाच सारथे याहि यत्रैव पाण्डरेण विराजता ॥ ध्रियमाणेन छत्रेण राजा तिष्ठति धर्मराट् । द्रोणाचार्य बोले — सारथे! वहीं चलो, जहाँ सुन्दर श्वेत छत्र धारण किये धर्मराज राजा
युधिष्ठिर खड़े हैं ।
तदेतद् दीर्यते सैन्यं धार्तराष्ट्रमनेकधा ॥
एतत् संस्तम्भयिष्यामि प्रतिवार्य युधिष्ठिरम् ।
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यह धृतराष्ट्रकी सेना तितर-बितर हो अनेक भागोंमें बँटी जा रही हैं । मैं युधिष्ठिरको
रोककर इस सेनाको स्थिर करूँगा ( भागनेसे रोकूँगा ) ।
न हि मामभिवर्षन्ति संयुगे तात पाण्डवाः ॥
मात्स्याः पाञ्चालराजानः सर्वे च सहसोमकाः । तात! ये पाण्डव, मत्स्य, पांचाल और समस्त सोमक वीर मुझपर बाण- वर्षा नहीं कर
सकते ।
अर्जुनो मत्प्रसादाद्धि महास्त्राणि समाप्तवान् ॥
न मामुत्सहते तात न भीमो न च सात्यकिः । अर्जुनने भी मेरी ही कृपासे बड़े -बड़े अस्त्रोंको प्राप्त किया है । तात! वे भीमसेन और
सात्यकि भी मुझसे लड़नेका साहस नहीं कर सकते ।
मत्प्रसादाद्धि बीभत्सुः परमेष्वासतां गतः ॥
ममैवास्त्रं विजानाति धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः । अर्जुन मेरे ही प्रसादसे महान् धनुर्धर हो गये हैं । धृष्टद्युम्न भी मेरे ही दिये हुए अस्त्रोंका
ज्ञान रखता है ।
नायं संरक्षितुं कालः प्राणांस्तात जयैषिणा ॥
याहि स्वर्गं पुरस्कृत्य यशसे च जयाय च । तात सारथे! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वीरके लिये यह प्राणोंकी रक्षा करनेका अवसर नहीं है । तुम स्वर्गप्राप्तिका उद्देश्य लेकर यश और विजयके लिये आगे बढ़ो । संजय उवाच एवं संचोदितो यन्ता द्रोणमभ्यवहत् ततः ॥
तदाश्वहृदयेनाश्वानभिमन्त्र्याशु हर्षयन् ।
रथेन सवरून भास्वरेण विराजता ॥
संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार प्रेरित होकर सारथि अश्वहृदय नामक मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके घोड़ोंका हर्ष बढ़ाता हुआ आवरणयुक्त प्रकाशमान एवं तेजस्वी रथके द्वारा शीघ्रतापूर्वक द्रोणाचार्यको आगे ले चला । तं करूषाश्च मत्स्याश्च चेदयश्च ससात्वताः । पाण्डवाश्च सपञ्चालाः सहिताः पर्यवारयन् ॥ ) उस समय करूष, मत्स्य, चेदि, सात्वत, पाण्डव तथा पांचाल वीरोंने एक साथ आकर द्रोणाचार्यको रोका ।
ततः शोणहयः क्रुद्धश्चतुर्दन्त इव द्विपः ।
प्रविश्य पाण्डवानीकं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ १९ ॥
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तब लाल घोड़ोंवाले द्रोणाचार्यने कुपित हो चार दाँतोंवाले गजराजके समान पाण्डव- सेनामें घुसकर युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ १ ९ ॥
तमाविध्यच्छितैर्बाणैः कङ्कपत्रैर्युधिष्ठिरः ।
तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा तं द्रुतं समुपाद्रवत् ॥ २० ॥
युधिष्ठिरने गीधकी पाँखोंसे युक्त पैने बार्णोद्वारा द्रोणाचार्यको बींध डाला । तब द्रोणाचार्यने उनका धनुष काटकर बड़े वेगसे उनपर आक्रमण किया ॥ २० ॥
चक्ररक्षः कुमारस्तु पञ्चालानां यशस्करः ।
दधार द्रोणमायान्तं वेलेव सरितां प्रतिम ॥ २१ ॥
उस समय पांचालोंके यशको बढ़ानेवाले कुमारने, जो युधिष्ठिरके रथ -चक्रकी रक्षा कर रहे थे, आते हुए द्रोणाचार्यको उसी प्रकार रोक दिया, जैसे तटभूमि समुद्रको रोकती है ॥ २१ ॥
द्रोणं निवारितं दृष्ट्वा कुमारेण द्विजर्षभम् ।
सिंहनादरवो ह्यासीत् साधु साध्विति भाषितम् ॥ २२ ॥
कुमारके द्वारा द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यको रोका गया देख पाण्डव सेनामें चोर- जोरसे सिंहनाद होने लगा और सब लोग कहने लगे ' बहुत अच्छा, बहुत अच्छा ' ॥ २२ ॥
कुमारस्तु ततो द्रोणं सायकेन महाहवे ।
विव्याधोरसि संक्रुद्धः सिंहवच्च नदन् मुहुः ॥ २३ ॥
कुमारने उस महायुद्धमें कुपित हो बारंबार सिंहनाद करते हुए एक बाणद्वारा द्रोणाचार्यकी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ २३ ॥
संवार्य च रणे द्रोणं कुमारस्तु महाबलः ।
शरैरनेकसाहस्रैः कृतहस्तो जितश्रमः ॥ २४ ॥
इतना ही नहीं, उस महाबली कुमारने कई हजार बाणोंद्वारा रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यको रोक दिया; क्योंकि उनके हाथ अस्त्र- संचालनकी कलामें दक्ष थे और उन्होंने परिश्रमको जीत लिया था ॥ २४ ॥
तं शूरमार्यव्रतिनं मन्त्रास्त्रेषु कृतश्रमम् ।
चक्ररक्षं परामृद्नात् कुमारं द्विजपुङ्गवः ॥ २५ ॥
परंतु द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यने शूर, आर्यव्रती एवं मन्त्रास्त्रविद्यामें परिश्रम किये हुए चक्र-रक्षक कुमारको परास्त कर दिया ॥ २५ ॥
स मध्यं प्राप्य सैन्यानां सर्वाः प्रविचरन् दिशः ।
तव सैन्यस्य गोप्ताऽऽसीद् भारद्वाजो द्विजर्षभः ॥ २६ ॥
राजन्! भरद्वाजनन्दन विप्रवर द्रोणाचार्य आपकी सेनाके संरक्षक थे । वे पाण्डव- सेनाके बीचमें घुसकर सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरने लगे ॥ २६ ॥
शिखण्डिनं द्वादशभिर्विंशत्या चोत्तमौजसम् ।
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नकुलं पञ्चभिर्विद्ध्वा सहदेवं च सप्तभिः ॥ २७ ॥
युधिष्ठिरं द्वादशभिर्द्रौपदेयांस्त्रिभिस्त्रिभिः ।
सात्यकिं पञ्चभिर्विद्ध्वा मत्स्यं च दशभिः शरैः ॥ २८ ॥
उन्होंने शिखण्डीको बारह, उत्तमौजाको बीस, नकुलको पाँच और सहदेवको सात बाणोंसे घायल करके युधिष्ठिरको बारह, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको तीन- तीन, सात्यकिको पाँच और विराटको दस बाणोंसे बींध डाला ॥ २७-२८ ॥
व्यक्षोभयद् रणे योधान् यथा मुख्यमभिद्रवन् ।
अभ्यवर्तत सम्प्रेप्सुः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ २ ९ ॥
राजन्! उन्होंने रणक्षेत्रमें मुख्य- मुख्य योद्धाओं पर धावा करके उन सबको क्षोभमें डाल दिया और कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको पकड़नेके लिये उनपर वेगसे आक्रमण किया ॥ २ ९ ॥
युगन्धरस्ततो राजन् भारद्वाजं महारथम् ।
वारयामास संक्रुद्धं वातोद्धतमिवार्णवम् ॥ ३० ॥
राजन्! उस समय वायुके थपेड़ोंसे विक्षुब्ध हुए महासागरके समान क्रोधमें भरे हुए महारथी द्रोणाचार्यको राजा युगन्धरने रोक दिया ॥ ३० ॥
युधिष्ठिरं स विद्ध्वा तु शरैः संनतपर्वभिः ।
युगन्धरं तु भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ ३१ ॥
तब झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको घायल करके द्रोणाचार्यने एक भल्ल नामक बाणद्वारा मारकर युगन्धरको रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ३१ ॥
ततो विराटद्रुपदौ केकयाः सात्यकिः शिबिः ।
व्याघ्रदत्तश्च पाञ्चाल्यः सिंहसेनश्च वीर्यवान् ॥ ३२ ॥
एते चान्ये च बहवः परीप्सन्तो युधिष्ठिरम् ।
आवव्रुस्तस्य पन्थानं किरन्तः सायकान् बहून् ॥ ३३ ॥
यह देख विराट, द्रुपद, केकय, सात्यकि, शिबि, पांचालदेशीय व्याघ्रदत्त तथा पराक्रमी सिंहसेन — ये तथा और भी बहुत- से नरेश राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करनेके लिये बहुत - से सायकोंकी वर्षा करते हुए द्रोणाचार्यकी राह रोककर खड़े हो गये ॥ ३२-३३ ॥
व्याघ्रदत्तस्तु पाञ्चाल्यो द्रोणं विव्याध मार्गणैः ।
पञ्चाशता शितै राजंस्तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥ ३४ ॥
राजन्! पांचालदेशीय व्याघ्रदत्तने पचास तीखे बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको घायल कर दिया । तब सब लोग जोर- जोरसे हर्षनाद करने लगे ॥ ३४ ॥
त्वरितं सिंहसेनस्तु द्रोणं विद्ध्वा महारथम् ।
प्राहसत् सहसा हृष्टस्त्रासयन् वै महारथान् ॥ ३५ ॥
हर्षमें भरे हुए सिंहसेनने तुरंत ही महारथी द्रोणाचार्यको घायल करके अन्य महारथियोंके मनमें त्रास उत्पन्न करते हुए सहसा चोरसे अट्टहास किया ॥ ३५ ॥
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ततो विस्फार्य नयने धनुर्ज्यामवमृज्य च ।
तलशब्दं महत् कृत्वा द्रोणस्तं समुपाद्रवत् ॥ ३६ ॥
तब द्रोणाचार्यने आँखें फाड़- फाड़कर देखते हुए धनुषकी डोरी साफ कर महान् टंकारघोष करके सिंहसेनपर आक्रमण किया ॥ ३६ ॥
ततस्तु सिंहसेनस्य शिरः कायात् सकुण्डलम् । व्याघ्रदत्तस्य चाक्रम्य भल्लाभ्यामाहरद् बली ॥ ३७ ॥
फिर बलवान् द्रोणने आक्रमणके साथ ही भल्ल नामक दो बाणोंद्वारा सिंहसेन और व्याघ्रदत्तके शरीरसे उनके कुण्डलमण्डित मस्तक काट डाले ॥ ३७ ॥
तान् प्रमथ्य शरव्रातैः पाण्डवानां महारथान् । युधिष्ठिररथाभ्याशे तस्थौ मृत्युरिवान्तकः ॥ ३८ ॥
इसके बाद पाण्डवोंके उन अन्य महारथियोंको भी अपने बाणसमूहोंसे मथित करके विनाशकारी यमराजके समान वे युधिष्ठिरके रथके समीप खड़े हो गये ॥ ३८ ॥
ततोऽभवन्महाशब्दो राजन् यौधिष्ठिरे बले ।
हतो राजेति योधानां समीपस्थे यतव्रते ॥ ३ ९ ॥
राजन्! नियम एवं व्रतका पालन करनेवाले द्रोणाचार्य युधिष्ठिरके बहुत निकट आ गये । तब उनकी सेनाके सैनिकोंमें महान् हाहाकार मच गया । सब लोग कहने लगे ' हाय, राजा मारे गये ' ॥ ३ ९ ॥
अब्रुवन् सैनिकास्तत्र दृष्ट्वा द्रोणस्य विक्रमम् ।
अद्य राजा धार्तराष्ट्रः कृतार्थो वै भविष्यति ॥ ४० ॥
वहाँ द्रोणाचार्यका पराक्रम देख कौरव- सैनिक कहने लगे, ' आज राजा दुर्योधन अवश्य कृतार्थ हो जायँगे ॥ ४० ॥
अस्मिन् मुहूर्ते द्रोणस्तु पाण्डवं गृह्य हर्षितः ।
आगमिष्याति नो नूनं धार्तराष्ट्रस्य संयुगे ॥ ४१ ॥
‘ इस मुहूर्तमें द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें निश्चय ही राजा युधिष्ठिरको पकड़कर बड़े हर्षके साथ हमारे राजा दुर्योधनके समीप ले आयेंगे' ॥ ४१ ॥
एवं संजल्पतां तेषां तावकानां महारथः ।
आयाज्जवेन कौन्तेयो रथघोषेण नादयन् ॥ ४२ ॥
राजन्! जब आपके सैनिक ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय उनके समक्ष कुन्तीनन्दन महारथी अर्जुन अपने रथकी घरघराहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े
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वेगसे आ पहुँचे ॥ ४२ ॥
शोणितोदां रथावर्तां कृत्वा विशसने नदीम् ।
शूरास्थिचयसंकीर्णां प्रेतकूलापहारिणीम् ॥ ४३ ॥
तां शरौघमहाफेनां प्रासमत्स्यसमाकुलाम् ।
नदीमुत्तीर्य वेगेन कुरून् विद्राव्य पाण्डवः ॥ ४४ ॥
ततः किरीटी सहसा द्रोणानीकमुपाद्रवत् । ये उस मार- काटसे भरे हुए संग्राममें रक्तकी नदी बहाकर आये थे । उसमें शोणित ही जल था । रथकी भँवरें उठ रही थीं । शूरवीरोंकी हड्डियाँ उसमें शिलाखण्डोंके समान बिखरी हुई थीं । प्रेतोंके कंकाल उस नदीके कूल- किनारे जान पड़ते थे, जिन्हें वह अपने वेगसे तोड़-फोड़कर बहाये लिये जाती थी । बाणोंके समुदाय उसमें फेनोंके बहुत बड़े ढेरके समान जान पड़ते थे । प्रास आदि शस्त्र उसमें मत्स्यके समान छाये हुए थे । उस नदीको वेगपूर्वक पार करके कौरव- सैनिकोंको भगाकर पाण्डुनन्दन किरीटधारी अर्जुनने सहसा द्रोणाचार्यकी सेनापर आक्रमण किया ॥ ४३-४४ ॥ छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव ॥ ४५ ॥
शीघ्रमभ्यस्यतो बाणान् संदधानस्य चानिशम् ।
नान्तरं ददृशे कश्चित् कौन्तेयस्य यशस्विनः ॥ ४६ ॥
वे अपने बाणोंके महान् समुदायसे द्रोणाचार्यको मोहमें डालते हुए - से आच्छादित करने लगे । यशस्वी कुन्तीकुमार अर्जुन इतनी शीघ्रताके साथ निरन्तर बाणोंको धनुषपर रखते