04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1501–1510
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1501–1510
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'तुझे ब्रह्महत्याका पाप लगा है । तुझ ब्रह्महत्यारेको देखकर लोग अपने प्रायश्चित्तके लिये सूर्यदेवका दर्शन करते हैं ॥ २१३ ॥
पाञ्चालक सुदुर्वृत्त ममैव गुरुमग्रतः ॥ २२ ॥
गुरोर्गुरुं च भूयोऽपि क्षिपन्नैव हि लज्जसे । 'दुराचारी पांचाल! तू मेरे आगे मेरे ही गुरु तथा मेरे गुरुके भी गुरुपर बारंबार आक्षेप कर रहा है, तो भी तुझे लज्जा नहीं आती ॥ २२ ॥
तिष्ठ तिष्ठ सहस्वैकं गदापातमिमं मम ॥ २३ ॥
तव चापि सहिष्येऽहं गदापाताननेकशः । ' खड़ा रह, खड़ा रह, मेरी गदाकी यह एक ही चोट सह ले, फिर मैं तेरी गदाकी भी अनेक चोटें सहन करूँगा ' ॥ २३३ ॥
सात्वतेनैवमाक्षिप्तः पार्षतः परुषाक्षरम् ॥ २४ ॥
संरब्धं सात्यकिं प्राह संक्रुद्धः प्रहसन्निव । सात्वतवंशी सात्यकिके इस प्रकार कठोर वचन कहकर आक्षेप करनेपर धृष्टद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे । फिर वे भी क्रोधमें भरे हुए सात्यकिसे हँसते हुए- से बोले ॥ धृष्टद्युम्नउवाच श्रूयते श्रूयते चेति क्षम्यते चेति माधव ॥ २५ ॥
सदानार्योऽशुभः साधुं पुरुषं क्षेप्तुमिच्छति । धृष्टद्युम्नने कहा – माधव! मैं तेरी यह बात सुनता हूँ, सुनता हूँ और इसके लिये तुझे क्षमा भी करता हूँ । दुष्ट और अनार्य पुरुष सदा साधु जनोंपर ऐसे ही आक्षेप करनेकी इच्छा रखते हैं ॥ २५ ॥
क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोऽर्हति क्षमाम् ॥ २६ ॥
क्षमावन्तं हि पापात्मा जितोऽयमिति मन्यते । यद्यपि लोकमें क्षमाभावकी प्रशंसा की जाती है, तथापि पापात्मा मनुष्य कभी क्षमाके योग्य नहीं है; क्योंकि क्षमा कर देनेपर वह पापात्मा क्षमाशील पुरुषको ऐसा समझ लेता है कि ' यह मुझसे हार गया ' ॥ २६३ ॥
स त्वं क्षुद्रसमाचारो नीचात्मा पापनिश्चयः ॥ २७ ॥
आकेशाग्रान्नखाग्राच्च वक्तव्यो वक्तुमिच्छसि । तू स्वयं ही दुराचारी, नीच और पापपूर्ण विचार रखनेवाला है । नखसे शिखातक पापमें डूबा होनेके कारण निन्दाके योग्य है, तथापि दूसरोंकी निन्दा करना चाहता है ॥ २७ ॥
यः स भूरिश्रवाश्छिन्नभुजः प्रायगतस्त्वया ॥ २८ ॥
वार्यमाणेन हि हतस्ततः पापतरं नु किम् ।
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भूरिश्रवाकी बाँह काट डाली गयी थी । वे आमरण उपवासका नियम लेकर चुपचाप बैठेहुए थे । उस दशामें सबके मना करनेपर भी जो तूने उनका वध किया, इससे बढ़कर महान् पापकर्म और क्या हो सकता है? ॥ २८३ ॥
गाहमानो मया द्रोणो दिव्येनास्त्रेण संयुगे ॥ २ ९ ॥ विसृष्टशस्त्रो निहतः किं तत्र क्रूर दुष्कृतम् । ओ क्रूर! मैंने तो पहलेसे ही युद्धके मैदानमें दिव्यास्त्रद्वारा द्रोणाचार्यको मथ डाला था । फिर वे हथियार डालकर मारे गये, तो उसमें मैंने कौन- सा पाप कर डाला ॥ २ ९ ॥ अयुध्यमानं यस्त्वाजौ तथा प्रायगतं मुनिम् ॥ ३० ॥
छिन्नबाहुं परैर्हन्यात् सात्यके स कथं वदेत् । सात्यके! जो युद्धस्थलमें मुनिवृत्तिका आश्रय ले आमरण उपवासका निश्चय लेकर बैठ गया हो, जो अपने साथ युद्ध न कर रहा हो तथा जिसकी बाँह भी शत्रुओंद्वारा काट डाली गयी हो, ऐसे पुरुषको जो मार सकता है, वह दूसरेकी निन्दा कैसे कर सकता है? ॥ निहत्य त्वां पदा भूमौ स विकर्षति वीर्यवान् ॥ ३१ ॥
किं तदा न निहंस्येनं भूत्वा पुरुषसत्तमः । जिस समय पराक्रमी भूरिश्रवा तुझे लातसे मारकर धरतीपर घसीट रहे थे, तूबड़ा श्रेष्ठ पुरुष था, तो उसी समय उन्हें क्यों नहीं मार डाला? ॥ ३१ ॥
त्वया पुनरनार्येण पूर्वं पार्थेन निर्जितः ॥ ३२ ॥
यदा तदा हतः शूरः सौमदत्तिः प्रतापवान् । जब अर्जुनने पहले ही प्रतापी शूरवीर सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाको परास्त कर दिया,
उस समय तूने उनका वध किया। तू कितना नीच है? ॥ ३२३ ॥
यत्र यत्र तु पाण्डूनां द्रोणो द्रावयते चमूम् ॥ ३३ ॥
किरन् शरसहस्राणि तत्र तत्र प्रयाम्यहम् । द्रोणाचार्य जहाँ - जहाँ पाण्डव - सेनाको खदेड़ते थे, वहीं- वहीं मैं जा पहुँचता और सहस्रों बाणोंकी वर्षा करके उनके छक्के छुड़ा देता था ॥ ३३३ ॥
स त्वमेवंविधं कृत्वा कर्म चाण्डालवत् स्वयम् ॥ ३४ ॥
वक्तुमर्हसि वक्तव्यः कस्मात् त्वं परुषाण्यथ । जब तू स्वयं ही चाण्डालके समान ऐसा पाप - कर्म करके निन्दाका पात्र बन गया है, तब दूसरेको कटु वचन सुनानेका कैसे अधिकारी हो सकता है? ॥ ३४३ ॥
कर्ता त्वं कर्मणो ह्यस्य नाहं वृष्णिकुलाधम ॥ ३५ ॥
पापानां च त्वमावासः कर्मणां मा पुनर्वद । वृष्णिकुलकलंक! तू ही ऐसे- ऐसे पाप करनेवाला और पाप कर्मोंका भण्डार है, मैं नहीं । अतः फिर ऐसी बातें मुँहसे न निकालना ॥ ३५३ ॥
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जोषमास्स्व न मां भूयो वक्तुमर्हस्यतः परम् ॥ ३६ ॥
अधरोत्तरमेतद्धि यन्मां त्वं वक्तुमर्हसि । चुपचाप बैठा रह; अब फिर ऐसी बातें तुझे नहीं कहनी चाहिये । तू मुझसे जो कुछ कहना चाहता है, वह तेरी बड़ी भारी नीचता है ॥ ३६३ ॥
अथ वक्ष्यसि मां मौर्य्याद् भूयः परुषमीदृशम् ॥ ३७ ॥
गमयिष्यामि बाणैस्त्वां युधि वैवस्वतक्षयम् । यदि मूर्खतावश तू पुनः मुझसे ऐसी कठोर बातें कहेगा, तो युद्धमें बाणोंद्वारा मैं अभी तुझे यमलोक भेज दूँगा ॥ न चैवं मूर्ख धर्मेण केवलेनैव शक्यते ॥ ३८ ॥
तेषामपि ह्यधर्मेण चेष्टितं शृणु यादृशम् । ओ मूर्ख! केवल धर्मसे ही युद्ध नहीं जीता जा सकता । उन कौरवोंकी भी जो अधर्मपूर्ण चेष्टाएँ हुई हैं, उन्हें सुन ले ॥ ३८३ ॥
वञ्चितः पाण्डवः पूर्वमधर्मेण युधिष्ठिरः ॥ ३ ९ ॥ द्रौपदी च परिक्लिष्टा तथाधर्मेण सात्यके । सात्यके! सबसे पहले पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको अधर्मपूर्वक छला गया । फिर अधर्मसे ही द्रौपदीको अपमानित किया गया ॥ ३ ९ ॥ प्रव्राजिता वनं सर्वे पाण्डवाः सह कृष्णया ॥ ४० ॥
सर्वस्वमपकृष्टं च तथाधर्मेण बालिश । ओ मूर्ख! समस्त पाण्डवोंको जो द्रौपदीके साथ वनमें भेज दिया गया और उनका सर्वस्व छीन लिया गया, वह भी अधर्मका ही कार्य था ॥ ४० ॥
अधर्मेणापकृष्टश्च मद्रराजः परेरितः ॥ ४१ ॥
अधर्मेण तथा बालः सौभद्रो विनिपातितः । शत्रुओंने अधर्मसे ही छलकर मद्रराज शल्यको अपने पक्षमें खींच लिया और सुभद्राके बालक पुत्र अभिमन्युको भी अधर्मसे ही मार डाला था ॥ ४१३३ ॥
इतोऽप्यधर्मेण हतो भीष्मः परपुरंजयः ॥ ४२ ॥
भूरिश्रवा ह्यधर्मेण त्वया धर्मविदा हतः । इस पक्षसे भी अधर्मके द्वारा ही शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्म मारे गये हैं और तू बड़ा धर्मज्ञ बनता है पर तूने भी अधर्मसे ही भूरिश्रवाका वध किया है ॥ एवं परैराचरितं पाण्डवेयैश्च संयुगे ॥ ४३ ॥
रक्षमाणैर्जयं वीरैर्धर्मज्ञैरपि सात्वत ।
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सात्वत! इस प्रकार धर्मके जाननेवाले वीर पाण्डवों तथा शत्रुओंने भी युद्धके मैदानमें अपनी विजयको सुरक्षित रखनेके लिये समय- समयपर अधर्मपूर्ण बर्ताव किया है ॥ ४३३ || दुर्ज्ञेयः स परो धर्मस्तथाधर्मश्च दुर्विदः ॥ ४४ ॥
युध्यस्व कौरवैः सार्धं मा गा पितृनिवेशनम् । उत्तम धर्मका स्वरूप जानना अत्यन्त कठिन है । अधर्म क्या है? इसे समझना भी सरल नहीं है । अब तू कौरवोंके साथ पूर्ववत् युद्ध कर | मुझसे विवाद करके पितृलोकमें जानेकी तैयारी न कर ॥ ४४ ॥
संजय उवाच एवमादीनि वाक्यानि क्रूराणि परुषाणि च ॥ ४५ ॥
श्रावितः सात्यकिः श्रीमानाकम्पित इवाभवत् ।
तच्छ्रुत्वा क्रोधताम्राक्षः सात्यकिस्त्वाददे गदाम् ॥ ४६ ॥
विनिःश्वस्य यथा सर्पः प्रणिधाय रथे धनुः ।
ततोऽभिपत्य पाञ्चाल्यं संरम्भेणेदमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
न त्वां वक्ष्यामि परुषं हनिष्ये त्वां वधक्षमम् । संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार कितने ही क्रूर एवं कठोर वचन धृष्टद्युम्नने श्रीमान् सात्यकिको सुनाये । उन्हें सुनकर वे क्रोधसे काँपने लगे । उनकी आँखें लाल हो गयीं तथा उन्होंने सर्पके समान लंबी साँस खींचकर धनुषको तो रथपर रख दिया और हाथमें गदा उठा ली । फिर वे धृष्टद्युम्नके पास पहुँचकर बड़े रोषके साथ इस प्रकार बोले — ‘ अब मैं तुझसे कठोर वचन नहीं कहूँगा । तू वधके ही योग्य है, अतः तुझे मार ही डालूँगा ॥ ४५— ४७ ॥ तमापतन्तं सहसा महाबलममर्षणम् ॥ ४८ ॥
पाञ्चाल्यायाभिसंक्रुद्धमन्तकायान्तकोपमम् ।
चोदितो वासुदेवेन भीमसेनो महाबलः ॥ ४ ९ ॥
अवप्लुत्य रथात् तूर्णं बाहुभ्यां समवारयत् । महाबली, अमर्षशील एवं अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए यमराज- तुल्य सात्यकि जब सहसा कालस्वरूप धृष्टद्युम्नकी ओर बढ़े, तब भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाबली भीमसेनने तुरंत ही रथसे कूदकर उन्हें दोनों हाथोंसे रोक लिया ॥ ४८-४९ ३ ॥ द्रवमाणं तथा क्रुद्धं सात्यकिं पाण्डवो बली ॥ ५० ॥
प्रस्पन्दमानमादाय जगाम बलिनं बलात् । क्रोधपूर्वक आगे बढ़ते और झपटते हुए बलवान् सात्यकिको महाबली पाण्डुपुत्र भीमने थामकर साथ- साथ चलना आरम्भ किया ॥ ५० ॥
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स्थित्वा विष्टभ्य चरणौ भीमेन शिनिपुङ्गवः ॥ ५१ ॥
निगृहीतः पदे षष्ठे बलेन बलिनां वरः । फिर भीमने खड़े होकर अपने दोनों पैर जमा दिये और बलवानोंमें श्रेष्ठ शिनिप्रवर सात्यकिको छठे कदमपर बलपूर्वक काबू में कर लिया ॥ ५१ ॥
अवरुह्य रथात् तूर्णं ध्रियमाणं बलीयसा ॥ ५२ ॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा सहदेवो विशाम्पते । प्रजानाथ! इतनेहीमें सहदेव भी तुरंत ही रथसे उतर पड़े और महाबली भीमसेनके द्वारा पकड़े गये सात्यकिसे मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले – ॥ ५२३ ॥
अस्माकं पुरुषव्याघ्र मित्रमन्यन्न विद्यते ॥ ५३ ॥
परमन्धकवृष्णिभ्यः पञ्चालेभ्यश्च मारिष ।
तथैवान्धकवृष्णीनां तथैव च विशेषतः ॥ ५४ ॥
कृष्णस्य च तथास्मत्तो मित्रमन्यन्न विद्यते । ‘ माननीय पुरुषसिंह! अन्धक और वृष्णिवंशके यादवों तथा पांचालोंसे बढ़कर दूसरा कोई हमलोगोंका मित्र नहीं है । इसी प्रकार अन्धक और वृष्णिवंशके लोगोंका तथा विशेषतः श्रीकृष्णका हमलोगोंसे बढ़कर दूसरा कोई मित्र नहीं है ॥ ५३-५४ ॥ पंचालानां च वार्ष्णेय समुद्रान्तां विचिन्वताम् ॥ ५५ ॥
नान्यदस्ति परं मित्रं यथा पाण्डववृष्णयः । ‘ वार्ष्णेय! पांचाल लोग भी यदि समुद्रतककी सारी पृथ्वी खोज डालें, तो भी उन्हें दूसरा कोई वैसा मित्र नहीं मिलेगा, जैसे उनके लिये पाण्डव और वृष्णिवंशके लोग हैं ॥ ५५३ ॥
स भवानीदृशं मित्रं मन्यते च यथा भवान् ॥ ५६ ॥
भवन्तश्च यथास्माकं भवतां च तथा वयम् । ' आप भी हमारे ऐसे ही मित्र हैं, जैसा कि आप स्वयं भी मानते हैं । आपलोग जैसे हमारे मित्र हैं, वैसे ही हम भी आपके हैं ॥ ५६ ॥
स एवं सर्वधर्मज्ञ मित्रधर्ममनुस्मरन् ॥ ५७ ॥
नियच्छ मन्युं पाञ्चाल्यात् प्रशाम्य शिनिपुङ्गव ।
पार्षतस्य क्षम त्वं वै क्षमतां पार्षतश्च ते ॥ ५८ ॥
वयं क्षमयितारश्च किमन्यत्र शमाद् भवेत् । ‘ सब धर्मोंके ज्ञाता शिनिप्रवर! इस प्रकार मित्रधर्मका विचार करके आप धृष्टद्युम्नकी ओरसे अपने क्रोधको रोकें और शान्त हो जायँ, आप धृष्टद्युम्नके और धृष्टद्युम्न आपके अपराधको क्षमा कर लें । हमलोग केवल क्षमा -प्रार्थना करनेवाले हैं; शान्तिसे बढ़कर श्रेष्ठ वस्तु और क्या हो सकती है? ' ॥ ५७-५८३ ॥ प्रशाम्यमाने शैनेये सहदेवेन मारिष ॥ ५ ९ ॥
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पाञ्चालराजस्य सुतः प्रहसन्निदमब्रवीत् । माननीय नरेश! जब सहदेव सात्यकिको इस प्रकार शान्त कर रहे थे, उस समय पांचालराजके पुत्रने हँसकर इस प्रकार कहा- ॥ ५ ९ ३ ॥ मुञ्च मुञ्च शिनेः पौत्रं भीम युद्धमदान्वितम् ॥ ६० ॥
आसादयतु मामेष धराधरमिवानिलः ।
यावदस्य शितैर्बाणैः संरम्भं विनयाम्यहम् ॥ ६१ ॥
युद्धश्रद्धां च कौन्तेय जीवितं चास्य संयुगे । ‘ भीमसेन! शिनिके इस पौत्रको अपने युद्ध - कौशलपर बड़ा घमंड है । तुम इसे छोड़ दो, छोड़ दो । जैसे हवा पर्वतसे आकर टकराती है, उसी प्रकार यह मुझसे आकर भिड़े तो सही । कुन्तीनन्दन! मैं अभी तीखे बाणोंसे इसका क्रोध उतार देता हूँ। साथ ही इसका युद्धका हौसला और जीवन भी समाप्त किये देता हूँ ॥ ६०-६१३ ॥ किं नु शक्यं मया कर्तुं कार्यं यदिदमुद्यतम् ॥ ६२ ॥
सुमहत् पाण्डुपुत्राणामायान्त्येते हि कौरवाः । ‘ परंतु मैं इस समय क्या कर सकता हूँ । पाण्डवोंका यह दूसरा ही महान् कार्य उपस्थित हो गया । ये कौरव बढ़े चले आ रहे हैं ॥ ६२ ॥
अथवा फाल्गुनः सर्वान् वारयिष्यति संयुगे ॥ ६३ ॥
अहमप्यस्य मूर्धानं पातयिष्यामि सायकैः ।
मन्यते छिन्नबाहुं मां भूरिश्रवसमाहवे ॥ ६४ ॥
उत्सृजैनमहं चैनमेष वा मां हनिष्यति । ‘ अथवा केवल अर्जुन युद्धके मैदानमें इन समस्त कौरवोंको रोकेंगे, तबतक मैं भी अपने बाणोंद्वारा इस सात्यकिका मस्तक काट गिराऊँगा। यह मुझे भी रणभूमिमें कटी हुई बाँहवाला भूरिश्रवा समझता है। तुम छोड़ दो इसे। या तो मैं इसे मार डालूँगा या यह मुझे ' || शृण्वन् पाञ्चालवाक्यानि सात्यकिः सर्पवच्छ्वसन् ॥ ६५ ॥
भीमबाह्वन्तरे सक्तो विस्फुरत्यनिशं बली । भीमसेनकी भुजाओंमें फँसे हुए बलवान् सात्यकि धृष्टद्युम्नकी बातें सुनकर फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचते हुए निरन्तर छूटनेकी चेष्टा कर रहे थे ॥ ६५३ ॥
तौ वृषाविव नर्दन्ती बलिनी बाहुशालिनौ ॥ ६६ ॥
त्वरया वासुदेवश्च धर्मराजश्च मारिष ।
यत्नेन महता वीरौ वारयामासतुस्ततः ॥ ६७ ॥
अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले वे दोनों वीर दो साँड़ोंके समान गरज रहे थे । माननीय नरेश! उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरने शीघ्रतापूर्वक महान् प्रयत्न करके उन दोनों वीरोंको रोका ॥ ६६-६७ ॥
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निवार्य परमेष्वासौ कोपसंरक्तलोचनौ ।
युयुत्सुनपरान् संख्ये प्रतीयुः क्षत्रियर्षभाः ॥ ६८ ॥
क्रोधसे लाल आँखें किये उन दोनों महान् धनुर्धरोंको रोककर वे क्षत्रियशिरोमणि वीर समरभूमिमें युद्धकी इच्छासे आते हुए शत्रुओंका सामना करनेके लिये चल दिये ॥ ६८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि धृष्टद्युम्नसात्यकि- क्रोधेऽष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृष्टद्युम्न और सात्यकिका क्रोधविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९८ ॥ Fard Pled
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नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः अश्वत्थामाके द्वारा नारायणास्त्रका प्रयोग, राजा युधिष्ठिरका खेद, भगवान् श्रीकृष्णके बताये हुए उपायसे सैनिकोंकी रक्षा, भीमसेनका वीरोचित उद्गार और उनपर उस अस्त्रका प्रबल आक्रमण संजय उवाच
ततः स कदनं चक्रे रिपूणां द्रोणनन्दनः ।
युगान्ते सर्वभूतानां कालसृष्ट इवान्तकः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! तदनन्तर द्रोणकुमार अश्वत्थामाने प्रलयकालमें कालसे प्रेरित हो समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाले यमराजके समान शत्रुओंका विनाश आरम्भ किया ॥ १ ॥
ध्वजद्रुमं शस्त्रशृङ्गं हतनागमहाशिलम् ।
अश्वकिम्पुरुषाकीर्णं शरासनलतावृतम् ॥ २ ॥
क्रव्यादपक्षिसंघुष्टं भूतयक्षगणाकुलम् ।
निहत्य शात्रवान् भल्लैः सोऽचिनोद् देहपर्वतम् ॥ ३ ॥
उसने शत्रु- सैनिकोंको भल्लोंसे मार-मारकर उनकी लाशोंका पहाड़ जैसा ढेर लगा दिया । ध्वजाएँ उस पहाड़के वृक्ष, शस्त्र उसके शिखर और मारे गये हाथी उसकी बड़ी - बड़ी शिलाओंके समान थे । घोड़े मानो उस पर्वतपर निवास करनेवाले किम्पुरुष थे । धनुष लताओंके समान फैलकर उसपर छाये हुए थे । मांसभक्षी जीव-जन्तु मानो वहाँ चहचहानेवाले पक्षी थे और भूतोंके समुदाय उसपर विहार करनेवाले यक्ष जान पड़ते थे ॥ २-३ ॥
ततो वेगेन महता विनद्य स नरर्षभः ।
प्रतिज्ञां श्रावयामास पुनरेव तवात्मजम् ॥४ ॥
नरश्रेष्ठ अश्वत्थामाने फिर बड़े वेगसे गर्जना करके आपके पुत्रको पुनः अपनी प्रतिज्ञा सुनायी ॥ ४ ॥
यस्माद् युध्यन्तमाचार्यं धर्मकञ्चुकमास्थितः ।
मुञ्च शस्त्रमिति प्राह कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ५ ॥
तस्मात् सम्पश्यतस्तस्य द्रावयिष्यामि वाहिनीम् ।
विद्राव्य सर्वान् हन्तास्मि जाल्मं पाञ्चाल्यमेव तु ॥ ६ ॥
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' धर्मका चोला पहने हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने युद्धपरायण आचार्यसे ' शस्त्र त्याग दीजिये' ऐसा कहा था और शस्त्र रखवा दिया; इसलिये मैं उसके देखते -देखते उनकी सारी सेनाको खदेड़ दूँगा और समस्त सैनिकोंको भगाकर उस नीच पांचालपुत्रको मार डालूँगा ॥
सर्वानेतान् हनिष्यामि यदि योत्स्यन्ति मां रणे ।
सत्यं ते प्रतिजानामि परिवर्तय वाहिनीम् ॥ ७ ॥
‘ यदि ये रणभूमिमें मेरे साथ युद्ध करेंगे तो मैं इन सबका वध कर डालूँगा, यह मैं तुमसे
सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ । अतः तुम अपनी सेनाको लौटाओ ' ॥ ७ ॥
तच्छ्रुत्वा तव पुत्रस्तु वाहिनीं पर्यवर्तयत् ।
सिंहनादेन महता व्यपोह्य सुमहद् भयम् ॥ ८ ॥
यह सुनकर आपके पुत्रने महान् सिंहनादके द्वारा अपनी सेनाका भारी भय दूर करके फिर उसे लौटाया ॥ ८ ॥
ततः समागमो राजन् कुरुपाण्डवसेनयोः ।
पुनरेवाभवत् तीव्रः पूर्णसागरयोरिव ॥ ९ ॥
राजन्! फिर भरे हुए दो महासागरोंके समान कौरव- पाण्डव- सेनाओंमें घोर संग्राम आरम्भ हो गया ॥
संरब्धा हि स्थिरीभूता द्रोणपुत्रेण कौरवाः ।
उदग्राः पाण्डुपञ्चाला द्रोणस्य निधनेन च ॥ १० ॥
द्रोणपुत्रसे आश्वासन पाकर कौरव- सैनिक स्थिर हो युद्धके लिये रोष और उत्साहमें भर गये थे । उधर द्रोणाचार्यके मारे जानेसे पाण्डव और पांचाल वीर पहलेसे ही उद्धत हो रहे थे ॥ १० ॥
तेषां परमहृष्टानां जयमात्मनि पश्यताम् ।
संरब्धानां महावेगः प्रादुरासीद् विशाम्पते ॥ ११ ॥
प्रजानाथ! वे अत्यन्त हर्षोत्फुल्ल होकर अपनी ही विजय देख रहे थे । रोषावेषमें भरे हुए उन सैनिकोंका महान् वेग प्रकट हुआ ॥ ११ ॥
यथा शिलोच्चये शैलः सागरे सागरो यथा ।
प्रतिहन्येत राजेन्द्र तथाऽऽसन् कुरुपाण्डवाः ॥ १२ ॥
राजेन्द्र! जैसे एक पहाड़ दूसरे पहाड़से टकरा जाय तथा एक समुद्र दूसरे समुद्रसे टक्कर ले, वही अवस्था कौरव- पाण्डव योद्धाओंकी भी थी ॥ १२ ॥
ततः शङ्खसहस्राणि भेरीणामयुतानि च ।
अवादयन्त संहृष्टाः कुरुपाण्डवसैनिकाः ॥ १३ ॥
तदनन्तर हर्षमग्न हुए कौरव- पाण्डव- सैनिक सहस्रों शंख और हजारों रणभेरियाँ बजाने लगे ॥ १३ ॥
यथा निर्मथ्यमानस्य सागरस्य तु निःस्वनः ।
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अभवत् तव सैन्यस्य सुमहानद्भुतोपमः ॥ १४ ॥
जैसे मथे जाते हुए समुद्रका महान् शब्द सब ओर गूँज उठा था, उसी प्रकार आपकी सेनाका महान् कोलाहल भी अद्भुत एवं अनुपम था ॥ १४ ॥
प्रादुश्चक्रे ततो द्रौणिरस्त्रं नारायणं तदा ।
अभिसंधाय पाण्डूनां पञ्चालानां च वाहिनीम् ॥ १५ ॥
प्रादुरासंस्ततो बाणा दीप्ताग्राः खे सहस्रशः ।
पाण्डवान् क्षपयिष्यन्तो दीप्तास्याः पन्नगा इव ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने पाण्डवों और पांचालोंकी सेनाको लक्ष्य करके नारायणास्त्र प्रकट किया । उससे आकाशमें हजारों बाण प्रकट हुए । उन सबके अग्रभाग प्रज्वलित हो रहे थे । वे सभी बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान आकर पाण्डव-सैनिकोंका विनाश करनेको उद्यत थे ॥ १५-१६ ॥
ते दिशः खं च सैन्यं च समावृण्वन् महाहवे ।
मुहूर्ताद् भास्करस्येव लोके राजन् गभस्तयः ॥ १७ ॥
राजन्! जैसे दो ही घड़ीमें सूर्यकी किरणें सारे संसारमें फैल जाती हैं, उसी प्रकार उस महासमरमें वे बाण सम्पूर्ण दिशाओं, आकाश और समस्त सेनाओंमें छा गये ॥ १७ ॥