04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1491–1500
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1491–1500
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सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनके वीरोचित उद्गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन संजय उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नोचुस्तत्र महारथाः ।
अप्रियं वा प्रियं वापि महाराज धनंजयम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — महाराज! अर्जुनकी यह बात सुनकर वहाँ बैठे हुए सब महारथी मौन रह गये । उनसे प्रिय या अप्रिय कुछ नहीं बोले ॥ १ ॥
ततः क्रुद्धो महाबाहुर्भीमसेनोऽभ्यभाषत ।
कुत्सयन्निव कौन्तेयमर्जुनं भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! तब महाबाहु भीमसेनको क्रोध चढ़ आया । उन्होंने कुन्तीकुमार अर्जुनको फटकारते हुए - से कहा ॥ २ ॥
मुनिर्यथारण्यगतो भाषसे धर्मसंहितम् ।
न्यस्तदण्डो यथा पार्थ ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ ३ ॥
‘ पार्थ! वनवासी मुनि अथवा किसी भी प्राणीको दण्ड न देते हुए कठोर व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण जिस प्रकार धर्मका उपदेश करता है, उसी प्रकार तुम भी धर्मसम्मत बातें कह रहे हो ॥ ३ ॥
क्षतत्राता क्षताज्जीवन् क्षन्ता स्त्रीष्वपि साधुषु ।
क्षत्रियः क्षितिमाप्नोति क्षिप्रं धर्मं यशः श्रियः ॥ ४ ॥
‘ परंतु जो क्षति ( संकट ) - से अपना तथा दूसरोंका त्राण करता है, युद्धमें शत्रुओंको क्षति पहुँचाना ही जिसकी जीविका है तथा जो स्त्रियों और साधु पुरुषोंपर क्षमाभाव रखता है, वही क्षत्रिय है और उसे ही शीघ्र इस पृथ्वीके राज्य, धर्म, यश और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती ॥ ४ ॥
स भवान् क्षत्रियगुणैर्युक्तः सर्वैः कुलोद्वहः ।
अविपश्चिद् यथा वाचं व्याहरन् नाद्य शोभसे ॥ ५ ॥
' तुम समस्त क्षत्रियोचित गुणोंसे सम्पन्न और इस कुलका भार वहन करनेमें समर्थ होते हुए भी आज मूर्खके समान बातें कर रहे हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता है ॥ ५ ॥
पराक्रमस्ते कौन्तेय शक्रस्येव शचीपतेः ।
न चाति वर्तसे धर्मं वेलामिव महोदधिः ॥ ६ ॥
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‘ कुन्तीनन्दन! तुम्हारा पराक्रम शचीपति इन्द्रके समान है । महासागर जैसे अपनी तट- भूमिका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार तुम भी कभी धर्म- मर्यादाका उल्लंघन नहीं करते हो ॥ ६ ॥
न पूजयेत् त्वां को न्वद्य यत् त्रयोदशवार्षिकम् ।
अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा धर्ममेवाभिकाङ्क्षसे ॥ ७ ॥
‘ आज तेरह वर्षोंसे संचित किये हुए अमर्षको पीछे करके जो तुम धर्मकी ही अभिलाषा रखते हो, इसके लिये कौन तुम्हारी पूजा नहीं करेगा? ॥ ७ ॥
दिष्ट्या तात मनस्तेऽद्य स्वधर्ममनुवर्तते ।
आनृशंस्ये च ते दिष्ट्या बुद्धिः सततमच्युत ॥ ८ ॥
‘ तात! सौभाग्यकी बात है कि इस समय भी तुम्हारा मन अपने धर्मका ही अनुसरण करता है । धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले मेरे भाई! तुम्हारी बुद्धि क्रूरताकी ओर न जाकर जो सदा दयाभावमें ही रम रही है, यह भी कम सौभाग्यकी बात नहीं है ॥ ८ ॥
यत् तु धर्मप्रवृत्तस्य हृतं राज्यमधर्मतः ।
द्रौपदी च परामृष्टा सभामानीय शत्रुभिः ॥ ९ ॥
वनं प्रव्राजिताश्चास्म वल्कलाजिनवाससः ।
अनर्हमाणास्तं भावं त्रयोदश समाः परैः ॥ १० ॥
‘ परंतु धर्ममें तत्पर रहनेपर भी जो शत्रुओंने अधर्मसे हमारा राज्य छीन लिया, द्रौपदीको सभामें लाकर अपमानित किया तथा हमें वल्कल और मृगचर्म पहनाकर तेरह वर्षोंके लिये जो वनमें निर्वासित कर दिया, हम वैसे बर्तावके योग्य कदापि नहीं थे ॥ ९-१० ॥
एतान्यमर्षस्थानानि मर्षितानि मयानघ ।
क्षत्रधर्मप्रसक्तेन सर्वमेतदनुष्ठितम् ॥ ११ ॥
‘ अनघ! ये सारे अन्याय अमर्षके स्थान थे - असह्य थे, परंतु मैंने सब चुपचाप सह लिये । क्षत्रिय - धर्ममें आसक्त होनेके कारण ही यह सब कुछ सहन किया गया है ॥ ११ ॥
तमधर्ममपाकृष्टं स्मृत्वाद्य सहितस्त्वया ।
सानुबन्धान् हनिष्यामि क्षुद्रान् राज्यहरानहम् ॥ १२ ॥
‘ परंतु अब उनके उन नीचतापूर्ण पापकर्मोंको याद करके मैं तुम्हारे साथ रहकर अपने राज्यका अपहरण करनेवाले इन नीच शत्रुओंको उनके सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा ॥ १२ ॥
त्वया हि कथितं पूर्वं युद्धायाभ्यागता वयम् ।
घटामहे यथाशक्ति त्वं तु नोऽद्य जुगुप्ससे ॥ १३ ॥
' तुमने ही पहले युद्धके लिये कहा था और उसीके अनुसार हम यहाँ आकर यथाशक्ति उसके लिये प्रयत्न कर रहे हैं, परंतु आज तुम्हीं हमारी निन्दा करते हो! ॥ १३ ॥
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स्वधर्मं नेच्छसे ज्ञातुं मिथ्यावचनमेव ते ।
भयार्दितानामस्माकं वाचा मर्माणि कृन्तसि ॥ १४ ॥
' तुम अपने क्षत्रिय - धर्मको नहीं जानना चाहते । तुम्हारी ये सारी बातें मिथ्या ही हैं । एक तो हम स्वयं ही भयसे पीड़ित हो रहे हैं, ऊपरसे तुम भी अपने वाग्बाणोंद्वारा हमारे मर्मस्थानोंको छेदे डालते हो ॥
वपन् व्रणे क्षारमिव क्षतानां शत्रुकर्शन ।
विदीर्यते मे हृदयं त्वया वाक्शल्यपीडितम् ॥ १५ ॥
'शत्रुसूदन! जैसे कोई घायल मनुष्योंके घावपर नमक बिखेर दे ( और वे वेदनासे छटपटाने लगें ), उसी प्रकार तुम अपने वाग्बाणोंसे पीड़ित करके मेरे हृदयको विदीर्ण किये डालते हो ॥ १५ ॥
अधर्ममेनं विपुलं धार्मिकः सन् न बुद्ध्यसे ।
यत् त्वमात्मानमस्मांश्च प्रशस्यान् न प्रशंससि ॥ १६ ॥
‘ यद्यपि तुम और हम प्रशंसाके पात्र हैं, तो भी तुम जो अपनी और हमारी प्रशंसा नहीं करते हो, यह बहुत बड़ा अधर्म है और तुम धार्मिक होते हुए इस अधर्मको नहीं समझ रहे हो ॥ १६
वासुदेवे स्थिते चापि द्रोणपुत्रं प्रशंससि ।
यः कलां षोडशीं पूर्णां धनंजय न तेऽर्हति ॥ १७ ॥
‘ धनंजय! भगवान् श्रीकृष्णके रहते हुए भी तुम द्रोणपुत्रकी प्रशंसा करते हो, जो तुम्हारी पूरी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है ॥ १७ ॥
स्वयमेवात्मनो दोषान् ब्रुवाणः किन्न लज्जसे ।
दारयेयं महीं क्रोधाद् विकिरेयं च पर्वतान् ॥ १८ ॥
आविध्यैतां गदां गुर्वी भीमां काञ्चानमालिनीम् ।
गिरिप्रकाशान् क्षितिजान् भञ्जेयमनिलो यथा ॥ १ ९ ॥
' स्वयं ही अपने दोषोंका वर्णन करते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती है? आज मैं अपनी इस सुवर्णभूषित भयंकर एवं भारी गदाको क्रोधपूर्वक घुमाकर इस पृथ्वीको विदीर्ण कर सकता हूँ, पर्वतोंको चूर-चूर करके बिखेर सकता हूँ तथा प्रचण्ड आँधीकी तरह पर्वतपर प्रकाशित होनेवाले ऊँचे -ऊँचे वृक्षोंको भी तोड़ और उखाड़ सकता हूँ ॥ १८-१९ ॥
द्रावयेयं शरैश्चापि सेन्द्रान् देवान् समागतान् ।
सराक्षसगणान् पार्थ सासुरोरगमानवान् ॥ २० ॥
‘ पार्थ! असुर, नाग, मानव तथा राक्षसगणोंसहित सम्पूर्ण देवता और इन्द्र भी आ जायँ तो मैं उन्हें बाणोंद्वारा मारकर भगा सकता हूँ ॥ २० ॥
स त्वमेवंविधं जानन् भ्रातरं मां नरर्षभ ।
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द्रोणपुत्राद् भयं कर्तुं नार्हस्यमितविक्रम ॥ २१ ॥
‘ अमित पराक्रमी नरश्रेष्ठ अर्जुन! मुझ अपने भ्राताको ऐसा जानकर तुम्हें द्रोणपुत्रसे भय नहीं करना चाहिये ॥ २१ ॥
अथवा तिष्ठ बीभत्सो सह सर्वैः सहोदरैः ।
अहमेनं गदापाणिर्जेष्याम्येको महाहवे ॥ २२ ॥
‘ अथवा अर्जुन! तुम अपने समस्त भाइयोंके साथ यहीं खड़े रहो । मैं हाथमें गदा लेकर इस महासमरमें अकेला ही अश्वत्थामाको परास्त करूँगा ' ॥ २२ ॥
ततः पाञ्चालराजस्य पुत्रः पार्थमथाब्रवीत् ।
संक्रुद्धमिव नर्दन्तं हिरण्यकशिपुर्हरिम् ॥ २३ ॥
तदनन्तर जैसे पूर्वकालमें अत्यन्त क्रुद्ध होकर दहाड़ते हुए नृसिंहावतारधारी भगवान् विष्णुसे दैत्यराज हिरण्यकशिपुने बातें की थी, उसी प्रकार वहाँ अर्जुनसे पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने इस प्रकार कहा ॥ २३ ॥
धृष्टद्युम्नउवाच
बीभत्सो विप्रकर्माणि विदितानि मनीषिणाम् ।
याजनाध्यापने दानं तथा यज्ञप्रतिग्रहौ ॥ २४ ॥
षष्ठमध्ययनं नाम तेषां कस्मिन् प्रतिष्ठितः ।
तो द्रोणो मया ह्येवं किं मां पार्थ विगर्हसे ॥ २५ ॥
अपक्रान्तः स्वधर्माच्च क्षात्रधर्मं व्यपाश्रितः ।
अमानुषेण हन्त्यस्मानस्त्रेण क्षुद्रकर्मकृत् ॥ २६ ॥
धृष्टद्युम्न बोला- ' अर्जुन! यज्ञ करना और कराना, वेदोंको पढ़ना और पढ़ाना तथा दान देना और प्रतिग्रह स्वीकार करना - ये छः कर्म ही ब्राह्मणोंके लिये मनीषी पुरुषोंमें प्रसिद्ध हैं । इनमेंसे किस कर्ममें द्रोणाचार्य प्रतिष्ठित थे । अपने धर्मसे भ्रष्ट होकर उन्होंने क्षत्रिय - धर्मका आश्रय ले रखा था । पार्थ! ऐसी अवस्थामें यदि मैंने द्रोणाचार्यका वध किया तो तुम इसके लिये मेरी निन्दा क्यों करते हो । वह नीच कर्म करनेवाला ब्राह्मण दिव्यास्त्रोंद्वारा हमलोगोंका संहार करता था ॥ २४–२६ ॥
तथा मायां प्रयुञ्चानमसह्यं ब्राह्मणब्रुवम् ।
माययैव विहन्याद् यो न युक्तं पार्थ तत्र किम् ॥ २७ ॥
कुन्तीनन्दन! जो ब्राह्मण कहलाकर भी दूसरोंके लिये मायाका प्रयोग करता हो और असह्य हो उठा हो, उसे यदि कोई मायासे ही मार डाले तो इसमें अनुचित क्या है? ॥ २७ ॥
तस्मिंस्तथा मया शस्ते यदि द्रौणायनी रुषा ।
कुरुते भैरवं नादं तत्र किं मम हीयते ॥ २८ ॥
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मेरे द्वारा द्रोणाचार्यके इस अवस्थामें मारे जानेपर यदि द्रोणपुत्र क्रोधपूर्वक भयानक गर्जना करता हो तो उसमें मेरी क्या हानि है? ॥ २८ ॥
न चाद्भुतमिदं मन्ये यद् द्रौणिर्युद्धसंज्ञया ।
घातयिष्यति कौरव्यान् परित्रातुमशक्नुवन् ॥ २ ९ ॥
मैं इसे कोई अद्भुत बात नहीं मान रहा हूँ; अश्वत्थामा इस युद्धके द्वारा कौरवोंको मरवा डालेगा; क्योंकि वह स्वयं उनकी रक्षा करनेमें असमर्थ है ॥ २ ९ ॥
यच्च मां धार्मिको भूत्वा ब्रवीषि गुरुघातिनम् ।
तदर्थमहमुत्पन्नः पाञ्चाल्यस्य सुतोऽनलात् ॥ ३० ॥
इसके सिवा तुम धार्मिक होकर जो मुझे गुरुकी हत्या करनेवाला बता रहे हो, वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि मैं इसीलिये अग्निकुण्डसे पांचालराजका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ था ॥ ३० ॥
यस्य कार्यमकार्यं वा युध्यतः स्यात् समं रणे ।
तं कथं ब्राह्मणं ब्रूयाः क्षत्रियं वा धनंजय ॥ ३१ ॥
धनंजय! रणभूमिमें युद्ध करते समय जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों समान हों, उसे तुम ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय कैसे कह सकते हो? ॥ ३१ ॥
यो ह्यनस्त्रविदो हन्याद् ब्रह्मास्त्रैः क्रोधमूर्च्छितः ।
सर्वोपायैर्न स कथं वध्यः पुरुषसत्तम ॥ ३२ ॥
पुरुषप्रवर! जो क्रोधसे व्याकुल होकर ब्रह्मास्त्र न जाननेवालोंको भी ब्रह्मास्त्रसे ही मार डाले, उसका सभी उपायोंसे वध करना कैसे उचित नहीं है? ॥ ३२ ॥
विधर्मिणं धर्मविद्भिः प्रोक्तं तेषां विषोपमम् ।
जानन् धर्मार्थतत्त्वज्ञ किं मामर्जुन गर्हसे ॥ ३३ ॥
धर्म और अर्थका तत्त्व जाननेवाले अर्जुन! जो अपना धर्म छोड़कर परधर्म ग्रहण कर लेता है, उस विधर्मीको धर्मज्ञ पुरुषोंने धर्मात्माओंके लिये विषके तुल्य बताया है । यह सब जानते हुए भी तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो? ॥ ३३ ॥
नृशंसः स मयाऽऽक्रम्य रथ एव निपातितः ।
तन्मामनिन्द्यं बीभत्सो किमर्थं नाभिनन्दसे ॥ ३४ ॥
बीभत्सो! द्रोणाचार्य क्रूर एवं नृशंस थे, इसलिये मैंने रथपर ही आक्रमण करके उनको मार गिराया । अतः मैं निन्दाका पात्र नहीं हूँ। फिर तुम किसलिये मेरा अभिनन्दन नहीं करते हो? ॥ ३४ ॥
कालानलसमं पार्थ ज्वलनार्कविषोपमम् ।
भीमं द्रोणशिरश्छिन्नं न प्रशंससि मे कथम् ॥ ३५ ॥
पार्थ! द्रोणका मस्तक प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त भयंकर तथा लौकिक अग्नि, सूर्य एवं विषके तुल्य संताप देनेवाला था, अतः मैंने उसका छेदन किया है । इसके
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लियेतुम मेरी प्रशंसा क्यों नहीं करते? ॥ ३५ ॥
योऽसौ ममैव नान्यस्य बान्धवान् युधि जघ्निवान् ।
छित्त्वापि तस्य मूर्धानं नैवास्मि विगतज्वरः ॥ ३६ ॥
जिसने युद्धके मैदानमें दूसरे किसीके नहीं, मेरे ही बन्धु बान्धवोंका वध किया था, उसका मस्तक काट लेनेपर भी मेरा क्रोध और संताप शान्त नहीं हुआ ॥ ३६ ॥
तच्च मे कृन्तते मर्म यन्न तस्य शिरो मया ।
निषादविषये क्षिप्तं जयद्रथशिरो यथा ॥ ३७ ॥
जैसे तुमने जयद्रथके मस्तकको दूर फेंका था, उसी प्रकार मैंने द्रोणाचार्यके मस्तकको जो निषादोंके स्थानमें नहीं फेंक दिया, वह भूल मेरे मर्मस्थानोंका छेदन कर रही है ॥
अथावधश्च शत्रूणामधर्मः श्रूयतेऽर्जुन ।
क्षत्रियस्य हि धर्मोऽयं हन्याद्धन्येत वा पुनः ॥ ३८ ॥
अर्जुन! सुननेमें आया है कि शत्रुओंका वध न करना भी अधर्म ही है । क्षत्रियके लिये तो यह धर्म ही है कि वह युद्धमें शत्रुको मार डाले या फिर स्वयं उसके हाथसे मारा जाय ॥ ३८ ॥
स शत्रुर्निहतः संख्ये मया धर्मेण पाण्डव ।
यथा त्वया हतः शूरो भगदत्तः पितुः सखा ॥ ३ ९ ॥
पाण्डुनन्दन! द्रोणाचार्य मेरे शत्रु थे, अतः मैंने युद्धमें धर्मके अनुसार ही उनका वध किया है । ठीक उसी तरह, जैसे तुमने अपने पिताके प्रिय मित्र शूरवीर भगदत्तका वध किया था ॥ ३ ९ ॥
पितामहं रणे हत्वा मन्यसे धर्ममात्मनः ।
मया शत्रौ हते कस्मात् पापे धर्मं न मन्यसे ॥ ४० ॥
तुम युद्धमें पितामहको मारकर भी अपने लिये तो धर्म ही मानते हो, किंतु मेरे द्वारा एक पापी शत्रुके मारे जानेपर भी इस कार्यको धर्म नहीं समझते; इसका क्या कारण है? ॥
सम्बन्धावनतं पार्थ न मां त्वं वक्तुमर्हसि ।
स्वगात्रकृतसोपानं निषण्णमिव दन्तिनम् ॥ ४१ ॥
पार्थ! जैसे हाथी सम्बन्ध स्थापित कर लेनेपर लोगोंको अपने ऊपर चढ़ानेके लिये अपने ही शरीरकी सीढ़ी बनाकर बैठ जाता है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ सम्बन्ध होनेके कारण नतमस्तक होता हूँ; अतः तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिये ॥ ४१ ॥
क्षमामि ते सर्वमेव वाग्व्यतिक्रममर्जुन ।
द्रौपद्या द्रौपदेयानां कृते नान्येन हेतुना ॥ ४२ ॥
अर्जुन! मैं अपनी बहिन द्रौपदी और उसके पुत्रोंके नाते ही तुम्हारी इन सारी उलटी या कड़वी बातोंको सहे लेता हूँ, दूसरे किसी कारणसे नहीं ॥ ४२ ॥
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कुलक्रमागतं वैरं ममाचार्येण विश्रुतम् ।
तथा जानात्ययं लोको न यूयं पाण्डुनन्दनाः ॥ ४३ ॥
द्रोणाचार्यके साथ मेरा वंशपरम्परागत वैर चला आ रहा है, जो बहुत प्रसिद्ध है । उसे यह सारा संसार जानता है; क्या तुम पाण्डवोंको इसका पता नहीं है? ॥ ४३ ॥
नानृती पाण्डवो ज्येष्ठो नाहं वाधार्मिकोऽर्जुन ।
शिष्यद्रोही हतः पापो युध्यस्व विजयस्तव ॥ ४४ ॥
अर्जुन! तुम्हारे बड़े भाई पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर असत्यवादी नहीं हैं और न मैं ही अधर्मी हूँ । द्रोणाचार्य पापी और शिष्यद्रोही थे, इसलिये मारे गये । अब तुम युद्ध करो; विजय तुम्हारे हाथमें है ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि धृष्टद्युम्नवाक्ये सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृष्टद्युम्नवाक्यविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १ ९७ ॥
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अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण धृतराष्ट्रउवाच
साङ्गा वेदा यथान्यायं येनाधीता महात्मना ।
यस्मिन् साक्षाद् धनुर्वेदो ह्रीनिषेवे प्रतिष्ठितः ॥ १ ॥
यस्य प्रसादात् कुर्वन्ति कर्माणि पुरुषर्षभाः ।
अमानुषाणि संग्रामे देवैरसुकराणि च ॥ २ ॥
तस्मिन्नाक्रुश्यति द्रोणे समक्षं पापकर्मणा ।
नीचात्मना नृशंसेन क्षुद्रेण गुरुघातिना ॥ ३ ॥
नामर्षं तत्र कुर्वन्ति धिक् क्षात्रं धिगमर्षिताम् । धृतराष्ट्र बोले- संजय! जिन महात्माने विधिपूर्वक अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया था, जिन लज्जाशील सत्पुरुषमें साक्षात् धनुर्वेद प्रतिष्ठित था, जिनके कृपाप्रसादसे कितने ही पुरुषरत्न योद्धा संग्रामभूमिमें ऐसे - ऐसे अलौकिक पराक्रम कर दिखाते थे, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर थे; उन्हीं द्रोणाचार्यकी वह पापी, नीच, नृशंस, क्षुद्र और गुरुघाती धृष्टद्युम्न सबके सामने निन्दा कर रहा था और लोग क्रोध नहीं प्रकट करते थे । धिक्कार है ऐसे क्षत्रियोंको! और धिक्कार है उनके अमर्षशील स्वभावको!! ॥ १ -३३ ॥ पार्थाः सर्वे च राजानः पृथिव्यां ये धनुर्धराः ॥ ४ ॥
श्रुत्वा किमाहुः पाञ्चाल्यं तन्ममाचक्ष्य संजय । संजय! भूमण्डलके जो- जो धनुर्धर नरेश वहाँ उपस्थित थे, उन सबने तथा कुन्तीके पुत्रोंने धृष्टद्युम्नकी बात सुनकर उससे क्या कहा? यह मुझे बताओ ॥ ४३ ॥
संजय उवाच श्रुत्वा द्रुपदपुत्रस्य ता वाचः क्रूरकर्मणः ॥ ५ ॥
तूष्णीं बभूवू राजानः सर्व एव विशाम्पते ।
अर्जुनस्तु कटाक्षेण जिह्मं विप्रेक्ष्य पार्षतम् ॥ ६ ॥
सबाष्पमतिनिःश्वस्य धिग् धिगित्येव चाब्रवीत् । संजयने कहा — प्रजानाथ! क्रूरकर्मा द्रुपदपुत्रकी वे बातें सुनकर वहाँ बैठे हुए सभी नरेश मौन रह गये । केवल अर्जुन टेढ़ी नजरोंसे उसकी ओर देखकर आँसू बहाते हुए दीर्घ
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निःश्वास ले इतना ही बोले कि— ' धिक्कार है! धिक्कार है!! ' ॥ ५-६३ ॥ युधिष्ठिरश्च भीमश्च यमौ कृष्णस्तथापरे ॥ ७ ॥
आसन् सुव्रीडिता राजन् सात्यकिस्त्वब्रवीदिदम् । राजन्! उस समय युधिष्ठिर, भीमसेन, नकुल, सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य लोग भी अत्यन्त लज्जित हो चुप ही बैठे रहे, परंतु सात्यकि इस प्रकार बोल उठे – ॥ ७३ || नेहास्ति पुरुषः कश्चिद् य इमं पापपूरुषम् ॥ ८ ॥
भाषमाणमकल्याणं शीघ्रं हन्यान्नराधमम् । ‘ क्या यहाँ कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो इस प्रकार अभद्रतापूर्ण वचन बोलनेवाले इस पापी नराधमको शीघ्र ही मार डाले ॥ ८३ ॥
एते त्वां पाण्डवाः सर्वे कुत्सयन्ति विकुत्सया ॥ ९ ॥
कर्मणा तेन पापेन श्वपाकं ब्राह्मणा इव । ' धृष्टद्युम्न! जैसे ब्राह्मण चाण्डालकी निन्दा करते हैं, उसी प्रकार ये समस्त पाण्डव उस पाप कर्मके कारण अत्यन्त घृणा प्रकट करते हुए तेरी निन्दा कर रहे हैं ॥ ९ ३ ॥ एतत् कृत्वा महत् पापं निन्दितः सर्वसाधुभिः ॥ १० ॥
न लज्जसे कथं वक्तुं समितिं प्राप्य शोभनाम् ।
कथं च शतधा जिह्वा न ते मूर्धा च दीर्यते ॥ ११ ॥
गुरुमाक्रोशतः क्षुद्र न चाधर्मेण पात्यसे । ‘ यह महान् पाप करके तू समस्त श्रेष्ठ पुरुषोंकी दृष्टिमें निन्दाका पात्र बन गया है । साधु पुरुषोंकी इस सुन्दर सभामें पहुँचकर ऐसी बातें करते हुए तुझे लज्जा कैसे नहीं आती है? तेरी जीभके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते और तेरा मस्तक क्यों नहीं फट जाता? ओ नीच! गुरुकी निन्दा करते हुए तेरा इस पापसे पतन क्यों नहीं हो जाता? ॥ १०-११३ ॥ वाच्यस्त्वमसि पार्थैश्च सर्वैश्चान्धकवृष्णिभिः ॥ १२ ॥
यत् कर्म कलुषं कृत्वा श्लाघसे जनसंसदि । ‘ तू पापकर्म करके जनसमाजमें जो इस तरह अपनी बड़ाई कर रहा है, इसके कारण तू कुन्तीके सभी पुत्रों तथा अन्धक और वृष्णिवंशके यादवोंद्वारा निन्दाके योग्य हो गया है ॥ १२३ ॥
अकार्यं तादृशं कृत्वा पुनरेव गुरुं क्षिपन् ॥ १३ ॥
वध्यस्त्वं न त्वयार्थोऽस्ति मुहूर्तमपि जीवता । ‘ वैसा पापकर्म करके तू पुनः गुरुपर आक्षेप कर रहा है; अतः तू वध करनेके ही योग्य है । एक मुहूर्त भी तेरे जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है ॥ १३३ ॥
कस्त्वेतद् व्यवसेदार्यस्त्वदन्यः पुरुषाधम ॥ १४ ॥
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निगृह्य केशेषु वधं गुरोर्धर्मात्मनः सतः । ‘ पुरुषाधम! तेरे सिवा दूसरा कौन श्रेष्ठ पुरुष धर्मात्मा सज्जन गुरुके केश पकड़कर उनके वधका विचार भी मनमें लायेगा ॥ १४ ॥
सप्तावरे तथा पूर्वे बान्धवास्ते निमज्जिताः ॥ १५ ॥
यशसा च परित्यक्तास्त्वां प्राप्य कुलपांसनम् । ‘ तुझ - जैसे कुलांगारको पाकर तेरे सात पीढ़ी पहलेके और सात पीढ़ी आगे होनेवाले बन्धु - बान्धव नरकमें डूब गये तथा सदाके लिये सुयशसे वंचित हो गये ॥ १५३ ॥
उक्तवांश्चापि यत् पार्थे भीष्मं प्रति नरर्षभम् ॥ १६ ॥
तथान्तो विहितस्तेन स्वयमेव महात्मना । तूने जो कुन्तीकुमार अर्जुनपर नरश्रेष्ठ भीष्मके वधका दोष लगाया है, वह भी व्यर्थ ही है; क्योंकि महात्मा भीष्मने स्वयं ही उसी प्रकार अपनी मृत्युका विधान किया था ॥ १६३ || तस्यापि तव सोदर्यो निहन्ता पापकृत्तमः ॥ १७ ॥
नान्यः पाञ्चाल्यपुत्रेभ्यो विद्यते भुवि पापकृत् । ‘ वास्तवमें भीष्मका वध करनेवाला भी तेरा महान् पापाचारी भाई ही है । इस पृथ्वीपर पांचालराजके पुत्रोंके सिवा दूसरा कोई ऐसा पाप करनेवाला नहीं है ॥ १७३ ॥
स चापिसृष्टः पित्रा ते भीष्मस्यान्तकरः किल ॥ १८ ॥
शिखण्डी रक्षितस्तेन स च मृत्युर्महात्मनः । ‘ यह प्रसिद्ध है कि उसे भी तेरे पिताने भीष्मका अन्त करनेके लिये उत्पन्न किया था; उन्होंने महात्मा भीष्मकी मूर्तिमान् मृत्युके रूपमें ही शिखण्डीको सुरक्षित रखा था ॥ १८३ || पञ्चालाश्चलिता धर्मात् क्षुद्रा मित्रगुरुद्रुहः ॥ १ ९ ॥ त्वां प्राप्य सहसोदर्यं धिक्कृतं सर्वसाधुभिः । ' तू और तेरा भाई दोनों समस्त साधु पुरुषोंके धिक्कारके पात्र हैं । तुम दोनोंको पाकर सारे पांचाल धर्मभ्रष्ट, नीच, मित्रद्रोही तथा गुरुद्रोही बन गये हैं ॥ पुनश्चेदीदृशीं वाचं मत्समीपे वदिष्यसि ॥ २० ॥
शिरस्ते पोथयिष्यामि गदया वज्रकल्पया । ‘यदि तू पुनः मेरे समीप ऐसी बात बोलेगा तो मैं अपनी इस वज्रतुल्य गदासे तेरा सिर कुचल दूँगा ॥ त्वां च ब्रह्महणं दृष्ट्वा जनः सूर्यमवेक्षते ॥ २१ ॥
ब्रह्महत्या हि ते पापं प्रायश्चित्तार्थमात्मनः ।