04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1521–1530
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1521–1530
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माननीय नरेश! भीमसेन तथा उनके रथ, घोड़े और सारथि -ये सभी अश्वत्थामाके अस्त्रसे आच्छादित हो आगकी लपटोंके भीतर आ गये थे ॥ ५ ॥
यथा दग्ध्वा जगत् कृत्स्नं समये सचराचरम् ।
गच्छेद् वह्निर्विभोरास्यं तथास्त्रं भीममावृणोत् ॥ ६ ॥
जैसे प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण जगत्को भस्म करके परमात्माके मुखमें प्रवेश कर जाती है, उसी प्रकार उस अस्त्रने भीमसेनको चारों ओरसे ढक लिया था ॥ ६ ॥
सूर्यमग्निः प्रविष्टः स्याद् यथा चाग्निं दिवाकरः ।
तथा प्रविष्टं तत् तेजो न प्राज्ञायत पाण्डवः ॥ ७ ॥
जैसे सूर्यमें अग्नि और अग्निमें सूर्य प्रविष्ट हुए हों, उसी प्रकार उस अस्त्रका तेज तेजस्वी भीमसेनपर छा गया था; इसलिये पाण्डुपुत्र भीमसेन किसीको दिखायी नहीं पड़ते थे ॥ ७ ॥
विकीर्णमस्त्रं तद् दृष्ट्वा तथा भीमरथं प्रति ।
उदीर्यमाणं द्रौणिं च निष्प्रतिद्वन्द्वमाहवे ॥ ८ ॥
सर्वसैन्यं च पाण्डूनां न्यस्तशस्त्रमचेतनम् ।
युधिष्ठिरपुरोगांश्च विमुखांस्तान् महारथान् ॥ ९ ॥
अर्जुनो वासुदेवश्च त्वरमाणौ महाद्युती ।
अवप्लुत्य रथाद् वीरौ भीममाद्रवतां ततः ॥ १० ॥
वह अस्त्र भीमसेनके रथपर छा गया था । युद्धस्थलमें कोई प्रतिद्वन्द्वी योद्धा न होनेसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामा प्रबल होता जा रहा था । पाण्डवोंकी सारी सेना हथियार डालकर ( भयसे ) अचेत हो गयी थी और युधिष्ठिर आदि महारथी युद्धसे विमुख हो गये थे । यह सब देखकर महातेजस्वी अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों वीर बड़ी उतावलीके साथ रथसे कूदकर भीमसेनकी ओर दौड़े ॥ ८–१० ॥
ततस्तद् द्रोणपुत्रस्य तेजोऽस्त्रबलसम्भवम् ।
विगाह्य तौ सुबलिनौ माययाऽऽविशतां तथा ॥ ११ ॥
वहाँ पहुँचकर वे दोनों अत्यन्त बलवान् वीर द्रोणपुत्रकी अस्त्र - शक्तिसे प्रकट हुई उस आगमें घुसकर मायाद्वारा उसमें प्रविष्ट हो गये ॥ ११ ॥
न्यस्तशस्त्रौ ततस्तौ तु नादहत् सोऽस्त्रजोऽनलः ।
वारुणास्त्रप्रयोगाच्च वीर्यवत्वाच्च कृष्णयोः ॥ १२ ॥
उन दोनोंने अपने हथियार रख दिये थे, वारुणास्त्रका प्रयोग किया था तथा वे दोनों कृष्ण अधिक शक्तिशाली थे; इसलिये वह अस्त्रजनित अग्नि उन्हें चला न सकी ॥ १२ ॥
ततश्चकृषतुर्भीमं सर्वशस्त्रायुधानि च ।
नारायणास्त्रशान्त्यर्थं नरनारायणौ बलात् ॥ १३ ॥
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तदनन्तर नर- नारायणस्वरूप अर्जुन और श्रीकृष्णने उस नारायणास्त्रकी शान्तिके लिये भीमसेनको और उनके सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंको बलपूर्वक रथसे नीचे खींचा ॥
आकृष्यमाणः कौन्तेयो नदत्येव महारवम् ।
वर्धते चैव तद् घोरं द्रौणेरस्त्रं सुदुर्जयम् ॥ १४ ॥
खींचे जाते समय कुन्तीकुमार भीमसेन और भी जोर - जोर से गर्जना करने लगे । इससे अश्वत्थामाका वह परम दुर्जय घोर अस्त्र और भी बढ़ने लगा ॥ १४ ॥
तमब्रवीद् वासुदेवः किमिदं पाण्डुनन्दन ।
वार्यमाणोऽपि कौन्तेय यद् युद्धान्न निवर्तसे ॥ १५ ॥
यदि युद्धेन जेयाः स्युरिमे कौरवनन्दनाः ।
वयमप्यत्र युध्येम तथा चेमे नरर्षभाः ॥ १६ ॥
उस समय भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा- ' पाण्डुनन्दन! कुन्तीकुमार! यह क्या बात है कि तुम मना करनेपर भी युद्धसे निवृत्त नहीं हो रहे हो । यदि ये कौरवनन्दन इस समय युद्धसे ही जीते जा सकते तो हम और ये सभी नरश्रेष्ठ राजा लोग युद्ध ही करते ॥
रथेभ्यस्त्ववतीर्णाः स्म सर्व एव हि तावकाः ।
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय रथात् तूर्णमपाक्रम ॥ १७ ॥
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‘ तुम्हारे सभी सैनिक रथसे उतर गये हैं । कुन्तीकुमार! अब तुम भी शीघ्र ही रथसे उतरकर युद्धसे अलग हो जाओ ' ॥ १७ ॥
एवमुक्त्वा तु तं कृष्णो रथाद् भूमिमवर्तयत् ।
निःश्वसन्तं यथा नागं क्रोधसंरक्तलोचनम् ॥ १८ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्णने क्रोधसे लाल आँखें करके सर्पके समान फुफकारते हुए भीमसेनको रथसे भूमिपर उतार लिया ॥ १८ ॥
यदापकृष्टः स रथान्न्यासितश्चायुधं भुवि ।
ततो नारायणास्त्रं तत् प्रशान्तं शत्रुतापनम् ॥ १ ९ ॥
जब ये रथसे उतर गये और उनसे अस्त्र - शस्त्रोंको भूमिपर रखवा लिया गया, तब वह शत्रुओंको संताप देनेवाला नारायणास्त्र स्वयं प्रशान्त हो गया ॥ १ ९ ॥ संजय उवाच
तस्मिन् प्रशान्ते विधिना तेन तेजसि दुःसहे ।
बभूवुर्विमलाः सर्वा दिशः प्रदिश एव च ॥ २० ॥
प्रववुश्च शिवा वाताः प्रशान्ता मृगपक्षिणः ।
वाहनानि च हृष्टानि प्रशान्तेऽस्त्रे सुदुर्जये ॥ २१ ॥
संजय कहते हैं – राजन्! उस विधिसे उस दुःसह तेजके शान्त हो जानेपर सारी दिशाएँ और विदिशाएँ निर्मल हो गयीं । शीतल सुखद वायु चलने लगी । पशु -पक्षियोंका आर्तनाद बंद हो गया तथा उस दुर्जय अस्त्रके शान्त होनेपर सारे वाहन भी सुखी हो गये ॥ २०-२१ ॥
व्यपोढे च ततो घोरे तस्मिंस्तेजसि भारत ।
बभौ भीमो निशापाये धीमान् सूर्य इवोदितः ॥ २२ ॥
भारत! उस भयंकर तेजके दूर हो जानेपर बुद्धिमान् भीमसेन रात बीतनेपर उगे हुए सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे ॥ २२ ॥
हतशेषं बलं तत् तु पाण्डवानामतिष्ठत ।
अस्त्रव्युपरमाद्धृष्टं तव पुत्रजिघांसया ॥ २३ ॥
पाण्डवोंकी जो सेना मरनेसे बच गयी थी, वह उस अस्त्रके शान्त हो जानेसे पुनः आपके पुत्रोंका विनाश करनेके लिये हर्षसे खिल उठी ॥ २३ ॥
व्यवस्थिते बले तस्मिन्नस्त्रे प्रतिहते तथा ।
दुर्योधनो महाराज द्रोणपुत्रमथाब्रवीत् ॥ २४ ॥
महाराज! उस अस्त्रके प्रतिहत और पाण्डव सेनाके सुव्यवस्थित हो जानेपर दुर्योधनने द्रोणपुत्रसे इस प्रकार कहा— ॥ २४ ॥
अश्वत्थामन् पुनः शीघ्रमस्त्रमेतत् प्रयोजय ।
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अवस्थिता हि पञ्चालाः पुनरेते जयैषिणः ॥ २५ ॥
' अश्वत्थामन्! तुम पुनः शीघ्र ही इसी शस्त्रका प्रयोग करो; क्योंकि विजयकी अभिलाषा रखनेवाले ये पांचाल सैनिक पुनः युद्धके लिये आकर डट गये हैं' ॥
अश्वत्थामा तथोक्तस्तु तव पुत्रेण मारिष ।
सुदीनमभिनिःश्वस्य राजानमिदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
मान्यवर! आपके पुत्रके ऐसा कहनेपर अश्वत्थामाने अत्यन्त दीनभावसे उच्छ्वास लेकर राजासे इस प्रकार कहा- ॥ २६ ॥
नैतदावर्तते राजन्नस्त्रं द्विर्नोपपद्यते ।
आवृतं हि निवर्तेत प्रयोक्तारं न संशयः ॥ २७ ॥
‘ राजन्! न तो यह अस्त्र फिर लौटता है और न इसका दुबारा प्रयोग ही हो सकता है । यदि इसका पुनः प्रयोग किया जाय तो यह प्रयोग करनेवालेको ही समाप्त कर देगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २७ ||
एष चास्त्रप्रतीघातं वासुदेवः प्रयुक्तवान् ।
अन्यथा विहितः संख्ये वधः शत्रोर्जनाधिप ॥ २८ ॥
'जनेश्वर! श्रीकृष्णने इस अस्त्रके निवारणका उपाय बता दिया है और उसका प्रयोग किया है; अन्यथा आज युद्धमें सम्पूर्ण शत्रुओंका वध हो ही गया होता ॥ २८ ॥
पराजयो वा मृत्युर्वा श्रेयान् मृत्युने निर्जयः ।
विजिताश्चारयो ह्येते शस्त्रोत्सर्गान्मृतोपमाः ॥ २ ९ ॥
‘ पराजय हो या मृत्यु, इनमें मृत्यु ही श्रेष्ठ है, पराजय नहीं । ये सारे शत्रु हार गये थे; हथियार डालकर मुर्देके समान हो गये थे ' ॥ २९ ॥
दुर्योधन उवाच
आचार्यपुत्र यद्येतद् द्विरस्त्रं न प्रयुज्यते ।
अन्यैर्गुरुघ्ना वध्यन्तामस्त्रैरस्त्रविदां वर ॥ ३० ॥
दुर्योधन बोला- आचार्यपुत्र! तुम तो सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो । यदि इस अस्त्रका दो बार प्रयोग नहीं हो सकता तो तुम दूसरे ही अस्त्रोंद्वारा इन गुरुघातियोंका वध करो ॥ ३० ॥
त्वयि शस्त्राणि दिव्यानि त्र्यम्बके चामितौजसि ।
इच्छतो न हि ते मुच्येत् संक्रुद्धो हि पुरंदरः ॥ ३१ ॥
तुममें तथा अमिततेजस्वी भगवान् शंकरमें ही सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्रतिष्ठित हैं । यदि तुम मारना चाहो तो क्रोधमें भरे हुए इन्द्र भी तुमसे बचकर नहीं जा सकते ॥ ३१ ॥
धृतराष्ट्रउवाच तस्मिन्नस्त्रे प्रतिहते द्रोणे चोपधिना हते ।
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तथा दुर्योधनेनोक्तो द्रौणिः किमकरोत् पुनः ॥ ३२ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा — संजय! द्रोणाचार्य छलपूर्वक मारे गये और नारायणास्त्र भी प्रतिहत हो गया, तब दुर्योधनके वैसा कहनेपर अश्वत्थामाने फिर क्या किया? ॥
दृष्ट्वा पार्थांश्च संग्रामे युद्धाय समुपस्थितान् ।
नारायणास्त्रनिर्मुक्तांश्चरतः पृतनामुखे ॥ ३३ ॥
क्योंकि उसने देख लिया था कि नारायणास्त्रसे छूटे हुए पाण्डव संग्राममें युद्धके लिये उपस्थित हैं और युद्धके मुहानेपर विचर रहे हैं ॥ ३३ ॥
संजय उवाच
जानन् पितुः स निधनं सिंहलाङ्गूलकेतनः ।
सक्रोधो भयमुत्सृज्य सोऽभिदुद्राव पार्षतम् ॥ ३४ ॥
संजयने कहा — राजन्! अश्वत्थामाकी ध्वजा- पताकामें सिंहकी पूँछका चिह्न बना हुआ था। उसने पिताके मारे जानेकी घटनाका स्मरण करके कुपित हो भय छोड़कर धृष्टद्युम्नपर धावा किया ॥ ३४ ॥
अभिद्रुत्य च विंशत्या क्षुद्रकाणां नरर्षभ ।
पञ्चभिश्चातिवेगेन विव्याध पुरुषर्षभः ॥ ३५ ॥
नरश्रेष्ठ! निकट जाकर पुरुषप्रवर अश्वत्थामाने धृष्टद्युम्नको पहले क्षुद्रक नामवाले बीस बाण मारे । फिर अत्यन्त वेगसे पाँच बाणोंका प्रहार करके उन्हें घायल कर दिया ॥ ३५ ॥
धृष्टद्युम्नस्ततो राजन् ज्वलन्तमिव पावकम् ।
द्रोणपुत्रं त्रिषष्ट्या तु राजन् विव्याध पत्रिणाम् ॥ ३६ ॥
राजन्! तदनन्तर धृष्टद्युम्नने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी द्रोणपुत्रको तिरसठ बाणोंसे बींध डाला ॥
सारथिं चास्य विंशत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ।
हयांश्च चतुरोऽविध्यच्चतुर्भिर्निशितैः शरैः ॥ ३७ ॥
फिर शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बीस बाणोंसे उसके सारथिको और चार तीखे सायकोंसे उसके चारों घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥
विद्ध्वा विद्ध्वानदद् द्रौणिं कम्पयन्निव मेदिनीम् ।
आददे सर्वलोकस्य प्राणानिव महारणे ॥ ३८ ॥
धृष्टद्युम्न अश्वत्थामाको बींध- बींधकर पृथ्वीको कँपाते हुए - से गरज रहे थे । मानो उस महासमरमें वे सम्पूर्ण जगत्के प्राण ले रहे हों ॥ ३८ ॥
पार्षतस्तु बली राजन् कृतास्त्रः कृतनिश्चयः ।
द्रौणिमेवाभिदुद्राव मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ३ ९ ॥
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राजन्! बलवान् अस्त्रवेत्ता तथा दृढ़ निश्चयवाले धृष्टद्युम्नने मृत्युको ही युद्धसे लौटनेकी अवधि निश्चित करके द्रोणपुत्रपर ही धावा किया ॥ ३ ९ ॥
ततो बाणमयं वर्ष द्रोणपुत्रस्य मूर्धनि ।
अवासृजदमेयात्मा पाञ्चाल्यो रथिनां वरः ॥ ४० ॥
तत्पश्चात् अमेय आत्मबलसे सम्पन्न, रथियोंमें श्रेष्ठ पांचालपुत्र धृष्टद्युम्नने अश्वत्थामाके मस्तकपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ४० ॥
तं द्रौणिः समरे क्रुद्धं छादयामास पत्रिभिः ।
विव्याध चैनं दशभिः पितुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४१ ॥
अपने पिताके वधका बारंबार स्मरण करते हुए अश्वत्थामाने भी समरांगणमें कुपित हुए धृष्टद्युम्नको बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया और दस बाणोंसे मारकर उसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४१ ॥
द्वाभ्यां च सुविसृष्टाभ्यां क्षुराभ्यां ध्वजकार्मुके ।
छित्त्वा पाञ्चालराजस्य द्रौणिरन्यैः समार्दयत् ॥ ४२ ॥
इसके सिवा, अच्छी तरह छोड़े हुए दो छुरोंसे पांचाल- राजकुमारके ध्वज और धनुषको काटकर अश्वत्थामाने दूसरे बाणोंद्वारा उन्हें भलीभाँति पीड़ित किया ॥ ४२ ॥
व्यश्वसूतरथं चैनं द्रौणिश्चक्रे महाहवे ।
तस्य चानुचरान् सर्वान् क्रुद्धः प्राद्रावयच्छरैः ॥ ४३ ॥
इतना ही नहीं, द्रोणपुत्रने उस महायुद्धमें धृष्टद्युम्नको घोड़े, सारथि तथा रथसे भी वंचित कर दिया । साथ ही कुपित हो उनके सारे सेवकोंको भी बाणोंसे मार- मारकर खदेड़ना शुरू किया ॥ ४३ ॥
ततः प्रदुद्रुवे सैन्यं पञ्चालानां विशाम्पते ।
सम्भ्रान्तरूपमार्तं च न परस्परमैक्षत ॥ ४४ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर पांचालोंकी सेना भ्रान्त एवं आर्त होकर भाग चली । उसके सैनिक एक- दूसरेको देखते नहीं थे ॥ ४४ ॥
दृष्ट्वा तु विमुखान् योधान् धृष्टद्युम्नं च पीडितम् ।
शैनेयोऽचोदयत् तूर्णं रथं दौणिरथं प्रति ॥ ४५ ॥
योद्धाओंको युद्धसे विमुख और धृष्टद्युम्नको बाणोंसे पीड़ित देख सात्यकिने तुरंत अपना रथ अश्वत्थामाके रथकी ओर बढ़ाया ॥ ४५ ॥
अष्टभिर्निशितैर्बाणैरश्वत्थामानमार्दयत् ।
विंशत्या पुनराहत्य नानारूपैरमर्षणः ॥ ४६ ॥
विव्याध च तथा सूतं चतुर्भिश्चतुरो हयान् ।
धनुर्ध्वजं च संयत्तश्चिच्छेद कृतहस्तवत् ॥ ४७ ॥
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उन्होंने आठ पैने बाणोंसे अश्वत्थामाको चोट पहुँचायी। तत्पश्चात् अमर्षमें भरे हुए सात्यकिने भाँति- भाँतिके बीस बाणोंद्वारा द्रोणपुत्रको पुनः घायल करके उसके सारथिको भी बींध डाला और पूर्णरूपसे सावधान हो एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति उन्होंने चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको घायल करके ध्वज और धनुषको भी काट दिया ॥ ४६-४७ ॥
स साश्वं व्यधमच्चापि रथं हेमपरिष्कृतम् ।
हृदि विव्याध समरे त्रिंशता सायकैर्भृशम् ॥ ४८ ॥
इसके बाद घोड़ोंसहित उसके सुवर्णभूषित रथको छिन्न- भिन्न कर डाला और समरांगणमें तीस बाणोंसे उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४८ ॥
एवं स पीडितो राजन्नश्वत्थामा महाबलः ।
शरजालैः परिवृतः कर्तव्यं नान्वपद्यत ॥ ४ ९ ॥
राजन्! इस प्रकार बाणोंके जालसे घिरकर पीड़ित हुए महाबली अश्वत्थामाको कोई कर्तव्य नहीं सूझता था ॥ ४ ९ ॥
एवं गते गुरोः पुत्रे तव पुत्रो महारथः ।
कृपकर्णादिभिः सार्धं शरैः सात्वतमावृणोत् ॥ ५० ॥
गुरुपुत्रकी ऐसी अवस्था हो जानेपर आपके महारथी पुत्र दुर्योधनने कृपाचार्य और कर्ण आदिके साथ आकर सात्यकिको बाणोंसे ढक दिया ॥ ५० ॥
दुर्योधनस्तु विंशत्या कृपः शारद्वतस्त्रिभिः ।
कृतवर्माथ दशभिः कर्णः पञ्चाशता शरैः ॥ ५१ ॥
दुःशासनः शतेनैव वृषसेनश्च सप्तभिः ।
सात्यकिं विव्यधुस्तूर्णं समन्तान्निशितैः शरैः ॥ ५२ ॥
दुर्योधनने बीस, शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने तीन, कृतवर्माने दस, कर्णने पचास, दुःशासनने सौ तथा वृषसेनने सात पैने बाणोंद्वारा शीघ्र ही सब ओरसे सात्यकिको घायल कर दिया ॥ ५१-५२ ॥
ततः स सात्यकी राजन् सर्वानेव महारथान् ।
विरथान् विमुखांश्चैव क्षणेनैवाकरोन्नृप ॥ ५३ ॥
राजन्! तब सात्यकिने भी उन सभी महारथियोंको क्षणभरमें रथहीन एवं युद्धसे विमुख कर दिया ॥ ५३ ॥
अश्वत्थामा तु सम्प्राप्य चेतनां भरतर्षभ ।
चिन्तयामास दुःखार्तो निःश्वसंश्च पुनः पुनः ॥ ५४ ॥
भरतश्रेष्ठ! उधर अश्वत्थामाको जब चेत हुआ, तब वह दुःखसे आतुर हो बारंबार लंबी साँस खींचता हुआ कुछ देरतक चिन्तामें डूबा रहा ॥ ५४ ॥
अथो रथान्तरं द्रौणिः समारुह्य परंतपः ।
सात्यकिं वारयामास किरन् शरशतान् बहून् ॥ ५५ ॥
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फिर दूसरे रथपर आरूढ़ हो शत्रुतापन अश्वत्थामाने कई सौ बाणोंकी वर्षा करके सात्यकिको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ५५ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य भारद्वाजसुतं रणे ।
विरथं विमुखं चैव पुनश्चक्रे महारथः ॥ ५६ ॥
रणभूमिमें द्रोणपुत्रको अपनी ओर आते देख महारथी सात्यकिने उसे पुनः रथहीन एवं युद्धसे विमुख कर दिया ॥ ५६ ॥
ततस्ते पाण्डवा राजन् दृष्ट्वा सात्यकिविक्रमम् ।
शङ्खशब्दान् भृशं चक्रुः सिंहनादांश्च नेदिरे ॥ ५७ ॥
राजन्! सात्यकिका यह पराक्रम देख पाण्डव बड़े जोर- जोरसे शंख बजाने और सिंहनाद करने लगे ॥ ५७ ॥
एवं तं विरथं कृत्वा सात्यकिः सत्यविक्रमः ।
जघान वृषसेनस्य त्रिसाहस्रान् महारथान् ॥ ५८ ॥
इस प्रकार उसे रथहीन करके सत्यपराक्रमी सात्यकिने वृषसेनकी सेनाके तीन हजार विशाल रथोंको नष्ट कर दिया ॥ ५८ ॥
अयुतं दन्तिनां सार्धं कृपस्य निजघान सः ।
पञ्चायुतानि चाश्वानां शकुनेर्निजघान ह ॥ ५ ९ ॥
तदनन्तर कृपाचार्यकी सेनाके पंद्रह हजार हाथियोंका वध कर डाला; इसी तरह शकुनिके पचास हजार घोड़ोंको भी उन्होंने मार गिराया ॥ ५ ९ ॥
ततो द्रौणिर्महाराज रथमारुह्य वीर्यवान् ।
सात्यकिं प्रतिसंक्रुद्धः प्रययौ तद्वधेप्सया ॥ ६० ॥
महाराज! तब पराक्रमी अश्वत्थामा रथपर आरूढ़ हो सात्यकिपर क्रोध करके उनका वध करनेकी इच्छासे आगे बढ़ा ॥ ६० ॥
पुनस्तमागतं दृष्ट्वा शैनेयो निशितैः शरैः ।
अदारयत् क्रूरतरैः पुनः पुनररिंदम ॥ ६१ ॥
शत्रुदमन नरेश! अश्वत्थामाको फिर आया देख सात्यकिने अत्यन्त क्रूर तीखे बाणोंद्वारा उसे बारंबार विदीर्ण किया ॥ ६१ ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासो नानालिङ्गैरमर्षणः ।
युयुधानेन वै द्रौणिः प्रहसन् वाक्यमब्रवीत् ॥ ६२ ॥
जब युयुधानने नाना प्रकारके चिह्नोंवाले बाणोंद्वारा महाधनुर्धर अश्वत्थामाको अत्यन्त घायल कर दिया, तब उसने अमर्षमें भरकर उनसे हँसते हुए कहा- ॥ ६२ ॥
शैनेयाभ्युपपत्तिं ते जानाम्याचार्यघातिनि ।
न चैनं त्रास्यसि मया ग्रस्तमात्मानमेव च ॥ ६३ ॥
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‘शिनिपौत्र! मैं जानता हूँ, आचार्यघाती धृष्टद्युम्नके प्रति तुम्हारा विशेष सहयोग एवं पक्षपात है; परंतु मेरे चंगुलमें फँसे हुए इस धृष्टद्युम्नको और अपनेको भी तुम बचा नहीं सकोगे ॥ ६३ ॥
शपेऽऽत्मनाहं शैनेय सत्येन तपसा तथा ।
अहत्वा सर्वपाञ्चालान् यदि शान्तिमहं लभे ॥ ६४ ॥
‘ शैनेय! मैं सत्य और तपस्याकी सौगंध खाकर कहता हूँ, सम्पूर्ण पांचालोंका वध किये बिना मुझे कदापि शान्ति नहीं मिलेगी ॥ ६४ ॥
यद् बलं पाण्डवेयानां वृष्णीनामपि यद् बलम् ।
क्रियतां सर्वमेवेह निहनिष्यामि सोमकान् ॥ ६५ ॥
‘ पाण्डवों और वृष्णिवंशियोंके पास जितना भी बल है, वह सब यहीं लगा दो तो भी सोमकोंका संहार कर डालूँगा' ॥ ६५ ॥
एवमुक्त्वार्करश्म्याभं सुतीक्ष्णं तं शरोत्तमम् ।
व्यसृज्यत् सात्वते द्रौणिर्वज्रं वृत्रे यथा हरिः ॥ ६६ ॥
ऐसा कहकर द्रोणकुमार अश्वत्थामाने सात्यकिपर सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी तथा अत्यन्त तीखा उत्तम बाण छोड़ दिया; मानो इन्द्रने वृत्रासुरपर वज्रका प्रहार किया हो ॥ ६६ ॥
स तं निर्भिद्य तेनास्तः सायकः सशरावरम् ।
विवेश वसुधां भित्त्वा श्वसन् बिलमिवोरगः ॥ ६७ ॥
उसका चलाया हुआ वह बाण सात्यकिके शरीरको कवचसहित विदीर्ण करके पृथ्वीको चीरता हुआ उसके भीतर उसी प्रकार घुस गया, जैसे फुफकारता हुआ सर्प बिलमें समा जाता है ॥ ६७ ॥
स भिन्नकवचः शूरस्तोत्रार्दित इव द्विपः ।
विमुच्य सशरं चापं भूरिव्रणपरिस्रवः ॥ ६८ ॥
सीदन् रुधिरसिक्तश्च रथोपस्थ उपाविशत् ।
सूतेनापहृतस्तूर्णं द्रोणपुत्राद् रथान्तरम् ॥ ६ ९ ॥
कवच छिन्न- भिन्न हो जानेसे शूरवीर सात्यकि अंकुशोंकी मार खाये हुए हाथीके समान व्यथित हो उठे । उनके घावोंसे अधिक रक्त बह रहा था । वे शिथिल एवं खूनसे लथपथ हो धनुष - बाण छोड़कर रथके पिछले भागमें बैठ गये । तब सारथि तुरंत ही उन्हें द्रोणपुत्रके पाससे दूसरे रथीके पास हटा ले गया ॥ ६८-६९ ॥
अथान्येन सुपुङ्खेन शरेणानतपर्वणा ।
आजघान भ्रुवोर्मध्ये धृष्टद्युम्नं परंतपः ॥ ७० ॥
तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले अश्वत्थामाने सुन्दर पंख एवं झुकी हुई गाँठवाले दूसरे बाणसे धृष्टद्युम्नकी दोनों भौंहोंके बीचमें गहरा आघात किया ॥
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स पूर्वमतिविद्धश्च भृशं पश्चाच्च पीडितः ।
ससादाथ च पाञ्चाल्यो व्यपाश्रयत च ध्वजम् ॥ ७१ ॥
पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न पहले ही बहुत घायल हो चुका था । फिर पीछे भी अत्यन्त पीड़ित हो वह रथकी बैठकमें धम्मसे बैठ गया और ध्वजापर अपने शरीरको टेक दिया ॥ ७१ ॥
तं नागमिव सिंहेन दृष्ट्वा राजन् शरार्दितम् ।
जवेनाभ्यद्रवञ्छूराः पञ्च पाण्डवतो रथाः ॥ ७२ ॥
राजन्! जैसे सिंह हाथीको सताता है, उसी प्रकार धृष्टद्युम्नको अश्वत्थामाके बाणोंसे पीड़ित देखकर पाण्डवपक्षसे पाँच शूरवीर महारथी वेगसे वहाँ आ पहुँचे ॥
किरीटी भीमसेनश्च वृद्धक्षत्रश्च पौरवः ।
युवराजश्च चेदीनां मालवश्च सुदर्शनः ॥ ७३ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं- किरीटधारी अर्जुन, भीमसेन, पौरव, वृद्धक्षत्र, चेदिदेशके युवराज तथा मालवनरेश सुदर्शन ॥ ७३ ॥
एते हाहाकृताः सर्वे प्रगृहीतशरासनाः ।
वीरं द्रौणायनिं वीराः सर्वतः पर्यवारयन् ॥ ७४ ॥
इन सब वीरोंने हाहाकार करते हुए हाथमें धनुष लेकर वीर अश्वत्थामाको चारों ओरसे घेर लिया ॥
ते विंशतिपदे यत्ता गुरुपुत्रममर्षणम् ।
पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैरभ्यघ्नन् सर्वतः समम् ॥ ७५ ॥
उन सावधान रथियोंने बीसवें पगपर अमर्षशील गुरुपुत्रको पा लिया और सब ओरसे पाँच - पाँच बाणोंद्वारा एक साथ ही उसपर चोट की ॥ ७५ ॥
आशीविषाभैर्विंशत्या पञ्चभिस्तु शितैः शरैः ।
चिच्छेद युगपद् द्रौणिः पञ्चविंशतिसायकान् ॥ ७६ ॥
तब द्रोणकुमारने विषैले सर्पोंके समान पचीस तीखे बाणोंद्वारा एक साथ ही उनके पचीसों बाणोंको काट डाला ॥ ७६ ॥
सप्तभिस्तु शितैर्बाणैः पौरवं द्रौणिरार्दयत् ।
मालवं त्रिभिरेकेन पार्थं षड्भिर्वृकोदरम् ॥ ७७ ॥
इसके बाद द्रोणपुत्रने सात तीखे बाणोंसे पौरवको पीड़ित कर दिया । फिर तीन बाणोंसे मालवनरेशको, एकसे अर्जुनको और छः बाणोंद्वारा भीमसेनको घायल कर दिया ॥ ७७ ॥
ततस्ते विव्यधुः सर्वे द्रौणिं राजन् महारथाः ।
युगपच्च पृथक् चैव रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ ७८ ॥
राजन्! तत्पश्चात् उन सब महारथियोंने एक साथ और अलग - अलग भी शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा द्रोणकुमारको घायल करना आरम्भ