04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1531–1540

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1531–1540

पृष्ठ 1531

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किया ॥ ७८ ॥

युवराजश्च विंशत्या दौणिं विव्याध पत्रिभिः ।

पार्थश्च पुनरष्टाभिस्तथा सर्वे त्रिभिस्त्रिभिः ॥ ७ ९ ॥

चेदिदेशके युवराजने बीस, अर्जुनने आठ तथा अन्य सब लोगोंने तीन- तीन बाणोंद्वारा द्रोणपुत्रको बींध डाला ॥ ७९ ॥

ततोऽर्जुनं षड्भिरथाजघान

द्रौणायनिर्दशभिर्वासुदेवम् ।

भीमं दशार्धेर्युवराजं चतुर्भि- र्द्वाभ्यां द्वाभ्यां मालवं पौरवं च ॥ ८० ॥

तदनन्तर द्रोणपुत्रने छः बाणोंसे अर्जुनको, दस बाणोंद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको, पाँचसे भीमको, चारसे चेदिदेशके युवराजको तथा दो -दो बाणोंद्वारा क्रमशः मालवनरेश तथा पौरवको घायल कर दिया ॥ ८० ॥

सूतं विद्ध्वा भीमसेनस्य षड्भि- र्द्वाभ्यां विद्ध्वा कार्मुकं च ध्वजं च । पुनः पार्थं शरवर्षेण विद्ध्वा द्रौणिर्घोरं सिंहनादं ननाद ॥ ८१ ॥

इतना ही नहीं, भीमसेनके सारथिको छः तथा उनके धनुष और ध्वजको दो बाणोंसे बींधकर पुनः बाणोंकी वर्षाद्वारा अर्जुनको घायल करके अश्वत्थामाने घोर सिंहनाद किया ॥ ८१ ॥

तस्यास्यतस्तान् निशितान् पीतधारान् द्रौणेः शरान् पृष्ठतश्चाग्रतश्च । धरा वियद् द्यौः प्रदिशो दिशश्च च्छन्ना बाणैरभवन् घोररूपैः ॥ ८२ ॥

द्रोणकुमार उन पानीदार धारवाले तीखे बाणोंको आगे और पीछे भी चला रहा था । उसके उन भयानक बाणोंसे पृथिवी, आकाश, अन्तरिक्ष, दिशाएँ और विदिशाएँ भी आच्छादित हो गयी थीं ॥ ८२ ॥

आसन्नस्य स्वरथं तीव्रतेजाः

सुदर्शनस्येन्द्रकेतुप्रकाशौ ।

भुजी शिरश्चेन्द्रसमानवीर्य- स्त्रिभिः शरैर्युगपत् संचकर्त ॥ ८३ ॥

उस युद्धमें इन्द्रके समान पराक्रमी एवं प्रचण्ड तेजस्वी अश्वत्थामाने अपने रथके निकट आये हुए मालवराज सुदर्शनकी इन्द्रध्वजके तुल्य प्रकाशित होनेवाली दोनों भुजाओं तथा मस्तकको तीन बाणोंद्वारा एक साथ ही काट डाला ॥ ८३ ॥

पृष्ठ 1532

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स पौरवं रथशक्त्या निहत्य छित्त्वा रथं तिलशश्चास्य बाणैः । छित्त्वा च बाहू वरचन्दनाक्तौ भल्लेन कायाच्छिर उच्चकर्त ॥ ८४ ॥

फिर उसने पौरवको रथशक्तिसे घायल करके अपने बाणोंद्वारा उनके रथके तिलके बराबर- बराबर टुकड़े कर डाले और सुन्दर चन्दनचर्चित उनकी दोनों भुजाओंको काटकर एक भल्लके द्वारा उनके मस्तकको भी धड़से अलग कर दिया ॥ ८४ ॥

युवानमिन्दीवरदामवर्णं चेदिप्रभुं युवराजं प्रसह्य । बाणैस्त्वरावान् प्रज्वलिताग्निकल्पै- र्विद्ध्वा प्रादान्मृत्यवे साश्वसूतम् ॥ ८५ ॥

तत्पश्चात् शीघ्रता करनेवाले अश्वत्थामाने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा नीलकमलकी मालाके समान कान्तिवाले नवयुवक चेदिदेशीय युवराजको हठपूर्वक घायल करके उन्हें घोड़ों और सारथिसहित मौतके हवाले कर दिया ॥ ८५ ॥

मालवं पौरवं चैव युवराजं च चेदिपम् ।

दृष्ट्वा समक्षं निहतं द्रोणपुत्रेण पाण्डवः ॥ ८६ ॥

भीमसेनो महाबाहुः क्रोधमाहारयत् परम् । मालवनरेश सुदर्शन, पुरुदेशके अधिपति वृद्धक्षत्र तथा चेदिदेशके युवराजको अपनी आँखोंके सामने द्रोणपुत्रके हाथसे मारा गया देख पाण्डुकुमार महाबाहु भीमसेनको बड़ा भारी क्रोध हुआ ॥ ८६३ ॥

ततः शरशतैस्तीक्ष्णैः संक्रुद्धाशीविषोपमैः ॥ ८७ ॥

छादयामास समरे द्रोणपुत्रं परंतपः । फिर तो शत्रुओंको संताप देनेवाले भीमसेनने क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पोंके समान सैकड़ों तीखे बाणोंद्वारा समरांगणमें द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको आच्छादित कर दिया ॥ ८७३ || ततो द्रौणिर्महातेजाः शरवर्षं निहत्य तम् ॥ ८८ ॥

विव्याध निशितैर्बाणैर्भीमसेनममर्षणः । तब महातेजस्वी अमर्षशील द्रोणकुमारने उस बाणवर्षाको नष्ट करके भीमसेनको पैने बाणोंसे बींध डाला ॥ ८८ ॥

ततो भीमो महाबाहुर्द्रोणेर्युधि महाबलः ॥ ८ ९ ॥ क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा द्रौणिं विव्याध पत्रिणा । यह देख महाबली महाबाहु भीमसेनने युद्धस्थलमें एक क्षुरप्रसे अश्वत्थामाका धनुष काटकर पंखदार बाणसे उसको भी घायल कर दिया ॥ ८ ९ ३ ॥

पृष्ठ 1533

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तदपास्य धनुश्छिन्नं द्रोणपुत्रो महामनाः ॥ ९० ॥

अन्यत् कार्मुकमादाय भीमं विव्याध पत्रिभिः । इसके बाद महामनस्वी द्रोणपुत्रने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा धनुष ले लिया और भीमसेनको अनेक बाण मारे ॥ ९ ०३ ॥ तौ दौणिभीमौ समरे पराक्रान्तौ महाबलौ ॥ ९ १ ॥ अवर्षतां शरवर्षं वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ । अश्वत्थामा और भीमसेन दोनों वीर महान् बलवान् एवं पराक्रमी थे । वे समरभूमिमें वर्षा करनेवाले दो बादलोंके समान परस्पर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ भीमनामाङ्किता बाणाः स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः ॥ ९ २ ॥ द्रौणिं संछादयामासुर्घनौघा इव भास्करम् । जैसे मेघोंकी घटाएँ सूर्यको ढक लेती हैं, उसी प्रकार भीमसेनके नामसे अंकित और सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुनहरी पाँखवाले बाणोंने द्रोणपुत्रको आच्छादित कर दिया ॥ ९ २ ॥ तथैव द्रौणिनिर्मुक्तैर्भीमः संनतपर्वभिः ॥ ९ ३ ॥ अवाकीर्यत स क्षिप्रं शरैः शतसहस्रशः । इसी तरह अश्वत्थामाके छोड़े हुए झुकी हुई गाँठवाले लाखों बाणोंसे भीमसेन भी तत्काल ढक गये || स च्छाद्यमानः समरे द्रौणिना रणशालिना ॥ ९ ४ ॥ न विव्यथे महाराज तदद्भुतमिवाभवत् । महाराज! संग्राममें शोभा पानेवाले अश्वत्थामाके द्वारा समरभूमिमें ढके जानेपर भी भीमसेनको तनिक भी व्यथा नहीं हुई, वह अद्भुत -सी बात थी ॥ ९ ४३ ॥ ततो भीमो महाबाहुः कार्तस्वरविभूषितान् ॥ ९ ५ ॥ नाराचान् दश सम्प्रैषीद् यमदण्डनिभाञ्छितान् । तदनन्तर महाबाहु भीमसेनने सुवर्णभूषित एवं यमदण्डके समान भयंकर दस तीखे नाराच अश्वत्थामापर चलाये ॥ ते जत्रुदेशमासाद्य द्रोणपुत्रस्य मारिष ॥ ९ ६ ॥ निर्भिद्य विविशुस्तूर्णं वल्मीकमिव पन्नगाः । माननीय नरेश! जैसे सर्प तुरंत ही बाँबीमें घुस जाते हैं, उसी प्रकार वे बाण द्रोणपुत्रके गलेकी हँसलीको छेदकर भीतर समा गये ॥ ९ ६३ ॥ सोऽतिविद्धो भृशं दौणिः पाण्डवेन महात्मना ॥ ९७ ॥

ध्वजयष्टिं समासाद्य न्यमीलयत लोचने । महात्मा पाण्डुपुत्रके बाणोंसे अत्यन्त घायल हुए अश्वत्थामाने ध्वजदण्ड थामकर नेत्र बंद कर लिये ॥

पृष्ठ 1534

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स मुहूर्तात् पुनः संज्ञां लब्ध्वा द्रौणिर्नराधिप ॥ ९ ८ ॥ क्रोधं परममातस्थौ समरे रुधिरोक्षितः । नरेश्वर! दो ही घड़ीमें पुनः सचेत हो खूनसे लथपथ हुए अश्वत्थामाने उस समरांगणमें अत्यन्त क्रोध प्रकट किया ॥ ९ ८१३ ॥ दृढं सोऽभिहतस्तेन पाण्डवेन महात्मना ॥ ९९ ॥

वेगं चक्रे महाबाहुर्भीमसेनरथं प्रति । महामना पाण्डुपुत्रने उसे गहरी चोट पहुँचायी थी । अतः महाबाहु अश्वत्थामाने भीमसेनके रथपर ही बड़े वेग से आक्रमण किया ॥ ९९ ३ ॥ तत आकर्णपूर्णानां शराणां तिग्मतेजसाम् ॥ १०० ॥

शतमाशीविषाभानां प्रेषयामास भारत । भारत! उसने धनुषको कानतक खींचकर प्रचण्ड तेजसे युक्त और विषैले सर्पोंके समान भयंकर सौ बाण भीमसेनपर चलाये ॥ १०० ॥

भीमोऽपि समरश्लाघी तस्य वीर्यमचिन्तयन् ॥ १०१ ॥

तूर्णं प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डवः । युद्धकी स्पृहा रखनेवाले पाण्डुकुमार भीमसेन भी उसके इस पराक्रमकी कोई परवा न करते हुए तुरंत ही उसपर भयंकर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ततो द्रौणिर्महाराज छित्त्वास्य विशिखैर्धनुः ॥ १०२ ॥

आजघानोरसि क्रुद्धः पाण्डवं निशितैः शरैः । महाराज! तब अश्वत्थामाने कुपित हो बाणोंद्वारा भीमसेनके धनुषको काटकर उन पाण्डुपुत्रकी छातीमें पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ १०२ ॥

ततोऽन्यद्धनुरादाय भीमसेनो ह्यमर्षणः ॥ १०३ ॥

विव्याध निशितैर्बाणैर्द्रौणिं पञ्चभिराहवे । तब अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने दूसरा धनुष लेकर युद्धस्थलमें पाँच पैने बाणोंसे द्रोणपुत्रको घायल कर दिया ॥ १०३३ ॥

जीमूताविव घर्मान्ते तौ शरौघप्रवर्षिणौ ॥ १०४ ॥

अन्योन्यक्रोधताम्राक्षी छादयामासतुर्युधि । वे दोनों क्रोधसे लाल आँखें करके बरसातके दो बादलोंके समान बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए एक - दूसरेको आच्छादित करने लगे ॥ १०४३ ॥

तलशब्दैस्ततो घोरैस्त्रासयन्तौ परस्परम् ॥ १०५ ॥

अयुध्येतां सुसंरब्धौ कृतप्रतिकृतैषिणौ ।

पृष्ठ 1535

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फिर ताल ठोंकनेकी भयंकर आवाजसे परस्पर त्रास उत्पन्न करते हुए वे दोनों योद्धा बड़े रोषसे युद्ध करने लगे । दोनों ही एक- दूसरेके प्रहारका प्रतीकार करना चाहते थे ॥ १०५ || ततो विस्फार्य सुमहच्चापं रुक्मविभूषितम् ॥ १०६ ॥

भीमं प्रैक्षत स द्रौणिः शरानस्यन्तमन्तिकात् ।

शरद्यहर्मध्यगतो दीप्तार्चिरिव भास्करः ॥ १०७ ॥

तत्पश्चात् सुवर्णभूषित विशाल धनुषको खींचकर निकटसे बाणोंकी वर्षा करते हुए भीमसेनकी ओर अश्वत्थामाने देखा । वह शरद् ऋतु मध्याह्नकालमें प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ १०६-१०७ ॥

आददानस्य विशिखान् संदधानस्य चाशुगान् ।

विकर्षतो मुञ्चतश्च नान्तरं ददृशुर्जनाः ॥ १०८ ॥

वह कब बाण लेता, कब उन्हें धनुषपर रखता, कब प्रत्यंचा खींचता और कब उन्हें छोड़ता था तथा इन कार्योंमें कितना अन्तर पड़ता था, यह सब योद्धालोग देख नहीं पाते थे ॥ १०८ ॥

अलातचक्रप्रतिमं तस्य मण्डलमायुधम् ।

द्रौणेरासीन्महाराज बाणान् विसृजतस्तदा ॥ १० ९ ॥

महाराज! बाण छोड़ते समय अश्वत्थामाका धनुष अलातचक्रके समान मण्डलाकार दिखायी देता था ॥

धनुश्च्युताः शरास्तस्य शतशोऽथ सहस्रशः ।

आकाशे प्रत्यदृश्यन्त शलभानामिवायतीः ॥ ११० ॥

उसके धनुषसे छूटे हुए सैकड़ों और हजारों बाण आकाशमें टिड्डी - दलोंके समान दिखायी देते थे ॥ ११० ॥

ते तु द्रौणिविनिर्मुक्ताः शरा हेमविभूषिताः ।

अजस्रमन्वकीर्यन्त घोरा भीमरथं प्रति ॥ १११ ॥

अश्वत्थामाके छोड़े हुए सुवर्णभूषित भयंकर बाण भीमसेनके रथपर लगातार गिरने लगे ॥ १११ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम भीमसेनस्य विक्रमम् ।

बलं वीर्यं प्रभावं च व्यवसायं च भारत ॥ ११२ ॥

भारत! वहाँ हमलोगोंने भीमसेनका अद्भुत पराक्रम, बल, वीर्य, प्रभाव और व्यवसाय देखा ॥ ११२ ॥

तां स मेघादिवोद्भूतां बाणवृष्टिं समन्ततः ।

जलवृष्टिं महाघोरां तपान्त इव चिन्तयन् ॥ ११३ ॥

द्रोणपुत्रवधप्रेप्सुर्भीमो भीमपराक्रमः ।

पृष्ठ 1536

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अमुञ्चच्छरवर्षाणि प्रावृषीव बलाहकः ॥ ११४ ॥

वर्षाकालमें मेघसे होनेवाली अत्यन्त घोर जलवृष्टिके समान चारों ओरसे होनेवाली अश्वत्थामाकी उस बाण- वर्षापर विचार करते हुए भयंकर पराक्रमी भीमसेनने द्रोणपुत्रके वधकी इच्छा की और वे बरसातके बादलोंके समान बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ ११३-११४ ॥

तद् रुक्मपृष्ठं भीमस्य धनुर्घोरं महारणे ।

विकृष्यमाणं विबभौ शक्रचापमिवापरम् ॥ ११५ ॥

उस महासमरमें सोनेकी पीठवाला भीमसेनका भयंकर धनुष जब खींचा जाता था, तब दूसरे इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होता था ॥ ११५ ॥

तस्माच्छराः प्रादुरासन् शतशोऽथ सहस्रशः ।

संछादयन्तः समरे द्रौणिमाहवशोभिनम् ॥ ११६ ॥

रणभूमिमें अधिक शोभा पानेवाले द्रोणकुमार अश्वत्थामाको आच्छादित करते हुए सैकड़ों और हजारों बाण भीमसेनके उस धनुषसे प्रकट हो रहे थे ॥

तयोर्विसृजतोरेवं शरजालानि मारिष ।

वायुरप्यन्तरा राजन् नाशक्नोत् प्रतिसर्पितुम् ॥ ११७ ॥

माननीय नरेश! इस प्रकार बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उन दोनोंके बीचसे निकल जानेमें वायु भी असमर्थ हो गयी थी ॥ ११७ ॥

तथा दौणिर्महाराज शरान् हेमविभूषितान् ।

तैलधौतान् प्रसन्नाग्रान् प्राहिणोद् वधकाङ्क्षया ॥ ११८ ॥

महाराज! तदनन्तर अश्वत्थामाने भीमसेनके वधकी इच्छासे तेलमें साफ किये हुए स्वच्छ अग्रभागवाले बहुत - से स्वर्णभूषित बाण चलाये ॥ ११८ ॥

तानन्तरिक्षे विशिखैस्त्रिधैकैकमशातयत् ।

विशेषयन् द्रोणसुतं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ११९ ॥

परंतु भीमसेनने अपनी विशेषता स्थापित करते हुए अपने बाणोंद्वारा आकाशमें ही उन बाणोंमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन टुकड़े कर डाले और द्रोणपुत्रसे कहा — ‘ खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ ११ ९ ॥

पुनश्च शरवर्षाणि घोराण्युग्राणि पाण्डवः ।

व्यसृजद् बलवान् क्रुद्धो द्रोणपुत्रवधेप्सया ॥ १२० ॥

फिर कुपित हुए पाण्डुपुत्र बलवान् भीमसेनने द्रोणपुत्रके वधकी इच्छासे उसके ऊपर पुनः घोर एवं उग्र बाण- वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ १२० ॥

ततोऽस्त्रमायया तूर्णं शरवृष्टिं निवार्य ताम् ।

धनुश्चिच्छेद भीमस्य द्रोणपुत्रो महास्त्रवित् ॥ १२१ ॥

शरैश्चैनं सुबहुभिः क्रुद्धः संख्ये पराभिनत् ।

पृष्ठ 1537

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तब महान् अस्त्रवेत्ता द्रोणपुत्रने अपने अस्त्रोंकी मायासे तुरंत ही उस बाण - वर्षाका निवारण करके भीमसेनका धनुष काट डाला । साथ ही क्रोधमें भरकर उसने युद्धस्थलमें बहुसंख्यक बाणोंद्वारा इन्हें क्षत- विक्षत कर दिया ॥ १२१३ ॥

स छिन्नधन्वा बलवान् रथशक्तिं सुदारुणाम् ॥ १२२ ॥

वेगेनाविध्य चिक्षेप द्रोणपुत्ररथं प्रति । धनुष कट जानेपर बलवान् भीमसेनने द्रोणपुत्रके रथपर एक भयंकर रथशक्ति बड़े वेगसे घुमाकर फेंकी ॥ तामापतन्तीं सहसा महोल्काभां शितैः शरैः ॥ १२३ ॥

चिच्छेद समरे द्रौणिर्दर्शयन् पाणिलाघवम् । बड़ी भारी उल्काके समान सहसा अपनी ओर आती हुई उस रथशक्तिको अश्वत्थामाने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए समरभूमिमें तीखे बाणोंसे काट डाला ॥ १२३३ ॥

एतस्मिन्नन्तरे भीमो दृढमादाय कार्मुकम् ॥ १२४ ॥

द्रौणिं विव्याध विशिखैः स्मयमानो वृकोदरः । इसी बीचमें मुसकराते हुए भीमसेनने एक सुदृढ़ धनुष लेकर अनेक बाणोंसे द्रोणपुत्रको बींध डाला ॥ १२४ ॥

ततो द्रौणिर्महाराज भीमसेनस्य सारथिम् ॥ १२५ ॥

ललाटे दारयामास शरेणानतपर्वणा । महाराज! तब अश्वत्थामाने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे भीमसेनके सारथिका ललाट छेद दिया ॥ १२५३ ॥

सोऽतिविद्धो बलवता द्रोणपुत्रेण सारथिः ॥ १२६ ॥

व्यामोहमगमद् राजन् रश्मीनुत्सृज्य वाजिनाम् । राजन्! बलवान् द्रोणपुत्रके द्वारा अत्यन्त घायल किया हुआ सारथि घोड़ोंकी बागडोर छोड़कर मूर्च्छित हो गया ॥ १२६३ ॥

ततोऽश्वाः प्राद्रवंस्तूर्णं मोहिते रथसारथौ ॥ १२७ ॥

भीमसेनस्य राजेन्द्र पश्यतां सर्वधन्विनाम् । राजेन्द्र! सारथिके मूर्च्छित हो जानेपर भीमसेनके घोड़े सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते- देखते तुरंत वहाँसे भाग चले ॥ १२७३ ॥

तं दृष्ट्वा प्रद्रुतैरश्वैरपकृष्टं रणाजिरात् ॥ १२८ ॥

दध्मौ प्रमुदितः शङ्खं बृहन्तमपराजितः । भागे हुए घोड़े भीमसेनको समरांगणसे दूर हटा ले गये, यह देखकर विजयी वीर अश्वत्थामाने अत्यन्त प्रसन्न हो अपना विशाल शंख बजाया ॥ १२८३ ॥

ततः सर्वे च पञ्चाला भीमसेनश्च पाण्डवः ॥ १२ ९ ॥

पृष्ठ 1538

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धृष्टद्युम्नरथं त्यक्त्वा भीताः सम्प्राद्रवन् दिशः । तब पाण्डुपुत्र भीमसेन और समस्त पांचाल भयभीत हो धृष्टद्युम्नका रथ छोड़कर चारों दिशाओंमें भाग गये ॥ १२ ९ ३ ॥ तान् प्रभग्नांस्ततो द्रोणिः पृष्ठतो विकिरन् शरान् ॥ १३० ॥

अभ्यवर्तत वेगेन कालयन् पाण्डुवाहिनीम् । उन भागते हुए सैनिकोंपर पीछेसे बाण बिखेरते और पाण्डव- सेनाको खदेड़ते हुए अश्वत्थामाने बड़े वेगसे पीछा किया ॥ १३०३ ॥

ते वध्यमानाः समरे द्रोणपुत्रेण पार्थिवाः ॥ १३१ ॥

द्रोणपुत्रभयाद् राजन् दिशः सर्वाश्च भेजिरे ॥ १३२ ॥

राजन्! समरांगणमें द्रोणपुत्रके द्वारा मारे जाते हुए समस्त राजाओंने उसके भयसे भागकर सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण ली ॥ १३१-१३२ ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वण्यश्वत्थामपराक्रमे द्विशततमोऽध्यायः ॥ २०० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अश्वत्थामाका पराक्रमविषयक दो सौवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २०० ॥

पृष्ठ 1539

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एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः अश्वत्थामाके द्वारा आग्नेयास्त्रके प्रयोगसे एक अक्षौहिणी पाण्डव - सेनाका संहार; श्रीकृष्ण और अर्जुनपर उस अस्त्रका प्रभाव न होनेसे चिन्तित हुए अश्वत्थामाको व्यासजीका शिव और श्रीकृष्णकी महिमा बताना संजय उवाच

तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।

न्यवारयदमेयात्मा द्रोणपुत्रजयेप्सया ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! तदनन्तर अमेय आत्मबल- से सम्पन्न कुन्तीकुमार अर्जुनने सेनाको भागती देख द्रोणपुत्रपर विजय पानेकी इच्छासे उसे रोका ॥ १ ॥

ततस्ते सैनिका राजन् नैव तत्रावतस्थिरे ।

संस्थाप्यमाना यत्नेन गोविन्देनार्जुनेन च ॥ २ ॥

नरेश्वर! श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा प्रयत्नपूर्वक ठहराये जानेपर भी वे सैनिक वहाँ खड़े न हो सके ॥ २ ॥

एक एव च बीभत्सुः सोमकावयवैः सह ।

मत्स्यैरन्यैश्च संधाय कौरवान् संन्यवर्तत ॥ ३ ॥

अकेले अर्जुन ही सोमकोंकी टुकड़ियों, मत्स्यदेशीय योद्धाओं तथा अन्य लोगोंको साथ लेकर कौरवोंका सामना करनेके लिये लौटे ॥ ३ ॥

ततो द्रुतमतिक्रम्य सिंहलाङ्गूलकेतनम् ।

सव्यसाची महेष्वासमश्वत्थामानमब्रवीत् ॥ ४ ॥

सव्यसाची अर्जुन सिंहकी पूँछके चिह्नवाली ध्वजासे युक्त महाधनुर्धर अश्वत्थामाके पास तुरंत आकर उससे इस प्रकार बोले- ॥ ४ ॥

या शक्तिर्यच्च विज्ञानं यद् वीर्यं यच्च पौरुषम् ।

धार्तराष्ट्रेषु या प्रीतिर्द्वेषोऽस्मासु च यश्च ते ॥ ५ ॥

यच्च भूयोऽस्ति तेजस्ते तत् सर्वं मयि दर्शय ।

स एव द्रोणहन्ता ते दर्पं छेत्स्यति पार्षतः ॥ ६ ॥

‘ आचार्यपुत्र! तुममें जो शक्ति, जो विज्ञान, जो बल- पराक्रम, जो पुरुषार्थ, कौरवोंपर जो प्रेम तथा हमलोगोंपर जो तुम्हारा द्वेष हो, साथ ही तुममें जो तेज और प्रभाव हो, वह सब मुझपर दिखाओ । द्रोणाचार्यका वध करनेवाला वह धृष्टद्युम्न ही तुम्हारा सारा घमंड चूर कर देगा ॥ ५-६ ॥

पृष्ठ 1540

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कालानलसमप्रख्यं द्विषतामन्तकोपमम् ।

समासादय पाञ्चाल्यं मां चापि सहकेशवम् ।

दर्पं नाशयितास्म्यद्य तवोद्वृत्तस्य संयुगे ॥ ७ ॥

' कालाग्निके समान तेजस्वी तथा शत्रुओंके लिये यमराजके समान भयंकर पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नपर तथा श्रीकृष्णसहित मुझपर भी तुम आक्रमण करो । तुम बड़े उद्दण्ड हो रहे हो । आज युद्धमें मैं तुम्हारा सारा घमंड दूर कर दूँगा ' ॥ ७ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

आचार्यपुत्रो मानार्हो बलवांश्चापि संजय ।

प्रीतिर्धनंजये चास्य प्रियश्चापि महात्मनः ॥ ८ ॥

न भूतपूर्वं बीभत्सोर्वाक्यं परुषमीदृशम् ।

अथ कस्मात् स कौन्तेयः सखायं रूक्षमुक्तवान् ॥ ९ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा — संजय! आचार्यपुत्र अश्वत्थामा बलवान् और सम्मानके योग्य है । उसका अर्जुनपर प्रेम है और वह भी महात्मा अर्जुनको प्रिय है । अर्जुनका उसके प्रति ऐसा कठोर वचन पहले कभी नहीं सुना गया । फिर उस दिन कुन्तीकुमार अर्जुनने अपने मित्रके प्रति वैसी कठोर बात क्यों कही? ॥ ८ -९ ॥ संजय उवाच

युवराजे हते चैव वृद्धक्षत्रे च पौरवे ।

इष्वस्त्रविधिसम्पन्ने मालवे च सुदर्शने ॥ १० ॥

धृष्टद्युम्ने सात्यकौ च भीमे चापि पराजिते ।

युधिष्ठिरस्य तैर्वाक्यैर्मर्मण्यपि च घट्टिते ॥ ११ ॥

अन्तर्भेदे च संजाते दुःखं संस्मृत्य च प्रभो ।

अभूतपूर्वो बीभत्सोर्दुःखान्मन्युरजायत ॥ १२ ॥

संजयने कहा — प्रभो! चेदिदेशके युवराज, पौरव वृद्धक्षत्र तथा बाणोंके प्रयोगमें कुशल मालवराज सुदर्शनके मारे जानेपर धृष्टद्युम्न, सात्यकि और भीमसेनके परास्त हो जानेपर अर्जुनके मनमें बड़ा कष्ट हुआ था । इसके सिवा, युधिष्ठिरके उन व्यंगवचनोंसे उनके मर्मस्थलमें बड़ी चोट पहुँची थी और पहलेके दुःखोंका स्मरण करके भी उनका हृदय फट गया था; अतः अधिक खेदके कारण अर्जुनके मनमें अभूतपूर्व क्रोध जाग उठा ॥ १०– १२ ॥

तस्मादनर्हमश्लीलमप्रियं द्रौणिमुक्तवान् ।

मान्यमाचार्यतनयं रूक्षं कापुरुषं यथा ॥ १३ ॥

इसीलिये माननीय आचार्यपुत्र अश्वत्थामाके प्रति, जो कठोर वचन सुननेके योग्य नहीं था, अर्जुनने कायर मनुष्यसे कहनेयोग्य अश्लील, अप्रिय और कठोर बातें कह