04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1571–1580

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1571–1580

पृष्ठ 1571

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राजन्! सब देवता भयभीत हो भगवान् शंकरकी शरणमें आये । तब क्रोध शान्त होनेपर उन्होंने उस यज्ञको पूर्ण किया । उन दिनों देवता लोग भाग खड़े हुए थे, तभीसे आजतक वे देवता उनसे डरते रहते हैं ॥ ६२-६३ ॥

असुराणां पुराण्यासंस्त्रीणि वीर्यवतां दिवि ।

आयसं राजतं चैव सौवर्णं परमं महत् ॥ ६४ ॥

पूर्वकालमें परम पराक्रमी तीन असुरोंके आकाशमें तीन नगर थे । एक लोहेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा अत्यन्त विशाल नगर सोनेका बना हुआ था ॥ ६४ ॥

सौवर्णं कमलाक्षस्य तारकाक्षस्य राजतम् ।

तृतीयं तु पुरं तेषां विद्युन्मालिन आयसम् ॥ ६५ ॥

उनमेंसे सोनेका नगर कमलाक्षके, चाँदीका तारकाक्षके तथा तीसरा लोहेका बना हुआ नगर विद्युन्मालीके अधिकारमें था ॥ ६५ ॥

न शक्तस्तानि मघवान् भेत्तुं सर्वायुधैरपि ।

अथ सर्वे सुरा रुद्रं जग्मुः शरणमर्दिताः ॥ ६६ ॥

इन्द्र सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंका प्रयोग करके भी उन नगरोंका भेदन न कर सके । तब उनसे पीड़ित हुए सम्पूर्ण देवता भगवान् शंकरकी शरणमें गये ॥ ६६ ॥

ते तमूचुर्महात्मानं सर्वे देवाः सवासवाः ।

ब्रह्मदत्तवरा ह्येते घोरास्त्रिपुरवासिनः ॥ ६७ ॥

पीडयन्त्यधिकं लोकं यस्मात् ते वरदर्पिताः । - इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंने महात्मा भगवान् शंकरसे कहा– ' प्रभो! ब्रह्माजीसे वरदान पाकर ये त्रिपुरनिवासी घोर दैत्य सम्पूर्ण जगत्‌को अधिकाधिक पीड़ा दे रहे हैं; क्योंकि वरदान प्राप्त होनेसे उनका घमंड बहुत बढ़ गया है ॥ ६७ ॥

त्वदृते देवदेवेश नान्यः शक्तः कथंचन ॥ ६८ ॥

हन्तुं दैत्यान् महादेव जहि तांस्त्वं सुरद्विषः । ‘ देवदेवेश्वर महादेव! आपके सिवा दूसरा कोई उन दैत्योंका वध करनेमें समर्थ नहीं है; अतः आप उन देवद्रोहियोंको मार डालिये ॥ ६८ ॥

रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु ॥ ६ ९ ॥ निपातयिष्यसे चैतानसुरान् भुवनेश्वर । ' भुवनेश्वर! रुद्र! आप जब इन असुरोंका विनाश कर डालेंगे, तबसे सम्पूर्ण यज्ञकर्मोंमें जो पशु ( यज्ञके साधनभूत उपकरण) होंगे, वे रुद्रके भाग समझे जायँगे ' ॥ स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा देवानां हितकाम्यया ॥ ७० ॥

गन्धमादनविन्ध्यौ च कृत्वा वंशध्वजौ हरः ।

पृथ्वीं ससागरवनां रथं कृत्वा तु शङ्करः ॥ ७१ ॥

अक्षं कृत्वा तु नागेन्द्रं शेषं नाम त्रिलोचनः ।

पृष्ठ 1572

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चक्रे कृत्वा तु चन्द्रार्कौ देवदेवः पिनाकधृक् ॥ ७२ ॥

अणी कृत्वैलपत्रं च पुष्पदन्तं च त्र्यम्बकः ।

यूपं कृत्वा तु मलयमवनाहं च तक्षकम् ॥ ७३ ॥

देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान् शिवने ' तथास्तु ' कहकर उनके हितकी इच्छासे गन्धमादन और विन्ध्याचल इन दो पर्वतोंको अपने रथके दो पार्श्ववर्ती ध्वज बनाये । फिर समुद्र और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीको रथ बनाकर नागराज शेषको उस रथका धुरा बनाया । तत्पश्चात् त्रिनेत्रधारी पिनाकपाणि देवाधिदेव महादेवने चन्द्रमा और सूर्य दोनोंको रथके दो पहिये बनाये । एलपत्रके पुत्र और पुष्पदन्तको जूएकी कीलें बनाया । फिर त्र्यम्बकने मलयाचलको यूप और तक्षक नागको जूआ बाँधनेकी रस्सी बना लिया ॥ ७०– ७३ ॥

योक्त्राङ्गानि च सत्त्वानि कृत्वा शर्वः प्रतापवान् ।

वेदान् कृत्वाऽथ चतुरश्चतुरश्वान् महेश्वरः ॥ ७४ ॥

इसी प्रकार प्रतापी भगवान् महेश्वरने अन्य प्राणियोंको जोते और बागडोर आदिके रूपमें रखकर चारों वेद ही रथके चार घोड़े बना लिये ॥ ७४ ॥

उपवेदान् खलीनांश्च कृत्वा लोकत्रयेश्वरः ।

गायत्रीं प्रग्रहं कृत्वा सावित्रीं च महेश्वरः ॥ ७५ ॥

तत्पश्चात् तीनों लोकोंके स्वामी महेश्वरने उपवेदोंको लगाम बनाकर गायत्री और सावित्रीको प्रग्रह बना लिया ॥ ७५ ॥

कृत्वोङ्कारं प्रतोदं च ब्रह्माणं चैव सारथिम् ।

गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा तु वासुकिम् ॥ ७६ ॥

विष्णुं शरोत्तमं कृत्वा शल्यमग्निं तथैव च ।

वायुं कृत्वाथ वाजाभ्यां पुखे वैवस्वतं यमम् ॥ ७७ ॥

फिर ओंकारको चाबुक, ब्रह्माजीको सारथि, मन्दराचलको गाण्डीव धनुष, वासुकिनागको उसकी प्रत्यंचा, भगवान् विष्णुको उत्तम बाण, अग्निदेवको उस बाणका फल, वायुको उसके पंख और वैवस्वत यमको उसकी पूँछ बनाया ॥ ७६-७७ ॥

विद्युत् कृत्वाथ निश्राणं मेरुं कृत्वाथ वै ध्वजम् ।

आरुह्य स रथं दिव्यं सर्वदेवमयं शिवः ॥ ७८ ॥

त्रिपुरस्य वधार्थाय स्थाणुः प्रहरतां वरः ।

असुराणामन्तकरः श्रीमानतुलविक्रमः ॥ ७९ ॥

बिजलीको उस बाणकी तीखी धार बनाकर मेरु पर्वतको प्रधान ध्वजके स्थानमें रखा । इस प्रकार सर्वदेवमय दिव्य रथ तैयार करके असुरोंका अन्त करनेवाले, अतुल पराक्रमी, योद्धाओंमें श्रेष्ठ तथा सदा स्थिर रहनेवाले श्रीमान् भगवान् शिव त्रिपुरवधके लिये उसपर आरूढ़ हुए ॥ ७८-७९ ॥

पृष्ठ 1573

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स्तूयमानः सुरैः पार्थ ऋषिभिश्च तपोधनैः ।

स्थानं माहेश्वरं कृत्वा दिव्यमप्रतिमं प्रभुः ॥ ८० ॥

अतिष्ठत् स्थाणुभूतः स सहस्रं परिवत्सरान् । पार्थ! उस समय सम्पूर्ण देवता और तपोधन महर्षि भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे । उन भगवान्‌ने उस अनुपम एवं दिव्य माहेश्वर स्थान (रथ ) - का निर्माण करके उसपर एक हजार वर्षोंतक स्थिरभावसे खड़े रहे ॥ ८० ॥

यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे पुराणि च ॥ ८१ ॥

त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि बिभेद सः । जब वे तीनों पुर आकाशमें एकत्र हुए, तब उन्होंने तीन गाँठ और तीन फलवाले बाणसे उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला ॥ ८१३ ॥

पुराणि न च तं शेकुर्दानवाः प्रतिवीक्षितुम् ॥ ८२ ॥

शरं कालाग्निसंयुक्तं विष्णुसोमसमायुतम् । उस समय दानव उन नगरोंकी ओर और कालाग्निसे संयुक्त एवं विष्णु तथा सोमकी शक्तिसे सम्पन्न उस बाणकी ओर भी आँख उठाकर देख न सके ॥ ८२३ ॥

पुराणि दग्धवन्तं तं देवी याता प्रवीक्षितुम् ॥ ८३ ॥

बालमङ्कगतं कृत्वा स्वयं पञ्चशिखं पुनः । जिस समय वे तीनों पुरोंको दग्ध कर रहे थे, उस समय पार्वतीदेवी भी उन्हें देखनेके लिये एक पाँच शिखावाले बालकको गोदमें लेकर वहाँ गयीं ॥ ८३ ॥

उमा जिज्ञासमाना वै कोऽयमित्यब्रवीत् सुरान् ॥ ८४ ॥

असूयतश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः ।

बाहुं सवज्रं तं तस्य क्रुद्धस्यास्तम्भयत् प्रभुः ॥ ८५ ॥

प्रहस्य भगवांस्तूर्णं सर्वलोकेश्वरो विभुः । पार्वतीदेवीने देवताओंसे पूछा - ' पहचानते हो, यह कौन है? ' उनके इस प्रश्नसे इन्द्रके हृदयमें असूया और क्रोधकी आग जल उठी, वे उस बालकपर वज्रका प्रहार करना ही चाहते थे कि सर्वलोकेश्वर सर्वव्यापी भगवान् शंकरने हँसकर उनकी वज्रसहित बाँहको स्तम्भित कर दिया ॥ ८४-८५३ ॥ ततः स स्तम्भितभुजः शक्रो देवगणैर्वृतः ॥ ८६ ॥

जगाम ससुरस्तूर्णं ब्रह्माणं प्रभुमव्ययम् । तदनन्तर स्तम्भित हुई भुजाके साथ ही देवताओंसहित इन्द्र तुरंत ही वहाँसे अविनाशी भगवान् ब्रह्माजीके पास गये ॥ ते तं प्रणम्य शिरसा प्रोचुः प्राञ्चलयस्तदा ॥ ८७ ॥

किमप्यङ्कगतं ब्रह्मन् पार्वत्या भूतमद्भुतम् ।

पृष्ठ 1574

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बालरूपधरं दृष्ट्वा नास्माभिरभिलक्षितः ॥ ८८ ॥

देवताओंने मस्तक झुकाकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा ——ब्रह्मन्! पार्वतीजीकी गोदमें बालरूपधारी एक अद्भुत प्राणी था, जिसे देखकर भी हमलोग पहचान नहीं सके हैं ॥ ८७-८८ ॥

तस्मात् त्वां प्रष्टुमिच्छामो निर्जिता येन वै वयम् ।

अयुध्यता हि बालेन लीलया सपुरंदराः ॥ ८ ९ ॥

‘ अतः हमलोग आपसे उसके विषयमें पूछना चाहते हैं, उस बालकने बिना युद्धके ही खेल- खेलमें इन्द्रसहित हम देवताओंको परास्त कर दिया ' ॥ ८ ९ ॥

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ।

ध्यात्वा स शम्भुं भगवान् बालं चामिततेजसम् ॥ ९० ॥

उनकी यह बात सुनकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् ब्रह्माने ध्यान करके अमिततेजस्वी बालरूपधारी शंकरको पहचान लिया ॥ ९ ० ॥

उवाच भगवान् ब्रह्मा शक्रादींश्च सुरोत्तमान् ।

चराचरस्य जगतः प्रभुः स भगवान् हरः ॥ ९ १ ॥

तस्मात् परतरं नान्यत् किंचिदस्ति महेश्वरात् ।

यो दृष्टो ह्युमया सार्धं युष्माभिरमितद्युतिः ॥ ९ २ ॥

स पार्वत्याः कृते शर्वः कृतवान् बालरूपताम् ।

ते मया सहिता यूयं प्रापयध्वं तमेव हि ॥ ९ ३ ॥

तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने उन देवश्रेष्ठ इन्द्र आदिसे कहा– 'देवताओ! वे चराचर जगत्के स्वामी साक्षात् भगवान् शंकर थे । उन महेश्वरसे बढ़कर दूसरी कोई सत्ता नहीं है । तुमलोगोंने पार्वतीजीके साथ जिस अमिततेजस्वी बालकका दर्शन किया है, उसके रूपमें भगवान् शंकर ही थे । उन्होंने पार्वतीजीकी प्रसन्नताके लिये बालरूप धारण कर लिया था; अतः तुमलोग मेरे साथ उन्हींकी शरणमें चलो ' ॥ ९ १ – ९ ३ ॥

स एष भगवान् देवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।

न सम्बुबुधिरे चैनं देवास्तं भुवनेश्वरम् ॥ ९ ४ ॥

सप्रजापतयः सर्वे बालार्कसदृशप्रभम् । उस बालकके रूपमें ये सर्वलोकेश्वर प्रभु भगवान् महादेव ही थे, किंतु प्रजापतियोंसहित सम्पूर्ण देवता बालसूर्यके सदृश कान्तिमान् उन जगदीश्वरको पहचान न सके ॥ ९ ४ ॥ अथाभ्येत्य ततो ब्रह्मा दृष्ट्वा स च महेश्वरम् ॥ ९ ५ ॥ अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तं पितामहः । तदनन्तर ब्रह्माजीने निकट जाकर भगवान् महेश्वरको देखा और ये ही सबसे श्रेष्ठ हैं, ऐसा जानकर उनकी वन्दना की ॥ ९ ५३ ॥

पृष्ठ 1575

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ब्रह्मोवाच त्वं यज्ञो भुवनस्यास्य त्वं गतिस्त्वं परायणम् ॥ ९ ६ ॥

त्वं भवस्त्वं महादेवस्त्वं धाम परमं पदम् ।

त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ९ ७ ॥

ब्रह्माजी बोले- भगवन्! आप ही यज्ञ, आप ही इस विश्वके सहारे और आप ही सबको शरण देनेवाले हैं, आप ही सबको उत्पन्न करनेवाले भव हैं, आप ही महादेव हैं और आप ही परमधाम एवं परमपद हैं । आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥

भगवन् भूतभव्येश लोकनाथ जगत्पते ।

प्रसादं कुरु शक्रस्य त्वया क्रोधार्दितस्य वै ॥ ९ ८ ॥

भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवन्! लोकनाथ! जगत्पते! ये इन्द्र आपके

क्रोधसे पीड़ित हो रहे हैं । आप इनपर कृपा कीजिये ॥ ९ ८ ॥

व्यास उवाच

पद्मयोनिवचः श्रुत्वा ततः प्रीतो महेश्वरः ।

प्रसादाभिमुखो भूत्वा अट्टहासमथाकरोत् ॥ ९९ ॥

व्यासजी कहते हैं — पार्थ! ब्रह्माजीकी बात सुनकर भगवान् महेश्वर प्रसन्न हो गये और कृपाके लिये उद्यत हो ठठाकर हँस पड़े ॥ ९९ ॥

ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः ।

अभवच्च पुनर्बाहुर्यथाप्रकृति वज्रिणः ॥ १०० ॥

तब देवताओंने पार्वतीदेवी तथा भगवान् शंकरको प्रसन्न किया । फिर वज्रधारी इन्द्रकी बाँह जैसी पहले थी, वैसी हो गयी ॥ १०० ॥

तेषां प्रसन्नो भगवान् सपत्नीको वृषध्वजः ।

देवानां त्रिदशश्रेष्ठो दक्षयज्ञविनाशनः ॥ १०१ ॥

दक्षयज्ञका विनाश करनेवाले देवश्रेष्ठ भगवान् वृषध्वज अपनी पत्नी उमाके साथ देवताओंपर प्रसन्न हो गये ॥ १०१ ॥

स वै रुद्रः स च शिवः सोऽग्निः सर्वश्च सर्ववित् ।

स चेन्द्रश्चैव वायुश्च सोऽश्विनौ च स विद्युतः ॥ १०२ ॥

वे ही रुद्र हैं, वे ही शिव हैं, वे ही अग्नि हैं, वे ही सर्वस्वरूप एवं सर्वज्ञ हैं । वे ही इन्द्र और वायु हैं, वे ही दोनों अश्विनीकुमार तथा विद्युत् हैं ॥ १०२ ॥

स भवः स च पर्जन्यो महादेवः सनातनः ।

स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः ॥ १०३ ॥

पृष्ठ 1576

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वे ही भव, वे ही मेघ और वे ही सनातन महादेव हैं । चन्द्रमा, ईशान, सूर्य और वरुण भी वे ही हैं ॥ १०३ ॥

स कालः सोऽन्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि तु ।

मासार्धमासा ऋतवः संध्ये संवत्सरश्च सः ॥ १०४ ॥

वे ही काल, अनाक, मृत्यु, यम, रात्रि, दिन, मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर ॥ १०४ ॥

धाता च स विधाता च विश्वात्मा विश्वकर्मकृत् ।

सर्वासां देवतानां च धारयत्यवपुर्वपुः ॥ १०५ ॥

वे ही धाता, विधाता, विश्वात्मा और विश्वरूपी कार्यके कर्ता हैं । वे शरीररहित होकर भी सम्पूर्ण देवताओंके शरीर धारण करते हैं ॥ १०५ ॥

सर्वदेवैः स्तुतो देवः सैकधा बहुधा च सः ।

शतधा सहस्रधा चैव भूयः शतसहस्रधा ॥ १०६ ॥

सम्पूर्ण देवता सदा उनकी स्तुति करते हैं । वे महादेवजी एक होकर भी अनेक हैं । सौ, हजार और लाखों रूपोंमें वे ही विराज रहे हैं ॥ १०६ ॥

द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः ।

घोरा चान्या शिवा चान्या ते तनू बहुधा पुनः ॥ १०७ ॥

वेदज्ञ ब्राह्मण उनके दो शरीर मानते हैं, एक घोर और दूसरा शिव। ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं और उन्हींसे पुनः बहुसंख्यक शरीर प्रकट हो जाते हैं ॥ १०७ ॥

घोरा तु या तनुस्तस्य सोऽग्निर्विष्णुः स भास्करः ।

सौम्या तु पुनरेवास्य आपो ज्योतींषि चन्द्रमाः ॥ १०८ ॥

उनका जो घोर शरीर है, वही अग्नि, विष्णु और सूर्य है और उनका सौम्य (शिव ) शरीर ही जल, ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा है ॥ १०८ ॥

वेदाः साङ्गोपनिषदः पुराणाध्यात्मनिश्चयाः ।

यदत्र परमं गुह्यं स वै देवो महेश्वरः ॥ १० ९ ॥

वेद, वेदांग, उपनिषद्, पुराण और अध्यात्मशास्त्रके जो सिद्धान्त हैं तथा उनमें भी जो परम रहस्य है, वह भगवान् महेश्वर ही हैं ॥ १० ९ ॥

ईदृशश्च महादेवो भूयांश्च भगवानजः ।

न हि सर्वे मया शक्या वक्तुं भगवतो गुणाः ॥ ११० ॥

अपि वर्षसहस्रेण सततं पाण्डुनन्दन । अर्जुन! यह है अजन्मा भगवान् महादेवका महामहिमस्वरूप । मैं सहस्रों वर्षोंतक लगातार वर्णन करता रहूँ तो भी भगवान्के समस्त गुणोंका पार नहीं पा सकता ॥ ११०३ || सर्वैर्ग्रहैर्गृहीतान् वै सर्वपापसमन्वितान् ॥ १११ ॥

पृष्ठ 1577

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स मोचयति सुप्रीतः शरण्यः शरणागतान् । जो सब प्रकारकी ग्रहबाधाओंसे पीड़ित हैं और सम्पूर्ण पापोंमें डूबे हुए हैं, वे भी यदि शरणमें आ जायँ तो शरणागतवत्सल भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें पाप- तापसे मुक्त कर देते हैं ॥ १११ ॥

आयुरारोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान् ॥ ११२ ॥

स ददाति मनुष्येभ्यः स चैवाक्षिपते पुनः । वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और प्रचुरमात्रामें मनोवांछित पदार्थ देते हैं तथा वे ही कुपित होनेपर फिर उन सबका संहार कर डालते हैं ॥ ११२३ ॥

सेन्द्रादिषु च देवेषु तस्य चैश्वर्यमुच्यते ॥ ११३ ॥

स चैव व्याप्तो लोके मनुष्याणां शुभाशुभे ।

ऐश्वर्याच्चैव कामानामीश्वरश्च स उच्यते ॥ ११४ ॥

इन्द्र आदि देवताओंमें उन्हींका ऐश्वर्य बताया जाता है, वे ही ईश्वर होनेके कारण लोकमें मनुष्योंके शुभाशुभ कर्मोंके फल देनेमें संलग्न रहते हैं । सम्पूर्ण कामनाओंके ईश्वर भी वे ही बताये जाते हैं ॥ ११३-११४ ॥

महेश्वरश्च महतां भूतानामीश्वरश्च सः ।

बहुभिर्बहुधा रूपैर्विश्वं व्याप्नोति वै जगत् ॥ ११५ ॥

महाभूतोंके ईश्वर होनेसे वे ही महेश्वर कहलाते हैं। वे नाना प्रकारके बहुसंख्यक रूपोंद्वारा सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं ॥ ११५ ॥

तस्य देवस्य यद् वक्त्रं समुद्रे तदधिष्ठितम् ।

वडवामुखेति विख्यातं पिबत् तोयमयं हविः ॥ ११६ ॥

उन महादेवजीका जो मुख है, वह समुद्र में स्थित है । वह ' वडवामुख ' नामसे विख्यात होकर जलमय हविष्यका पान करता है ॥ ११६ ॥

एष चैव श्मशानेषु देवो वसति नित्यशः ।

यजन्त्येनं जनास्तत्र वीरस्थान इतीश्वरम् ॥ ११७ ॥

ये ही महादेवजी श्मशानभूमि (काशीपुरी ) -में नित्य निवास करते हैं । वहाँ मनुष्य ‘ वीरस्थानेश्वर' के नामसे इनकी आराधना करते हैं ॥ ११७ ॥

अस्य दीप्तानि रूपाणि घोराणि च बहूनि च ।

लोके यान्यस्य पूज्यन्ते मनुष्याः प्रवदन्ति च ॥ ११८ ॥

इनके बहुत - से तेजस्वी घोर रूप हैं, जो लोकमें पूजित होते हैं और मनुष्य उनका कीर्तन करते रहते हैं ॥ ११८ ॥

नामधेयानि लोकेषु बहून्यस्य यथार्थवत् ।

निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात् कर्मणस्तथा ॥ ११ ९ ॥

पृष्ठ 1578

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1578 का मूल पृष्ठ
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उनकी महत्ता, सर्वव्यापकता तथा कर्मके अनुसार लोकमें इनके बहुत - से यथार्थ नाम बताये जाते हैं ॥ ११ ९ ॥

वेदे चास्य समाम्नातं शतरुद्रियमुत्तमम् ।

नाम्ना चानन्तरुद्रेति ह्युपस्थानं महात्मनः ॥ १२० ॥

यजुर्वेदमें भी परमात्मा शिवकी ' शतरुद्रिय ' नामक उत्तम स्तुति बतायी गयी है ।

अनन्तरुद्रनामसे इनका उपस्थान बताया गया है ॥ १२० ॥

स कामानां प्रभुर्देवो ये दिव्या ये च मानुषाः ।

स विभुः स प्रभुर्देवो विश्वं व्याप्नोति वै महत् ॥ १२१ ॥

जो दिव्य तथा मानव भोग हैं, उन सबके स्वामी ये महादेवजी ही हैं । ये देव इस विशाल विश्वमें व्याप्त हैं; इसलिये विभु और प्रभु कहलाते हैं ॥ १२१ ॥

ज्येष्ठं भूतं वदन्त्येनं ब्राह्मणा मुनयस्तथा ।

प्रथमो ह्येष देवानां मुखादस्यानलोऽभवत् ॥ १२२ ॥

ब्राह्मण और मुनिजन इन्हें सबसे ज्येष्ठ बताते हैं, ये देवताओंमें सबसे प्रथम हैं; इन्हींके मुखसे अग्निदेवका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ १२२ ॥

सर्वथा यत् पशून् पाति तैश्च यद् रमते पुनः तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात् पशुपतिः स्मृतः ॥ १२३ ॥

ये सर्वथा पशुओं (प्राणियों )) -- का पालन करते और उन्हींके साथ खेला करते हैं तथा उन पशुओंके अधिपति हैं; इसलिये ' पशुपति' कहे गये हैं ॥ १२३ ॥

दिव्यं च ब्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यथा स्थितम् ।

महयत्येष लोकांश्च महेश्वर इति स्मृतः ॥ १२४ ॥

इनका दिव्य लिंग ब्रह्मचर्यसे स्थित है । ये सम्पूर्ण लोकोंको महिमान्वित करते हैं; इसलिये महेश्वर कहे गये हैं ॥ १२४ ॥

ऋषयश्चैव देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।

लिङ्गमस्यार्चयन्ति स्म तच्चाप्यूर्ध्वं समास्थितम् ॥ १२५ ॥

ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ इनके ऊर्ध्वलोकस्थित लिंगविग्रह ( प्रतीक) -की पूजा करती हैं ॥ १२५ ॥

पूज्यमाने ततस्तस्मिन् मोदते स महेश्वरः ।

सुखी प्रीतश्च भवति प्रहृष्टश्चैव शङ्करः ॥ १२६ ॥

उस लिंग अर्थात् प्रतीककी पूजा होनेपर कल्याणकारी भगवान् महेश्वर आनन्दित होते हैं । सुखी, प्रसन्न तथा हर्षोल्लाससे परिपूर्ण होते हैं ॥ १२६ ॥

यदस्य बहुधा रूपं भूतभव्यभवस्थितम् ।

स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्ततः स्मृतः ॥ १२७ ॥

पृष्ठ 1579

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1579 का मूल पृष्ठ
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भूत, भविष्य और वर्तमान- तीनों कालोंमें इनके स्थावर- जंगम बहुत- से रूप स्थित होते हैं; इसलिये इन्हें ' बहुरूप ' नाम दिया गया है ॥ १२७ ॥

एकाक्षो जाज्वलन्नास्ते सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।

क्रोधाद् यश्चाविशल्लोकांस्तस्मात् सर्व इति स्मृतः ॥ १२८ ॥

यद्यपि उनके सब ओर नेत्र हैं, तथापि उनका एक विलक्षण अग्निमय नेत्र अलग भी है, जो सदा क्रोधसे प्रज्वलित रहता है; वे सब लोकोंमें समाविष्ट होनेके कारण ' सर्व ' कहे गये हैं ॥ १२८ ॥

धूम्ररूपं च यत् तस्य धूर्जटिस्तेन चोच्यते ।

विश्वेदेवाश्च यत् तस्मिन् विश्वरूपस्ततः स्मृतः ॥ १२ ९ ॥

उनका रूप धूम्रवर्णका है; इसलिये वे ' धूर्जटि' कहलाते हैं । विश्वेदेव उन्हींमें प्रतिष्ठित हैं, इसलिये उनका एक नाम 'विश्वरूप' है ॥ १२ ९ ॥

तिस्रो देवीर्यदा चैव भजते भुवनेश्वरः ।

द्यामपः पृथिवीं चैव त्र्यम्बकश्च ततः स्मृतः ॥ १३० ॥

वे भगवान् भुवनेश्वर आकाश, जल और पृथ्वी इन अम्बास्वरूपा तीन देवियोंको अपनाते, उनकी रक्षा करते हैं, इसलिये त्र्यम्बक कहे गये हैं ॥ १३० ॥

समेधयति यन्नित्यं सर्वार्थान् सर्वकर्मसु ।

शिवमिच्छन् मनुष्याणां तस्मादेष शिवः स्मृतः ॥ १३१ ॥

ये मनुष्योंका कल्याण चाहते हुए उनके समस्त कर्मोंमें सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंकी समृद्धि ( सिद्धि ) करते हैं, इसलिये ' शिव ' कहे गये हैं ॥ १३१ ॥

सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।

यच्च विश्वं महत् पाति महादेवस्ततः स्मृतः ॥ १३२ ॥

उनके सहस्र अथवा दस हजार नेत्र हैं अथवा वे सब ओरसे नेत्रमय ही हैं । भगवान् शिव महान् विश्वका पालन करते हैं; इसलिये ' महादेव' कहे गये हैं ॥ १३२ ॥

महत् पूर्वं स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिस्थितश्च यत् ।

स्थितलिङ्गश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृतः ॥ १३३ ॥

वे पूर्वकालसे ही महान् रूपमें स्थित हैं, प्राणोंकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा उनका लिंगमय शरीर सदा स्थिर रहता है; इसलिये उन्हें ' स्थाणु ' कहते हैं ॥ १३३ ॥

सूर्याचन्द्रमसोर्लोके प्रकाशन्ते रुचश्च याः ।

ताः केशसंज्ञितास्त्र्यक्षे व्योमकेशस्ततः स्मृतः ॥ १३४ ॥

लोकमें जो सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें प्रकाशित होती हैं, वे भगवान् त्रिलोचनके केश कही गयी हैं । वे व्योम ( आकाश ) में प्रकाशित होती हैं; इसलिये उनका नाम ' व्योमकेश' ॥ १३४ ॥

भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं जगदशेषतः ।

पृष्ठ 1580

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1580 का मूल पृष्ठ
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भव एव ततो यस्माद् भूतभव्यभवोद्भवः ॥ १३५ ॥

भूत, वर्तमान और भविष्य सम्पूर्ण जगत् भगवान् शंकरसे ही विस्तारको प्राप्त हुआ है; इसलिये वे ‘ भूतभव्यभवोद्भव' कहे गये हैं ॥ १३५ ॥

कपिः श्रेष्ठ इति प्रोक्तो धर्मश्च वृष उच्यते ।

स देवदेवो भगवान् कीर्त्यतेऽतो वृषाकपिः ॥ १३६ ॥

कपि कहते हैं श्रेष्ठको और वृष नाम है धर्मका । वृष और कपि दोनों होनेके कारण देवाधिदेव भगवान् शंकर ' वृषाकपि' कहलाते हैं ॥ १३६ ॥

ब्रह्माणमिन्द्रं वरुणं यमं धनदमेव च ।

निगृह्य हरते यस्मात् तस्माद्धर इति स्मृतः ॥ १३७ ॥

वे ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, यम तथा कुबेरको भी काबूमें करके उनसे उनका ऐश्वर्य हर लेते हैं; इसलिये ' हर' कहे गये हैं ॥ १३७ ॥

निमीलिताभ्यां नेत्राभ्यां बलाद् देवो महेश्वरः ।

ललाटे नेत्रमसृजत् तेन त्र्यक्षः स उच्यते ॥ १३८ ॥

उन भगवान् महेश्वरने दोनों नेत्रोंको बंद करके अपने ललाटमें बलपूर्वक तीसरे नेत्रकी सृष्टि की, इसलिये उन्हें त्रिनेत्र कहते हैं ॥ १३८ ॥

विषमस्थः शरीरेषु समश्च प्राणिनामिह ।

स वायुर्विषमस्थेषु प्राणोऽपानः शरीरिषु ॥ १३ ९ ॥

वे प्राणियोंके शरीरोंमें विषम संख्यावाले पाँच प्राणोंके साथ निवास करते हुए सदा समभावसे स्थित रहते हैं । विषम परिस्थितियोंमें पड़े हुए समस्त देहधारियोंके भीतर वे ही प्राणवायु और अपानवायुके रूपमें विराजमान हैं ॥ १३ ९ ॥

पूजयेद् विग्रहं यस्तु लिङ्गं चापि महात्मनः ।

लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते ॥ १४० ॥

जो कोई भी मनुष्य हो, उसे महात्मा शिवके अर्चाविग्रह अथवा लिंग ( प्रतीक) -की पूजा करनी चाहिये । लिंग अथवा प्रतिमाकी पूजा करनेवाला पुरुष बड़ी भारी सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है ॥ १४० ॥

ऊरुभ्यामर्धमाग्नेयं सोमर्धं च शिवा तनुः ।

आत्मनोऽर्धं तथा चाग्निः सोमोऽर्धं पुनरुच्यते ॥ १४१ ॥

दोनों जाँघोंसे नीचे भगवान् शिवका आधा शरीर आग्नेय अथवा घोर है तथा उससे ऊपरका आधा शरीर सोम एवं शिव है। किसी -किसीके मतमें उनके सम्पूर्ण शरीरका आधा भाग ‘ अग्नि ' और आधा भाग ' सोम ' कहलाता है ॥ १४१ ॥

तैजसी महती दीप्ता देवेभ्योऽस्य शिवा तनुः ।

भास्वती मानुषेष्वस्य तनुर्घोराग्निरुच्यते ॥ १४२ ॥