04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1581–1590

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1581–1590

पृष्ठ 1581

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उनका जो शिव शरीर है, वह तेजोमय और परम कान्तिमान् है । वह देवताओंके उपयोगमें आता है तथा मनुष्यलोकमें उनका प्रकाशमान घोर शरीर ‘ अग्नि ’ कहलाता है ॥ १४२ ॥

ब्रह्मचर्यं चरत्येष शिवा यास्य तनुस्तया ।

यास्य घोरतरा मूर्तिः सर्वानत्ति तयेश्वरः ॥ १४३ ॥

उनकी जो शिव मूर्ति है, वह जगत्की रक्षाके लिये ब्रह्मचर्यका पालन करती है और उनकी जो घोरतर मूर्ति है, उसके द्वारा भगवान् शंकर सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं ॥ १४३ ॥

यन्निर्दहति यत् तीक्ष्णो यदुग्रो यत् प्रतापवान् ।

मांसशोणितमज्जादो यत् ततो रुद्र उच्यते ॥ १४४ ॥

ये प्रतापी देवता प्रलयकालमें अत्यन्त तीक्ष्ण एवं उग्र रूप धारण करके सबको दग्ध कर डालते हैं और प्राणियोंके रक्त, मांस एवं मज्जाको भी भक्षण करते हैं; अतः रौद्रभावके कारण ‘ रुद्र ' कहलाते हैं ॥ १४४ ॥

एष देवो महादेवो योऽसौ पार्थ तवाग्रतः ।

संग्रामे शात्रवान् निघ्नंस्त्वया दृष्टः पिनाकधृक् ॥ १४५ ॥

अर्जुन! संग्रामभूमिमें जो तुम्हारे आगे शत्रुओंका संहार करते हुए दिखायी दिये हैं, वे ये ही पिनाकधारी भगवान् महादेव हैं ॥ १४५ ॥

सिन्धुराजवधार्थाय प्रतिज्ञाते त्वयानघ ।

कृष्णेन दर्शितः स्वप्ने यस्तु शैलेन्द्रमूर्धनि ॥ १४६ ॥

एष वै भगवान् देवः संग्रामे याति तेऽग्रतः ।

येन दत्तानि तेऽस्त्राणि यैस्त्वया दानवा हताः ॥ १४७ ॥

निष्पाप अर्जुन! जब तुमने सिंधुराजके वधकी प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हें गिरिराजके शिखरपर जिनका दर्शन कराया था, ये वे ही भगवान् शंकर संग्राममें तुम्हारे आगे - आगे चल रहे हैं । उन्होंने ही तुम्हें वे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनके द्वारा तुमने दानवोंका संहार किया है ॥ १४६-१४७ ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम् ।

देवदेवस्य ते पार्थ व्याख्यातं शतरुद्रियम् ॥ १४८ ॥

पार्थ! यह देवाधिदेव भगवान् शिवके ' शतरुद्रिय' स्तोत्रकी व्याख्या की गयी है । यह स्तोत्र वेदोंके समान परम पवित्र तथा धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है ॥ १४८ ॥

सर्वार्थसाधनं पुण्यं सर्वकिल्बिषनाशनम् ।

सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभयापहम् ॥ १४ ९ ॥

इसके पाठसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है । यह पवित्र स्तोत्र सम्पूर्ण किल्बिषोंका नाशक, सब पापोंका निवारक तथा सब प्रकारके दुःख और भयको दूर करनेवाला

पृष्ठ 1582

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है ॥ १४ ९ ॥

चतुर्विधमिदं स्तोत्रं यः शृणोति नरः सदा ।

विजित्य शत्रून् सर्वान् स रुद्रलोके महीयते ॥ १५० ॥

जो मनुष्य भगवान् शंकरके ब्रह्मा, विष्णु महेश और निर्गुण निराकार– इन चतुर्विध स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाले इस स्तोत्रको सदा सुनता है, वह सम्पूर्ण शत्रुओंको जीतकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १५० ॥

चरितं महात्मनो नित्यं सांग्रामिकमिदं स्मृतम् ।

पठन् वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्च सततोत्थितः ॥ १५१ ॥

भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु च यः सदा ।

वरान् कामान् स लभते प्रसन्ने त्र्यम्बके नरः ॥ १५२ ॥

परमात्मा शिवका यह चरित सदा संग्राममें विजय दिलानेवाला है, जो सदा उद्यत रहकर शतरुद्रियको पढ़ता और सुनता है तथा मनुष्योंमें जो कोई भी निरन्तर भगवान् विश्वेश्वरका भक्तिभावसे भजन करता है, वह उन त्रिलोचनके प्रसन्न होनेपर समस्त उत्तम कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १५१-१५२ ॥

गच्छ युद्धयस्व कौन्तेय न तवास्ति पराजयः ।

यस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वस्थो हि जनार्दनः ॥ १५३ ॥

कुन्तीनन्दन! जाओ, युद्ध करो । तुम्हारी पराजय नहीं हो सकती; क्योंकि तुम्हारे मन्त्री, रक्षक और पार्श्ववर्ती साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हैं ॥ १५३ ॥

पृष्ठ 1583

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संजय उवाच

एवमुक्त्वार्जुनं संख्ये पराशरसुतस्तदा ।

जगाम भरतश्रेष्ठ यथागतमरिंदम ॥ १५४ ॥

संजय कहते हैं— शत्रुओंका दमन करने वाले भरतश्रेष्ठ! युद्धस्थलमें अर्जुनसे ऐसा कहकर पराशरनन्दन व्यासजी जैसे आये थे, वैसे चले गये ॥ १५४ ॥

युद्धं कृत्वा महद् घोरं पञ्चाहानि महाबलः ।

ब्राह्मणो निहतो राजन् ब्रह्मलोकमवाप्तवान् ॥ १५५ ॥

राजन्! पाँच दिनोंतक अत्यन्त घोर युद्ध करके महाबली ब्राह्मण द्रोणाचार्य मारे गये और ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ १५५ ॥

स्वधीते यत् फलं वेदे तदस्मिन्नपि पर्वणि ।

क्षत्रियाणामभीरूणां युक्तमत्र महद् यशः ॥ १५६ ॥

वेदोंके स्वाध्यायसे जो फल मिलता है, वही इस पर्वके पाठ और श्रवणसे भी प्राप्त होता है । इसमें निर्भय होकर युद्ध करनेवाले वीर क्षत्रियोंके महान् यशका वर्णन है ॥ १५६ ॥

पृष्ठ 1584

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य इदं पठते पर्व शृणुयाद् वापि नित्यशः ।

स मुच्यते महापापैः कृतैर्घोरैश्च कर्मभिः ॥ १५७ ॥

जो प्रतिदिन इस पर्वको पढ़ता अथवा सुनता है, वह पहलेके किये हुए बड़े - बड़े पापों तथा घोर कर्मोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १५७ ॥

यज्ञावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह नित्यं घोरे युद्धे क्षत्रियाणां यशश्च । शेषौ वर्णौ काममिष्टं लभेते पुत्रान् पौत्रान् नित्यमिष्टांस्तथैव ॥ १५८ ॥

इसको प्रतिदिन पढ़ने और सुननेसे ब्राह्मणको यज्ञका फल प्राप्त होता है, क्षत्रियोंको घोर युद्धमें सुयशकी प्राप्ति होती है, शेष दो वर्णके लोगोंको भी पुत्र, पौत्र आदि अभीष्ट एवं प्रिय वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं ॥ १५८ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि द्वयधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें दो सौदोवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २०२ ॥

[द्रोणपर्व सम्पूर्णम्] अनुष्टुप् छन्द ( अन्य बड़े छन्द ) बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके कुलयोग अनुष्टुप् मानकर गिननेपर उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक - ९ ३७ ९ ॥ ( २ ९ १ ॥ ) ४००।- ९७८० /--दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये श्लोक - १३० ( ५ ) ६॥- १३६ ॥ = द्रोणपर्वकी सम्पूर्ण श्लोक संख्या ९९ १७= 0 श्रवण - महिमा स्वधीते यत् फलं वेदे तदस्मिन्नपि पर्वणि ।

पृष्ठ 1585

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क्षत्रियाणामभीरूणां युक्तमत्र महद् यशः ॥ १ ॥

य इदं पठते पर्व शृणुयाद् वापि नित्यशः ।

स मुच्यते महापापैः कृतैर्घोरैश्च कर्मभिः ॥ २ ॥

यज्ञावाप्तिर्ब्राह्मणस्येह नित्यं घोरे युद्धे क्षत्रियाणां यशश्च । शेष वर्णौ काममिष्टं लभेते पुत्रान् पौत्रान् नित्यमिष्टांस्तथैव ॥ ३ ॥

पृष्ठ 1586

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्रीमहाभारतम् कर्णपर्व प्रथमोऽध्यायः कर्णवधका संक्षिप्त वृत्तान्त सुनकर जनमेजयका वैशम्पायनजीसे उसे विस्तारपूर्वक कहनेका अनुरोध

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

‘ अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, ( उनके नित्य सखा ) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, ( उनकी लीला प्रकट करनेवाली ) भगवती सरस्वती और ( उन लीलाओंका संकलन करनेवाले ) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत ) -का पाठ करना चाहिये । ' वैशम्पायन उवाच

ततो द्रोणे हते राजन् दुर्योधनमुखा नृपाः ।

भृशमुद्विग्नमनसो द्रोणपुत्रमुपागमन् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! द्रोणाचार्यके मारे जानेपर दुर्योधन आदि राजाओंका मन अत्यन्त उद्विग्न हो गया था । वे सब-ब- के - सब द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके पास आये ॥ १ ॥

ते द्रोणमनुशोचन्तः कश्मलाभिहतौजसः ।

पर्युपासन्त शोकार्तास्ततः शारद्वतीसुतम् ॥ २ ॥

मोहवश उनका बल और उत्साह नष्ट -सा हो गया था । वे द्रोणाचार्यके लिये बारंबार चिन्ता करते हुए शोकसे व्याकुल हो कृपीकुमार अश्वत्थामाके पास उसके चारों ओर बैठ गये ॥ २ ॥

ते मुहूर्तं समाश्वस्य हेतुभिः शास्त्रसम्मितैः ।

रात्र्यागमे महीपालाः स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥ ३ ॥

वे शास्त्रानुकूल युक्तियोंद्वारा दो घड़ीतक अश्वत्थामाको सान्त्वना देते रहे । फिर रात हो जानेपर समस्त भूपाल अपने - अपने शिविरमें चले गये ॥ ३ ॥

ते वेश्मस्वपि कौरव्य पृथ्वीशा नाप्नुवन् सुखम् ।

चिन्तयन्तः क्षयं तीव्रं दुःखशोकसमन्विताः ॥ ४ ॥

पृष्ठ 1587

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कुरुनन्दन! शिविरोंमें भी वे भूपगण सुख न पा सके । संग्राममें जो घोर विनाश हुआ था, उसका चिन्तन करते हुए दुःख और शोक में डूब गये ॥ ४ ॥

विशेषतः सूतपुत्रो राजा चैव सुयोधनः ।

दुःशासनश्च शकुनिः सौबलश्च महाबलः ॥ ५ ॥

उषितास्ते निशां तां तु दुर्योधननिवेशने ।

चिन्तयन्तः परिक्लेशान् पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ६ ॥

विशेषतः सूतपुत्र कर्ण, राजा दुर्योधन, दुःशासन तथा महाबली सुबलपुत्र शकुनि — ये चारों उस रातको दुर्योधनके ही शिविरमें रहे और महात्मा पाण्डवोंको जो बड़े - बड़े क्लेश दिये गये थे; उनका चिन्तन करते रहे ॥ ५-६ ॥

यत् तद् द्यूते परिक्लिष्टा कृष्णा चानायिता सभाम् ।

तत् स्मरन्तोऽनुशोचन्तो भृशमुद्विग्नचेतसः ॥ ७ ॥

द्यूत -क्रीडाके समय जो द्रुपदकुमारी कृष्णाको सभामें लाया गया और उसे सर्वथा क्लेश पहुँचाया गया, उसका बारंबार स्मरण करके वे शोकमग्न हो जाते और मन - ही - मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठते थे ॥ ७ ॥

तथा तु संचिन्तयतां तान् क्लेशान् द्यूतकारितान् ।

दुःखेन क्षणदा राजन् जगामाब्दशतोपमा ॥ ८ ॥

राजन्! इस प्रकार पाण्डवोंको जूएके द्वारा प्राप्त कराये गये उन क्लेशोंका चिन्तन करते - करते उनकी वह रात सौ वर्षोंके समान बड़े कष्टसे व्यतीत हुई ॥ ८ ॥

ततः प्रभाते विमले स्थिता दिष्टस्य शासने ।

चक्रुरावश्यकं सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ९ ॥

तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल आनेपर दैवके अधीन हुए समस्त कौरवोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार शौच, स्नान, संध्या- वन्दन आदि आवश्यक कार्य पूर्ण किया ॥ ९ ॥

ते कृत्वावश्यकार्याणि समाश्वस्य च भारत ।

योगमाज्ञापयामासुर्युद्धाय च विनिर्ययुः ॥ १० ॥

कर्णं सेनापतिं कृत्वा कृतकौतुकमङ्गलाः ।

पूजयित्वा द्विजश्रेष्ठान् दधिपात्रघृताक्षतैः ॥ ११ ॥

गोभिरश्वैश्च निष्कैश्च वासोभिश्च महाधनैः ।

वन्द्यमाना जयाशीर्भिः सूतमागधवन्दिभिः ॥ १२ ॥

भरतनन्दन! प्रतिदिनके आवश्यक कार्य सम्पन्न करके आश्वस्त हो उन्होंने सैनिकोंको कवच आदि धारण करके तैयार हो जानेकी आज्ञा दी तथा कौतुक एवं मांगलिक कृत्य पूर्ण करके कर्णको सेनापति बनाकर वे सब के सब दही, पात्र, घृत, अक्षत, गौ, अश्व, कण्ठभूषण तथा बहुमूल्य वस्त्रोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका आदर-सत्कार करके सूत, मागध और

पृष्ठ 1588

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वन्दीजनोंद्वारा विजय- सूचक आशीर्वादोंसे अभिवन्दित हो युद्धके लिये निकले ॥ १०– १२ ॥

तथैव पाण्डवा राजन् कृतपूर्वाह्निकक्रियाः ।

शिबिरान्निर्ययुस्तूर्णं युद्धाय कृतनिश्चयाः ॥ १३ ॥

राजन्! इसी प्रकार पाण्डव भी पूर्वाह्नमें किये जानेवाले नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करके तुरंत ही शिविरसे बाहर निकले । उन्होंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था ॥ १३ ॥

ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।

कुरूणां पाण्डवानां च परस्परजयैषिणाम् ॥ १४ ॥

तदनन्तर एक- दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले कौरवों और पाण्डवोंमें भयंकर रोमांचकारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥

तयोर्द्वी दिवसौ युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ।

कर्णे सेनापतौ राजन् बभूवाद्भुतदर्शनम् ॥ १५ ॥

राजन्! कर्णके सेनापति हो जानेपर उन कौरव - पाण्डव - सेनाओंमें दो दिनोंतक अद्भुत युद्ध हुआ ॥ १५ ॥

ततः शत्रुक्षयं कृत्वा सुमहान्तं रणे वृषः ।

पश्यतां धार्तराष्ट्राणां फाल्गुनेन निपातितः ॥ १६ ॥

उस युद्धमें शत्रुओंका महान् संहार करके कर्ण धृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते- देखते अर्जुनके हाथसे मारा गया ॥

ततस्तु संजयः सर्वं गत्वा नागपुरं द्रुतम् ।

आचष्ट धृतराष्ट्राय यद् वृत्तं कुरुजाङ्गले ॥ १७ ॥

तदनन्तर संजयने तुरंत हस्तिनापुरमें जाकर कुरुक्षेत्रमें जो घटना घटित हुई थी, वह सब धृतराष्ट्रसे कह सुनायी ॥ १७ ॥

जनमेजय उवाच

आपगेयं हतं श्रुत्वा द्रोणं चापि महारथम् ।

आजगाम परामार्तिं वृद्धो राजाम्बिकासुतः ॥ १८ ॥

जनमेजय बोले- ब्रह्मन्! गंगानन्दन भीष्म तथा महारथी द्रोणको मारा गया सुनकर ही बूढ़े राजा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रको बड़ी भारी वेदना हुई थी ॥ १८ ॥

स श्रुत्वा निहतं कर्णं दुर्योधनहितैषिणम् ।

कथं द्विजवर प्राणानधारयत दुःखितः ॥ १ ९ ॥

द्विजश्रेष्ठ! फिर दुर्योधनके हितैषी कर्णके मारे जानेका समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखी हो उन्होंने अपने प्राण कैसे धारण किये? ॥ १ ९ ॥ यस्मिञ्जयाशां पुत्राणां सममन्यत पार्थिवः ।

पृष्ठ 1589

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तस्मिन् हते स कौरव्यः कथं प्राणानधारयत् ॥ २० ॥

कुरुवंशी राजाने जिसके ऊपर अपने पुत्रोंकी विजयकी आशा बाँध रखी थी, उसके मारे जानेपर उन्होंने कैसे प्राण धारण किये? ॥ २० ॥

दुरं तदहं मन्ये नृणां कृच्छ्रेऽपि वर्तताम् ।

यत्र कर्णं हतं श्रुत्वा नात्यजज्जीवितं नृपः ॥ २१ ॥

मैं समझता हूँ कि बड़े भारी संकटमें पड़ जानेपर भी मनुष्योंके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करना अत्यन्त कठिन है, तभी तो कर्णवधका वृत्तान्त सुनकर भी राजा धृतराष्ट्रने इस जीवनका त्याग नहीं किया ॥ २१ ॥

तथा शान्तनवं वृद्धं ब्रह्मन् बाह्लीकमेव च ।

द्रोणं च सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ॥ २२ ॥

तथैव चान्यान् सुहृदः पुत्रान् पौत्रांश्च पातितान् ।

श्रुत्वा यन्नाजहात् प्राणांस्तन्मन्ये दुष्करं द्विज ॥ २३ ॥

ब्रह्मन! उन्होंने वृद्ध शान्तनुनन्दन भीष्म, बाह्लीक, द्रोण, सोमदत्त तथा भूरिश्रवाको और अन्यान्य सुहृदों, पुत्रों एवं पौत्रोंको भी शत्रुओंद्वारा मारा गया सुनकर भी जो अपने प्राण नहीं छोड़े, उससे मुझे यही मालूम होता है कि मनुष्यके लिये स्वेच्छापूर्वक मरना बहुत कठिन है ॥ २२-२३ ॥

एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने ।

न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥ २४ ॥

महामुने! यह सारा वृत्तान्त आप मुझसे विस्तारपूर्वक कहें । मैं अपने पूर्वजोंका महान् चरित्र सुनकर तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि जनमेजयवाक्यं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें जनमेजयवाक्य नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

पृष्ठ 1590

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द्वितीयोऽध्यायः धृतराष्ट्र और संजयका संवाद वैशम्पायन उवाच

हते कर्णे महाराज निशि गावल्गणिस्तदा ।

दीनो ययौ नागपुरमश्वैर्वातसमैर्जवे ॥ १ ॥

वैशम्पायनजीने कहा - महाराज! कर्णके मारे जानेपर गवल्गणपुत्र संजय अत्यन्त दुःखी हो वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा उसी रातमें हस्तिनापुर जा पहुँचे ॥ १ ॥

स हास्तिनपुरं गत्वा भृशमुद्विग्नचेतनः ।

जगाम धृतराष्ट्रस्य क्षयं प्रक्षीणबान्धवम् ॥ २ ॥

उस समय उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो रहा था । हस्तिनापुरमें पहुँचकर वे धृतराष्ट्रके उस महलमें गये, जहाँ रहनेवाले बन्धु- बान्धव प्रायः नष्ट हो चुके थे ॥ २ ॥

स तमुद्वीक्ष्य राजानं कश्मलाभिहतौजसम् ।

ववन्दे प्राञ्जलिर्भूत्वा मूर्ध्ना पादौ नृपस्य ह ॥ ३ ॥

मोहवश जिनके बल और उत्साह नष्ट हो गये थे, उन राजा धृतराष्ट्रका दर्शन करके संजयने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर हाथ जोड़ प्रणाम किया ॥ ३ ॥

सम्पूज्य च यथान्यायं धृतराष्ट्रं महीपतिम् ।

हा कष्टमिति चोक्त्वा स ततो वचनमाददे ॥ ४ ॥

राजा धृतराष्ट्रका यथायोग्य सम्मान करके संजयने ' हाय! बड़े कष्टकी बात है ' ऐसा कहकर फिर इस प्रकार वार्तालाप आरम्भ किया- ॥ ४ ॥

संजयोऽहं क्षितिपते कच्चिदास्ते सुखं भवान् ।

स्वदोषैरापदं प्राप्य कच्चिन्नाद्य विमुह्यति ॥ ५ ॥

‘ पृथ्वीनाथ! मैं संजय हूँ । आप सुखसे तो हैं न? अपने ही अपराधोंसे विपत्तिमें पड़कर आज आप मोहित तो नहीं हो रहे हैं? ॥ ५ ॥

हितान्युक्तानि विदुरद्रोणगाङ्गेयकेशवैः ।

अगृहीतान्यनुस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ॥ ६ ॥

' विदुर, द्रोणाचार्य, भीष्म और श्रीकृष्णके कहे हुए हितकारक वचन आपने स्वीकार नहीं किये थे । अब उन वचनोंको बारंबार याद करके क्या आपको व्यथा नहीं होती है? ॥ ६ ॥

रामनारदकण्वाद्यैर्हितमुक्तं सभातले ।

न गृहीतमनुस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ॥ ७ ॥