04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 161–170

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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भगवान् हृषीकेशसे ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने युद्धमें त्रिगर्तोंकी व्यूहाकार खड़ी हुई सेनापर आक्रमण किया ॥ ७ ॥

स देवदत्तमादाय शङ्खं हेमपरिष्कृतम् ।

दध्मौ वेगेन महता घोषेणापूरयन् दिशः ॥ ८ ॥

उन्होंने सुवर्णजटित देवदत्त नामक शंख लेकर उसकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको परिपूर्ण करते हुए उसे बड़े वेग से बजाया ॥ ८ ॥

तेन शब्देन वित्रस्ता संशप्तकवरूथिनी ।

विचेष्टावस्थिता संख्ये ह्यश्मसारमयी यथा ॥ ९ ॥

उस शंखनादसे भयभीत हो वह संशप्तक- सेना युद्धभूमिमें लोहेकी प्रतिमाके समान निश्चेष्ट खड़ी हो गयी ॥ ९ ॥

( सा सेना भरतश्रेष्ठ निश्चेष्टा शुशुभे तदा ।

चित्र पटे यथा न्यस्ता कुशलैः शिल्पिभिर्नरैः ॥

भरतश्रेष्ठ! वह निश्चेष्ट हुई सेना ऐसी सुशोभित हुई, मानो कुशल कलाकारोंद्वारा चित्रपटमें अंकित की गयी हो ।

स्वनेन तेन सैन्यानां दिवमावृण्वता तदा ।

सस्वना पृथिवी सर्वा तथैव च महोदधिः ॥

स्वनेन सर्वसैन्यानां कर्णास्तु बधिरीकृताः । ) सम्पूर्ण आकाशमें फैले हुए उस शंखनादने समूची पृथ्वी और महासागरको भी प्रतिध्वनित कर दिया । उस ध्वनिसे सम्पूर्ण सैनिकोंके कान बहरे हो गये ।

वाहास्तेषां विवृत्ताक्षाः स्तब्धकर्णशिरोधराः ।

विष्टब्धचरणा मूत्रं रुधिरं च प्रसुस्रुवुः ॥ १० ॥

उनके घोड़े आँखें फाड़- फाड़कर देखने लगे । उनके कान और गर्दन स्तब्ध हो गये, चारों पैर अकड़ गये और वे मूत्रके साथ- साथ रुधिरका भी त्याग करने लगे ॥ १० ॥

उपलभ्य ततः संज्ञामवस्थाप्य च वाहिनीम् ।

युगपत् पाण्डुपुत्राय चिक्षिपुः कङ्कपत्रिणः ॥ ११ ॥

थोड़ी देरमें चेत होनेपर संशप्तकोंने अपनी सेनाको स्थिर किया और एक साथ ही पाण्डुपुत्र अर्जुनपर कंकपक्षीकी पाँखवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥

तान्यर्जुनः सहस्राणि दशपञ्चभिराशुगैः ।

अनागतान्येव शरैश्चिच्छेदाशु पराक्रमी ॥ १२ ॥

परंतु पराक्रमी अर्जुनने पंद्रह शीघ्रगामी बाणोंद्वारा उनके सहस्रों बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही शीघ्रतापूर्वक काट डाला ॥ १२ ॥

ततोऽर्जुनं शितैर्बाणैर्दशभिर्दशभिः पुनः ।

प्राविध्यन्त ततः पार्थस्तानविध्यत् त्रिभिस्त्रिभिः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 162

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तदनन्तर संशप्तकोंने दस-दस तीखे बाणोंसे पुनः अर्जुनको बींध डाला, यह देख उन कुन्तीकुमारने भी तीन - तीन बाणोंसे संशप्तकोंको घायल कर दिया ॥ १३ ॥

एकैकस्तु ततः पार्थं राजन् विव्याध पञ्चभिः ।

स च तान् प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमी ॥ १४ ॥

राजन्! फिर उनमेंसे एक-एक योद्धाने अर्जुनको पाँच- पाँच बाणोंसे बींध डाला और पराक्रमी अर्जुनने भी दो-दो बाणोंद्वारा उन सबको घायल करके तुरंत बदला चुकाया ॥ १४ ॥

भूय एव तु संक्रुद्धास्त्वर्जुनं सहकेशवम् ।

आपूरयन् शरैस्तीक्ष्णैस्तडागमिव वृष्टिभिः ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् अत्यन्त कुपित हो संशप्तकोंने पुनः श्रीकृष्णसहित अर्जुनको पैने बाणोंद्वारा उसी प्रकार परिपूर्ण करना आरम्भ किया, जैसे मेघ वर्षाद्वारा सरोवरको पूर्ण करते हैं ॥ १५ ॥

ततः शरसहस्राणि प्रापतन्नर्जुनं प्रति ।

भ्रमराणामिव व्राताः फुल्लं द्रुमगणं वने ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् अर्जुनपर एक ही साथ हजारों बाण गिरे, मानो वनमें फूले हुए वृक्षपर भौंरोंके समूह आ गिरे हों ॥ १६ ॥

ततः सुबाहुस्त्रिंशद्भिरद्रिसारमयैः शरैः ।

अविध्यदिषुभिर्गाढं किरीटे सव्यसाचिनम् ॥ १७ ॥

तदनन्तर सुबाहुने लोहेके बने हुए तीस बाणोंद्वारा अर्जुनके किरीटमें गहरा आघात किया ॥ १७ ॥

तैः किरीटी किरीटस्थैर्हेमपुङ्खैरजिह्मगैः ।

शातकुम्भमयापीडो बभौ सूर्य इवोत्थितः ॥ १८ ॥

सोनेके पंखोंसे युक्त सीधे जानेवाले वे बाण उनके किरीटमें चारों ओरसे धँस गये । उन बाणोंद्वारा किरीटधारी अर्जुनकी वैसी ही शोभा हुई जैसे स्वर्णमय मुकुटसे मण्डित भगवान् सूर्य उदित एवं प्रकाशित हो रहे हों ॥ १८ ॥

हस्तावापं सुबाहोस्तु भल्लेन युधि पाण्डवः ।

चिच्छेद तं चैव पुनः शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १ ९ ॥

तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने भल्लका प्रहार करके युद्धमें सुबाहुके दस्तानेको काट दिया और उसके ऊपर पुनः बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १ ९ ॥

ततः सुशर्मा दशभिः सुरथस्तु किरीटिनम् ।

सुधर्मा सुधनुश्चैव सुबाहुश्च समार्पयत् ॥ २० ॥

यह देख सुशर्मा, सुरथ, सुधर्मा, सुधन्वा और सुबाहुने दस- दस बाणोंसे किरीटधारी अर्जुनको घायल कर दिया ॥ २० ॥

पृष्ठ 163

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तांस्तु सर्वान् पृथग्बाणैर्वानरप्रवरध्वजः ।

प्रत्यविध्यद् ध्वजांश्चैषां भल्लैश्चिच्छेद सायकान् ॥ २१ ॥

फिर कपिध्वज अर्जुनने भी पृथक् -पृथक् बाण मारकर उन सबको घायल कर दिया ।

भल्लोंद्वारा उनकी ध्वजाओं तथा सायकोंको भी काट गिराया ॥ २१ ॥

सुधन्वनो धनुश्छित्त्वा हयांश्चास्यावधीच्छरैः ।

अथास्य सशिरस्त्राणं शिरः कायादपातयत् ॥ २२ ॥

सुधन्वाका धनुष काटकर उसके घोड़ोंको भी बाणोंसे मार डाला । फिर शिरस्त्राणसहित उसके मस्तकको भी काटकर धड़से नीचे गिरा दिया ॥ २२ ॥

तस्मिन्निपतिते वीरे त्रस्तास्तस्य पदानुगाः ।

व्यद्रवन्त भयाद् भीता यत्र दौर्योधनं बलम् ॥ २३ ॥

वीरवर सुधन्वाके धराशायी हो जानेपर उसके अनुगामी सैनिक भयभीत हो गये, वे भयके मारे वहीं भाग गये, जहाँ दुर्योधनकी सेना थी ॥ २३ ॥

ततो जघान संक्रुद्धो वासविस्तां महाचमूम् ।

शरजालैरविच्छिन्नैस्तमः सूर्य इवांशुभिः ॥ २४ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए इन्द्रकुमार अर्जुनने बाणसमूहोंकी अविच्छिन्न वर्षा करके उस विशाल वाहिनीका उसी प्रकार संहार आरम्भ किया, जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंद्वारा महान् अन्धकारका नाश करते हैं ॥ २४ ॥

ततो भग्ने बले तस्मिन् विप्रलीने समन्ततः ।

सव्यसाचिनि संक्रुद्धे त्रैगर्तान् भयमाविशत् ॥ २५ ॥

पृष्ठ 164

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तदनन्तर जब संशप्तकोंकी सारी सेना भागकर चारों ओर छिप गयी और सव्यसाची अर्जुन अत्यन्त क्रोधमें भर गये, तब उन त्रिगर्तदेशीय योद्धाओंके मनमें भारी भय समा गया ॥ २५ ॥

ते वध्यमानाः पार्थेन शरैः संनतपर्वभिः ।

अमुह्यंस्तत्र तत्रैव त्रस्ता मृगगणा इव ॥ २६ ॥

अर्जुनके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंकी मार खाकर वे सभी सैनिक वहाँ भयभीत मृगोंकी भाँति मोहित हो गये ॥

ततस्त्रिगर्तराट् क्रुद्धस्तानुवाच महारथान् ।

अलं द्रुतेन वः शूरा न भयं कर्तुमर्हथ ॥ २७ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए त्रिगर्तराजने अपने उन महारथियोंसे कहा– ' शूरवीरो! भागनेसे

कोई लाभ नहीं है । तुम भय न करो ॥ २७ ॥

शप्त्वाथ शपथान् घोरान् सर्वसैन्यस्य पश्यतः ।

गत्वा दौर्योधनं सैन्यं किं वै वक्ष्यथ मुख्यशः ॥ २८ ॥

‘ सारी सेनाके सामने भयंकर शपथ खाकर अब यदि दुर्योधनकी सेनामें जाओगे तो तुम सभी श्रेष्ठ महारथी क्या जवाब दोगे? ॥ २८ ॥

नावहास्याः कथं लोके कर्मणानेन संयुगे । भवेम सहिताः सर्वे निवर्तध्वं यथाबलम् ॥ २ ९ ॥ ‘ हमें युद्धमें ऐसा कर्म करके किसी प्रकार संसारमें उपहासका पात्र नहीं बनना चाहिये । अतः तुम सब लोग लौट आओ । हमें यथाशक्ति एक साथ संगठित होकर युद्धभूमिमें डटे रहना चाहिये ' ॥ २ ९ ॥

एवमुक्तास्तु ते राजन्नुदक्रोशन् मुहुर्मुहुः ।

शङ्खांश्च दध्मिरे वीरा हर्षयन्तः परस्परम् ॥ ३० ॥

राजन्! त्रिगर्तराजके ऐसा कहनेपर वे सभी वीर बारंबार गर्जना करने और एक- दूसरेमें हर्ष एवं उत्साह भरते हुए शंख बजाने लगे ॥ ३० ॥

ततस्ते संन्यवर्तन्त संशप्तकगणाः पुनः ।

नारायणाश्च गोपाला मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ३१ ॥

तब वे समस्त संशप्तकगण और नारायणी सेनाके ग्वाले मृत्युको ही युद्धसे निवृत्तिका अवसर मानकर पुनः लौट आये ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि सुधन्ववधे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

पृष्ठ 165

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इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें सुधन्वाका वधविषयक अठारहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३ श्लोक मिलाकर कुल ३३३ श्लोक हैं। )

पृष्ठ 166

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एकोनविंशोऽध्यायः संशप्तकगणोंके साथ अर्जुनका घोर युद्ध संजय उवाच

दृष्ट्वा तु संनिवृत्तांस्तान् संशप्तकगणान् पुनः ।

वासुदेवं महात्मानमर्जुनः समभाषत ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! उन संशप्तकगणोंको पुनः लौटा हुआ देख अर्जुनने महात्मा श्रीकृष्णसे कहा – ॥

चोदयाश्वान् हृषीकेश संशप्तकगणान् प्रति ।

नैते हास्यन्ति संग्रामं जीवन्त इति मे मतिः ॥ २ ॥

' हृषीकेश! घोड़ोंको इन संशप्तकगणोंकी ओर ही बढ़ाइये । मुझे ऐसा जान पड़ता है, ये जीते- जी रणभूमिका परित्याग नहीं करेंगे ॥ २ ॥

पश्य मेऽस्त्रबलं घोरं बाह्वोरिष्वसनस्य च ।

अद्यैतान् पातयिष्यामि क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ॥ ३ ॥

' आज आप मेरे अस्त्र, भुजाओं और धनुषका बल देखिये । क्रोधमें भरे हुए रुद्रदेव जैसे पशुओं ( जगत्के जीवों ) का संहार करते हैं, उसी प्रकार मैं भी इन्हें मार गिराऊँगा ' ॥

ततः कृष्णः स्मितं कृत्वा प्रतिनन्द्य शिवेन तम् ।

प्रावेशयत दुर्धर्षो यत्र यत्रैच्छदर्जुनः ॥ ४ ॥

तब श्रीकृष्णने मुसकराकर अर्जुनकी मंगलकामना करते हुए उनका अभिनन्दन किया और दुर्धर्ष वीर अर्जुनने जहाँ - जहाँ जानेकी इच्छा की, वहीं - वहीं उस रथको पहुँचाया ॥

स रथो भ्राजतेऽत्यर्थमुह्यमानो रणे तदा ।

उह्यमानमिवाकाशे विमानं पाण्डुरैर्हयैः ॥ ५ ॥

रणभूमिमें श्वेत घोड़ोंद्वारा खींचा जाता हुआ वह रथ उस समय आकाशमें उड़नेवाले विमानके समान अत्यन्त शोभा पा रहा था ॥ ५ ॥

मण्डलानि ततश्चक्रे गतप्रत्यागतानि च ।

यथा शक्ररथो राजन् युद्धे देवासुरे पुरा ॥ ६ ॥

राजन्! पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंके संग्राममें इन्द्रका रथ जिस प्रकार चलता था, उसी प्रकार अर्जुनका रथ भी कभी आगे बढ़कर और कभी पीछे हटकर मण्डलाकार गतिसे घूमने लगा ॥ ६ ॥

अथ नारायणाः क्रुद्धा विविधायुधपाणयः ।

छादयन्तः शरव्रातैः परिवव्रुर्धनंजयम् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 167

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तब क्रोधमें भरे हुए नारायणीसेनाके गोपोंने हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्र लेकर अर्जुनको अपने बाण- समूहोंसे आच्छादित करते हुए उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥

अदृश्यं च मुहूर्तेन चक्रुस्ते भरतर्षभ ।

कृष्णेन सहितं युद्धे कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ॥ ८ ॥

भरतश्रेष्ठ! उन्होंने दो ही घड़ीमें श्रीकृष्णसहित कुन्तीकुमार अर्जुनको युद्धमें अदृश्य कर दिया ॥ ८ ॥

क्रुद्धस्तु फाल्गुनः संख्ये द्विगुणीकृतविक्रमः ।

गाण्डीवं धनुरामृज्य तूर्णं जग्राह संयुगे ॥ ९ ॥

तब अर्जुनने कुपित होकर युद्धमें अपना द्विगुण पराक्रम प्रकट करते हुए गाण्डीव धनुषको सब ओरसे पोंछकर उसे तुरंत हाथमें लिया ॥ ९ ॥

बद्ध्वा च भ्रुकुटिं वक्रे क्रोधस्य प्रतिलक्षणम् ।

देवदत्तं महाशङ्खं पूरयामास पाण्डवः ॥ १० ॥

फिर पाण्डुकुमारने भौंहें टेढ़ी करके क्रोधको सूचित करनेवाले अपने महान् शंख देवदत्तको बजाया ॥

अथास्त्रमरिसंघघ्नं त्वाष्ट्रमभ्यस्यदर्जुनः ।

ततो रूपसहस्राणि प्रादुरासन् पृथक् पृथक् ॥ ११ ॥

तदनन्तर अर्जुनने शत्रुसमूहोंका नाश करनेवाले त्वाष्ट्र नामक अस्त्रका प्रयोग किया । फिर तो उस अस्त्रसे सहस्रों रूप पृथक् - पृथक् प्रकट होने लगे ॥ ११ ॥

आत्मनः प्रतिरूपैस्तैर्नानारूपैर्विमोहिताः ।

अन्योन्येनार्जुनं मत्वा स्वमात्मानं च जघ्निरे ॥ १२ ॥

अपने ही समान आकृतिवाले उन नाना रूपोंसे मोहित हो वे एक- दूसरेको अर्जुन मानकर अपने तथा अपने ही सैनिकोंपर प्रहार करने लगे ॥ १२ ॥

अयमर्जुनोऽयं गोविन्द इमौ पाण्डवयादवौ ।

इति ब्रुवाणाः सम्मूढा जघ्नुरन्योन्यमाहवे ॥ १३ ॥

ये अर्जुन हैं, ये श्रीकृष्ण हैं, ये दोनों अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं - इस प्रकार बोलते हुए वे मोहाच्छन्न हो युद्धमें एक- दूसरेपर आघात करने लगे ॥ १३ ॥

मोहिताः परमास्त्रेण क्षयं जग्मुः परस्परम् ।

अशोभन्त रणे योधाः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ १४ ॥

उस दिव्यास्त्रसे मोहित हो वे परस्परके आघातसे क्षीण होने लगे । उस रणक्षेत्रमें समस्त योद्धा फूले हुए पलाश वृक्षके समान शोभा पा रहे थे ॥ १४ ॥

ततः शरसहस्राणि तैर्विमुक्तानि भस्मसात् ।

कृत्वा तदस्त्रं तान् वीराननयद् यमसादनम् ॥ १५ ॥

पृष्ठ 168

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तत्पश्चात् उस दिव्यास्त्रने संशप्तकोंके छोड़े हुए सहस्रों बाणोंको भस्म करके बहुसंख्यक वीरोंको यमलोक पहुँचा दिया ॥ १५ ॥

अथ प्रहस्य बीभत्सुर्ललित्थान् मालवानपि ।

मावेल्लकांस्त्रिगर्तांश्च यौधेयांश्चार्दयच्छरैः ॥ १६ ॥

इसके बाद अर्जुनने हँसकर ललित्थ, मालव, मावेल्लक, त्रिगर्त तथा यौधेय सैनिकोंको बाणोंद्वारा गहरी पीड़ा पहुँचायी ॥ १६ ॥

ते हन्यमाना वीरेण क्षत्रियाः कालचोदिताः ।

व्यसृजञ्छरजालानि पार्थे नानाविधानि च ॥ १७ ॥

वीर अर्जुनके द्वारा मारे जाते हुए क्षत्रियगण कालसे प्रेरित हो अर्जुनके ऊपर नाना प्रकारके बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ १७ ॥

न ध्वजो नार्जुनस्तत्र न रथो न च केशवः ।

प्रत्यदृश्यत घोरेण शरवर्षेण संवृतः ॥ १८ ॥

उस भयंकर बाण - वर्षासे ढक जानेके कारण वहाँ न ध्वज दिखायी देता था, न रथ; न अर्जुन दृष्टिगोचर हो रहे थे, न भगवान् श्रीकृष्ण ॥ १८ ॥

ततस्ते लब्धलक्षत्वादन्योन्यमभिचुक्रुशुः ।

हतौ कृष्णाविति प्रीत्या वासांस्यादुधुवुस्तदा ॥ १ ९ ॥

उस समय ‘ हमने अपने लक्ष्यको मार लिया' ऐसा समझकर वे एक-दूसरेकी ओर देखते हुए चोर- जोरसे सिंहनाद करने लगे और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन मारे गये – ऐसा सोचकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने कपड़े हिलाने लगे ॥ १ ९ ॥

भेरीमृदङ्गशङ्खांश्च दध्मुर्वीराः सहस्रशः ।

सिंहनादरवांश्चोग्रांश्चक्रिरे तत्र मारिष ॥ २० ॥

आर्य! वे सहस्रों वीर वहाँ भेरी, मृदंग और शंख बजाने तथा भयानक सिंहनाद करने लगे ॥ २० ॥

ततः प्रसिष्विदे कृष्णः खिन्नश्चार्जुनमब्रवीत् ।

क्वासि पार्थ न पश्ये त्वां कच्चिज्जीवसि शत्रुहन् ॥ २१ ॥

उस समय श्रीकृष्ण पसीने - पसीने हो गये और खिन्न होकर अर्जुनसे बोले — ‘ पार्थ! कहाँ हो । मैं तुम्हें देख नहीं पाता हूँ । शत्रुओंका नाश करनेवाले वीर! क्या तुम जीवित हो? ' ॥ २१ ॥

तस्य तद् भाषितं श्रुत्वा त्वरमाणो धनंजयः ।

वायव्यास्त्रेण तैरस्तां शरवृष्टिमपाहरत् ॥ २२ ॥

श्रीकृष्णका वह वचन सुनकर अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ वायव्यास्त्रका प्रयोग करके शत्रुओंद्वारा की हुई उस बाण- वर्षाको नष्ट कर दिया ॥ २२ ॥

ततः संशप्तकव्रातान् साश्वद्विपरथायुधान् ।

पृष्ठ 169

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उवाह भगवान् वायुः शुष्कपर्णचयानिव ॥ २३ ॥

तदनन्तर भगवान् वायुदेवने घोड़े, हाथी, रथ और आयुधोंसहित संशप्तकसमूहोंको वहाँसे सूखे पत्तोंके ढेरकी भाँति उड़ाना आरम्भ किया ॥ २३ ॥

उह्यमानास्तु ते राजन् बह्वशोभन्त वायुना ।

प्रडीनाः पक्षिणः काले वृक्षेभ्य इव मारिष ॥ २४ ॥

माननीय महाराज! वायुके द्वारा उड़ाये जाते हुए वे सैनिक समय- समयपर वृक्षोंसे उड़नेवाले पक्षियोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २४ ॥

तांस्तथा व्याकुलीकृत्य त्वरमाणो धनंजयः ।

जघान निशितैर्बाणैः सहस्राणि शतानि च ॥ २५ ॥

उन सबको व्याकुल करके अर्जुन अपने पैने बाणोंसे शीघ्रतापूर्वक उनके सौ- सौ और हजार - हजार योद्धाओंका एक साथ संहार करने लगे ॥ २५ ॥

शिरांसि भल्लैरहरद् बाहूनपि च सायुधान् ।

हस्तिहस्तोपमांश्चोरून् शरैरुर्व्यामपातयत् ॥ २६ ॥

उन्होंने भल्लोंद्वारा उनके सिर उड़ा दिये, आयुधोंसहित भुजाएँ काट डालीं और हाथीकी सूँड़के समान मोटी जाँघोंको भी बाणोंद्वारा पृथ्वीपर काट गिराया ॥ २६ ॥

पृष्ठच्छिन्नान् विचरणान् बाहुपार्श्वेक्षणाकुलान् ।

नानाङ्गावयवैर्हीनांश्चकारारीन् धनंजयः ॥ २७ ॥

पृष्ठ 170

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धनंजयने शत्रुओंको शरीरके अनेक अंगोंसे विहीन कर दिया । किन्हींकी पीठ काट ली तो किन्हींके पैर उड़ा दिये । कितने ही सैनिक बाहु, पसली और नेत्रोंसे वंचित होकर व्याकुल हो रहे थे ॥ २७ ॥

गन्धर्वनगराकारान् विधिवत्कल्पितान् रथान् ।

शरैर्विशकलीकुर्वश्चक्रे व्यश्वरथद्विपान् ॥ २८ ॥

उन्होंने गन्धर्वनगरोंके समान प्रतीत होनेवाले और विधिवत् सजे हुए रथोंके अपने बाणोंद्वारा टुकड़े- टुकड़े कर दिये और शत्रुओंको हाथी, घोड़े एवं रथोंसे वंचित कर दिये ॥ २८ ॥

मुण्डतालवनानीव तत्र तत्र चकाशिरे ।

छिन्ना रथध्वजव्राताः केचित्तत्र क्वचित् क्वचित् ॥ २ ९ ॥

वहाँ कहीं - कहीं रथवर्ती ध्वजोंके समूह ऊपरसे कट जानेके कारण मुण्डित तालवनोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २ ९ ॥

सोत्तरायुधिनो नागाः सपताकाङ्कुशध्वजाः ।

पेतुः शक्राशनिहता द्रुमवन्त इवाचलाः ॥ ३० ॥

पताका, अंकुश और ध्वजोंसे विभूषित गजराज वहाँ इन्द्रके वज्रसे मारे हुए वृक्षयुक्त पर्वतोंके समान ऊपर चढ़े हुए योद्धाओंसहित धराशायी हो गये ॥ ३० ॥

चामरापीडकवचाः स्रस्तान्त्रनयनास्तथा ।

सारोहास्तुरगाः पेतुः पार्थबाणहताः क्षितौ ॥ ३१ ॥

चामर, माला और कवचोंसे युक्त बहुत -से घोड़े अर्जुनके बाणोंसे मारे जाकर

सवारोंसहित धरतीपर पड़े थे । उनकी आँतें और आँखें बाहर निकल आयी थीं ॥

विप्रविद्धासिनखराश्छिन्नवर्मर्ष्टिशक्तयः ।

पत्तयश्छिन्नवर्माणः कृपणाः शेरते हताः ॥ ३२ ॥

पैदल सैनिकोंके खड्ग एवं नखर कटकर गिरे हुए थे । कवच, ऋष्टि और शक्तियोंके टुकड़े -टुकड़े हो गये थे । कवच कट जानेसे अत्यन्त दीन हो वे मरकर पृथ्वीपर पड़े थे ॥ ३२ ॥

तैर्हतैर्हन्यमानैश्च पतद्भिः पतितैरपि ।

भ्रमद्भिर्निष्टनद्भिश्च क्रूरमायोधनं बभौ ॥ ३३ ॥

कितने ही वीर मारे गये थे और कितने ही मारे जा रहे थे । कुछ गिर गये थे और कुछ गिर रहे थे । कितने ही चक्कर काटते और आघात करते थे । इन सबके द्वारा वह युद्धस्थल अत्यन्त क्रूरतापूर्ण जान पड़ता था ॥ ३३ ॥

रजश्च सुमहज्जातं शान्तं रुधिरवृष्टिभिः ।

मही चाप्यभवद् दुर्गा कबन्धशतसंकुला ॥ ३४ ॥