04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1631–1640
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1631–1640
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संजय! युद्धस्थलमें किरीटधारी अर्जुनके द्वारा उस महाधनुर्धर कर्णके मारे जानेपर कौन - कौन - से वीर ठहर सके; यह मुझे बताओ ॥ ३५ ॥
कच्चिन्नैकः परित्यक्तः पाण्डवैर्निहतो रणे ।
उक्तं त्वया पुरा तात यथा वीरो निपातितः ॥ ३६ ॥
तात! कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि कर्णको अकेला छोड़ दिया गया हो और समस्त पाण्डवोंने मिलकर उसे मार डाला हो; क्योंकि तुम पहले बता चुके हो कि वीर कर्ण मारा गया ॥ ३६ ॥
भीष्ममप्रतियुद्धयन्तं शिखण्डी सायकोत्तमैः ।
पातयामास समरे सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥ ३७ ॥
समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्म जब युद्ध नहीं कर रहे थे, उस दशामें शिखण्डीने अपने उत्तम बाणोंद्वारा उन्हें समरांगणमें मार गिराया ॥ ३७ ॥
तथा द्रौपदिना द्रोणो न्यस्तसर्वायुधो युधि ।
युक्तयोगो महेष्वासः शरैर्बहुभिराचितः ॥ ३८ ॥
निहतः खड्गमुद्यम्य धृष्टद्युम्नेन संजय ।
अन्तरेण हतावेतौ छलेन च विशेषतः ॥ ३ ९ ॥
इसी प्रकार जब महाधनुर्धर द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें अपने सारे अस्त्र- शस्त्रोंको नीचे डालकर ब्रह्मका ध्यान लगाये हुए बैठे थे, उस अवस्थामें द्रुपद- पुत्र धृष्टद्युम्नने उन्हें बहुसंख्यक बाणोंसे ढक दिया और तलवार उठाकर उनका सिर काट लिया । संजय! इस प्रकार ये दोनों वीर छिद्र मिल जानेसे विशेषतः छलपूर्वक मारे गये ॥
श्रीषमहमेतद् वै भीष्मद्रोणौ निपातितौ ।
भीष्मद्रोणौ हि समरे न हन्याद् वज्रभृत् स्वयम् ॥ ४० ॥
न्यायेन युध्यमानौ हि तद् वै सत्यं ब्रवीमि ते । मैंने यह समाचार भी सुना था कि भीष्म और द्रोणाचार्य मार गिराये गये, परंतु मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ कि ये भीष्म और द्रोण यदि समरभूमिमें न्यायपूर्वक युद्ध करते होते तो इन्हें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी नहीं मार सकते थे ॥ ४० ॥
कर्णं त्वस्यन्तमस्त्राणि दिव्यानि च बहूनि च ॥ ४१ ॥
कथमिन्द्रोपमं वीरं मृत्युर्युद्धे समस्पृशत् । मैं पूछता हूँ कि युद्धमें बहुत- से दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करते हुए इन्द्रके समान पराक्रमी वीर कर्णको मृत्यु कैसे छू सकी? ॥ ४१३ ॥
यस्य विद्युत्प्रभां शक्तिं दिव्यां कनकभूषणाम् ॥ ४२ ॥
प्रायच्छद् द्विषतां हन्त्रीं कुण्डलाभ्यां पुरंदरः ।
यस्य सर्पमुखो दिव्यः शरः काञ्चनभूषणः ॥ ४३ ॥
अशेत निशितः पत्री समरेष्वरिसूदनः ।
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भीष्मद्रोणमुखान् वीरान् योऽवमन्ये महारथान् ॥ ४४ ॥
जामदग्न्यान्महाघोरं ब्राह्ममस्त्रमशिक्षत ।
यश्च द्रोणमुखान् दृष्ट्वा विमुखानर्दिताञ्शरैः ॥ ४५ ॥
सौभद्रस्य महाबाहुर्व्यधमत् कार्मुकं शितैः ।
यश्च नागायुतप्राणं वज्ररंहसमच्युतम् ॥ ४६ ॥
विरथं सहसा कृत्वा भीमसेनमथाहसत् ।
सहदेवं च निर्जित्य शरैः संनतपर्वभिः ॥ ४७ ॥
कृपया विरथं कृत्वा नाहनद् धर्मचिन्तया ।
यश्च मायासहस्राणि विकुर्वाणं जयैषिणम् ॥ ४८ ॥
घटोत्कचं राक्षसेन्द्रं शक्रशक्त्या निजघ्निवान् ।
एतांश्च दिवसान् यस्य युद्धे भीतो धनंजयः ॥ ४ ९ ॥
नागमद् द्वैरथं वीरः स कथं निहतो रणे । जिसे देवराज इन्द्रने दो कुण्डलोंके बदलेमें विद्युत्के समान प्रकाशित होनेवाली तथा शत्रुओंका नाश करनेमें समर्थ सुवर्णभूषित दिव्य शक्ति प्रदान की थी, जिसके तूणीरमें सर्पके समान मुखवाला दिव्य, सुवर्णभूषित, कंकपत्रयुक्त एवं युद्धमें शत्रुसंहारक तीखा बाण सदा शयन करता था, जो भीष्म द्रोण आदि महारथी वीरोंकी भी अवहेलना करता था, जिसने जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे अत्यन्त घोर ब्रह्मास्त्रकी शिक्षा पायी थी और जिस महाबाहु वीरने सुभद्राकुमारके बाणोंसे पीड़ित हुए द्रोणाचार्य आदिको युद्धसे विमुख हुआ देख अपने तीखे बाणोंसे उसका धनुष काट डाला था, जिसने दस हजार हाथियोंके समान बलशाली, वज्रके समान तीव्र वेगवाले, अपराजित वीर भीमसेनको सहसा रथहीन करके उनकी हँसी उड़ायी थी, जिसने सहदेवको जीतकर झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उन्हें रथहीन करके भी धर्मके विचारसे दयावश उनके प्राण नहीं लिये; जिसने सहस्रों मायाओंकी सृष्टि करनेवाले विजयाभिलाषी राक्षसराज घटोत्कचको इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे मार डाला तथा इतने दिनोंतक अर्जुन जिससे भयभीत होकर उसके साथ द्वैरथ- युद्धमें सम्मिलित नहीं हो सके, वही वीर कर्ण रणभूमिमें मारा कैसे गया? ॥ संशप्तकानां योधा ये आह्वयन्त सदान्यतः ॥ ५० ॥
एतान् हत्वा हनिष्यामि पश्चाद् वैकर्तनं रणे ।
इति व्यपदिशन् पार्थो वर्जयन् सूतजं रणे ॥ ५१ ॥
स कथं निहतो वीरः पार्थेन परवीरहा । ‘ संशप्तकोंमेंसे जो योद्धा सदा मुझे दूसरी ओर युद्धके लिये बुलाया करते हैं, इन्हें पहले मारकर पीछे वैकर्तन कर्णका रणभूमिमें वध करूँगा । ' ऐसा बहाना बनाकर अर्जुन जिस सूतपुत्रको युद्धस्थलमें छोड़ दिया करते थे, उसी शत्रुवीरोंके संहारक वीरवर कर्णको अर्जुनने किस प्रकार मारा? ॥ ५०-५१ ॥
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रथभङ्गो न चेत् तस्य धनुर्वा न व्यशीर्यत ॥ ५२ ॥
न चेदस्त्राणि निर्णेशुः स कथं निहतः परेः । यदि उसका रथ नहीं टूट गया था, धनुषके टुकड़े -टुकड़े नहीं हो गये थे और अस्त्र नहीं नष्ट हुए थे, तब शत्रुओंने उसे किस प्रकार मार दिया? ॥ ५२३ ॥
को हि शक्तो रणे कर्णं विधुन्वानं महद् धनुः ॥ ५३ ॥
विमुञ्चन्तं शरान् घोरान् दिव्यान्यस्त्राणि चाहवे ।
जेतुं पुरुषशार्दूलं शार्दूलमिव वेगिनम् ॥ ५४ ॥
सिंहके समान वेगशाली पुरुषसिंह कर्ण जब अपना विशाल धनुष कँपाता हुआ युद्धस्थलमें दिव्यास्त्र तथा भयंकर बाण छोड़ रहा हो, उस समय उसे कौन जीत सकता था? ॥ ५३-५४ ॥
ध्रुवं तस्य धनुश्छिन्नं रथो वापि महीं गतः ।
अस्त्राणि वा प्रणष्टानि यथा शंससि मे हतम् ॥ ५५ ॥
निश्चय ही उसका धनुष कट गया होगा या रथ धरतीमें धँस गया होगा अथवा उसके अस्त्र नष्ट हो गये होंगे, तभी जैसा कि तुम मुझे बता रहे हो, वह मारा गया होगा ॥ ५५ ॥
न ह्यन्यदपि पश्यामि कारणं तस्य नाशने ।
न हन्मि फाल्गुनं यावत् तावत् पादौ न धावये ॥ ५६ ॥
इति यस्य महाघोरं व्रतमासीन्महात्मनः । उसके नष्ट होनेमें और कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता है, जिस महामना वीरका यह भयंकर व्रत था कि ' मैं जबतक अर्जुनको मार नहीं लूँगा, तबतक दूसरोंसे अपने पैर नहीं धुलाऊँगा' ॥ ५६३ ॥
यस्य भीतो रणे निद्रां धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ५७ ॥
त्रयोदश समा नित्यं नाभजत् पुरुषर्षभः ।
यस्य वीर्यवतो वीर्यमुपाश्रित्य महात्मनः ॥ ५८ ॥
मम पुत्रः सभां भार्यां पाण्डूनां नीतवान् बलात् ।
तत्रापि च सभामध्ये पाण्डवानां च पश्यताम् ॥ ५ ९ ॥
दासभार्येति पाञ्चालीमब्रवीत् कुरुसंनिधौ ।
न सन्ति पतयः कृष्णे सर्वे षण्ढतिलैः समाः ॥ ६० ॥
उपतिष्ठस्व भर्तारमन्यं वा वरवर्णिनि ।
इत्येवं यः पुरा वाचो रूक्षाश्चाश्रावयद् रुषा ॥ ६१ ॥
सभायां सूतजः कृष्णां स कथं निहतः परैः ।
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रणभूमिमें जिसके भयसे डरे हुए पुरुषशिरोमणि धर्मराज युधिष्ठिरने तेरह वर्षोंतक कभी अच्छी तरह नींद नहीं ली, जिस महामनस्वी बलवान् सूतपुत्रके बलका भरोसा करके मेरा पुत्र दुर्योधन पाण्डवोंकी पत्नीको बलपूर्वक सभामें घसीट लाया और वहाँ भी भरी सभामें उसने पाण्डवोंके देखते - देखते समस्त कुरुवंशियोंके समीप पांचालराजकुमारीको दासपत्नी बतलाया, साथ ही जिसने उसे सम्बोधित करके कहा – 'कृष्णे! तेरे पति अब नहींके बराबर हैं । ये सभी थोथे तिलोंके समान नपुंसक हो गये हैं । सुन्दरि! अब तू दूसरे किसी पतिका आश्रय ले ' पूर्वकालमें जिस सूतपुत्रने सभामें रोषपूर्वक द्रौपदीको ये कठोर बातें सुनायी थीं, वह स्वयं शत्रुओंद्वारा कैसे मारा गया? ॥ ५७–६१३ ॥ यदि भीष्मो रणश्लाघी द्रोणो वा युधि दुर्मदः ॥ ६२ ॥
न हनिष्यति कौन्तेयान् पक्षपातात् सुयोधन ।
सर्वानेव हनिष्यामि व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ६३ ॥
जिसने मेरे पुत्रसे कहा था कि ' दुर्योधन! यदि युद्धकी श्लाघा रखनेवाले भीष्म अथवा रणदुर्मद द्रोणाचार्य पक्षपात करनेके कारण कुन्तीपुत्रोंको नहीं मारेंगे तो मैं उन सबको मार डालूँगा । तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ६२-६३ ॥
किं करिष्यति गाण्डीवमक्षय्यौ च महेषुधी ।
स्निग्धचन्दनदिग्धस्य मच्छरस्याभिधावतः ॥ ६४ ॥
स नूनमृषभस्कन्धो ह्यर्जुनेन कथं हतः । ‘ गाण्डीव धनुष अथवा दोनों अक्षय तरकस मेरे उस बाणका क्या कर लेंगे, जो चिकने चन्दनसे चर्चित हो शत्रुओंपर बड़े वेगसे धावा करता है ' ऐसी बातें कहनेवाला कर्ण, जिसके कंधे बैलोंके समान हृष्टपुष्ट थे, निश्चय ही अर्जुनके हाथसे कैसे मारा गया? ॥ ६४ ॥
यश्च गाण्डीवमुक्तानां स्पर्शमुग्रमचिन्तयन् ॥ ६५ ॥
अपतिर्ह्यसि कृष्णेति ब्रुवन् पार्थानवैक्षत ।
यस्य नासीद् भयं पार्थैः सपुत्रैः सजनार्दनैः ॥ ६६ ॥
स्वबाहुबलमाश्रित्य मुहूर्तमपि संजय ।
तस्य नाहं वधं मन्ये देवैरपि सवासवैः ॥ ६७ ॥
प्रतीपमभिधावद्भिः किं पुनस्तात पापडवैः । संजय! जिसने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंके आघातकी तनिक भी परवा न करके 'कृष्णे! अब तू पतिहीना हो गयी ' ऐसा कहते हुए कुन्तीपुत्रोंकी ओर देखा था, जिसे अपने बाहुबलके भरोसे कभी दो घड़ीके लिये भी पुत्रोंसहित पाण्डवों और भगवान् श्रीकृष्णसे भी भय नहीं हुआ । तात! यदि शत्रुपक्षकी ओरसे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी धावा करें तो उनके द्वारा भी कर्णके वध होनेका विश्वास मुझे नहीं हो सकता था, फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ६५—६७ ॥ न हि ज्यां संस्पृशानस्य तलत्रे वापि गृह्णतः ॥ ६८ ॥
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पुमानाधिरथेः स्थातुं कश्चित् प्रमुखतोऽर्हति ।
अपि स्यान्मेदिनी हीना सोमसूर्यप्रभांशुभिः ॥ ६ ९ ॥
न वधः पुरुषेन्द्रस्य संयुगेष्वपलायिनः । जब अधिरथपुत्र कर्ण अपने धनुषकी प्रत्यंचाका स्पर्श कर रहा हो अथवा दस्ताने पहन चुका हो, उस समय कोई पुरुष उसके सामने नहीं ठहर सकता था । सम्भव है यह पृथ्वी चन्द्रमा और सूर्यकी प्रकाशमयी किरणोंसे वंचित हो जाय, परंतु युद्धमें पीठ न दिखानेवाले पुरुषशिरोमणि कर्णके वधकी कदापि सम्भावना नहीं थी ॥ ६८-६९ ॥ येन मन्दः सहायेन भ्रात्रा दुःशासनेन च ॥ ७० ॥
वासुदेवस्य दुर्बुद्धिः प्रत्याख्यानमरोचत ।
स नूनं वृषभस्कन्धं कर्णं दृष्ट्वा निपातितम् ॥ ७१ ॥
दुःशासनं च निहतं मन्ये शोचति पुत्रकः । जिस कर्ण और भाई दुःशासनको अपना सहायक पाकर मूर्ख एवं दुर्बुद्धि दुर्योधनने श्रीकृष्णके प्रस्तावको ठुकरा देना ही उचित समझा था, मैं समझता हूँ, आज बैलोंके समान पुष्ट कंधेवाले कर्णको गिरा हुआ तथा दुःशासनको भी मारा गया देख मेरा वह पुत्र निश्चय ही शोकमें मग्न हो गया होगा ॥ ७०-७१३ ॥ हतं वैकर्तनं श्रुत्वा द्वैरथे सव्यसाचिना ॥ ७२ ॥
जयतःपाण्डवान् दृष्ट्वा किंस्विद् दुर्योधनोऽब्रवीत् । द्वैरथयुद्धमें सव्यसाची अर्जुनके हाथसे कर्णको मारा गया सुनकर और पाण्डवोंकी विजय होती देखकर दुर्योधनने क्या कहा था? ॥ ७२ ॥
दुर्मर्षणं हतं दृष्ट्वा वृषसेनं च संयुगे ॥ ७३ ॥
प्रभग्नं च बलं दृष्ट्वा वध्यमानं महारथैः ।
पराङ्मुखांश्च राज्ञस्तु पलायनपरायणान् ॥ ७४ ॥
विद्रुतान् रथिनो दृष्ट्वा मन्ये शोचति पुत्रकः । दुर्मर्षण और वृषसेन भी युद्धमें मारे गये, महारथी पाण्डवोंकी मार खाकर सेनामें भगदड़ मच गयी, सहायक नरेश युद्धसे विमुख हो पलायन करने लगे और रथियोंने पीठ दिखा दी । यह सब देखकर मेरा बेटा शोक कर रहा होगा; ऐसा मुझे मालूम हो रहा है ॥ ७३-७४ ॥ अनेयश्चाभिमानी च दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः ॥ ७५ ॥
हतोत्साहं बलं दृष्ट्वा किंस्विद् दुर्योधनोऽब्रवीत् । जो किसीकी सीख नहीं मानता है, जिसे अपनी विद्वत्ता और बुद्धिमत्ताका अभिमान है, उस दुर्बुद्धि, अजितेन्द्रिय दुर्योधनने अपने सेनाको हतोत्साह देखकर क्या कहा? ॥ ७५
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स्वयं वैरं महत् कृत्वा वार्यमाणः सुहृद्गणैः ॥ ७६ ॥
प्रधने हतभूयिष्ठैः किंस्विद् दुर्योधनोऽब्रवीत् । हितैषी सुहृदोंके मना करनेपर भी पाण्डवोंके साथ स्वयं बड़ा भारी वैर ठानकर दुर्योधनने, जब संग्राममें उसके अधिकांश सैनिक मार डाले गये, तब क्या कहा? ॥ भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे ॥ ७७ ॥
रुधिरे पीयमाने च किंस्विद् दुर्योधनोऽब्रवीत् । युद्धस्थलमें अपने भाई दुःशासनको भीमसेनके द्वारा मारा गया देख जब कि उसका रक्त पीया जा रहा था, दुर्योधनने क्या कहा? ॥ ७७ ॥
सह गान्धारराजेन सभायां यदभाषत ॥ ७८ ॥
कर्णोऽर्जुनं रणे हन्ता हते तस्मिन् किमब्रवीत् । गान्धारराज शकुनिके साथ सभामें दुर्योधनने जो यह कहा था कि ' कर्ण अर्जुनको मार डालेगा ', उसके विपरीत जब कर्ण स्वयं मारा गया तब उसने क्या कहा? ॥ ७८३३ ॥
द्यूतं कृत्वा पुरा हृष्ठो वञ्चयित्वा च पाण्डवान् ॥ ७९ ॥
शकुनिः सीबलस्तात हते कर्णे किमब्रवीत् । तात! पहले द्यूतक्रीड़ाका आयोजन करके पाण्डवोंको ठग लेनेके बाद जिसे बड़ा हर्ष हुआ था, वह सुबल - पुत्र शकुनि कर्णके मारे जानेपर क्या बोला? ॥ ७ ९ ॥ कृतवर्मा महेष्वासः सात्वतानां महारथः ॥ ८० ॥
हतं वैकर्तनं दृष्ट्वा हार्दिक्यः किमभाषत । वैकर्तन कर्णको मारा गया देख सात्वतवंशके महाधनुर्धर महारथी हृदिकपुत्र कृतवर्माने क्या कहा? ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या यस्य शिक्षामुपासते ॥ ८१ ॥
धनुर्वेदं चिकीर्षन्तो द्रोणपुत्रस्य धीमतः ।
युवा रूपेण सम्पन्नो दर्शनीयो महायशाः ॥ ८२ ॥
अश्वत्थामा हते कर्णे किमभाषत संजय । संजय! धनुर्वेद प्राप्त करनेकी इच्छावाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जिस बुद्धिमान् द्रोणपुत्रके पास आकर शिक्षा ग्रहण करते हैं, जो सुन्दर रूपसे सम्पन्न, युवक, दर्शनीय तथा महायशस्वी है, उस अश्वत्थामाने कर्णके मारे जानेपर क्या कहा? ॥ ८१-८२ ॥ आचार्यो यो धनुर्वेदे गौतमो रथसत्तमः ॥ ८३ ॥
कृपः शारद्वतस्तात हते कर्णे किमब्रवीत् । तात! धनुर्वेदके आचार्य एवं रथियोंमें श्रेष्ठ, गौतमवंशी, शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने कर्णके मारे जानेपर क्या कहा? ॥ ८३३ ॥
मद्रराजो महेष्वासः शल्यः समितिशोभनः ॥ ८४ ॥
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दृष्ट्वा विनिहतं कर्णं सारथ्ये रथिनां वरः ।
किमभाषत वीरौऽसौ मद्राणामधिपो बली ॥ ८५ ॥
युद्धमें शोभा पानेवाले, रथियोंमें श्रेष्ठ, मद्रदेशके अधिपति, बलवान्, वीर, महाधनुर्धर मद्रराज शल्यने अपने सारथित्वमें कर्णको मारा गया देखकर क्या कहा? ॥ दृष्ट्वा विनिहतं सर्वे योधा वा रणदुर्जयाः ।
ये च केचन राजानः पृथिव्यां योद्धुमागताः ।
वैकर्तनं हतं दृष्ट्वा कान्यभाषन्त संजय ॥ ८६ ॥
संजय! भूमण्डलके जो कोई भी नरेश युद्धके लिये आये थे, वे समस्त रणदुर्जय योद्धा वैकर्तन कर्णको मारा गया देखकर क्या बातें कर रहे थे? ॥ ८६ ॥
द्रोणे तु निहते वीरे रथव्याघ्रे नरर्षभे ।
के वा मुखमनीकानामासन् संजय भागशः ॥ ८७ ॥
संजय! रथियोंमें सिंह नरश्रेष्ठ वीरवर द्रोणाचार्यके मारे जानेपर कौन - कौनसे वीर सेनाओंके मुख ( अग्रभाग ) की रक्षा करते रहे? ॥ ८७ ॥
मद्रराजः कथं शल्यो नियुक्तो रथिनां वरः ।
वैकर्तनस्य सारथ्ये तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ८८ ॥
संजय! रथियोंमें श्रेष्ठ मद्रराज शल्यको कर्णके सारथिके कार्यमें कैसे नियुक्त किया गया? यह मुझे बताओ ॥ ८८ ॥
केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं सूतपुत्रस्य युध्यतः ।
वामं चक्रं ररक्षुर्वा के वा वीरस्य पृष्ठतः ॥ ८९ ॥
युद्ध करते समय भी वीर सूतपुत्रके दाहिने पहियेकी रक्षा कौन- कौन कर रहे थे? अथवा उसके बायें पहिये या पृष्ठभागकी रक्षामें कौन - कौन वीर नियुक्त थे? ॥ ८ ९ ॥
के कर्णं न जहुः शूराः के क्षुद्राः प्राद्रवंस्ततः ।
कथं च वः समेतानां हतः कर्णो महारथः ॥ ९ ० ॥
किन शूरवीरोंने कर्णका साथ नहीं छोड़ा? और कौन - कौन- से नीच सैनिक वहाँसे भाग गये? तुम सब लोग जब एक साथ होकर लड़ रहे थे, तब महारथी कर्ण कैसे मारा गया? ॥ ९ ० ॥
पाण्डवाश्च स्वयं शूराः प्रत्युदीयुर्महारथाः ।
सृजन्तः शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्बुदाः ॥ ९ १ ॥
स च सर्पमुखो दिव्यो महेषुप्रवरस्तदा ।
व्यर्थः कथं समभवत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ९ २ ॥
संजय! जिस समय शूरवीर महारथी पाण्डव पानीकी धारा बरसानेवाले बादलोंके समान स्वयं ही बाणोंकी वृष्टि करते हुए आगे बढ़ने लगे, उस समय महान् बाणोंमें सर्वश्रेष्ठ दिव्य सर्पमुख बाण व्यर्थ कैसे हो गया? यह मुझे बताओ ॥ ९ १ - ९ २ ॥
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मामकस्यास्य सैन्यस्य हतोत्सेधस्य संजय ।
अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥ ९ ३ ॥
संजय! मेरी इस सेनाका उत्कर्ष अथवा उत्साह नष्ट हो गया है । इसके प्रमुख वीर कर्णके मारे जानेपर अब यह बच सकेगी, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता है ॥
तौ हि वीरौ महेष्वासौ मदर्थे त्यक्तजीवितौ ।
भीष्मद्रोण हतौ श्रुत्वा को न्यर्थो जीवितेन मे ॥ ९ ४ ॥
मेरे लिये प्राणोंका मोह छोड़ देनेवाले महाधनुर्धर वीर भीष्म और द्रोणाचार्य मारे गये, यह सुनकर मेरे जीवित रहनेका क्या प्रयोजन है? ॥ ९ ४ ॥
पुनः पुनर्न मृष्यामि हतं कर्णं च पाण्डवैः ।
यस्य बाह्वोर्बलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतैः ॥ ९ ५ ॥
जिसकी भुजाओंमें दस हजार हाथियोंका बल था, वह कर्ण पाण्डवोंद्वारा मारा गया, यह बारंबार सुनकर मुझसे सहा नहीं जाता ॥ ९ ५ ॥
द्रोणे हते च यद् वृत्तं कौरवाणां परैः सह ।
संग्रामे नरवीराणां तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ९ ६ ॥
संजय! द्रोणाचार्यके मारे जानेपर संग्राममें नरवीर कौरवोंका शत्रुओंके साथ जैसा बर्ताव हुआ, वह मुझे बताओ ॥
यथा कर्णश्च कौन्तेयैः सह युद्धमयोजयत् ।
यथा च द्विषतां हन्ता रणे शान्तस्तदुच्यताम् ॥ ९ ७ ॥
शत्रुहन्ता कर्णने कुन्तीपुत्रोंके साथ जिस प्रकार युद्धका आयोजन किया और जिस प्रकार वह रणभूमिमें शान्त हो गया, वह सारा वृत्तान्त मुझे बताओ ॥ ९ ७ ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि धृतराष्ट्रप्रश्ने नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें धृतराष्ट्रका प्रश्नविषयक नवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
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दशमोऽध्यायः कर्णको सेनापति बनानेके लिये अश्वत्थामाका प्रस्ताव और सेनापतिके पदपर उसका अभिषेक संजय उवाच
ते द्रोणे महेष्वासे तस्मिन्नहनि भारत ।
कृते च मोघसंकल्पे द्रोणपुत्रे महारथे ॥ १ ॥
द्रवमाणे महाराज कौरवाणां बलार्णवे ।
व्यूह्य पार्थः स्वकं सैन्यमतिष्ठद् भ्रातृभिर्वृतः ॥ २ ॥
संजयने कहा — भरतनन्दन महाराज! उस दिन जब महाधनुर्धर द्रोणाचार्य मारे गये, महारथी द्रोणपुत्रका संकल्प व्यर्थ हो गया और समुद्रके समान विशाल कौरव- सेना भागने लगी, उस समय कुन्तीकुमार अर्जुन अपनी सेनाका व्यूह बनाकर अपने भाइयोंके साथ रणभूमिमें डटे रहे ॥ १-२ ॥
तमवस्थितमाज्ञाय पुत्रस्ते भरतर्षभ ।
विद्रुतं स्वबलं दृष्ट्वा पौरुषेण न्यवारयत् ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन्हें युद्धके लिये डटा हुआ जान आपके पुत्रने अपनी सेनाको भागती देख उसे पराक्रमपूर्वक रोका ॥ ३ ॥
स्वमनीकमवस्थाप्य बाहुवीर्यमुपाश्रितः ।
युद्ध्वा च सुचिरं कालं पाण्डवैः सह भारत ॥ ४ ॥
लब्धलक्ष्यैः परैर्हृष्टैर्व्यायच्छद्भिश्चिरं तदा ।
संध्याकालं समासाद्य प्रत्याहारमकारयत् ॥ ५ ॥
भारत! इस प्रकार अपनी सेनाको स्थापित करके, जिन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त हो गया था और इसीलिये जो बड़े हर्षके साथ परिश्रमपूर्वक युद्ध कर रहे थे, उन विपक्षी पाण्डवोंके साथ दुर्योधनने अपने ही बाहुबलके भरोसे दीर्घकालतक युद्ध करके संध्याकाल आनेपर सैनिकोंको शिविरमें लौटनेकी आज्ञा दे दी ॥ ४-५ ॥
कृत्वावहारं सैन्यानां प्रविश्य शिबिरं स्वकम् ।
कुरवः सुहितं मन्त्रं मन्त्रयाञ्चक्रिरे मिथः ॥ ६ ॥
सेनाको लौटाकर अपने शिविरमें प्रवेश करनेके पश्चात् समस्त कौरव परस्पर अपने हितके लिये गुप्त मन्त्रणा करने लगे ॥ ६ ॥
पर्यङ्केषु परार्ध्येषु स्पर्ध्यास्तरणवत्सु च ।
वरासनेषूपविष्टाः सुखशय्यास्विवामराः ॥ ७ ॥
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उस समय वे सब लोग बहुमूल्य बिछौनोंसे युक्त मूल्यवान् पलंगों तथा श्रेष्ठ सिंहासनोंपर बैठे हुए थे, मानो देवता सुखद शय्याओंपर विराज रहे हों ॥ ७ ॥
ततो दुर्योधनो राजा साम्ना परमवल्गुना ।
तानाभाष्य महेष्वासान् प्राप्तकालमभाषत ॥ ८ ॥
मतं मतिमतां श्रेष्ठाः सर्वे प्रब्रूत मा चिरम् ।
एवं गते तु किं कार्यं किं च कार्यतरं नृपाः ॥ ९ ॥
उस समय राजा दुर्योधनने सान्त्वनापूर्ण परम मधुर वाणीद्वारा उन महाधनुर्धर नरेशोंको सम्बोधित करके यह समयोचित बात कही — ' बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ नरेश्वरो! तुम सब लोग शीघ्र बोलो, विलम्ब न करो, इस अवस्थामें हमलोगोंको क्या करना चाहिये और सबसे अधिक आवश्यक कर्तव्य क्या है? ' ॥ ८ - ९ ॥ संजय उवाच
एवमुक्ते नरेन्द्रेण नरसिंहा युयुत्सवः ।
चक्रुर्नानाविधाश्चेष्टाः सिंहासनगतास्तदा ॥ १० ॥
संजय कहते हैं - राजा दुर्योधनके ऐसा कहनेपर वे सिंहासनपर बैठे हुए पुरुषसिंह नरेश युद्धकी इच्छासे नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करने लगे ॥ १० ॥
तेषां निशाम्येङ्गितानि युद्धे प्राणाञ्जुहूषताम् ।
समुद्वीक्ष्य मुखं राज्ञो बालार्कसमवर्चसम् ॥ ११ ॥
आचार्यपुत्रो मेधावी वाक्यज्ञो वाक्यमाददे । युद्धमें प्राणोंकी आहुति देनेकी इच्छा रखनेवाले उन नरेशोंकी चेष्टाएँ देखकर राजा दुर्योधनके प्रातःकालीन सूर्यके समान तेजस्वी मुखकी ओर दृष्टिपात करके वाक्यविशारद, मेधावी आचार्यपुत्र अश्वत्थामाने यह बात कही- ॥ ११३ ॥
रागो योगस्तथा दाक्ष्यं नयश्चेत्यर्थसाधकाः ॥ १२ ॥
उपायाः पण्डितैः प्रोक्तास्ते तु दैवमुपाश्रिताः । ‘ विद्वानोंने अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करानेवाले चार उपाय बताये हैं - राग ( राजाके प्रति सैनिकोंकी भक्ति), योग ( साधन - सम्पत्ति ), दक्षता ( उत्साह, बल एवं कौशल ) तथा नीति; परंतु वे सभी दैवके अधीन हैं ॥ १२३ ॥
लोकप्रवीरा येऽस्माकं देवकल्पा महारथाः ॥ १३ ॥
नीतिमन्तस्तथा युक्ता दक्षा रक्ताश्च तेते हताः ।
न त्वेव कार्यं नैराश्यमस्माभिर्विजयं प्रति ॥ १४ ॥
‘ हमारे पक्षमें जो देवताओंके समान पराक्रमी, विश्व- विख्यात महारथी वीर, नीतिमान्, साधनसम्पन्न, दक्ष और स्वामीके प्रति अनुरक्त थे, वे सब- के - सब मारे गये, तथापि हमें अपनी विजयके प्रति निराश नहीं होना चाहिये ॥ १३-१४ ॥