04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1671–1680

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1671–1680

पृष्ठ 1671

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प्रेषयामास संक्रुद्धश्चित्रस्य वधकाङ्क्षया ॥ ३१ ॥

राजन्! तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए प्रतिविन्ध्यने चित्रके वधकी इच्छासे उसके ऊपर एक सुवर्णभूषित तोमरका प्रहार किया ॥ ३१ ॥

स तस्य गात्रावरणं भित्त्वा हृदयमेव च ।

जगाम धरणीं तूर्णं महोरग इवाशयम् ॥ ३२ ॥

वह तोमर उसके कवच और वक्षःस्थलको विदीर्ण करता हुआ तुरंत धरतीमें समा गया, जैसे कोई बड़ा सर्प बिलमें घुस गया हो ॥ ३२ ॥

स पपात तदा राजा तोमरेण समाहतः ।

प्रसार्य विपुलौ बाहू पीनौ परिघसंनिभौ ॥ ३३ ॥

तोमरसे अत्यन्त आहत हो राजा चित्र अपनी परिघके समान मोटी और विशाल भुजाओंको फैलाकर तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३३ ॥

चित्रं सम्प्रेक्ष्य निहतं तावका रणशोभिनः ।

अभ्यद्रवन्त वेगेन प्रतिविन्ध्यं समन्ततः ॥ ३४ ॥

चित्रको मारा गया देख संग्राममें शोभा पानेवाले आपके योद्धा प्रतिविन्ध्यपर चारों ओरसे वेगपूर्वक टूट पड़े ॥ ३४

सृजन्तो विविधान् बाणान् शतघ्नीश्च सकिंकिणीः ।

तमवच्छादयामासुः सूर्यमभ्रगणा इव ॥ ३५ ॥

जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार उन योद्धाओंने नाना प्रकारके बाणों और छोटी- छोटी घंटियोंसहित शतघ्नियोंका प्रहार करके उसे आच्छादित कर दिया ॥ ३५ ॥

तान् विधम्य महाबाहुः शरजालेन संयुगे ।

व्यद्रावयत् तव चमूं वज्रहस्त इवासुरीम् ॥ ३६ ॥

जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरोंकी सेनाको खदेड़ते हैं, उसी प्रकार युद्धस्थलमें महाबाहु प्रतिविन्ध्यने अपने बाणसमूहोंसे उन अस्त्र- शस्त्रोंको नष्ट करके आपकी सेनाको मार भगाया ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 1672

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ते वध्यमानाः समरे तावकाः पाण्डवैर्नृप ।

विप्राकीर्यन्त सहसा वातनुन्ना घना इव ॥ ३७ ॥

नरेश्वर! समरभूमिमें पाण्डवोंकी मार खाकर आपके सैनिक हवाके उड़ाये हुए बादलोंके समान सहसा छिन्न- भिन्न होकर बिखर गये ॥ ३७ ॥

विप्रद्रुते बले तस्मिन् वध्यमाने समन्ततः ।

द्रौणिरेकोऽभ्ययात् तूर्णं भीमसेनं महाबलम् ॥ ३८ ॥

उनके द्वारा मारी जाती हुई आपकी वह सेना जब चारों ओर भागने लगी, तब अकेले अश्वत्थामाने तुरंत ही महाबली भीमसेनपर आक्रमण कर दिया ॥ ३८ ॥

ततः समागमो घोरो बभूव सहसा तयोः ।

यथा देवासुरे युद्धे वृत्रवासवयोरिव ॥ ३ ९ ॥

फिर तो देवासुर- संग्राममें वृत्रासुर और इन्द्रके समान उन दोनों वीरोंमें सहसा घोर युद्ध छिड़ गया ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि चित्रवधे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1673

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इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें चित्रसेन और चित्रका वधविषयक चौदहवाँ अध्याय हुआ ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1674

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पञ्चदशोऽध्यायः अश्वत्थामा और भीमसेनका अद्भुत युद्ध तथा दोनोंका मूर्च्छित हो जाना संजय उवाच

भीमसेनं ततो द्रौणी राजन् विव्याध पत्रिणा ।

परया त्वरया युक्तो दर्शयन्नस्त्रलाघवम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर द्रोणकुमार अश्वत्थामाने बड़ी उतावलीके साथ अस्त्र चलानेमें अपनी फुर्ती दिखाते हुए एक बाणसे भीमसेनको बींध डाला ॥ १ ॥

अथैनं पुनराजघ्ने नवत्या निशितैः शरैः ।

सर्वमर्माणि सम्प्रेक्ष्य मर्मज्ञो लघुहस्तवत् ॥ २ ॥

फिर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले कुशल योद्धाके समान मर्मज्ञ अश्वत्थामाने भीमसेनके सारे मर्मस्थानोंको लक्ष्य करके पुनः उनपर नब्बे तीखों बाणोंका प्रहार किया ॥ २ ॥

भीमसेनः समाकीर्णो द्रौणिना निशितैः शरैः ।

रराज समरे राजन् रश्मिवानिव भास्करः ॥ ३ ॥

राजन्! अश्वत्थामाके तीखे बाणोंसे समरांगणमें आच्छादित हुए भीमसेन किरणोंवाले सूर्यके समान सुशोभित होने लगे ॥ ३ ॥

ततः शरसहस्रेण सुप्रयुक्तेन पाण्डवः ।

द्रोणपुत्रमवच्छाद्य सिंहनादममुञ्चत ॥ ४ ॥

तदनन्तर पाण्डुपुत्र भीमने अच्छी तरह चलाये हुए एक हजार बाणोंसे द्रोणपुत्रको आच्छादित करके घोर सिंहनाद किया ॥ ४ ॥

शरैः शरांस्ततो द्रौणिः संवार्य युधि पाण्डवम् ।

ललाटेऽभ्याहनद् राजन् नाराचेन स्मयन्निव ॥ ५ ॥

राजन्! अश्वत्थामाने अपने बाणोंसे भीमसेनके बाणोंका निवारण करके युद्धस्थलमें उन पाण्डुपुत्रके ललाटमें मुसकराते हुए - से एक नाराचका प्रहार किया ॥

ललाटस्थं ततो बाणं धारयामास पाण्डवः ।

यथा शृङ्गं वने दृप्तः खड्गो धारयते नृप ॥ ६ ॥

नरेश्वर! जैसे वनमें बलोन्मत्त गेंड़ा सींग धारण करता है, उसी प्रकार पाण्डुपुत्र भीमने अपने ललाटमें धँसे हुए उस बाणको धारण कर रखा था ॥ ६ ॥

ततो द्रौणिं रणे भीमो यतमानं पराक्रमी ।

पृष्ठ 1675

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त्रिभिर्विव्याध नाराचैर्ललाटे विस्मयन्निव ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् पराक्रमी भीमसेनने रणभूमिमें विजयके लिये प्रयत्नशील अश्वत्थामाके ललाटमें भी मुसकराते हुए- से तीन नाराचोंका प्रहार किया ॥ ७ ॥

ललाटस्थैस्ततो बाणैर्ब्राह्मणोऽसौ व्यशोभत ।

प्रावृषीव यथा सिक्तस्त्रिशृङ्गः पर्वतोत्तमः ॥ ८ ॥

ललाटमें धँसे हुए उन तीनों बाणोंद्वारा वह ब्राह्मण वर्षाकालमें भीगे हुए तीन शिखरोंवाले उत्तम पर्वतके समान अद्भुत शोभा पाने लगा ॥ ८ ॥

ततः शरशतैर्द्रौणिरर्दयामास पाण्डवम् ।

न चैनं कम्पयामास मातरिश्वेव पर्वतम् ॥ ९ ॥

तब अश्वत्थामाने सैकड़ों बाणोंसे पाण्डुपुत्र भीमसेनको पीड़ित किया; परंतु जैसे हवा पर्वतको नहीं हिला सकती, उसी प्रकार वह उन्हें कम्पित न कर सका ॥ ९ ॥

तथैव पाण्डवो युद्धे द्रौणिं शरशतैः शितैः ।

नाकम्पयत संहृष्टो वार्योघ इव पर्वतम् ॥ १० ॥

इसी प्रकार हर्ष और उत्साहमें भरे हुए पाण्डुपुत्र भीमसेन भी युद्धमें सैकड़ों तीखे बाणोंका प्रहार करके द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको विचलित न कर सके । ठीक उसी तरह, जैसे जलका महान् प्रवाह किसी पर्वतको हिला -डुला नहीं सकता ॥ १० ॥

तावन्योन्यं शरैर्घोरैश्छादयानौ महारथौ ।

रथवर्यगतौ वीरौ शुशुभाते बलोत्कटौ ॥ ११ ॥

वे दोनों बलोन्मत्त महारथी वीर श्रेष्ठ रथोंपर बैठकर एक- दूसरेको भयंकर बाणोंद्वारा आच्छादित करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ११ ॥

आदित्याविव संदीप्तौ लोकक्षयकरावुभौ ।

स्वरश्मिभिरिवान्योन्यं तापयन्तौ शरोत्तमैः ॥ १२ ॥

जैसे सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेके लिये उगे हुए दो तेजस्वी सूर्य अपनी किरणोंद्वारा परस्पर ताप दे रहे हों, उसी प्रकार वे दोनों वीर अपने उत्तम बाणोंद्वारा एक-दूसरेको संतप्त कर रहे थे ॥ १२ ॥

ततः प्रतिकृते यत्नं कुर्वाणौ तौ महारणे ।

कृतप्रतिकृते यत्तौ शरसङ्घैरभीतवत् ॥ १३ ॥

उस महासमरमें बदला लेनेका यत्न करते हुए वे दोनों योद्धा निर्भय - से होकर अपने बाणसमूहोंद्वारा परस्पर अस्त्रोंके घात- प्रतिघातके लिये प्रयत्नशील थे ॥

व्याघ्राविव च संग्रामे चेरतुस्तौ नरोत्तमौ ।

शरदंष्ट्रौ दुराधर्षौ चापवक्त्रौ भयंकरौ ॥ १४ ॥

वे दोनों नरश्रेष्ठ संग्रामभूमिमें दो व्याघ्रोंके समान विचर रहे थे, धनुष ही उन व्याघ्रोंके मुख और बाण ही उनकी दाढ़ें थीं । वे दोनों ही दुर्धर्ष एवं भयंकर प्रतीत होते थे ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1676

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अभूतां तावदृश्यौ च शरजालैः समन्ततः ।

मेघजालैरिव च्छन्नौ गगने चन्द्रभास्करौ ॥ १५ ॥

आकाशमें मेघोंकी घटासे आच्छादित हुए चन्द्रमा और सूर्यके समान वे दोनों वीर सब ओरसे बाणसमूहोंद्वारा ढककर अदृश्य हो गये थे ॥ १५ ॥

चकाशेते मुहूर्तेन ततस्तावप्यरिंदमौ ।

विमुक्तावभ्रजालेन अङ्गारकबुधाविव ॥ १६ ॥

फिर दो ही घड़ीमें मेघोंके आवरणसे मुक्त हुए मंगल और बुध नामक ग्रहोंके समान वे दोनों शत्रुदमन वीर एक दूसरेके बाणोंको नष्ट करके प्रकाशित होने लगे ॥ १६ ॥

अथ तत्रैव संग्रामे वर्तमाने सुदारुणे ।

अपसव्यं ततश्चक्रे द्रौणिस्तत्र वृकोदरम् ॥ १७ ॥

इस प्रकार चलनेवाले उस भयंकर संग्राममें वहीं द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने भीमसेनको अपने दाहिने भागमें कर दिया ॥ १७ ॥

किरन् शरशतैरुग्रैर्धाराभिरिव पर्वतम् ।

न तु तन्ममृषे भीमः शत्रोर्विजयलक्षणम् ॥ १८ ॥

फिर जैसे मेघ झलकी धाराओंसे पर्वतको ढक-सा देता है, उसी प्रकार भयंकर एवं सैकड़ों बाणोंद्वारा वह भीमसेनको आच्छादित करने लगा; परंतु भीमसेन शत्रुके इस विजयसूचक लक्षणको सहन न कर सके ॥

प्रतिचक्रे ततो राजन् पाण्डवोऽप्यपसव्यतः ।

मण्डलानां विभागेषु गतप्रत्यागतेषु च ॥ १ ९ ॥

राजन्! पाण्डुपुत्र भीमने भी गत-प्रत्यागत आदि मण्डलभागों (विभिन्न पैंतरों ) -में अश्वत्थामाको दाहिने करके बदला चुका लिया ॥ १ ९ ॥

बभूव तुमुलं युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः ।

चरित्वा विविधान् मार्गान् मण्डलस्थानमेव च ॥ २० ॥

उन दोनों पुरुषसिंहोंमें मण्डलाकार घूमकर भाँति- भाँतिके पैंतरे दिखाते हुए भयंकर युद्ध होने लगा ॥ २० ॥

शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ।

अन्योन्यस्य वधे चैव चक्रतुर्यत्नमुत्तमम् ॥ २१ ॥

वे कानतक खींचकर छोड़े हुए बाणोंसे परस्पर चोट पहुँचाने और एक- दूसरेके वधके लिये भारी यत्न करने लगे ॥ २१ ॥

ईषतुर्विरथं चैव कर्तुमन्योन्यमाहवे ।

ततो द्रौणिर्महास्त्राणि प्रादुश्चक्रे महारथः ॥ २२ ॥

तान्यस्त्रैरेव समरे प्रतिजघ्नेऽथ पाण्डवः ।

पृष्ठ 1677

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दोनों ही युद्धस्थलमें एक- दूसरेको रथहीन कर देनेकी इच्छा करने लगे । तदनन्तर महारथी अश्वत्थामाने बड़े - बड़े अस्त्र प्रकट किये; परन्तु पाण्डुपुत्र भीमसेनने समरांगणमें अपने अस्त्रोंद्वारा ही उन सबको नष्ट कर दिया ॥ २२ ॥

ततो घोरं महाराज अस्त्रयुद्धमवर्तत ॥ २३ ॥

ग्रहयुद्धं यथा घोरं प्रजासंहरणे ह्यभूत् । महाराज! फिर तो जैसे प्रजाके संहारकालमें ग्रहोंका घोर युद्ध होने लगता है, उसी प्रकार उन दोनोंमें भयंकर अस्त्रयुद्ध छिड़ गया ॥ २३ ॥

ते बाणाः समसज्जन्त मुक्तास्ताभ्यां तु भारत ॥ २४ ॥

द्योतयन्तो दिशः सर्वास्तव सैन्यं समन्ततः । भारत! उन दोनोंके छोड़े हुए वे बाण सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए आपकी सेनाके चारों ओर गिरने लगे ॥ २४ ॥

बाणसङ्घैर्वृतं घोरमाकाशं समपद्यत ॥ २५ ॥

उल्कापातावृतं युद्धं प्रजानां संक्षये नृप । नरेश्वर! उस समय बाणसमूहोंसे व्याप्त हुआ आकाश बड़ा भयंकर प्रतीत होने लगा; ठीक उस तरह जैसे प्रजाके संहारकालमें होनेवाला युद्ध उल्कापातसे व्याप्त होनेके कारण अत्यन्त भयानक दिखायी देता है ॥ २५ ॥

बाणाभिघातात् संजज्ञे तत्र भारत पावकः ॥ २६ ॥

सविस्फुलिङ्गो दीप्तार्चिर्योऽदहद् वाहिनीद्वयम् । भरतनन्दन! वहाँ बाणोंके परस्पर टकरानेसे चिनगारियों तथा प्रज्वलित लपटोंके साथ आग प्रकट हो गयी, जो दोनों सेनाओंको दग्ध किये देती थी ॥ २६३ ॥

तत्र सिद्धा महाराज सम्पतन्तोऽब्रुवन् वचः ॥ २७ ॥

युद्धानामति सर्वेषां युद्धमेतदिति प्रभो ।

सर्वयुद्धानि चैतस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २८ ॥

प्रभो! महाराज! उस समय वहाँ उड़कर आते हुए सिद्ध परस्पर इस प्रकार कहने लगे -'यह युद्ध तो सभी युद्धोंसे बढ़कर हो रहा है, अन्य सब युद्ध तो इसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं थे ॥ २७-२८ ॥

नेदृशं च पुनर्युद्धं भविष्यति कदाचन ।

अहो ज्ञानेन सम्पन्नावुभौ ब्राह्मणक्षत्रियौ ॥ २ ९ ॥

‘ ऐसा युद्ध फिर कभी नहीं होगा । ये ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों ही अद्भुत ज्ञानसे सम्पन्न हैं ॥ २ ९ ॥

अहो शौर्येण सम्पन्नावुभौ चोग्रपराक्रमौ ।

अहो भीमबलो भीम एतस्य च कृतास्त्रता ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1678

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‘ भयंकर पराक्रम दिखानेवाले ये दोनों योद्धा अद्भुत शौर्यशाली हैं । अहो! भीमसेनका बल भयंकर है । इनका अस्त्रज्ञान अद्भुत है! ॥ ३० ॥

अहो वीर्यस्य सारत्वमहो सौष्ठवमेतयोः ।

स्थितावेतौ हि समरे कालान्तकयमोपमौ ॥ ३१ ॥

‘ अहो! इनके वीर्यकी सारता विलक्षण है । इन दोनोंका युद्धसौन्दर्य आश्चर्यजनक है । ये दोनों समरांगणमें कालान्तक एवं यमके समान जान पड़ते हैं ॥ ३१ ॥

रुद्रौ द्वाविव सम्भूतौ यथा द्वाविव भास्करौ ।

यमौ वा पुरुषव्याघ्रौ घोररूपावुभौ रणे ॥ ३२ ॥

‘ ये भयंकर रूपधारी दोनों पुरुषसिंह रणभूमिमें दो रुद्र, दो सूर्य अथवा दो यमराजके समान प्रकट हुए हैं' ॥ ३२ ॥

इति वाचः स्म श्रूयन्ते सिद्धानां वै मुहुर्मुहुः ।

सिंहनादश्च संजज्ञे समेतानां दिवौकसाम् ॥ ३३ ॥

इस प्रकार सिद्धोंकी बातें वहाँ बारंबार सुनायी देती थीं। आकाशमें एकत्र हुए देवताओंका सिंहनाद भी प्रकट हो रहा था ॥ ३३ ॥

अद्भुतं चाप्यचिन्त्यं च दृष्ट्वा कर्म तयो रणे ।

सिद्धचारणसंघानां विस्मयः समपद्यत ॥ ३४ ॥

रणभूमिमें उन दोनोंके अद्भुत एवं अचिन्त्य कर्मको देखकर सिद्धों और चारणोंके समूहोंको बड़ा विस्मय हो रहा था ॥ ३४ ॥

प्रशंसन्ति तदा देवाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।

साधु द्रौणे महाबाहो साधु भीमेति चाब्रुवन् ॥ ३५ ॥

उस समय देवता, सिद्ध और महर्षिगण उन दोनोंकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे -' महाबाहु द्रोणकुमार! तुम्हें साधुवाद! भीमसेन! तुम्हारे लिये भी साधुवाद' ॥ ३५ ॥

तौ शूरौ समरे राजन् परस्परकृतागसौ ।

परस्परमुदीक्षेतां क्रोधादुद्धृत्य चक्षुषी ॥ ३६ ॥

राजन्! परस्पर अपराध करनेवाले वे दोनों शूरवीर समरांगणमें क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर एक- दूसरेकी ओर देख रहे थे ॥ ३६ ॥

क्रोधरक्तेक्षणौ तौ तु क्रोधात् प्रस्फुरिताधरौ ।

क्रोधात् संदष्टदशनौ तथैव दशनच्छदौ ॥ ३७ ॥

क्रोधसे उन दोनोंकी आँखें लाल हो गयी थीं । क्रोधसे उनके ओठ फड़क रहे थे और क्रोधसे ही वे ओठ चबाते एवं दाँत पीसते थे ॥ ३७ ॥

अन्योन्यं छादयन्तौ स्म शरवृष्ट्या महारथौ ।

शराम्बुधारौ समरे शस्त्रविद्युत्प्रकाशिनौ ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 1679

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वे दोनों महारथी धनुषरूपी विद्युत्से प्रकाशित होनेवाले मेघके समान हो बाणरूपी जल धारण करते थे और समरांगणमें बाण- वर्षा करके एक- दूसरेको ढके देते थे ॥ ३८ ॥

तावन्योन्यं ध्वजं विद्ध्वा सारथिं च महारणे ।

अन्योन्यस्य हयान् विद्ध्वा बिभिदाते परस्परम् ॥ ३ ९ ॥

वे उस महासमरमें परस्परके ध्वज, सारथि और घोड़ोंको बींधकर एक- दूसरेको क्षत-विक्षत कर रहे थे ॥ ३ ९ ॥

ततः क्रुद्धौ महाराज बाणौ गृह्य महाहवे ।

उभौ चिक्षिपतुस्तूर्णमन्योन्यस्य वधैषिणौ ॥ ४० ॥

महाराज! तदनन्तर उस महासमरमें कुपित हो उन दोनोंने एक-दूसरेके वधकी इच्छासे तुरंत दो बाण लेकर चलाये ॥ ४० ॥

तौ सायकौ महाराज द्योतमानौ चमूमुखे ।

आजघ्नतुः समासाद्य वज्रवेगौ दुरासदौ ॥ ४१ ॥

राजेन्द्र! वे दोनों बाण सेनाके मुहानेपर चमक उठे । उन दोनोंका वेग वज्रके समान था । उन दुर्जय बाणोंने दोनोंके पास पहुँचकर उन्हें घायल कर दिया ॥ ४१ ॥

तौ परस्परवेगाच्च शराभ्यां च भृशाहतौ निपेततुर्महावीर्यै रथोपस्थे तयोस्तदा ॥ ४२ ॥

परस्परके वेगसे छूटे हुए उन बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल हो वे महापराक्रमी वीर अपने-अपने रथकी बैठकमें तत्काल गिर पड़े ॥ ४२ ॥

ततस्तु सारथिर्ज्ञात्वा द्रोणपुत्रमचेतनम् ।

अपोवाह रणाद् राजन् सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ ४३ ॥

राजन्! तत्पश्चात् सारथि द्रोणपुत्रको अचेत जानकर सारी सेनाके देखते - देखते उसे रणक्षेत्रसे बाहर हटा ले गया ॥ ४३ ॥

तथैव पाण्डवं राजन् विह्वलन्तं मुहुर्मुहुः ।

अपोवाह रथेनाजौ सारथिः शत्रुतापनम् ॥ ४४ ॥

महाराज! इसी प्रकार बारंबार विह्वल होते हुए शत्रुतापन पाण्डुपुत्र भीमसेनको भी रथद्वारा उनका सारथि विशोक युद्धस्थलसे अन्यत्र हटा ले गया ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अश्वत्थामभीमसेनयोर्युद्धे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अश्वत्थामा और भीमसेनका युद्धविषयक पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

Fara

पृष्ठ 1680

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षोडशोऽध्यायः अर्जुनका संशप्तकों तथा अश्वत्थामाके साथ अद्भुत युद्ध धृतराष्ट्रउवाच

यथा संशप्तकैः सार्धमर्जुनस्याभवद् रणः ।

अन्येषां च महीपानां पाण्डवैस्तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने कहा – संजय! संशप्तकोंके साथ अर्जुनका तथा अन्य पाण्डवोंके साथ दूसरे दूसरे राजाओंका जिस प्रकार युद्ध हुआ, वह मुझे बताओ ॥ १ ॥

अश्वत्थाम्नस्तु यद् युद्धमर्जुनस्य च संजय ।

अन्येषां च महीपानां पाण्डवैस्तद् ब्रवीहि मे ॥ २ ॥

सूत! अश्वत्थामा और अर्जुनका जो युद्ध हुआ था तथा अन्य पाण्डवोंके साथ अन्यान्य नरेशोंका जैसा संग्राम हुआ था, उसका मुझसे वर्णन करो ॥ २ ॥

संजय उवाच

शृणु राजन् यथा वृत्तं संग्रामं ब्रुवतो मम ।

वीराणां शत्रुभिः सार्धं देहपाप्मासुनाशनम् ॥ ३ ॥

संजयने कहा- राजन्! कौरव- वीरोंका शत्रुओंके साथ देह, पाप और प्राणोंका नाश करनेवाला संग्राम जिस प्रकार हुआ था, वह बता रहा हूँ। आप मुझसे सारी बातें सुनिये ॥ ३ ॥

पार्थः संशप्तकबलं प्रविश्यार्णवसंनिभम् ।

व्यक्षोभयदमित्रघ्नो महावात इवार्णवम् ॥ ४ ॥

शत्रुनाशक अर्जुनने समुद्रके समान अपार संशप्तक -सेनामें प्रवेश करके उसे उसी प्रकार क्षुब्ध कर डाला, जैसे प्रचण्ड वायु सागरमें ज्वार उठा देती है ॥ ४ ॥

शिरांस्युन्मथ्य वीराणां शितैर्भल्लैर्धनंजयः ।

पूर्णचन्द्राभवक्त्राणि स्वक्षिभूदशनानि च ॥ ५ ॥

संतस्तार क्षितिं क्षिप्रं विनालैर्नलिनैरिव । धनंजयने अपने तीखे भल्लोंसे वीरोंके सुन्दर नेत्र, भौंह और दाँतोंसे सुशोभित, पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले मस्तकोंको काट- काटकर तुरंत ही वहाँकी धरतीको पाट दिया, मानो वहाँ बिना नालके कमल बिछा दिये हों ॥ ५३ ॥

सुवृत्तानायतान् पुष्टांश्चन्दनागुरुभूषितान् ॥ ६ ॥

सायुधान् सतलत्रांश्च पञ्चास्योरगसंनिभान् ।

बाहुन् क्षुरैरमित्राणां चिच्छेद समरेऽर्जुनः ॥ ७ ॥