04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1661–1670
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1661–1670
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त्रयोदशोऽध्यायः दोनों सेनाओंका परस्पर घोर युद्ध तथा सात्यकिके द्वारा विन्द और अनुविन्दका वध संजय उवाच
ततः कर्णो महेष्वासः पाण्डवानामनीकिनीम् ।
जघान समरे शूरः शरैः संनतपर्वभिः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! तत्पश्चात् महाधनुर्धर शूरवीर कर्णने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा समरांगणमें पाण्डव सेनाका संहार आरम्भ किया ॥ १ ॥
तथैव पाण्डवा राजंस्तव पुत्रस्य वाहिनीम् ।
कर्णस्य प्रमुखे क्रुद्धा निजघ्नुस्ते महारथाः ॥ २ ॥
राजन्! इसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए महारथी पाण्डव भी कर्णके सामने ही आपके बेटेकी सेनाका विनाश करने लगे ॥ २ ॥
कर्णोऽपि राजन् समरे व्यहनत् पाण्डवीं चमूम् ।
नाराचैरर्करश्म्याभैः कर्मारपरिमार्जितैः ॥ ३ ॥
महाराज! कर्णके नाराच कारीगरोंद्वारा धोकर साफ किये गये थे, इसलिये सूर्यकी किरणोंके समान चमक रहे थे । उनके द्वारा वह भी रणभूमिमें पाण्डव- सेनाका वध करने लगा ॥ ३ ॥
तत्र भारत कर्णेन नाराचैस्ताडिता गजाः ।
नेदुः सेदुश्च मम्लुश्च बभ्रमुश्च दिशो दश ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! वहाँ कर्णके चलाये हुए नाराचोंकी मार खाकर झुंड- के - झुंड हाथी चिग्घाड़ने, पीड़ासे कराहने, मलिन होने और दसों दिशाओंमें चक्कर काटने लगे ॥ ४ ॥
वध्यमाने बले तस्मिन् सूतपुत्रेण मारिष ।
नकुलोऽभ्यद्रवत् तूर्णं सूतपुत्रं महारणे ॥ ५ ॥
तब माननीय नरेश! सूतपुत्रके द्वारा उस महासमरमें जब अपनी सेना मारी जाने लगी, नकुलने तुरंत ही कर्णपर धावा किया ॥ ५ ॥
भीमसेनस्तथा द्रौणिं कुर्वाणं कर्म दुष्करम् ।
विन्दानुविन्दौ कैकेयौ सात्यकिः समवारयत् ॥ ६ ॥
भीमसेनने दुष्कर कर्म करते हुए अश्वत्थामाको तथा सात्यकिने केकयदेशीय विन्द और अनुविन्दको रोका ॥ ६ ॥
श्रुतकर्माणमायान्तं चित्रसेनो महीपतिः ।
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प्रतिविन्ध्यस्तथा चित्रं चित्रकेतनकार्मुकम् ॥ ७ ॥
सामने आते हुए श्रुतकर्माको राजा चित्रसेनने रोका तथा प्रतिविंध्यने विचित्र ध्वज और धनुषवाले चित्रका सामना किया ॥ ७ ॥
दुर्योधनस्तु राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
संशप्तकगणान् क्रुद्धो ह्यभ्यधावद् धनंजयः ॥ ८ ॥
दुर्योधनने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरपर और क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने संशप्तकगणोंपर धावा किया ॥ ८ ॥
धृष्टद्युम्नः कृपेणाथ तस्मिन् वीरवरक्षये ।
शिखण्डी कृतवर्माणं समासादयदच्युतम् ॥ ९ ॥
बड़े - बड़े वीरोंका संहार करनेवाले उस संग्राममें धृष्टद्युम्न कृपाचार्यके साथ युद्ध करने लगे और शिखण्डी कभी पीछे न हटनेवाले कृतवर्मासे भिड़ गया ॥ ९ ॥
श्रुतकीर्तिस्तथा शल्यं माद्रीपुत्रः सुतं तव ।
दुःशासनं महाराज सहदेवः प्रतापवान् ॥ १० ॥
महाराज! श्रुतकीर्तिने शल्यपर और प्रतापी माद्रीकुमार सहदेवने आपके पुत्र दुःशासनपर आक्रमण किया ॥ १०
कैकेयौ सात्यकिं युद्धे शरवर्षेण भास्वता ।
सात्यकिः केकयौ चापि च्छादयामास भारत ॥ ११ ॥
भरतनन्दन! केकयराजकुमार विन्द और अनुविन्दने युद्धमें चमकीले बाणोंकी वर्षा करके सात्यकिको और सात्यकिने दोनों केकयराजकुमारोंको आच्छादित कर दिया ॥
तावेनं भ्रातरौ वीरौ जघ्नतुर्हृदये भृशम् ।
विषाणाभ्यां यथा नागौ प्रतिनागं महावने ॥ १२ ॥
जैसे विशाल वनमें दो हाथी अपने विरोधी हाथीपर दोनों दाँतोंसे प्रहार करते हों, उसी प्रकार वे दोनों वीर भ्राता विन्द और अनुविन्द सात्यकिकी छातीमें गहरी चोट पहुँचाने लगे ॥ १२ ॥
शरसम्भिन्नवर्माणौ तायुभौ भ्रातरौ रणे ।
सात्यकिं सत्यकर्माणं राजन् विव्यधतुः शरैः ॥ १३ ॥
राजन्! उन दोनोंके कवच बाणोंसे छिन्न- भिन्न हो गये थे, तो भी उन दोनों भाइयोंने रणभूमिमें सत्यकर्मा सात्यकिको बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १३ ॥
तौ सात्यकिर्महाराज प्रहसन् सर्वतोदिशः ।
छादयञ्छरवर्षेण वारयामास भारत ॥ १४ ॥
महाराज! भरतनन्दन! सात्यकिने हँसते - हँसते सम्पूर्ण दिशाओंको अपने बाणोंकी वर्षासे आच्छादित करके उन दोनों भाइयोंको रोक दिया ॥ १४ ॥
वार्यमाणौ ततस्तौ हि शैनेयशरवृष्टिभिः ।
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शैनेयस्य रथं तूर्णं छादयामासतुः शरैः ॥ १५ ॥
सात्यकिकी बाण - वर्षासे रोके जाते हुए उन दोनों राजकुमारोंने तुरंत ही उनके रथको बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १५ ॥
तयोस्तु धनुषी चित्रे छित्त्वा शौरिर्महायशाः ।
अथ तौ सायकैस्तीक्ष्णैर्वारयामास संयुगे ॥ १६ ॥
तब महायशस्वी सात्यकिने अपने तीखे बाणोंसे उन दोनोंके विचित्र धनुषोंको काटकर उन्हें युद्धस्थलमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १६ ॥
अथान्ये धनुषी चित्रे प्रगृह्य च महाशरान् ।
सात्यकिं छादयन्तौ तौ चेरतुर्लघु सुष्ठुच ॥ १७ ॥
फिर वे दोनों भाई दूसरे विचित्र धनुष और उत्तम बाण लेकर सात्यकिको आच्छादित करते हुए सुन्दर एवं शीघ्र गतिसे सब ओर विचरने लगे ॥ १७ ॥
ताभ्यां मुक्ता महाबाणाः कङ्कबर्हिणवाससः ।
द्योतयन्तो दिशः सर्वाः सम्पेतुः स्वर्णभूषणाः ॥ १८ ॥
उन दोनोंके छोड़े हुए स्वर्णभूषित महान् बाण, जो कंक और मोरके पंखोंसे सुशोभित थे, सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए गिरने लगे ॥ १८ ॥
बाणान्धकारमभवत् तयो राजन् महामृधे ।
अन्योन्यस्य धनुश्चैव चिच्छिदुस्ते महारथाः ॥ १ ९ ॥
राजन्! उस महासमरमें उन दोनोंके बाणोंसे अन्धकार छा गया । फिर उन तीनों महारथियोंने एक दूसरेके धनुष काट डाले ॥ १ ९ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज सात्वतो युद्धदुर्मदः ।
धनुरन्यत् समादाय सज्यं कृत्वा च संयुगे ॥ २० ॥
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन अनुविन्दशिरोऽहरत् । महाराज! फिर तो रणदुर्मद सात्यकि कुपित हो उठे । उन्होंने युद्धस्थलमें दूसरा धनुष लेकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ायी और एक अत्यन्त तीखे क्षुरप्रके द्वारा अनुविन्दका सिर काट लिया ॥ २०३ ॥
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अपतत् तच्छिरो राजन् कुण्डलोपचितं महत् ॥ २१ ॥
शम्बरस्य शिरो यद्वन्निहतस्य महारणे ।
शोचयन् केकयान् सर्वान् जगामाशु वसुन्धराम् ॥ २२ ॥
राजन्! उस महासमरमें मारे गये अनुविन्दका कुण्डलमण्डित महान् मस्तक शम्बरासुरके सिरके समान कटकर गिरा और समस्त केकयोंको शोकमें डालता हुआ शीघ्र पृथ्वीपर जा पड़ा ॥ २१-२२ ॥
तं दृष्ट्वा निहतं शूरं भ्राता तस्य महारथः ।
सज्यमन्यद् धनुः कृत्वा शैनेयं पर्यवारयत् ॥ २३ ॥
शूरवीर अनुविन्दको मारा गया देख उसके महारथी भाई विन्दने अपने धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर सात्यकिको चारों ओरसे रोका ॥ २३ ॥
स षष्ट्या सात्यकिं विद्ध्वा स्वर्णपुङ्खै शिलाशितैः ।
ननाद बलवन्नादं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २४ ॥
उसने शिलापर तेज किये गये सुवर्णपंखयुक्त साठ बाणोंद्वारा सात्यकिको घायल करके बड़े जोरकी गर्जना की और कहा - 'खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ २४ ॥
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सात्यकिं च ततस्तूर्णं केकयानां महारथः ।
शरैरनेकसाहस्रैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ २५ ॥
तदनन्तर केकय - महारथी विन्दने तुरंत ही सात्यकिकी दोनों भुजाओं और छातीमें कई हजार बाण मारे ॥ २५ ॥
स शरैः क्षतसर्वाङ्गः सात्यकिः सत्यविक्रमः ।
रराज समरे राजन् सपुष्प इव किंशुक ॥ २६ ॥
राजन्! उन बाणोंसे समरांगणमें सत्यपराक्रमी सात्यकिके सारे अंग क्षत - विक्षत हो लहूलुहान हो गये और वे खिले हुए पलाशके समान सुशोभित होने लगे ॥
सात्यकिः समरे विद्धः कैकेयेन महात्मना ।
कैकेयं पञ्चविंशत्या विव्याध प्रहसन्निव ॥ २७ ॥
महामना कैकेय ( विन्द ) -के द्वारा समरांगणमें घायल हुए सात्यकिने हँसते हुए - से पचीस बाण मारकर कैकेयको भी घायल कर दिया ॥ २७ ॥
तावन्योन्यस्य समरे संछिद्य धनुषी शुभे ।
हत्वा च सारथी तूर्णं हयांश्च रथिनां वरौ ॥ २८ ॥
उन दोनों महारथियोंने युद्धस्थलमें एक- दूसरेके सुन्दर धनुष काटकर तुरंत ही सारथि और घोड़े भी मार डाले ॥
विरथावसियुद्धाय समाजग्मतुराहवे ।
शतचन्द्रचिते गृह्य चर्मणी सुभुजौ तथा ॥ २९ ॥
फिर वे सुन्दर भुजाओंवाले दोनों वीर रथहीन होकर सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त ढाल और तलवार लिये खड्ग- युद्धके लिये उद्यत हो युद्धस्थलमें एक- दूसरेके सामने आये ॥ २ ९ ॥
व्यरोचेतां महारङ्गे निस्त्रिंशवरधारिणौ ।
यथा देवासुरे युद्धे जम्भशक्रौ महाबलौ ॥ ३० ॥
जैसे देवासुर - संग्राममें महाबली इन्द्र और जम्भसुर शोभा पाते थे, उसी प्रकार युद्धके उस महान् रंगस्थलमें उत्तम खड्ग धारण किये हुए वे दोनों योद्धा सुशोभित हो रहे थे ॥ ३० ॥
मण्डलानि ततस्तौ तु विचरन्तौ महारणे ।
अन्योन्यमभितस्तूर्णं समाजग्मतुराहवे ॥ ३१ ॥
उस महासमरमें मण्डलाकार विचरते और पैंतरे दिखाते हुए वे दोनों वीर तुरंत ही एक-दूसरेके समीप आ गये ॥ ३१ ॥
अन्योन्यस्य वधे चैव चक्रतुर्यत्नमुत्तमम् ।
कैकेयस्य द्विधा चर्म ततश्चिच्छेद सात्वतः ॥ ३२ ॥
सात्यकेस्तु तथैवासौ चर्म चिच्छेद पार्थिवः ।
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फिर वे एक- दूसरेके वधके लिये भारी यत्न करने लगे । तदनन्तर सात्यकिने विन्दकी ढालके दो टुकड़े कर दिये । इसी प्रकार राजकुमार विन्दने भी सात्यकिकी ढाल टूक- टूक कर दी ॥ ३२ ॥
चर्म च्छित्त्वा तु कैकेयस्तारागणशतैर्वृतम् ॥ ३३ ॥
चचार मण्डलान्येव गतप्रत्यागतानि च । सैकड़ों तारक - चिह्नोंसे भरी हुई सात्यकिकी ढाल काटकर विन्द गत और प्रत्यागत आदि पैंतरे बदलने लगा ॥ ३३३ ॥
तं चरन्तं महारङ्गे निस्त्रिंशवरधारिणम् ॥ ३४ ॥
अपहस्तेन चिच्छेद शैनेयस्त्वरयान्वितः । युद्धके उस महान् रंगस्थलमें श्रेष्ठ खड्ग धारण करके विचरते हुए विन्दको सात्यकिने तिरछे हाथसे शीघ्रतापूर्वक काट डाला ॥ ३४३ ॥
सवर्मा केकयो राजन् द्विधा छिन्नो महारणे ॥ ३५ ॥
निपपात महेष्वासो वज्राहत इवाचलः । राजन्! इस प्रकार महायुद्धमें दो टुकड़ोंमें कटा हुआ कवचसहित महाधनुर्धर केकयराज वज्रके मारे हुए पर्वतके समान गिर पड़ा ॥ ३५३ ॥
तं निहत्य रणे शूरः शैनेयो रथसत्तमः ॥ ३६ ॥
युधामन्युरथं तूर्णमारुरोह परंतपः । रथियोंमें श्रेष्ठ शत्रुदमन रणशूर सात्यकि विन्दका वध करके तुरंत ही युधामन्युके रथपर चढ़ गये ॥ ३६३ ॥
ततोऽन्यं रथमास्थाय विधिवत्कल्पितं पुनः ।
केकयानां महत् सैन्यं व्यधमत् सात्यकिः शरैः ॥ ३७ ॥
तत्पश्चात् विधिपूर्वक सजाकर लाये हुए दूसरे रथपर आरूढ़ हो सात्यकि अपने बाणोंद्वारा केकयोंकी विशाल सेनाका संहार करने लगे ॥ ३७ ॥
सा वध्यमाना समरे केकयानां महाचमूः ।
तमुत्सृज्य रणे शत्रुं प्रदुद्राव दिशो दश ॥ ३८ ॥
समरभूमिमें मारी जाती हुई केकयोंकी वह विशाल सेना रणमें शत्रुको त्यागकर दसों दिशाओंमें भाग गयी ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि विन्दानुविन्दवधे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें विन्द और अनुविन्दका वधविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
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चतुर्दशोऽध्यायः द्रौपदीपुत्र श्रुतकर्मा और प्रतिविन्ध्यद्वारा क्रमशः चित्रसेन एवं चित्रका वध, कौरव- सेनाका पलायन तथा अश्वत्थामाका भीमसेनपर आक्रमण संजय उवाच
श्रुतकर्मा ततो राजंश्चित्रसेनं महीपतिम् ।
आजघ्ने समरे क्रुद्धः पञ्चाशद्भिः शिलीमुखैः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! तदनन्तर श्रुतकर्माने समरांगणमें कुपित हो राजा चित्रसेनको पचास बाण मारे ॥
अभिसारस्तु तं राजन् नवभिर्नतपर्वभिः ।
श्रुतकर्माणमाहत्य सूतं विव्याध पञ्चभिः ॥ २ ॥
नरेश्वर! अभिसारके राजा चित्रसेनने झुकी हुई गाँठवाले नौ बाणोंसे श्रुतकर्माको घायल करके पाँचसे उसके सारथिको भी बींध डाला ॥ २ ॥
श्रुतकर्मा ततः क्रुद्धश्चित्रसेनं चमूमुखे ।
नाराचेन सुतीक्ष्णेन मर्मदेशे समार्पयत् ॥ ३ ॥
तब क्रोधमें भरे हुए श्रुतकर्माने सेनाके मुहानेपर तीखे नाराचसे चित्रसेनके मर्मस्थलपर आघात किया ॥ ३ ॥
सोऽतिविद्धो महाराज नाराचेन महात्मना ।
मूर्च्छामभिययौ वीरः कश्मलं चाविवेश ह ॥ ४ ॥
महामना श्रुतकर्माके नाराचसे अत्यन्त घायल होनेपर वीर चित्रसेनको मूर्च्छा आ गयी ।
वे अचेत हो गये ॥ ४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे चैनं श्रुतकीर्तिर्महायशाः ।
नवत्या जगतीपालं छादयामास पत्रिभिः ॥ ५ ॥
इसी बीचमें महायशस्वी श्रुतकीर्तिने नब्बे बाणोंसे भूपाल चित्रसेनको आच्छादित कर दिया ॥ ५ ॥
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां चित्रसेनो महारथः ।
धनुश्चिच्छेद भल्लेन तं च विव्याध सप्तभिः ॥ ६ ॥
तदनन्तर होशमें आकर महारथी चित्रसेनने एक भल्लसे श्रुतकर्माका धनुष काट डाला और उसे भी सात बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६ ॥
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय वेगघ्नं रुक्मभूषितम् ।
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चित्ररूपधरं चक्रे चित्रसेनं शरोर्मिभिः ॥ ७ ॥
तब श्रुतकर्माने शत्रुओंके वेगको नष्ट करनेवाला दूसरा सुवर्णभूषित धनुष लेकर चित्रसेनको अपने बाणोंकी लहरोंसे विचित्र रूपधारी बना दिया ॥ ७ ॥
स शरैश्चित्रितो राजा चित्रमाल्यधरो युवा ।
अशोभत महारङ्गे श्वाविच्छ्ललतो यथा ॥ ८ ॥
विचित्र माला धारण करनेवाले नवयुवक राजा चित्रसेन उन बाणोंसे चित्रित हो युद्धके महान् रंगस्थलमें काँटोंसे भरे हुए साहीके समान सुशोभित होने लगे ॥ ८ ॥
श्रुतकर्माणमथ वै नाराचेन स्तनान्तरे ।
बिभेद तरसा शूरस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ९ ॥
तब उस शूरवीर नरेशने श्रुतकर्माकी छातीमें बड़े वेग से नाराचका प्रहार किया और कहा — ‘ खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ ९ ॥
श्रुतकर्मापि समरे नाराचेन समर्पितः ।
सुस्राव रुधिरं तत्र गैरिकार्द्र इवाचलः ॥ १० ॥
उस समय नाराचसे घायल हुआ श्रुतकर्मा समरांगणमें उसी प्रकार रक्त बहाने लगा, जैसे गेरूसे भीगा हुआ पर्वत लाल रंगकी जलधारा बहाता है ॥ १० ॥
ततः स रुधिराक्ताङ्गो रुधिरेण कृतच्छविः ।
रराज समरे वीरः सपुष्प इव किंशुकः ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् खूनसे लथपथ अंगोंवाला वीर श्रुतकर्मा समरांगणमें उस रुधिरसे अभिनव शोभा धारण करके खिले हुए पलाशवृक्षके समान सुशोभित हुआ ॥ ११ ॥
श्रुतकर्मा ततो राजन् शत्रुणा समभिद्रुतः ।
शत्रुसंवारणं क्रुद्धो द्विधा चिच्छेद कार्मुकम् ॥ १२ ॥
राजन्! शत्रुके द्वारा इस प्रकार आक्रान्त होनेपर श्रुतकर्मा कुपित हो उठा और उसने राजा चित्रसेनके शत्रु - निवारक धनुषके दो टुकड़े कर डाले ॥ १२ ॥
अथैनं छिन्नधन्वानं नाराचानां शतैस्त्रिभिः ।
छादयन् समरे राजन् विव्याध च सुपत्रिभिः ॥ १३ ॥
महाराज! धनुष कट जानेपर चित्रसेनको आच्छादित करते हुए श्रुतकर्माने सुन्दर पंखवाले तीन सौ नाराचोंद्वारा उसे घायल कर दिया ॥ १३ ॥
ततोऽपरेण भल्लेन तीक्ष्णेन निशितेन च ।
जहार सशिरस्त्राणं शिरस्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
तदनन्तर एक पैनी धारवाले तीखे भल्लसे उसने महामना चित्रसेनके शिरस्त्राणसहित मस्तकको काट लिया ॥ १४ ॥
तच्छिरो न्यपतद् भूमौ चित्रसेनस्य दीप्तिमत् ।
यदृच्छया यथा चन्द्रश्च्युतः स्वर्गान्महीतलम् ॥ १५ ॥
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चित्रसेनका वह दीप्तिशाली मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो चन्द्रमा दैवेच्छावश स्वर्गसे भूतलपर आ गिरा हो ॥ १५ ॥
राजानं निहतं दृष्ट्वा तेऽभिसारं तु मारिष ।
अभ्यद्रवन्त वेगेन चित्रसेनस्य सैनिकाः ॥ १६ ॥
माननीय नरेश! अभिसार देशके अधिपति राजा चित्रसेनको मारा गया देख उनके सैनिक बड़े वेगसे भाग चले ॥ १६ ॥
ततः क्रुद्धो महेष्वासस्तत्सैन्यं प्राद्रवच्छरैः ।
अन्तकाले यथा क्रुद्धः सर्वभूतानि प्रेतराट् ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए महाधनुर्धर श्रुतकर्माने अपने बाणोंद्वारा उस सेनापर आक्रमण किया, मानो प्रलयकालमें कुपित हुए यमराज समस्त प्राणियोंपर धावा बोल रहे हों ॥ १७ ॥
ते वध्यमानाः समरे तव पौत्रेण धन्विना ।
व्यद्रवन्त दिशस्तूर्णं दावदग्धा इव द्विपाः ॥ १८ ॥
युद्धमें आपके धनुर्धर पौत्र श्रुतकर्माद्वारा मारे जाते हुए वे सैनिक दावानलमें झुलसे हुए हाथियोंके समान तुरंत ही सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ १८ ॥
तांस्तु विद्रवतो दृष्ट्वा निरुत्साहान् द्विषज्जये ।
द्रावयन्निषुभिस्तीक्ष्णैः श्रुतकर्मा व्यरोचत ॥ १ ९ ॥
शत्रुओंपर विजय पानेका उत्साह छोड़कर भागते हुए उन सैनिकोंको देखकर अपने तीखे बाणोंसे उन्हें खदेड़ते हुए श्रुतकर्माकी अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ १ ९ ॥
प्रतिविन्ध्यस्ततश्चित्रं भित्त्वा पञ्चभिराशुगैः ।
सारथिं च त्रिभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेषुणापि च ॥ २० ॥
दूसरी ओर प्रतिविन्ध्यने पाँच बाणोंद्वारा चित्रको क्षत -विक्षत करके तीन बाणोंसे सारथिको घायल कर दिया और एक बाणसे उसके ध्वजको भी बींध डाला ॥
तं चित्रो नवभिर्भल्लैर्बाहोरुरसि चार्पयत् ।
स्वर्णपुङ्खैः प्रसन्नाग्रैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ॥ २१ ॥
तब चित्रने कंक और मयूरकी पाँखोंसे युक्त स्वच्छ धार और सुनहरे पंखवाले नौ भल्लोंसे प्रतिविन्ध्यकी दोनों भुजाओं और छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २१ ॥
प्रतिविन्ध्यो धनुश्छित्त्वा तस्य भारत सायकैः ।
पञ्चभिर्निशितैर्बाणैरथैनं स हि जघ्निवान् ॥ २२ ॥
भारत! प्रतिविन्ध्यने अपने बाणोंद्वारा उसके धनुषको काटकर पाँच तीखे बाणोंसे चित्रको भी घायल कर दिया ॥
ततः शक्तिं महाराज स्वर्णघण्टां दुरासदाम् ।
प्राहिणोत् तव पौत्राय घोरामग्निशिखामिव ॥ २३ ॥
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महाराज! तदनन्तर चित्रने आपके पौत्रपर घोर अग्निशिखाके समान सुवर्णमय घंटोंसे सुशोभित एक दुर्धर्ष शक्ति चलायी ॥ २३ ॥
तामापतन्तीं सहसा महोल्काप्रतिमां तदा ।
द्विधा चिच्छेद समरे प्रतिविन्ध्यो हसन्निव ॥ २४ ॥
समरांगणमें बड़ी भारी उल्काके समान सहसा आती हुई उस शक्तिको प्रतिविन्ध्यने हँसते हुए - से दो टुकड़ोंमें काट डाला ॥ २४ ॥
सा पपात द्विधा छिन्ना प्रतिविन्ध्यशरैः शितैः ।
युगान्ते सर्वभूतानि त्रासयन्ती यथाशनिः ॥ २५ ॥
प्रतिविन्ध्यके तीखे बाणोंसे दो टूक होकर वह शक्ति प्रलयकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंको भयभीत करनेवाली अशनिके समान गिर पड़ी ॥ २५ ॥
शक्तिं तां प्रहतां दृष्ट्वा चित्रो गृह्य महागदाम् ।
प्रतिविन्ध्याय चिक्षेप रुक्मजालविभूषिताम् ॥ २६ ॥
उस शक्तिको नष्ट हुई देख चित्रने सोनेकी जालियोंसे विभूषित एक विशाल गदा हाथमें ले ली और उसे प्रतिविन्ध्यपर छोड़ दिया ॥ २६ ॥
सा जघान हयांस्तस्य सारथिं च महारणे ।
रथं प्रमृद्य वेगेन धरणीमन्वपद्यत ॥ २७ ॥
उस गदाने महासमरमें प्रतिविन्ध्यके घोड़ों और सारथिको मार डाला और रथको भी चूर- चूर करती हुई वह बड़े वेगसे पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २७ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु रथादाप्लुत्य भारत ।
शक्तिं चिक्षेप चित्राय स्वर्णदण्डामलंकृताम् ॥ २८ ॥
भारत! इसी बीचमें रथसे कूदकर प्रतिविन्ध्यने चित्रपर एक सुवर्णमय दण्डवाली सुसज्जित शक्ति चलायी ॥ २८ ॥
तामापतन्तीं जग्राह चित्रो राजन् महामनाः ।
ततस्तामेव चिक्षेप प्रतिविन्ध्याय पार्थिवः ॥ २ ९ ॥
राजन्! महामना राजा चित्रने अपनी ओर आती हुई उस शक्तिको हाथसे पकड़ लिया और फिर उसीको प्रतिविन्ध्यपर दे मारा ॥ २ ९ ॥ समासाद्य रणे शूरं प्रतिविन्ध्यं महाप्रभा ।
निर्भिद्य दक्षिणं बाहुं निपपात महीतले ।
पतिताभासयच्चैव तं देशमशनिर्यथा ॥ ३० ॥
वह अत्यन्त कान्तिमती शक्ति रणभूमिमें शूरवीर प्रतिविन्ध्यको जा लगी और उसकी दाहिनी भुजाको विदीर्ण करती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी । वह जहाँ गिरी, उस स्थानको बिजलीके समान प्रकाशित करने लगी ॥ ३० ॥
प्रतिविन्ध्यस्ततो राजंस्तोमरं हेमभूषितम् ।