04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1711–1720

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1711–1720

पृष्ठ 1711

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1711 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कौरव - सेनामें रथ, घोड़े और हाथियोंकी संख्या बढ़ी चढ़ी थी, श्रेष्ठ पैदल सैनिकोंसे भी वह सेना भरी हुई थी, तथापि पाण्ड्यनरेशके द्वारा बलपूर्वक आहत होकर वह कुम्हारके चाककी भाँति चक्कर काटने लगी ॥ ७ ॥

व्यश्वसूतध्वजरथान् विप्रविद्धायुधद्विपान् ।

सम्यगस्तैः शरैः पाण्ड्यो वायुर्मेघानिवाक्षिपत् ॥ ८ ॥

जैसे वायु मेघोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेशने अच्छी तरह चलाये हुए बाणोंद्वारा समस्त सैनिकोंको घोड़े, सारथि, ध्वज और रथोंसे हीन कर दिया । उनके आयुधों और हाथियोंको भी मार गिराया ॥ ८ ॥

द्विरदान् द्विरदारोहान् विपताकायुधध्वजान् ।

सपादरक्षानहनद् वज्रेणाद्रीनिवाद्रिहा ॥ ९ ॥

जैसे पर्वतोंका हनन करनेवाले इन्द्रने वज्रद्वारा पर्वतोंपर आघात किया था, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेशने पादरक्षकोंसहित हाथियों और हाथीसवारोंको ध्वजा, पताका तथा आयुधोंसे वंचित करके मार डाला ॥ ९ ॥

सशक्तिप्रासतूणीरानश्वारोहान् हयानपि ।

पुलिन्दखसबाह्लीकनिषादान्ध्रककुन्तलान् ॥ १० ॥

दाक्षिणात्यांश्च भोजांश्च शूरान् संग्रामकर्कशान् ।

विशस्त्रकवचान् बाणैः कृत्वा चैवाकरोद् व्यसून् ॥ ११ ॥

शक्ति, प्रास और तरकसोंसहित घुड़सवारों तथा घोड़ोंको भी यमलोक पहुँचा दिया । पुलिन्द, खस, बाह्लीक, निषाद, आन्ध्र, कुन्तल, दाक्षिणात्य तथा भोजप्रदेशीय रणकर्कश शूर- वीरोंको अपने बाणोंद्वारा अस्त्र- शस्त्र तथा कवचोंसे हीन करके उनके प्राण हर लिये ॥ १०-११ ॥

चतुरङ्गं बलं बाणैर्निघ्नन्तं पाण्ड्यमाहवे ।

दृष्ट्वा द्रौणिरसम्भ्रान्तमसम्भ्रान्तस्ततोऽभ्ययात् ॥ १२ ॥

राजा पाण्ड्यको समरांगणमें बिना किसी घबराहटके अपने बाणोंद्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका विनाश करते देख अश्वत्थामाने निर्भय होकर उनका सामना किया ॥ १२ ॥

आभाष्य चैनं मधुरमभीतं तमभीतवत् ।

प्राह प्रहरतां श्रेष्ठः स्मितपूर्वं समाह्वयत् ॥ १३ ॥

साथ ही उन निर्भय नरेशको मधुर वाणीमें सम्बोधित करके योद्धाओंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामाने मुसकराकर युद्धके लिये उनका आह्वान करते हुए निर्भीकके समान कहा — - ॥ १३ ॥

राजन् कमलपत्राक्ष विशिष्टाभिजनश्रुत ।

वज्रसंहननप्रख्य प्रख्यातबलपौरुष ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1712

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1712 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ राजन्! कमलनयन! तुम्हारा कुल और शास्त्रज्ञान सर्वश्रेष्ठ है । तुम्हारा सुगठित शरीर वज्रके समान कान्तिमान् है, तुम्हारे बल और पुरुषार्थ भी प्रसिद्ध हैं ॥ १४ ॥

मुष्टिश्लिष्टायतज्यं च व्यायताभ्यां महद् धनुः ।

दोर्भ्यां विस्फारयन् भासि महाजलदवद् भृशम् ॥ १५ ॥

' तुम्हारे धनुषकी प्रत्यंचा एक ही समय तुम्हारी मुट्ठीमें सटी हुई तथा गोलाकार फैली हुई दिखायी देती है । जब तुम अपनी दोनों बड़ी- बड़ी भुजाओंसे विशाल धनुषको खींचने और उसकी टंकार करने लगते हो, उस समय महान् मेघके समान तुम्हारी बड़ी शोभा होती है ॥ १५ ॥

शरवर्षैर्महावेगैरमित्रानभिवर्षतः ।

मदन्यं नानुपश्यामि प्रतिवीरं तवाहवे ॥ १६ ॥

' जब तुम अपने शत्रुओंपर बड़े वेगसे बाण- वर्षा करने लगते हो, उस समय मैं अपने सिवा दूसरे किसी वीरको ऐसा नहीं देखता, जो समरांगणमें तुम्हारा सामना कर सके ॥ १६ ॥

रथद्विरदपत्त्यश्वानेकः प्रमथसे बहुन् ।

मृगसंघानिवारण्ये विभीर्भीमबलो हरिः ॥ १७ ॥

तुम अकेले ही बहुत - से रथ, हाथी, पैदल और घोड़ोंको मथ डालते हो । ठीक उसी तरह जैसे वनमें भयंकर बलशाली सिंह बिना किसी भयके मृग- समूहोंका संहार कर डालता है ॥ १७ ॥

महता रथघोषेण दिवं भूमिं च नादयन् ।

वर्षान्ते सस्यहा मेघो भासि हादीव पार्थिव ॥ १८ ॥

‘ राजन्! तुम अपने रथके गम्भीर घोषसे आकाश और पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए शरत्कालमें गर्जना करनेवाले सस्यनाशक मेघके समान जान पड़ते हो ॥ १८ ॥

संस्पृशानः शरांस्तीक्ष्णांस्तूणादाशीविषोपमान् ।

मयैवैकेन युध्यस्व त्र्यम्बकेनान्धको यथा ॥ १ ९ ॥

' अब तुम अपने तरकससे विषधर सर्पोंके समान तीखे बाण लेकर जैसे महादेवजीके साथ अन्धकासुरने संग्राम किया था, उसी प्रकार केवल मेरे साथ युद्ध करो ' ॥ १ ९ ॥

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा प्रहरेति च ताडितः ।

कर्णिना द्रोणतनयं विव्याध मलयध्वजः ॥ २० ॥

अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर पाण्ड्यनरेश बोले- ' अच्छा ऐसा ही होगा । पहले तुम प्रहार करो । ' इस प्रकार आक्षेपयुक्त वचन सुनकर अश्वत्थामाने उनपर अपने बाणका प्रहार किया । तब मलयध्वज पाण्ड्यनरेशने कर्णी नामक बाणके द्वारा द्रोणपुत्रको बींध डाला ॥ २० ॥

मर्मभेदिभिरत्युग्रैर्बाणैरग्निशिखोपमैः ।

पृष्ठ 1713

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1713 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

स्मयन्नभ्यहनद् द्रौणिः पाण्ड्यमाचार्यसत्तमः ॥ २१ ॥

तब आचार्यप्रवर अश्वत्थामाने अत्यन्त भयंकर तथा अग्निशिखाके समान तेजस्वी मर्मभेदी बाणोंद्वारा पाण्ड्यनरेशको मुसकराते हुए घायल कर दिया ॥ २१ ॥

ततोऽपरान् सुतीक्ष्णाग्रान् नाराचान् मर्मभेदिनः ।

गत्या दशम्या संयुक्तानश्वत्थामाप्यवासृजत् ॥ २२ ॥

तत्पश्चात् अश्वत्थामाने तीखे अग्रभागवाले दूसरे बहुत- से मर्मभेदी नाराच चलाये, जो दसवीं गतिका आश्रय लेकर छोड़े गये थे* ॥ २२ ॥

तान् शरानच्छिनत् पाण्ड्यो नवभिर्निशितैः शरैः ।

चतुर्भिरर्दयच्चाश्वानाशु ते व्यसवोऽभवन् ॥ २३ ॥

परंतु पाण्ड्यनरेशने नौ तीखे सायकोंद्वारा उन सब बाणोंके टुकड़े - टुकड़े कर दिये । फिर चार बाणोंसे उसके अश्वोंको अत्यन्त पीड़ा दी, जिससे वे शीघ्र ही अपने प्राण छोड़ बैठे ॥ २३ ॥

अथ द्रोणसुतस्येषूस्ताञ्छित्त्वा निशितैः शरैः ।

धनुर्ज्या विततां पाण्ड्यश्चिच्छेदादित्य तेजसः ॥ २४ ॥

तत्पश्चात् पाण्ड्यराजने अपने तीखे बाणोंद्वारा सूर्यके समान तेजस्वी अश्वत्थामाके उन बाणोंको छिन्न-भिन्न करके उसके धनुषकी फैली हुई डोरी भी काट डाली ॥ २४ ॥

दिव्यं धनुरथाधिज्यं कृत्वा द्रौणिरमित्रहा ।

प्रेक्ष्य चाशु रथे युक्तान् नरैरन्यान् हयोत्तमान् ॥ २५ ॥

ततः शरसहस्राणि प्रेषयामास वै द्विजः ।

इषुसम्बाधमाकाशमकरोद् दिश एव च ॥ २६ ॥

तब शत्रुसूदन द्रोणपुत्र विप्रवर अश्वत्थामाने अपने दिव्य धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर तथा यह भी देखकर कि मेरे रथमें सेवकोंने शीघ्र ही दूसरे उत्तम घोड़े लाकर जोत दिये हैं, सहस्रों बाण छोड़े तथा आकाश और दिशाओंको अपने बाणोंसे खचाखच भर दिया ॥ २५-२६ ॥

ततस्तानस्यतः सर्वान् द्रौणेर्बाणान् महात्मनः ।

जानानोऽप्यक्षयान् पाण्ड्योऽशातयत् पुरुषर्षभः ॥ २७ ॥

पुरुषशिरोमणि पाण्ड्यने बाण चलाते हुए महामनस्वी अश्वत्थामाके उन सब बाणोंको अक्षय जानते हुए भी काट डाला ॥ २७ ॥

प्रयुक्तांस्तान् प्रयत्नेन छित्त्वा द्रौणेरिषूनरिः ।

चक्ररक्षौ रणे तस्य प्राणुदन्निशितैः शरैः ॥ २८ ॥

इस प्रकार अश्वत्थामाके चलाये हुए उन बाणोंको प्रयत्नपूर्वक काटकर उसके शत्रु पाण्ड्यनरेशने पैने बाणोंद्वारा रणभूमिमें उसके दोनों चक्ररक्षकोंको मार डाला ॥ २८ ॥

अथारेर्लाघवं दृष्ट्वा मण्डलीकृतकार्मुकः ।

प्रास्यद् द्रोणसुतो बाणान् वृष्टिं पूषानुजो यथा ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1714

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1714 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शत्रुकी यह फुर्ती देखकर द्रोणकुमारने अपने धनुषको खींचकर मण्डलाकार बना दिया और जैसे पूषाका भाई पर्जन्य जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार उसने बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी ॥ २ ९ ॥

अष्टावष्टगवान्यूहुः शकटानि` यदायुधम् ।

अह्नस्तदष्टभागेन द्रौणिश्चिक्षेप मारिष ॥ ३० ॥

मान्यवर! आठ बैलोंसे जुते हुए आठ छकड़ोंने जितने आयुध ढोये थे, उन सबको अश्वत्थामाने उस दिनके आठवें भागमें चलाकर समाप्त कर दिया ॥ ३० ॥

तमन्तकमिव क्रुद्धमन्तकस्यान्तकोपमम् ।

ये ये ददृशिरे तत्र विसंज्ञाः प्रायशोऽभवन् ॥ ३१ ॥

यमराजके समान क्रोधमें भरा हुआ अश्वत्थामा उस समय कालका भी काल- सा जान पड़ता था । जिन - जिन लोगोंने वहाँ उसे देखा, वे प्रायः बेहोश हो गये ॥ ३१ ॥

पर्जन्य इव घर्मान्ते वृष्ट्या साद्रिद्रुमां महीम् ।

आचार्यपुत्रस्तां सेनां बाणवृष्ट्या व्यवीवृषत् ॥ ३२ ॥

जैसे वर्षाकालमें मेघ पर्वत और वृक्षोंसहित इस पृथ्वीपर जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार आचार्यपुत्र अश्वत्थामाने उस सेनापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३२ ॥

द्रौणिपर्जन्यमुक्तां तां बाणवृष्टिं सुदुःसहाम् ।

वायव्यास्त्रेण संक्षिप्य मुदा पाण्ड्यानिलोऽनुदत् ॥ ३३ ॥

अश्वत्थामारूपी मेघद्वारा की हुई उस दुःसह बाण वर्षाको पाण्ड्यराजरूपी वायुने वायव्यास्त्रसे छिन्न - भिन्न करके प्रसन्नतापूर्वक उड़ा दिया ॥ ३३ ॥

तस्य नानदतः केतुं चन्दनागुरुरूषितम् ।

मलयप्रतिमं द्रौणिश्छित्त्वाश्वांश्चतुरोऽहनत् ॥ ३४ ॥

उस समय द्रोणकुमार अश्वत्थामाने बारंबार गर्जना करते हुए पाण्ड्यके मलयाचल-सदृश ऊँचे तथा चन्दन और अगुरुसे चर्चित ध्वजको काटकर उनके चारों घोड़ोंको भी मार डाला ॥ ३४ ॥

सूतमेकेषुणा हत्वा महाजलदनिःस्वनम् ।

धनुश्छित्त्वार्धचन्द्रेण तिलशो व्यधमद् रथम् ॥ ३५ ॥

फिर एक बाणसे सारथिको मारकर महान् मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उनके धनुषको भी अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा काट दिया और उनके रथको तिल- तिल करके नष्ट कर डाला ॥ ३५ ॥

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य छित्त्वा सर्वायुधानि च ।

प्राप्तमप्यहितं द्रौणिर्न जघान रणेप्सया ॥ ३६ ॥

इस प्रकार अस्त्रोंद्वारा पाण्ड्यके अस्त्रोंका निवारण करके अश्वत्थामाने उनके सारे आयुध काट डाले, तथापि युद्धकी अभिलाषासे उसने अपने वशमें आये हुए शत्रुका भी वध

पृष्ठ 1715

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1715 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नहीं किया ॥ ३६ ॥

एतस्मिन्नन्तरे कर्णो गजानीकमुपाद्रवत् ।

द्रावयामास स तदा पाण्डवानां महद् बलम् ॥ ३७ ॥

इसी बीचमें कर्णने पाण्डवोंकी गजसेनापर आक्रमण किया । उस समय उसने पाण्डवोंकी विशाल सेनाको खदेड़ना आरम्भ किया ॥ ३७ ॥

विरथान् रथिनश्चक्रे गजानश्वांश्च भारत ।

गजान् बहुभिरानर्छच्छरैः संनतपर्वभिः ॥ ३८ ॥

भारत! उसने बहुत - से रथियोंको रथहीन कर दिया, हाथीसवारों और घुड़सवारोंके हाथी और घोड़े मार डाले तथा झुकी हुई गाँठवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा कितने ही हाथियोंको अत्यन्त पीड़ित कर दिया ॥ ३८ ॥

अथ द्रौणिर्महेष्वासः पाण्ड्यं शत्रुनिबर्हणम् ।

विरथं रथिनां श्रेष्ठं नाहनद् युद्धकाङ्क्षया ॥ ३ ९ ॥

इधर महाधनुर्धर अश्वत्थामाने शत्रुसंहारक, रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्यको रथहीन करके भी उनका वध इसलिये नहीं किया कि वह उनके साथ अभी युद्ध करना चाहता था ॥ ३ ९ ॥ हतेश्वरो दन्तिवरः सुकल्पित- स्त्वराभिसृष्टः प्रतिशब्दगो बली । तमाद्रवद् द्रौणिशराहतस्त्वरन् जवेन कृत्वा प्रतिहस्तिगर्जितम् ॥ ४० ॥

इतनेहीमें एक सजा-सजाया श्रेष्ठ एवं बलवान् गजराज बड़ी उतावलीके साथ छूटकर प्रतिध्वनिका अनुसरण करता हुआ उधर आ निकला, उसके मालिक और महावत मारे जा चुके थे । अश्वत्थामाके बाणोंसे आहत होकर वह शीघ्रतापूर्वक पाण्ड्यराजकी ओर दौड़ा । उसने प्रतिपक्षी हाथीकी गर्जनाका शब्द सुनकर बड़े वेगसे उसी ओर धावा किया था ॥ ४० ॥

तं वारणं वारणयुद्धकोविदो द्विपोत्तमं पर्वतसानुसंनिभम् । समभ्यतिष्ठन्मलयध्वजस्त्वरन् यथाद्रिशृङ्गं हरिरुन्नदंस्तथा ॥ ४१ ॥

परंतु गजयुद्धविशारद मलयध्वज पाण्ड्यनरेश पर्वतशिखरके समान ऊँचे उस श्रेष्ठ गजराजपर उतनी ही शीघ्रताके साथ चढ़ गये, जैसे दहाड़ता हुआ सिंह किसी पहाड़की चोटीपर चढ़ जाता है ॥ ४१ ॥

स तोमरं भास्कररश्मिवर्चसं बलास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभिः । ससर्ज शीघ्रं परिपीडयन् गजं

पृष्ठ 1716

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1716 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गुरोः सुतायाद्रिपतीश्वरो नदन् ॥ ४२ ॥

गिरिराज मलयके स्वामी पाण्ड्यराजने तुरंत अग्रसर होनेके लिये उस हाथीको पीड़ा दी और अस्त्र-प्रहारके लिये उत्तम यत्न, बल तथा क्रोधसे प्रेरित हो सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी एक तोमर हाथमें लेकर गर्जना करते हुए उसे शीघ्र ही आचार्यपुत्रपर चला दिया ॥ ४२ ॥

मणिप्रवेकोत्तमवज्रहाटकै- रलंकृत चांशुकमाल्यमौक्तिकैः । हतो हतोऽसीत्यसकृन्मुदा नदन् पराहनद् द्रौणिवराङ्गभूषणम् ॥ ४३ ॥

उस तोमरद्वारा उन्होंने उत्तम मणि, श्रेष्ठ हीरक, स्वर्ण, वस्त्र, माला और मुक्तासे विभूषित अश्वत्थामाके मुकुटपर बारंबार यह कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक आघात किया कि ' तुम मारे गये, मारे गये ' ॥ ४३ ॥

तदर्कचन्द्रग्रहपावकत्विषं भृशातिपातात् पतितं विचूर्णितम् । महेन्द्रवज्राभिहतं महास्वनं यथाद्रिशृङ्गं धरणीतले तथा ॥ ४४ ॥

सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और अग्निके समान प्रकाशमान वह मुकुट उस तोमरके गहरे आघातसे चूर- चूर होकर महान् शब्दके साथ उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे आहत हो किसी पर्वतका शिखर भारी आवाजके साथ धराशायी हो जाता है ॥ ४४ ॥

ततः प्रजज्वाल परेण मन्युना

पादाहतो नागपतिर्यथा तथा ।

समाददे चान्तकदण्डसंनिभा- निषूनमित्रार्तिकरांश्चतुर्दश ॥ ४५ ॥

तब अश्वत्थामा पैरोंसे ठुकराये हुए नागराजके समान शीघ्र ही अत्यन्त क्रोधसे जल उठा । फिर तो उसने यमदण्डके समान शत्रुओंको संताप देनेवाले चौदह बाण हाथमें लिये ॥ ४५ ॥

द्विपस्य पादाग्रकरान् स पञ्चभि- र्नृपस्य बाहू च शिरोऽथ च त्रिभिः । जघान षड्भिः षडनुत्तमत्विषः स पाण्ड्यराजानुचरान् महारथान् ॥ ४६ ॥

उसने पाँच बाणोंसे उस हाथीके पैर तथा सूँड़ काट लिये । फिर तीन बाणोंसे पाण्ड्यनरेशकी दोनों भुजाओं और मस्तकको शरीरसे अलग कर दिया । इसके बाद छः

पृष्ठ 1717

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1717 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बाणोंसे पाण्ड्यराजके पीछे चलनेवाले उत्तम कान्तिसे सुशोभित छः महारथियोंको भी मार डाला ॥ ४६ ॥

सुदीर्घवृत्तौ वरचन्दनोक्षितौ सुवर्णमुक्तामणिवज्रभूषणौ । भुजौ धरायां पतितौ नृपस्य तौ विचेष्टतुस्तार्क्ष्यहताविवोरगौ ॥ ४७ ॥

उत्तम, विशाल, गोलाकार, श्रेष्ठ चन्दनसे चर्चित, सुवर्ण, मुक्ता, मणि तथा हीरोंसे विभूषित पाण्ड्यनरेशकी वे दोनों भुजाएँ पृथ्वीपर गिरकर गरुड़के मारे हुए दो सर्पोंके समान छटपटाने लगीं ॥ ४७ ॥

शिरश्च तत् पूर्णशशिप्रभाननं सरोषताम्रायतनेत्रमुन्नसम् । क्षितावपि भ्राजति तत् सकुण्डलं विशाखयोर्मध्यगतः शशी यथा ॥ ४८ ॥

जिसका मुखमण्डल पूर्ण चन्द्रमाके सदृश प्रकाशमान तथा नेत्र क्रोधके कारण अरुणवर्ण थे, जिसकी नासिका ऊँची थी, वह पाण्ड्यराजका कुण्डलमण्डित मस्तक पृथ्वीपर गिरकर भी दो विशाखा नक्षत्रोंके बीचमें विराजमान चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ४८ ॥

स तु द्विपः पञ्चभिरुत्तमेषुभिः कृतः षडंशश्चतुरो नृपस्त्रिभिः । कृतो दशांशः कुशलेन युध्यता यथा हविस्तद्दशदैवतं तथा ॥ ४ ९ ॥ युद्धकुशल अश्वत्थामाने पाँच उत्तम बाण मारकर उस हाथीके छः टुकड़े कर दिये और फिर तीन बाणसे राजाके भी चार टुकड़े कर डाले । इस प्रकार दोनों मिलाकर दस भाग कर दिये । जैसे कि कर्मनिपुण पुरोहित दस हविर्धान यज्ञमें इन्द्र आदि दस देवताओंके लिये हविष्यके दस भाग कर देता है ॥ ४ ९ ॥ स पादशो राक्षसभोजनान् बहून्

प्रदाय पाण्ड्योऽश्वमनुष्यकुञ्जरान् ।

स्वधामिवाप्य ज्वलनः पितृप्रिय- स्ततः प्रशान्तः सलिलप्रवाहतः ॥ ५० ॥

जैसे पितरोंकी प्रिय चिताग्नि मृत शरीरको पाकर प्रज्वलित हो उसे जलाती है और अन्तमें जलका अभिषेक पाकर शान्त हो जाती है, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेश घोड़े, हाथी और मनुष्योंके टुकड़े -टुकड़े करके उन्हें प्रचुर मात्रामें राक्षसोंके लिये भोजन देकर अन्तमें अश्वत्थामाके बाणसे सदाके लिये शान्त हो गये ॥ ५० ॥

पृष्ठ 1718

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1718 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समाप्तविद्यं तु गुरोः सुतं नृपः समाप्तकर्माणमुपेत्य ते सुतः । सुहृद्वृतोऽत्यर्थमपूजयन्मुदा जिते बलौ विष्णुमिवामरेश्वरः ॥ ५१ ॥

जिसने पूरी विद्या समाप्त कर ली है तथा समस्त कर्तव्यकर्म पूर्ण कर लिये हैं, उस गुरुपुत्र अश्वत्थामाके पास सुहृदोंसहित आकर आपके पुत्र दुर्योधनने प्रसन्नतापूर्वक उसकी बड़ी पूजा की । ठीक उसी तरह जैसे बलिके पराजित होनेपर देवराज इन्द्रने विष्णुका पूजन किया था ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि पाण्ड्यवधे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें पाण्ड्यवधविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥

* बाणोंकी दस गतियाँ बतायी गयी हैं, जो इस प्रकार हैं- १ -उन्मुखी, २- अभिमुखी, ३ तिर्यक्, ४- मन्दा, ५ - गोमूत्रिका, ६- ध्रुवा, ७ - स्खलिता, ८- यमकाक्रान्ता, ९-क्रुष्टा और १० अतिक्रुष्टा । इनमें से पूर्वकी तीन गतियाँ क्रमशः मस्तक, हृदय तथा पार्श्वदेशका स्पर्श करनेवाली हैं । अर्थात् उन्मुखी गतिसे छोड़ा हुआ बाण मस्तकपर, अभिमुखी गतिसे प्रेरित बाण वक्षःस्थलपर और तिर्यक् - गति से चलाया हुआ बाण पार्श्वभागमें आघात करता है । मन्दा गतिसे छोड़े गये बाण त्वचाको कुछ- कुछ छेद पाते हैं । गोमूत्रिका गति से चलाये गये बाण बायें और दायें दोनों ओर जाते तथा कवचको भी काट देते हैं । ध्रुवा गति निश्चितरूपसे लक्ष्यका भेदन करानेवाली होती है । स्खलिता कहते हैं, लक्ष्यसे विचलित होनेवाली गतिको । उसके द्वारा संचालित बाण लक्ष्यभ्रष्ट होते हैं । यमकाक्रान्ता वह गति है, जिसके द्वारा प्रेरित बाण बारंबार लक्ष्य वेधकर निकल जाते हैं । क्रुष्टा उस गतिका नाम है, जो लक्ष्यके एक अवयव भुजा आदिका छेदन करती है । दसवीं गतिका नाम है अतिक्रुष्टा; जिसके द्वारा चलाया गया बाण शत्रुका मस्तक काटकर उसके साथ ही दूर जा गिरता है । ( नीलकण्ठीके आधारपर)

पृष्ठ 1719

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1719 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकविंशोऽध्यायः कौरव - पाण्डव -दलोंका भयंकर घमासान युद्ध धृतराष्ट्रउवाच

पाण्ड्ये हते किमकरोदर्जुनो युधि संजय ।

एकवीरेण कर्णेन द्रावितेषु परेषु च ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा – संजय! जब युद्धस्थलमें अश्वत्थामाद्वारा पाण्ड्यनरेश मार डाले गये और मेरे पक्षके अद्वितीय वीर कर्णने जब शत्रुसैनिकोंको मार भगाया, उस समय अर्जुनने क्या किया? ॥ १ ॥

समाप्तविद्यो बलवान् युक्तो वीरः स पाण्डवः ।

सर्वभूतेष्वनुज्ञातः शङ्करेण महात्मना ॥ २ ॥

पाण्डुकुमार अर्जुन युद्धविद्याकी शिक्षा समाप्त कर चुके हैं । वे विजयके प्रयत्नमें लगे हुए बलवान् वीर हैं । भगवान् शंकरने उन्हें कृपापूर्वक अनुगृहीत करते हुए यह कह दिया है कि ‘ तुम समस्त प्राणियोंमें प्रधान एवं अजेय होओगे ' ॥ २ ॥

तस्मान्महद् भयं तीव्रममित्रघ्नाद् धनंजयात् ।

स यत् तत्राकरोत् पार्थस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ३ ॥

इसलिये उन शत्रुनाशक धनंजयसे मुझे अत्यन्त तीव्र एवं महान् भय बना रहता है ।

अतः संजय! वहाँ कुन्तीकुमार अर्जुनने जो कुछ किया हो, वह मुझे बताओ ॥ ३ ॥

संजय उवाच

हते पाण्ड्येऽर्जुनं कृष्णस्त्वरन्नाह वचो हितम् ।

पश्यामि नाहं राजानमपयातांश्च पाण्डवान् ॥ ४ ॥

संजयने कहा — राजन्! पाण्ड्यनरेशके मारे जानेपर श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ अर्जुनसे यह हितकर वचन कहा -' पार्थ! मैं राजा युधिष्ठिरको नहीं देख रहा हूँ । युद्धस्थलसे हटे हुए अन्य पाण्डव भी मुझे नहीं दिखायी दे रहे हैं ॥ ४ ॥

निवृत्तैश्च पुनः पार्थैर्भग्नं शत्रुबलं महत् ।

अश्वत्थाम्नश्च सङ्कल्पाद्धताः कर्णेन सृञ्जयाः ॥ ५ ॥

तथाश्वरथनागानां कृतं च कदनं महत् । ‘ पुनः लौटे हुए पाण्डव- योद्धाओंने विशाल शत्रुसेनामें भगदड़ मचा दी थी; परंतु अश्वत्थामाके संकल्पके अनुसार कर्णने सृजयोंका संहार कर डाला तथा अपनी सेनाके हाथी, घोड़े एवं रथोंका भारी विनाश कर दिया' ॥ ५३ ॥

सर्वमाख्यातवान् वीरो वासुदेवः किरीटिने ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1720

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1720 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एतच्छ्रुत्वा च दृष्ट्वा च भ्रातुर्घोरं महद्भयम् ।

वाहयाश्वान् हृषीकेश क्षिप्रमित्याह पाण्डवः ॥ ७ ॥

वीर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने किरीटधारी अर्जुनको ये सारी बातें बतायीं । यह सुनकर तथा अपने भाईके ऊपर आये हुए इस घोर एवं महान् भयको देखकर पाण्डुकुमार अर्जुनने कहा — ‘ हृषीकेश! आप शीघ्र ही इन घोड़ोंको बढ़ाइये' ॥ ६-७ ॥

ततः प्रायाद्धषीकेशो रथेनाप्रतियोधिना ।

दारुणश्च पुनस्तत्र प्रादुरासीत् समागमः ॥ ८ ॥

तब भगवान् हृषीकेश जिसका सामना करनेवाला दूसरा कोई योद्धा नहीं था उस रथके द्वारा आगे बढ़े । उस समय वहाँ पुनः बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ा हुआ था ॥ ८ ॥

ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः ।

भीमसेनमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥ ९ ॥

कौरव तथा पाण्डव - योद्धा पुनः निर्भय होकर एक- दूसरेसे भिड़ गये थे । पाण्डव-सैनिकोंके प्रधान थे भीमसेन और हमलोगोंका प्रधान था सूतपुत्र कर्ण ॥ ९ ॥

ततः प्रववृते भूयः संग्रामो राजसत्तम ।

कर्णस्य पाण्डवानां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ १० ॥

नृपश्रेष्ठ! उस समय कर्णका पाण्डव - सैनिकोंके साथ जो पुनः संग्राम आरम्भ हुआ था, वह यमराजके राज्यकी श्रीवृद्धि करनेवाला था ॥ १० ॥

धनूंषि बाणान् परिघानसिपट्टिशतोमरान् ।

मुसलानि भुशुण्डीश्च सशक्त्यृष्टिपरश्वधान् ॥ ११ ॥

गदाः प्रासाञ्छितान् कुन्तान् भिन्दिपालान् महाङ् कुशान् ।

प्रगृह्य क्षिप्रमापेतुः परस्परजिघांसया ॥ १२ ॥

दोनों दलोंके सैनिक एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे धनुष, बाण, परिघ, खड्ग, पट्टिश, तोमर, मूसल, भुशुण्डी, शक्ति, ऋष्टि, फरसे, गदा, प्रास, तीखे कुन्त, भिन्दिपाल और बड़े - बड़े अंकुश लेकर शीघ्रतापूर्वक युद्धके मैदानमें कूद पड़े थे ॥ ११-१२ ॥

बाणज्यातलशब्देन द्यां दिशः प्रदिशो वियत् ।

पृथिवीं नेमिघोषेण नादयन्तोऽभ्ययुः परान् ॥ १३ ॥

रथी वीर अपने बाणसहित धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि एवं रथके पहियोंकी घर्घराहटसे आकाश, अन्तरिक्ष, दिशा, विदिशा तथा भूतलको शब्दायमान करते हुए शत्रुओंपर चढ़ आये ॥ १३ ॥

तेन शब्देन महता संहृष्टाश्चक्रुराहवम् ।

वीरा वीरैर्महाघोरं कलहान्तं तितीर्षवः ॥ १४ ॥

कलहके पार जानेकी इच्छा रखनेवाले वे सभी वीर उस महान् शब्दसे हर्ष एवं उत्साहमें भरकर विपक्षी वीरोंके साथ अत्यन्त घोर संग्राम करने लगे ॥ १४ ॥