04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1721–1730
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1721–1730
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ज्यातलत्रधनुःशब्दः कुञ्जराणां च बृंहताम् ।
पादातानां च पततां नृणां नादो महानभूत् ॥ १५ ॥
प्रत्यंचा, हस्तत्राण और धनुषका शब्द, चिग्घाड़ते हुए हाथियोंकी आवाज तथा रणभूमिमें गिरते हुए पैदल मनुष्योंके महान् आर्तनादकी तुमुल ध्वनि वहाँ गूँजने लगी ॥ १५ ॥
तालशब्दांश्च विविधाञ्शूराणां चाभिगर्जताम् ।
श्रुत्वा तत्र भृशं त्रेसुः पेतुर्मम्लुश्च सैनिकाः ॥ १६ ॥
सामने गर्जना करनेवाले शूरवीरोंके ताल ठोंकनेके विविध शब्द सुनकर कितने ही सैनिक वहाँ भयसे थर्रा उठते थे, कितने ही गिर पड़ते थे और कितने ही ग्लानिसे भर जाते थे ॥ १६ ॥
तेषां निनदतां चैव शस्त्रवर्षं च मुञ्चताम् ।
बहूनाधिरथिर्वीरः प्रममाथेषुभिः परान् ॥ १७ ॥
जोर- जोरसे गर्जते तथा अस्त्र - शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए उन शत्रुसैनिकोंमेंसे बहुतोंको वीर कर्णने अपने बाणोंसे मथ डाला ॥ १७ ॥
पञ्च पाञ्चालवीराणां रथान् दश च पञ्च च ।
साश्वसूतध्वजान् कर्णः शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ १८ ॥
उसने अपने बाणोंद्वारा पांचाल वीरोंमेंसे पहले पाँच, फिर दस और फिर पाँच रथियोंको घोड़े, सारथि एवं ध्वजोंसहित मारकर यमलोक पहुँचा दिया ॥ १८ ॥
योधमुख्या महावीर्याः पाण्डूनां कर्णमाहवे ।
शीघ्रास्त्रास्तूर्णमावृत्य परिवव्रुः समन्ततः ॥ १ ९ ॥
तब समरांगणमें पाण्डवदलके शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले महापराक्रमी प्रधान-प्रधान योद्धाओंने तुरंत आकर कर्णको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १ ९ ॥
ततः कर्णो द्विषत्सेनां शरवर्षैर्विलोडयन् ।
विजगाहाण्डजाकीर्णां पद्मिनीमिव यूथपः ॥ २० ॥
तदनन्तर कर्णने अपने बाणोंकी वर्षासे शत्रुसेनाका मन्थन करते हुए उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे यूथपति गजराज पक्षियोंसे भरे हुए कमलपूर्ण सरोवरमें घुसकर उसे मथने लगता है ॥ २० ॥
द्विषन्मध्यमवस्कन्द्य राधेयो धनुरुत्तमम् ।
विधुन्वानः शितैर्बाणैः शिरांस्युन्मथ्य पातयत् ॥ २१ ॥
राधापुत्र कर्ण क्रमशः शत्रुसेनाके मध्यभागमें पहुँचकर अपने उत्तम धनुषको कम्पित करता हुआ पैने बाणोंसे शत्रुओंके सिर काट - काटकर गिराने लगा ॥ २१ ॥
चर्मवर्माणि संछिन्नान्यपतन् भुवि देहिनाम् ।
विषेहुर्नास्य संस्पर्शं द्वितीयस्य पतत्रिणः ॥ २२ ॥
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उस समय देहधारियोंके चमड़े और कवच कट- कटकर भूतलपर गिर रहे थे ।
शत्रुसैनिक कर्णके द्वितीय बाणका स्पर्श नहीं सहन कर पाते थे ॥ २२ ॥
वर्मदेहासुमथनैर्धनुषः प्रच्युतैः शरैः ।
मौर्व्या तलत्रे न्यहनत् कशया वाजिनो यथा ॥ २३ ॥
जैसे घुड़सवार घोड़ोंको कोड़ेसे पीटता है, उसी प्रकार कर्ण धनुषसे छूटकर कवच, शरीर और प्राणोंको मथ डालनेवाले बाणोंद्वारा शत्रुओंके हस्तत्राणपर भी प्रहार करने लगा ॥ २३ ॥
पाण्डुसृञ्जयपञ्चालान् शरगोचरमागतान् ।
ममर्द तरसा कर्णः सिंहो मृगगणानिव ॥ २४ ॥
जैसे सिंह अपनी दृष्टिमें पड़े हुए मृगोंको वेगपूर्वक मसल डालता है, उसी प्रकार कर्णने अपने बाणोंकी पहुँचके भीतर आये हुए पाण्डव, संजय तथा पांचाल योद्धाओंको बड़े वेगसे रौंद डाला ॥ २४ ॥
ततः पाञ्चालराजश्च द्रौपदेयाश्च मारिष ।
यमौ च युयुधानश्च सहिताः कर्णमभ्ययुः ॥ २५ ॥
मान्यवर! तब पांचालराज धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पुत्र तथा नकुल, सहदेव और सात्यकि— इन सबने एक साथ आकर कर्णपर आक्रमण किया ॥ २५ ॥
तेषु व्यायच्छमानेषु कुरुपाञ्चालपाण्डुषु ।
प्रियानसून् रणे त्यक्त्वा योधा जघ्नुः परस्परम् ॥ २६ ॥
उस समय जब कौरव, पांचाल तथा पाण्डव योद्धा परिश्रमपूर्वक युद्धमें लगे हुए थे, सभी सैनिक रणभूमिमें अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर एक - दूसरेको मारने लगे ॥
सुसंनद्धाः कवचिनः सशिरस्त्राणभूषणाः ।
गदाभिर्मुसलैश्चान्ये परिघैश्च महाबलाः ॥ २७ ॥
समभ्यधावन्त भृशं कालदण्डैरिवोद्यतैः ।
नर्दन्तश्चाह्वयन्तश्च प्रवल्गन्तश्च मारिष ॥ २८ ॥
माननीय नरेश! कमर कसे, कवच बाँधे तथा शिरस्त्राण एवं आभूषण धारण किये हुए महाबली योद्धा गरजते, उछलते-कूदते और एक- दूसरेको ललकारते हुए कालदण्डके समान गदा, मूसल और परिघ उठाये परस्पर धावा बोल रहे थे ॥ २७-२८ ॥
ततो निजघ्नुरन्योन्यं पेतुश्चान्योन्यताडिताः ।
वमन्तो रुधिरं गात्रैर्विमस्तिष्केक्षणायुधाः ॥ २ ९ ॥
तदनन्तर वे एक-दूसरेका वध करने, परस्पर चोट खाकर धराशायी होने तथा शरीरसे रक्त बहाने लगे । उनके मस्तिष्क, नेत्र और आयुध नष्ट हो गये थे ॥
दन्तपूर्णैः सरुधिरैर्वक्त्रैर्दाडिमसंनिभैः ।
जीवन्त इव चाप्येके तस्थुः शस्त्रोपबृंहिताः ॥ ३० ॥
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कितने ही वीरोंके शरीर अस्त्र- शस्त्रोंसे व्याप्त एवं प्राणशून्य होकर पड़े थे; परंतु उनके खुले हुए मुखमें जो रक्तरंजित दाँत थे, उनके द्वारा वे फटे हुए अनारके फलों - जैसे जान पड़ते थे और उस तरहके मुखोंद्वारा वे जीवित - से प्रतीत होते थे ॥ ३० ॥
परश्वधैश्चाप्यवरे पट्टिशैरसिभिस्तथा ।
शक्तिभिर्भिन्दिपालैश्च नखरप्रासतोमरैः ॥ ३१ ॥
ततक्षुश्चिच्छिदुश्चान्ये बिभिदुश्चिक्षिपुस्तथा ।
संचकर्तुश्च जघ्नुश्च क्रुद्धा रणमहार्णवे ॥ ३२ ॥
महासागरके समान उस विशाल युद्धस्थलमें परस्पर कुपित हुए अन्यान्य योद्धा परशु, पट्टिश, खड्ग, शक्ति, भिन्दिपाल, नखर, प्रास तथा तोमरोंद्वारा यथासम्भव एक- दूसरेका छेदन- भेदन, विदारण, क्षेपण, कर्तन और हनन करने लगे ॥ ३१-३२ ॥
पेतुरन्योन्यनिहता व्यसवो रुधिरोक्षिताः ।
क्षरन्तः सुरसं रक्तं प्रकृत्ताश्चन्दना इव ॥ ३३ ॥
जैसे लाल चन्दनके वृक्ष कट जानेपर रक्त वर्णका रस बहाने लगते हैं, उसी प्रकार परस्परके आघातसे मारे गये योद्धा खून से लथपथ एवं प्राणशून्य होकर युद्धभूमिमें पड़े थे और अपने अंगोंसे रक्त बहा रहे थे ॥ ३३ ॥
रथै रथा विनिहता हस्तिभिश्चापि हस्तिनः ।
नरैर्नरा हताः पेतुरश्वाश्चाश्वैः सहस्रशः ॥ ३४ ॥
रथियोंसे रथी, हाथियोंसे हाथी, पैदल मनुष्योंसे मनुष्य और घोड़ोंसे घोड़े मारे जाकर रणभूमिमें सहस्रोंकी संख्यामें पड़े थे ॥ ३४ ॥
ध्वजाः शिरांसि च्छत्राणि द्विपहस्ता नृणां भुजाः ।
क्षुरैर्भल्लार्धचन्द्रैश्च च्छिन्नाः पेतुर्महीतले ॥ ३५ ॥
ध्वज, मस्तक, छत्र, हाथीकी सूँड़ तथा मनुष्योंकी भुजाएँ – ये सब - के - सब क्षुरों, भल्लों तथा अर्धचन्द्रोंद्वारा कटकर भूतलपर पड़े थे ॥ ३५ ॥
नरांश्च नागान् सरथान् हयान् ममृदुराहवे ।
अश्वारोहैर्हताः शूराश्छिन्नहस्ताश्च दन्तिनः ॥ ३६ ॥
सपताकाध्वजाः पेतुर्विशीर्णा इव पर्वताः । घुड़सवारोंने कितने ही शूरवीरोंको मार डाला और बड़े- बड़े दन्तार हाथियोंकी सूँड़ें काट लीं । सूँड़ कट जानेपर उन हाथियोंने युद्धस्थलमें बहुत -से मनुष्यों, हाथियों, रथों और घोड़ोंको कुचल डाला । फिर वे पताका और ध्वजोंसहित टूटे - फूटे पर्वतोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३६३ ॥
पत्तिभिश्च समाप्लुत्य द्विरदाः स्यन्दनास्तथा ॥ ३७ ॥
हताश्च हन्यमानाश्च पतिताश्चैव सर्वशः ।
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पैदल वीरोंद्वारा उछल - उछलकर मारे गये और मारे जाते हुए कितने ही हाथी और रथ सवारोंसहित सब ओर पड़े थे ॥ ३७ ॥
अश्वारोहाः समासाद्य त्वरिताः पत्तिभिर्हताः ॥ ३८ ॥
सादिभिः पत्तिसंघाश्च निहता युधि शेरते । कितने ही घुड़सवार बड़ी उतावलीके साथ पैदल वीरोंके पास जाकर उनके द्वारा मारे गये तथा झुडं - के - झुंड पैदल सैनिक भी घुड़सवारोंकी चोटसे मारे जाकर युद्धस्थलमें सदाके लिये सो गये थे ॥ ३८ ॥
मृदितानीव पद्मानि प्रम्लाना इव च स्रजः ॥ ३ ९ ॥ हतानां वदनान्यासन् गात्राणि च महाहवे । उस महासमरमें मारे गये योद्धाओंके मुख और शरीर कुचले हुए कमलों और कुम्हलायी हुई मालाओंके समान श्रीहीन हो गये थे ॥ ३ ९ ३ ॥
रूपाण्यत्यर्थकान्तानि द्विरदाश्वनृणां नृप ।
समुन्नानीव वस्त्राणि ययुर्दुर्दर्शतां पराम् ॥ ४० ॥
नरेश्वर! हाथी, घोड़े और मनुष्योंके अत्यन्त सुन्दर रूप भी वहाँ कीचड़में सने हुए
वस्त्रोंके समान घिनौने हो गये थे । उनकी ओर देखना कठिन हो रहा था ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥
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द्वाविंशोऽध्यायः पाण्डव सेनापर भयानक गजसेनाका आक्रमण, पाण्डवोंद्वारा पुण्ड्रकी पराजय तथा बंगराज और अंगराजका वध, गजसेनाका विनाश और पलायन संजय उवाच
हस्तिभिस्तु महामात्रास्तव पुत्रेण चोदिताः ।
धृष्टद्युम्नं जिघांसन्तः क्रुद्धाः पार्षतमभ्ययुः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! आपके पुत्र दुर्योधनकी आज्ञा पाकर बहुत - से महावत धृष्टद्युम्नको मार डालनेकी इच्छासे क्रोधपूर्वक हाथियोंके साथ आकर उनपर टूट पड़े ॥
प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च प्रवरा गजयोधिनः ।
अङ्गा वङ्गाश्च पुण्ड्राश्च मागधास्ताम्रलिप्तकाः ॥ २ ॥
मेकलाः कोसला मद्रा दशार्णा निषधास्तथा ।
गजयुद्धेषु कुशलाः कलिङ्गैः सह भारत ॥ ३ ॥
शरतोमरनाराचैर्वृष्टिमन्त इवाम्बुदाः ।
सिषिचुस्ते ततः सर्वे पाञ्चालबलमाहवे ॥ ४ ॥
भारत! पूर्व और दक्षिण दिशाके श्रेष्ठ गजयोद्धा तथा अंग, बंग, पुण्ड्र, मगध, ताम्रलिप्त, मेकल, कोसल, मद्र, दशार्ण तथा निषध देशोंके समस्त गजयुद्धनिपुण वीर कलिंगोंके साथ मिलकर वर्षा करनेवाले मेघोंके समान समरांगणमें पांचाल-सेनापर बाण, तोमर और नाराचोंकी वृष्टि करने लगे ॥ २–४ ॥
तान् सम्मिमर्दिषून् नागान् पार्ण्यङ्गुष्ठाङ्कुशैर्भृशम् ।
चोदितान् पार्षतो बाणैर्नाराचैरभ्यवीवृषत् ॥ ५ ॥
वे नाग शत्रुओंकी सारी सेनाको कुचल डालनेकी इच्छा रखते थे और उन्हें पैरोंकी एड़ी, अँगूठों तथा अंकुशोंकी मारसे बारंबार आगे बढ़नेके लिये प्रेरित किया जा रहा था । यह देखकर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने उनपर नाराच नामक बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥
एकैकं दशभिः षड्भिरष्टाभिरपि भारत ।
द्विरदानभिविव्याध क्षिप्तैर्गिरिनिभान् शरैः ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! धृष्टद्युम्नने उन पर्वताकार हुए हाथियोंमेंसे प्रत्येकको अपने चलाये हुए दस- दस, छः - छः और आठ- आठ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६ ॥
प्रच्छाद्यमानं द्विरदैर्मेघैरिव दिवाकरम् ।
प्रययुः पाण्डुपञ्चाला नदन्तो निशितायुधाः ॥ ७ ॥
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उस समय मेघोंकी घटासे ढके हुए सूर्यके समान धृष्टद्युम्नको उन हाथियोंसे आच्छादित हुआ देख पाण्डव और पांचाल सैनिक तीखे आयुध लिये गर्जना करते हुए आगे बढ़े ॥ ७ ॥
तान् नागानभिवर्षन्तो ज्यातन्त्रीतलनादितैः ।
वीरनृत्यं प्रनृत्यन्तः शूरतालप्रचोदितैः ।
नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ॥ ८ ॥
सात्यकिश्च शिखण्डी च चेकितानश्च वीर्यवान् ।
समन्तात् सिषिचुर्वीरा मेघास्तोयैरिवाचलान् ॥ ९ ॥
वे प्रत्यंचारूपी वीणाके तारको झंकारते, शूरवीरोंके दिये हुए तालसे प्रेरणा लेते तथा वीरोचितनृत्य कर हुए उन हाथियोंपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे । नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, प्रभद्रकगण, सात्यकि, शिखण्डी तथा पराक्रमी चेकितान— ये सभी वीर चारों ओरसे उन हाथियोंपर उसी प्रकार बाणोंकी वृष्टि करने लगे, जैसे बादल पर्वतोंपर पानी बरसाते हैं ॥ ८ - ९ ॥
ते म्लेच्छैः प्रेषिता नागा नरानश्वान् रथानपि ।
हस्तैराक्षिप्य ममृदुः पद्भिश्चाप्यतिमन्यवः ॥ १० ॥
म्लेच्छोंद्वारा आगे बढ़ाये हुए वे अत्यन्त क्रोधी गजराज मनुष्यों, घोड़ों और रथोंको अपनी सूँड़ोंसे उठाकर फेंक देते और उन्हें पैरोंसे मसल डालते थे ॥ १० ॥
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बिभिदुश्च विषाणाग्रैः समाक्षिप्य च चिक्षिपुः ।
विषाणलग्नाश्चाप्यन्ये परिपेतुर्विभीषणाः ॥ ११ ॥
कितनोंको अपने दाँतोंके अग्रभागसे विदीर्ण कर देते और बहुतोंको सूँड़ोंसे खींचकर दूर फेंक देते थे । कितने ही योद्धा उनके दाँतोंमें गुँथकर बड़ी भयानक अवस्थामें नीचे गिरते थे ॥ ११ ॥
प्रमुखे वर्तमानं तु द्विपं वङ्गस्य सात्यकिः ।
नाराचेनोग्रवेगेन भित्त्वा मर्माण्यपातयत् ॥ १२ ॥
इसी समय सात्यकिने अपने सामने उपस्थित हुए वंगराजके हाथीके मर्मस्थानोंको भयंकर वेगवाले नाराचसे विदीर्ण करके उसे धराशायी कर दिया ॥ १२ ॥
तस्यावर्जितकायस्य द्विरदादुत्पतिष्यतः ।
नाराचेनाहनद् वक्षः सात्यकिः सोऽपतद् भुवि ॥ १३ ॥
वंगराज अपने शरीरको सिकोड़कर उस हाथीसे कूदना ही चाहता था कि सात्यकिने नाराचद्वारा उसकी छाती छेद डाली; अतः वह घायल होकर भूतलपर गिर पड़ा ॥ १३ ॥
पुण्ड्रस्यापततो नागं चलन्तमिव पर्वतम् ।
सहदेवः प्रयत्नास्तैर्नाराचैरहनत् त्रिभिः ॥ १४ ॥
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दूसरी ओर पुण्ड्रराज आक्रमण कर रहे थे । उनका हाथी चलते - फिरते पर्वतके समान जान पड़ता था। सहदेवने प्रयत्नपूर्वक चलाये हुए तीन नाराचोंद्वारा उसे घायल कर दिया ॥ १४ ॥
विपताकं वियन्तारं विवर्मध्वजजीवितम् ।
तं कृत्वा द्विरदं भूयः सहदेवोऽङ्गमभ्ययात् ॥ १५ ॥
इस प्रकार उस हाथीको पताका, महावत, कवच, ध्वज तथा प्राणोंसे हीन करके सहदेव पुनः अंगराजकी ओर बढ़े ॥ १५ ॥
सहदेवं तु नकुलो वारयित्वांगमार्दयत् ।
नाराचैर्यमदण्डाभैस्त्रिभिर्नागं शतेन तम् ॥ १६ ॥
परंतु नकुलने सहदेवको रोककर स्वयं ही अंगराजको पीड़ित किया । उन्होंने यमदण्डके समान तीन भयानक नाराचोंद्वारा उनके हाथीको और सौ नाराचोंसे अंगराजको घायल कर दिया ॥ १६ ॥
दिवाकरकरप्रख्यानङ्गश्चिक्षेप तोमरान् ।
नकुलाय शतान्यष्टौ त्रिधैकैकं तु सोऽच्छिनत् ॥ १७ ॥
अंगराजने नकुलपर सूर्यकिरणोंके समान तेजस्वी आठ सौ तोमर चलाये; परंतु नकुलने उनमेंसे प्रत्येकके तीन - तीन टुकड़े कर डाले ॥ १७ ॥
तथार्धचन्द्रेण शिरस्तस्य चिच्छेद पाण्डवः ।
स पपात हतो म्लेच्छस्तेनैव सह दन्तिना ॥ १८ ॥
तत्पश्चात् पाण्डुकुमार नकुलने एक अर्धचन्द्रके द्वारा अंगराजका सिर काट लिया । इस प्रकार मारा गया म्लेच्छजातीय अंगराज अपने हाथीके साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १८ ॥
अथाङ्गपुत्रे निहते हस्तिशिक्षाविशारदे ।
अङ्गाः क्रुद्धा महामात्रा नागैर्नकुलमभ्ययुः ॥ १ ९ ॥
गजशिक्षामें कुशल अंगराजके पुत्रके मारे जानेपर कुपित हुए अंगदेशीय महावतोंने हाथियोंद्वारा नकुलपर आक्रमण किया ॥ १ ९ ॥
चलत्पताकैः सुमुखैर्हेमकक्षातनुच्छदैः ।
मिमर्दिषन्तस्त्वरिताः प्रदीप्तैरिव पर्वतैः ॥ २० ॥
मेकलोत्कलकालिङ्गा निषधास्ताम्रलिप्तकाः ।
शरतोमरवर्षाणि विमुञ्चन्तो जिघांसवः ॥ २१ ॥
उन हाथियोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं । उनके मुख बहुत सुन्दर थे । उनको कसनेके लिये बनी हुई रस्सी और कवच सुवर्णमय थे । वे प्रज्वलित पर्वतोंके समान जान पड़ते थे । उन हाथियोंके द्वारा नकुलको कुचलवा देनेकी इच्छा रखकर मेकल, उत्कल, कलिंग, निषध
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तथा ताम्रलिप्तदेशीय योद्धा बड़ी उतावलीके साथ बाणों और तोमरोंकी वर्षा कर रहे थे । वे सब - के - सब उन्हें मार डालनेको उतारू थे ॥ २०-२१ ॥
तैश्छाद्यमानं नकुलं दिवाकरमिवाम्बुदैः ।
परिपेतुः सुसंरब्धाः पाण्डुपाञ्चालसोमकाः ॥ २२ ॥
बादलोंसे ढके हुए सूर्यके समान नकुलको उनके द्वारा आच्छादित होते देख क्रोधमें भरे हुए पाण्डव, पांचाल और सोमक योद्धा तुरंत उन म्लेच्छोंपर टूट पड़े ॥ २२ ॥
ततस्तदभवद् युद्धं रथिनां हस्तिभिः सह ।
सृजतां शरवर्षाणि तोमरांश्च सहस्रशः ॥ २३ ॥
तब उन रथियोंका हाथियोंके साथ युद्ध छिड़ गया । वे रथी वीर उनके ऊपर सहस्रों तोमरों और बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ २३ ॥
नागानां प्रास्फुटन् कुम्भा मर्माणि विविधानि च ।
दन्ताश्चैवातिविद्धानां नाराचैर्भूषणानि च ॥ २४ ॥
नाराचोंसे अत्यन्त घायल हुए उन हाथियोंके कुम्भस्थल फूट गये, विभिन्न मर्मस्थान विदीर्ण हो गये तथा उनके दाँत और आभूषण कट गये ॥ २४ ॥
तेषामष्टौ महानागांश्चतुःषष्ट्या सुतेजनैः ।
सहदेवो जघानाशु तेऽपतन् सह सादिभिः ॥ २५ ॥
सहदेवने उनमेंसे आठ महागजोंको चौंसठ पैने बाणोंसे शीघ्र मार डाला । वे सब--के--सब सवारोंके साथ धराशायी हो गये ॥ २५ ॥
अञ्जोगतिभिरायम्य प्रयत्नाद् धनुरुत्तमम् ।
नाराचैरहनन्नागान् नकुलः कुलनन्दनः ॥ २६ ॥
अपने कुलको आनन्दित करनेवाले नकुलने भी प्रयत्नपूर्वक उत्तम धनुषको खींचकर अनायास ही दूरतक जानेवाले नाराचोंद्वारा बहुत- से हाथियोंका वध कर डाला ॥
ततः पाञ्चालशैनेयौ द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ।
शिखण्डी च महानागान् सिषिचुः शरवृष्टिभिः ॥ २७ ॥
तदनन्तर धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके पुत्र, प्रभद्रकगण तथा शिखण्डीने भी उन महान् गजराजोंपर अपने बाणोंकी वर्षा की ॥ २७ ॥
ते पाण्डुयोधाम्बुधरैः शत्रुद्विरदपर्वताः ।
बाणवर्षैर्हताः पेतुर्वज्रवर्षैरिवाचलाः ॥ २८ ॥
जैसे वज्रोंकी वर्षासे पर्वत ढह जाते हैं, उसी प्रकार पाण्डवव-२- सैनिकरूपी बादलोंद्वारा की हुई बाणोंकी वृष्टिसे आहत हो शत्रुओंके हाथीरूपी पर्वत धराशायी हो गये ॥
एवं हत्वा तव गजांस्ते पाण्डुरथकुञ्जराः ।
द्रुतां सेनामवैक्षन्त भिन्नकूलामिवापगाम् ॥ २ ९ ॥
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इस प्रकार उन श्रेष्ठ पाण्डव महारथियोंने आपके हाथियोंका संहार करके देखा कि आपकी सेना किनारा तोड़कर बहनेवाली नदीके समान सब ओर भाग रही है ।
तां ते सेनां समालोड्य पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ।
विक्षोभयित्वा च पुनः कर्णं समभिदुद्रुवुः ॥ ३० ॥
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके उन सैनिकोंने आपकी उस सेनाको मथकर उसमें हलचल पैदा करके पुनः कर्णपर धावा किया ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बाईसवाँअध्याय पूराहुआ ॥ २२ ॥
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