04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1781–1790
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1781–1790
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इसके बाद कुन्तीपुत्रोंकी सेनाके सभी प्रमुख वीर कर्णको पीड़ा देने लगे । युधामन्यु, शिखण्डी, द्रौपदीके पाँचों पुत्र प्रभद्रकगण, उत्तमौजा, युयुत्सु, नकुल- सहदेव, धृष्टद्युम्न, चेदि, कारूष, मत्स्य और केकय देशोंकी सेनाएँ, बलवान् चेकितान तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर – ये भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले रथी, घुड़सवार, हाथीसवार और पैदल सैनिकोंद्वारा रणभूमिमें कर्णको चारों ओरसे घेरकर उसके ऊपर नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे । सभी भयंकर वचन बोलते हुए वहाँ कर्णके वधका निश्चय कर चुके थे ॥ २६–२९ ॥
तां शस्त्रवृष्टिं बहुधा कर्णश्छित्त्वा शितैः शरैः ।
अपोवाहास्त्रवीर्येण द्रुमं भङ्क्त्वेव मारुतः ॥ ३० ॥
जैसे प्रचण्ड वायु वृक्षको तोड़कर गिरा देती है, उसी प्रकार कर्ण अपने तीखे बाणोंसे शत्रुओंकी उस शस्त्रवर्षाको बहुधा छिन्न-भिन्न करके अपने अस्त्रबलसे दूर हटा दिया ॥ ३० ॥
रथिनः समहामात्रान् गजानश्वान् ससादिनः ।
पत्तिव्रातांश्च संक्रुद्धो निघ्नन् कर्णो व्यदृश्यत ॥ ३१ ॥
क्रोधमें भरा हुआ कर्ण रथियों, महावतोंसहित हाथियों, सवारोंसहित घोड़ों तथा पैदलसमूहोंका वध करता देखा जा रहा था ॥ ३१ ॥
तद् वध्यमानं पाण्डूनां बलं कर्णास्त्रतेजसा ।
विशस्त्रपत्रदेहासु प्राय आसीत् पराङ्मुखम् ॥ ३२ ॥
कर्णके अस्त्रोंके तेजसे मारी जाती हुई पाण्डवोंकी सेना शस्त्र, वाहन, शरीर और प्राणोंसे रहित हो प्रायः रणभूमिसे विमुख होकर भाग चली ॥ ३२ ॥
अथ कर्णास्त्रमस्त्रेण प्रतिहत्यार्जुनः स्मयन् ।
दिशं खं चैव भूमिं च प्रावृणोच्छरवृष्टिभिः ॥ ३३ ॥
तब अर्जुनने मुसकराते हुए अपने अस्त्रसे कर्णके अस्त्रको नष्ट करके बाणोंकी वर्षाद्वारा आकाश, दिशा और पृथ्वीको आच्छादित कर दिया ॥ ३३ ॥
मुसलानीव सम्पेतुः परिघा इव चेषवः ।
शतघ्न्य इव चाप्यन्ये वज्राण्युग्राणि चापरे ॥ ३४ ॥
उनके कुछ बाण मूसलोंके समान गिरते थे, कुछ परिघोंके समान, कुछ शतघ्नियोंके तुल्य तथा कुछ दूसरे बाण भयंकर वज्रोंके समान शत्रुओंपर पड़ते थे ॥ ३४ ॥
तैर्वध्यमानं तत् सैन्यं सपत्त्यश्वरथद्विपम् ।
निमीलिताक्षमत्यर्थं बभ्राम च ननाद च ॥ ३५ ॥
उन बाणोंसे हताहत होती हुई पैदल, घोड़े, रथ और हाथियोंसे युता कौरव -सेना आँख मूँदकर जोर- जोरसे चिल्लाने और चक्कर काटने लगी ॥ ३५ ॥
निष्कैवल्यं तदा युद्धं प्रापुरश्वनरद्विपाः ।
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हन्यमानाः शरैरार्तास्तदा भीताः प्रदुद्रुवुः ॥ ३६ ॥
उस समय घोड़े, हाथी और मनुष्योंको ऐसा युद्ध प्राप्त हुआ, जिसमें मृत्यु निश्चित है । उन सब लोगोंपर जब बाणोंकी मार पड़ने लगी, तब वे सबब-- के - सब आर्त और भयभीत होकर भाग चले ॥ ३६ ॥
त्वदीयानां तदा युद्धे संसक्तानां जयैषिणाम् ।
गिरिमस्तं समासाद्य प्रत्यपद्यत भानुमान् ॥ ३७ ॥
इस प्रकार जब आपके विजयाभिलाषी सैनिक युद्धमें संलग्न हो रहे थे, उसी समय सूर्यदेव अस्ताचल पहुँचकर डूब गये ॥ ३७ ॥
तमसा च महाराज रजसा च विशेषतः ।
न किंचित् प्रत्यपश्याम शुभं वा यदि वाशुभम् ॥ ३८ ॥
महाराज! उस समय अन्धकार और विशेषतः धूलसे सब कुछ आच्छादित होनेके कारण हमलोग किसी भी शुभ या अशुभ वस्तुको देख नहीं पाते थे ॥
ते त्रसन्तो महेष्वासा रात्रियुद्धस्य भारत ।
अपयानं ततश्चक्रुः सहिताः सर्वयोधिभिः ॥ ३ ९ ॥
भारत! वे महाधनुर्धर योद्धा रात्रियुद्धसे डरते थे । इसलिये समस्त सैनिकोंके साथ उन्होंने वहाँसे शिविरको प्रस्थान कर दिया ॥ ३ ९ ॥
कौरवेष्वपयातेषु तदा राजन् दिनक्षये ।
जयं सुमनसः प्राप्य पार्थाः स्वशिबिरं ययुः ॥ ४० ॥
वादित्रशब्दैर्विविधैः सिंहनादैः सगर्जितैः ।
परानुपहसन्तश्च स्तुवन्तश्चाच्युतार्जुनौ ॥ ४१ ॥
राजन्! दिनके अन्तमें कौरवोंके हट जानेपर पाण्डव भी विजय पाकर प्रसन्नचित्त हो भाँति - भाँतिके बाजोंकी आवाज, सिंहनाद और गर्जनाके द्वारा शत्रुओंका उपहास और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनकी स्तुति करते हुए अपने शिविरको लौट गये ॥ ४०-४१ ॥ कृतेऽवहारे तैर्वीरैः सैनिकाः सर्व एव ते I आशीर्वाचः पाण्डवेषु प्रायुञ्जन्त नरेश्वराः ॥ ४२ ॥
उन वीरोंके द्वारा युद्धका उपसंहार कर दिये जानेपर समस्त सैनिक और नरेश पाण्डवोंको आशीर्वाद देने लगे ॥ ४२ ॥
ततः कृतेऽवहारे च प्रहृष्टास्तत्र पाण्डवाः ।
निशायां शिबिरं गत्वा न्यवसन्त नरेश्वराः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार सैनिकोंके लौटा लिये जानेपर हर्षमें भरे हुए पाण्डव- पक्षीय नरेश रातको शिविरमें जाकर सो रहे ॥ ४३ ॥
ततो रक्षः पिशाचाश्च श्वापदाश्चैव संघशः ।
जग्मुरायोधनं घोरं रुद्रस्याक्रीडसंनिभम् ॥ ४४ ॥
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तदनन्तर रुद्रके क्रीडास्थल ( श्मशान) -सदृश उस भयंकर युद्धभूमिमें राक्षस, पिशाच र झुंड- के - झुंड हिंसक जीव - जन्तु जा पहुँचे ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि प्रथमे युद्धदिवसे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें प्रथम दिनका युद्धविषयक तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
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एकत्रिंशोऽध्यायः रात्रिमें कौरवोंकी मन्त्रणा, धृतराष्ट्रके द्वारा दैवकी प्रबलताका प्रतिपादन, संजयद्वारा धृतराष्ट्रपर दोषारोप तथा कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत धृतराष्ट्रउवाच
स्वेनच्छन्देन नः सर्वानवधीद् व्यक्तमर्जुनः ।
न ह्यस्य समरे मुच्येदन्तकोऽप्याततायिनः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – संजय! निश्चय ही अर्जुनने अपनी इच्छासे हमारे सब सैनिकोंका वध किया । समरांगणमें यदि वे शस्त्र उठा लें तो यमराज भी उनके हाथसे जीवित नहीं छूट सकता ॥ १ ॥
पार्थश्चैको s हरद् भद्रामेकश्चाग्निमतर्पयत् ।
एकश्चेमां महीं जित्वा चक्रे बलिभूतो नृपान् ॥ २ ॥
अर्जुनने अकेले ही सुभद्राका अपहरण किया, अकेले ही खाण्डव वनमें अग्निदेवको तृप्त किया और अकेले ही इस पृथ्वीको जीतकर सम्पूर्ण नरेशोंको कर देनेवाला बना दिया ॥ २ ॥
एको निवातकवचानहनद् दिव्यकार्मुकः ।
एकः किरातरूपेण स्थितं शर्वमयोधयत् ॥ ३ ॥
उन्होंने दिव्य धनुष धारण करके अकेले ही निवातकवचोंका संहार कर डाला और किरातरूप धारण करके खड़े हुए महादेवजीके साथ भी अकेले ही युद्ध किया ॥ ३ ॥
एको ह्यरक्षद् भरतानेको भवमतोषयत् ।
तेनैकेन जिताः सर्वे महीपा ह्युग्रतेजसा ॥ ४ ॥
अर्जुनने अकेले ही घोषयात्राके समय दुर्योधन आदि भरतवंशियोंकी रक्षा की, अकेले ही अपने पराक्रमसे महादेवजीको संतुष्ट किया और उन उग्रतेजस्वी वीरने अकेले ही ( विराटनगरमें ) कौरव - दलके समस्त भूमिपालोंको पराजित किया था ॥ ४ ॥
न ते निन्द्याः प्रशस्यास्ते यत्ते चक्रुर्ब्रवीहि तत् ।
ततो दुर्योधनः सूत पश्चात् किमकरोत् तदा ॥ ५ ॥
इसलिये वे हमारे पक्षके सैनिक या नरेश निन्दनीय नहीं हैं, प्रशंसाके ही पात्र हैं । उन्होंने जो कुछ किया हो, बताओ । सूत! सेनाके शिविरमें लौट आनेके पश्चात् उस समय दुर्योधनने क्या किया? ॥ ५ ॥
संजय उवाच
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हतप्रहतविध्वस्ता विवर्मायुधवाहनाः ।
दीनस्वरा दूयमाना मानिनः शत्रुनिर्जिताः ॥ ६ ॥
संजय बोले — राजन्! कौरव- सैनिक बाणोंसे घायल, छिन्न- भिन्न अवयवोंसे युक्त और अपने वाहनोंसे भ्रष्ट हो गये थे । उनके कवच, आयुध और वाहन नष्ट हो गये थे । उनके स्वरोंमें दीनता थी । शत्रुओंसे पराजित होनेके कारण वे स्वाभिमानी कौरव मन- ही- मन बहुत दुःख पा रहे थे ॥
शिबिरस्थाः पुनर्मन्त्रं मन्त्रयन्ति स्म कौरवाः ।
भग्नदंष्ट्रा हतविषाः पादाक्रान्ता इवोरगाः ॥ ७ ॥
शिविरमें आनेपर वे कौरव पुनः गुप्त मन्त्रणा करने लगे । उस समय उनकी दशा पैरसे कुचले गये उन सर्पोंके समान हो रही थी, जिनके दाँत तोड़ दिये और विष नष्ट कर दिये गये हों ॥ ७ ॥
तानब्रवीत् ततः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ।
करं करेण निष्पीड्य प्रेक्षमाणस्तवात्मजम् ॥ ८ ॥
उस समय क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए सर्पके समान कर्णने हाथ से -हाथ दबाकर आपके पुत्रकी ओर देखते हुए उन कौरव वीरोंसे इस प्रकार कहा- ॥ ८ ॥
यत्तो दृढश्च दक्षश्च धृतिमानर्जुनस्तदा ।
सम्बोधयति चाप्येनं यथाकालमधोक्षजः ॥ ९ ॥
‘ अर्जुन सावधान, दृढ़, चतुर और धैर्यवान् हैं । साथ ही उन्हें समय- समयपर श्रीकृष्ण भी कर्तव्यका ज्ञान कराते रहते हैं ॥ ९ ॥
सहसास्त्रविसर्गेण वयं तेनाद्य वञ्चिताः ।
श्वस्त्वहं तस्य संकल्पं सर्वं हन्ता महीपते ॥ १० ॥
‘ इसीलिये उन्होंने सहसा अस्त्रोंका प्रयोग करके आज हमें ठग लिया है; परंतु भूपाल! कल मैं उनके सारे मनसूबेको नष्ट कर दूँगा' ॥ १० ॥
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सोऽनुजज्ञे नृपोत्तमान् ।
तेऽनुज्ञाता नृपाः सर्वे स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥ ११ ॥
कर्णके ऐसा कहनेपर दुर्योधनने ' तथास्तु ' कहकर समस्त श्रेष्ठ राजाओंको विश्रामके लिये जानेकी आज्ञा दी । आज्ञा पाकर वे सब नरेश अपने - अपने शिविरोंमें चले गये ॥ ११ ॥
सुखोषितास्तां रजनीं हृष्टा युद्धाय निर्ययुः ।
तेऽपश्यन् विहितं व्यूहं धर्मराजेन दुर्जयम् ॥ १२ ॥
प्रयत्नात् कुरुमुख्येन बृहस्पत्युशनोमते ।
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वहाँ रातभर सुखसे रहे । फिर प्रसन्नतापूर्वक युद्धके लिये निकले । निकलकर उन्होंने देखा कि कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष धर्मराज युधिष्ठिरने बृहस्पति और शुक्राचार्यके मतके अनुसार प्रयत्नपूर्वक अपनी सेनाका दुर्जय व्यूह बना रखा है ॥ १२३ ॥
अथ प्रतीपकर्तारं प्रवीरं परवीरहा ॥ १३ ॥
सस्मार वृषभस्कन्धं कर्णं दुर्योधनस्तदा । तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुर्योधनने शत्रुओंके विरुद्ध व्यूह- रचनामें समर्थ और वृषभके समान पुष्ट कंधोंवाले प्रमुख वीर कर्णका स्मरण किया ॥ १३३ ॥
पुरंदरसमं युद्धे मरुद्गणसमं बले ॥ १४ ॥
कार्तवीर्यसमं वीर्ये कर्णं राज्ञोऽगमन्मनः । कर्ण युद्धमें इन्द्रके समान पराक्रमी, मरुद्गणोंके समान बलवान् तथा कार्तवीर्य
अर्जुनके समान शक्तिशाली था । राजा दुर्योधनका मन उसीकी ओर गया ॥ १४३ ॥
सर्वेषां चैव सैन्यानां कर्णमेवागमन्मनः ।
सूतपुत्रं महेष्वासं बन्धुमात्ययिकेष्विव ॥ १५ ॥
जैसे प्राण- संकटकालमें लोग अपने बन्धुजनोंका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार समस्त सेनाओंमेंसे केवल महाधनुर्धर सूतपुत्र कर्णकी ओर ही उसका मन गया ॥ धृतराष्ट्रउवाच
ततो दुर्योधनः सूत पश्चात् किमकरोत्तदा ।
यद्वोऽगमन्मनो मन्दाः कर्णं वैकर्तनं प्रति ॥ १६ ॥
अप्यपश्यत राधेयं शीतार्ता इव भास्करम् । धृतराष्ट्रने पूछा- सूत! तत्पश्चात् दुर्योधनने क्या किया। मूर्खो! तुमलोगोंका मन जो वैकर्तन कर्णकी ओर गया था, उसका क्या कारण है । जैसे शीतसे पीड़ित हुए प्राणी सूर्यकी ओर देखते हैं, क्या उसी प्रकार तुमलोग भी राधापुत्र कर्णकी ओर देखते थे? ॥ १६३ ॥
कृतेऽवहारे सैन्यानां प्रवृत्ते च रणे पुनः ॥ १७ ॥
कथं वैकर्तनः कर्णस्तत्रायुध्यत संजय ।
कथं च पाण्डवाः सर्वे युयुधुस्तत्र सूतजम् ॥ १८ ॥
संजय! सेनाको शिविरकी ओर लौटानेके बाद जब रात बीती और प्रातःकाल पुनः संग्राम आरम्भ हुआ, उस समय वैकर्तन कर्णने वहाँ किस प्रकार युद्ध किया तथा समस्त पाण्डवोंने सूतपुत्र कर्णके साथ किस प्रकार युद्ध आरम्भ किया? ॥ १७-१८ ॥
कर्णो ह्येको महाबाहुर्हन्यात् पार्थान् ससृजयान् ।
कर्णस्य भुजयोर्वीर्यं शक्रविष्णुसमं युधि ॥ १ ९ ॥
तस्य शस्त्राणि घोराणि विक्रमश्च महात्मनः ।
कर्णमाश्रित्य संग्रामे मत्तो दुर्योधनो नृपः ॥ २० ॥
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' अकेला महाबाहु कर्ण सृजयोंसहित समस्त कुन्तीपुत्रोंको मार सकता है। युद्धमें कर्णका बाहुबल इन्द्र और विष्णुके समान है । उसके अस्त्र- शस्त्र भयंकर हैं तथा उस महामनस्वी वीरका पराक्रम भी अद्भुत है । ' यह सब सोचकर राजा दुर्योधन संग्राममें कर्णका सहारा ले मतवाला हो उठा था ॥ १ ९ -२० ॥
दुर्योधनं ततो दृष्ट्वा पाण्डवेन भृशार्दितम् ।
पराक्रान्तान् पाण्डुसुतान् दृष्ट्वा चापि महारथः ॥ २१ ॥
किंतु उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरद्वारा दुर्योधनको अत्यन्त पीड़ित होते और पाण्डुपुत्रोंको पराक्रम प्रकट करते देखकर भी महारथी कर्णने क्या किया? ॥ २१ ॥
कर्णमाश्रित्य संग्रामे मन्दो दुर्योधनः पुनः ।
जेतुमुत्सहते पार्थान् सपुत्रान् सहकेशवान् ॥ २२ ॥
मूर्ख दुर्योधन संग्राममें कर्णका आश्रय लेकर पुनः पुत्रोसहित कुलीकुमारों और श्रीकृष्णको जीतनेके लिये उत्साहित हुआ था ॥ २२ ॥
अहो बत महद् दुःखं यत्र पाण्डुसुतान् रणे ।
नातरद् रभसः कर्णो दैवं नूनं परायणम् ॥ २३ ॥
अहो! यह महान् दुःखकी बात है कि वेगशाली वीर कर्ण भी रणभूमिमें पाण्डवोंसे पार न पा सका । अवश्य दैव ही सबका परम आश्रय है ॥ २३ ॥
अहो द्यूतस्य निष्ठेयं घोरा सम्प्रति वर्तते ।
अहो तीव्राणि दुःखानि दुर्योधनकृतान्यहम् ॥ २४ ॥
सोढा घोराणि बहुशः शल्यभूतानि संजय । अहो! द्यूतक्रीडाका यह घोर परिणाम इस समय प्रकट हुआ है । संजय! आश्चर्य है कि मैंने दुर्योधनके कारण बहुत- से तीव्र एवं भयंकर दुःख, जो काँटोंके समान कसक रहे हैं, सहन किये हैं ॥ २४ ॥
सौबलं च तदा तात नीतिमानिति मन्यते ॥ २५ ॥
कर्णश्च रभसो नित्यं राजा तं चाप्यनुव्रतः । तात! दुर्योधन उन दिनों शकुनिको बड़ा नीतिज्ञ मानता था तथा वेगशाली वीर कर्ण भी नीतिज्ञ है, ऐसा समझकर राजा दुर्योधन उसका भी भक्त बना रहा ॥ २५३ ॥
यदेवं वर्तमानेषु महायुद्धेषु संजय ॥ २६ ॥
अश्रौषं निहतान् पुत्रान् नित्यमेव विनिर्जितान् ।
न पाण्डवानां समरे कश्चिदस्ति निवारकः ॥ २७ ॥
स्त्रीमध्यमिव गाहन्ते दैवं तु बलवत्तरम् ।
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संजय! इस प्रकार वर्तमान महान् युद्धोंमें जो मैं प्रतिदिन ही अपने कुछ पुत्रोंको मारा गया और कुछको पराजित हुआ सुनता आ रहा हूँ, इससे मुझे यह विश्वास हो गया है कि समरांगणमें कोई भी ऐसा वीर नहीं है जो पाण्डवोंको रोक सके । जैसे लोग स्त्रियोंके बीचमें निर्भय प्रवेश कर जाते हैं, उसी प्रकार पाण्डव मेरी सेनामें बेखटके घुस जाते हैं । अवश्य इस विषयमें दैव ही अत्यन्त प्रबल है ॥ २६-२७ ॥ संजय उवाच राजन् पूर्वनिमित्तानि धर्मिष्ठानि विचिन्तय ॥ २८ ॥
अतिकान्तं हि यत् कार्यं पश्चाच्चिन्तयते नरः ।
तच्चास्य न भवेत् कार्यं चिन्तया च विनश्यति ॥ २ ९ ॥
संजयने कहा — राजन्! पूर्वकालमें आपने जो द्यूतक्रीडा आदि धर्मसंगत कारण उपस्थित किये थे, उन्हें याद तो कीजिये । जो मनुष्य बीती हुई बातके लिये पीछे चिन्ता करता है, उसका वह कार्य तो सिद्ध होता नहीं, केवल चिन्ता करनेसे वह स्वयं नष्ट हो जाता है ॥ २८-२९ ॥
तदिदं तव कार्यं तु दूरप्राप्तं विजानता ।
न कृतं यत् त्वया पूर्वं प्राप्ताप्राप्तविचारणम् ॥ ३० ॥
पाण्डवोंके राज्यके अपहरणरूपी इस कार्यमें सफलता मिलनी आपके लिये दूरकी बात थी । यह जानते हुए भी आपने पहले इस बातका विचार नहीं किया कि यह उचित है या अनुचित ॥ ३० ॥
उक्तोऽसि बहुधा राजन् मा युध्यस्वेति पापडवैः ।
गृह्णीषे न च तन्मोहाद् वचनं च विशाम्पते ॥ ३१ ॥
राजन्! पाण्डवोंने तो आपसे बारंबार कहा था कि ' आप युद्ध न छेड़िये । ' किन्तु प्रजानाथ! आपने मोहवश उनकी बात नहीं मानी ॥ ३१ ॥
त्वया पापानि घोराणि समाचीर्णानि पाण्डुषु ।
त्वत्कृते वर्तते घोरः पार्थिवानां जनक्षयः ॥ ३२ ॥
आपने पाण्डवोंपर भयंकर अत्याचार किये हैं । आपके ही कारण राजाओंद्वारा यह घोर नरसंहार हो रहा है ॥ ३२ ॥
तत्त्विदानीमतिक्रान्तं मा शुचो भरतर्षभ ।
शृणु सर्वं यथावृत्तं घोरं वैशसमुच्यते ॥ ३३ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह बात तो अब बीत गयी । उसके लिये शोक न करें । युद्धका सारा वृत्तान्त
यथावत् रूपसे सुनें । मैं उस भयंकर विनाशका वर्णन करता हूँ ॥ ३३ ॥
प्रभातायां रजन्यां तु कर्णो राजानमभ्ययात् ।
समेत्य च महाबाहुर्दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥ ३४ ॥
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जब रात बीती और प्रातः काल हो गया, तब महाबाहु कर्ण राजा दुर्योधनके पास आया और उससे मिलकर इस प्रकार बोला ॥ ३४ ॥
कर्णउवाच
अद्य राजन् समेष्यामि पाण्डवेन यशस्विना ।
निहनिष्यामि तं वीरं स वा मां निहनिष्यति ॥ ३५ ॥
कर्णने कहा — राजन्! आज मैं यशस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ संग्राम करूँगा । या तो मैं ही उस वीरको मार डालूँगा या वही मेरा वध कर डालेगा ॥ ३५ ॥
बहुत्वान्मम कार्याणां तथा पार्थस्य भारत ।
नाभूत् समागमो राजन् मम चैवार्जुनस्य च ॥ ३६ ॥
भरतवंशी नरेश! मेरे तथा अर्जुनके सामने बहुत - से कार्य आते गये; इसीलिये अबतक मेरा और उनका द्वैरथ युद्ध न हो सका ॥ ३६ ॥
इदं तु मे यथाप्राज्ञं शृणु वाक्यं विशाम्पते ।
अनिहत्य रणे पार्थं नाहमेष्यामि भारत ॥ ३७ ॥
प्रजानाथ! भरतनन्दन! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार निश्चय करके यह जो बात कह रहा हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो । आज मैं रणभूमिमें अर्जुनका वध किये बिना नहीं लौहूँगा ॥ ३७ ॥
हतप्रवीरे सैन्येऽस्मिन् मयि चावस्थिते युधि ।
अभियास्यति मां पार्थः शक्रशक्तिविनाकृतम् ॥ ३८ ॥
हमारी इस सेनाके प्रमुख वीर मारे गये हैं । अतः मैं युद्धमें जब इस सेनाके भीतर खड़ा होऊँगा, उस समय अर्जुन मुझे इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे वंचित जानकर अवश्य मुझपर आक्रमण करेंगे ॥ ३८ ॥
ततः श्रेयस्करं यच्च तन्निबोध जनेश्वर ।
आयुधानां च मे वीर्यं दिव्यानामर्जुनस्य च ॥ ३ ९ ॥
जनेश्वर! अब जो यहाँ हितकर बात है, उसे सुनिये । मेरे तथा अर्जुनके पास भी दिव्यास्त्रोंका समान बल है ॥ ३ ९ ॥
कायस्य महतो भेदे लाघवे दूरपातने ।
सौष्ठवे चास्त्रपाते च सव्यसाची न मत्समः ॥ ४० ॥
हाथी आदिके विशाल शरीरका भेदन करने, शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाने, दूरका लक्ष्य वेधने, सुन्दर रीतिसे युद्ध करने तथा दिव्यास्त्रोंके प्रयोगमें भी सव्यसाची अर्जुन मेरे समान नहीं हैं ॥ ४० ॥
प्राणे शौर्येऽथ विज्ञाने विक्रमे चापि भारत ।
निमित्तज्ञानयोगे च सव्यसाची न मत्समः ॥ ४१ ॥
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भारत! शारीरिक बल, शौर्य, अस्त्रविज्ञान, पराक्रम तथा शत्रुओंपर विजय पानेके उपायको ढूँढ़ निकालनेमें भी सव्यसाची अर्जुन मेरी समानता नहीं कर सकते ॥ ४१ ॥
सर्वायुधमहामात्रं विजयं नाम तद्धनुः ।
इन्द्रार्थं प्रियकामेन निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ ४२ ॥
मेरे धनुषका नाम विजय है । यह समस्त आयुधोंमें श्रेष्ठ है । इसे इन्द्रका प्रिय चाहनेवाले विश्वकर्माने उन्हींके लिये बनाया था ॥ ४२ ॥
येन दैत्यगणान् राजञ्जितवान् वै शतक्रतुः ।
यस्य घोषेण दैत्यानां व्यामुह्यन्त दिशो दश ॥ ४३ ॥
तद् भार्गवाय प्रायच्छच्छक्रः परमसम्मतम् ।
तद् दिव्यं भार्गवो मह्यमददाद् धनुरुत्तमम् ॥ ४४ ॥
राजन्! इन्द्रने जिसके द्वारा दैत्योंको जीता था, जिसकी टंकारसे दैत्योंको दसों दिशाओंके पहचाननेमें भ्रम हो जाता था, उसी अपने परम प्रिय दिव्य धनुषको इन्द्रने परशुरामजीको दिया था और परशुरामजीने वह दिव्य उत्तम धनुष मुझे दे दिया है ॥ ४३-४४ ॥
तेन योत्स्ये महाबाहुमर्जुनं जयतां वरम् ।
यथेन्द्रः समरे सर्वान् दैतेयान् वै समागतान् ॥ ४५ ॥
उसी धनुषके द्वारा मैं विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ महाबाहु अर्जुनके साथ युद्ध करूँगा । ठीक वैसे ही जैसे समरांगणमें आये हुए समस्त दैत्योंके साथ इन्द्रने युद्ध किया था ॥ ४५ ॥
धनुर्घोरं रामदत्तं गाण्डीवात् तद् विशिष्यते ।
त्रिस्सप्तकृत्वः पृथिवी धनुषा येन निर्जिता ॥ ४६ ॥
परशुरामजीका दिया हुआ वह घोर धनुष गाण्डीवसे श्रेष्ठ है । यह वही धनुष है, जिसके द्वारा परशुरामजीने पृथ्वीपर इक्कीस बार विजय पायी थी ॥ ४६ ॥
धनुषो ह्यस्य कर्माणि दिव्यानि प्राह भार्गवः ।
तद् रामो ह्यददान्मह्यं तेन योत्स्यामि पाण्डवम् ॥ ४७ ॥
स्वयं भृगुनन्दन परशुरामने ही मुझे उस धनुषके दिव्य कर्म बताये हैं और उसे उन्होंने मुझे अर्पित कर दिया है; उसी धनुषके द्वारा मैं पाण्डुकुमार अर्जुनके साथ युद्ध करूँगा ॥ ४७ ॥
अद्य दुर्योधनाहं त्वां नन्दयिष्ये सबान्धवम् ।
निहत्य समरे वीरमर्जुनं जयतां वरम् ॥ ४८ ॥
दुर्योधन! आज मैं समरभूमिमें विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ वीर अर्जुनका वध करके बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हें आनन्दित करूँगा ॥ ४८ ॥
सपर्वतवनद्वीपा हतवीरा ससागरा ।
पुत्रपौत्रप्रतिष्ठा ते भविष्यत्यद्य पार्थिव ॥ ४ ९ ॥