श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1771–1780
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1771–1780
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एकोनत्रिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरके द्वारा दुर्योधनकी पराजय धृतराष्ट्रउवाच
अतितीव्राणि दुःखानि दुःसहानि बहूनि च ।
त्वत्तोऽहं संजयाश्रौषं पुत्राणां चैव संक्षयम् ॥ १ ॥
यथा त्वं मे कथयसे तथा युद्धमवर्तत ।
न सन्ति सूत कौरव्या इति मे निश्चिता मतिः ॥ २ ॥
धृतराष्ट्र बोले- संजय! तुमसे मैंने अबतक अत्यन्त तीव्र और दुःसह दुःख देनेवाली बहुत - सी घटनाएँ सुनी हैं । अपने पुत्रोंके विनाशकी बात भी सुन ली । सूत! जैसा तुम मुझसे कह रहे हो और जिस प्रकार वह युद्ध सम्पन्न हुआ, उसे देखते हुए मेरा यह दृढ़ निश्चय हो रहा है कि अब कुरुवंशी जीवित नहीं रहे ॥ १-२ ॥
दुर्योधनश्च विरथः कृतस्तत्र महारथः ।
धर्मपुत्रः कथं चक्रे तस्य वा नृपतिः कथम् ॥ ३ ॥
सुनता हूँ महारथी दुर्योधन भी वहाँ रथहीन कर दिया गया । धर्मपुत्र युधिष्ठिरने उसके साथ किस प्रकार युद्ध किया अथवा राजा दुर्योधनने युधिष्ठिरके प्रति कैसा बर्ताव किया? ॥ ३ ॥
अपराह्णे कथं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन कुशलो ह्यसि संजय ॥ ४ ॥
संजय! अपराह्णकालमें किस प्रकार वह रोमांचकारी युद्ध हुआ था? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ; क्योंकि तुम उसका वर्णन करनेमें कुशल हो ॥ ४ ॥
संजय उवाच
संसक्तेषु तु सैन्येषु वध्यमानेषु भागशः ।
रथमन्यं समास्थाय पुत्रस्तव विशाम्पते ॥ ५ ॥
क्रोधेन महता युक्तः सविषो भुजगो यथा । संजयने कहा — प्रजानाथ! जब सारी सेनाएँ विभिन्न भागोंमें बँटकर जूझने और मरने लगीं, तब आपका पुत्र दुर्योधन दूसरे रथपर बैठकर विषधर सर्पके समान अत्यन्त कुपित हो
उठा (॥सर्वसैन्यमुदीक्ष्यैव५३ ॥ क्रोधादुद्वृत्तलोचनः ।
दृष्ट्वा धर्मसुतं चापि सैन्यमध्ये व्यवस्थितम् ॥
श्रिया ज्वलन्तं कौन्तेयं यथा वज्रधरं युधि । )
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दुर्योधनः समालक्ष्य धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ ६ ॥
प्रोवाच सूतं त्वरितो याहि याहीति भारत ।
तत्र मां प्रापय क्षिप्रं सारथे यत्र पाण्डवः ॥ ७ ॥
ध्रियमाणातपत्रेण राजा राजति दंशितः । सारी सेनाओंपर दृष्टिपात करके क्रोधसे उसकी आँखें घूमने लगीं । उस समय युद्धस्थलमें धर्मपुत्र कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर वज्रधारी इन्द्रके समान अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित होते हुए सेनाके बीचमें खड़े थे । भारत! उन धर्मराज युधिष्ठिरको देखकर दुर्योधनने तुरंत अपने सारथिसे कहा - ' सारथे! चलो, चलो, जहाँ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर कवच बाँधकर छत्र धारण किये सुशोभित हो रहे हैं, वहाँ मुझे शीघ्र पहुँचा दो ' ॥ ६-७ ॥ स सूतश्चोदितो राज्ञा राज्ञः स्यन्दनमुत्तमम् ॥ ८ ॥
युधिष्ठिरस्याभिमुखं प्रेषयामास संयुगे । राजा दुर्योधनसे इस प्रकार प्रेरित होकर सारथिने उस उत्तम रथको राजा युधिष्ठिरके सामने बढ़ाया ॥ ८३ ॥
ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ॥ ९ ॥
सारथिं चोदयामास याहि यत्र सुयोधनः । तब मदस्रावी हाथीके समान कुपित हुए राजा युधिष्ठिरने भी अपने सारथिको आज्ञा दी, ‘ जहाँ दुर्योधन है, वहीं चलो ' ॥ ९ ३ ॥ तौ समाजग्मतुर्वीरौ भ्रातरौ रथसत्तमौ ॥ १० ॥
समेत्य च महावीरौ संरब्धौ युद्धदुर्मदी ।
ववर्षतुर्महेष्वासौ शरैरन्योन्यमाहवे ॥ ११ ॥
इस प्रकार वे महाधनुर्धर, महावीर और महारथी दोनों रणदुर्मद बन्धु एक- दूसरेके सामने आ गये और क्रोधपूर्वक आपसमें भिड़कर युद्धस्थलमें परस्पर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १०-११ ॥
ततो दुर्योधनो राजा धर्मशीलस्य मारिष ।
शिलाशितेन भल्लेन धनुश्चिच्छेद संयुगे ॥ १२ ॥
मान्यवर! तदनन्तर युद्धस्थलमें राजा दुर्योधनने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए भल्लसे धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरका धनुष काट दिया ॥ १२ ॥
तं नामृष्यत संक्रुद्धो ह्यवमानं युधिष्ठिरः ।
अपविध्य धनुश्छिन्नं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३ ॥
अन्यत् कार्मुकमादाय धर्मपुत्रश्चमूमुखे ।
दुर्योधनस्य चिच्छेद ध्वजं कार्मुकमेव च ॥ १४ ॥
राजा युधिष्ठिर उस अपमानको सहन न कर सके । उनका क्रोध बहुत बढ़ गया । उनकी आँखें रोषसे लाल हो गयीं । उन्होंने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा हाथमें ले लिया ।
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फिर उन धर्मपुत्रने सेनाके मुहानेपर दुर्योधनके ध्वज और धनुषको भी काट डाला ॥ १३-१४ ॥
अथान्यद् धनुरादाय प्राविध्यत युधिष्ठिरम् ।
तावन्योन्यं सुसंक्रुद्धौ शस्त्रवर्षाण्यमुञ्चताम् ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् दुर्योधनने दूसरा धनुष लेकर युधिष्ठिरको बींध डाला । वे दोनों वीर अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक- दूसरेपर अस्त्र - शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ १५ ॥
सिंहाविव सुसंरब्धौ परस्परजिगीषया ।
जघ्नतुस्तौ रणेऽन्योन्यं नर्दमानौ वृषाविव ॥ १६ ॥
परस्पर विजयकी इच्छासे रोषमें भरे हुए दो सिंहोंके समान दहाड़ते अथवा दो साँड़ोंके समान गरजते हुए वे रणभूमिमें एक- दूसरेपर चोट करते थे ॥ १६ ॥
अन्तरं मार्गमाणौ च चेरतुस्तौ महारथौ ।
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैस्तौ तु कृतव्रणौ ॥ १७ ॥
विरेजतुर्महाराज किंशुकाविव पुष्पितौ । वे दोनों महारथी एक- दूसरेका अन्तर ( प्रहार करनेका अवसर) ढूँढ़ते हुए रणभूमिमें विचर रहे थे । महाराज! धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बाणोंद्वारा वे दोनों वीर क्षत-विक्षत होकर फूले हुए दो पलाश- वृक्षोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ १७३ ॥
ततो राजन् विमुञ्चन्तौ सिंहनादान् मुहुर्मुहुः ॥ १८ ॥
तलयोश्च तथा शब्दान् धनुषश्च महाहवे ।
शङ्खशब्दवरांश्चैव चक्रतुस्तौ नरेश्वरौ ॥ १ ९ ॥
राजन्! तब वे दोनों नरेश बारंबार सिंहनाद करते हुए उस महासमरमें तालियाँ बजाने, धनुषकी टंकार करने और उत्तम शंखनाद फैलाने लगे ॥ १८-१९ ॥
अन्योन्यं तौ महाराज पीडयाञ्चक्रतुर्भृशम् ।
ततो युधिष्ठिरो राजा पुत्रं तव शरैस्त्रिभिः ॥ २० ॥
आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रवेगैर्दुरासदैः । महाराज! वे दोनों एक-दूसरेको अत्यन्त पीड़ा दे रहे थे । तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने वज्रके समान वेगशाली एवं दुर्जय तीन बाणोंद्वारा आपके पुत्रकी छातीमें क्रोधपूर्वक प्रहार किया ॥ २०३ ॥
प्रतिविव्याध तं तूर्णं तव पुत्रो महीपतिः ॥ २१ ॥
पञ्चभिर्निशितैर्बाणैः स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः । आपके पुत्र राजा दुर्योधनने भी शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले पाँच पैने बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको घायल करके तुरंत बदला चुकाया ॥ २१३ ॥
ततो दुर्योधनो राजा शक्तिं चिक्षेप भारत ॥ २२ ॥
सर्वपारशवीं तीक्ष्णां महोल्काप्रतिमां तदा ।
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भारत! इसके बाद राजा दुर्योधनने सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई एक तीखी शक्ति चलायी, जो उस समय बड़ी भारी उल्काके समान प्रतीत हो रही थी ॥ २२ ॥
तामापतन्तीं सहसा धर्मराजः शितैः शरैः ॥ २३ ॥
त्रिभिश्चिच्छेद सहसा तं च विव्याध पञ्चभिः । सहसा अपने ऊपर आती हुई उस शक्तिको धर्मराज युधिष्ठिरने तीन तीखे बाणोंसे तत्काल काट डाला और दुर्योधनको भी पाँच बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २३ ॥
निपपात ततः साऽथ स्वर्णदण्डा महास्वना ॥ २४ ॥
निपतन्ती महोल्केव व्यराजच्छिखिसंनिभा । सुवर्णमय दण्डवाली वह शक्ति आकाशसे गिरती हुई बड़ी भारी उल्काके समान महान्
शब्दके साथ गिर पड़ी । उस समय वह अग्निके तुल्य प्रकाशित हो रही थी ॥
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशाम्पते ॥ २५ ॥
नवभिर्निशितैर्भल्लैर्निजघान युधिष्ठिरम् । प्रजानाथ! उस शक्तिको नष्ट हुई देख आपके पुत्रने नौ तीखे भल्लोंसे युधिष्ठिरको गहरी चोट पहुँचायी ॥ सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुतापनः ॥ २६ ॥
दुर्योधनं समुद्दिश्य बाणं जग्राह सत्वरः ।
समाधत्त च तं बाणं धनुर्मध्ये महाबलः ॥ २७ ॥
बलवान् शत्रुके द्वारा अत्यन्त घायल किये जानेपर शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली युधिष्ठिरने दुर्योधनको लक्ष्य करके एक बाण हाथमें लिया और उसे धनुषके मध्यभागमें रखा ॥ २६-२७ ॥
चिक्षेप च महाराज ततः क्रुद्धः पराक्रमी ।
स तु बाणः समासाद्य तव पुत्रं महारथम् ॥ २८ ॥
व्यामोहयत राजानं धरणीं च ददार ह । महाराज! तत्पश्चात् पराक्रमी युधिष्ठिरने उस बाणको क्रोधपूर्वक चला दिया। उस बाणने आपके महारथी पुत्र दुर्योधनको घायल करके उसे मूर्च्छित कर दिया और पृथ्वीको भी विदीर्ण कर डाला ॥ २८३ ॥
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो गदामुद्यम्य वेगितः ॥ २ ९ ॥ विधित्सुः कलहस्यान्तं धर्मराजमुपाद्रवत् । उसके बाद क्रोधमें भरे हुए दुर्योधनने वेगपूर्वक गदा उठाकर कलहका अन्त कर देनेकी इच्छासे धर्मराज युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ २ ९ ३ ॥ तमुद्यतगदं दृष्ट्वा दण्डहस्तमिवान्तकम् ॥ ३० ॥
धर्मराजो महाशक्तिं प्राहिणोत् तव सूनवे ।
दीप्यमानां महावेगां महोल्कां ज्वलितामिव ॥ ३१ ॥
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दण्डधारी यमराजके समान उसे गदा उठाये देख धर्मराजने आपके उस पुत्रपर अत्यन्त वेगशालिनी महाशक्तिका प्रहार किया, जो प्रज्वलित हुई बड़ी भारी उल्काके समान देदीप्यमान हो रही थी ॥ ३०-३१ ॥
रथस्थः स तया विद्धो वर्म भित्त्वा स्तनान्तरे ।
भृशं संविग्नहृदयः पपात च मुमोह च ॥ ३२ ॥
रथपर बैठे हुए ही दुर्योधनका कवच फाड़कर वह शक्ति उसकी छातीमें चुभ गयी ।
इससे अत्यन्त उद्विग्नचित्त होकर दुर्योधन गिरा और मूर्च्छित हो गया ॥
भीमस्तमाह च ततः प्रतिज्ञामनुचिन्तयन् ।
नायं वध्यस्तव नृप इत्युक्तः स न्यवर्तत ॥ ३३ ॥
उस समय भीमसेनने अपनी प्रतिज्ञाका विचार करते हुए युधिष्ठिरसे कहा – ' महाराज! यह राजा दुर्योधन आपका वध्य नहीं है । ' उनके ऐसा कहनेपर राजा युधिष्ठिर उसके वधसे निवृत्त हो गये ॥ ३३ ॥
ततस्त्वरितमागम्य कृतवर्मा तवात्मजम् ।
प्रत्यपद्यत राजानं निमग्नं व्यसनार्णवे ॥ ३४ ॥
तब कृतवर्मा विपत्तिके समुद्रमें डूबे हुए आपके पुत्र राजा दुर्योधनके पास तुरंत आकर उसकी रक्षाके लिये उद्यत हो गया ॥ ३४ ॥
गदामादाय भीमोऽपि हेमपट्टपरिष्कृताम् ।
अभिदुद्राव वेगेन कृतवर्माणमाहवे ॥ ३५ ॥
यह देख भीमसेन भी सुवर्णपत्रजटित गदा हाथमें लेकर युद्धस्थलमें बड़े वेगसे कृतवर्मापर टूट पड़े ॥ ३५ ॥
एवं तदभवद् युद्धं त्वदीयानां परैः सह ।
अपराह्णे महाराज काङ्क्षतां विजयं युधि ॥ ३६ ॥
महाराज! इस प्रकार अपराह्नके समय रणक्षेत्रमें विजय चाहनेवाले आपके योद्धाओंका शत्रुओंके साथ भीषण युद्ध होने लगा ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुल-युद्धविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
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त्रिंशोऽध्यायः सात्यकि और कर्णका युद्ध तथा अर्जुनके द्वारा कौरव- सेनाका संहार और पाण्डवोंकी विजय संजय उवाच
ततः कर्णं पुरस्कृत्य त्वदीया युद्धदुर्मदाः ।
पुनरावृत्य संग्रामं चक्रुर्देवासुरोपमम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! तदनन्तर आपके रणदुर्मद योद्धा कर्णको आगे करके पुनः लौटकर देवताओं और असुरोंके समान संग्राम करने लगे ॥ १ ॥
द्विरदनररथाश्वशङ्खशब्दैः परिहृषिता विविधैश्च शस्त्रपातैः । द्विरदरथपदातिसादिसंघाः परिकुपिताभिमुखाः प्रजघ्निरे ते ॥ २ ॥
हाथी, मनुष्य, रथ, घोड़ों और शंखके शब्दोंसे अत्यन्त हर्ष और उत्साहमें भरे हाथीसवार, रथी, पैदल और घुड़सवारोंके समुदाय क्रोधपूर्वक सामना करते हुए नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंका प्रहार करके एक - दूसरेको मारने लगे ॥ २ ॥
शितपरश्वधसासिपट्टिशै- रिषुभिरनेकविधैश्च सूदिताः । द्विरदरथहया महाहवे वरपुरुषैः पुरुषाश्च वाहनैः ॥ ३ ॥
उस महायुद्धमें श्रेष्ठ वीर पुरुषोंने वाहनों तथा तीखे फरसों, तलवारों, पट्टिशों और अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा सवारोंसहित हाथियों, रथों, घोड़ों एवं पैदल मनुष्योंका संहार कर डाला ॥ ३ ॥
कमलदिनकरेन्दुसंनिभैः सितदशनैः सुमुखाक्षिनासिकः । रुचिरमुकुटकुण्डलैर्मही पुरुषशिरोभिरुपस्तृता बभौ ॥ ४ ॥
उस समय नरमुण्डोंसे ढकी हुई रणभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी । वीरोंके वे कटे हुए मस्तक कमल, सूर्य और चन्द्रमाके समान कान्तिमान् थे । उनके सफेद दाँत चमक रहे थे । उनके मुख, नेत्र और नासिकाएँ भी बड़ी सुन्दर थीं और वे मनोहर मुकुट तथा कुण्डलोंसे मण्डित थे ॥ ४ ॥
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परिघमुसलशक्तितोमरै- र्नखरभुशुण्डिगदाशतैर्हताः । द्विरदनरहयाः सहस्रशो रुधिरनदीप्रवहास्तदाभवन् ॥ ५ ॥
उस समय परिघ, मूसल, शक्ति, तोमर, नखर, भुशुण्डी और गदाओंकी सौ -सौ चोटें खाकर हजारों हाथी, मनुष्य और घोड़े खूनकी नदी बहाने लगे ॥ ५ ॥
प्रहतरथनराश्वकुञ्जरं प्रतिभयदर्शनमुल्बणव्रणम् । तदहितहतमाबभौ बलं पितृपतिराष्ट्रमिव प्रजाक्षये ॥ ६ ॥
नष्ट हुए रथ, मनुष्य, घोड़े और हाथियोंसे भरी एवं शत्रुओंकी मारी हुई वह सेना गहरे आघातोंसे युक्त हो प्रलयकालमें यमराजके राज्यकी भाँति बड़ी भयंकर दिखायी देती थी ॥ ६ ॥
अथ तव नरदेव सैनिका- स्तव च सुताः सुरसूनुसंनिभाः । अमितबलपुरःसरा रणे कुरुवृषभाः शिनिपौत्रमभ्ययुः ॥ ७ ॥
नरदेव! तदनन्तर आपके सैनिक तथा देवकुमारोंके समान तेजस्वी कुरुकुलभूषण आपके पुत्र असंख्य सेना साथ लेकर रणभूमिमें शिनिपौत्र सात्यकिपर चढ़ आये ॥ तदतिरुधिरभीममाबभौ पुरुषवराश्वरथद्विपाकुलम् । लवणजलसमुद्धतस्वनं बलमसुरामरसैन्यसप्रभम् ॥ ८ ॥
पैदल मनुष्यों, श्रेष्ठ घोड़ों, रथों और हाथियोंसे भरी और खारे पानीके समुद्रके समान भयंकर गर्जना करनेवाली वह सेना अत्यन्त रक्तरंजित होकर देवताओं और असुरोंकी सेनाके समान भयानक प्रतीत होती थी ॥ ८ ॥
सुरपतिसमविक्रमस्तत- स्त्रिदशवरावरजोपमं युधि । दिनकरकिरणप्रभैः पृषत्कै रवितनयोऽभ्यहनच्छिनिप्रवीरम् ॥ ९ ॥
उस समय देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी सूर्यपुत्र कर्णने युद्धस्थलमें इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्रके समान शक्तिशाली शिनिवंशके प्रमुख वीर सात्यकिको सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ९ ॥
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तमपि सरथवाजिसारथिं शिनिवृषभो विविधैः शरैस्त्वरन् । भुजगविषसमप्रभै रणे पुरुषवरं समवास्तृणोत् तदा ॥ १० ॥
तब शिनिवंशशिरोमणि सात्यकिने बड़ी उतावलीके साथ विषधर सर्पोंके समान विषैले नाना प्रकारके बाणोंद्वारा रथ, घोड़े और सारथिसहित नरश्रेष्ठ कर्णको भी आच्छादित कर दिया ॥ १० ॥
शिनिवृषभशरैर्निपीडितं तव सुहृदो वसुषेणमभ्ययुः । त्वरितमतिरथा रथर्षभं द्विरदरथाश्वपदातिभिः सह ॥ ११ ॥
उस समय आपके हितैषी सुहृद् अतिरथी वीर वहाँ शिनिवंशशिरोमणि सात्यकिके शरोंसे अत्यन्त पीड़ित हुए महारथी कर्णके पास हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी चतुरंगिणी सेना साथ लेकर तुरंत आ पहुँचे ॥ तदुदधिनिभमाद्रवद् बलं त्वरिततरैः समभिद्रुतं परैः । द्रुपदसुतमुखैस्तदाभवत् पुरुषरथाश्वगजक्षयो महान् ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् धृष्टद्युम्न आदि शीघ्रकारी शत्रुओंने आपकी समुद्र- सदृश विशाल वाहिनीपर आक्रमण किया और आपकी सेना भी शत्रुओंकी ओर दौड़ी । फिर तो वहाँ मनुष्यों, रथों, घोड़ों और हाथियोंका महान् संहार होने लगा ॥ १२ ॥
अथ पुरुषवरौ कृताह्निकौ भवमभिपूज्य यथाविधि प्रभुम् । अरिवधकृतनिश्चयौ द्रुतं तव बलमर्जुनकेशवौ सृतौ ॥ १३ ॥
तदनन्तर अपराह्णकालके कृत्य समाप्त करके विधिपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करनेके पश्चात् नरश्रेष्ठ अर्जुन और श्रीकृष्ण शत्रुओंके वधका निश्चय करके तुरंत आपकी सेनापर चढ़ आये ॥ १३ ॥
जलदनिनदनिःस्वनं रथं पवनविधूतपताककेतनम् । सितहयमुपयान्तमन्तिकं हृतमनसो ददृशुस्तदारयः ॥ १४ ॥
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अर्जुनके रथसे मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि हो रही थी, पवनकी प्रेरणा पाकर उसकी ऊँची पताका फहरा रही थी और उसमें श्वेत घोड़े जुते हुए थे । उस समय शत्रुओंने उत्साहशून्य हृदयसे उस रथको समीप आते देखा ॥ १४ ॥
अथ विस्फार्य गाण्डीवं रथे नृत्यन्निवार्जुनः ।
शरसम्बाधमकरोत् खं दिशः प्रदिशस्तथा ॥ १५ ॥
इसके बाद रथपर नृत्य करते हुए - से अर्जुनने गाण्डीव धनुषको फैलाकर आकाश, दिशा और विदिशाओंको बाणोंसे भर दिया ॥ १५ ॥
रथान् विमानप्रतिमान् मज्जयन् सायुधध्वजान् ।
स सारथींस्तदा बाणैरभ्राणीवानिलोऽवधीत् ॥ १६ ॥
जैसे वायु मेघोंकी घटाको छिन्न - भिन्न कर देती है, उसी प्रकार उस समय अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा विमान - जैसे रथोंको आयुध, ध्वज और सारथियोंसहित नष्ट कर दिया ॥ १६ ॥
गजान् गजप्रयन्तॄंश्च वैजयन्त्यायुधध्वजान् ।
सादिनोऽश्वांश्च पत्तींश्च शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ १७ ॥
उन्होंने अपने तीखे बाणोंसे पताका, ध्वज और आयुधोंसहित गजों एवं गजारोहियोंको, घोड़ों और घुड़सवारोंको तथा पैदल मनुष्योंको भी यमलोक भेज दिया ॥
तमन्तकमिव क्रुद्धमनिवार्यं महारथम् ।
दुर्योधनोऽभ्ययादेको निघ्नन् बाणैरजिह्मगैः ॥ १८ ॥
इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान अबाध गतिवाले महारथी अर्जुनपर सीधे जानेवाले बाणोंसे प्रहार करता हुआ अकेला दुर्योधन उनका सामना करनेके लिये गया ॥ १८ ॥
तस्यार्जुनो धनुः सूतमश्वान् केतुं च सायकैः ।
हत्वा सप्तभिरेकेन छत्रं चिच्छेद पत्रिणा ॥ १ ९ ॥
अर्जुनने सात बाणोंसे दुर्योधनके धनुष, सारथि, घोड़ों और ध्वजको नष्ट करके एक बाणसे उसका छत्र भी काट डाला ॥ १ ९ ॥
नवमं च समाधाय व्यसृजत् प्राणघातिनम् ।
दुर्योधनायेषुवरं तं द्रौणिः सप्तधाच्छिनत् ॥ २० ॥
फिर नवें प्राणघातक बाणको धनुषपर रखकर उन्होंने दुर्योधनकी ओर चला दिया; परंतु अश्वत्थामाने उस उत्तम बाणके सात टुकड़े कर डाले ॥ २० ॥
ततो द्रौणेर्धनुश्छित्त्वा हत्वा चाश्वरथान् शरैः ।
कृपस्यापि तदत्युग्रं धनुश्चिच्छेद पाण्डवः ॥ २१ ॥
तब पाण्डुकुमार अर्जुनने अश्वत्थामाका धनुष काटकर उसके रथ और घोड़ोंको नष्ट करके अपने बाणोंद्वारा कृपाचार्यके अत्यन्त भयंकर धनुषको भी खण्डित कर दिया ॥ २१ ॥
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हार्दिक्यस्य धनुश्छित्त्वा ध्वजं चाश्वांस्तदावधीत् । दुःशासनस्येष्वसनं छित्त्वा राधेयमभ्ययात् ॥ २२ ॥
इसके बाद उन्होंने कृतवर्माका धनुष काटकर उसके ध्वज और घोड़ोंको भी तत्काल नष्ट कर दिया । फिर दुःशासनके धनुषके टुकड़े -टुकड़े करके राधापुत्र कर्णपर आक्रमण किया ॥ २२ ॥
अथ सात्यकिमुत्सृज्य त्वरन् कर्णोऽर्जुनं त्रिभिः । विद्ध्वा विव्याध विंशत्या कृष्णं पार्थं पुनः पुनः ॥ २३ ॥
तदनन्तर कर्णने सात्यकिको छोड़कर अर्जुनको तीन बाणोंसे बींध डाला । फिर बीस बाण मारकर श्रीकृष्णको भी घायल कर दिया । इस प्रकार वह दोनोंको बारंबार चोट पहुँचाने लगा ॥ २३ ॥
न ग्लानिरासीत् कर्णस्य क्षिपतः सायकान् बहून् रणे विनिघ्नतः शत्रून् क्रुद्धस्येव शतक्रतोः ॥ २४ ॥
उस समय कर्ण क्रोधमें भरे हुए इन्द्रके समान रणभूमिमें बहुत -से बाणोंकी वर्षा करके शत्रुओंका संहार कर रहा था; परंतु उसे इस कार्यमें तनिक भी क्लेश अथवा थकावटका अनुभव नहीं होता था ॥ २४ ॥
अथ सात्यकिरागत्य कर्णं विद्ध्वा शितैः शरैः ।
नवत्या नवभिश्चोग्रैः शतेन पुनरार्पयत् ॥ २५ ॥
फिर सात्यकिने भी लौटकर कर्णको तीखे बाणोंसे घायल करके पुनः उसे एक सौ निन्यानबे भयंकर बाण मारे ॥
ततः प्रवीराः पार्थानां सर्वे कर्णमपीडयन् ।
युधामन्युः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ॥ २६ ॥
उत्तमौजा युयुत्सुश्च यमौ पार्षत एव च ।
चेदिकारूषमत्स्यानां केकयानां च यद् बलम् ॥ २७ ॥
चेकितानश्च बलवान् धर्मराजश्च सुव्रतः ।
एते रथाश्वद्विरदैः पत्तिभिश्चोग्रविक्रमैः ॥ २८ ॥
परिवार्य रणे कर्णं नानाशस्त्रैरवाकिरन् ।
भाषन्तो वाग्भिरुग्राभिः सर्वे कर्णवधे धृताः ॥ २ ९ ॥