04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1881–1890

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1881–1890

पृष्ठ 1881

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एकचत्वारिंशोऽध्यायः राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना संजय उवाच

मारिषाधिरथेः श्रुत्वा वाचो युद्धाभिनन्दिनः ।

शल्योऽब्रवीत् पुनः कर्णं निदर्शनमिदं वचः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— माननीय नरेश! युद्धका अभिनन्दन करनेवाले अधिरथपुत्र कर्णकी पूर्वोक्त बात सुनकर फिर शल्यने उससे यह दृष्टान्तयुक्त बात कही- ॥ १ ॥

जातोऽहं यज्वनां वंशे संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ।

राज्ञां मूर्धाभिषिक्तानां स्वयं धर्मपरायणः ॥ २ ॥

' सूतपुत्र! मैं युद्धमें पीठ न दिखानेवाले यज्ञपरायण, मूर्धाभिषिक्त नरेशोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और स्वयं भी धर्ममें तत्पर रहता हूँ ॥ २ ॥

यथैव मत्तो मद्येन त्वं तथा लक्ष्यसे वृष ।

तथाद्य त्वां प्रमाद्यन्तं चिकित्सेयं सुहृत्तया ॥ ३ ॥

किंतु वृषभस्वरूप कर्ण! जैसे कोई मदिरासे मतवाला हो गया हो, उसी प्रकार तुम भी उन्मत्त दिखायी दे रहे हो; अतः मैं हितैषी सुहृद् होनेके नाते तुम जैसे प्रमत्तकी आज चिकित्सा करूँगा ॥ ३ ॥

इमां काकोपमां कर्ण प्रोच्यमानां निबोध मे ।

श्रुत्वा यथेष्टं कुर्यास्त्वं निहीन कुलपांसन ॥ ४ ॥

ओ नीच कुलांगार कर्ण! मेरे द्वारा बताये जानेवाले कौएके इस दृष्टान्तको सुनो और सुनकर जैसी इच्छा हो वैसा करो ॥ ४ ॥

नाहमात्मनि किंचिद् वै किल्बिषं कर्ण संस्मरे ।

येन मां त्वं महाबाहो हन्तुमिच्छस्यनागसम् ॥५ ॥

महाबाहु कर्ण! मुझे अपना कोई ऐसा अपराध नहीं याद आता है, जिसके कारण तुम मुझ निरपराधको भी मार डालनेकी इच्छा रखते हो ॥ ५ ॥

अवश्यं तु मया वाच्यं बुद्ध्यता त्वद्धिताहितम् ।

विशेषतो रथस्थेन राज्ञश्चैव हितैषिणा ॥ ६ ॥

मैं राजा दुर्योधनका हितैषी हूँ और विशेषतः रथपर सारथि बनकर बैठा हूँ; इसलिये तुम्हारे हिताहितको जानते हुए मेरा आवश्यक कर्तव्य है कि तुम्हें वह सब बता दूँ ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1882

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समं च विषमं चैव रथिनश्च बलाबलम् ।

श्रमः खेदश्च सततं हयानां रथिना सह ॥ ७ ॥

आयुधस्य परिज्ञानं रुतं च मृगपक्षिणाम् ।

भारश्चाप्यतिभारश्च शल्यानां च प्रतिक्रिया ॥ ८ ॥

अस्त्रयोगश्च युद्धं च निमित्तानि तथैव च ।

सर्वमेतन्मया ज्ञेयं रथस्यास्य कुटुम्बिना ॥ ९ ॥

अतस्त्वां कथये कर्ण निदर्शनमिदं पुनः । सम और विषम अवस्था, रथीकी प्रबलता और निर्बलता, रथीके साथ ही घोड़ोंके सतत परिश्रम और कष्ट, अस्त्र हैं या नहीं, इसकी जानकारी, जय और पराजयकी सूचना देनेवाली पशु - पक्षियोंकी बोली, भार, अतिभार, शल्य- चिकित्सा, अस्त्रप्रयोग, युद्ध और शुभाशुभ निमित्त – इन सारी बातोंका ज्ञान रखना मेरे लिये आवश्यक है; क्योंकि मैं इस रथका एक कुटुम्बी हूँ । कर्ण! इसीलिये मैं पुनः तुमसे इस दृष्टान्तका वर्णन करता हूँ— ॥ ७ -९ ॥ वैश्यः किल समुद्रान्ते प्रभूतधनधान्यवान् ॥ १० ॥

यज्वा दानपतिः क्षान्तः स्वकर्मस्थोऽभवच्छुचिः ।

बहुपुत्रः प्रियापत्यः सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ११ ॥

राज्ञो धर्मप्रधानस्य राष्ट्रे वसति निर्भयः । कहते हैं समुद्रके तटपर किसी धर्मप्रधान राजाके राज्यमें एक प्रचुर धन - धान्यसे सम्पन्न वैश्य रहता था । वह यज्ञ- यागादि करनेवाला, दानपति, क्षमाशील, अपने वर्णानुकूल कर्ममें तत्पर, पवित्र, बहुत - से पुत्रवाला, संतानप्रेमी और समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाला था ॥ १०-११ ॥ पुत्राणां तस्य बालानां कुमाराणां यशस्विनाम् ॥ १२ ॥

काको बहूनामभवदुच्छिष्टकृतभोजनः । उसके जो बहुत- से अल्पवयस्क यशस्वी पुत्र थे, उन सबकी जूठन खानेवाला एक कौआ भी वहाँ रहा करता था ॥ १२३ ॥

तस्मै सदा प्रयच्छन्ति वैश्यपुत्राः कुमारकाः ॥ १३ ॥

मांसौदनं दधि क्षीरं पायसं मधुसर्पिषी । वैश्यके बालक उस कौएको सदा मांस, भात, दही, दूध, खीर, मधु और घी आदि दिया करते थे ॥ १३३ ॥

स चोच्छिष्टभृतः काको वैश्यपुत्रैः कुमारकैः ॥ १४ ॥

सदृशान् पक्षिणो दृप्तः श्रेयसश्चाधिचिक्षिपे ।

पृष्ठ 1883

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वैश्यके बालकोंद्वारा जूठन खिला-खिलाकर पाला हुआ वह कौआ बड़े घमंडमें भरकर अपने समान तथा अपनेसे श्रेष्ठ पक्षियोंका भी अपमान करने लगा ॥ १४३ ॥

अथ हंसाः समुद्रान्ते कदाचिदतिपातिनः ॥ १५ ॥

गरुडस्य गतौ तुल्याश्चक्राङ्गा हृष्टचेतसः । एक दिनकी बात है, उस समुद्रके तटपर गरुड़के समान लंबी उड़ानें भरनेवाले मानसरोवरनिवासी राजहंस आये । उनके अंगोंमें चक्रके चिह्न थे और वे मन- ही- मन बहुत प्रसन्न थे ॥ १५३ ॥

कुमारकास्तदा हंसान् दृष्ट्वा काकमथाब्रुवन् ॥ १६ ॥

भवानेव विशिष्टो हि पतत्रिभ्यो विहङ्गम । ( एतेऽतिपातिनः पश्य विहङ्गान् वियदाश्रितान् । एभिस्त्वमपि शक्तो हि कामान्न पतितं त्वया ॥ ) उस समय उन हंसोंको देखकर कुमारोंने कौएसे इस प्रकार कहा - ' विहंगम! तुम्हीं समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ हो । देखो, ये आकाशचारी हंस आकाशमें जाकर बड़ी दूरकी उड़ानें भरते हैं । तुम भी इन्हींके समान दूरतक उड़नेमें समर्थ हो । तुमने अपनी इच्छासे ही अबतक वैसी उड़ान नहीं भरी ' ॥ १६३ ॥

प्रतार्यमाणस्तैः सर्वैरल्पबुद्धिभिरण्डजः ॥ १७ ॥

तद्वचः सत्यमित्येव मौर्य्याद् दर्पाच्च मन्यते । उन सारे अल्पबुद्धि बालकोंद्वारा ठगा गया वह पक्षी मूर्खता और अभिमानसे उनकी बातको सत्य मानने लगा ॥ १७३३ ॥

तान् सोऽभिपत्य जिज्ञासुः क एषां श्रेष्ठभागिति ॥ १८ ॥

उच्छिष्टदर्पितः काको बहूनां दूरपातिनाम् ।

तेषां यं प्रवरं मेने हंसानां दूरपातिनाम् ॥ १ ९ ॥

तमाह्वयत दुर्बुद्धिः पताव इति पक्षिणम् । फिर वह जूठनपर घमंड करनेवाला कौआ इन हंसोंमें सबसे श्रेष्ठ कौन है? यह जाननेकी इच्छासे उड़कर उनके पास गया और दूरतक उड़नेवाले उन बहुसंख्यक हंसोंमेंसे जिस पक्षीको उसने श्रेष्ठ समझा, उसीको उस दुर्बुद्धिने ललकारते हुए कहा — ‘ चलो, हम दोनों उड़ें' ॥ १८-१९ ३ ॥ तच्छ्रुत्वा प्राहसन् हंसा ये तत्रासन् समागताः ॥ २० ॥

भाषतो बहु काकस्य बलिनः पततां वराः ।

इदमूचुः स्म चक्राङ्गा वचः काकं विहङ्गमाः ॥ २१ ॥

बहुत काँव - काँव करनेवाले उस कौएकी वह बात सुनकर वहाँ आये हुए वे पक्षियोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी बलवान् चक्रांग हँस पड़े और कौएसे इस प्रकार बोले ॥ २०-२१ ॥

पृष्ठ 1884

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हंसा ऊचुः

वयं हंसाश्चरामेमां पृथिवीं मानसौकसः ।

पक्षिणां च वयं नित्यं दूरपातेन पूजिताः ॥ २२ ॥

हंसोंने कहा- काक! हम मानसरोवरनिवासी हंस हैं, जो सदा इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं । दूरतक उड़नेके कारण हमलोग सदा सभी पक्षियोंमें सम्मानित होते आये हैं ॥ २२ ॥

कथं हंसं नु बलिनं चक्राङ्गं दूरपातिनम् ।

भूत्वा निपतने समाह्वयसि दुर्मते ॥ २३ ॥

कथं त्वं पतिता काक सहास्माभिर्ब्रवीहि तत् । ओ खोटी बुद्धिवाले काग! तू कौआ होकर लंबी उड़ान भरनेवाले और अपने अंगोंमें चक्रका चिह्न धारण करनेवाले एक बलवान् हंसको अपने साथ उड़नेके लिये कैसे ललकार रहा है? काग! बता तो सही, तू हमारे साथ किस प्रकार उड़ेगा? ॥ २३ ॥

अथ हंसवचो मूढः कुत्सयित्वा पुनः पुनः ।

प्रजगादोत्तरं काकः कत्थनो जातिलाघवात् ॥ २४ ॥

हंसकी बात सुनकर बढ़ - बढ़कर बातें बनानेवाले मूर्ख कौएने अपनी जातिगत क्षुद्रताके कारण बारंबार उसकी निन्दा करके उसे इस प्रकार उत्तर दिया ॥ २४ ॥

काक उवाच

शतमेकं च पातानां पतितास्मि न संशयः ।

शतयोजनमेकैकं विचित्रं विविधं तथा ॥ २५ ॥

कौआ बोला — हंस! मैं एक सौ एक प्रकारकी उड़ानें उड़ सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है । उनमेंसे प्रत्येक उड़ान सौ- सौ योजनकी होती है और वे सभी विभिन्न प्रकारकी एवं विचित्र हैं ॥ २५ ॥

उड्डीनमवडीनं च प्रडीनं डीनमेव च ।

निडीनमथ संडीनं तिर्यक् डीनगतानि च ॥ २६ ॥

विडीनं परिडीनं च पराडीनं सुडीनकम् ।

अभिडीनं महाडीनं निर्डीनमतिडीनकम् ॥ २७ ॥

अवडीनं प्रडीनं च संडीनं डीनडीनकम् ।

संडीनोड्डीनडीनं च पुनर्डीनविडीनकम् ॥ २८ ॥

सम्पातं समुदीषं च ततोऽन्यद् व्यतिरिक्तकम् ।

गतागतप्रतिगतं बह्वीश्च निकुलीनकाः ॥ २ ९ ॥

उनमेंसे कुछ उड़ानोंके, नाम इस प्रकार हैं- उड्डीन ( ऊँचा उड़ना ), अवडीन ( नीचा उड़ना ), प्रडीन ( चारों ओर उड़ना ), डीन ( साधारण उड़ना ), निडीन ( धीरे - धीरे उड़ना ),

पृष्ठ 1885

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संडीन ( ललित गतिसे उड़ना ), तिर्यग्डीन ( तिरछा उड़ना), विडीन ( दूसरोंकी चालकी नकल करते हुए उड़ना), परिडीन ( सब ओर उड़ना ), पराडीन ( पीछेकी ओर उड़ना ), सुडीन (स्वर्गकी ओर उड़ना), अभिडीन ( सामनेकी ओर उड़ना ), महाडीन ( बहुत वेगसे उड़ना ), निर्डीन ( परोंको हिलाये बिना ही उड़ना ), अतिडीन ( प्रचण्डतासे उड़ना ), संडीन डीनडीन ( सुन्दर गतिसे आरम्भ करके फिर चक्कर काटकर नीचेकी ओर उड़ना ), संडीनोड्डीनडीन ( सुन्दर गतिसे आरम्भ करके फिर चक्कर काटकर ऊँचा उड़ना), डीनविडीन (एक प्रकारकी उड़ानमें दूसरी उड़ान दिखाना), सम्पात ( क्षणभर सुन्दरतासे उड़कर फिर पंख फड़फड़ाना ), समुदीष ( कभी ऊपरकी ओर और कभी नीचेकी ओर उड़ना ) और व्यतिरिक्तक ( किसी लक्ष्यका संकल्प करके उड़ना ), – ये छब्बीस उड़ानें हैं । इनमेंसे महाडीनके सिवा अन्य सब उड़ानोंके, ' गत ' ( किसी लक्ष्यकी ओर जाना ), ‘ आगत ’ ( लक्ष्यतक पहुँचकर लौट आना) और ' प्रतिगत' ( पलटा खाना) – ये तीन भेद हैं ( इस प्रकार कुल छिहत्तर भेद हुए) । इसके सिवा बहुत से ( अर्थात् पचीस) निपात भी हैं ।* ( ये सब मिलकर एक सौ एक उड़ानें होती हैं ) ॥

कर्तास्मि मिषतां वोऽद्य ततो द्रक्ष्यथ मे बलम् ।

तेषामन्यतमेनाहं पतिष्यामि विहायसम् ॥ ३० ॥

प्रदिशध्वं यथान्यायं केन हंसाः पताम्यहम् । आज मैं तुमलोगोंके देखते- देखते जब इतनी उड़ानें भरूँगा, उस समय मेरा बल तुम देखोगे । मैं इनमेंसे किसी भी उड़ानसे आकाशमें उड़ सकूँगा। हंसो! तुमलोग यथोचितरूपसे विचार करके बताओ कि ' मैं किस उड़ानसे उड़ू?' ॥ ३० ॥

ते वै ध्रुवं विनिश्चित्य पतध्वं न मया सह ॥ ३१ ॥

पातैरेभिः खलु खगाः पतितुं खे निराश्रये । अतः पक्षियो! तुम सब लोग दृढ़ निश्चय करके आश्रयरहित आकाशमें इन विभिन्न उड़ानोंद्वारा उड़नेके लिये मेरे साथ चलो न ॥ ३१३ ॥

एवमुक्ते तु काकेन प्रहस्यैको विहंगमः ॥ ३२ ॥

उवाच काकं राधेय वचनं तन्निबोध मे । राधापुत्र! कौएके ऐसा कहनेपर एक आकाशचारी हंसने हँसकर उससे जो कुछ कहा, वह मुझसे सुनो ॥ ३२ ॥

हंस उवाच शतमेकं च पातानां त्वं काक पतिता ध्रुवम् ॥ ३३ ॥

एकमेव तु यं पातं विदुः सर्वे विहंगमाः ।

तमहं पतिता काक नान्यं जानामि कञ्चन ॥ ३४ ॥

पत त्वमपि ताम्राक्ष येन पातेन मन्यसे ।

पृष्ठ 1886

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हंस बोला - काग! तू अवश्य एक सौ एक उड़ानोंद्वारा उड़ सकता है । परंतु मैं तो जिस एक उड़ानको सारे पक्षी जानते हैं उसीसे उड़ सकता हूँ, दूसरी किसी उड़ानका मुझे पता नहीं है । लाल नेत्रवाले कौए? तू भी जिस उड़ानसे उचित समझे, उसीसे उड़ ॥ ३३-३४ ॥ अथ काकाः प्रजहसुर्ये तत्रासन् समागताः ॥ ३५ ॥

कथमेकेन पातेन हंसः पातशतं जयेत् ।

एकेनैव शतस्यैष पातेनाभिभविष्यति ॥ ३६ ॥

हंसस्य पतितं काको बलवानाशुविक्रमः । तब वहाँ आये हुए सारे कौए जोर- जोर से हँसने लगे और आपसमें बोले — ‘ भला यह हंस एक ही उड़ानसे सौ प्रकारकी उड़ानोंको कैसे जीत सकता है? यह कौआ बलवान् और शीघ्रतापूर्वक उड़नेवाला है; अतः सौमेंसे एक ही उड़ानद्वारा हंसकी उड़ानको पराजित कर देगा' ॥ ३५-३६३ ॥ प्रपेततुः स्पर्धया च ततस्तौ हंसवायसौ ॥ ३७ ॥

एकपाती च चक्राङ्गः काकः पातशतेन च ।

पेतिवानथ'चक्राङ्गः पेतिवानथ वायसः ॥ ३८ ॥

तदनन्तर हंस और कौआ दोनों होड़ लगाकर उड़े । चक्रांग हंस एक ही गतिसे उड़नेवाला था और कौआ सौ उड़ानोंसे । इधरसे चक्रांग उड़ा और उधरसे कौआ ॥ ३७-३८ ॥

विसिस्मापयिषुः पातैराचक्षाणोऽऽत्मनः क्रियाः ।

अथ काकस्य चित्राणि पतितानि मुहुर्मुहुः ॥ ३ ९ ॥

दृष्ट्वा प्रमुदिताः काका विनेदुरधिकैः स्वरैः । कौआ विभिन्न उड़ानोंद्वारा दर्शकोंको आश्चर्य चकित करनेकी इच्छासे अपने कार्योंका बखान करता जा रहा था । उस समय कौएकी विचित्र उड़ानोंको बारंबार देखकर दूसरे कौए बड़े प्रसन्न हुए और जोर- जोरसे काँव- काँव करने लगे ॥ ३ ९ ३ ॥ हंसांश्चावहसन्ति स्म प्रावदन्नप्रियाणि च ॥ ४० ॥

उत्पत्योत्पत्य च मुहुर्मुहूर्तमिति चेति च ।

वृक्षाग्रेभ्यः स्थलेभ्यश्च निपतन्त्युतन्ति च ॥ ४१ ॥

कुर्वाणा विविधान् रावानाशंसन्तो जयं तथा । वे दो - दो घड़ीपर बारंबार उड़- उड़कर कहते - ' देखो, कौएकी यह उड़ान, वह उड़ान' । ऐसा कहकर वे हंसोंका उपहास करते और उन्हें कटु वचन सुनाते थे । साथ ही कौएकी विजयके लिये शुभाशंसा करते और भाँति- भाँतिकी बोली बोलते हुए वे कभी वृक्षोंकी शाखाओंसे भूतलपर और कभी भूतलसे वृक्षोंकी शाखाओंपर नीचे- ऊपर उड़ते रहते थे ॥ ४०-४१ ॥

पृष्ठ 1887

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हंसस्तु मृदुनैकेन विक्रान्तुमुपचक्रमे ॥ ४२ ॥

प्रत्यहीयत काकाच्च मुहूर्तमिव मारिष । आर्य! हंसने एक ही मृदुल गतिसे उड़ना आरम्भ किया था; अतः दो घड़ीतक वह कौएसे हारता - सा प्रतीत हुआ ॥ ४२ ॥

अवमन्य च हंसांस्तानिदं वचनमब्रुवन् ॥ ४३ ॥

योऽसावुत्पतितो हंसः सोऽसावेवं प्रहीयते । तब कौओंने हंसोंका अपमान करके इस प्रकार कहा - ' वह जो हंस उड़ा था, वह तो इस प्रकार कौएसे पिछड़ता जा रहा है! ' ४३३ ॥ अथ हंसः स तच्छ्रुत्वा प्रापतत् पश्चिमां दिशम् ॥ ४४ ॥

उपर्युपरि वेनने सागरं मकरालयम् । उड़नेवाले हंसने कौओंकी वह बात सुनकर बड़े वेग से मकरालय समुद्रके ऊपर- ऊपर पश्चिम दिशाकी ओर उड़ना आरम्भ किया ॥ ४४ ॥

ततो भीः प्राविशत् काकं तदा तत्र विचेतसम् ॥ ४५ ॥

द्वीपद्रुमानपश्यन्तं निपातार्थे श्रमान्वितम् । इधर कौआ थक गया था । उसे कहीं आश्रय लेनेके लिये द्वीप या वृक्ष नहीं दिखायी दे रहे थे; अतः उसके मनमें भय समा गया और वह घबराकर अचेत - सा हो उठा ॥ ४५ ॥

निपतेयं क्व नु श्रान्त इति तस्मिञ्जलार्णवे ॥ ४६ ॥

अविषह्यः समुद्रो हि बहुसत्त्वगणालयः ।

महासत्त्वशतोद्भासी नभसोऽपि विशिष्यते ॥ ४७ ॥

कौआ सोचने लगा, ‘ मैं थक जानेपर इस जलराशिमें कहाँ उतरूँगा? बहुत - से जल-जन्तुओंका निवासस्थान समुद्र मेरे लिये असह्य है । असंख्य महाप्राणियोंसे उद्भासित होनेवाला यह महासागर तो आकाशसे भी बढ़कर है ' ॥ ४६-४७ ॥

गाम्भीर्याद्धि समुद्रस्य न विशेषं हि सूतज ।

दिगम्बराम्भसः कर्ण समुद्रस्था विदुर्जनाः ॥ ४८ ॥

विदूरपातात् तोयस्य किं पुनः कर्ण वायसः । सूतपुत्र कर्ण! समुद्रमें विचरनेवाले मनुष्य भी उसकी गम्भीरताके कारण दिशाओंद्वारा आवृत उसकी जलराशिकी थाह नहीं जान पाते, फिर वह कौआ कुछ दूरतक उड़ने मात्रसे उस समुद्रके जलसमूहका पार कैसे पा सकता था? ॥ ४८३ ॥

अथ हंसोऽप्यतिक्रम्य मुहूर्तमिति चेति च ॥ ४९ ॥

अवेक्षमाणस्तं काकं नाशकद् व्यपसर्पितुम् । उधर हंस दो घड़ीतक उड़कर इधर- उधर देखता हुआ कौएकी प्रतीक्षामें आगे न जा सका ॥ ४ ९ ॥

पृष्ठ 1888

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अतिक्रम्य च चक्राङ्गः काकं तं समुदैक्षत ॥ ५० ॥

यावद् गत्वा पतत्येष काको मामिति चिन्तयन् । चक्रांग कौएको लाँघकर आगे बढ़ चुका था तो भी यह सोचकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा कि यह कौआ भी उड़कर मेरे पास आ जाय ॥ ५० ॥

ततः काको भृशं श्रान्तो हंसमभ्यागमत्तदा ॥ ५१ ॥

तं तथा हीयमानं तु हंसो दृष्ट्वाब्रवीदिदम् ।

उज्जिहीर्षुर्निमज्जन्तं स्मरन् सत्पुरुषव्रतम् ॥ ५२ ॥

तदनन्तर उस समय अत्यन्त थका-मादा कौआ हंसके समीप आया । हंसने देखा, कौएकी दशा बड़ी शोचनीय हो गयी है । अब यह पानीमें डूबनेहीवाला है । तब उसने सत्पुरुषोंके व्रतका स्मरण करके उसके उद्धारकी इच्छा मनमें लेकर इस प्रकार कहा ॥ ५१-५२ ॥ हंसउवाच

बहूनि पतितानि त्वमाचक्षाणो मुहुर्मुहुः ।

पातस्य व्याहरंश्चेदं न नो गुह्यं प्रभाषसे ॥ ५३ ॥

हंस बोला - काग! तू तो बारंबार अपनी बहुत - सी उड़ानोंका बखान कर रहा था; परंतु उन उड़ानोंका वर्णन करते समय उनमेंसे इस गोपनीय रहस्ययुक्त उड़ानकी बात तो तूने नहीं बतायी थी ॥ ५३ ॥

किं नाम पतितं काक यत्त्वं पतसि साम्प्रतम् ।

जलं स्पृशसि पक्षाभ्यां तुण्डेन च पुनः पुनः ॥ ५४ ॥

कौए! बता तो सही, तू इस समय जिस उड़ानसे उड़ रहा है, उसका क्या नाम है? इस उड़ानमें तो तू अपने दोनों पंखों और चोंचके द्वारा जलका बार- बार स्पर्श करने लगा है ॥ ५४ ॥

प्रब्रूहि कतमे तत्र पाते वर्तसि वायस ।

एह्येहि काक शीघ्रं त्वमेष त्वां प्रतिपालये ॥ ५५ ॥

वायस! बता, बता । इस समय तू कौन- सी उड़ानमें स्थित है। कौए! आ, शीघ्र आ । मैं अभी तेरी रक्षा करता हूँ ॥ ५५ ॥

शल्य उवाच

स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च जलं तदा ।

दृष्टो हंसेन दुष्टात्मन्निदं हंसं ततोऽब्रवीत् ॥ ५६ ॥

अपश्यन्नम्भसः पारं निपतंश्च श्रमान्वितः ।

पातवेगप्रमथितो हंसं काकोऽब्रवीदिदम् ॥ ५७ ॥

पृष्ठ 1889

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शल्य कहते हैं - दुष्टात्मा कर्ण! वह कौआ अत्यन्त पीड़ित हो जब अपनी दोनों पाँखों और चोंचसे जलका स्पर्श करने लगा, उस अवस्थामें हंसने उसे देखा । वह उड़ानके वेगसे थककर शिथिलांग हो गया था और जलका कहीं आर- पार न देखकर नीचे गिरता जा रहा था । उस समय उसने हंससे इस प्रकार कहा— ॥ ५६-५७ ॥

पृष्ठ 1890

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शल्य कर्णको हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर अपमानित कर रहे हैं