श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1891–1900
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1891–1900
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वयं काकाः कुतो नाम चरामः काकवाशिकाः ।
हंस प्राणैः प्रपद्ये त्वामुदकान्तं नयस्व माम् ॥ ५८ ॥
' भाई हंस! हम तो कौए हैं । व्यर्थ काँव- काँव किया करते हैं । हम उड़ना क्या जानें? मैं अपने इन प्राणोंके साथ तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम मुझे जलके किनारेतक पहुँचा दो ' ॥ ५८ ॥
स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च महार्णवे ।
काको दृढपरिश्रान्तः सहसा निपपात ह ॥ ५ ९ ॥
ऐसा कहकर अत्यन्त थका- मादा कौआ दोनों पाँखों और चोंचसे जलका स्पर्श करता
हुआ सहसा उस महासागरमें गिर पड़ा । उस समय उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ ५ ९ ॥
सागराम्भसि तं दृष्ट्वा पतितं दीनचेतसम् ।
म्रियमाणमिदं काकं हंसो वाक्यमुवाच ह ॥ ६० ॥
समुद्रके जलमें गिरकर अत्यन्त दीनचित्त हो मृत्युके निकट पहुँचे हुए उस कौएसे हंसने इस प्रकार कहा— ॥ ६० ॥
शतमेकं च पातानां पताम्यहमनुस्मर ।
श्लाघमानस्त्वमात्मानं काक भाषितवानसि ॥ ६१ ॥
' काग! तूने अपनी प्रशंसा करते हुए कहा था कि मैं एक सौ एक उड़ानोंद्वारा उड़ सकता हूँ । अब उन्हें याद कर ॥ ६१ ॥
स त्वमेकशतं पातं पतन्नभ्यधिको मया ।
कथमेवं परिश्रान्तः पतितोऽसि महार्णवे ॥ ६२ ॥
‘ सौ उड़ानोंसे उड़नेवाला तू तो मुझसे बहुत बढ़ा- चढ़ा है। फिर इस प्रकार थककर महासागरमें कैसे गिर पड़ा? ' ॥ ६२ ॥
प्रत्युवाच ततः काकः सीदमान इदं वचः ।
उपरिष्टं तदा हंसमभिवीक्ष्य प्रसादयन् ॥ ६३ ॥
तब जलमें अत्यन्त कष्ट पाते हुए कौएने जलके ऊपर ठहरे हुए हंसकी ओर देखकर उसे प्रसन्न करनेके लिये कहा ॥ ६३ ॥
काक उवाच
उच्छिष्टदर्पितो हंस मन्येऽऽत्मानं सुपर्णवत् ।
अवमन्य बहूंश्चाहं काकानन्यांश्च पक्षिणः ॥ ६४ ॥
कौआ बोला- भाई हंस! मैं जूठन खा- खाकर घमंडमें भर गया था औरबहुत-से कौओं तथा दूसरे पक्षियोंका तिरस्कार करके अपने - आपको गरुड़के समान शक्तिशाली समझने लगा था ॥ ६४ ॥
प्राणैर्हंस प्रपद्ये त्वां द्वीपान्तं प्रापयस्व माम् ।
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यद्यहं स्वस्तिमान् हंस स्वं देशं प्राप्नुयां प्रभो ॥ ६५ ॥
न कंचिदवमन्येऽहमापदो मां समुद्धर । हंस! अब मैं अपने प्राणोंके साथ तुम्हारी शरणमें आया हूँ । तुम मुझे द्वीपके पास पहुँचा दो । शक्तिशाली हंस! यदि मैं कुशलपूर्वक अपने देशमें पहुँच जाऊँ तो अब कभी
किसीका अपमान नहीं करूँगा । तुम इस विपत्तिसे मेरा उद्धार करो ॥ ६५३ ॥
तमेवं वादिनं दीनं विलपन्तमचेतनम् ॥ ६६ ॥
काक काकेति वाशन्तं निमज्जन्तं महार्णवे ।
कृपयाऽऽदाय हंसस्तं जलक्लिन्नं सुदुर्दृशम् ॥ ६७ ॥
पद्भ्यामुत्क्षिप्य वेगेन पृष्ठमारोपयच्छनैः । कर्ण! इस प्रकार कहकर कौआ अचेत - सा होकर दीनभावसे विलाप करने और काँव-काँव करते हुए महासागरके जलमें डूबने लगा । उस समय उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था । वह पानीसे भीग गया था। हंसने कृपापूर्वक उसे पंजोंसे उठाकर बड़े वेगसे ऊपरको उछाला और धीरेसे अपनी पीठपर चढ़ा लिया ॥ ६६-६७३ ॥ आरोप्य पृष्ठं हंसस्तं काकं तूर्णं विचेतनम् ॥ ६८ ॥
आजगाम पुनद्वपं स्पर्धया पेततुर्यतः । अचेत हुए कौएको पीठपर बिठाकर हंस तुरंत ही फिर उसी द्वीपमें आ पहुँचा, जहाँसे होड़ लगाकर दोनों उड़े थे ॥ ६८ ॥
संस्थाप्य तं चापि पुनः समाश्वास्य च खेचरम् ॥ ६ ९ ॥ गतो यथेप्सितं देशं हंसो मन इवाशुगः । उस कौएको उसके स्थानपर रखकर उसे आश्वासन दे मनके समान शीघ्रगामी हंस पुनः अपने अभीष्ट देशको चला गया ॥ ६ ९ ३ ॥ एवमुच्छिष्टपुष्टः स काको हंसपराजितः ॥ ७० ॥
बलवीर्यमदं कर्ण त्यक्त्वा क्षान्तिमुपागतः । कर्ण! इस प्रकार जूठन खाकर पुष्ट हुआ कौआ उस हंससे पराजित हो अपने महान् बल - पराक्रमका घमंड छोड़कर शान्त हो गया ॥ ७० ॥
उच्छिष्टभोजनः काको यथा वैश्यकुले पुरा ॥ ७१ ॥
एवं त्वमुच्छिष्टभृतो धार्तराष्ट्रैर्न संशयः ।
सदृशान् श्रेयसश्चापि सर्वान् कर्णावमन्यसे ॥ ७२ ॥
पूर्वकालमें वह कौआ जैसे वैश्यकुलमें सबकी जूठन खाकर पला था, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके पुत्रोंने तुम्हें जूठन खिला-खिलाकर पाला है, इसमें संशय नहीं है । कर्ण! इसीसे तुम अपने समान तथा अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंका भी अपमान करते हो ॥ ७१-७२ ॥ द्रोणद्रौणिकृपैर्गुप्तो भीष्मेणान्यैश्च कौरवैः ।
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विराटनगरे पार्थमेकं किं नावधीस्तदा ॥ ७३ ॥
विराटनगरमें तो द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, भीष्म तथा अन्य कौरव वीर भी तुम्हारी रक्षा कर रहे थे । फिर उस समय तुमने अकेले सामने आये हुए अर्जुनका वध क्यों नहीं कर डाला? ॥ ७३ ॥
यत्र व्यस्ताः समस्ताश्च निर्जिताः स्थ किरीटिना ।
शृगाला इव सिंहेन क्व ते वीर्यमभूत् तदा ॥ ७४ ॥
वहाँ तो किरीटधारी अर्जुनने अलग- अलग और सब लोगोंसे एक साथ लड़कर भी तुमलोगोंको उसी प्रकार परास्त कर दिया था, जैसे एक ही सिंहने बहुत - से सियारोंको मार भगाया हो । कर्ण! उस समय तुम्हारा पराक्रम कहाँ था? ॥ ७४ ॥
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा समरे सव्यसाचिना ।
पश्यतां कुरुवीराणां प्रथमं त्वं पलायितः ॥ ७५ ॥
सव्यसाची अर्जुनके द्वारा समरांगणमें अपने भाईको मारा गया देखकर कौरव वीरोंके समक्ष सबसे पहले तुम्हीं भागे थे ॥ ७५ ॥
तथा द्वैतवने कर्ण गन्धर्वैः समभिद्रुतः ।
कुरून् समग्रानुत्सृज्य प्रथमं त्वं पलायितः ॥ ७६ ॥
कर्ण! इसी प्रकार जब द्वैतवनमें ग्रन्धर्वोंने आक्रमण किया था, उस समय समस्त कौरवोंको छोड़कर पहले तुमने ही पीठ दिखायी थी ॥ ७६ ॥
हत्वा जित्वा च गन्धर्वांश्चित्रसेनमुखान् रणे ।
कर्ण दुर्योधनं पार्थः सभार्यं सममोक्षयत् ॥ ७७ ॥
कर्ण! वहाँ कुन्तीकुमार अर्जुनने ही रणभूमिमें चित्रसेन आदि गन्धर्वोंको मार- पीटकर उनपर विजय पायी थी और स्त्रियोंसहित दुर्योधनको उनकी कैदसे छुड़ाया था ॥
पुनः प्रभावः पार्थस्य पौराणः केशवस्य च ।
कथितः कर्ण रामेण सभायां राजसंसदि ॥ ७८ ॥
कर्ण! पुनः तुम्हारे गुरु परशुरामजीने भी उस दिन राजसभामें अर्जुन और श्रीकृष्णके पुरातन प्रभावका वर्णन किया था ॥ ७८ ॥
सततं च त्वमश्रौषीर्वचनं द्रोणभीष्मयोः ।
अवध्यौ वदतः कृष्णौ संनिधौ च महीक्षिताम् ॥ ७९ ॥
तुमने समस्त भूपालोंके समीप द्रोणाचार्य और भीष्मकी कही हुई बातें सदा सुनी हैं । वे दोनों श्रीकृष्ण और अर्जुनको अवध्य बताया करते थे ॥ ७९ ॥
कियत् तत् तत् प्रवक्ष्यामि येन येन धनंजयः ।
त्वत्तोऽतिरिक्तः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ब्राह्मणो यथा ॥ ८० ॥
मैं कहाँतक गिन- गिनकर बताऊँ कि किन-किन गुणोंके कारण अर्जुन तुमसे बढ़े - चढ़े हैं । जैसे ब्राह्मण समस्त प्राणियोंसे श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार अर्जुन तुमसे श्रेष्ठ हैं ॥ ८० ॥
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इदानीमेव द्रष्टासि प्रधाने स्यन्दने स्थितौ ।
पुत्रं च वसुदेवस्य कुन्तीपुत्रं च पाण्डवम् ॥ ८१ ॥
तुम इसी समय प्रधान रथपर बैठे हुए वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण तथा कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र अर्जुनको देखोगे ॥ ८१ ॥
यथाश्रयत चक्राङ्गं वायसो बुद्धिमास्थितः ।
तथाश्रयस्व वार्ष्णेयं पाण्डवं च धनंजयम् ॥ ८२ ॥
जैसे कौआ उत्तम बुद्धिका आश्रय लेकर चक्रांगकी शरणमें गया था, उसी प्रकार तुम भी वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनकी शरण लो ॥ ८२ ॥
यदा त्वं युधि विक्रान्तौ वासुदेवधनंजयौ ।
द्रष्टास्येकरथे कर्ण तदा नैवं वदिष्यसि ॥ ८३ ॥
कर्ण! जब तुम युद्धस्थलमें पराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुनको एक रथपर बैठे देखोगे, तब ऐसी बातें नहीं बोल सकोगे ॥ ८३ ॥
यदा शरशतैः पार्थो दर्पं तव वधिष्यति ।
तदा त्वमन्तरं द्रष्टा आत्मनश्चार्जुनस्य च ॥ ८४ ॥
जब अर्जुन अपने सैकड़ों बाणोंद्वारा तुम्हारा घमंड चूर- चूर कर देंगे, तब तुम स्वयं ही देख लोगे कि तुममें और अर्जुनमें कितना अन्तर है? ॥ ८४ ॥
देवासुरमनुष्येषु प्रख्यातौ यौ नरोत्तमौ ।
तौ मावमंस्था मौर्य्यात् त्वं खद्योत इव रोचनौ ॥ ८५ ॥
जैसे जुगनू प्रकाशमान सूर्य और चन्द्रमाका तिरस्कार करे, उसी प्रकार तुम देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें भी विख्यात उन दोनों नरश्रेष्ठ वीर श्रीकृष्ण और अर्जुनका मूर्खतावश अपमान न करो ॥ ८५ ॥
सूर्याचन्द्रमसौ यद्वत् तद्वदर्जुनकेशवौ ।
प्रकाश्येनाभिविख्यातौ त्वं तु खद्योतवन्नृषु ॥ ८६ ॥
जैसे सूर्य और चन्द्रमा हैं, वैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं । वे दोनों अपने तेजसे सर्वत्र विख्यात हैं; परंतु तुम तो मनुष्योंमें जुगनूके ही समान हो ॥ ८६ ॥
एवं विद्वान् मावमंस्थाः सूतपुत्राच्युतार्जुनौ ।
नृसिंहौ तौ महात्मानौ जोषमास्स्व विकत्थने ॥ ८७ ॥
सूतपुत्र! तुम महात्मा पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुनको ऐसा जानकर उनका अपमान न करो । बढ़ - बढ़कर बातें बनाना बंद करके चुपचाप बैठे रहो ॥ ८७ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे हंसकाकीयोपाख्याने एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
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इसप्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण- शल्य- संवादके अन्तर्गत हंसकाकीयोपाख्यान- विषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ८८ श्लोक हैं) * महाडीनके सिवा, जो अन्य पचीस उड़ानें कही गयी हैं, उन सबका पृथक् - पृथक् एक-एक संपात ( पंख फड़फड़ानेकी क्रिया ) भी है, ये पचीस संपात जोड़नेसे एक सौ एक संख्याकी पूर्ति होती है ।
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द्विचत्वारिंशोऽध्यायः कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना संजय उवाच मद्राधिपस्याधिरथिर्महात्मा वो निशम्याप्रियमप्रतीतः । उवाच शल्यं विदितं ममैतद् यथाविधावर्जुनवासुदेवी ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! मद्रराज शल्यकी ये अप्रिय बातें सुनकर महामनस्वी अधिरथपुत्र कर्णने असंतुष्ट होकर उनसे कहा – ' शल्य! अर्जुन और श्रीकृष्ण कैसे हैं, यह बात मुझे अच्छी तरह ज्ञात है ॥ १ ॥
शौरे रथं वाहयतोऽर्जुनस्य बलं महास्त्राणि च पाण्डवस्य । अहं विजानामि यथावदद्य परोक्षभूतं तव तत् तु शल्य ॥ २ ॥
' मद्रराज! अर्जुनका रथ हाँकनेवाले श्रीकृष्णके बल और पाण्डुपुत्र अर्जुनके महान्
दिव्यास्त्रोंको इस समय मैं भलीभाँति जानता हूँ। तुम स्वयं उनसे अपरिचित हो ॥ २ ॥
तौ चाप्यहं शस्त्रभृतां वरिष्ठौ
व्यपेतभीर्योधयिष्यामि कृष्णौ ।
संतापयत्यभ्यधिकं नु रामा- च्छापोऽद्य मां ब्राह्मणसत्तमाच्च ॥ ३ ॥
‘ वे दोनों कृष्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तो भी मैं उनके साथ निर्भय होकर युद्ध करूँगा । परंतु परशुरामजीसे तथा एक ब्राह्मणशिरोमणिसे मुझे जो शाप प्राप्त हुआ है, वह आज मुझे अधिक संताप दे रहा है ॥ ३ ॥
अवसं वै ब्राह्मणच्छद्मनाहं रामे पुरा दिव्यमस्त्रं चिकीर्षुः । तत्रापि मे देवराजेन विघ्नो हितार्थिना फाल्गुनस्यैव शल्य ॥ ४ ॥
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कृतो विभेदेन ममोरुमेत्य प्रविश्य कीटस्य तनुं विरूपाम् । ममोरुमेत्य प्रबिभेद कीटः गुरौ तत्र शिरो निधाय ॥ ५ ॥
' पूर्वकालकी बात है, मैं दिव्य अस्त्रोंको प्राप्त करनेकी इच्छासे ब्राह्मणका वेष बनाकर परशुरामजीके पास रहता था । शल्य! वहाँ भी अर्जुनका ही हित चाहनेवाले देवराज इन्द्रने मेरे कार्यमें विघ्न उपस्थित कर दिया था । एक दिन गुरुदेव मेरी जाँघपर अपना मस्तक रखकर सो गये थे । उस समय इन्द्रने एक कीड़ेके भयंकर शरीरमें प्रवेश करके मेरी जाँघके पास आकर उसे काट लिया, काटकर उसमें भारी घाव कर दिया और इस कार्यके द्वारा इन्होंने मेरे मनोरथमें विघ्न डाल दिया ॥ ४-५ ॥ ऊरुप्रभेदाच्च महान् बभूव शरीरतो मे घनशोणितौघः । गुरोर्भयाच्चापि न चेलिवानहं ततो विबुद्धो ददृशे स विप्रः ॥ ६ ॥
‘ जाँघमें घाव हो जानेके कारण मेरे शरीरसे गाढ़े रक्तका महान् प्रवाह बह चला; परंतु गुरुके जागनेके भयसे मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ । तत्पश्चात् जब गुरुजी जागे, तब उन्होंने यह सब कुछ देखा ॥ ६ ॥
स धैर्ययुक्तं प्रसमीक्ष्य मां वै
न त्वं विप्रः कोऽसि सत्यं वदेति ।
तस्मै तदाऽऽत्मानमहं यथाव- दाख्यातवान् सूत इत्येव शल्य ॥ ७ ॥
‘ शल्य! उन्होंने मुझे ऐसे धैर्यसे युक्त देखकर पूछा — ' अरे! तू ब्राह्मण तो है नहीं; फिर कौन है? सच - सच बता दे । ' तब मैंने उनसे अपना यथार्थ परिचय देते हुए इस प्रकार कहा -' भगवन्! मैं सूत हूँ' ॥ ७ ॥
स मां निशम्याथ महातपस्वी संशप्तवान् रोषपरीतचेताः । सूतोपधावाप्तमिदं तवास्त्रं न कर्मकाले प्रतिभास्यति त्वाम् ॥ ८ ॥
‘ तदनन्तर मेरा वृत्तान्त सुनकर महातपस्वी परशुरामजीके मनमें मेरे प्रति अत्यन्त रोष भर गया और उन्होंने मुझे शाप देते हुए कहा -' सूत! तूने छल करके यह ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया है । इसलिये काम पड़नेपर तेरा यह अस्त्र तुझे याद न आयेगा ॥ ८ ॥
अन्यत्र तस्मात् तव मृत्युकाला- ब्राह्मणे ब्रह्म न हि ध्रुवं स्यात् ।
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तदद्य पर्याप्तमतीव चास्त्र- मस्मिन् संग्रामे तुमुलेऽतीव भीमे ॥ ९ ॥
‘ तेरी मृत्युके समयको छोड़कर अन्य अवसरोंपर ही यह अस्त्र तेरे काम आ सकता है; क्योंकि ब्राह्मणेतर मनुष्यमें यह ब्रह्मास्त्र सदा स्थिर नहीं रह सकता । ' वह अस्त्र आज इस अत्यन्त भयंकर तुमुल संग्राममें पर्याप्त काम दे सकता है ॥ ९ ॥
योऽयं शल्य भरतेषूपपन्नः प्रकर्षणः सर्वहरोऽतिभीमः । सोऽभिमन्ये क्षत्रियाणां प्रवीरान् प्रतापिता बलवान् वै विमर्दः ॥ १० ॥
‘ शल्य! वीरोंको आकृष्ट करनेवाला, सर्वसंहारक और अत्यन्त भयंकर जो यह प्रबल संग्राम भरतवंशी क्षत्रियोंपर आ पड़ा है, वह क्षत्रिय जातिके प्रधान- प्रधान वीरोंको निश्चय ही संतप्त करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १० ॥
शल्योग्रधन्वानमहं वरिष्ठं तरस्विनं भीममसह्यवीर्यम् । सत्यप्रतिज्ञं युधि पाण्डवेयं धनंजयं मृत्युमुखं नयिष्ये ॥ ११ ॥
' शल्य! आज मैं युद्धमें भयंकर धनुष धारण करनेवाले सर्वश्रेष्ठ, वेगवान्, भयंकर, असह्यपराक्रमी और सत्यप्रतिज्ञ पाण्डुपुत्र अर्जुनको मौतके मुखमें भेज दूँगा ॥ ११ ॥
अस्त्रं ततोऽन्यत् प्रतिपन्नमद्य येन क्षेप्स्ये समरे शत्रुपूगान् । प्रतापिनं बलवन्तं कृतास्त्रं तमुग्रधन्वानममितौजसं च ॥ १२ ॥
क्रूरं शूरं रौद्रममित्रसाहं धनंजयं संयुगेऽहं हनिष्ये । ‘उस ब्रह्मास्त्रसे भिन्न एक दूसरा अस्त्र भी मुझे प्राप्त है, जिससे आज समरांगणमें मैं शत्रुसमूहोंको मार भगाऊँगा तथा उन भयंकर धनुर्धर, अमिततेजस्वी, प्रतापी, बलवान्, अस्त्रवेत्ता, क्रूर, शूर, रौद्ररूपधारी तथा शत्रुओंका वेग सहन करनेमें समर्थ अर्जुनको भी युद्धमें मार डालूँगा ॥ १२३ ॥
अपां पतिर्वेगवानप्रमेयो निमज्जयिष्यन् बहुलाः प्रजाश्च ॥ १३ ॥
महावेगं संकुरुते समुद्रो वेला चैनं धारयत्यप्रमेयम् ।
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‘ जलका स्वामी, वेगवान् और अप्रमेय समुद्र बहुत लोगोंको निमग्न कर देनेके लिये अपना महान् वेग प्रकट करता है; परंतु तटकी भूमि उस अनन्त महासागरको भी रोक लेती है ॥ १३३ ॥
प्रमुञ्चन्तं बाणसंघानमेयान् मर्मच्छिदो वीरहणः सुपत्रान् ॥ १४ ॥
कुन्तीपुत्रं यत्र योत्स्यामि युद्धे ज्यां कर्षतमुत्तममद्य लोके । ' उसी प्रकार मैं भी मर्मस्थलको विदीर्ण कर देनेवाले, सुन्दर पंखोंसे युक्त, असंख्य, वीरविनाशक बाण - समूहोंका प्रयोग करनेवाले उन कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ रणभूमिमें युद्ध करूँगा, जो इस जगत्के भीतर प्रत्यंचा खींचनेवाले वीरोंमें सबसे उत्तम हैं ॥ १४३ ॥
एवं बलेनातिबलं महास्त्रं समुद्रकल्पं सुदुरापमुग्रम् ॥ १५ ॥
शरौघिणं पार्थिवान् मज्जयन्तं वेलेव पार्थमिषुभिः संसहिष्ये । ' कुन्तीकुमार अर्जुन अत्यन्त बलशाली, महान् अस्त्रधारी, समुद्रके समान दुर्लङ्घ्य, भयंकर, बाणसमूहोंकी धारा बहानेवाले और बहुसंख्यक भूपालोंको डुबो देनेवाले हैं; तथापि मैं समुद्रको रोकनेवाली तटभूमिके समान अपने बाणोंद्वारा अर्जुनको बलपूर्वक रोकूँगा और उनका वेग सहन करूँगा ॥ १५ ॥
अद्याहवे यस्य न तुल्यमन्यं मन्ये मनुष्यं धनुराददानम् ॥ १६ ॥
सुरासुरान् युधि वै यो जयेत तेनाद्य मे पश्य युद्धं सुघोरम् । ' आज मैं युद्धमें जिनके समान इस समय किसी दूसरे मनुष्यको नहीं मानता, जो हाथमें धनुष लेकर रणभूमिमें देवताओं और असुरोंको भी परास्त कर सकते हैं, उन्हीं वीर अर्जुनके साथ आज मेरा अत्यन्त घोर युद्ध होगा; उसे तुम देखना ॥ १६३ ॥
अतीव मानी पाण्डवो युद्धकामो ह्यमानुषैरेष्यति मे महास्त्रैः ॥ १७ ॥
तस्यास्त्रमस्त्रैः प्रतिहत्य संख्ये बाणोत्तमैः पातयिष्यामि पार्थम् । ‘ अत्यन्त मानी पाण्डुपुत्र अर्जुन युद्धकी इच्छासे महान् दिव्यास्त्रोंद्वारा मेरे सामने आयेंगे । उस समय मैं अपने अस्त्रोंद्वारा उनके अस्त्रका निवारण करके युद्धस्थलमें उत्तम बाणोंसे कुन्तीकुमार अर्जुनको मार गिराऊँगा ॥ १७३ ॥
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सहस्ररश्मिप्रतिमं ज्वलन्तं दिशश्च सर्वाः प्रतपन्तमुग्रम् ॥ १८ ॥
तमोनुदं मेघ इवातिमात्रं धनंजयं छादयिष्यामि बाणैः । ‘ सहस्रों किरणोंवाले सूर्यके सदृश प्रकाशित हो सम्पूर्ण दिशाओंको ताप देते हुए भयंकर वीर अर्जुनको मैं अपने बाणोंद्वारा उसी प्रकार अत्यन्त आच्छादित कर दूँगा, जैसे मेघ अन्धकारनाशक सूर्यदेवको ढक देता है ॥ वैश्वानरं धूमशिखं ज्वलन्तं तेजस्विनं लोकमिदं दहन्तम् ॥ १ ९ ॥ पर्जन्यभूतः शरवर्षैर्यथाग्निं तथा पार्थं शमयिष्यामि युद्धे । ‘ जैसे प्रलयकालका मेघ इस जगत्को दग्ध करनेवाले तेजस्वी एवं प्रज्वलित धूममयी शिखावाले संवर्तक अग्निको बुझा देता है, उसी प्रकार मैं मेघ बनकर बाणोंकी वर्षाद्वारा युद्धमें अग्निरूपी अर्जुनको शान्त कर दूँगा ॥ १ ९ ३ ॥ आशीविषं दुर्धरमप्रमेयं सुतीक्ष्णदंष्ट्रं ज्वलनप्रभावम् ॥ २० ॥
क्रोधप्रदीप्तं त्वहितं महान्तं कुन्तीपुत्रं शमयिष्यामि भल्लैः । ' तीखे दाढ़ोंवाले विषधर सर्पके समान दुर्धर्ष, अप्रमेय, अग्निके समान प्रभावशाली तथा क्रोधसे प्रज्वलित अपने महान् शत्रु कुन्तीपुत्र अर्जुनको मैं भल्लोंद्वारा शान्त कर दूँगा ॥ २०६३ ॥
प्रमाथिनं बलवन्तं प्रहारिणं प्रभञ्जनं मातरिश्वानमुग्रम् ॥ २१ ॥
युद्धे सहिष्ये हिमवानिवाचलो धनंजयं क्रुद्धममृष्यमाणम् । ' वृक्षोंको तोड़- उखाड़ देनेवाली प्रचण्ड वायुके समान प्रमथनशील, बलवान्, प्रहारकुशल, तोड़ - फोड़ करनेवाले तथा अमर्षशील क्रुद्ध अर्जुनका वेग आज मैं युद्धस्थलमें हिमालय पर्वतके समान अचल रहकर सहन करूँगा ॥ २१ ॥
विशारदं रथमार्गेषु शक्तं धुर्यं नित्यं समरेषु प्रवीरम् ॥ २२ ॥
लोके वरं सर्वधनुर्धराणां धनंजयं संयुगे संसहिष्ये ।