04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 191–200
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200
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द्रोणचापविमुक्तेन शरौघेणाशुहारिणा ।
सिन्धोरिव महौघेन ह्रियमाणान् यथा प्लवान् ॥ ८ ॥
कौरवाः सिंहनादेन नानावाद्यस्वनेन च ।
रथद्विपनरांश्चैव सर्वतः समवारयन् ॥ ९ ॥
संजयने कहा — महाराज! कौरवोंने देखा कि पांचाल, पाण्डव, मत्स्य, संजय, चेदि और केकय- देशीय योद्धा युद्धमें द्रोणाचार्यके बाणोंसे पीड़ित हो विचलित हो उठे हैं तथा जैसे समुद्रकी महान् जलराशि बहुत -से नावोंको बहा ले जाती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटकर शीघ्र ही प्राण हर लेनेवाले बाण-समुदायने पाण्डव - सैनिकोंको मार भगाया है । तब वे सिंहनाद एवं नाना प्रकारके रण- वाद्योंका गम्भीर घोष करते हुए शत्रुओंके रथारोहियों, हाथीसवारों तथा पैदल सैनिकोंको सब ओरसे रोकने लगे ॥ ७ – ९ ॥
तान् पश्यन् सैन्यमध्यस्थो राजा स्वजनसंवृतः ।
दुर्योधनोऽब्रवीत् कर्णं प्रहृष्टः प्रहसन्निव ॥ १० ॥
सेनाके बीचमें खड़े हो स्वजनोंसे घिरे हुए राजा दुर्योधनने पाण्डव- सैनिकोंकी ओर देखते हुए अत्यन्त प्रसन्न होकर कर्णसे हँसते हुए- से कहा ॥ १० ॥
दुर्योधन उवाच
पश्य राधेय पञ्चालान् प्रणुन्नान् द्रोणसायकैः ।
सिंहेनेव मृगान् वन्यांस्त्रासितान् दृढधन्वना ॥ ११ ॥
दुर्योधन बोला - राधानन्दन! देखो, सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले द्रोणाचार्यके बाणोंसे ये पांचाल सैनिक उसी प्रकार पीड़ित हो रहे हैं, जैसे सिंह वनवासी मृगोंको त्रस्त कर देता है ॥ ११ ॥
नैते जातु पुनर्युद्धमीहेयुरिति मे मतिः ।
यथा तु भग्ना द्रोणेन वातेनेव महाद्रुमाः ॥ १२ ॥
मेरा तो ऐसा विश्वास है कि ये फिर कभी युद्धकी इच्छा नहीं करेंगे । जैसे वायु बड़े - बड़े वृक्षोंको उखाड़ देती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने युद्धसे इनके पाँव उखाड़ दिये हैं ॥ १२ ॥
अर्धमानाः शरैरेते रुक्मपुङ्खैर्महात्मना ।
पथा नैकेन गच्छन्ति घूर्णमानास्ततस्ततः ॥ १३ ॥
महामना द्रोणके सुवर्णमय पंखयुक्त बाणोंद्वारा पीड़ित होकर ये इधर- उधर चक्कर काटते हुए एक ही मार्गसे नहीं भाग रहे हैं ॥ १३ ॥
संनिरुद्धाश्च कौरव्यैर्द्रोणेन च महात्मना ।
एतेऽन्ये मण्डलीभूताः पावकेनेव कुञ्जराः ॥ १४ ॥
कौरव- सैनिकों तथा महामना द्रोणने इनकी गति रोक दी है । जैसे दावानलसे हाथी घिर जाते हैं, उसी प्रकार ये तथा अन्य पाण्डव - योद्धा कौरवोंसे घिर गये हैं ॥ १४ ॥
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भ्रमरैरिव चाविष्टा द्रोणस्य निशितैः शरैः ।
अन्योन्यं समलीयन्त पलायनपरायणाः ॥ १५ ॥
भ्रमरोंके समान द्रोणके पैने बाणोंसे घायल होकर ये रणभूमिसे पलायन करते हुए एक- दूसरेकी आडमें छिप रहे हैं ॥ १५ ॥
एष भीमो महाक्रोधी हीनः पाण्डवसृञ्जयैः ।
मदीयैरावृतो योधैः कर्ण नन्दयतीव माम् ॥ १६ ॥
यह महाक्रोधी भीमसेन पाण्डव तथा सृजयोंसे रहित हो मेरे योद्धाओंसे घिर गया है ।
कर्ण! इस अवस्थामें भीमसेन मुझे आनन्दित-सा कर रहा है ॥ १६ ॥
व्यक्तं द्रोणमयं लोकमद्य पश्यति दुर्मतिः ।
निराशो जीवितान्नूनमद्य राज्याच्च पाण्डवः ॥ १७ ॥
निश्चय ही आज जीवन और राज्यसे निराश हो यह दुर्बुद्धि पाण्डुकुमार सारे संसारको द्रोणमय ही देख रहा होगा ॥ १७ ॥
कर्णउवाच
नैष जातु महाबाहुर्जीवन्नाहवमुत्सृजेत् ।
न चेमान् पुरुषव्याघ्र सिंहनादान् सहिष्यति ॥ १८ ॥
कर्ण बोला— राजन्! यह महाबाहु भीमसेन जीतेजी कभी युद्ध नहीं छोड़ सकता है । पुरुषसिंह! तुम्हारे सैनिक जो ये सिंहनाद कर रहे हैं, इन्हें भीमसेन कभी नहीं सहेगा ॥ १८ ॥
न चापि पाण्डवा युद्धे भज्येरन्निति मे मतिः ।
शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥ १ ९ ॥
पाण्डव शूरवीर, बलवान्, अस्त्र-विद्यामें निपुण तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले हैं ।
ये रणभूमिसे कभी भाग नहीं सकते हैं । मेरा यही विश्वास है ॥ १ ९ ॥
विषाग्निद्यूतसंक्लेशान् वनवासं च पाण्डवाः ।
स्मरमाणा न हास्यन्ति संग्राममिति मे मतिः ॥ २० ॥
मैं ऐसा मानता हूँ कि पाण्डव तुम्हारे द्वारा दिये हुए विष, अग्निदाह और द्यूतके क्लेशों तथा वनवासको याद करके कभी युद्धभूमि नहीं छोड़ेंगे ॥ २० ॥
निवृत्तो हि महाबाहुरमितौजा वृकोदरः ।
वरान् वरान् हि कौन्तेयो रथोदारान् हनिष्यति ॥ २१ ॥
अमिततेजस्वी महाबाहु कुन्तीपुत्र वृकोदर इधरकी ओर लौटे हैं । वे बड़े - बड़े उदार महारथियोंको चुन - चुनकर मारेंगे ॥ २१ ॥
असिना धनुषा शक्त्या हयैर्नागैर्नरै रथैः ।
आयसेन च दण्डेन व्रातान् व्रातान् हनिष्यति ॥ २२ ॥
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वे खड्ग, धनुष, शक्ति, घोड़े, हाथी, मनुष्य एवं रथोंद्वारा और लोहेके डंडेसे समूह--के-समूह सैनिकोंका संहार कर डालेंगे ॥ २२ ॥
तमेनमनुवर्तन्ते सात्यकिप्रमुखा रथाः ।
पञ्चालाः केकया मत्स्याः पाण्डवाश्च विशेषतः ॥ २३ ॥
देखो, भीमसेनके पीछे सात्यकि आदि महारथी तथा पांचाल, केकय, मत्स्य और विशेषतः पाण्डव योद्धा भी आ रहे हैं ॥ २३ ॥
शूराश्च बलवन्तश्च विक्रान्ताश्च महारथाः ।
विनिघ्नन्तश्च भीमेन संरब्धेनाभिचोदिताः ॥ २४ ॥
क्रोधमें भरे हुए भीमसेनसे प्रेरित हो वे शूरवीर, बलवान् पराक्रमी महारथी सैनिक हमारे सैनिकोंको मारते आ रहे हैं ॥ २४ ॥
ते द्रोणमभिवर्तन्ते सर्वतः कुरुपुङ्गवाः ।
वृकोदरं परीप्सन्तः सूर्यमभ्रगणा इव ॥ २५ ॥
वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डव भीमसेनकी रक्षाके लिये द्रोणाचार्यको सब ओरसे उसी प्रकार घेर रहे हैं, जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं ॥ २५ ॥
( समरेषु तु निर्दिष्टाः पाण्डवाः कृष्णबान्धवाः ।
ह्रीमन्तः शत्रुमरणे निपुणाः पुण्यलक्षणाः ॥
बहवः पार्थिवा राजंस्तेषां वशगता रणे । मावमंस्थाः पाण्डवांस्त्वं नारायणपुरोगमान् ॥ ) राजन्! पाण्डवोंके सहायक बन्धु श्रीकृष्ण हैं । वे उन्हें युद्धविषयक कर्तव्यका निर्देश किया करते हैं । वे लज्जाशील, शत्रुओंको मारनेकी कलामें निपुण तथा पवित्र लक्षणोंसे युक्त हैं । रणभूमिमें बहुत - से भूपाल उनके वशमें आ चुके हैं । अतः भगवान् नारायण जिनके अगुआ हैं, उन पाण्डवोंकी तुम अवहेलना न करो ।
एकायनगता ह्येते पीडयेयुर्यतव्रतम् ।
अरक्ष्यमाणं शलभा यथा दीपं मुमूर्षवः ॥ २६ ॥
ये सब एक रास्तेपर चल रहे हैं । यदि व्रत और नियमका पालन करनेवाले द्रोणाचार्यकी रक्षा न की गयी तो ये उन्हें उसी प्रकार पीड़ा देंगे, जैसे मरनेकी इच्छावाले पतंग दीपकको बुझा देनेकी चेष्टा करते हैं ॥ २६ ॥
असंशयं कृतास्त्राश्च पर्याप्ताश्चापि वारणे ।
अतिभारमहं मन्ये भारद्वाजे समाहितम् ॥ २७ ॥
इसमें संदेह नहीं कि वे पाण्डव योद्धा अस्त्र - विद्यामें निपुण तथा द्रोणाचार्यकी गतिको रोकनेमें समर्थ हैं । मुझे ऐसा जान पड़ता है कि इस समय भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यपर बहुत बड़ा भार आ पहुँचा है ॥ २७ ॥
शीघ्रमनुगमिष्यामो यत्र द्रोणो व्यवस्थितः ।
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कोका इव महानागं मा वै हन्युर्यतव्रतम् ॥ २८ ॥
अतः हमलोग शीघ्र वहीं चलें, जहाँ द्रोणाचार्य खड़े हैं । कहीं ऐसा न हो कि कुछ भेड़िये ( जैसे पाण्डव - सैनिक ) महान् गजराज - जैसे व्रतधारी द्रोणाचार्यका वध कर डालें ॥ २८ ॥
संजय उवाच
राधेयस्य वचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्ततः ।
भ्रातृभिः सहितो राजन् प्रायाद् द्रोणरथं प्रति ॥ २ ९ ॥
संजय कहते हैं — महाराज! राधानन्दन कर्णकी बात सुनकर राजा दुर्योधन अपने भाइयोंके साथ द्रोणाचार्यके रथकी ओर चल दिया ॥ २ ९ ॥
तत्रारावो महानासीदेकं द्रोणं जिघांसताम् ।
पाण्डवानां निवृत्तानां नानावर्णैर्हयोत्तमैः ॥ ३० ॥
वहाँ अनेक प्रकारके रंगवाले उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए रथोंद्वारा एकमात्र द्रोणाचार्यको मार डालनेकी इच्छासे लौटे हुए पाण्डव-सैनिकोंका महान् कोलाहल प्रकट हो रहा था ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि द्रोणयुद्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ || इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें द्रोणाचार्यका युद्धविषयक बाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं । )
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त्रयोविंशोऽध्यायः पाण्डव सेनाके महारथियोंके रथ, घोड़े, ध्वज तथा धनुषोंका विवरण धृतराष्ट्रउवाच
सर्वेषामेव मे ब्रूहि रथचिह्नानि संजय ।
ये द्रोणमभ्यवर्तन्त क्रुद्धा भीमपुरोगमाः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा – संजय! क्रोधमें भरे हुए भीमसेन आदि जो योद्धा द्रोणाचार्यपर चढ़ाई कर रहे थे, उन सबके रथोंके ( घोड़े - ध्वजा आदि ) चिह्न कैसे थे? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥
संजय उवाच
ऋक्षवर्णैर्हयैर्दृष्ट्वा व्यायच्छन्तं वृकोदरम् ।
रजताश्वस्ततः शूरः शैनेयः संन्यवर्तत ॥ २ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! रीछके समान रंगवाले घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर भीमसेनको आते देख चाँदीके समान श्वेत घोड़ोंवाले शूरवीर सात्यकि भी लौट पड़े ॥ २ ॥
सारङ्गाश्वो युधामन्युः स्वयं प्रत्वरयन् हयान् ।
पर्यवर्तत दुर्धर्षः क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ॥ ३ ॥
सारंगके समान ( सफेद, नीले और लाल) रंगके घोड़ोंसे युक्त युधामन्यु, स्वयं ही अपने घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक हाँकता हुआ द्रोणाचार्यके रथकी ओर लौट पड़ा । वह दुर्जय वीर क्रोधमें भरा हुआ था ॥ ३ ॥
पारावतसवर्णैस्तु हेमभाण्डैर्महाजवैः ।
पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युन्नो न्यवर्तत ॥ ४ ॥
पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न कबूतरके समान ( सफेद और नीले ) रंगवाले सुवर्णभूषित एवं अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंके द्वारा लौट आया ॥ ४ ॥
पितरं तु परिप्रेप्सुः क्षत्रधर्मा यतव्रतः ।
सिद्धिं चास्य परां काङ्क्षन् शोणाश्वः संन्यवर्तत ॥ ५ ॥
नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाला क्षत्रधर्मा अपने पिता धृष्टद्युम्नकी रक्षा और उनके अभीष्ट मनोरथकी उत्तम सिद्धि चाहता हुआ लाल रंगके घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ हो लौट आया ॥ ५ ॥
पद्मपत्रनिभांश्चाश्वान् मल्लिकाक्षान् स्वलंकृतान् ।
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शैखण्डिः क्षत्रदेवस्तु स्वयं प्रत्वरयन् ययौ ॥ ६ ॥
शिखण्डीका पुत्र क्षत्रदेव, कमलपत्रके समान रंग तथा निर्मल नेत्रोंवाले सजे - सजाये घोड़ोंको स्वयं ही शीघ्रतापूर्वक हाँकता हुआ वहाँ आया ॥ ६ ॥
दर्शनीयास्तु काम्बोजाः शुकपत्रपरिच्छदाः ।
वहन्तो नकुलं शीघ्रं तावकानभिदुद्रुवुः ॥ ७ ॥
तोतेकी पाँखके समान रोमवाले दर्शनीय काम्बोजदेशीय घोड़े नकुलको वहन करते हुए बड़ी शीघ्रताके साथ आपके सैनिकोंकी ओर दौड़े ॥ ७ ॥
कृष्णास्तु मेघसंकाशा अवहन्नुत्तमौजसम् ।
दुर्धर्षायाभिसंधाय क्रुद्धं युद्धाय भारत ॥ ८ ॥
भरतनन्दन! दुर्धर्ष युद्धका संकल्प लेकर क्रोधमें भरे हुए उत्तमौजाको मेघके समान श्यामवर्णवाले घोड़े युद्धस्थलकी ओर ले जा रहे थे ॥ ८ ॥
तथा तित्तिरिकल्माषा हया वातसमा जवे ।
अवहंस्तुमुले युद्धे सहदेवमुदायुधम् ॥ ९ ॥
इस प्रकार अस्त्र- शस्त्रोंसे सम्पन्न सहदेवको तीतरके समान चितकबरे रंगवाले तथा वायुके समान वेगशाली घोड़े उस भयंकर युद्धमें ले गये ॥ ९ ॥
दन्तवर्णास्तु राजानं कालवाला युधिष्ठिरम् ।
भीमवेगा नरव्याघ्रमवहन् वातरंहसः ॥ १० ॥
हाथीके दाँतके समान सफेद रंग, काली पूँछ तथा वायुके समान तीव्र एवं भयंकर वेगवाले घोड़े नरश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरको रणक्षेत्रमें ले गये ॥ १० ॥
हेमोत्तमप्रतिच्छन्नैर्हयैर्वातसमैर्जवे ।
अभ्यवर्तन्त सैन्यानि सर्वाण्येव युधिष्ठिरम् ॥ ११ ॥
सोनेके उत्तम आवरणोंसे ढके हुए, वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा सारी सेनाओंने महाराज युधिष्ठिरको सब ओरसे घेर रखा था ॥ ११ ॥
राज्ञस्त्वनन्तरो राजा पाञ्चाल्यो द्रुपदोऽभवत् ।
जातरूपमयच्छत्रः सर्वैस्तैरभिरक्षितः ॥ १२ ॥
राजा युधिष्ठिरके पीछे पांचालराज द्रुपद चल रहे थे । उनका छत्र सोनेका बना हुआ था । वे भी समस्त सैनिकोंद्वारा सुरक्षित थे ॥ १२ ॥
ललामैर्हरिभिर्युक्तः सर्वशब्दक्षमैर्युधि ।
राज्ञां मध्ये महेष्वासः शान्तभीरभ्यवर्तत ॥ १३ ॥
वे ‘ ललाम’3 और ‘ हरि' संज्ञावाले घोड़ोंसे, जो सब प्रकारके शब्दोंको सुनकर उन्हें सहन करनेमें समर्थ थे, सुशोभित हो रहे थे । उस युद्धस्थलमें
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समस्त राजाओंके मध्यभागमें महाधनुर्धर राजा द्रुपद निर्भय होकर द्रोणाचार्यका सामना करनेके लिये आये ॥ १३ ॥
तं विराटोऽन्वयाच्छीघ्रं सह सर्वैर्महारथैः ।
केकयाश्च शिखण्डी च धृष्टकेतुस्तथैव च ॥ १४ ॥
स्वैः स्वैः सैन्यैः परिवृता मत्स्यराजानमन्वयुः । द्रुपदके पीछे सम्पूर्ण महारथियोंके साथ राजा विराट शीघ्रतापूर्वक चल रहे थे । केकयराजकुमार, शिखण्डी तथा धृष्टकेतु —-ये अपनी -अपनी सेनाओंसे घिरकर मत्स्यराज विराटके पीछे चल रहे थे ॥ १४३ ॥
तं तु पाटलिपुष्पाणां समवर्णा हयोत्तमाः ॥ १५ ॥
वहमाना व्यराजन्त मत्स्यस्यामित्रघातिनः । शत्रुसूदन मत्स्यराज विराटके रथको जो वहन करते हुए शोभा पा रहे थे, वे उत्तम घोड़े पाडरके फूलोंके समान लाल और सफेद रंगवाले थे ॥ १५३ ॥
हरिद्रासमवर्णास्तु जवना हेममालिनः ॥ १६ ॥
पुत्रं विराटराजस्य सत्वरं समुदावहन् । हल्दीके समान पीले रंगवाले तथा सुवर्णमय माला धारण करनेवाले वेगशाली घोड़े विराटराजके पुत्रको शीघ्रतापूर्वक रणभूमिकी ओर ले जा रहे थे ॥ १६३ ॥
इन्द्रगोपकवर्णैश्च भ्रातरः पञ्च केकयाः ॥ १७ ॥
जातरूपसमाभासाः सर्वे लोहितकध्वजाः । पाँच भाई केकयराजकुमार इन्द्रगोप ( वीरबहूटी ) के समान रंगवाले घोड़ोंद्वारा रणभूमिमें लौट रहे थे । उन पाँचों भाइयोंकी कान्ति सुवर्णके समान थी तथा वे सब - के - सब लाल रंगकी ध्वजा - पताका धारण किये हुए थे ॥ १७३ || ते हेममालिनः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ १८ ॥
वर्षन्त इव जीमूताः प्रत्यदृश्यन्त दंशिताः । सुवर्णकी मालाओंसे विभूषित वे सभी युद्धविशारद शूरवीर मेघोंके समान बाण - वर्षा करते हुए कवच आदिसे सुसज्जित दिखायी देते थे ॥ १८३ ॥
आमपात्रनिकाशास्तु पांचाल्यममितौजसम् ॥ १ ९ ॥ दत्तास्तुम्बुरुणा दिव्याः शिखण्डिनमुदावहन् । अमित तेजस्वी पांचालराजकुमार शिखण्डीको तुम्बुरुके दिये हुए मिट्टीके कच्चे बर्तनके समान रंगवाले दिव्य अश्व वहन करते थे ॥ १ ९ ॥ तथा द्वादश साहस्राः पञ्चालानां महारथाः ॥ २० ॥
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तेषां तु षट् सहस्राणि ये शिखण्डिनमन्वयुः । पांचालोंके जो बारह हजार महारथी युद्धमें लड़ रहे थे, उनमेंसे छः हजार इस समय शिखण्डीके पीछे चलते थे ॥ २० ॥
पुत्रं तु शिशुपालस्य नरसिंहस्य मारिष ॥ २१ ॥
आक्रीडन्तो वहन्ति स्म सारङ्गशबला हयाः । आर्य! पुरुषसिंह शिशुपालके पुत्रके सारंगके समान चितकबरे अश्व खेल करते हुए - से वहन कर रहे थे ॥ २१३ ॥
धृष्टकेतुस्तु चेदीनामृषभोऽतिबलोदितः ॥ २२ ॥
काम्बोजैः शबलैरश्वैरभ्यवर्तत दुर्जयः । चेदिदेशका श्रेष्ठ राजा अत्यन्त बलवान् दुर्जय वीर धृष्टकेतु काम्बोजदेशीय चितकबरे घोड़ोंद्वारा युद्धभूमिकी ओर लौट रहा था ॥ २२३ ॥
बृहत्क्षत्रं तु कैकेयं सुकुमारं हयोत्तमाः ॥ २३ ॥
पलालधूमसंकाशाः सैन्धवाः शीघ्रमावहन् । केकयदेशके सुकुमार राजकुमार बृहत्क्षत्रको पुआलके धूएँके समान उज्ज्वल- नील वर्णवाले सिन्धुदेशीय अच्छी जातिके घोड़ोंने शीघ्रतापूर्वक रणभूमिमें पहुँचाया ॥ मल्लिकाक्षाः पद्मवर्णा बाह्लिजाताः स्वलंकृताः ॥ २४ ॥
शूरं शिखण्डिनः पुत्रमृक्षदेवमुदावहन् । शिखण्डीके शूरवीर पुत्र ऋक्षदेवको पद्मके समान वर्ण और निर्मल नेत्रवाले बाह्निक देशके सजे सजाये घोड़ोंने रणभूमिमें पहुँचाया ॥ २४ ॥
रुक्मभाण्डप्रतिच्छन्नाः कौशेयसदृशा हराः ॥ २५ ॥
क्षमावन्तोऽवहन् संख्ये सेनाबिन्दुमरिंदमम् । सोनेके आभूषणों तथा कवचोंसे सुशोभित रेशमके समान श्वेत- पीत रोमवाले सहनशील घोड़ोंने शत्रुओंका दमन करनेवाले सेनाबिन्दुको युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ २५ ॥
युवानमवहन् युद्धे क्रौञ्चवर्णा हयोत्तमाः ॥ २६ ॥
काश्यस्याभिभुवः पुत्रं सुकुमारं महारथम् । क्रौंचवर्णक उत्तम घोड़ोंने काशिराज अभिभूके सुकुमार एवं युवा पुत्रको, जो महारथी वीर था, युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ २६३ ॥
श्वेतास्तु प्रतिविन्ध्यं तं कृष्णग्रीवा मनोजवाः ।
यन्तुः प्रेष्यकरा राजन् राजपुत्रमुदावहन् ॥ २७ ॥
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राजन्! मनके समान वेगशाली तथा काली गर्दनवाले श्वेतवर्णके घोड़े, जो सारथिकी आज्ञा माननेवाले थे, राजकुमार प्रतिविन्ध्यको रणमें ले गये ॥ २७ ॥
सुतसोमं तु यः सौम्यं पार्थः पुत्रमजीजनत् ।
माषपुष्पसवर्णास्तमवहन् वाजिनो रणे ॥ २८ ॥
कुन्तीकुमार भीमसेनने जिस सौम्यरूपवाले पुत्र सुतसोमको जन्म दिया था, उसे उड़दके फूलकी भाँति सफेद और पीले रंगवाले घोड़ोंने रणक्षेत्रमें पहुँचाया ॥ सहस्रसोमप्रतिमो बभूव पुरे कुरूणामुदयेन्दुनाम्नि । तस्मिंजातः सोमसंक्रन्दमध्ये यस्मात् तस्मात् सुतसोमोऽभवत् सः ॥ २ ९ ॥ कौरवोंके उदयेन्दु नामक पुर ( इन्द्रप्रस्थ ) में सोमाभिषव ( सोमरस निकालने ) के दिन सहस्रों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमान् वह बालक उत्पन्न हुआ था, इसलिये उसका नाम सुतसोम रखा गया थ ॥ २ ९ ॥
नाकुलिं तु शतानीकं शालपुष्पनिभा हयाः ।
आदित्यतरुणप्रख्याः श्लाघनीयमुदावहन् ॥ ३० ॥
नकुलके स्पृहणीय पुत्र शतानीकको शालपुष्पके समान रक्त - पीतवर्णवाले और बालसूर्यके समान कान्तिमान् अश्व रणभूमिमें ले गये ॥ ३० ॥
काञ्चनापिहितैर्योक्त्रैर्मयूरग्रीवसंनिभाः ।
द्रौपदेयं नरव्याघ्रं श्रुतकर्माणमाहवे ॥ ३१ ॥
मोरकी गर्दनके समान नीले रंगवाले घोड़ोंने सुनहरी रस्सियोंसे आबद्ध हो द्रौपदीपुत्र सहदेवकुमार पुरुषसिंह श्रुतकर्माको युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥ ३१ ॥
श्रुतकीर्तिं श्रुतनिधिं द्रौपदेयं हयोत्तमाः ।
ऊहुः पार्थसमं युद्धे चाषपत्रनिभा हयाः ॥ ३२ ॥
इसी प्रकार युद्धमें अर्जुनकी समानता करनेवाले, शास्त्रज्ञानके भण्डार द्रौपदीनन्दन अर्जुनकुमार श्रुतकीर्तिको नीलकण्ठकी पाँखके समान रंगवाले उत्तम घोड़े रणक्षेत्रमें ले गये ॥ ३२ ॥
यमाहुरध्यर्धगुणं कृष्णात् पार्थाच्च संयुगे ।
अभिमन्युं पिशङ्गास्तं कुमारमवहन् रणे ॥ ३३ ॥
जिसे युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनसे ड्योढ़ा बताया गया है, उस सुभद्राकुमार अभिमन्युको रणक्षेत्रमें कपिलवर्णवाले घोड़े ले गये ॥ ३३ ॥
एकस्तु धार्तराष्ट्रेभ्यः पाण्डवान् यः समाश्रितः ।
तं बृहन्तो महाकाया युयुत्सुमवहन् रणे ॥ ३४ ॥
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पलालकाण्डवर्णास्तु वार्धक्षेमिं तरस्विनम् ।
ऊहुः सुतुमुले युद्धे हयाः कृष्णाः स्वलंकृताः ॥ ३५ ॥
आपके पुत्रोंमेंसे जो एक युयुत्सु पाण्डवोंकी शरणमें जा चुके हैं, उन्हें पुआलके डंठलके समान रंगवाले, विशालकाय एवं बृहद् अश्वोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया । उस भयंकर युद्धमें काले रंगके सजे - सजाये घोड़ोंने वृद्धक्षेमके वेगशाली पुत्रको युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥
कुमारं शितिपादास्तु रुक्मचित्रैरुरच्छदैः ।
सौचित्तिमवहन् युद्धे यन्तुः प्रेष्यकरा हयाः ॥ ३६ ॥
सुचित्तके प्रत्र कुमार सत्यधृतिको सुवर्णमय विचित्र कवचोंसे सुसज्जित और काले रंगके पैरोंवाले, सारथिकी इच्छाके अनुसार चलनेवाले उत्तम घोड़ोंने युद्धक्षेत्रमें उपस्थित किया ॥ ३६ ॥
रुक्मपीठावकीर्णास्तु कौशेयसदृशा हयाः ।
सुवर्णमालिनः क्षान्ताः श्रेणिमन्तमुदावहन् ॥ ३७ ॥
सुनहरी पीठसे युक्त, रेशमके समान रोमवाले, सुवर्णमालाधारी तथा सहनशक्तिसे सम्पन्न घोड़ोंने श्रेणिमान्को युद्धमें पहुँचाया ॥ ३७ ॥
रुक्ममालाधराः शूरा हेमपृष्ठाः स्वलंकृताः ।
काशिराजं नरश्रेष्ठं श्लाघनीयमुदावहन् ॥ ३८ ॥
सुवर्णमाला धारण करनेवाले शूरवीर और सुवर्ण रंगके पृष्ठभागवाले सजे-सजाये घोड़े स्पृहणीय नरश्रेष्ठ काशिराजको रणभूमिमें ले गये ॥ ३८ ॥
अस्त्राणां च धनुर्वेदे बाह्मे वेदे च पारगम् ।
तं सत्यधृतिमायान्तमरुणाः समुदावहन् ॥ ३ ९ ॥
अस्त्रोंके ज्ञानमें, धनुर्वेदमें तथा ब्राह्मवेदमें भी पारंगत पूर्वोक्त सत्यधृतिको अरुणवर्णके अश्वोंने युद्धक्षेत्रमें उपस्थित किया ॥ ३ ९ ॥
यः स पाञ्चालसेनानीर्द्रोणमंशमकल्पयत् ।
पारावतसवर्णास्तं धृष्टद्युम्नमुदावहन् ॥ ४० ॥
जो पांचालोंके सेनापति हैं, जिन्होंने द्रोणाचार्यको अपना भाग निश्चित कर रखा था, उन धृष्टद्युम्नको कबूतरके समान रंगवाले घोड़ोंने युद्धभूमिमें पहुँचाया ॥
तमन्वयात् सत्यधृतिः सौचित्तियुद्धदुर्मदः ।
श्रेणिमान् वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ॥ ४१ ॥
उनके पीछे सुचित्तके पुत्र युद्धदुर्मद सत्यधृति, श्रेणिमान्, वसुदान.*और काशिराजके पुत्र अभिभू चल रहे थे ॥ ४१ ॥
युक्तैः परमकाम्बोजैर्जवनैर्हेममालिभिः ।