04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1921–1930
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1921–1930
पृष्ठ 1921
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
महाराज! राक्षस, पिशाच और गुह्यक- ये गिरिराज हिमालय तथा गन्धमादन पर्वतकी रक्षा करते हैं और अविनाशी एवं सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन समस्त प्राणियोंका पालन करते हैं ( परंतु बाहीक देशपर किसी भी देवताका विशेष अनुग्रह नहीं है ) ॥ ३३ ॥
इङ्गितज्ञाश्च मगधाः प्रेक्षितज्ञाश्च कोसलाः ॥ ३४ ॥
अर्धोक्ताः कुरुपञ्चालाः शाल्वाः कृत्स्नानुशासनाः ।
पर्वतीयाश्च विषमा यथैव शिबयस्तथा ॥ ३५ ॥
मगधदेशके लोग इशारेसे ही सब बात समझ लेते हैं, कोसलनिवासी नेत्रोंकी भावभंगीसे मनका भाव जान लेते हैं, कुरु तथा पांचालदेशके लोग आधी बात कहनेपर ही पूरी बात समझ लेते हैं, शाल्वदेशके निवासी पूरी बात कह देनेपर उसे समझ पाते हैं, परंतु शिबिदेशके लोगोंकी भाँति पर्वतीय प्रान्तोंके निवासी इन सबसे विलक्षण होते हैं। वे पूरी बात कहनेपर भी नहीं समझ पाते ॥ ३४-३५ ॥
सर्वज्ञा यवना राजन् शूराश्चैव विशेषतः ।
म्लेच्छाः स्वसंज्ञानियता नानुक्तमितरे जनाः ॥ ३६ ॥
प्रतिरब्धास्तु वाहीका न च केचन मद्रकाः । राजन्! यद्यपि यवनजातीय म्लेच्छ सभी उपायोंसे बात समझ लेनेवाले और विशेषतः शूर होते हैं, तथापि अपने द्वारा कल्पित संज्ञाओंपर ही अधिक आग्रह रखते हैं ( वैदिक धर्मको नहीं मानते ) । अन्य देशोंके लोग बिना कहे हुए कोई बात नहीं समझते हैं, परंतु बाहीक देशके लोग सब काम उलटे ही करते हैं ( उनकी समझ उलटी ही होती है ) और मद्रदेशके कुछ निवासी तो ऐसे होते हैं कि कुछ भी नहीं समझ पाते ॥ ३६३ ॥
स त्वमेतादृशः शल्य नोत्तरं वक्तुमर्हसि ।
पृथिव्यां सर्वदेशानां मद्रको मलमुच्यते ॥ ३७ ॥
शल्य! ऐसे ही तुम हो । अब मेरी बातका जवाब नहीं दोगे । मद्रदेशके निवासीको पृथ्वीके सम्पूर्ण देशोंका मल बताया जाता है ॥ ३७ ॥
सीधोः पानं गुरुतल्पावमर्दो भ्रूणहत्या परवित्तापहारः । येषां धर्मस्तान् प्रति नास्त्यधर्म आरट्टजान् पञ्चनदान् धिगस्तु ॥ ३८ ॥
मदिरापान, गुरुकी शय्याका उपभोग, भ्रूणहत्या और दूसरोंके धनका अपहरण — ये जिनके लिये धर्म हैं, उनके लिये अधर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं । ऐसे आरट्ट और पंचनददेशके लोगोंको धिक्कार है! ॥
एतज्ज्ञात्वा जोषमास्स्व प्रतीपं मा स्म वै कृथाः ।
मा त्वां पूर्वमहं हत्वा हनिष्ये केशवार्जुनौ ॥ ३ ९ ॥
पृष्ठ 1922
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
यह जानकर तुम चुपचाप बैठे रहो । फिर कोई प्रतिकूल बात मुँहसे न निकालो ।
अन्यथा पहले तुम्हींको मारकर पीछे श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध करूँगा ॥ ३ ९ ॥
शल्य उवाच
आतुराणां परित्यागः स्वदारसुतविक्रयः ।
अङ्गे प्रवर्तते कर्ण येषामधिपतिर्भवान् ॥ ४० ॥
शल्य बोले- कर्ण! तुम जहाँके राजा बनाये गये हो, उस अंगदेशमें क्या होता है? अपने सगे - सम्बन्धी जब रोगसे पीड़ित हो जाते हैं तो उनका परित्याग कर दिया जाता है । अपनी ही स्त्री और बच्चोंको वहाँके लोग सरे बाजार बेचते हैं ॥ ४० ॥
रथातिरथसंख्यायां यत् त्वां भीष्मस्तदाब्रवीत् ।
तान् विदित्वाऽऽत्मनो दोषान् निर्मन्युर्भव मा क्रुधः ॥ ४१ ॥
उस दिन रथी और अतिरथियोंकी गणना करते समय भीष्मजीने तुमसे जो कुछ कहा था, उसके अनुसार अपने उन दोषोंको जानकर क्रोधरहित हो शान्त हो जाओ ॥ ४१ ॥
सर्वत्र ब्राह्मणाः सन्ति सन्ति सर्वत्र क्षत्रियाः ।
वैश्याः शूद्रास्तथा कर्ण स्त्रियः साध्व्यश्च सुव्रताः ॥ ४२ ॥
कर्ण! सर्वत्र ब्राह्मण हैं । सब जगह क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं तथा सभी देशोंमें उत्तम व्रतका पालन करनेवाली साध्वी स्त्रियाँ होती हैं ॥ ४२ ॥
रमन्ते चोपहासेन पुरुषाः पुरुषैः सह ।
अन्योन्यमवतक्षन्तो देशे देशे समैथुनाः ॥ ४३ ॥
सभी देशोंके पुरुष दूसरे पुरुषोंके साथ बात करते समय उपहासके द्वारा एक- दूसरेको चोट पहुँचाते हैं और स्त्रियोंके साथ रमण करते हैं ॥ ४३ ॥
परवाच्येषु निपुणः सर्वो भवति सर्वदा ।
आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि च मुह्यति ॥ ४४ ॥
दूसरोंके दोष बतानेमें सभी लोग सदा ही निपुण होते हैं; परंतु अपने दोषोंका उन्हें पता नहीं रहता, अथवा जानकर भी अनजान बने रहते हैं ॥ ४४ ॥
सर्वत्र सन्ति राजानः स्वं स्वं धर्ममनुव्रताः ।
दुर्मनुष्यान् निगृह्णन्ति सन्ति सर्वत्र धार्मिकाः ॥ ४५ ॥
सभी देशोंमें अपने - अपने धर्मका पालन करनेवाले राजा रहते हैं, जो दुष्टोंका दमन करते हैं तथा सर्वत्र ही धर्मात्मा मनुष्य निवास करते हैं ॥ ४५ ॥
न कर्ण देशसामान्यात् सर्वः पापं निषेवते ।
यादृशाः स्वस्वभावेन देवा अपि न तादृशाः ॥ ४६ ॥
कर्ण! एक देशमें रहनेमात्रसे सब लोग पापका ही सेवन नहीं करते हैं । उसी देशमें मनुष्य अपने श्रेष्ठ शील स्वभावके कारण ऐसे महापुरुष हो जाते हैं कि देवता भी उनकी
पृष्ठ 1923
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बराबरी नहीं कर सकते ॥ ४६ ॥
संजय उवाच
ततो दुर्योधनो राजा कर्णशल्याववारयत् ।
सखिभावेन राधेयं शल्यं स्वाञ्जल्यकेन च ॥ ४७ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! तब राजा दुर्योधनने कर्ण तथा शल्य दोनोंको रोक दिया । उसने कर्णको तो मित्रभावसे समझाकर मना किया और शल्यको हाथ जोड़कर रोका ॥ ४७ ॥
ततो निवारितः कर्णो धार्तराष्ट्रेण मारिष ।
कर्णोऽपि नोत्तरं प्राह शल्योऽप्यभिमुखः परान् ।
ततः प्रहस्य राधेयः पुनर्याहीत्यचोदयत् ॥ ४८ ॥
मान्यवर! दुर्योधनके मना करनेपर कर्णने कोई उत्तर नहीं दिया और शल्यने भी शत्रुओंकी ओर मुँह फेर लिया । तब राधापुत्र कर्णने हँसकर शल्यको रथ बढ़ानेकी आज्ञा देते हुए कहा — ‘ चलो, चलो ' ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
* विभिन्न जातियोंके कर्मको अपनानेके कारण वह उन जातियोंके नामसे निर्दिष्ट होने लगता है ।
पृष्ठ 1924
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः कौरव सेनाकी व्यूहव्यूह - रचनारचना,, युधिष्ठिरके आदेशसे अर्जुनका आक्रमण, शल्यके द्वारा पाण्डव सेनाके प्रमुख वीरोंका वर्णन तथा अर्जुनकी प्रशंसा संजय उवाच
ततः परानीकसहं व्यूहमप्रतिमं कृतम् ।
समीक्ष्य कर्णः पार्थानां धृष्टद्युम्नाभिरक्षितम् ॥ १ ॥
प्रययौ रथघोषेण सिंहनादरवेण च ।
वादित्राणां च निनदैः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ २ ॥
वेपमान इव क्रोधाद् युद्धशौण्डः परंतपः ।
प्रतिव्यूह्य महातेजा यथावद् भरतर्षभ ॥ ३ ॥
व्यधमत् पाण्डवीं सेनामासुरीं मघवानिव ।
युधिष्ठिरं चाभ्यहनदपसव्यं चकार ह ॥ ४ ॥
संजय कहते हैं — भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर यह देखकर कि कुन्तीकुमारोंकी सेनाका अनुपम व्यूह बनाया गया है, जो शत्रुदलके आक्रमणको सह सकनेमें समर्थ और धृष्टद्युम्नद्वारा सुरक्षित है, शत्रुओंको संताप देनेवाला युद्धकुशल कर्ण रथकी घर्घराहट, सिंहकी - सी गर्जना तथा वाद्योंकी गम्भीर ध्वनिसे पृथ्वीको कँपाता और स्वयं भी क्रोधसे काँपता हुआ - सा आगे बढ़ा । उस महातेजस्वी वीरने शत्रुओंके मुकाबलेमें अपनी सेनाकी यथोचित व्यूह - रचना करके, जैसे इन्द्र आसुरी सेनाका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्डव- सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया और युधिष्ठिरको भी घायल करके दाहिने कर दिया ॥ १ –४ ॥
( तानि सर्वाणि सैन्यानि कर्णं दृष्ट्वा विशाम्पते ।
बभूवुः सम्प्रहृष्टानि तावकानि युयुत्सया ॥
अश्रूयन्त ततो वाचस्तावकानां विशाम्पते । प्रजानाथ! ( उस समय ) आपके सभी सैनिक कर्णको देखकर युद्धकी इच्छासे हर्ष और उत्साहमें भर गये । राजन्! उस समय आपके योद्धाओंकी कही हुई ये बातें सुनायी देने लगीं । सैनिका ऊचुः
कर्णार्जुनमहायुद्धमेतदद्य भविष्यति ।
अद्य दुर्योधनो राजा हतामित्रो भविष्यति ॥
पृष्ठ 1925
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सैनिक बोले — आज यह कर्ण और अर्जुनका महान् युद्ध होगा । आज राजा दुर्योधनके सारे शत्रु मार डाले जायँगे ।
अद्य कर्णं रणे दृष्ट्वा फाल्गुनो विद्रविष्यति ।
अद्य तावद् वयं युद्धे कर्णस्यैवानुगामिनः ॥
कर्णबाणमयं भीमं युद्धं द्रक्ष्याम संयुगे । आज अर्जुन रणभूमिमें कर्णको देखते ही भाग खड़े होंगे । आज युद्धमें हमलोग कर्णके
ही अनुगामी होकर समरांगणमें कर्णके बाणोंसे भरा हुआ भीषण संग्राम देखेंगे ।
चिरकालागतमिदमद्येदानीं भविष्यति ॥
अद्य द्रक्ष्याम संग्रामं घोरं देवासुरोपमम् । दीर्घकालसे जिसकी सम्भावना की जाती थी, वह आज इसी समय उपस्थित होगा ।
आज हमलोग देवासुर- संग्रामके समान भयंकर युद्ध देखेंगे।
अद्येदानीं महद् युद्धं भविष्यति भयानकम् ॥
अद्येदानीं जयो नित्यमेकस्यैकस्य वा रणे । आज अभी बड़ा भयानक युद्ध छिड़नेवाला है । आज रणभूमिमें इन दोनोंमेंसे एक-न-एककी विजय अवश्य होगी । अर्जुनं किल राधेयो वधिष्यति महारणे ॥ अथवा कं नरं लोके न स्पृशन्ति मनोरथाः । निश्चय ही राधापुत्र कर्ण इस महायुद्धमें अर्जुनका वध कर डालेगा अथवा इस जगत्में किस मनुष्यके अंदर बड़े - बड़े मनसूबे नहीं उठते हैं । संजय उवाच
इत्युक्त्वा विविधा वाचः कुरवः कुरुनन्दन ।
आजघ्नुः पटहांश्चैव तूर्यांश्चैव सहस्रशः ॥
संजय कहते हैं— कुरुनन्दन! इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर कौरवोंने सहस्रों नगाड़े पीटे और दूसरे- दूसरे बाजे भी बजवाये ।
भेरीनादांश्च विविधान् सिंहनादांश्च पुष्कलान् ।
मुरजानां महाशब्दानानकानां महारवान् ॥
भाँति - भाँतिकी भेरी - ध्वनि हुई और बारंबार सैनिकोंद्वारा सिंहनाद किये गये । गम्भीर ध्वनि करनेवाले ढोल और मृदंगके महान् शब्द वहाँ सब ओर गूँजने लगे ।
नृत्यमानाश्च बहवस्तर्जमानाश्च मारिष ।
अन्योन्यमभ्ययुर्युद्धे युद्धरङ्गगता नराः ॥
मान्यवर नरेश! युद्धके रंगभूमिमें उतरे हुए बहुसंख्यक मनुष्य नृत्य तथा गर्जन - तर्जन करते हुए एक- दूसरेका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ।
पृष्ठ 1926
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तेषां पदाता नागानां पादरक्षाः समन्ततः ।
पट्टिशासिधराः शूराश्चापबाणभुशुण्डिनः ॥
भिन्दिपालधराश्चैव शूलहस्ताः सुचक्रिणः । तेषां समागमो घोरो देवासुररणोपमः II ) उनमें शूरवीर पैदल सैनिक चारों ओरसे पट्टिश, खड्ग, धनुष- बाण, भुशुण्डी, भिन्दिपाल, त्रिशूल और चक्र हाथमें लेकर हाथियोंके पैरोंकी रक्षा कर रहे थे । उनमें देवासुर- संग्रामके समान भयंकर युद्ध छिड़ गया । धृतराष्ट्रउवाच
कथं संजय राधेयः प्रत्यव्यूहत पाण्डवान् ।
धृष्टद्युम्नमुखान् सर्वान् भीमसेनाभिरक्षितान् ॥ ५ ॥
सर्वानेव महेष्वासानजय्यानमरैरपि ।
के च प्रपक्षौ पक्षौ वा मम सैन्यस्य संजय ॥ ६ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा- संजय! राधापुत्र कर्णने देवताओंके लिये भी अजेय तथा भीमसेनद्वारा सुरक्षित धृष्टद्युम्न आदि सम्पूर्ण महाधनुर्धर पाण्डव-वीरोंके जवाबमें किस प्रकार व्यूहका निर्माण किया? संजय! मेरी सेनाके दोनों पक्ष और प्रपक्षके रूपमें कौन-कौनसे वीर थे? ॥ ५-६ ॥
प्रविभज्य यथान्यायं कथं वा समवस्थिताः ।
कथं पाण्डुसुताश्चापि प्रत्यव्यूहन्त मामकान् ॥ ७ ॥
वे किस प्रकार यथोचित रूपसे योद्धाओंका विभाजन करके खड़े हुए थे? पाण्डवोंने भी मेरे पुत्रोंके मुकाबलेमें कैसे व्यूहका निर्माण किया था? ॥ ७ ॥
कथं चैव महद् युद्धं प्रावर्तत सुदारुणम् ।
क्व च बीभत्सुरभवद् यत् कर्णोऽयाद् युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥
यह अत्यन्त भयंकर महायुद्ध किस प्रकार आरम्भ हुआ? अर्जुन कहाँ थे कि कर्णने युधिष्ठिरपर आक्रमण कर दिया? ॥ ८ ॥
को हार्जुनस्य सान्निध्ये शक्तोऽभ्येतुं युधिष्ठिरम् ।
सर्वभूतानि यो ह्येकः खाण्डवे जितवान् पुरा ।
कस्तमन्यस्तु राधेयात् प्रतियुद्ध्येज्जिजीविषुः ॥ ९ ॥
जिन्होंने पूर्वकालमें अकेले ही खाण्डववनमें समस्त प्राणियोंको परास्त कर दिया था, उन अर्जुनके समीप रहते हुए युधिष्ठिरपर कौन आक्रमण कर सकता था? राधापुत्र कर्णके सिवा दूसरा कौन है जो जीवित रहनेकी इच्छा रखते हुए भी अर्जुनके सामने युद्ध कर सके ॥ ९ ॥
संजय उवाच
पृष्ठ 1927
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शृणु व्यूहस्य रचनामर्जुनश्च यथा गतः ।
परिवार्य नृपं स्वं स्वं संग्रामश्चाभवद् यथा ॥ १० ॥
संजय कहते हैं — राजन्! व्यूहकी रचना किस प्रकार हुई थी, अर्जुन कैसे और कहाँ चले गये थे और अपने - अपने राजाको सब ओरसे घेरकर दोनों दलोंके योद्धाओंने किस प्रकार संग्राम किया था? यह सब बताता हूँ, सुनिये ॥ १० ॥
कृपः शारद्वतो राजन् मागधाश्च तरस्विनः ।
सात्वतः कृतवर्मा च दक्षिणं पक्षमाश्रिताः ॥ ११ ॥
तेषां प्रपक्षे शकुनिरुलूकश्च महारथः ।
सादिभिर्विमलप्रासैस्तवानीकमरक्षताम् ॥ १२ ॥
नरेश्वर! शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य, वेगशाली मागध वीर और सात्वतवंशी कृतवर्मा — ये व्यूहके दाहिने पक्षका आश्रय लेकर खड़े थे । महारथी शकुनि और उलूक चमचमाते हुए प्रासोंसे सुशोभित घुड़सवारोंके साथ उनके प्रपक्षमें स्थित हो आपके व्यूहकी रक्षा कर रहे थे ॥ ११-१२ ॥
गान्धारिभिरसम्भ्रान्तैः पर्वतीयैश्च दुर्जयैः ।
शलभानामिव व्रातैः पिशाचैरिव दुर्दृशैः ॥ १३ ॥
उनके साथ कभी घबराहटमें न पड़नेवाले गान्धारदेशीय सैनिक और दुर्जय पर्वतीय वीर भी थे । पिशाचोंके समान उन योद्धाओंकी ओर देखना कठिन हो रहा था और वे टिड्डीदलोंके समान यूथ बनाकर चलते थे ॥ १३ ॥
चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि रथानामनिवर्तिनाम् ।
संशप्तका युद्धशौण्डा वामं पार्श्वमपालयन् ॥ १४ ॥
समन्वितास्तव सुतैः कृष्णार्जुनजिघांसवः । श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालनेकी इच्छावाले युद्ध -निपुण संशप्तक योद्धा युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले रथी वीर थे । उनकी संख्या चौंतीस हजार थी । वे आपके पुत्रोंके साथ रहकर व्यूहके वाम पार्श्वकी रक्षा करते थे ॥ १४ ॥
तेषां प्रपक्षाः काम्बोजाः शकाश्च यवनैः सह ॥ १५ ॥
निदेशात् सूतपुत्रस्य सरथाः साश्वपत्तयः ।
आह्वयन्तोऽर्जुनं तस्थुः केशवं च महाबलम् ॥ १६ ॥
उनके प्रपक्षस्थानमें सूतपुत्रकी आज्ञासे रथों, घुड़सवारों और पैदलोंसहित काम्बोज, शक तथा यवन महाबली श्रीकृष्ण और अर्जुनको ललकारते हुए खड़े थे ॥ १५-१६ ॥
मध्ये सेनामुखे कर्णोऽप्यवातिष्ठत दंशितः ।
चित्रवर्माङ्गदः स्रग्वी पालयन् वाहिनीमुखम् ॥ १७ ॥
कर्ण भी विचित्र कवच, अंगद और हार धारण करके सेनाके मुखभागकी रक्षा करता हुआ व्यूहके मुहाने पर ठीक बीचो - बीचमें खड़ा था ॥ १७ ॥
पृष्ठ 1928
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
रक्षमाणैः सुसंरब्धैः पुत्रैः शस्त्रभृतां वरः ।
वाहिनीं प्रमुखे वीरः सम्प्रकर्षन्नशोभत ॥ १८ ॥
अभ्यवर्तन्महाबाहुः सूर्यवैश्वानरप्रभः । सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी और शस्त्र-धारियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु कर्ण रोष और जोशमें भरकर सेनापतिकी रक्षामें तत्पर हुए आपके पुत्रोंके साथ प्रमुख भागमें स्थित हो कौरव - सेनाको अपने साथ खींचता हुआ बड़ी शोभा पा रहा था, वह शत्रुओंके सामने डटा हुआ था ॥ १८ ॥
महाद्विपस्कन्धगतः पिङ्गाक्षः प्रियदर्शनः ॥ १ ९ ॥ दुःशासनो वृतः सैन्यैः स्थितो व्यूहस्य पृष्ठतः । व्यूहके पृष्ठभागमें पिंगल नेत्रोंवाला प्रियदर्शन दुःशासन सेनाओंसे घिरा हुआ खड़ा था । वह एक विशाल गजराजकी पीठपर विराजमान था ॥ १ ९ ३ ॥ तमन्वयान्महाराज स्वयं दुर्योधनो नृपः ॥ २० ॥
चित्रास्त्रैश्चित्रसंनाहैः सोदर्यैरभिरक्षितः ।
रक्ष्यमाणो महावीर्यैः सहितैर्मद्रकेकयैः ॥ २१ ॥
अशोभत महाराज देवैरिव शतक्रतुः । महाराज! विचित्र अस्त्र और कवच धारण करनेवाले सहोदर भाइयों तथा एक साथ आये हुए मद्र और केकयदेशके महापराक्रमी योद्धाओंद्वारा सुरक्षित साक्षात् राजा दुर्योधन दुःशासनके पीछे - पीछे चल रहा था । महाराज! उस समय देवताओंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रके समान उसकी शोभा हो रही थी ॥ २० - २१३३ ॥ अश्वत्थामा कुरूणां च ये प्रवीरा महारथाः ॥ २२ ॥
नित्यमत्ताश्च मातङ्गाः शूरैर्लेच्छैः समन्विताः ।
अन्वयुस्तद् रथानीकं क्षरन्त इव तोयदाः ॥ २३ ॥
अश्वत्थामा, कौरवपक्षके प्रमुख महारथी वीर, शौर्यसम्पन्न म्लेच्छ सैनिकोंसे युक्त नित्य मतवाले हाथी वर्षा करनेवाले मेघोंके समान मदकी धारा बहाते हुए उस रथसेनाके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ २२-२३ ॥
ते ध्वजैर्वैजयन्तीभिर्ज्वलद्भिः परमायुधैः ।
सादिभिश्चास्थिता रेजुर्द्रुमवन्त इवाचलाः ॥ २४ ॥
वे हाथी ध्वजों, वैजयन्ती पताकाओं, प्रकाशमान अस्त्र - शस्त्रों तथा सवारोंसे सुशोभित हो वृक्षसमूहोंसे युक्त पर्वतोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २४ ॥
तेषां पदातिनागानां पादरक्षाः सहस्रशः ।
पट्टिशासिधराः शूरा बभूवुरनिवर्तिनः ॥ २५ ॥
पट्टिश और खड्ग धारण किये तथा युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले सहस्रों शूर सैनिक उन पैदलों एवं हाथियोंके पादरक्षक थे ॥ २५ ॥
पृष्ठ 1929
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सादिभिः स्यन्दनैर्नागैरधिकं समलङ्कृतैः ।
स व्यूहराजो विबभौ देवासुरचमूपमः ॥ २६ ॥
अधिकाधिक सुसज्जित हाथियों, रथों और घुड़सवारोंसे सम्पन्न वह व्यूहराज देवताओं और असुरोंकी सेनाके समान सुशोभित हो रहा था ॥ २६ ॥
बार्हस्पत्यः सुविहितो नायकेन विपश्चिता ।
नृत्यतीव महाव्यूहः परेषां भयमादधत् ॥ २७ ॥
विद्वान् सेनापति कर्णके द्वारा बृहस्पतिकी बतायी हुई रीतिके अनुसार भलीभाँति रचा गया वह महान् व्यूह शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न करता हुआ नृत्य - सा कर रहा था ॥ २७ ॥
तस्य पक्षप्रपक्षेभ्यो निष्पतन्ति युयुत्सवः ।
पत्त्यश्वरथमातङ्गाः प्रावृषीव बलाहकाः ॥ २८ ॥
उसके पक्ष और प्रपक्षोंसे युद्धके इच्छुक पैदल, घुड़सवार, रथी और गजारोही योद्धा उसी प्रकार निकल पड़ते थे, जैसे वर्षाकालमें मेघ प्रकट होते हैं ॥ २८ ॥
ततः सेनामुखे कर्णं दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः ।
धनंजयममित्रघ्नमेकवीरमुवाच ह ॥ २ ९ ॥
तदनन्तर सेनाके मुहानेपर कर्णको खड़ा देख राजा युधिष्ठिरने शत्रुओंका संहार करनेवाले अद्वितीय वीर धनंजयसे इस प्रकार कहा— ॥ २ ९ ॥
पश्यार्जुन महाव्यूहं कर्णेन विहितं रणे ।
युक्तं पक्षैः प्रपक्षैश्च परानीकं प्रकाशते ॥ ३० ॥
‘ अर्जुन! रणभूमिमें कर्णद्वारा रचित उस महाव्यूहको देखो । पक्षों और प्रपक्षोंसे युक्त शत्रुकी वह व्यूहबद्ध सेना कैसी प्रकाशित हो रही है! ॥ ३० ॥
पृष्ठ 1930
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Milra
तदेतद् वै समालोक्य प्रत्यमित्रं महद् बलम् ।
यथा नाभिभवत्यस्मांस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ३१ ॥
‘ अतः इस विशाल शत्रुसेनाकी ओर देखकर तुम ऐसी नीतिका निर्माण करो, जिससे वह हमें परास्त न कर सके ' ॥ ३१ ॥
एवमुक्तोऽर्जुनो राज्ञा प्राञ्जलिर्नृपमब्रवीत् ।
यथा भवानाह तथा तत् सर्वं न तदन्यथा ॥ ३२ ॥
-- राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर अर्जुन हाथ जोड़कर उनसे बोले – ' भारत! आप जैसा
कहते हैं वह सब वैसा ही है । उसमें थोड़ा - सा भी अन्तर नहीं है ॥ ३२ ॥
यस्त्वस्य विहितो घातस्तं करिष्यामि भारत ।
प्रधानवध एवास्य विनाशस्तं करोम्यहम् ॥ ३३ ॥
‘ युद्धशास्त्रमें इस व्यूहके विनाशके लिये जो उपाय बताया गया है, उसीका सम्पादन करूँगा । प्रधान सेनापतिका वध होनेपर ही इसका विनाश हो सकता है; अतः मैं वही करूँगा' ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिरउवाच तस्मात् त्वमेव राधेयं भीमसेनः सुयोधनम् ।