04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1911–1920

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1911–1920

पृष्ठ 1911

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‘ मदसे उन्मत्त होकर परस्पर सरस विनोदयुक्त बातें करती हुई वे एक- दूसरीको ' ओ घायल की हुई! ओ किसीकी मारी हुई! हे पतिमर्दिते! ' इत्यादि कहकर पुकारती और नृत्य करती हैं । पर्वों और त्योहारोंके अवसरपर तो उन संस्कारहीन रमणियोंके संयमका बाँध और भी टूट जाता है ॥ १४३ ॥

तासां किलावलिप्तानां निवसन् कुरुजाङ्गले ॥ १५ ॥

कश्चिद् वाहीकदुष्टानां नातिहृष्टमना जगौ । ‘ उन्हीं बाहीकदेशी मदमत्त एवं दुष्ट स्त्रियोंका कोई सम्बन्धी वहाँसे आकर कुरुजांगल प्रदेशमें निवास करता था । वह अत्यन्त खिन्नचित्त होकर इस प्रकार गुनगुनाया करता था ॥ १५३ ॥

सा नूनं बृहती गौरी सूक्ष्मकम्बलवासिनी ॥ १६ ॥

मामनुस्मरती शेते वाहीकं कुरुजाङ्गले । 'निश्चय ही वह लंबी, गोरी और महीन कम्बलकी साड़ी पहननेवाली मेरी प्रेयसी कुरुजांगल प्रदेशमें निवास करनेवाले मुझ बाहीकको निरन्तर याद करती हुई सोती होगी ॥ १६ ॥

शतद्रुकामहं तीर्त्वा तां च रम्यामिरावतीम् ॥ १७ ॥

गत्वा स्वदेशं द्रक्ष्यामि स्थूलशङ्खाः शुभाः स्त्रियः । ' मैं कब सतलज और उस रमणीय रावी नदीको पार करके अपने देशमें पहुँचकर शंखकी बनी हुई मोटी- मोटी चूड़ियोंको धारण करनेवाली वहाँकी सुन्दरी स्त्रियोंको देखूँगा ॥ १७ ॥

मनःशिलोज्ज्वलापाङ्ग्यो गौर्यस्त्रिककुदाञ्जनाः ॥ १८ ॥

कम्बलाजिनसंवीताः कूर्दन्त्यः प्रियदर्शनाः ।

मृदङ्गानकशङ्खानां मर्दलानां च निःस्वनैः ॥ १ ९ ॥

‘जिनके नेत्रोंके प्रान्तभाग मैनसिलके आलेपसे उज्ज्वल हैं, दोनों नेत्र और ललाट अंजनसे सुशोभित हैं तथा जिनके सारे अंग कम्बल और मृगचर्मसे आवृत हैं, वे गोरे रंगवाली प्रियदर्शना ( परम सुन्दरी ) रमणियाँ मृदंग, ढोल, शंख और मर्दल आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ - साथ कब नृत्य करती दिखायी देंगी ॥ १८-१९ ॥

खरोष्ट्राश्वतरैश्चैव मत्ता यास्यामहे सुखम् ।

शमीपीलुकरीराणां वनेषु सुखवर्त्मसु ॥ २० ॥

' कब हमलोग मदोन्मत्त हो गदहे, ऊँट और खच्चरोंकी सवारीद्वारा सुखद मार्गोंवाले शमी, पीलु और करीलोंके जंगलोंमें सुखसे यात्रा करेंगे ॥ २० ॥

अपूपान् सक्तुपिण्डांश्च प्राश्नन्तो मथितान्वितान् ।

पथि सुप्रबला भूत्वा कदा सम्पततोऽध्वगान् ॥ २१ ॥

चेलापहारं कुर्वाणास्ताडयिष्याम भूयसः ।

पृष्ठ 1912

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‘ मार्गमें तक्रके साथ पूए और सत्तूके पिण्ड खाकर अत्यन्त प्रबल हो कब चलते हुए बहुत - से राहगीरोंको उनके कपड़े छीनकर हम अच्छी तरह पीटेंगे' ॥ २१३ ॥

एवंशीलेषु व्रात्येषु वाहीकेषु दुरात्मसु ॥ २२ ॥

कश्चेतयानो निवसेन्मुहूर्तमपि मानवः । संस्कारशून्य दुरात्मा बाहीक ऐसे ही स्वभावके होते हैं । उनके पास कौन सचेत मनुष्य दो घड़ी भी निवास करेगा? ' ॥ २२३ ॥

ईदृशा ब्राह्मणेनोक्ता वाहीका मोघचारिणः ॥ २३ ॥

येषां षड्भागहर्ता त्वमुभयोः शुभपापयोः । र- विचारवाले बाहीकोंको, ब्राह्मणने निरर्थक आचार- ऐसा ही बताया है जिनके पुण्य औरपाप दोनोंका छठा भाग तुम लिया करते हो ॥ २३३ ॥

इत्युक्त्वा ब्राह्मणः साधुरुत्तरं पुनरुक्तवान् ॥ २४ ॥

वाहीकेष्वविनीतेषु प्रोच्यमानं निबोध तत् । शल्य! उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने ये सब बातें बताकर उद्दण्ड बाहीकोंके विषयमें पुनः जो कुछ कहा था, वह भी बताता हूँ, सुनो – ॥ २४ ॥

तत्र स्म राक्षसी गाति सदा कृष्णचतुर्दशीम् ॥ २५ ॥

नगरे शाकले स्फीते आहत्य निशि दुन्दुभिम् । ' उस देशमें एक राक्षसी रहती है, जो सदा कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको समृद्धिशाली शाकल नगरमें रातके समय दुन्दुभि बजाकर इस प्रकार गाती है – ॥ २५३ ॥

कदा वाहेयिका गाथाः पुनर्गास्यामि शाकले ॥ २६ ॥

गव्यस्य तृप्ता मांसस्य पीत्वा गौडं सुरासवम् ।

गौरीभिः सह नसिभिर्बृहतीभिः स्वलंकृताः ॥ २७ ॥

पलाण्डुगंडूषयुतान् खादन्ती चैडकान् बहून् । ‘ मैं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो गोमांस खाकर और गुड़की बनी हुई मदिरा पीकर तृप्त हो अंजलि भर प्याजके साथ बहुत- सी भेड़ोंको खाती हुई गोरे रंगकी लंबी युवती स्त्रियोंके साथ मिलकर इस शाकल नगरमें पुनः कब इस तरहकी बाहीकसम्बन्धी गाथाओंका गान करूँगी ॥ २६-२७३ ॥ वाराहं कौक्कुटं मांसं गव्यं गार्दभमौष्ट्रिकम् ॥ २८ ॥

ऐडं च ये न खादन्ति तेषां जन्म निरर्थकम् । 'जो सूअर, मुर्गा, गाय, गदहा, ऊँट और भेड़के मांस नहीं खाते, उनका जन्म व्यर्थ है' ॥ २८३ ॥

इति गायन्ति ये मत्ताः सीधुना शाकलाश्च ये ॥ २ ९ ॥ सबालवृद्धाः क्रन्दन्तस्तेषु धर्मः कथं भवेत् ।

पृष्ठ 1913

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‘ जो शाकलनिवासी आबालवृद्ध नर- नारी मदिरासे उन्मत्त हो चिल्ला -चिल्लाकर ऐसी गाथाएँ गाया करते हैं, उनमें धर्म कैसे रह सकता है? ' ॥ २ ९ ३ ॥ इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ॥ ३० ॥

यदन्योऽप्युक्तवानस्मान् ब्राह्मणः कुरुसंसदि । शल्य! इस बातको अच्छी तरह समझ लो । हर्षका विषय है कि इसके सम्बन्धमें मैं तुम्हें कुछ और बातें बता रहा हूँ, जिन्हें दूसरे ब्राह्मणने कौरव- सभामें हमलोगोंसे कहा था ॥ ३० ॥

पञ्च नद्यो वहन्त्येता यत्र पीलुवनान्युत ॥ ३१ ॥

शतद्रुश्च विपाशा च तृतीयैरावती तथा ।

चन्द्रभागा वितस्ता च सिन्धुषष्ठा बहिर्गिरेः ॥ ३२ ॥

आरट्टा नाम ते देशा नष्टधर्मा न तान् व्रजेत् । ‘ जहाँ शतद्रु ( सतलज ), विपाशा ( व्यास ), तीसरी इरावती ( रावी ), चन्द्रभागा ( चिनाव) और वितस्ता ( झेलम ) —ये पाँच नदियाँ छठी सिंधु नदीके साथ बहती हैं, जहाँ पीलु नामक वृक्षोंके कई जंगल हैं, वे हिमालयकी सीमासे बाहरके प्रदेश ' आरट्ट ' नामसे विख्यात हैं ।

वहाँका धर्म - कर्म नष्ट हो गया है । उन देशोंमें कभी न जाय ॥

व्रात्यानां दासमीयानां वाहीकानामयज्वनाम् ॥ ३३ ॥

न देवाः प्रतिगृह्णन्ति पितरो ब्राह्मणास्तथा ।

तेषां प्रणष्टधर्माणां वाहीकानामिति श्रुतिः ॥ ३४ ॥

‘जिनके धर्म - कर्म नष्ट हो गये हैं, वे संस्कारहीन, जारज बाहीक यज्ञ - कर्मसे रहित होते हैं । उनके दिये हुए द्रव्यको देवता, पितर और ब्राह्मण भी नहीं ग्रहण करते हैं, यह बात सुननेमें आयी है' ॥ ३३-३४ ॥

ब्राह्मणेन तथा प्रोक्तं विदुषा साधुसंसदि ।

काष्ठकुण्डेषु वाहीका मृन्मयेषु च भुञ्जते ॥ ३५ ॥

सक्तुमद्यावलिप्तेषु श्वावलीढेषु निर्घृणाः ।

आविकं चौष्ट्रिकं चैव क्षीरं गार्दभमेव च ॥ ३६ ॥

तद्विकारांश्च वाहीकाः खादन्ति च पिबन्ति च । किसी विद्वान् ब्राह्मणने साधु पुरुषोंकी सभामें यह भी कहा था कि ' बाहीक देशके लोग काठके कुण्डों तथा मिट्टीके बर्तनोंमें जहाँ सत्तू और मदिरा लिपटे होते हैं और जिन्हें कुत्ते चाटते रहते हैं, घृणाशून्य होकर भोजन करते हैं । बाहीक देशके निवासी भेड़, ऊँटनी और गदहीके दूध पीते और उसी दूधके बने हुए दही- घी आदि भी खाते हैं ॥ ३५-३६३ ॥ पुत्रसंकरिणो जाल्माः सर्वान्नक्षीरभोजनाः ॥ ३७ ॥

आरट्टा नाम वाहीका वर्जनीया विपश्चिता ।

पृष्ठ 1914

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‘ वे जारज पुत्र उत्पन्न करनेवाले नीच आरट्ट नामक बाहीक सबका अन्न खाते और सभी पशुओंके दूध पीते हैं । अतः विद्वान् पुरुषको उन्हें दूरसे ही त्याग देना चाहिये ' ॥ ३७ || हन्त शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ॥ ३८ ॥

यदन्योऽप्युक्तवान् मह्यं ब्राह्मणः कुरुसंसदि । शल्य! इस बातको याद कर लो । अभी तुमसे और भी बातें बताऊँगा, जिन्हें किसी दूसरे ब्राह्मणने कौरवसभामें स्वयं मुझसे कहा था- ॥ ३८३ ॥

युगन्धरे पयः पीत्वा प्रोष्य चाप्यच्युतस्थले ॥ ३ ९ ॥ तद्वद् भूतिलये स्नात्वा कथं स्वर्गं गमिष्यति । ‘ युगन्धर नगरमें दूध पीकर अच्युतस्थल नामक नगरमें एक रात रहकर तथा भूतिलयमें स्नान करके मनुष्य कैसे स्वर्गमें जायगा? ' ॥ ३ ९ ॥ पञ्च नद्यो वहन्त्येता यत्र निःसृत्य पर्वतात् ॥ ४० ॥

आरट्टा नाम वाहीका न तेष्वार्योद्व्यहं वसेत् । जहाँ पर्वतसे निकलकर ये पूर्वोक्त पाँचों नदियाँ बहती हैं, वे आरट्ट नामसे प्रसिद्ध बाहीक प्रदेश हैं । उनमें श्रेष्ठ पुरुष दो दिन भी निवास न करे ॥ ४० ॥

बहिश्च नाम हीकश्च विपाशायां पिशाचकौ ॥ ४१ ॥

तयोरपत्यं वाहीका नैषा सृष्टिः प्रजापतेः ।

ते कथं विविधान् धर्मान् ज्ञास्यन्ते हीनयोनयः ॥ ४२ ॥

विपाशा ( व्यास ) नदीमें दो पिशाच रहते हैं । एकका नाम है बहि और दूसरेका नाम है हीक । इन्हीं दोनोंकी संतानें बाहीक कहलाती हैं । ब्रह्माजीने इनकी सृष्टि नहीं की है । वे नीच योनिमें उत्पन्न हुए मनुष्य नाना प्रकारके धर्मोंको कैसे जानेंगे? ॥ ४१-४२ ॥

कारस्करान्माहिषकान् कुरण्डान् केरलांस्तथा ।

कर्कोटकान् वीरकांश्च दुर्धर्मांश्च विवर्जयेत् ॥ ४३ ॥

कारस्कर, माहिषक, कुरंड, केरल, कर्कोटक और वीरक- इन देशोंके धर्म ( आचार-व्यवहार ) दूषित हैं; अतः इनका त्याग कर देना चाहिये ॥ ४३ ॥

इति तीर्थानुसर्तारं राक्षसी काचिदब्रवीत् ।

एकरात्रशयी गेहे महोलूखलमेखला ॥ ४४ ॥

विशाल ओखलियोंकी मेखला ( करधनी ) धारण करनेवाली किसी राक्षसीने किसी तीर्थयात्रीके घरमें एक रात रहकर उससे इस प्रकार कहा था- ॥ ४४ ॥

आरट्टा नाम ते देशा वाहीकं नाम तज्जलम् ।

ब्राह्मणापसदा यत्र तुल्यकालाः प्रजापतेः ॥ ४५ ॥

जहाँ ब्रह्माजीके समकालीन ( अत्यन्त प्राचीन ) वेदविरुद्ध आचरणवाले नीच ब्राह्मण निवास करते हैं, वे आरट्ट नामक देश हैं और वहाँके जलका नाम बाहीक है ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 1915

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वेदा न तेषां वेद्यश्च यज्ञा यजनमेव च ।

व्रात्यानां दासमीयानामन्नं देवा न भुञ्जते ॥ ४६ ॥

उन अधम ब्राह्मणोंको न तो वेदोंका ज्ञान है, न वहाँ यज्ञकी वेदियाँ हैं और न उनके यहाँ यज्ञ - याग ही होते हैं । वे संस्कारहीन एवं दासोंसे समागम करनेवाली कुलटा स्त्रियोंकी संतानें हैं; अतः देवता उनका अन्न नहीं ग्रहण करते हैं ॥ ४६ ॥

प्रस्थला मद्रगान्धारा आरट्टा नामतः खशाः ।

वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायोऽतिकुत्सिताः ॥ ४७ ॥

प्रस्थल, मद्र, गान्धार, आरट्ट, खस, वसाति, सिंधु तथा सौवीर- ये देश प्रायः अत्यन्त निन्दित हैं ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णऔर शल्यका संवादविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 1916

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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः कर्णका मद्र आदि बाहीक- निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना कर्णउवाच

हन्त शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ।

उच्यमानं मया सम्यक् त्वमेकाग्रमनाः शृणु ॥ १ ॥

कर्ण बोला- शल्य! पहले जो बातें बतायी गयी हैं, उन्हें समझो । अब मैं पुनः तुमसे कुछ कहता हूँ । मेरी कही हुई इस बातको तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो- ॥ १ ॥

ब्राह्मणः किल नो गेहमध्यगच्छत् पुरातिथिः ।

आचारं तत्र सम्प्रेक्ष्य प्रीतो वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥

पूर्वकालमें एक ब्राह्मण अतिथिरूपसे हमारे घरपर ठहरा था । उसने हमारे यहाँका आचार - विचार देखकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए यह बात कही— ॥ २ ॥

मया हिमवतः शृङ्गमेकेनाध्युषितं चिरम् ।

दृष्टाश्च बहवो देशा नानाधर्मसमावृताः ॥ ३ ॥

' मैंने अकेले ही दीर्घकालतक हिमालयके शिखरपर निवास किया है और विभिन्न धर्मोंसे सम्पन्न बहुत- से देश देखे हैं ॥ ३ ॥

न च केन च धर्मेण विरुध्यन्ते प्रजा इमाः ।

सर्वं हि तेऽब्रुवन् धर्मं यदुक्तं वेदपारगैः ॥ ४ ॥

‘ इन सब देशोंके लोग किसी भी निमित्तसे धर्मके विरुद्ध नहीं जाते । वेदोंके पारगामी विद्वानोंने जैसा बताया है, उसी रूपमें वे लोग सम्पूर्ण धर्मको मानते और बतलाते हैं ॥ ४ ॥

अटता तु ततो देशान् नानाधर्मसमाकुलान् ।

आगच्छता महाराज वाहीकेषु निशामितम् ॥ ५ ॥

‘ महाराज! विभिन्न धर्मोंसे युक्त अनेक देशोंमें घूमता- घामता जब मैं बाहीक देशमें आ रहा था, तब वहाँ ऐसी बातें देखने और सुननेमें आयीं ॥ ५ ॥

तत्र वै ब्राह्मणो भूत्वा ततो भवति क्षत्रियः ।

वैश्यः शूद्रश्च वाहीकस्ततो भवति नापितः ॥ ६ ॥

नापितश्च ततो भूत्वा पुनर्भवति ब्राह्मणः ।

द्विजो भूत्वा च तत्रैव पुनर्दासोऽभिजायते ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1917

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‘ उस देशमें एक ही बाहीक पहले ब्राह्मण होकर फिर क्षत्रिय होता है । तत्पश्चात् वैश्य और शूद्र भी बन जाता है । उसके बाद वह नाई होता है । नाई होकर फिर ब्राह्मण हो जाता है । ब्राह्मण होनेके पश्चात् फिर वही दास बन जाता है * ॥ ६-७ ॥

भवन्त्येककुले विप्राः प्रसृष्टाः कामचारिणः ।

गान्धारा मद्रकाश्चैव वाहीकाश्चाल्पचेतसः ॥ ८ ॥

'वहाँ एक ही कुलमें कुछ लोग ब्राह्मण और कुछ लोग स्वेच्छाचारी वर्णसंकर संतान उत्पन्न करनेवाले होते हैं । गान्धार, मद्र और बाहीक- इन सभी देशोंके लोग मन्दबुद्धि हुआ करते हैं ॥ ८ ॥

एतन्मया श्रुतं तत्र धर्मसंकरकारकम् ।

कृत्स्नामटित्वा पृथिवीं वाहीकेषु विपर्ययः ॥ ९ ॥

‘ उस देशमें मैंने इस प्रकार धर्मसंकरता फैलानेवाली बातें सुनीं । सारी पृथ्वीमें घूमकर केवल बाहीक देशमें ही मुझे धर्मके विपरीत आचार- व्यवहार दिखायी दिया ' ॥

हन्त शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ।

यदप्यन्योऽब्रवीद् वाक्यं वाहीकानां च कुत्सितम् ॥ १० ॥

शल्य! ये सब बातें जान लो । अभी और कहता हूँ । एक दूसरे यात्रीने भी बाहीकोंके सम्बन्धमें जो घृणित बातें बतायी थीं, उन्हें सुनो— ॥ १० ॥

सती पुरा हृता काचिदारट्टात् किल दस्युभिः ।

अधर्मतश्चोपयाता सा तानभ्यशपत् ततः ॥ ११ ॥

' कहते हैं, प्राचीन कालमें लुटेरे डाकुओंने आरट्ट देशसे किसी सती स्त्रीका अपहरण कर लिया और अधर्मपूर्वक उसके साथ समागम किया । तब उसने उन्हें यह शाप दे दिया ॥ ११ ॥

बालां बन्धुमतीं यन्मामधर्मेणोपगच्छथ ।

तस्मान्नार्यो भविष्यन्ति बन्धक्यो वै कुलस्य च ॥ १२ ॥

न चैवास्मात् प्रमोक्षध्वं घोरात् पापान्नराधमाः । ' मैं अभी बालिका हूँ और मेरे भाई- बन्धु मौजूद हैं तो भी तुमलोगोंने अधर्मपूर्वक मेरे साथ समागम किया है । इसलिये इस कुलकी सारी स्त्रियाँ व्यभिचारिणी होंगी । नराधमो! तुम्हें इस घोर पापसे कभी छुटकारा नहीं मिलेगा ' ॥ १२३ ॥

तस्मात् तेषां भागहरा भागिनेया न सूनवः ॥ १३ ॥

‘ इसलिये उनकी धन - सम्पत्तिके उत्तराधिकारी भानजे होते हैं, पुत्र नहीं ॥ १३ ॥

कुरवः सहपाञ्चालाः शाल्वा मत्स्याः सनैमिषाः ।

कोसलाः काशयोऽङ्गाश्च कालिङ्गा मागधास्तथा ॥ १४ ॥

चेदयश्च महाभागा धर्मं जानन्ति शाश्वतम् ।

पृष्ठ 1918

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'कुरु, पांचाल, शाल्व, मत्स्य, नैमिष, कोसल, काशी, अंग, कलिंग, मगध और चेदिदेशोंके बड़भागी मनुष्य सनातन धर्मको जानते हैं ॥ १४३ ॥

नानादेशेषु सन्तश्च प्रायो बाह्यालयादृते ॥ १५ ॥

आ मत्स्येभ्यः कुरुपञ्चालदेश्या आ नैमिषाच्चेदयो ये विशिष्टाः । धर्मं पुराणमुपजीवन्ति सन्तो मद्रानृते पाञ्चनदांश्च जिह्मान् ॥ १६ ॥

‘ भिन्न -भिन्न देशोंमें बाहीकनिवासियोंको छोड़कर प्रायः सर्वत्र श्रेष्ठ पुरुष उपलब्ध होते हैं । मत्स्यसे लेकर कुरु और पांचाल देशतक, नैमिषारण्यसे लेकर चेदिदेशतक जो लोग निवास करते हैं, वे सभी श्रेष्ठ एवं साधु पुरुष हैं और प्राचीन धर्मका आश्रय लेकर जीवननिर्वाह करते हैं । मद्र और पंचनद प्रदेशोंमें ऐसी बात नहीं है । वहाँके लोग कुटिल होते हैं ' ॥ १५-१६ ॥ एवं विद्वान् धर्मकथासु राजं- स्तूष्णींभूतो जडवच्छल्य भूयः । त्वं तस्य गोप्ता च जनस्य राजा षड्भागहर्ता शुभदुष्कृतस्य ॥ १७ ॥

राजा शल्य! ऐसा जानकर तुम जड पुरुषोंके समान धर्मोपदेशकी ओरसे मुँह मोड़कर चुपचाप बैठे रहो । तुम बाहीक देशके लोगोंके राजा और रक्षक हो; अतः उनके पुण्य और पापका भी छठा भाग ग्रहण करते हो ॥ १७ ॥

अथवा दुष्कृतस्य त्वं हर्ता तेषामरक्षिता ।

रक्षिता पुण्यभाग् राजा प्रजानां त्वं ह्यपुण्यभाक् ॥ १८ ॥

अथवा उनकी रक्षा न करनेके कारण तुम केवल उनके पापोंमें ही हिस्सा बँटाते हो । प्रजाकी रक्षा करनेवाला राजा ही उसके पुण्यका भागी होता है; तुम तो केवल पापके ही भागी हो ॥ १८ ॥

पूज्यमाने पुरा धर्मे सर्वदेशेषु शाश्वते ।

धर्मं पाञ्चनदं दृष्ट्वा धिगित्याह पितामहः ॥ १ ९ ॥

पूर्वकालमें समस्त देशोंमें प्रचलित सनातन धर्मकी जब प्रशंसा की जा रही थी, उस समय ब्रह्माजीने पंचनदवासियोंके धर्मपर दृष्टिपात करके कहा था कि 'धिक्कार है इन्हें! ' ॥ १ ९ ॥

व्रात्यानां दासमीयानां कृतेऽप्यशुभकर्मणाम् ।

ब्रह्मणा निन्दिते धर्मे स त्वं लोके किमब्रवीः ॥ २० ॥

संस्कारहीन, जारज और पापकर्मी पंचनदवासियोंके धर्मकी जब ब्रह्माजीने सत्ययुगमें भी निन्दा की, तब तुम उसी देशके निवासी होकर जगत्मे क्यों धर्मोपदेश करने चले

पृष्ठ 1919

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हो? ॥ २० ॥

इति पाञ्चनदं धर्ममवमेने पितामहः ।

स्वधर्मस्थेषु वर्षेषु सोऽप्येतान् नाभ्यपूजयत् ॥ २१ ॥

पितामह ब्रह्माने पंचनदनिवासियोंके आचार- व्यवहाररूपी धर्मका इस प्रकार अनादर किया है । अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले अन्य देशोंकी तुलनामें उन्होंने इनका आदर नहीं किया ॥ २१ ॥

हन्त शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ।

कल्माषपादः सरसि निमज्जन् राक्षसोऽब्रवीत् ॥ २२ ॥

शल्य! इन सब बातोंको अच्छी तरह जान लो । अभी इस विषयमें तुमसे कुछ और भी बातें बता रहा हूँ, जिन्हें सरोवरमें डूबते हुए राक्षस कल्माषपादने कहा था— ॥ २२ ॥

क्षत्रियस्य मलं भैक्ष्यं ब्राह्मणस्याश्रुतं मलम् ।

मलं पृथिव्यां वाहीकाः स्त्रीणां मद्रस्त्रियो मलम् ॥ २३ ॥

‘ क्षत्रियका मल है भिक्षावृत्ति, ब्राह्मणका मल है वेद -शास्त्रोंके विपरीत आचरण, पृथ्वीके मल हैं बाहीक और स्त्रियोंके मल हैं मद्रदेशकी स्त्रियाँ' ॥ २३ ॥

निमज्जमानमुद्धृत्य कश्चिद् राजा निशाचरम् ।

अपृच्छत् तेन चाख्यातं प्रोक्तवांस्तन्निबोध मे ॥ २४ ॥

उस डूबते हुए राक्षसका किसी राजाने उद्धार करके उससे कुछ प्रश्न किया । उनके उस प्रश्नके उत्तरमें राक्षसने जो कुछ कहा था, उसे सुनो— ॥ २४ ॥

मानुषाणां मलं म्लेच्छा म्लेच्छानां शौण्डिका मलम् ।

शौण्डिकानां मलं षण्ढाः षण्ढानां राजयाजकाः ॥ २५ ॥

' मनुष्योंके मल हैं म्लेच्छ, म्लेच्छोंके मल हैं शराब बेचनेवाले कलाल, कलालोंके मल हैं हींजड़े और हींजड़ोंके मल हैं राजपुरोहित ॥ २५ ॥

राजयाजकयाज्यानां मद्रकाणां च यन्मलम् ।

तद् भवेद् वै तव मलं यद्यस्मान्न विमुञ्चसि ॥ २६ ॥

' राजपुरोहितोंके पुरोहितों तथा मद्रदेशवासियोंका जो मल है, वह सब तुम्हें प्राप्त हो, यदि इस सरोवरसे तुम मेरा उद्धार न कर दो ' ॥ २६ ॥

इति रक्षोपसृष्टेषु विषवीर्यहतेषु च ।

राक्षसं भैषजं प्रोक्तं संसिद्धवचनोत्तरम् ॥ २७ ॥

जिनपर राक्षसोंका उपद्रव है तथा जो विषके प्रभावसे मारे गये हैं, उनके लिये यह उत्तम सिद्ध वाक्य ही राक्षसके प्रभावका निवारण करनेवाला एवं जीवनरक्षक औषध बताया गया है ॥ २७ ॥

ब्राह्मं पञ्चालाः कौरवेयास्तु धर्म्यं सत्यं मत्स्याः शूरसेनाश्च यज्ञम् ।

पृष्ठ 1920

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प्राच्या दासा वृषला दाक्षिणात्याः स्तेना वाहीकाः संकरा वै सुराष्ट्राः ॥ २८ ॥

पांचाल देशके लोग वेदोक्त धर्मका आश्रय लेते हैं, कुरुदेशके निवासी धर्मानुकूल कार्य करते हैं, मत्स्यदेशके लोग सत्य बोलते और शूरसेननिवासी यज्ञ करते हैं । पूर्वदेशके लोग दासकर्म करनेवाले, दक्षिणके निवासी वृषल, बाहीक देशके लोग चोर और सौराष्ट्र - निवासी वर्णसंकर होते हैं ॥ २८ ॥

कृतघ्नता परवित्तापहारो मद्यपानं गुरुदारावमर्दः । वाक्पारुष्यं गोवधो रात्रिचर्या बहिर्गेहं परवस्त्रोपभोगः ॥ २ ९ ॥ येषां धर्मस्तान् प्रति नास्त्यधर्मो ह्यारट्टानां पञ्चनदान् धिगस्तु । कृतघ्नता, दूसरोंके धनका अपहरण, मदिरापान, गुरुपत्नीगमन, कटुवचनका प्रयोग, गोवध, रातके समय घरसे बाहर घूमना और दूसरोंके वस्त्रका उपभोग करना – ये सब जिनके धर्म हैं, उन आरट्टों और पंचनदवासियोंके लिये अधर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं । उन्हें धिक्कार है! ॥ २ ९ ३ ॥ आ पाञ्चाल्येभ्यः कुरवो नैमिषाश्च मत्स्याश्चैतेऽप्यथ जानन्ति धर्मम् । अथोदीच्याश्चाङ्गका मागधाश्च शिष्टान् धर्मानुपजीवन्ति वृद्धाः ॥ ३० ॥

पांचाल, कौरव, नैमिष और मत्स्यदेशोंके निवासी धर्मको जानते हैं । उत्तर, अंग तथा मगधदेशोंके वृद्ध पुरुष शास्त्रोक्त धर्मोंका आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं ॥

प्राचीं दिशं श्रिता देवा जातवेदःपुरोगमाः ।

दक्षिणां पितरो गुप्तां यमेन शुभकर्मणा ॥ ३१ ॥

प्रतीचीं वरुणः पाति पालयानः सुरान् बली ।

उदीचीं भगवान् सोमो ब्राह्मणैः सह रक्षति ॥ ३२ ॥

अग्नि आदि देवता पूर्वदिशाका आश्रय लेकर रहते हैं, पितर पुण्यकर्मा यमराजके द्वारा सुरक्षित दक्षिण दिशामें निवास करते हैं, बलवान् वरुण देवताओंका पालन करते हुए पश्चिम दिशाकी रक्षामें तत्पर रहते हैं और भगवान् सोम ब्राह्मणोंके साथ उत्तर दिशाकी रक्षा करते हैं ॥

तथा रक्षःपिशाचाश्च हिमवन्तं नगोत्तमम् ।

गुह्यकाश्च महाराज पर्वतं गन्धमादनम् ॥ ३३ ॥

ध्रुवः सर्वाणि भूतानि विष्णुः पाति जनार्दनः ।