04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2031–2040
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2031–2040
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जैसे यज्ञमें ऋत्विजोंद्वारा विधिपूर्वक आवाहन किये जानेपर दोनों अश्विनीकुमार नामक देवता पदार्पण करते हैं, उसी प्रकार युद्धनिपुण वे श्रीकृष्ण और अर्जुन भी मानो आह्वान किये जानेपर उस रणयज्ञमें पधारे थे ॥ ९ ३३ ॥ क्रुद्धौ तौ तु नरव्याघ्रौ वेगवन्तौ बभूवतुः ॥ ९ ४ ॥ तलशब्देन रुषितौ यथा नागौ महावने । जैसे विशाल वनमें तालीकी आवाजसे कुपित हुए दो हाथी दौड़े आ रहे हों, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए वे दोनों पुरुषसिंह बड़े वेगसे बढ़े आ रहे थे ॥ ९ ४३ ॥ विगाह्य तु रथानीकमश्वसंघांश्च फाल्गुनः ॥ ९ ५ ॥ व्यचरत् पृतनामध्ये पाशहस्त इवान्तकः । अर्जुन रथसेना और घुड़सवारोंके समूहमें घुसकर पाशधारी यमराजके समान कौरव- सेनाके मध्यभागमें विचरने लगे ॥ ९ ५३ ॥ तं दृष्ट्वा युधि विक्रान्तं सेनायां तव भारत ॥ ९ ६ ॥ संशप्तकगणान् भूयः पुत्रस्ते समचूचुदत् । भारत! युद्धमें पराक्रम प्रकट करनेवाले अर्जुनको आपकी सेनामें घुसा हुआ देख आपके पुत्र दुर्योधनने पुनः संशप्तकगणोंको उनपर आक्रमण करनेके लिये प्रेरित किया ॥ ९ ६३ ॥ ततो रथसहस्रेण द्विरदानां त्रिभिः शतैः ॥ ९ ७ ॥
चतुर्दशसहस्रैस्तु तुरगाणां महाहवे ।
द्वाभ्यां शतसहस्राभ्यां पदातीनां च धन्विनाम् ॥ ९ ८ ॥
शूराणां लब्धलक्ष्याणां विदितानां समन्ततः ।
अभ्यवर्तन्त कौन्तेयं छादयन्तो महारथाः ॥ ९९ ॥
शरवर्षैर्महाराज सर्वतः पाण्डुनन्दनम् । महाराज! तब एक हजार रथ, तीन सौ हाथी, चौदह हजार घोड़े और लक्ष्य वेधनेमें निपुण, सर्वत्र विख्यात एवं शौर्यसम्पन्न दो लाख पैदल सैनिक साथ लेकर संशप्तक महारथी कुन्तीकुमार पाण्डुनन्दन अर्जुनको अपने बाणोंकी वर्षासे आच्छादित करते हुए उनपर चढ़ आये ॥ ९ ७ – ९९ ३ ॥ स च्छाद्यमानः समरे शरैः परबलार्दनः ॥ १०० ॥
दर्शयन् रौद्रमात्मानं पाशहस्त इवान्तकः ।
निघ्नन् संशप्तकान् पार्थः प्रेक्षणीयतरोऽभवत् ॥ १०१ ॥
उस समय समरांगणमें उनके बाणोंसे आच्छादित होते हुए शत्रुसैन्यसंहारक कुन्तीकुमार अर्जुन पाशधारी यमराजके समान अपना भयंकर रूप दिखाते और संशप्तकोंका वध करते हुए अत्यन्त दर्शनीय हो रहे थे ॥
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ततो विद्युत्प्रभैर्बाणैः कार्तस्वरविभूषितैः ।
निरन्तरमिवाकाशमासीच्छन्नं किरीटिना ॥ १०२ ॥
तदनन्तर किरीटधारी अर्जुनके चलाये हुए विद्युत् के समान प्रकाशमान सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा आच्छादित हो आकाश ठसाठस भर गया ॥ १०२ ॥
किरीटिभुजनिर्मुक्तः सम्पतद्भिर्महाशरैः ।
समाच्छन्नं बभौ सर्वं काद्रवेयैरिव प्रभो ॥ १०३ ॥
प्रभो! किरीटधारी अर्जुनकी भुजाओंसे छूटकर सब ओर गिरनेवाले बड़े - बड़े बाणोंसे आवृत होकर वहाँका सारा प्रदेश सर्पोंसे व्याप्त- सा प्रतीत हो रहा था ॥ १०३ ॥
रुक्मपुङ्खान् प्रसन्नाग्रान् शरान् संनतपर्वणः ।
अवासृजदमेयात्मा दिक्षु सर्वासु पाण्डवः ॥ १०४ ॥
अमेय आत्मबलसे सम्पन्न पाण्डुनन्दन अर्जुन सम्पूर्ण दिशाओंमें सुवर्णमय पंख, स्वच्छ धार और झुकी हुई गाँठवाले बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ १०४ ॥
मही वियद् दिशः सर्वाः समुद्रा गिरयोऽपि वा ।
स्फुटन्तीति जना जज्ञुः पार्थस्य तलनिःस्वनात् ॥ १०५ ॥
वहाँ सब लोग यही समझने लगे कि ' अर्जुनके तलशब्द ( हथेलीकी आवाज) -से पृथ्वी, आकाश, सम्पूर्ण दिशाएँ, समुद्र और पर्वत भी फटे जा रहे हैं ' ॥ १०५ ॥
हत्वा दशसहस्राणि पार्थिवानां महारथः ।
संशप्तकानां कौन्तेयः प्रत्यक्षं त्वरितोऽभ्ययात् ॥ १०६ ॥
महारथी कुन्तीकुमार अर्जुन सबके देखते -देखते दस हजार संशप्तक नरेशोंका वध करके तुरंत आगे बढ़ गये ॥ १०६ ॥
प्रत्यक्षं च समासाद्य पार्थः काम्बोजरक्षितम् ।
प्रममाथ बलं बाणैर्दानवानिव वासवः ॥ १०७ ॥
जैसे इन्द्रने दानवोंका विनाश किया था, उसी प्रकार अर्जुनने हमारी आँखोंके सामने काम्बोजराजके द्वारा सुरक्षित सेनाके पास पहुँचकर अपने बाणोंद्वारा उसका संहार कर डाला ॥ १०७ ॥
प्रचिच्छेदाशु भल्लेन द्विषतामाततायिनाम् ।
शस्त्रं पाणिं तथा बाहुं तथापि च शिरांस्युत ॥ १०८ ॥
वे अपने भल्लके द्वारा आततायी शत्रुओंके शस्त्र, हाथ, भुजा तथा मस्तकोंको बड़ी फुर्तीसे काट रहे थे ॥ १०८ ॥
अङ्गाङ्गावयवैश्छिन्नैर्व्यायुधास्तेऽपतन् भुवि ।
विष्वग्वाताभिसम्भग्ना बहुशाखा इव द्रुमाः ॥ १० ९ ॥
जैसे सब ओरसे उठी हुई आँधीके उखाड़े हुए अनेक शाखाओंवाले वृक्ष धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार अपने शरीरका एक- एक अवयव कट जानेसे वे शस्त्रहीन शत्रु भूतलपर
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गिर पड़ते थे ॥ १० ९ ॥
हस्त्यश्वरथपत्तीनां व्रातान् निघ्नन्तमर्जुनम् ।
सुदक्षिणादवरजः शरवृष्ट्याभ्यवीवृषत् ॥ ११० ॥
तब हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंके समूहोंका संहार करनेवाले अर्जुनपर काम्बोजराज सुदक्षिणका छोटा भाई अपने बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ११० ॥
तस्यास्यतोऽर्धचन्द्राभ्यां बाहू परिघसंनिभौ ।
पूर्णचन्द्राभवक्त्रं च क्षुरेणाभ्यहरच्छिरः ॥ १११ ॥
उस समय अर्जुनने बाण- वर्षा करनेवाले उस वीरकी परिघके समान मोटी और सुदृढ़ भुजाओंको दो अर्धचन्द्राकार बाणोंसे काट डाला और एक छुरेके द्वारा पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले उसके मस्तकको भी धड़से अलग कर दिया ॥ १११ ॥
स पपात ततो वाहात् सुलोहितपरिस्रवः ।
मनःशिलागिरेः शृङ्गं वज्रेणेवावदारितम् ॥ ११२ ॥
फिर तो वह रक्तका झरना- सा बहाता हुआ अपने वाहनसे नीचे गिर पड़ा, मानो मैनसिलके पहाड़का शिखर वज्रसे विदीर्ण होकर भूतलपर आ गिरा हो ॥ ११२ ॥
सुदक्षिणादवरजं काम्बोजं ददृशुर्हतम् ।
प्रांशुं कमलपत्राक्षमत्यर्थं प्रियदर्शनम् ॥ ११३ ॥
काञ्चनस्तम्भसदृशं भिन्नं हेमगिरिं यथा । उस समय सब लोगोंने देखा कि सुदक्षिणका छोटा भाई काम्बोजदेशीय वीर जो देखनेमें अत्यन्त प्रिय, कमल -दलके समान नेत्रोंसे सुशोभित तथा सोनेके खम्भेके समान ऊँचा कदका था, मारा जाकर विदीर्ण हुए सुवर्णमय पर्वतके समान धरतीपर पड़ा है ॥ ११३ ॥
ततोऽभवत् पुनर्युद्धं घोरमत्यर्थमद्भुतम् ॥ ११४ ॥
नानावस्थाश्च योधानां बभूवुस्तत्र युद्धयताम् । तदनन्तर पुनः अत्यन्त घोर एवं अद्भुत युद्ध होने लगा। वहाँ युद्ध करते हुए योद्धाओंकी विभिन्न अवस्थाएँ प्रकट होने लगीं ॥ ११४३ ॥
एकेषुनिहतैरश्वैः काम्बोजैर्यवनैः शकैः ॥ ११५ ॥
शोणिताक्तैस्तदा रक्तं सर्वमासीद् विशाम्पते । प्रजानाथ! एक- एक बाणसे मारे गये रक्तरंजित काबुली घोड़ों, यवनों और शकोंके खूनसे वह सारा युद्धस्थल लाल हो गया था ॥ ११५३ ॥
रथैर्हताश्वसूतैश्च हतारोहैश्च वाजिभिः ॥ ११६ ॥
द्विरदैश्च हतारोहैर्महामात्रैर्हतद्विपैः ।
अन्योन्येन महाराज कृपो घोरो जनक्षयः ॥ ११७ ॥
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रथोंके घोड़े और सारथि, घोड़ोंके सवार, हाथियोंके आरोही, महावत और स्वयं हाथी भी मारे गये थे । महाराज! इन सबने परस्पर प्रहार करके घोर जनसंहार मचा दिया था ॥ ११६-११७ ॥
तस्मिन् प्रपक्षे पक्षे च निहते सव्यसाचिना ।
अर्जुनं जयतां श्रेष्ठं त्वरितो द्रौणिरभ्ययात् ॥ ११८ ॥
विधुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ।
आददानः शरान् घोरान् स्वरश्मीनिव भास्करः ॥ ११ ९ ॥
उस युद्धमें जब सव्यसाची अर्जुनने शत्रुओंके पक्ष और प्रपक्ष दोनोंको मार गिराया, तब द्रोणपुत्र अश्वत्थामा अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको हिलाता और अपनी किरणोंको धारण करनेवाले सूर्यदेवके समान भयंकर बाण हाथमें लेता हुआ तुरंत विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनके सामने आ पहुँचा ॥ ११८-११९ ॥
क्रोधामर्षविवृत्तास्यो लोहिताक्षो बभौ बली ।
अन्तकाले यथा क्रुद्धो मृत्युः किङ्करदण्डभृत् ॥ १२० ॥
उस समय क्रोध और अमर्षसे उसका मुँह खुला हुआ था, नेत्र रक्तवर्ण हो रहे थे तथा वह बलवान् अश्वत्थामा अन्तकालमें किंकर नामक दण्ड धारण करनेवाले कुपित यमराजके समान जान पड़ता था ॥ १२० ॥
ततः प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि संघशः ।
तैर्विसृष्टैर्महाराज व्यद्रवत् पाण्डवी चमूः ॥ १२१ ॥
महाराज! तत्पश्चात् वह समूह के समूह भयंकर बाणोंकी वर्षा करने लगा । उसके छोड़े हुए बाणोंसे व्यथित हो पाण्डव- सेना भागने लगी ॥ १२१ ॥
स दृष्ट्वैव तु दाशार्हं स्यन्दनस्थं विशाम्पते ।
पुनः प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि मारिष ॥ १२२ ॥
माननीय प्रजानाथ! वह रथपर बैठे हुए श्रीकृष्णकी ओर देखकर ही पुनः उनके ऊपर भयानक बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ १२२ ॥
तैः पतद्भिर्महाराज द्रौणिमुक्तैः समन्ततः ।
संछादितौ रथस्थौ तावुभौ कृष्णधनंजयौ ॥ १२३ ॥
महाराज! अश्वत्थामाके हाथोंसे छूटकर सब ओर गिरनेवाले उन बाणोंसे रथपर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ही ढक गये ॥ १२३ ॥
ततः शरशतैस्तीक्ष्णैरश्वत्थामा प्रतापवान् ।
निश्चेष्टौ तावुभौ युद्धे चक्रे माधवपाण्डवौ ॥ १२४ ॥
तत्पश्चात् प्रतापी अश्वत्थामाने सैकड़ों तीखे बाणोंद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको युद्धस्थलमें निश्चेष्ट कर दिया ॥ १२४ ॥
हाहाकृतमभूत् सर्वं स्थावरं जङ्गमं तथा ।
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चराचरस्य गोप्तारौ दृष्ट्वा संछादितौ शरैः ॥ १२५ ॥
चराचर जगत्की रक्षा करनेवाले उन दोनों वीरोंको बाणोंसे आच्छादित हुआ देख स्थावर- जंगम समस्त प्राणी हाहाकार कर उठे ॥ १२५ ॥
सिद्धचारणसंघाश्च सम्पेतुस्ते समन्ततः ।
चिन्तयन्तो भवेदद्य लोकानां स्वस्त्यपीति च ॥ १२६ ॥
सिद्धों और चारणोंके समुदाय सब ओरसे वहाँ आ पहुँचे और यह चिन्तन करने लगे कि ‘ आज सम्पूर्ण जगत्का कल्याण हो' ॥ १२६ ॥
न मया तादृशो राजन् दृष्टपूर्वः पराक्रमः ।
संग्रामे यादृशो द्रौणेः कृष्णौ संछादयिष्यतः ॥ १२७ ॥
राजन्! समरांगणमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको बाणोंद्वारा आच्छादित करनेवाले अश्वत्थामाका जैसा पराक्रम उस दिन देखा गया, वैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था ॥ १२७ ॥
द्रौणेस्तु धनुषः शब्दमहितत्रासनं रणे ।
अश्रौषं बहुशो राजन् सिंहस्य निनदो यथा ॥ १२८ ॥
महाराज! मैंने रणभूमिमें अश्वत्थामाके धनुषकी शत्रुओंको भयभीत कर देनेवाली टंकार बारंबार सुनी, मानो किसी सिंहके दहाड़नेकी आवाज हो रही हो ॥
ज्या चास्य चरतो युद्धे सव्यदक्षिणमस्यतः ।
विद्युदम्बुदमध्यस्था भ्राजमानेव साभवत् ॥ १२ ९ ॥
जैसे मेघोंकी घटाके बीचमें बिजली चमकती है, उसी प्रकार युद्धमें दायें - बायें बाण-वर्षापूर्वक विचरते हुए अशत्थामाके धनुषकी प्रत्यंचा भी प्रकाशित हो रही थी ॥ १२ ९ ॥
स तथा क्षिप्रकारी च दृढहस्तश्च पाण्डवः ।
प्रमोहं परमं गत्वा प्रेक्ष्य तं द्रोणजं ततः ॥ १३० ॥
विक्रमं विहतं मेन आत्मनः स महायशाः ।
तस्यास्य समरे राजन् वपुरासीत् सुदुर्दृशम् ॥ १३१ ॥
युद्धमें फुर्ती करने और दृढ़तापूर्वक हाथ चलानेवाले महायशस्वी पाण्डुनन्दन अर्जुन द्रोणकुमारकी ओर देखकर भारी मोहमें पड़ गये और अपने पराक्रमको प्रतिहत हुआ मानने लगे । राजन्! उस समरांगणमें अश्वत्थामाके शरीरकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन हो रहा था ॥ १३०-१३१ ॥
द्रौणिपाण्डवयोरेवं वर्तमाने महारणे ।
वर्धमाने च राजेन्द्र द्रोणपुत्रे महाबले ॥ १३२ ॥
हीयमाने च कौन्तेये कृष्णे रोषः समाविशत् ।
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राजेन्द्र! इस प्रकार अश्वत्थामा और अर्जुनमें महान् युद्ध आरम्भ होनेपर जब महाबली द्रोणपुत्र बढ़ने लगा और कुन्तीकुमार अर्जुनका पराक्रम मन्द पड़ने लगा, तब भगवान् श्रीकृष्णको बड़ा क्रोध हुआ ॥ १३२ ॥
स रोषान्निःश्वसन् राजन् निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ १३३ ॥
द्रौणिं ह्यपश्यत् संग्रामे फाल्गुनं च मुहुर्मुहुः । राजन्! वे रोषसे लंबी साँस खींचते और अपने नेत्रोंद्वारा दग्ध-सा करते हुए युद्धस्थलमें अश्वत्थामा और अर्जुनकी ओर बारंबार देखने लगे ॥ १३३३ ॥
ततः क्रुद्धोऽब्रवीत् कृष्णः पार्थं सप्रणयं तदा ॥ १३४ ॥
अत्यद्भुतमिदं पार्थ तव पश्यामि संयुगे ।
अतिशेते हि यत्र त्वां द्रोणपुत्रोऽद्य भारत ॥ १३५ ॥
तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए श्रीकृष्ण उस समय अर्जुनसे प्रेमपूर्वक बोले — ‘ पार्थ! युद्धस्थलमें तुम्हारा यह उपेक्षायुक्त अद्भुत बर्ताव देख रहा हूँ। भारत! आज द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तुमसे सर्वथा बढ़ता जा रहा है ॥ १३४-१३५ ॥
कच्चिद् वीर्यं यथापूर्वं भुजयोर्वा बलं तव ।
कच्चित् ते गाण्डिवं हस्ते रथे तिष्ठसि चार्जुन ॥ १३६ ॥
' अर्जुन! तुम्हारी शारीरिक शक्ति पहलेके समान ही ठीक है न? अथवा तुम्हारी भुजाओंमें पूर्ववत् बल तो है न? तुम्हारे हाथमें गाण्डीव धनुष तो है न? और तुम रथपर ही खड़े हो न? ॥ १३६ ॥
कच्चित् कुशलिनौ बाहू मुष्टिर्वा न व्यशीर्यत ।
उदीर्यमाणं हि रणे पश्यामि द्रौणिमाहवे ॥ १३७ ॥
' क्या तुम्हारी दोनों भुजाएँ सकुशल हैं? तुम्हारी मुट्ठी तो ढीली नहीं हो गयी है? अर्जुन! मैं देखता हूँ कि युद्धस्थलमें अश्वत्थामा तुमसे बढ़ा जा रहा है ॥ १३७ ॥
गुरुपुत्र इति ह्येनं मानयन् भरतर्षभ ।
उपेक्षां कुरु मा पार्थ नायं काल उपेक्षितुम् ॥ १३८ ॥
‘ भरतश्रेष्ठ! कुन्तीनन्दन! यह मेरे गुरुका पुत्र है, ऐसा मानकर तुम इसके प्रति उपेक्षाभाव न करो । यह समय उपेक्षा करनेका नहीं है ' ॥ १३८ ॥
एवमुक्तस्तु कृष्णेन गृह्य भल्लांश्चतुर्दश ।
त्वरमाणस्त्वराकाले द्रौणेर्धनुरथच्छिनत् ॥ १३ ९ ॥
ध्वजं छत्रं पताकाश्च खड्गं शक्तिं गदां तथा ।
जत्रुदेशे च सुभृशं वत्सदन्तैरताडयत् ॥ १४० ॥
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने चौदह भल्ल हाथमें लेकर शीघ्रता करनेके अवसरपर फुर्ती दिखायी और अश्वत्थामाके धनुषको काट डाला । साथ ही उसके ध्वज,
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छत्र, पताका, खड्ग, शक्ति और गदाके भी टुकड़े -टुकड़े कर दिये । तदनन्तर अश्वत्थामाके गलेकी हँसलीपर ‘ वत्सदन्त' नामक बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ १३ ९ -१४० ॥
स मूर्च्छा परमां गत्वा ध्वजयष्टिं समाश्रितः ।
तं विसंज्ञं महाराज शत्रुणा भृशपीडितम् ॥ १४१ ॥
अपोवाह रणात् सूतो रक्षमाणो धनंजयात् । महाराज! उस आघातसे भारी मूर्च्छामें पड़कर अश्वत्थामा ध्वजदण्डके सहारे लुढ़क गया । शत्रुसे अत्यन्त पीड़ित एवं अचेत हुए अश्वत्थामाको उसका सारथि अर्जुनसे उसकी रक्षा करता हुआ रणभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ १४१३ ॥
एतस्मिन्नेव काले च विजयः शत्रुतापनः ॥ १४२ ॥
व्यहनत् तावकं सैन्यं शतशोऽथ सहस्रशः ।
पश्यतस्तस्य वीरस्य तव पुत्रस्य भारत ॥ १४३ ॥
भारत! इसी समय शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने आपकी सेनाके सैकड़ों और हजारों योद्धाओंको आपके वीर पुत्रके देखते - देखते मार डाला ॥ १४२-१४३ ॥
एवमेष क्षयो वृत्तस्तावकानां परैः सह ।
क्रूरो विशसनो घोरो राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ १४४ ॥
राजन्! इस प्रकार आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप शत्रुओंके साथ आपके योद्धाओंका यह विनाशकारी, भयंकर एवं क्रूरतापूर्ण संग्राम हुआ ॥ १४४ ॥
संशप्तकांश्च कौन्तेयः कुरूंश्चापि वृकोदरः ।
वसुषेणश्च पञ्चालान् क्षणेन व्यधमद् रणे ॥ १४५ ॥
उस समय रणभूमिमें कुन्तीकुमार अर्जुनने संशप्तकोंका, भीमसेनने कौरवोंका और कर्णने पांचाल - सैनिकोंका क्षणभरमें संहार कर डाला ॥ १४५ ॥
वर्तमाने तथा रौद्रे राजन् वीरवरक्षये ।
उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः ॥ १४६ ॥
राजन्! जब बड़े - बड़े वीरोंका विनाश करनेवाला वह भीषण संग्राम हो रहा था, उस समय चारों ओर असंख्य कबन्ध खड़े दिखायी देते थे ॥ १४६ ॥
युधिष्ठिरोऽपि संग्रामे प्रहारैर्गाढवेदनः ।
क्रोशमात्रमपक्रम्य तस्थौ भरतसत्तम ॥ १४७ ॥
भरतश्रेष्ठ! संग्राममें युधिष्ठिरपर बहुत अधिक प्रहार किये गये थे, जिससे उन्हें गहरी वेदना हो रही थी । वे रणभूमिसे एक कोस दूर हटकर खड़े थे ॥ १४७ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥
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* संशप्तकोंके सेनापति त्रिगर्तराज सुशर्मा कौरवोंके पक्षमें था। यह सुशर्मा उससे भिन्न पाण्डव पक्षका योद्धा था ।
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सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः दुर्योधनका सैनिकोंको प्रोत्साहन देना और अश्वत्थामाकी प्रतिज्ञा संजय उवाच
दुर्योधनस्ततः कर्णमुपेत्य भरतर्षभ ।
अब्रवीन्मद्रराजं च तथैवान्यांश्च पार्थिवान् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर दुर्योधन कर्णके पास जाकर मद्रराज शल्य तथा अन्य राजाओंसे बोला- ॥ १ ॥
यदृच्छयैतत् सम्प्राप्तं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः कर्ण लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ २ ॥
‘ कर्ण! यह स्वर्गका खुला हुआ द्वाररूप युद्ध बिना इच्छाके अपने- आप प्राप्त हुआ है । ऐसे युद्धको सुखी क्षत्रियगण ही पाते हैं ॥ २ ॥
सदृशौः क्षत्रियैः शूरैः शूराणां युद्ध्यतां युधि ।
इष्टं भवति राधेय तदिदं समुपस्थितम् ॥ ३ ॥
‘ राधानन्दन! अपने समान बलवाले शूरवीर क्षत्रियोंके साथ रणभूमिमें जूझनेवाले शूरवीरोंको जो अभीष्ट होता है, वही यह संग्राम हमारे सामने उपस्थित है ॥ ३ ॥
हत्वा च पाण्डवान् युद्धे स्फीतामुर्वीमवाप्स्यथ ।
निहता वा परैर्युद्धे वीरलोकमवाप्स्यथ ॥ ४ ॥
‘ तुम सब लोग युद्धस्थलमें पाण्डवोंका वध करके भूतलका समृद्धिशाली राज्य प्राप्त करोगे अथवा शत्रुओंद्वारा युद्धमें मारे जाकर वीरगति पाओगे’ ॥ ४ ॥
दुर्योधनस्य तच्छ्रुत्वा वचनं क्षत्रियर्षभाः ।
हृष्टा नादानुदक्रौशन् वादित्राणि च सर्वशः ॥ ५ ॥
दुर्योधनकी वह बात सुनकर क्षत्रियशिरोमणि वीर हर्षमें भरकर सिंहनाद करने और सब प्रकारके बाजे बजाने लगे ॥ ५ ॥
ततः प्रमुदिते तस्मिन् दुर्योधनबले तदा ।
हर्षयंस्तावकान् योधान् द्रौणिर्वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
तदनन्तर आनन्दमग्न हुई दुर्योधनकी उस सेनामें अश्वत्थामाने आपके योद्धाओंका हर्ष बढ़ाते हुए कहा- ॥ ६ ॥
प्रत्यक्षं सर्वसैन्यानां भवतां चापि पश्यताम् ।
न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥ ७ ॥
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‘ समस्त सैनिकोंके सामने आपलोगोंके देखते - देखते जिन्होंने हथियार डाल दिया था, उन मेरे पिताको धृष्टद्युम्नने मार गिराया था ॥ ७ ॥
स तेनाहममर्षेण मित्रार्थे चापि पार्थिवाः ।
सत्यं वः प्रतिजानामि तद् वाक्यं मे निबोधत ॥ ८ ॥
‘ राजाओ! उससे होनेवाले अमर्षके कारण तथा मित्र दुर्योधनके कार्यकी सिद्धिके लिये मैं आपलोगोंसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, आपलोग मेरी यह बात सुनिये ॥ ८ ॥
धृष्टद्युम्नमहत्वाहं न विमोक्ष्यामि दंशनम् ।
अनृतायां प्रतिज्ञायां नाहं स्वर्गमवाप्नुयाम् ॥ ९ ॥
‘ मैं धृष्टद्युम्नको मारे बिना अपना कवच नहीं उतारूंगा । ' यदि यह मेरी प्रतिज्ञा झूठी हो जाय तो मुझे स्वर्गलोककी प्राप्ति न हो ॥ ९ ॥
अर्जुनो भीमसेनश्च योधो यो रक्षिता रणे ।
धृष्टद्युम्नस्य तं संख्ये निहनिष्यामि सायकैः ॥ १० ॥
' अर्जुन और भीमसेन आदि जो योद्धा रणभूमिमें धृष्टद्युम्नकी रक्षा करेगा, उसे मैं युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा मार डालूँगा ' ॥ १० ॥
एवमुक्ते ततः सर्वा सहिता भारतीचमूः ।
अभ्यद्रवत कौन्तेयांस्तथा ते चापि पाण्डवाः ॥ ११ ॥
अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर सारी कौरव सेना एक साथ होकर कुन्तीपुत्रोंके सैनिकोंपर टूट पड़ी तथा पाण्डवोंने भी कौरवोंपर धावा बोल दिया ॥ ११ ॥
स संनिपातो रथयूथपानां बभूव राजन्नतिभीमरूपः । जनक्षयः कालयुगान्तकल्पः प्रावर्तताग्रे कुरुसृञ्जयानाम् ॥ १२ ॥
राजन्! रथयूथपतियोंका वह संघर्ष बड़ा भयंकर था । कौरवों और सृजयोंके आगे प्रलयकालके समान जनसंहार आरम्भ हो गया था ॥ १२ ॥
ततः प्रवृत्ते युधि सम्प्रहारे
भूतानि सर्वाणि सदैवतानि ।
आसन् समेतानि सहाप्सरोभि- र्दिदृक्षमाणानि नरप्रवीरान् ॥ १३ ॥
तदनन्तर युद्धस्थलमें जब भीषण मार-काट होने लगी, उस समय देवताओं तथा अप्सराओंसहित समस्त प्राणी उन नरवीरोंको देखनेकी इच्छासे एकत्र हो गये थे ॥ १३ ॥
दिव्यैश्च माल्यैर्विविधैश्च गन्धै- र्दिव्यैश्च रत्नैर्विविधैर्नराग्रयान् । रणे स्वकर्मोद्वहतः प्रवीरा-