श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 2041–2050

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2041–2050

पृष्ठ 2041

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नवाकिरन्नप्सरसः प्रहृष्टाः ॥ १४ ॥

रणभूमिमें अपने कर्मका ठीक -ठीक भार वहन करनेवाले मनुष्योंमें श्रेष्ठ प्रमुख वीरोंपर हर्षमें भरी हुई अप्सराएँ दिव्य हारों, भाँति - भाँतिके सुगन्धित पदार्थों एवं नाना प्रकारके दिव्य रत्नोंकी वर्षा करती थीं ॥ १४ ॥

समीरणस्तांश्च निषेव्य गन्धान् सिषेव सर्वानपि योधमुख्यान् । निषेव्यमाणास्त्वनिलेन योधाः परस्परघ्ना धरणीं निपेतुः ॥ १५ ॥

वायु उन सुगन्धोंको ग्रहण करके समस्त श्रेष्ठ योद्धाओंकी सेवामें लग जाती थी और उस वायुसे सेवित योद्धा एक- दूसरेको मारकर धराशायी हो जाते थे ॥ १५ ॥

सा दिव्यमाल्यैरवकीर्यमाणा सुवर्णपुङ्खैश्च शरैर्विचित्रैः । नक्षत्रसंघैरिव चित्रिता द्यौः क्षितिर्बभौ योधवरैर्विचित्रा ॥ १६ ॥

दिव्य मालाओं तथा सुवर्णमय पंखवाले विचित्र बाणोंसे आच्छादित और श्रेष्ठ योद्धाओंसे विचित्र शोभाको प्राप्त हुई वह रणभूमि नक्षत्रसमूहोंसे चित्रित आकाशके समान सुशोभित हो रही थी ॥ १६ ॥

ततोऽन्तरिक्षादपि साधुवादै- र्वादित्रघोषैः समुदीर्यमाणः । ज्याघोषनेमिस्वननादचित्रः समाकुलः सोऽभवत् सम्प्रहारः ॥ १७ ॥

तत्पश्चात् आकाशसे भी साधुवाद एवं वाद्योंकी ध्वनि आने लगी, जिससे प्रत्यंचाकी टंकारों और रथोंके पहियोंके घर्घर शब्दोंसे युक्त वह संग्राम अधिक कोलाहलपूर्ण हो उठा था ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अश्वत्थामप्रतिज्ञायां सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अश्वत्थामाका प्रतिज्ञाविषयक सत्तावनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥

पृष्ठ 2042

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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः अर्जुनका श्रीकृष्णसे युधिष्ठिरके पास चलनेका आग्रह तथा श्रीकृष्णका उन्हें युद्धभूमि दिखाते और वहाँका समाचार बताते हुए रथको आगे बढ़ाना संजय उवाच

एवमेष महानासीत् संग्रामः पृथिवीक्षिताम् ।

क्रुद्धेऽर्जुने तथा कर्णे भीमसेने च पाण्डवे ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! इस प्रकार अर्जुन, कर्ण एवं पाण्डुपुत्र भीमसेनके कुपित होनेपर राजाओंका वह संग्राम उत्तरोत्तर बढ़ने लगा ॥ १ ॥

द्रोणपुत्रं पराजित्य जित्वा चान्यान् महारथान् ।

अब्रवीदर्जुनो राजन् वासुदेवमिदं वचः ॥ २ ॥

नरेश्वर! द्रोणपुत्र तथा अन्यान्य महारथियोंको हराकर और उनपर विजय पाकर अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा- ॥ २ ॥

पश्य कृष्ण महाबाहो द्रवन्तीं पाण्डवीं चमूम् कर्णं पश्य च संग्रामे कालयन्तं महारथान् ॥ ३ ॥

' महाबाहु श्रीकृष्ण! देखिये, वह पाण्डव- सेना भागी जा रही है तथा कर्ण समरांगणमें बड़े - बड़े महारथियोंको कालके गालमें भेज रहा है ॥ ३ ॥

न च पश्यामि दाशार्ह धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।

नापि केतुर्युधां श्रेष्ठ धर्मराजस्य दृश्यते ॥ ४ ॥

‘दाशार्ह! इस समय मुझे धर्मराज युधिष्ठिर नहीं दिखायी दे रहे हैं । योद्धाओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! धर्मराजके ध्वजका भी दर्शन नहीं हो रहा है ॥ ४ ॥

त्रिभागश्चावशिष्टोऽयं दिवसस्य जनार्दन ।

न च मां धार्तराष्ट्रेषु कच्चिद् युध्यति संयुगे ॥ ५ ॥

‘ जनार्दन! इस सम्पूर्ण दिनके ये तीन भाग ही शेष रह गये हैं । दुर्योधनकी सेनाओंमेंसे कोई भी मेरे साथ युद्ध नहीं कर रहा है ' ॥ ५ ॥

तस्मात् त्वं मत्प्रियं कुर्वन् याहि यत्र युधिष्ठिरः ।

दृष्ट्वा कुशलिनं युद्धे धर्मपुत्रं सहानुजम् ॥ ६ ॥

पुनर्योद्धास्मि वार्ष्णेय शत्रुभिः सह संयुगे ।

पृष्ठ 2043

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‘ अतः आप मेरा प्रिय करनेके लिये वहीं चलिये, जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं । वार्ष्णेय! भाइयोंसहित धर्मपुत्र युधिष्ठिरको युद्धमें सकुशल देखकर मैं पुनः समरांगणमें शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा' ॥ ६३ ॥

ततः प्रायाद् रथेनाशु बीभत्सोर्वचनाद्धरिः ॥ ७ ॥

यतो युधिष्ठिरो राजा सृञ्जयाश्च महारथाः । तदनन्तर अर्जुनके कथनानुसार श्रीकृष्ण तुरंत ही रथके द्वारा उसी ओर चल दिये, जहाँ राजा युधिष्ठिर और सृजय महारथी मौजूद थे ॥ ७३ ॥

अयुध्यंस्तावकैः सार्धं मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ८ ॥

ततः संग्रामभूमिं तां वर्तमाने जनक्षये ।

अवेक्षमाणो गोविन्दः सव्यसाचिनमब्रवीत् ॥ ९ ॥

वे मृत्युको ही युद्धसे निवृत्त होनेका निमित्त बनाकर आपके योद्धाओंके साथ युद्ध कर रहे थे । तदनन्तर जहाँ वह भारी जनसंहार हो रहा था, उस संग्रामभूमिको देखते हुए भगवान् श्रीकृष्ण सव्यसाची अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ ८ - ९ ॥

पश्य पार्थ महारौद्रो वर्तते भरतक्षयः ।

पृथिव्यां क्षत्रियाणां वै दुर्योधनकृते महान् ॥ १० ॥

' कुन्तीनन्दन! देखो, दुर्योधनके कारण भरत- वंशियोंका तथा भूमण्डलके अन्य क्षत्रियोंका महाभयंकर विनाश हो रहा है ॥ १० ॥

पश्य भारत चापानि रुक्मपृष्ठानि धन्विनाम् ।

मृतानामपविद्धानि कलापांश्च महाधनान् ॥ ११ ॥

‘ भरतनन्दन! देखो, मरे हुए धनुर्धरोंके ये सोनेके पृष्ठभागवाले धनुष और बहुमूल्य तरकस फेंके पड़े हैं ॥ ११ ॥

जातरूपमयैः पुङ्खैः शरांश्चानतपर्वणः ।

तैलधौतांश्च नाराचान् निर्मुक्तान् पन्नगानिव ॥ १२ ॥

' सुवर्णमय पंखोंसे युक्त झुकी हुई गाँठवाले बाण तथा तेलमें धोये हुए नाराच केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान दिखायी दे रहे हैं ॥ १२ ॥

हस्तिदन्तत्सरून् खड्गान् जातरूपपरिष्कृतान् ।

वर्माणि चापविद्धानि रुक्मगर्भाणि भारत ॥ १३ ॥

‘ भारत! हाथीके दाँतकी बनी हुई मूँठवाले सुवर्णजटित खड्ग तथा स्वर्णभूषित कवच भी फेंके पड़े हैं ॥ १३ ॥

सुवर्णविकृतान् प्रासाञ्शक्तीः कनकभूषणाः ।

जाम्बूनदमयैः पट्टैर्बद्धाश्च विपुला गदाः ॥ १४ ॥

' देखो, ये सुवर्णमय प्रास, स्वर्णभूषित शक्तियाँ तथा सोनेके बने हुए पत्रोंसे मढ़ी हुई विशाल गदाएँ पड़ी हैं ॥ १४ ॥

पृष्ठ 2044

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जातरूपमयीश्चः पट्टिशान् हेमभूषणान् ।

दण्डैः कनकचित्रैश्च विप्रविद्धान् परश्वधान् ॥ १५ ॥

'स्वर्णमयी ऋष्टि, हेमभूषित पट्टिश तथा सुवर्णजटित दण्डोंसे युक्त फरसे फेंके हुए ॥ १५ ॥

अयःकुन्तांश्च पतितान् मुसलानि गुरूणि च ।

शतघ्नीः पश्य चित्राश्च विपुलान् परिघांस्तथा ॥ १६ ॥

' लोहेके कुन्त ( भाले ), भारी मूसल, विचित्र शतघ्नियाँ और विशाल परिघ इधर - उधर पड़े हैं ॥ १६ ॥

चक्राणि चापविद्धानि तोमरांश्च महारणे ।

नानाविधानि शस्त्राणि प्रगृह्य जयगृद्धिनः ॥ १७ ॥

जीवन्त इव दृश्यन्ते गततत्त्वास्तरस्विनः । ‘ इस महासमरमें फेंके गये इन चक्रों और तोमरोंको भी देखो । विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वेगशाली योद्धा नाना प्रकारके शस्त्रोंको हाथमें लिये हुए ही अपने प्राण खो बैठे हैं; तथापि जीवित - से दिखायी देते हैं ॥ १७३ ॥

गदाविमथितैर्गात्रैर्मुसलैर्भिन्नमस्तकान् ॥ १८ ॥

गजवाजिरथक्षुण्णान् पश्य योधान् सहस्रशः । ‘देखो, सहस्रों योद्धाओंके शरीर गदाओंके आघातसे चूर- चूर हो रहे हैं । मूसलोंकी मारसे उनके मस्तक फट गये हैं, तथा हाथी, घोड़े एवं रथोंसे वे कुचल दिये गये हैं ॥ १८३ || मनुष्यहयनागानां शरशक्त्यृष्टिपट्टिशैः ॥ १ ९ ॥

परिघैरायसैर्घोरैरयः कुन्तैः परश्वधैः ।

शरीरैर्बहुभिश्छिन्नैः शोणितौघपरिप्लुतैः ॥ २० ॥

गतासुभिरमित्रघ्न संवृता रणभूमयः । ‘ शत्रुसूदन! बाण, शक्ति, ऋष्टि, पट्टिश, लोहमय परिघ, भयंकर लोहनिर्मित कुन्त और फरसोंसे मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके बहुसंख्यक शरीर छिन्न- भिन्न होकर खूनसे लथपथ और प्राणशून्य हो गये हैं और उनके द्वारा रणभूमि आच्छादित दिखायी देती है ॥ १ ९-२० || बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः साङ्गदैर्हेमभूषितैः ॥ २१ ॥

सतलत्रैः सकेयूरैर्भाति भारत मेदिनी । ' भारत! चन्दनचर्चित, अंगदों और केयूरोंसे अलंकृत, सोनेके अन्य आभूषणोंसे विभूषित तथा दस्तानोंसे युक्त वीरोंकी कटी हुई भुजाओंसे युद्धभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही है ॥ २१ ॥

साङ्गुलित्रैर्भुजाग्रैश्च विप्रविद्धैरलंकृतैः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 2045

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हस्तिहस्तोपमैश्छिन्नैरूरुभिश्च तरस्विनाम् ।

बद्धचूडामणिवरैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः ॥ २३ ॥

पतितैर्ऋषभाक्षाणां विराजति वसुंधरा । ‘ साँड़के समान विशाल नेत्रोंवाले वेगशाली वीरोंके दस्तानोंसहित आभूषणभूषित हाथ कटकर गिरे हैं । हाथियोंके शुण्डदण्डोंके समान मोटी जाँघें खण्डित होकर पड़ी हैं तथा श्रेष्ठ चूड़ामणि धारण किये कुण्डलमण्डित मस्तक भी धड़से अलग होकर पड़े हैं । इन सबके द्वारा रणभूमिकी अपूर्व शोभा हो रही है ॥ २२-२३ ॥ कबन्धैः शोणितादिग्धैश्छिन्नगात्रशिरोधरैः ॥ २४ ॥

भूर्भाति भरतश्रेष्ठ शान्तार्चिर्भिरिवाग्निभिः । ‘ भरतश्रेष्ठ! जिनकी गर्दन कट गयी है, विभिन्न अंग छिन्न -भिन्न हो गये हैं तथा जो खूनसे लथपथ होकर लाल दिखायी देते हैं, उन कबन्धों ( धड़ों ) -से रणभूमि ऐसी जान पड़ती है, मानो वहाँ जगह - जगह बुझी हुई लपटोंवाले आगके अंगारे पड़े हों ॥ २४ ॥

रथांश्च बहुधा भग्नान् हेमकिङ्किणिनः शुभान् ॥ २५ ॥

वाजिनश्च हतान् पश्य निष्कीर्णान्त्राञ्शराहतान् । ‘ देखो, जिनमें सोनेकी छोटी-छोटी घंटियाँ लगी हैं, ऐसे बहुत- से सुन्दर रथ टुकड़े-टुकड़े होकर पड़े हैं । वे बाणोंसे घायल हुए घोड़े मरे पड़े हैं और उनकी आँतें बाहर निकल आयी हैं ॥ २५ ॥

अनुकर्षानुपासांगान् पताका विविधध्वजान् ॥ २६ ॥

रथिनां च महाशङ्खान् पाण्डुरांश्च प्रकीर्णकान् । ‘ अनुकर्ष, उपासंग, पताका, नाना प्रकारके ध्वज तथा रथियोंके बड़े - बड़े श्वेत शंख बिखरे पड़े हैं ॥ निरस्तजिह्वान् मातङ्गान् शयानान् पर्वतोपमान् ॥ २७ ॥

वैजयन्तीर्विचित्राश्च हतांश्च गजवाजिनः । ' जिनकी जीभें बाहर निकल आयी हैं, ऐसे अगणित पर्वताकार हाथी धरतीपर सदाके लिये सो गये हैं । विचित्र वैजयन्ती पताकाएँ खण्डित होकर पड़ी हैं तथा हाथी और घोड़े मारे गये हैं ॥ २७३ ॥

वारणानां परिस्तोमांस्तथैवाजिनकम्बलान् ॥ २८ ॥

विपाटितविचित्रांश्च रूप्यचित्रान् कुथाङ्कुशान् ।

भिन्नाश्च बहुधा घण्टा महद्भिः पतितैर्गजैः ॥ २ ९ ॥

' हाथियोंके विचित्र झूल, मृगचर्म और कम्बल चिथड़े -चिथड़े होकर गिरे हैं । चाँदीके तारोंसे चित्रित झूल, अंकुश और अनेक टुकड़ोंमें बँटे हुए बहुत - से घंटे महान् गजराजोंके साथ ही धरतीपर गिरे पड़े हैं ॥ २८-२९ ॥ वैदूर्यदण्डांश्च शुभान् पतितानङ्कुशान् भुवि ।

पृष्ठ 2046

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बद्धाः सादिभुजाग्रेषु सुवर्णविकृताः कशाः ॥ ३० ॥

'जिनमें वैदूर्यमणिके डंडे लगे हुए हैं, ऐसे बहुत- से सुन्दर अंकुश पृथ्वीपर पड़े हैं । सवारोंके हाथोंमें सटे हुए कितने ही सुवर्णनिर्मित कोड़े कटकर गिरे हैं ॥ ३० ॥

विचित्रमणिचित्रांश्च जातरूपपरिष्कृतान् ।

अश्वास्तरपरिस्तोमान् राङ्कवान् पतितान् भुवि ॥ ३१ ॥

‘ विचित्र मणियोंसे जटित और सोनेके तारोंसे विभूषित रंकुमृगके चमड़ेके बने हुए, घोड़ोंकी पीठपर बिछाये जानेवाले बहुत - से झूल भूमिपर पड़े हैं ॥ ३१ ॥

चूडामणीन् नरेन्द्राणां विचित्राः काञ्चनस्रजः ।

छत्राणि चापविद्धानि चामरव्यजनानि च ॥ ३२ ॥

‘ नरपतियोंके मणिमय मुकुट, विचित्र स्वर्णमय हार, छत्र, चँवर और व्यजन फेंके पड़े हैं ॥ ३२ ॥

चन्द्रनक्षत्रभासैश्च वदनैश्चारुकुण्डलैः ।

क्लृप्तश्मश्रुभिरत्यर्थं वीराणां समलंकृतैः ॥ ३३ ॥

वदनैः पश्य संछन्नां महीं शोणितकर्दमाम् । ‘ देखो, चन्द्रमा और नक्षत्रोंके समान कान्तिमान्, मनोहर कुण्डलोंसे विभूषित तथा दाढ़ी - मूँछसे युक्त वीरोंके आभूषणभूषित मुखोंसे रणभूमि अत्यन्त आच्छादित हो गयी है और इसपर रक्तकी कीच जम गयी है ॥ ३३३ ॥

सजीवांश्चापरान् पश्य कूजमानान् समन्ततः ॥ ३४ ॥

उपास्यमानान् बहुशो न्यस्तशस्त्रैर्विशाम्पते ।

ज्ञातिभिः सहितांस्तत्र रोदमानैर्मुहुर्मुहुः ॥ ३५ ॥

'प्रजापालक अर्जुन! उन दूसरे योद्धाओं पर दृष्टिपात करो जिनके प्राण अभीतक शेष हैं और जो चारों ओर कराह रहे हैं । उनके बहुसंख्यक कुटुम्बीजन हथियार डालकर उनके निकट आ बैठे हैं और बारंबार रो रहे हैं ॥ ३४-३५ ॥

व्युत्क्रान्तानपरान् योधांश्छादयित्वा तरस्विनः ।

पुनर्युद्धाय गच्छन्ति जयगृद्धाः प्रमन्यवः ॥ ३६ ॥

'जिनके प्राण निकल गये हैं, उन योद्धाओंको वस्त्र आदिसे ढककर विजयाभिलाषी वेगशाली वीर पुनः अत्यन्त क्रोधपूर्वक युद्धके लिये जा रहे हैं ॥ ३६ ॥

अपरे तत्र तत्रैव परिधावन्ति मानवाः ।

ज्ञातिभिः पतितैः शूरैर्याच्यमानास्तथोदकम् ॥ ३७ ॥

' दूसरे बहुत - से सैनिक रणभूमिमें गिरे हुए अपने शूरवीर कुटुम्बीजनोंके पानी माँगनेपर वहीं इधर- उधर दौड़ रहे हैं ॥ ३७ ॥

जलार्थं च गताः केचिन्निष्प्राणा बहवोऽर्जुन ।

संनिवृत्ताश्च ते शूरास्तान् वै दृष्ट्वा विचेतसः ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 2047

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जलं त्यक्त्वा प्रधावन्ति क्रोशमानाः परस्परम् । ' अर्जुन! कितने ही योद्धा पानी लानेके लिये गये, इसी बीचमें पानी चाहनेवाले बहुत--से वीरोंके प्राण निकल गये । वे शूरवीर जब पानी लेकर लौटे हैं, तब अपने उन सम्बन्धियोंको चेतनारहित देखकर पानीको वहीं फेंक परस्पर चीखते -चिल्लाते हुए चारों ओर दौड़ रहे हैं ॥ ३८३ ॥

जलं पीत्वा मृतान् पश्य पिबतोऽन्यांश्च मारिष ॥ ३ ९ ॥

परित्यज्य प्रियानन्ये बान्धवान् बान्धवप्रियाः ।

व्युत्क्रान्ताः समदृश्यन्त तत्र तत्र महारणे ॥ ४० ॥

‘ श्रेष्ठ वीर अर्जुन! उधर देखो, कुछ लोग पानी पीकर मर गये और कुछ लोग पीते - पीते ही अपने प्राण खो बैठे । कितने ही बान्धवजनोंके प्रेमी सैनिक अपने प्रिय बान्धवोंको छोड़कर उस महासमरमें जहाँ -तहाँ प्राणशून्य हुए दिखायी देते हैं ॥ ३ ९ -४० ॥

तथापरान् नरश्रेष्ठ संदष्टौष्ठपुटान् पुनः ।

भ्रुकुटीकुटिलैर्वक्त्रैः प्रेक्षमाणान् समन्ततः ॥ ४१ ॥

‘ नरश्रेष्ठ! उन दूसरे योद्धाओंको देखो, जो दाँतोंसे ओठ चबाते हुए टेढ़ी भौंहोंसे युक्त मुखोंद्वारा चारों ओर दृष्टिपात कर रहे हैं ' ॥ ४१ ॥

एवं ब्रुवंस्तदा कृष्णो ययौ यत्र युधिष्ठिरः ।

अर्जुनश्चापि नृपतेर्दर्शनार्थं महारणे ॥ ४२ ॥

इस प्रकार बातें करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन उस महासमरमें राजाका दर्शन करनेके लिये उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ राजा युधिष्ठिर विद्यमान थे ॥ ४२ ॥

याहि याहीति गोविन्दं मुहुर्मुहुरचोदयत् ।

तां युद्धभूमिं पार्थस्य दर्शयित्वा च माधवः ॥ ४३ ॥

त्वरमाणस्ततः कृष्णः पार्थमाह शनैरिदम् ।

पश्य पाण्डव राजानमुपयातांश्च पार्थिवान् ॥ ४४ ॥

अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णसे बारंबार कहते थे, ' चलिये, चलिये' । भगवान् श्रीकृष्ण बड़ी उतावलीके साथ अर्जुनको युद्धभूमिका दर्शन कराते हुए आगे बढ़े और धीरे- धीरे उनसे इस प्रकार बोले — ‘ पाण्डुनन्दन! देखो, राजाके पास बहुत- से भूपाल जा पहुँचे हैं ॥ ४३-४४ ॥

कर्णं पश्य महारङ्गे ज्वलन्तमिव पावकम् ।

असौ भीमो महेष्वासः संनिवृत्तो रणं प्रति ॥ ४५ ॥

‘ उधर दृष्टिपात करो । कर्ण युद्धके महान् रंगमंचपर प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहा है और महाधनुर्धर भीमसेन युद्धस्थलकी ओर लौट पड़े हैं ॥ ४५ ॥

तमेते विनिवर्तन्ते धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।

पाञ्चालसृञ्जयानां च पाण्डवानां च ये मुखम् ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 2048

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‘ पांचालों, सृजयों और पाण्डवोंके जो धृष्टद्युम्न आदि प्रमुख वीर हैं, वे भी भीमसेनके साथ ही युद्धके लिये लौट रहे हैं ॥ ४६ ॥

निवृत्तैश्च पुनः पार्थैर्भग्नं शत्रुबलं महत् ।

कौरवान् द्रवतो ह्येष कर्णो रोधयतेऽर्जुन ॥ ४७ ॥

‘ अर्जुन! वह देखो, लौटे हुए पाण्डव योद्धाओंने शत्रुओंकी विशाल वाहिनीके पाँव उखाड़ दिये । भागते हुए कौरववीरोंको यह कर्ण रोक रहा है ॥ ४७ ॥

अन्तकप्रतिमो वेगे शक्रतुल्यपराक्रमः ।

असौ गच्छति कौरव्य द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः ॥ ४८ ॥

'कुरुनन्दन! जो वेगमें यमराज और पराक्रममें इन्द्रके समान है, वह शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा उधर ही जा रहा है ॥ ४८ ॥

तमेव प्रद्रुतं संख्ये धृष्टद्युम्नो महारथः ।

अनुप्रयाति संग्रामे हतान् पश्य च सृञ्जयान् ॥ ४ ९ ॥

' महारथी धृष्टद्युम्न युद्धस्थलमें बड़े वेगसे जाते हुए अश्वत्थामाका ही पीछा कर रहे हैं । वह देखो, संग्राममें बहुत - से संजय वीर मार डाले गये ' ॥ ४ ९ ॥

सर्वमाह सुदुर्धर्षो वासुदेवः किरीटिने ।

ततो' राजन् महाघोरः प्रादुरासीन्महारणः ॥ ५० ॥

राजन्! अत्यन्त दुर्जय वीर भगवान् श्रीकृष्णने किरीटधारी अर्जुनसे ये सारी बातें बतायीं । तत्पश्चात् वहाँ अत्यन्त भयंकर महायुद्ध होने लगा ॥ ५० ॥

सिंहनादरवाश्चैव प्रादुरासन् समागमे ।

उभयोः सेनयो राजन् मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ५१ ॥

नरेश्वर! दोनों सेनाओंमें मृत्युको ही युद्धसे निवृत्त होनेकी अवधि नियत करके संघर्ष छिड़ गया और वीरोंके सिंहनाद होने लगे ॥ ५१ ॥

एवमेष क्षयो वृत्तः पृथिव्यां पृथिवीपते ।

तावकानां परेषां च राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ५२ ॥

पृथ्वीनाथ! इस प्रकार इस भूतलपर आपकी और शत्रुओंकी सेनाओंका महान् संहार हुआ है । राजन्! यह सब आपकी कुमन्त्रणाका ही फल है ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि वासुदेववाक्ये अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें भगवान् श्रीकृष्णका वाक्यविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ५८ ॥

Face

पृष्ठ 2049

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एकोनषष्टितमोऽध्यायः धृष्टद्युम्न और कर्णका युद्ध, अश्वत्थामाका धृष्टद्युम्नपर आक्रमण तथा अर्जुनके द्वारा धृष्टद्युम्नकी रक्षा और अश्वत्थामाकी पराजय संजय उवाच

ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुसृञ्जयाः ।

युधिष्ठिरमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! तदनन्तर पुनः कौरव और संजय योद्धा निर्भय होकर एक-दूसरेसे भिड़ गये । एक ओर युधिष्ठिर आदि पाण्डवदलके लोग थे और दूसरी ओर कर्ण आदि हमलोग ॥ १ ॥

ततः प्रववृते भीमः संग्रामो लोमहर्षणः ।

कर्णस्य पाण्डवानां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ २ ॥

उस समय कर्ण और पाण्डवोंका बड़ा भयंकर और रोमांचकारी संग्राम आरम्भ हुआ, जो यमराजके राज्यकी वृद्धि करनेवाला था ॥ २ ॥

तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे तुमुले शोणितोदके ।

संशप्तकेषु शूरेषु किंचिच्छिष्टेषु भारत ॥ ३ ॥

धृष्टद्युम्नो महाराज सहितः सर्वराजभिः ।

कर्णमेवाभिदुद्राव पाण्डवाश्च महारथाः ॥ ४ ॥

भारत! जहाँ खून पानीके समान बहाया जाता था, उस भयंकर संग्रामके छिड़ जानेपर तथा थोड़े - से ही संशप्तक वीरोंके शेष रह जानेपर समस्त राजाओं-सहित धृष्टद्युम्नने कर्णपर ही आक्रमण किया । महाराज! अन्य पाण्डव महारथियोंने भी उन्हींका साथ दिया ॥ ३-४ ॥

आगच्छमानांस्तान् संख्ये प्रहृष्टान् विजयैषिणः ।

दधारैको रणे कर्णो जलौघानिव पर्वतः ॥ ५ ॥

युद्धस्थलमें विजयकी अभिलाषा लेकर हर्ष और उल्लासके साथ आते हुए उन वीरोंको रणभूमिमें अकेले कर्णने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे जलके प्रवाहोंको पर्वत रोक देता है ॥ ५ ॥

समासाद्य तुतु ते कर्णं व्यशीर्यन्त महारथाः ।

यथाचलं समासाद्य वार्योघाः सर्वतोदिशम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2050

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कर्णके पास पहुँचकर वे सब महारथी बिखर गये, ठीक वैसे ही जैसे जलके प्रवाह किसी पर्वतके पास पहुँचकर सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल जाते हैं ॥ ६ ॥

तयोरासीन्महाराज संग्रामो लोमहर्षणः ।

धृष्टद्युम्नस्तु राधेयं शरेणानतपर्वणा ॥ ७ ॥

ताडयामास समरे तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । महाराज! उस समय उन दोनोंमें रोमांचकारी युद्ध होने लगा । धृष्टद्युम्नने समरांगणमें झुकी हुई गाँठवाले बाणसे राधापुत्र कर्णको चोट पहुँचायी और कहा — ' खड़ा रह, खड़ा || रह ' ॥७ विजयं च धनुः श्रेष्ठं विधुन्वानो महारथः ॥ ८ ॥

पार्षतस्य धनुश्छित्त्वा शरांश्चाशीविषोपमान् ।

ताडयामास संक्रुद्धः पार्षतं नवभिः शरैः ॥ ९ ॥

तब महारथी कर्णने अपने विजय नामक श्रेष्ठ धनुषको कम्पित करके धृष्टद्युम्नके धनुष और विषधर सर्पके समान विषैले बाणोंको भी काट डाला । फिर क्रोधमें भरकर नौ बाणोंसे धृष्टद्युम्नको भी घायल कर दिया ॥ ८ - ९ ॥

ते वर्म हेमविकृतं भित्त्वा तस्य महात्मनः ।

शोणिताक्ता व्यराजन्त शक्रगोपा इवानघ ॥ १० ॥

निष्पाप नरेश! वे बाण महामना धृष्टद्युम्नके सुवर्णनिर्मित कवचको छेदकर उनके रक्तसे रंजित हो इन्द्रगोप ( वीरबहूटी ) नामक कीड़ोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ १० ॥

तदपास्य धनुश्छिन्नं धृष्टद्युन्मो महारथः ।

अथान्यद् धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ॥ ११ ॥

कर्णं विव्याध सप्तत्या शरैः संनतपर्वभिः । महारथी धृष्टद्युम्नने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा धनुष और विषधर सर्पके समान विषैले बाण हाथमें लेकर झुकी हुई गाँठवाले सत्तर बाणोंसे कर्णको बींध डाला ॥ ११ ॥

तथैव राजन् कर्णोऽपि पार्षतं शत्रुतापनम् ॥ १२ ॥

छादयामास समरे शरैराशीविषोपमैः ।

द्रोणशत्रुर्महेष्वासो विव्याध निशितैः शरैः ॥ १३ ॥

राजन्! इसी प्रकार कर्णने भी समरांगणमें विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंद्वारा शत्रुओंको संताप देनेवाले धृष्टद्युम्नको आच्छादित कर दिया । फिर द्रोणशत्रु महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने भी कर्णको पैने बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १२-१३ ॥

तस्य कर्णो महाराज शरं कनकभूषणम् ।

प्रेषयामास संक्रुद्धो मृत्युदण्डमिवापरम् ॥ १४ ॥