04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2061–2070

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2061–2070

पृष्ठ 2061

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2061 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

'कर्णने शत्रुओंको संताप देनेवाले, शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले, बलवान्, विद्वान् और युद्धकुशल राजा युधिष्ठिरको युद्ध से विमुख कर दिया है ॥ १४ ॥

राधेयः पाण्डवश्रेष्ठं शक्तः पीडयितुं रणे ।

सहितो धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः शूरैर्महाबलैः ॥ १५ ॥

‘ धृतराष्ट्रके महाबली शूरवीर पुत्रोंके साथ रहकर राधापुत्र कर्ण रणभूमिमें पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरको अवश्य पीड़ा दे सकता है ॥ १५ ॥

तस्यैभिर्युध्यमानस्य संग्रामे संयतात्मनः ।

अन्यैरपि च पार्थस्य हृतं वर्म महारथैः ॥ १६ ॥

संग्राममें जूझते हुए संयतचित्त कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके कवचको इन दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रों तथा अन्य महारथियोंने नष्ट कर दिया है ॥ १६ ॥

उपवासकृशो राजा भृशं भरतसत्तमः ।

ब्राह्मे बले स्थितो ह्येष न क्षात्रे हि बले विभुः ॥ १७ ॥

‘ भरतकुलशिरोमणि राजा युधिष्ठिर उपवास करनेसे अत्यन्त दुर्बल हो गये हैं । ये ब्राह्मबलमें स्थित हैं, क्षात्रबल प्रकट करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥ १७ ॥

कर्णेन चाभियुक्तोऽयं भूपतिः शत्रुतापनः ।

संशयं समनुप्राप्तः पाण्डवो वै युधिष्ठिरः ॥ १८ ॥

' शत्रुओंको तपानेवाले ये पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर कर्णके साथ युद्ध करके प्राणसंकटकी अवस्थामें पहुँच गये हैं ॥ १८ ॥

न जीवति महाराजो मन्ये पार्थ युधिष्ठिरः ।

यद् भीमसेनः सहते सिंहनादममर्षणः ॥ १ ९ ॥

नदतां धार्तराष्ट्राणां पुनः पुनररिंदमः ।

धमतां च महाशङ्खान् संग्रामे जितकाशिनाम् ॥ २० ॥

'पार्थ! मुझे जान पड़ता है कि महाराज युधिष्ठिर जीवित नहीं हैं; क्योंकि अमर्षशील शत्रुदमन भीमसेन संग्राममें विजयसे उल्लसित हो बड़े- बड़े शंख बजाते और बारंबार गर्जते हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंका सिंहनाद चुपचाप सहन करते हैं ॥ १ ९ -२० ॥

युधिष्ठिरं पाण्डवेयं हतेति भरतर्षभ ।

संचोदयत्यसौ कर्णो धार्तराष्ट्रान् महाबलान् ॥ २१ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! वह कर्ण महाबली धृतराष्ट्रपुत्रोंको यह प्रेरणा दे रहा है कि तुम सब लोग मिलकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको मार डालो ॥ २१ ॥

स्थूणाकर्णेन्द्रजालेन पार्थ पाशुपतेन च ।

प्रच्छादयन्ति राजानं शस्त्रजालैर्महारथाः ॥ २२ ॥

‘ पार्थ! कौरव महारथी स्थूणाकर्ण, इन्द्रजाल, पाशुपत तथा अन्य प्रकारके शस्त्रसमूहोंसे राजा युधिष्ठिरको आच्छादित कर रहे हैं ॥ २२ ॥

पृष्ठ 2062

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2062 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आतुरो हि कृतो राजा संनिषेव्यश्च भारत ।

यथैनमनुवर्तन्ते पञ्चालाः सह पाण्डवैः ॥ २३ ॥

' भारत! राजा युधिष्ठिर आतुर एवं सेवाके योग्य कर दिये गये हैं; जैसा कि पाण्डवोंसहित पांचाल उनके पीछे - पीछे सेवाके लिये जा रहे हैं ॥ २३ ॥

त्वरमाणास्त्वराकाले सर्वशस्त्रभृतां वराः ।

मज्जन्तमिव पाताले बलिनोऽप्युज्जिहीर्षवः ॥ २४ ॥

‘ शीघ्रताके अवसरपर शीघ्रता करनेवाले सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ बलवान् पाण्डव- योद्धा युधिष्ठिरका ऐसी अवस्थामें उद्धार करनेके लिये उत्सुक दिखायी देते हैं, मानो वे पातालमें डूब रहे हों ॥ २४ ॥

न केतुर्दृश्यते राज्ञः कर्णेन निहतः शरैः ।

पश्यतोर्यमयोः पार्थ सात्यकेश्च शिखण्डिनः ॥ २५ ॥

धृष्टद्युम्नस्य भीमस्य शतानीकस्य वा विभो ।

पञ्चालानां च सर्वेषां चेदीनां चैव भारत ॥ २६ ॥

' पार्थ! राजाका ध्वज नहीं दिखायी देता है । कर्णने अपने बाणोंद्वारा उसे काट डाला है । भरतनन्दन! प्रभो! यह कार्य उसने नकुल सहदेव, सात्यकि, शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, भीमसेन, शतानीक, समस्त पांचाल- सैनिक तथा चेदिदेशीय योद्धाओंके देखते - देखते किया ॥ २५-२६ ॥

एष कर्णो रणे पार्थ पाण्डवानामनीकिनीम् ।

शरैर्विध्वंसयति वै नलिनीमिव कुञ्जरः ॥ २७ ॥

‘ कुन्तीनन्दन! जैसे हाथी कमलोंसे भरी हुई पुष्करिणीको मथ डालता है, उसी प्रकार यह कर्ण रणभूमिमें अपने बाणोंद्वारा पाण्डव - सेनाका विध्वंस कर रहा है ॥ २७ ॥

एते द्रवन्ति रथिनस्त्वदीयाः पाण्डुनन्दन ।

पश्य पश्य यथा पार्थ गच्छन्त्येते महारथाः ॥ २८ ॥

' पाण्डुनन्दन! ये तुम्हारे रथी भागे जा रहे हैं । पार्थ! देखो, देखो, ये महारथी भी कैसे खिसके जा रहे हैं ॥ २८ ॥

एते भारत मातङ्गाः कर्णेनाभिहताः शरैः ।

आर्तनादान् विकुर्वाणा विद्रवन्ति दिशो दश ॥ २ ९ ॥

‘ भारत! कर्णके बाणोंसे मारे गये ये मतवाले हाथी आर्तनाद करते हुए दसों दिशाओंमें भाग रहे हैं ॥ २ ९ ॥

रथानां द्रवते वृन्दमेतच्चैव समन्ततः ।

द्राव्यमाणं रणे पार्थ कर्णेनामित्रकर्षिणा ॥ ३० ॥

' कुन्तीकुमार! रणभूमिमें शत्रुसूदन कर्णके द्वारा खदेड़ा हुआ यह रथियोंका समूह सब ओर पलायन कर रहा है ॥

पृष्ठ 2063

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2063 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हस्तिकक्ष्यां रणे पश्य चरन्तीं तत्र तत्र ह ।

रथस्थं सूतपुत्रस्य केतुं केतुमतां वर ॥ ३१ ॥

' ध्वज धारण करनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! देखो, सूतपुत्रके रथपर कैसी ध्वजा फहरा रही है? हाथीकी रस्सीके चिह्नसे युक्त उसकी पताका रणभूमिमें यत्र- तत्र कैसे विचरण कर रही है ॥ ३१ ॥

असौ धावति राधेयो भीमसेनरथं प्रति ।

किरञ्शरशतान्येव विनिघ्नंस्तव वाहिनीम् ॥ ३२ ॥

‘वह राधापुत्र कर्ण सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करके तुम्हारी सेनाका संहार करता हुआ भीमसेनके रथपर धावा कर रहा है ॥ ३२ ॥

एतान् पश्य च पञ्चालान् द्राव्यमाणान् महारथान् ।

शक्रेणेव यथा दैत्यान् हन्यमानान् महाहवे ॥ ३३ ॥

‘ जैसे देवराज इन्द्र दैत्योंको खदेड़ते और मारते हैं, उसी प्रकार महासमरमें कर्णके द्वारा खदेड़े और मारे जानेवाले इन पांचाल महारथियोंको देखो ॥ ३३ ॥

एष कर्णो रणे जित्वा पञ्चालान् पाण्डुसृञ्जयान् ।

दिशो विप्रेक्षते सर्वास्त्वदर्थमिति मे मतिः ॥ ३४ ॥

‘ यह कर्ण रणभूमिमें पांचालों, पाण्डवों और सृजयोंको जीतकर अब तुम्हें परास्त करनेके लिये सारी दिशाओंमें दृष्टिपात कर रहा है; ऐसा मेरा मत है ॥ ३४ ॥

पश्य पार्थ धनुः श्रेष्ठं विकर्षन् साधु शोभते ।

शत्रुं जित्वा यथा शक्रो देवसंघैः समावृतः ॥ ३५ ॥

‘ अर्जुन! देखो, जैसे देवराज इन्द्र शत्रुपर विजय पाकर देवसमूहोंसे घिरे हुए शोभा पाते हैं, उसी प्रकार यह कर्ण कौरवोंके बीचमें अपने श्रेष्ठ धनुषको खींचता हुआ सुशोभित हो रहा है— ॥ ३५ ॥

एते नर्दन्ति कौरव्या दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ।

त्रासयन्तो रणे पाण्डून् सृञ्जयांश्च समन्ततः ॥ ३६ ॥

‘ कर्णका पराक्रम देखकर ये कौरवयोद्धा रणभूमिमें पाण्डवों और सृजयोंको सब ओरसे डराते हुए जोर- जोरसे गर्जना करते हैं ॥ ३६ ॥

एष सर्वात्मना पाण्डूंस्त्रासयित्वा महारणे ।

अभिभाषति राधेयः सर्वसैन्यानि मानद ॥ ३७ ॥

'मानद! यह राधापुत्र कर्ण महासमरमें पाण्डव - सैनिकोंको सर्वथा भयभीत करके अपनी सम्पूर्ण सेनाओंसे इस प्रकार कह रहा है ॥ ३७ ॥

अभिद्रवत भद्रं वो द्रुतं द्रवत कौरवाः ।

यथा जीवन्न वः कश्चिन्मुच्येत युधि सृञ्जयः ॥ ३८ ॥

तथा कुरुत संयत्ता वयं यास्याम पृष्ठतः ।

पृष्ठ 2064

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2064 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ कौरवो! तुम्हारा कल्याण हो । दौड़ो और वेगपूर्वक धावा करो । आज युद्धस्थलमें कोई सृजय तुम्हारे हाथसे जिस प्रकार भी जीवित न छूटने पावे, सावधान होकर वैसा ही प्रयत्न करो । हम सब लोग तुम्हारे पीछे - पीछे चलेंगे' ॥ एवमुक्त्वा गतो ह्येष पृष्ठतो विकिरन् शरान् ॥ ३ ९ ॥

पश्य कर्णं रणे पार्थ श्वेतच्छत्रविराजितम् ।

उदयं पर्वतं यद्वच्छशाङ्केनाभिशोभितम् ॥ ४० ॥

‘ ऐसा कहकर यह कर्ण पीछेसे बाण- वर्षा करता हुआ गया है । पार्थ! रणभूमिमें श्वेत छत्रसे विराजमान कर्णको देखो । वह चन्द्रमासे सुशोभित उदयाचलके समान जान पड़ता है ॥ ३ ९ -४० ॥

पूर्णचन्द्रनिकाशेन मूर्ध्निच्छत्रेण भारत ।

ध्रियमाणेन समरे श्रीमच्छतशलाकिना ॥ ४१ ॥

एष त्वां प्रेक्षते कर्णः सकटाक्षं विशाम्पते ।

उत्तमं जवमास्थाय ध्रुवमेष्यति संयुगे ॥ ४२ ॥

‘ भारत! प्रजानाथ! समरांगणमें जिसके मस्तकपर सौ तेजस्वी शलाकाओंसे युक्त और पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशमान श्वेत छत्र तना हुआ है, वही यह कर्ण तुम्हारी ओर कटाक्षपूर्वक देख रहा है । निश्चय ही यह युद्धस्थलमें उत्तम वेगका आश्रय लेकर तुम्हारे सामने आयेगा ॥ ४१-४२ ॥

पश्य ह्येनं महाबाहो विधुन्वानं महद् धनुः ।

शरांश्चाशीविषाकारान् विसृजन्तं महारणे ॥ ४३ ॥

‘ महाबाहो! इसे देखो, यह अपना विशाल धनुष हिलाता हुआ महासमरमें विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंकी वृष्टि कर रहा है ॥ ४३ ॥

असौ निवृत्तो राधेयो दृष्ट्वा ते वानरध्वजम् ।

प्रार्थयन् समरे पार्थ त्वया सह परंतप ॥ ४४ ॥

‘ शत्रुओंको संताप देनेवाले कुन्तीकुमार! वह देखो, तुम्हारे वानरध्वजको देखकर समरमें तुम्हारे साथ द्वैरथ युद्ध चाहता हुआ राधापुत्र कर्ण इधर लौट पड़ा है ॥

वधाय चात्मनोऽभ्येति दीप्तास्यं शलभो यथा ।

कर्णमेकाकिनं दृष्ट्वा रथानीकेन भारत ॥ ४५ ॥

रिरक्षिषुः सुसंवृत्तो धार्तराष्ट्रो निवर्तते । ‘ जैसे पतंग प्रज्वलित आगके मुखमें आ पड़ता है, उसी प्रकार यह कर्ण अपने वधके लिये ही तुम्हारे पास आ रहा है। भारत! कर्णको अकेला देख उसकी रक्षाके लिये धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन भी रथसेनासे घिरा हुआ इधर ही लौट रहा है ॥ ४५३ ॥

सर्वैः सहैभिर्दुष्टात्मा वध्यतां च प्रयत्नतः ॥ ४६ ॥

त्वया यशश्च राज्यं च सुखं चोत्तममिच्छता ।

पृष्ठ 2065

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2065 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' तुम यश, राज्य और उत्तम सुखकी अभिलाषा रखकर इन सबके साथ दुष्टात्मा कर्णका प्रयत्नपूर्वक वध कर डालो ॥ ४६३ ॥

अदीनयोर्विश्रुतयोर्युवयोर्योत्स्यमानयोः ॥ ४७ ॥

देवासुरे पार्थमृधे देवदानवयोरिव ।

पश्यन्तु कौरवाः सर्वे तव पार्थ पराक्रमम् ॥ ४८ ॥

‘ पार्थ! जैसे देवासुरसंग्राममें देवताओं और दानवोंका युद्ध हुआ था, उसी प्रकार जब तुम दोनों विश्वविख्यात वीरोंमें सोत्साह युद्ध होने लगे, उस समय समस्त कौरव तुम्हारा पराक्रम देखें ॥ ४७-४८ ॥

त्वां च दृष्ट्वातिसंरब्धं कर्णं च भरतर्षभ ।

असौ दुर्योधनः क्रुद्धो नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥ ४ ९ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए तुमको और कर्णको देखकर उस क्रोधी दुर्योधनको कोई उत्तर नहीं सूझ पड़ेगा ॥ ४ ९ ॥ आत्मानं च कृतात्मानं समीक्ष्य भरतर्षभ ।

कृतागसं च राधेयं धर्मात्मनि युधिष्ठिरे ।

प्रतिपद्यस्व कौन्तेय प्राप्तकालमनन्तरम् ॥ ५० ॥

' भरतभूषण कुन्तीकुमार! तुम अपनेको पुण्यात्मा तथा राधापुत्र कर्णको धर्मात्मा युधिष्ठिरका अपराधी समझकर अब समयोचित कर्तव्यका पालन करो ॥ ५० ॥

आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा प्रत्येहि रथयूथपम् ।

पञ्च ह्येतानि मुख्यानि रथानां रथसत्तम ॥ ५१ ॥

शतान्यायान्ति समरे बलिनां तिग्मतेजसाम् ।

पञ्च नागसहस्राणि द्विगुणा वाजिनस्तथा ॥ ५२ ॥

अभिसंहत्य कौन्तेय पदातिप्रयुतानि च । ‘ युद्धविषयक श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर तुम रथयूथपति कर्णपर चढ़ाई करो । रथियोंमें श्रेष्ठ वीर! देखो, समरभूमिमें ये प्रचण्ड तेजस्वी, महाबली एवं मुख्य- मुख्य पाँच सौ रथी आ रहे हैं । इनके साथ ही पाँच हजार हाथी और दस हजार घोड़े हैं । कुन्तीनन्दन! ये सब - के-सब संगठित हो दस लाख पैदल योद्धाओंको साथ ले आ रहे हैं ॥ ५१-५२३ ॥ अन्योन्यरक्षितं वीर बलं त्वामभिवर्तते ॥ ५३ ॥

द्रोणपुत्रं पुरस्कृत्य तच्छीघ्रं संनिषुदय । ‘ वीर! द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको आगे करके एक- दूसरेके द्वारा सुरक्षित यह सेना तुमपर आक्रमण कर रही है । तुम शीघ्र ही इसका संहार कर डालो ॥ ५३ ॥

निकृत्यैतद्रथानीकं बलिनं लोकविश्रुतम् ॥ ५४ ॥

सूतपुत्रं महेष्वासं दर्शयात्मानमात्मना ।

पृष्ठ 2066

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2066 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ इस रथसेनाका संहार करके विश्वविख्यात महाधनुर्धर बलवान् सूतपुत्र कर्णके सामने स्वयं ही अपने - आपको प्रकट करो ॥ ५४३ ॥

उत्तमं जवमास्थाय प्रत्येहि भरतर्षभ ॥ ५५ ॥

असौ कर्णः सुसंरब्धः पञ्चालानभिधावति ।

केतुमस्य हि पश्यामि धृष्टद्युम्नरथं प्रति ॥ ५६ ॥

‘ भरतभूषण! तुम उत्तम वेगका आश्रय लेकर शत्रुदलपर आक्रमण करो । वह क्रोधमें भरा हुआ कर्ण पांचालोंपर धावा बोल रहा है । मैं उसकी ध्वजाको धृष्टद्युम्नके रथके पास देख रहा हूँ ॥ ५५-५६ ॥

समुपैष्यति पञ्चालानिति मन्ये परंतप ।

आचक्षे च प्रियं पार्थ तवेदं भरतर्षभ ॥ ५७ ॥

राजासौ कुशली श्रीमान् धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

असौ भीमो महाबाहुः संनिवृत्तश्चमूमुखे ॥ ५८ ॥

‘ परंतप! मैं समझता हूँ, कर्ण पांचालोंपर अवश्य ही आक्रमण करेगा । भरतश्रेष्ठ पार्थ! मैं तुमसे एक प्रिय समाचार कह रहा हूँ— धर्मपुत्र श्रीमान् राजा युधिष्ठिर सकुशल हैं; क्योंकि वेमहाबाहु भीमसेन सेनाके मुहानेपर लौट रहे हैं ॥ ५७-५८ ॥

वृतः सृञ्जयसैन्येन शैनेयेन च भारत ।

वध्यन्त एते समरे कौरवा निशितैः शरैः ॥ ५ ९ ॥

भीमसेनेन कौन्तेय पञ्चालैश्च महात्मभिः । ‘ भारत! उनके साथ सृजयोंकी सेना और सात्यकि भी हैं । कुन्तीकुमार! भीमसेन तथा महामनस्वी पांचाल वीर समरांगणमें अपने तीखे बाणोंद्वारा इन कौरवोंका वध कर रहे हैं ॥ ५ ९ ३ ॥ सेना हि धार्तराष्ट्रस्य विमुखा विक्षरवणा ॥ ६० ॥

विप्रधावति वेगेन भीमस्याभिहता शरैः । ‘ भीमके बाणोंसे घायल हो दुर्योधनकी सेना युद्धसे मुँह फेरकर बड़े वेगसे भाग रही है । उसके घावोंसे रक्तकी धारा बह रही है ॥ ६०३ ॥

विपन्नसस्येव मही रुधिरेण समुक्षिता ॥ ६१ ॥

भारती भरतश्रेष्ठ सेना कृपणदर्शना । ‘ भरतश्रेष्ठ! खूनसे लथपथ हुई कौरव सेना, जहाँकी खेती नष्ट हो गयी है उस भूमिके समान अत्यन्त दयनीय दिखायी देती है ॥ ६१३ ॥

निवृत्तं पश्य कौन्तेय भीमसेनं युधां पतिम् ॥ ६२ ॥

आशीविषमिव क्रुद्धं द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।

पृष्ठ 2067

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2067 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' कुन्तीनन्दन! देखो, योद्धाओंके अधिपति भीमसेन लौटकर विषधर सर्पके समान कुपित हो कौरव सेनाको खदेड़ रहे हैं ॥ ६२ ॥

पीतरक्तासितसितास्ताराचन्द्रार्कमण्डिताः ॥ ६३ ॥

पताका विप्रकीर्यन्ते छत्राण्येतानि चार्जुन । ' अर्जुन! तारों और सूर्य -चन्द्रमाके चिह्नोंसे अलंकृत ये लाल, पीली, काली और सफेद पताकाएँ तथा ये श्वेत छत्र बिखरे पड़े हैं ॥ ६३ ॥

सौवर्णा राजताश्चैव तैजसाश्च पृथग्विधाः ॥ ६४ ॥

केतवोऽभिनिपात्यन्ते हस्त्यश्वं च प्रकीर्यते । ‘ सोने, चाँदी तथा पीतल आदि तैजस द्रव्योंके बने हुए नाना प्रकारके ध्वज काट-काटकर गिराये जा रहे हैं । हाथी और घोड़े तितर- बितर हो गये हैं ॥ ६४ ॥

रथेभ्यः प्रपतन्त्येते रथिनो विगतासवः ॥ ६५ ॥

नानावर्णैर्हता बाणैः पञ्चालैरपलायिभिः । ' युद्धसे पीठ न दिखानेवाले पांचाल- वीरोंके विभिन्न रंगोंवाले बाणोंसे मारे जाकर ये प्राणशून्य रथी रथोंसे नीचे गिर रहे हैं ॥ ६५३ ॥

निर्मनुष्यान् गजानश्वान् रथांश्चैव धनंजय ॥ ६६ ॥

समाद्रवन्ति पञ्चाला धार्तराष्ट्रांस्तरस्विनः ।

विमृद्नन्ति नरव्याघ्रा भीमसेनबलाश्रयात् ॥ ६७ ॥

‘ धनंजय! ये वेगशाली पुरुषसिंह पांचालयोद्धा भीमसेनके बलका आश्रय लेकर मनुष्योंसे रहित हाथियों, घोड़ों, रथों और वेगशाली धृतराष्ट्र सैनिकोंपर आक्रमण करते और उन्हें धूलमें मिलाते जा रहे हैं ॥ ६६-६७ ॥

बलं परेषां दुर्धर्षास्त्यक्त्वा प्राणानरिंदम ।

एते नर्दन्ति पञ्चाला ध्यापयन्ति च वारिजान् ॥ ६८ ॥

‘ शत्रुदमन वीर! दुर्जय पांचाल- सैनिक प्राणोंका मोह छोड़कर शत्रुओंकी सेनाको नष्ट करते हुए गरजते और शंख बजाते हैं ॥ ६८ ॥

अभिद्रवन्ति च रणे मृद्नन्तः सायकेः परान् ।

पश्यस्वैषां च माहात्म्यं पञ्चाला हि पराक्रमात् ॥ ६ ९ ॥

धार्तराष्ट्रान् विनिघ्नन्ति क्रुद्धाः सिंहा इव द्विपान् । ' अर्जुन! देखो, इन वीरोंकी कैसी महिमा है? जैसे क्रोधमें भरे हुए सिंह हाथियोंको मार डालते हैं, उसी प्रकार ये पांचाल- योद्धा पराक्रम करके अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंको रौंदते हुए रणभूमिमें सब ओर दौड़ रहे हैं ॥ शस्त्रमाच्छिद्य शत्रूणां सायुधानां निरायुधाः ॥ ७० ॥

तेनैवैतानमोघास्त्रा निघ्नन्ति च नदन्ति च ।

पृष्ठ 2068

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2068 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ वे स्वयं अस्त्र- शस्त्रोंसे रहित होनेपर भी आयुधधारी शत्रुओंके शस्त्र छीनकर उसीसे उन्हें मार डालते और गर्जना करते हैं; उनके अस्त्रोंका निशाना कभी खाली नहीं जाता ॥ ७० शिरांस्येतानि पात्यन्ते शत्रूणां बाहवोऽपि च ॥ ७१ ॥

रथनागहया वीरा यशस्याः सर्व एव च । ' ये शत्रुओंके मस्तक, भुजाएँ, रथ, हाथी, घोड़े और समस्त यशस्वी वीर धरतीपर गिराये जा रहे हैं ॥ ७१ ॥

सर्वतश्चाभिपन्नैषा धार्तराष्ट्री महाचमूः ॥ ७२ ॥

पञ्चालैर्मानसादेत्य हंसैर्गङ्गेव वेगितैः । ‘ जैसे वेगशाली हंस मानसरोवरसे निकलकर गंगाजीपर सब ओरसे छा जाते हैं, उसी प्रकार पांचाल - सैनिकोंद्वारा दुर्योधनकी यह विशाल सेना चारों ओरसे आक्रान्त हो रही है ॥ ७२३ ॥

सुभृशं च पराक्रान्ताः पञ्चालानां निवारणे ॥ ७३ ॥

कृपकर्णादयो वीरा ऋषभाणामिवर्षभाः । ‘ कृपाचार्य और कर्ण आदि वीर इन पांचालोंको रोकनेके लिये अत्यन्त पराक्रम दिखा रहे हैं । ठीक उसी तरह, जैसे साँड़ दूसरे साँड़ोंको दबानेकी चेष्टा करते हैं ॥ भीमास्त्रेण सुनिर्भग्नान् धार्तराष्ट्रान् महारथान् ॥ ७४ ॥

धृष्टद्युम्नमुखा वीरा घ्नन्ति शत्रून् सहस्रशः । ' भीमसेनके बाणोंसे हतोत्साह होकर भागनेवाले कौरवमहारथियों तथा सहस्रों शत्रुओंको धृष्टद्युम्न आदि वीर मार रहे हैं ॥ ७४ ॥

पञ्चालेष्वभिभूतेषु द्विषद्भिरपभीर्नदन् ॥ ७५ ॥

शत्रुपक्षमवस्कन्द्य शरानस्यति मारुतिः । शत्रुओंद्वारा पांचालोंके पराजित होनेपर ये वायुपुत्र भीमसेन निर्भय गर्जना करते हुए शत्रुदलपर आक्रमण करके बाणोंकी वर्षा कर रहे हैं ॥ ७५३ ॥

विषण्णभूयिष्ठतरा धार्तराष्ट्री महाचमूः ॥ ७६ ॥

रथाश्चैते सुवित्रस्ता भीमसेनभयार्दिताः । ' दुर्योधनकी विशाल सेनाके अधिकांश वीर अत्यन्त खिन्न हो उठे हैं और वे रथी भीमसेनके भयसे पीड़ित हो संत्रस्त हो गये हैं ॥ ७६ ॥

पश्य भीमेन नाराचैर्भिन्ना नागाः पतन्त्यमी ॥ ७७ ॥

वज्रिवज्रहतानीव शिखराणि धराभृताम् । 'देखो, इन्द्रके वज्रसे आहत होकर गिरनेवाले पर्वतशिखरोंके समान ये बड़े - बड़े हाथी भीमसेनके चलाये हुए नाराचोंसे विदीर्ण होकर पृथ्वीपर गिर रहे हैं ॥ ७७ ॥

पृष्ठ 2069

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2069 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भीमसेनस्य निर्विद्धा बाणैः संनतपर्वभिः ॥ ७८ ॥

स्वान्यनीकानि मृद्नन्तो द्रवन्त्येते महागजाः । ' भीमसेनके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे अत्यन्त घायल हुए ये विशालकाय हाथी अपनी ही सेनाओंको कुचलते हुए भागते हैं ॥ ७८३ ॥

(एते द्रवन्ति कुरवो भीमसेनभयार्दिताः ।

त्यक्त्वा गजान् हयांश्चैव रथांश्चैव सहस्रशः ॥

हस्त्यश्वरथपत्तीनां द्रवतां निःस्वनं शृणु । भीमसेनस्य निनदं द्रावयाणस्य कौरवान् ॥ ) ‘ ये भीमसेनके भयसे पीड़ित हुए कौरव- योद्धा अपने सहस्रों हाथियों, रथों और घोड़ोंको छोड़ - छोड़कर भाग रहे हैं । भागते हुए हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंका वह

आर्तनाद तथा कौरवोंको खदेड़ते हुए भीमसेनकी यह गर्जना सुन लो ।

अभिजानीहि भीमस्य सिंहनादं सुदुःसहम् ॥ ७९ ॥

नदतोऽर्जुन संग्रामे वीरस्य जितकाशिनः । 'अर्जुन! विजयश्रीसे सुशोभित हो गर्जना करनेवाले वीर भीमसेनका संग्राममें जो अत्यन्त दुःसह सिंहनाद हो रहा है, उसे पहचानो ॥ ७ ९ ३ ॥ एष नैषादिरभ्येति द्विपमुख्येन पाण्डवम् ॥ ८० ॥

जिघांसुस्तोमरैः क्रुद्धो दण्डपाणिरिवान्तकः । ' यह निषादपुत्र श्रेष्ठ गजराजपर आरूढ़ हो तोमरोंद्वारा भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे क्रोधमें भरे हुए दण्डपाणि यमराजके समान उनपर आक्रमण कर रहा है ॥ ८०१३ || सतोमरावस्य भुजौ छिन्नौ भीमेन गर्जतः ॥ ८१ ॥

तीक्ष्णैरग्निरविप्रख्यैर्नाराचैर्दशभिर्हतः । ' देखो, भीमसेनने गरजते हुए निषादपुत्रकी तोमरसहित दोनों भुजाओंको काट दिया और अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी दस तीखे नाराचोंद्वारा उसे मार डाला ॥ ८१३ ॥

हत्वैनं पुनरायाति नागानन्यान् प्रहारिणः ॥ ८२ ॥

पश्य नीलाम्बुदनिभान् महामात्रैरधिष्ठितान् ।

शक्तितोमरसंघातैर्विनिघ्नन्तं वृकोदरम् ॥ ८३ ॥

‘ इस निषादपुत्रका वध करके वे पुनः प्रहार करनेवाले दूसरे दूसरे हाथियोंपर आक्रमण कर रहे हैं । देखो, भीमसेन शक्ति और तोमरोंके समूहोंसे काले मेघोंकी घटाके समान हाथियोंको, जिनके कंधोंपर महावत बैठे हैं, मार रहे हैं ॥ ८२-८३ ॥

सप्तसप्त च नागांस्तान् वैजयन्तीश्च सध्वजाः ।

निहत्य निशितैर्बाणैश्छिन्नाः पार्थाग्रजेन ते ॥ ८४ ॥

पृष्ठ 2070

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2070 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

'पार्थ! तुम्हारे बड़े भाई भीमसेनने अपने पैने बाणोंसे ध्वजसहित वैजयन्ती पताकाओंको नष्ट करके उनचास हाथियोंको काट गिराया है ॥ ८४ ॥

दशभिर्दशभिश्चैको नाराचैर्निहतो गजः ।

न चासौ धार्तराष्ट्राणां श्रूयते निनदस्तथा ॥ ८५ ॥

पुरंदरसमे क्रुद्धे निवृत्ते भरतर्षभ । ‘ उन्होंने दस - दस नाराचोंसे एक- एक हाथीका वध किया है । भरतभूषण! इन्द्रके समान पराक्रमी भीमसेनके क्रोधपूर्वक लौटनेपर धृतराष्ट्रपुत्रोंका वह सिंहनाद अब नहीं सुनायी दे रहा है ॥ ८५३ ॥

अक्षौहिण्यस्तथा तिस्रो धार्तराष्ट्रस्य संहताः ।

क्रुद्धेन भीमसेनेन नरसिंहेन वारिताः ॥ ८६ ॥

' कुपित हुए पुरुषसिंह भीमसेनने दुर्योधनकी संगठित हुई तीन अक्षौहिणी सेनाओंको आगे बढ़ने से रोक दिया है ॥

न शक्नुवन्ति वै पार्थं पार्थिवाः समुदीक्षितुम् ।

मध्यंदिनगतं सूर्यं यथा दुर्बलचक्षुषः ॥ ८७ ॥

' जैसे दुर्बल नेत्रोंवाले प्राणी दोपहरके सूर्यकी ओर नहीं देख सकते, उसी प्रकार राजा लोग कुन्तीकुमार भीमसेनकी ओर आँख उठाकर देख नहीं पा रहे हैं ॥ ८७ ॥

एते भीमस्य संत्रस्ताः सिंहस्येवेतरे मृगाः ।

शरैः संत्रासिताः संख्ये न लभन्ते सुखं क्वचित् ॥ ८८ ॥

जैसे सिंहसे डरे हुए दूसरे मृग चैन नहीं पाते हैं, उसी प्रकार ये भीमसेनके बाणोंसे भयभीत हुए कौरव - सैनिक युद्धस्थलमें कहीं सुख नहीं पा रहे हैं ॥ ८८ ॥

( राजानं च महाबाहुं पीडयन्त्यात्तमन्यवः ।

राधेयो बहुभिः सार्धमसौ गच्छति वेगतः ॥

वर्जयित्वा तु भीमं तं पार्श्वतो ह्यानयन् धनुः । तं पालयन् महाराजं धार्तराष्ट्रं बलान्वितः ॥ ) ‘ पाण्डव - सैनिक क्रोधमें भरकर महाबाहु दुर्योधनको पीड़ा दे रहे हैं । बलशाली राधापुत्र कर्ण भीमसेनको छोड़कर बगलमें धनुष लिये महाराज दुर्योधनकी रक्षाके लिये बहुतेरे सैनिकोंके साथ वेगपूर्वक उसके पास जा रहा है । ' संजय उवाच

एतच्छ्रुत्वा महाबाहुर्वासुदेवाद् धनंजयः ।

भीमसेनेन तत् कर्म कृतं दृष्ट्वा सुदुष्करम् ॥ ८ ९ ॥

अर्जुनो व्यधमच्छिष्टानहितान् निशितैः शरैः ।