श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 2051–2060
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2051–2060
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महाराज! तब कर्णने अत्यन्त कुपित हो धृष्टद्युम्नपर द्वितीय मृत्युदण्डके समान एक सुवर्ण- भूषित बाण चलाया ॥ १४ ॥
तमापतन्तं सहसा घोररूपं विशाम्पते ।
चिच्छेद शतधा राजञ्शैनेयः कृतहस्तवत् ॥ १५ ॥
प्रजानाथ! नरेश! सहसा आते हुए उस भयंकर बाणके सात्यकिने सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति सौ टुकड़े कर डाले ॥ १५ ॥
दृष्ट्वा विनिहतं बाणं शरैः कर्णो विशाम्पते ।
सात्यकिं शरवर्षेण समन्तात् पर्यवारयत् ॥ १६ ॥
प्रजापालक नरेश! सात्यकिके बाणोंसे अपने बाणको नष्ट हुआ देख कर्णने चारों ओरसे बाण बरसाकर सात्यकिको ढक दिया ॥ १६ ॥
विव्याध चैनं समरे नाराचैस्तत्र सप्तभिः ।
तं प्रत्यविध्यच्छैनेयः शरैर्हेमपरिष्कृतैः ॥ १७ ॥
साथ ही समरांगणमें सात नाराचोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया । तब सात्यकिने भी सुवर्णभूषित बाणोंसे कर्णको घायल करके बदला चुकाया ॥ १७ ॥
ततो युद्धं महाराज चक्षुःश्रोत्रभयानकम् ।
आसीद् घोरं च चित्रं च प्रेक्षणीयं समन्ततः ॥ १८ ॥
महाराज! तब नेत्रोंसे देखने और कानोंसे सुननेपर भी भय उत्पन्न करनेवाला घोर एवं विचित्र युद्ध छिड़ गया, जो सब ओरसे देखने ही योग्य था ॥ १८ ॥
सर्वेषां तत्र भूतानां लोमहर्षोऽभ्यजायत ।
तद् दृष्ट्वा समरे कर्म कर्णशैनेययोर्नृप ॥ १ ९ ॥
नरेश्वर! समरभूमिमें कर्ण और सात्यकिका वह कर्म देखकर समस्त प्राणियोंके रोंगटे खड़े हो गये ॥ १ ९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे द्रौणिरभ्ययात् सुमहाबलम् ।
पार्षतं शत्रुदमनं शत्रुवीर्यासुनाशनम् ॥ २० ॥
इसी समय शत्रुओंके बल और प्राणोंका नाश करनेवाले शत्रुसूदन महाबली धृष्टद्युम्नके पास द्रोणकुमार अश्वत्थामा आ पहुँचा ॥ २० ॥
अभ्यभाषत संक्रुद्धो द्रौणिः परपुरंजयः ।
तिष्ठ तिष्ठाद्य ब्रह्मघ्न न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ॥ २१ ॥
शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाला द्रोणपुत्र अश्वत्थामा वहाँ पहुँचते ही अत्यन्त कुपित होकर बोला — ' ब्रह्महत्या करनेवाले पापी! खड़ा रह, खड़ा रह, आज तू मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा ' ॥ २१ ॥
इत्युक्त्वा सुभृशं वीरं शीघ्रकृन्निशितैः शरैः ।
पार्षतं छादयामास घोररूपैः सुतेजनैः ॥ २२ ॥
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यतमानं परं शक्त्या यतमानो महारथः । ऐसा कहकर शीघ्रता करनेवाले प्रयत्नशील महारथी अश्वत्थामाने अत्यन्त तेज, घोर एवं पैने बाणोंद्वारा यथाशक्ति विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले वीर धृष्टद्युम्नको ढक दिया ॥ २२ ॥
यथा हि समरे द्रोणः पार्षतं वीक्ष्य मारिष ॥ २३ ॥
तथा द्रौणिं रणे दृष्ट्वा पार्षतः परवीरहा ।
नातिहृष्टमना भूत्वा मन्यते मृत्युमात्मनः ॥ २४ ॥
आर्य! जैसे द्रोणाचार्य समरभूमिमें धृष्टद्युम्नको देखकर मन-ही- मन खिन्न हो उसे अपनी मृत्यु मानते थे, उसी प्रकार शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले धृष्टद्युम्न भी रणक्षेत्रमें अश्वत्थामाको देखकर अप्रसन्न हो उसे अपनी मृत्यु समझते थे ॥ २३-२४ ॥
स ज्ञात्वा समरेऽऽत्मानं शस्त्रेणावध्यमेव तु ।
जवेनाभ्याययौ द्रौणिं कालः कालमिव क्षये ॥ २५ ॥
वे अपने - आपको समरभूमिमें शस्त्रद्वारा अवध्य मानकर बड़े वेगसे अश्वत्थामाके सामने आये, मानो प्रलयके समय काल ही कालपर टूट पड़ा हो ॥ २५ ॥
द्रौणिस्तु दृष्ट्वा राजेन्द्र धृष्टद्युम्नमवस्थितम् ।
क्रोधेन निःश्वसन् वीरः पार्षतं समुपाद्रवत् ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! वीर अश्वत्थामाने द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नको सामने खड़ा देख क्रोधसे लंबी साँस खींचते हुए उनपर आक्रमण किया ॥ २६ ॥
तावन्योन्यं तु दृष्ट्वैव संरम्भं जग्मतुः परम् ।
अथाब्रवीन्महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ॥ २७ ॥
धृष्टद्युम्नं समीपस्थं त्वरमाणो विशाम्पते । महाराज! वे दोनों एक- दूसरेको देखते ही अत्यन्त क्रोधमें भर गये । प्रजानाथ! फिर प्रतापी द्रोणपुत्रने बड़ी उतावलीके साथ अपने पास ही खड़े हुए धृष्टद्युम्नसे कहा— ॥ २७ ३ ॥ पाञ्चालापसदाद्य त्वां प्रेषयिष्यामि मृत्यवे ॥ २८ ॥
पापं हि यत् त्वया कर्म घ्नता द्रोणं पुरा कृतम् ।
अद्य त्वां तप्स्यते तद् वै यथा न कुशलं तथा ॥ २ ९ ॥
‘ पांचालकुलकलंक! आज मैं तुझे मौतके मुँहमें भेज दूँगा। तुमने पूर्वकालमें द्रोणाचार्यका वध करके जो पापकर्म किया है, वह एक अमंगलकारी कर्मकी भाँति आज तुझे संताप देगा ॥ २८-२९ ॥
अरक्ष्यमाणः पार्थेन यदि तिष्ठसि संयुगे ।
नापक्रामसि वा मूढ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३० ॥
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‘ ओ मूर्ख! यदि तू अर्जुनसे अरक्षित रहकर युद्धभूमिमें खड़ा रहेगा, भाग नहीं जायगा तो अवश्य तुझे मार डालूँगा, यह मैं तुझसे सत्य कहता हूँ' ॥ ३० ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ।
प्रतिवाक्यं स एवासिर्मामको दास्यते तव ॥ ३१ ॥
येनैव ते पितुर्दत्तं यतमानस्य संयुगे । अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर प्रतापी धृष्टद्युम्नने उससे इस प्रकार उत्तर दिया — ' अरे! तेरी इस बातका जवाब तुझे मेरी वही तलवार देगी, जिसने युद्धस्थलमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले तेरे पिताको दिया था ॥ ३१ ॥
यदि तावन्मया द्रोणो निहतो ब्राह्मणब्रुवः ॥ ३२ ॥
त्वामिदानीं कथं युद्धे न हनिष्यामि विक्रमात् । ' यदि मैंने नाममात्रके ब्राह्मण द्रोणाचार्यको पहले मार डाला था, तो इस समय पराक्रम करके तुझे भी मैं कैसे नहीं मार डालूँगा' ॥ ३२३ ॥
एवमुक्त्वा महाराज सेनापतिरमर्षणः ॥ ३३ ॥
निशितेनातिबाणेन द्रौणिं विव्याध पार्षतः । महाराज! ऐसा कहकर अमर्षशील सेनापति द्रुपदकुमारने अत्यन्त तीखे बाणसे द्रोणपुत्रको बींध डाला ॥ ३३३ ॥
ततो द्रौणिः सुसंक्रुद्धः शरैः संनतपर्वभिः ॥ ३४ ॥
आच्छादयद् दिशो राजन् धृष्टद्युम्नस्य संयुगे । इससे अश्वत्थामाका क्रोध बहुत बढ़ गया। राजन्! उसने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नकी सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ३४ ॥
नैवान्तरिक्षं न दिशो नापि योधाः समन्ततः ॥ ३५ ॥
दृश्यन्ते वै महाराज शरैश्छन्नाः सहस्रशः । महाराज! उस समय सब ओरसे बाणोंद्वारा आच्छादित होनेके कारण न तो आकाश दिखायी देता था, न दिशाएँ दीखती थीं और न सहस्रों योद्धा ही दृष्टिगोचर होते थे ॥ ३५३ || तथैव पार्षतो राजन् द्रौणिमाहवशोभिनम् ॥ ३६ ॥
शरैः संछादयामास सूतपुत्रस्य पश्यतः । राजन्! उसी प्रकार युद्धमें शोभा पानेवाले अश्वत्थामाको धृष्टद्युम्नने भी कर्णके देखते-देखते बाणोंसे ढक दिया ॥ ३६ ॥
राधेयोऽपि महाराज पञ्चालान् सह पाण्डवैः ॥ ३७ ॥
द्रौपदेयान् युधामन्युं सात्यकिं च महारथम् ।
एकः संवारयामास प्रेक्षणीयः समन्ततः ॥ ३८ ॥
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महाराज! सब ओरसे दर्शनीय राधापुत्र कर्णने भी पाण्डवोंसहित पांचालों, द्रौपदीके पाँचों पुत्रों, युधामन्यु और महारथी सात्यकिको अकेले ही आगे बढ़नेसे रोक दिया था ॥ ३७-३८ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु समरे द्रौणेश्चिच्छेद कार्मुकम् ।
तदपास्य धनुर्द्रौणिरन्यदादाय कार्मुकम् ॥ ३ ९ ॥
वेगवान् समरे घोरे शरांश्चाशीविषोपमान् ।
स पार्षतस्य राजेन्द्र धनुः शक्तिं गदां ध्वजम् ॥ ४० ॥
हयान् सूतं रथं चैव निमेषाद् व्यधमच्छरैः । धृष्टद्युम्नने समरांगणमें अश्वत्थामाके धनुषको काट डाला । राजेन्द्र! तब वेगवान् अश्वत्थामाने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा धनुष और विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण हाथमें लेकर उनके द्वारा पलक मारते- मारते धृष्टद्युम्नके धनुष, शक्ति, गदा, ध्वज, अश्व, सारथि एवं रथको तहस - नहस कर दिया ॥ ३ ९ -४०३ ॥ स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः ॥ ४१ ॥
खड्गमादत्त विपुलं शतचन्द्रं च भानुमत् । धनुष कट जाने और घोड़ों तथा सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए धृष्टद्युम्नने विशाल खड्ग और सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त चमकती हुई ढाल हाथमें ले ली ॥ ४१३ ॥
द्रौणिस्तदपि राजेन्द्र भल्लैः क्षिप्रं महारथः ॥ ४२ ॥
चिच्छेद समरे वीरः क्षिप्रहस्तो दृढायुधः ।
रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४३ ॥
राजेन्द्र! शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले सुदृढ़ आयुधधारी वीर महारथी अश्वत्थामाने समरांगणमें अनेक भल्लोंद्वारा रथसे उतरनेके पहले ही धृष्टद्युम्नकी उस ढाल- तलवारको भी काट दिया । यह एक अद्भुत- सी बात हुई ॥ ४२-४३ ॥
धृष्टद्युम्नं हि विरथं हताश्वं छिन्नकार्मुकम् ।
शरैश्च बहुधा विद्धमस्त्रैश्च शकलीकृतम् ॥ ४४ ॥
नाशकद् भरतश्रेष्ठ यतमानो महारथः । भरतश्रेष्ठ! यद्यपि धृष्टद्युम्न रथहीन हो गये थे, उनके घोड़े मारे जा चुके थे, धनुष कट गया था तथा वे बाणोंसे बारंबार घायल और अस्त्र - शस्त्रोंसे जर्जर हो गये थे तो भी महारथी अश्वत्थामा लाख प्रयत्न करनेपर भी उन्हें मार न सका ॥ ४४ ॥
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3S तस्यान्तमिषुभी राजन् यदा द्रौणिर्न जग्मिवान् ॥ ४५ ॥
अथ त्यक्त्वा धनुर्वीरः पार्षतं त्वरितोऽन्वगात् । राजन्! जब वीर द्रोणकुमार बाणोंद्वारा उनका वध न कर सका, तब वह धनुष फेंककर तुरंत ही धृष्टद्युम्नकी ओर दौड़ा ॥ ४५ ॥
आसीदाप्लवतो वेगस्तस्य राजन् महात्मनः ॥ ४६ ॥
गरुडस्येव पततो जिघृक्षोः पन्नगोत्तमम् । नरेश्वर! रथसे उछलकर दौड़ते हुए महामना अश्वत्थामाका वेग बहुत बड़े सर्पको पकड़नेके लिये झपटे हुए गरुड़के समान प्रतीत हुआ ॥ ४६३ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु माधवोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
पश्य पार्थ यथा द्रौणिः पार्षतस्य वधं प्रति ।
यत्नं करोति विपुलं हन्याच्चैनं न संशयः ॥ ४८ ॥
इसी समय श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा– ' पार्थ! वह देखो, द्रोणकुमार अश्वत्थामा धृष्टद्युम्नके वधके लिये कैसा महान् प्रयत्न कर रहा है? वह इन्हें मार सकता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४७-४८ ॥ तं मोचय महाबाहो पार्षतं शत्रुकर्शन ।
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द्रौणेरास्यमनुप्राप्तं मृत्योरास्यगतं यथा ॥ ४ ९ ॥ ‘ महाबाहो! शत्रुसूदन! जैसे कोई मौतके मुखमें पड़ गया हो, उसी प्रकार अश्वत्थामाके मुखमें पहुँचे हुए धृष्टद्युम्नको छुड़ाओ ' ॥ ४ ९ ॥
एवमुक्त्वा महाराज वासुदेवः प्रतापवान् ।
प्रैषयत् तुरगांस्तत्र यत्र द्रौणिर्व्यवस्थितः ॥ ५० ॥
महाराज! ऐसा कहकर प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने अपने घोड़ोंको उसी ओर हाँका जहाँ द्रोणकुमार अश्वत्थामा खड़ा था ॥ ५० ॥
ते हयाश्चन्द्रसंकाशाः केशवेन प्रचोदिताः ।
आपिबन्त इव व्योम जग्मुर्द्रौणिरथं प्रति ॥ ५१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा हाँके गये वे चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाले घोड़े अश्वत्थामाके रथकी ओर इस प्रकार दौड़े, मानो आकाशको पीते जा रहे हों ॥ ५१ ॥
दृष्ट्वाऽऽयातौ महावीर्यावुभौ कृष्णधनंजयौ ।
धृष्टद्युम्नवधे यत्नं चक्रे राजन् महाबलः ॥ ५२ ॥
राजन्! महापराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको आते देख महाबली अश्वत्थामा धृष्टद्युम्नके वधके लिये विशेष प्रयत्न करने लगा ॥ ५२ ॥
विकृष्यमाणं दृष्ट्वैव धृष्टद्युम्नं नरेश्वर ।
शरांश्चिक्षेप वै पार्थो द्रौणिं प्रति महाबलः ॥ ५३ ॥
नरेश्वर! धृष्टद्युम्नको खींचे जाते देख महाबली अर्जुनने अश्वत्थामापर बहुत- से बाण चलाये ॥ ५३ ॥
ते शरा हेमविकृता गाण्डीवप्रेषिता भृशम् ।
द्रौणिमासाद्य विविशुर्वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ५४ ॥
गाण्डीव धनुषसे वेगपूर्वक छूटे हुए वे सुवर्ण- निर्मित बाण अश्वत्थामाके पास पहुँचकर उसके शरीरमें उसी प्रकार घुस गये, जैसे सर्प बाँबीमें प्रवेश करते हैं ॥ ५४ ॥
स विद्धस्तैः शरैर्घोरैर्द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
उत्सृज्य समरे राजन् पाञ्चाल्यममितौजसम् ॥ ५५ ॥
रथमारुरुहे वीरो धनंजयशरार्दितः ।
प्रगृह्य च धनुः श्रेष्ठं पार्थं विव्याध सायकैः ॥ ५६ ॥
राजन्! उन भयंकर बाणोंसे घायल हुआ प्रतापी वीर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा समरांगणमें अमित बलशाली धृष्टद्युम्नको छोड़कर अपने रथपर जा चढ़ा । वह धनंजयके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो चुका था; इसलिये उसने भी श्रेष्ठ धनुष हाथमें लेकर बाणोंद्वारा अर्जुनको घायल कर दिया ॥ ५५-५६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरः सहदेवो जनाधिप ।
अपोवाह रथेनाजौ पार्षतं शत्रुतापनम् ॥ ५७ ॥
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नरेश्वर! इसी बीचमें वीर सहदेव शत्रुओंको संताप देनेवाले धृष्टद्युम्नको अपने रथके द्वारा रणभूमिमें अन्यत्र हटा ले गये ॥ ५७ ॥
अर्जुनोऽपि महाराज द्रौणिं विव्याध पत्रिभिः ।
तं द्रोणपुत्रः संक्रुद्धो बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ ५८ ॥
महाराज! अर्जुनने भी अपने बाणोंसे अश्वत्थामाको घायल कर दिया । तब द्रोणपुत्रने अत्यन्त कुपित हो अर्जुनकी छाती और दोनों भुजाओंमें प्रहार किया ॥ ५८ ॥
क्रोधितस्तु रणे पार्थो नाराचं कालसम्मितम् ।
द्रोणपुत्राय चिक्षेप कालदण्डमिवापरम् ॥ ५ ९ ॥
रणमें कुपित हुए कुन्तीकुमारने द्रोणपुत्रपर द्वितीय कालदण्डके समान साक्षात् कालस्वरूप नाराच चलाया ॥ ५ ९ ॥
ब्राह्मणस्यांसदेशे स निपपात महाद्युतिः ।
स विह्वलो महाराज शरवेगेन संयुगे ॥ ६० ॥
निषसाद रथोपस्थे वैक्लव्यं च परं ययौ । महाराज! वह महातेजस्वी नाराच उस ब्राह्मणके कंधेपर जा लगा । अश्वत्थामा युद्धस्थलमें उस बाणके वेगसे व्याकुल हो रथकी बैठकमें धम्मसे बैठ गया और अत्यन्त मूर्च्छित हो गया ॥ ६०३ ॥
ततः कर्णो महाराज व्याक्षिपद् विजयं धनुः ॥ ६१ ॥
अर्जुनं समरे क्रुद्धः प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ।
द्वैरथं चापि पार्थेन कामयानो महारणे ॥ ६२ ॥
राजराजेश्वर! तत्पश्चात् कर्णने समरांगणमें कुपित हो अर्जुनकी ओर बारंबार देखते हुए विजय नामक धनुषकी टंकार की । वह महासमरमें अर्जुनके साथ द्वैरथ युद्धकी अभिलाषा करता था ॥ ६१-६२ ॥
विह्वलं तं तु वीक्ष्याथ द्रोणपुत्रं च सारथिः ।
अपोवाह रथेनाजौ त्वरमाणो रणाजिरात् ॥ ६३ ॥
द्रोणकुमारको विह्वल देखकर उसका सारथि बड़ी उतावलीके साथ उसे रथके द्वारा समरांगणसे दूर हटा ले गया ॥ ६३ ॥
अथोत्क्रुष्टं महाराज पञ्चालैर्जितकाशिभिः ।
मोक्षितं पार्षतं दृष्ट्वा द्रोणपुत्रं च पीडितम् ॥ ६४ ॥
महाराज! धृष्टद्युम्नको संकटसे मुक्त और द्रोणपुत्रको पीड़ित देख विजयसे उल्लसित होनेवाले पांचालोंने बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ६४ ॥
वादित्राणि च दिव्यानि प्रावाद्यन्त सहस्रशः ।
सिंहनादांश्च चक्रुस्ते दृष्ट्वा संख्ये तदद्भुतम् ॥ ६५ ॥
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उस समय सहस्रों दिव्य वाद्य बजने लगे । वे पांचाल- सैनिक युद्धस्थलमें वह अद्भुत कार्य देखकर सिंहनाद करने लगे ॥ ६५ ॥
एवं कृत्वाब्रवीत् पार्थो वासुदेवं धनंजयः ।
याहि संशप्तकान् कृष्ण कार्यमेतत् परं मम ॥ ६६ ॥
ऐसा पराक्रम करके कुन्तीपुत्र धनंजयने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा– ' श्रीकृष्ण! अब
संशप्तकोंकी ओर चलिये । इस समय यही मेरा सबसे प्रधान कार्य है ' ॥ ६६ ॥
ततः प्रयातो दाशार्हः श्रुत्वा पाण्डवभाषितम् ।
रथेनातिपताकेन मनोमारुतरंहसा ॥ ६७ ॥
श्रीकृष्ण अर्जुनका वह कथन सुनकर मन और वायुके समान वेगशाली तथा अत्यन्त ऊँची पताकावाले रथके द्वारा वहाँसे चल दिये ॥ ६७ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि द्रौण्यपयाने एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अश्वत्थामाका पलायनविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ९ ॥
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षष्टितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका अर्जुनसे दुर्योधन और कर्णके पराक्रमका वर्णन करके कर्णको मारनेके लिये अर्जुनको उत्साहित करना तथा भीमसेनके दुष्कर पराक्रमका वर्णन करना संजय उवाच
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णः पार्थं वचनमब्रवीत् ।
दर्शयन्निव कौन्तेयं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! इसी समय भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको धर्मराज युधिष्ठिरका दर्शन कराते हुए- से इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
एष पाण्डव ते भ्राता धार्तराष्ट्रैर्महाबलैः ।
जिघांसुभिर्महेष्वासैर्द्रुतं पार्थोऽनुसार्यते ॥ २ ॥
'पाण्डुनन्दन! ये तुम्हारे भाई कुन्तीकुमार युधिष्ठिर हैं, जिन्हें मार डालनेकी इच्छासे महाबली महाधनुर्धर धृतराष्ट्रपुत्र शीघ्रतापूर्वक इनका पीछा कर रहे हैं ॥ २ ॥
तं चानुयान्ति संरब्धाः पञ्चाला युद्धदुर्मदाः ।
युधिष्ठिरं महात्मानं परीप्सन्तो महाबलाः ॥ ३ ॥
' रणदुर्मद महाबली पांचाल - सैनिक महात्मा युधिष्ठिरकी रक्षा करते हुए बड़े रोष और आवेशमें भरकर उनके साथ जा रहे हैं ॥ ३ ॥
एष दुर्योधनः पार्थ रथानीकेन दंशितः ।
राजा सर्वस्य लोकस्य राजानमनुधावति ॥ ४ ॥
‘पार्थ! यह सम्पूर्ण जगत्का राजा दुर्योधन कवच धारण करके रथसेनाके साथ राजा युधिष्ठिरका पीछा कर रहा है ॥ ४ ॥
जिघांसुः पुरुषव्याघ्र भ्रातृभिः सहितो बली ।
आशीविषसमस्पर्शेः सर्वयुद्धविशारदैः ॥ ५ ॥
‘ पुरुषसिंह! जिनका स्पर्श विषधर सर्पोंके समान भयंकर है तथा जो सम्पूर्ण युद्ध-कलाओंमें निपुण हैं, उन भाइयोंके साथ बली दुर्योधन राजा युधिष्ठिरको मार डालनेकी इच्छासे उनके पीछे लगा हुआ है ॥ ५ ॥
एते जिघृक्षवो यान्ति द्विपाश्वरथपत्तयः ।
युधिष्ठिरं धार्तराष्ट्रा नरोत्तममिवार्थिनः ॥ ६ ॥
' जैसे याचक किसी श्रेष्ठ पुरुषको पाना चाहते हैं, उसी प्रकार हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसहित ये दुर्योधनके सैनिक युधिष्ठिरको पकड़नेके लिये उनपर चढ़ाई करते हैं ॥ ६ ॥
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पश्य सात्वतभीमाभ्यां निरुद्धाधिष्ठिताः पुनः जिहीर्षवोऽमृतं दैत्याः शक्राग्निभ्यामिवासकृत् ॥ ७ ॥
'देखो, जैसे अमृतका अपहरण करनेकी इच्छावाले दैत्योंको इन्द्र और अग्निने बारंबार रोका था, उसी प्रकार ये दुर्योधनके सैनिक सात्यकि और भीमसेनके द्वारा अवरुद्ध होकर पुनः खड़े हो गये हैं ॥ ७ ॥
एते बहुत्वात्त्वरिताः पुनर्गच्छन्ति पाण्डवम् ।
समुद्रमिव वार्योघाः प्रावृट्काले महारथाः ॥ ८ ॥
‘ जैसे वर्षाकालमें जलके प्रवाह अधिक होनेके कारण समुद्रतक चले जाते हैं, उसी प्रकार ये कौरव महारथी बहुसंख्यक होनेके कारण पुनः बड़ी उतावलीके साथ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरपर चढ़े जा रहे हैं ॥ ८ ॥
नदन्तः सिंहनादांश्च धमन्तश्चापि वारिजान् ।
बलवन्तो महेष्वासा विधुन्वन्तो धनूंषि च ॥ ९ ॥
‘ वे बलवान् और महाधनुर्धर कौरव सिंहनाद करते, शंख बजाते और अपने धनुषोंको कँपाते हुए आगे बढ़ रहे हैं ॥ ९ ॥
मृत्योर्मुखगतं मन्ये कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
हुतमग्नौ च कौन्तेयं दुर्योधनवशं गतम् ॥ १० ॥
‘ मैं तो समझता हूँ कि इस समय कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर दुर्योधनके अधीन हो मृत्युके मुखमें चले गये हैं अथवा प्रज्वलित अग्निकी आहुति बन गये हैं ॥ १० ॥
यथाविधमनीकं तु धार्तराष्ट्रस्य पाण्डव ।
नास्य शक्रोऽपि मुच्येत सम्प्राप्तो बाणगोचरम् ॥ ११ ॥
‘ पाण्डुनन्दन! दुर्योधनकी सेनाका जैसा व्यूह दिखायी दे रहा है, उससे यह जान पड़ता है कि उसके बाणोंके मार्गमें आ जानेपर इन्द्र भी जीवित नहीं छूट सकते ॥ ११ ॥
दुर्योधनस्य वीरस्य शरौघान् शीघ्रमस्यतः ।
संक्रुद्धस्यान्तकस्येव को वेगं संसद् रणे ॥ १२ ॥
' क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान शीघ्रतापूर्वक बाणसमूहोंकी वर्षा करनेवाले वीर दुर्योधनका वेग इस युद्धमें कौन सह सकता है? ॥ १२ ॥
दुर्योधनस्य वीरस्य द्रौणेः शारद्वतस्य च ।
कर्णस्य चेषुवेगो वै पर्वतानपि शातयेत् ॥ १३ ॥
' वीर दुर्योधन, अश्वत्थामा, कृपाचार्य तथा कर्णके बाणोंका वेग पर्वतोंको भी विदीर्ण कर सकता है ॥ १३ ॥
कर्णेन च कृतो राजा विमुखः शत्रुतापनः ।
बलवाँल्लघुहस्तश्च कृती युद्धविशारदः ॥ १४ ॥