04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2161–2170
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2161–2170
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तव बुद्ध्या हि भद्रं ते वधस्तस्य दुरात्मनः - राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले – ' श्रीकृष्ण! आज रणभूमिमें मैं कर्णका वध करूँगा, इसमें संशय नहीं है । आपका कल्याण हो । आपकी बुद्धिसे ही उस दुरात्माका वध होगा ' ॥ २३३ ॥
एवमुक्तोऽब्रवीत् पार्थं केशवो राजसत्तम ॥ २४ ॥
शक्तोऽसि भरतश्रेष्ठ हन्तुं कर्णं महाबलम् ।
एष चापि हि मे कामो नित्यमेव महारथ ॥ २५ ॥
कथं भवान् रणे कर्णं निहन्यादिति सत्तम । नृपश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा– ' भरतश्रेष्ठ! तुम महाबली कर्णका वध करनेमें समर्थ हो । सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महारथी वीर! मेरे मनमें भी सदा यही इच्छा बनी रहती है कि तुम रणभूमिमें कर्णको किसी तरह मार डालो ' ॥ २४-२५३ ॥ भूयश्चोवाच मतिमान् माधवो धर्मनन्दनम् ॥ २६ ॥
युधिष्ठिरेमं बीभत्सुं त्वं सान्त्वयितुमर्हसि ।
अनुज्ञातुं च कर्णस्य वधायाद्य दुरात्मनः ॥ २७ ॥
फिर बुद्धिमान् भगवान् माधवने धर्मनन्दन युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा- ‘ महाराज! आप अर्जुनको सान्त्वना और दुरात्मा कर्णके वधके लिये आज्ञा प्रदान करें ॥
श्रुत्वा ह्यहमयं चैव त्वां कर्णशरपीडितम् ।
प्रवृत्तिं ज्ञातुमायाताविहावां पाण्डुनन्दन ॥ २८ ॥
‘ पाण्डुनन्दन! राजन्! आप कर्णके बाणोंसे बहुत पीड़ित हो गये हैं - यह सुनकर मैं और ये अर्जुन दोनों आपका समाचार जाननेके लिये यहाँ आये थे ॥ २८ ॥
दिष्ट्यासि राजन् न हतो दिष्ट्या न ग्रहणं गतः ।
परिसान्त्वय बीभत्सुं जयमाशाधि चानघ ॥ २ ९ ॥
‘निष्पाप नरेश! सौभाग्यकी बात है कि ( कर्णके द्वारा) न तो आप मारे गये और न पकड़े ही गये । अब आप अर्जुनको सान्त्वना दें और उन्हें विजयके लिये आशीर्वाद प्रदान करें ' ॥ २ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच
एह्येहि पार्थ बीभत्सो मां परिष्वज पाण्डव ।
वक्तव्यमुक्तोऽस्मि हितं त्वया क्षान्तं च तन्मया ॥ ३० ॥
युधिष्ठिर बोले – कुन्तीनन्दन! बीभत्सो! आओ, आओ! पाण्डुकुमार! मेरे हृदयसे लग जाओ । तुमने तो मेरे प्रति कहनेयोग्य और हितकी ही बात कही है तथा मैंने उसके लिये क्षमा भी कर दी ॥ ३० ॥
अहं त्वामनुजानामि जहि कर्ण धनंजय ।
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मन्युं च मा कृथाः पार्थ यन्मयोक्तोऽसि दारुणम् ॥ ३१ ॥
धनंजय! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, कर्णका वध करो । पार्थ! मैंने जो तुमसे कठोर वचन कहा है, उसके लिये खेद न करना ॥ ३१ ॥
संजय उवाच
ततो धनंजयो राजञ्शिरसा प्रणतस्तदा ।
पादौ जग्राह पाणिभ्यां भ्रातुर्ज्येष्ठस्य मारिष ॥ ३२ ॥
संजय कहते हैं — माननीय नरेश! तब धनंजयने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और दोनों हाथोंसे बड़े भाईके पैर पकड़ लिये ॥ ३२ ॥
तमुत्थाप्य ततो राजा परिष्वज्य च पीडितम् ।
मूर्क्युपाघ्राय चैवैनमिदं पुनरुवाच ह ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् राजाने मन - ही- मन पीड़ाका अनुभव करनेवाले अर्जुनको उठाकर छातीसे लगा लिया और उनका मस्तक सूँघकर पुनः उनसे इस प्रकार कहा- ॥ ३३ ॥
धनंजय महाबाहो मानितोऽस्मि दृढं त्वया ।
माहात्म्यं विजयं चैव भूयः प्राप्नुहि शाश्वतम् ॥ ३४ ॥
‘ महाबाहु धनंजय! तुमने मेरा बड़ा सम्मान किया है; अतः तुम्हारी महिमा बढ़े और तुम्हें पुनः सनातन विजय प्राप्त हो' ॥ ३४ ॥
अर्जुनउवाच
अद्य तं पापकर्माणं सानुबन्धं रणे शरैः ।
नयाम्यन्तं समासाद्य राधेयं बलगर्वितम् ॥ ३५ ॥
अर्जुन बोले- महाराज! आज मैं अपने बलका घमंड रखनेवाले उस पापाचारी राधापुत्र कर्णको रणभूमिमें पाकर उसके सगे- सम्बन्धियोंसहित मृत्युके समीप भेज दूँगा ॥ ३५ ॥
येन त्वं पीडितो बाणैर्दृढमायम्य कार्मुकम् ।
तस्याद्य कर्मणः कर्णः फलमाप्स्यति दारुणम् ॥ ३६ ॥
राजन्! जिसने धनुषको दृढ़तापूर्वक खींचकर अपने बाणोंद्वारा आपको पीड़ित किया है, वह कर्ण आज अपने उस पापकर्मका अत्यन्त भयंकर फल पायेगा ॥ ३६ ॥
अद्य त्वामनुपश्यामि कर्णं हत्वा महीपते ।
सभाजयितुमाक्रन्दादिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ३७ ॥
भूपाल! आज मैं कर्णको मारकर ही आपका दर्शन करूँगा और युद्धस्थलसे आपका
अभिनन्दन करनेके लिये आऊँगा । यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ ॥ ३७ ॥
नाहत्वा विनिवर्तिष्ये कर्णमद्य रणाजिरात् ।
इति सत्येन ते पादौ स्पृशामि जगतीपते ॥ ३८ ॥
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पृथ्वीपते! आज मैं कर्णको मारे बिना समरांगणसे नहीं लौटूंगा । इस सत्यके द्वारा मैं आपके दोनों चरण छूता हूँ ॥ संजय उवाच इति ब्रुवाणं सुमनाः किरीटिनं युधिष्ठिरः प्राह वचोबृहत्तरम् यशोऽक्षयं जीवितमीप्सितं ते जयं सदा वीर्यमरिक्षयं तदा ॥ ३ ९ ॥ संजय कहते हैं - राजन्! ऐसी बातें कहनेवाले किरीटधारी अर्जुनसे युधिष्ठिरने प्रसन्नचित्त होकर यह महत्त्वपूर्ण बात कही - ' वीर! तुम्हें अक्षय यश, पूर्ण आयु, मनोवांछित कामना, विजय तथा शत्रुनाशक पराक्रम- ये सदा प्राप्त होते रहें ॥ ३ ९ ॥ प्रयाहि वृद्धिं च दिशन्तु देवता यथाहमिच्छामि तवास्तु तत् तथा । प्रयाहि शीघ्रं जहि कर्णमाहवे पुरंदरो वृत्रमिवात्मवृद्धये ॥ ४० ॥
'जाओ, देवता तुम्हें अभ्युदय प्रदान करें । मैं तुम्हारे लिये जैसा चाहता हूँ, वैसा ही सब कुछ तुम्हें प्राप्त हो । आगे बढ़ो और युद्धस्थलमें शीघ्र ही कर्णको मार डालो । ठीक उसी तरह, जैसे देवराज इन्द्रने अपने ही ऐश्वर्यकी वृद्धिके लिये वृत्रासुरका नाश किया था' ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अर्जुनप्रतिज्ञायामेकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अर्जुनका प्रतिज्ञाविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७१ ॥
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द्विसप्ततितमोऽध्यायः श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रणयात्रा, मार्गमें शुभ शकुन तथा श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रोत्साहन देना संजय उवाच
प्रसाद्य धर्मराजानं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
पार्थः प्रोवाच गोविन्दं सूतपुत्रवधोद्यतः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिरको प्रसन्न करके अर्जुन सूतपुत्र कर्णका वध करनेके लिये उद्यत हो प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णसे बोले – ॥ १ ॥
कल्पतां मे रथो भूयो युज्यन्तां च हयोत्तमाः ।
आयुधानि च सर्वाणि सज्जन्तां मे महारथे ॥ २ ॥
उपावृत्ताश्च तुरगाः शिक्षिताश्चाश्वसादिभिः ।
रथोपकरणैः सज्जा उपायान्तु त्वरान्विताः ॥ ३ ॥
प्रयाहि शीघ्रं गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । ‘ गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो । उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र- शस्त्र सजाकर रख दिये जायँ। अश्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये ' ॥ २-३ ॥ एवमुक्तो महाराज फाल्गुनेन महात्मना ॥ ४ ॥
उवाच दारुकं कृष्णः कुरु सर्वं यथाब्रवीत् ।
अर्जुनो भरतश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ ५ ॥
महाराज! महात्मा अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने दारुकसे कहा ——सारथे! समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ भरतभूषण अर्जुनने जैसा कहा है, उसके अनुसार सारी तैयारी करो ' ॥ ४-५ ॥
आज्ञप्तस्त्वथ कृष्णेन दारुको राजसत्तम ।
योजयामास स रथं वैयाघ्रं शत्रुतापनम् ॥ ६ ॥
सज्जं निवेदयामास पाण्डवस्य महात्मनः । नृपश्रेष्ठ! श्रीकृष्णके इस प्रकार आदेश देनेपर दारुकने व्याघ्र चर्मसे आच्छादित तथा शत्रुओंको तपानेवाले रथको जोतकर तैयार कर दिया और महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके पास आकर निवेदन किया कि ' आपका रथ सब सामग्रियोंसे सुसज्जित है ' ॥ ६३ ॥
युक्तं तु तं रथं दृष्ट्वा दारुकेण महात्मना ॥ ७ ॥
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आपृच्छ्य धर्मराजानं ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ।
सुमङ्गलस्वस्त्ययनमारुरोह रथोत्तमम् ॥ ८ ॥
महामना दारुकके द्वारा जोतकर लाये हुए उस रथको देखकर अर्जुन धर्मराजसे आज्ञा ले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कल्याणके आश्रयभूत उस परम मंगलमय उत्तम रथपर आरूढ हुए ॥ ७-८ ॥
तस्य राजा महाप्राज्ञो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
आशिषोऽयुङ्क्त स ततः प्रायात् कर्णरथं प्रति ॥ ९ ॥
उस समय महाबुद्धिमान् धर्मराज राजा युधिष्ठिरने अर्जुनको आशीर्वाद दिये । तत्पश्चात् उन्होंने कर्णके रथकी ओर प्रस्थान किया ॥ ९ ॥
तमायान्तं महेष्वासं दृष्ट्वा भूतानि भारत ।
निहतं मेनिरे कर्णं पाण्डवेन महात्मना ॥ १० ॥
भारत! महाधनुर्धर अर्जुनको आते देख समस्त प्राणियोंको यह विश्वास हो गया कि अब कर्ण महामनस्वी पाण्डुपुत्र अर्जुनके हाथसे अवश्य मारा जायगा ॥ १० ॥
बभूवुर्विमलाः सर्वा दिशो राजन् समन्ततः ।
चाषाश्च शतपत्राश्च क्रौञ्चाश्चैव जनेश्वर ॥ ११ ॥
प्रदक्षिणमकुर्वन्त तदा वै पाण्डुनन्दनम् । राजन्! सम्पूर्ण दिशाएँ सब ओरसे निर्मल हो गयी थीं । नरेश्वर! नीलकण्ठ, सारस और क्रौंच पक्षी पाण्डुनन्दन अर्जुनको दाहिने रखते हुए जाने लगे ॥ ११३ ॥
बहवः पक्षिणो राजन् पुन्नामानः शुभाः शिवाः ॥ १२ ॥
त्वरयन्तोऽर्जुनं युद्धे हृष्टरूपा ववाशिरे । राजन्! पुरुष जातिवाले बहुत - से शुभकारक मंगलदायक पक्षी अर्जुनको युद्धके लिये उतावले करते हुए बड़े हर्षमें भरकर चहचहा रहे थे ॥ १२३ ॥
कङ्का गृध्रा बकाः श्येना वायसाश्च विशाम्पते ॥ १३ ॥
अग्रतस्तस्य गच्छन्ति मांसहेतोर्भयानकाः । प्रजानाथ! कंक, गृध्र, बक, बाज और कौए आदि भयानक पक्षी मांसके लिये उनके आगे - आगे जा रहे थे ॥ निमित्तानि च धन्यानि पाण्डवस्य शशंसिरे ॥ १४ ॥
विनाशमरिसैन्यानां कर्णस्य च वधं प्रति । इस प्रकार बहुत -से शुभ शकुन पाण्डुपुत्र अर्जुनको उनके शत्रुओंके विनाश तथा कर्णके वधकी सूचना दे रहे थे ॥ १४ ॥
प्रयातस्याथ पार्थस्य महान् स्वेदो व्यजायत ॥ १५ ॥
चिन्ता च विपुला जज्ञे कथं चेदं भविष्यति ।
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युद्धके लिये प्रस्थान करनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनके शरीरमें बड़े जोरसे पसीना छूटने लगा तथा मन - ही - मन भारी चिन्ता होने लगी कि ' यह सब कैसे होगा? ' ॥ १५३ ॥
ततो गाण्डीवधन्वानमब्रवीन्मधुसूदनः ॥ १६ ॥
दृष्ट्वा पार्थं तथा यान्तं चिन्तापरिगतं तदा । रथमें बैठकर चलते समय गाण्डीवधारी अर्जुनको चिन्तामग्न देख भगवान् श्रीकृष्णने उनसे इस प्रकार कहा ॥ वासुदेव उवाच गाण्डीवधन्वन् संग्रामे ये त्वया धनुषा जिताः ॥ १७ ॥
तेषां मानुषो जेता त्वदन्य इह विद्यते । श्रीकृष्ण बोले- गाण्डीवधारी अर्जुन! तुमने अपने धनुषसे जिन -जिन वीरोंपर विजय पायी है, उन्हें जीतनेवाला इस संसारमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मनुष्य नहीं है ॥ १७३ ॥
दृष्ट्वा हि बहवः शूराः शक्रतुल्यपराक्रमाः ॥ १८ ॥
त्वां प्राप्य समरे शूरं ते गताः परमां गतिम् । मैंने देखा है इन्द्रके समान पराक्रमी बहुत- से शूरवीर समरांगणमें तुझ शौर्यसम्पन्न वीरके पास आकर परम गतिको प्राप्त हो गये ॥ १८६३ ॥
को हि द्रोणं च भीष्मं च भगदत्तं च मारिष ॥ १ ९ ॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजं च सुदक्षिणम् ।
श्रुतायुषं महावीर्यमच्युतायुषमेव च ।
प्रत्युद्गम्य भवेत् क्षेमी यो न स्यात् त्वमिव प्रभो ॥ २० ॥
प्रभो! आर्य! जो तुम्हारे- जैसा वीर न हो, ऐसा कौन पुरुष द्रोणाचार्य, भीष्म, भगदत्त, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण महापराक्रमी श्रुतायु तथा अच्युतायुका सामना करके सकुशल रह सकता था ॥
तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि लाघवं बलमेव च ।
असम्मोहश्च युद्धेषु विज्ञानस्य च संततिः ॥ २१ ॥
वेधः पातश्च लक्ष्येषु योगश्चैव तथार्जुन ।
भवान् देवान् सगन्धर्वान् हन्यात् सह चराचरान् ॥ २२ ॥
तुम्हारे पास दिव्य अस्त्र हैं, तुममें फुर्ती है, बल है, युद्धके समय तुम्हें घबराहट नहीं होती, तुम्हें अस्त्र- शस्त्रोंका विस्तृत ज्ञान है तथा लक्ष्यको वेधने तथा गिरानेकी कला ज्ञात है । अर्जुन! लक्ष्यको वेधते समय तुम्हारा चित्त एकाग्र रहता है । गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा चराचर प्राणियोंको तुम एक साथ मार सकते हो ॥ २१-२२ ॥
पृथिव्यां तु रणे पार्थ न योद्धा त्वत्समः पुमान् ।
धनुग्रहा हि ये केचित् क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥ २३ ॥
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आ देवात् त्वत्समं तेषां न पश्यामि शृणोमि च । कुन्तीकुमार! इस भूमण्डलपर दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान योद्धा नहीं है । यहाँसे देवलोकतक धनुष धारण करनेवाले जो कोई भी रणदुर्मद क्षत्रिय हैं, उनमेंसे किसीको भी मैं तुम्हारे समान न तो देखता हूँ और न सुनता ही हूँ ॥ ब्रह्मणा च प्रजाः सृष्ट्वा गाण्डीवं च महद् धनुः ॥ २४ ॥
येन त्वं युध्यसे पार्थ तस्मान्नास्ति त्वया समः । पार्थ! ब्रह्माजीने सम्पूर्ण प्रजाकी सृष्टि की है और उन्होंने ही उस विशाल धनुष गाण्डीवकी भी रचना की है, जिसके द्वारा तुम युद्ध करते हो; अतः तुम्हारी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ २४ ॥
अवश्यं तु मया वाच्यं यत् पथ्यं तव पाण्डव ॥ २५ ॥
मावमंस्था महाबाहो कर्णमाहवशोभिनम् । पाण्डुनन्दन! तो भी जो बात तुम्हारे लिये हितकर हो, उसे बता देना मैं आवश्यक समझता हूँ । महाबाहो! संग्राममें शोभा पानेवाले कर्णकी अवहेलना न करना ॥ कर्णो हि बलवान् दृप्तः कृतास्त्रश्च महारथः ॥ २६ ॥
कृती च चित्रयोधी च देशकालस्य कोविदः । क्योंकि कर्ण बलवान्, अभिमानी, अस्त्रविद्याका विद्वान्, महारथी, युद्धकुशल, विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाला तथा देशकालको समझनेवाला है ॥ २६३ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन संक्षेपाच्छृणु पाण्डव ॥ २७ ॥
त्वत्समं त्वद्विशिष्टं वा कर्णं मन्ये महारथम् ।
परमं यत्नमास्थाय त्वया वध्यो महाहवे ॥ २८ ॥
पाण्डुनन्दन! इस विषयमें अधिक कहने से क्या लाभ, संक्षेपसे ही सुन लो । मैं महारथी कर्णको तुम्हारे समान या तुमसे भी बढ़कर मानता हूँ। अतः महासमरमें महान् प्रयत्न करके तुम्हें उसका वध करना होगा ॥ २७-२८ ॥
तेजसा वह्निसदृशो वायुवेगसमो जवे ।
अन्तकप्रतिमः क्रोधे सिंहसंहननो बली ॥ २ ९ ॥
कर्ण तेजमें अग्निके सदृश, वेगमें वायुके समान, क्रोधमें यमराजके तुल्य, सुदृढ़ शरीरमें सिंहके सदृश तथा बलवान् है ॥ २ ९ ॥
अष्टरत्निर्महाबाहुर्व्यूढोरस्कः सुदुर्जयः ।
अभिमानी च शूरश्च प्रवीरः प्रियदर्शनः ॥ ३० ॥
उसके शरीरकी ऊँचाई आठ रत्नि* (एक सौ अड़सठ अंगुल) है । उसकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और छाती चौड़ी है । उसे जीतना अत्यन्त कठिन है। वह अभिमानी, शौर्यसम्पन्न, प्रमुख वीर और प्रियदर्शन ( सुन्दर) है ॥
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सर्वयोधगुणैर्युक्तो मित्राणामभयंकरः ।
सततं पाण्डवद्वेषी धार्तराष्ट्रहिते रतः ॥ ३१ ॥
उसमें योद्धाओंके सभी गुण हैं । वह अपने मित्रोंको अभय देनेवाला है तथा दुर्योधनके हितमें तत्पर रहकर पाण्डवोंसे सदा द्वेष रखता है ॥ ३१ ॥
सर्वैरवध्यो राधेयो देवैरपि सवासवैः ।
ऋते त्वामिति मे बुद्धिस्तदद्य जहि सूतजम् ॥ ३२ ॥
मेरा तो ऐसा विचार है कि राधापुत्र कर्ण तुम्हें छोड़कर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अवध्य है; अतः तुम आज सूतपुत्रका वध करो ॥ ३२ ॥
देवैरपि हि संयत्तैर्बिभ्रद्भिर्मांसशोणितम् ।
अशक्यः स रथो जेतुं सर्वैरपि युयुत्सभिः ॥ ३३ ॥
समस्त देवता भी यदि रक्त - मांसयुक्त शरीरको धारण करके युद्धकी अभिलाषा लेकर विजयके लिये प्रयत्नशील हो रणभूमिमें आ जायँ तो उनके लिये रथसहित कर्णको जीतना असम्भव है ॥ ३३ ॥
दुरात्मानं पापवृत्तं नृशंसं दुष्टप्रज्ञं पाण्डवेयेषु नित्यम् । हीनस्वार्थं पाण्डवेयैर्विरोधे हत्वा कर्णं निश्चितार्थो भवाद्य ॥ ३४ ॥
अतः आज तुम दुरात्मा, पापाचारी, क्रूर, पाण्डवोंके प्रति सदा दुर्भावना रखनेवाले और किसी स्वार्थके बिना ही पाण्डव- विरोधमें तत्पर हुए कर्णका वध करके सफलमनोरथ हो जाओ ॥ ३४ ॥
तं सूतपुत्रं रथिनां वरिष्ठं निष्कालिकं कालवशं नयाद्य । तं सूतपुत्रं रथिनां वरिष्ठं हत्वा प्रीतिं धर्मराजे कुरुष्व ॥ ३५ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र अपनेको कालके वशमें नहीं समझता है । तुम उसे आज ही कालके अधीन कर दो । रथियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णको मारकर धर्मराज युधिष्ठिरको प्रसन्न करो ॥ ३५ ॥
जानामि ते पार्थ वीर्यं यथावद्
दुर्वारणीयं च सुरासुरैश्च ।
सदावजानाति हि पाण्डुपुत्रा- नसौ दर्पात् सूतपुत्रो दुरात्मा ॥ ३६ ॥
पार्थ! मैं तुम्हारे उस बल- पराक्रमको अच्छी तरह जानता हूँ, जिसका निवारण करना देवताओं और असुरोंके लिये भी कठिन है । दुरात्मा सूतपुत्र कर्ण घमंडमें आकर सदा
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पाण्डवोंका अपमान करता है ॥ ३६ ॥
आत्मानं मन्यते वीरं येन पापः सुयोधनः ।
तमद्य मूलं पापानां जहि सौतिं धनंजय ॥ ३७ ॥
धनंजय! जिसके साथ होनेसे पापी दुर्योधन अपनेको वीर मानता है, वह सूतपुत्र कर्ण ही सारे पापोंकी जड़ है; अतः आज तुम उसे मार डालो ॥ ३७ ॥
खड्गजिह्वं धनुरास्यं शरदंष्ट्रं तरस्विनम् ।
दृप्तं पुरुषशार्दूलं जहि कर्णं धनंजय ॥ ३८ ॥
अर्जुन! कर्ण पुरुषोंमें सिंहके समान है, तलवार ही उसकी जिह्वा है, धनुष ही उसका फैला हुआ मुख है, बाण उसकी दाढ़ें हैं, वह अत्यन्त वेगशाली और अभिमानी है । तुम उसका वध करो ॥ ३८ ॥
अहं त्वामनुजानामि वीर्येण च बलेन च ।
हि कर्णं रणे शूर मातङ्गमिव केसरी ॥ ३ ९ ॥
जैसे सिंह मतवाले हाथीको मार डालता है, उसी प्रकार तुम भी अपने बल और पराक्रमसे रणभूमिमें शूरवीर कर्णको मार डालो । इसके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता ॥ ३ ९ ॥
यस्य वीर्येण वीर्यं ते धार्तराष्ट्रोऽवमन्यते ।
तमद्य पार्थ संग्रामे कर्णं वैकर्तनं जहि ॥ ४० ॥
पार्थ! जिसके बलसे दुर्योधन तुम्हारे बल- पराक्रमकी अवहेलना करता है, उस वैकर्तन कर्णको आज तुम युद्धमें मार डालो ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कृष्णार्जुनसंवादे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवादविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥
* मुट्ठी बँधे हुए हाथके मापको रत्नि कहते हैं ।
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त्रिसप्ततितमोऽध्यायः भीष्म और द्रोणके पराक्रमका वर्णन करते हुए अर्जुनके बलकी प्रशंसा करके श्रीकृष्णका कर्ण और दुर्योधनके अन्यायकी याद दिलाकर अर्जुनको कर्णवधके लिये उत्तेजित करना संजय उवाच
ततः पुनरमेयात्मा केशवोऽर्जुनमब्रवीत् ।
कृतसंकल्पमायान्तं वधे कर्णस्य भारत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — भरतनन्दन! तदनन्तर कर्णका वध करनेके लिये कृतसंकल्प होकर जाते हुए अर्जुनसे अप्रमेयस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने पुनः इस प्रकार कहा ॥
अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत ।
विनाशस्यातिघोरस्य नरवारणवाजिनाम् ॥ २ ॥
' भारत! मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंका जो यह अत्यन्त भयंकर विनाश चल रहा है, इसे आज सत्रह दिन हो गये ॥ २ ॥
भूत्वा हि विपुला सेना तावकानां परैः सह ।
अन्योन्यं समरं प्राप्य किंचिच्छेषा विशाम्पते ॥ ३ ॥
‘ प्रजानाथ! शत्रुओंके साथ- साथ तुमलोगोंके पास भी विशाल सेना जुट गयी थी; परंतु परस्पर युद्ध करके प्रायः नष्ट हो गयी, अब थोड़ी - सी ही शेष रह गयी है ॥
भूत्वा वै कौरवाः पार्थ प्रभूतगजवाजिनः ।
त्वां वै शत्रुं समासाद्य विनष्टा रणमूर्धनि ॥ ४ ॥
‘ पार्थ! कौरवपक्षके योद्धा बहुसंख्यक हाथी -घोड़ोंसे सम्पन्न थे, परंतु तुम- जैसे वीर शत्रुको पाकर युद्धके मुहानेपर नष्ट हो गये ॥ ४ ॥
एते ते पृथिवीपालाः सृञ्जयाश्च समागताः ।
त्वां समासाद्य दुर्धर्षं पाण्डवाश्च व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥
' तुम शत्रुओंके लिये दुर्जय हो, तुम्हारे ही आश्रयमें रहकर ये तुम्हारे पक्षके भूमिपाल सृजय और पाण्डव- योद्धा युद्धस्थलमें डटे हुए हैं ॥ ५ ॥
पाञ्चालैः पाण्डवैर्मत्स्यैः कारूषैश्चेदिभिः सह ।
त्वया गुप्तैरमित्रघ्नैः कृतः शत्रुगणक्षयः ॥ ६ ॥
' तुमसे सुरक्षित हुए इन पाण्डव, पांचाल, मत्स्य, करूष तथा चेदिदेशीय शत्रुनाशक वीरोंने शत्रुसमूहोंका संहार कर डाला है ॥ ६ ॥