04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2171–2180
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2171–2180
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को हि शक्तो रणे जेतुं कौरवांस्तात संयुगे ।
अन्यत्र पाण्डवान् युद्धे त्वया गुप्तान् महारथान् ॥ ७ ॥
' तात! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित पाण्डव महारथियोंको छोड़कर दूसरा कौन नरेश युद्धमें कौरवोंको परास्त कर सकता है ॥ ७ ॥
शक्तस्त्वं हि रणे जेतुं ससुरासुरमानुषान् ।
त्रील्लोँकान् समरे युक्तान् किं पुनः कौरवं बलम् ॥ ८ ॥
'तुम तो युद्धके लिये तैयार होकर आये हुए देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोकोंको समरभूमिमें जीत सकते हो, फिर कौरव -सेनाकी तो बात ही क्या है? ॥ ८ ॥
भगदत्तं च राजानं कोऽन्यः शक्तस्त्वया विना ।
जेतुं पुरुषशार्दूल योऽपि स्याद् वासवोपमः ॥ ९ ॥
‘ पुरुषसिंह! कोई इन्द्रके समान भी पराक्रमी क्यों न हो, तुम्हारे सिवा दूसरा कौन वीर राजा भगदत्तको जीत सकता था? ॥ ९ ॥
तथेमां विपुलां सेनां गुप्तां पार्थ त्वयानघ ।
न शेकुः पार्थिवाः सर्वे चक्षर्भिरपि वीक्षितुम् ॥ १० ॥
'निष्पाप कुन्तीकुमार! तुम जिसकी रक्षा करते हो, उस विशाल सेनाकी ओर सारे राजा आँख उठाकर देख भी नहीं सके हैं ॥ १० ॥
तथैव सततं पार्थ रक्षिताभ्यां त्वया रणे ।
धृष्टद्युम्नशिखण्डिभ्यां भीष्मद्रोणौ निपातितौ ॥ ११ ॥
‘ पार्थ! इसी प्रकार रणक्षेत्रमें सदा तुमसे सुरक्षित रहकर ही धृष्टद्युम्न और शिखण्डीने द्रोणाचार्य और भीष्मको मार गिराया है ॥ ११ ॥
को हि शक्तो रणे पार्थ भारतानां महारथौ ।
भीष्मद्रोणौ युधा जेतुं शक्रतुल्यपराक्रमौ ॥ १२ ॥
‘ कुन्तीनन्दन! भरतवंशियोंकी सेनाके दो महारथी इन्द्रतुल्य पराक्रमी भीष्म और द्रोणको रणभूमिमें युद्ध करते समय कौन जीत सकता था? ॥ १२ ॥
को हि शान्तनवं भीष्मं द्रोणं वैकर्तनं कृपम् ।
द्रौणिं च सौमदत्तिं च कृतवर्माणमेव च ॥ १३ ॥
सैन्धवं मद्रराजानं राजानं च सुयोधनम् ।
वीरान् कृतास्त्रान् समरे सर्वानेवानिवर्तिनः ॥ १४ ॥
अक्षौहिणीपतीनुग्रान् संहतान् युद्धदुर्मदान् ।
त्वामृते पुरुषव्याघ्र जेतुं शक्तः पुमानिह ॥ १५ ॥
‘ नरव्याघ्र! अक्षौहिणी सेनाके अधिपति, वीर, अस्त्रवेत्ता, भयंकर पराक्रमी, संगठित, रणोन्मत्त, तथा कभी पीछे न हटनेवाले भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, वैकर्तन कर्ण, अश्वत्थामा,
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भूरिश्रवा, कृतवर्मा, जयद्रथ, शल्य तथा राजा दुर्योधन-जैसे समस्त महारथियोंपर इस जगत्में तुम्हारे सिवा, दूसरा कौन पुरुष विजय पा सकता है? ॥ १३ – १५ ॥
श्रेण्यश्च बहुलाः क्षीणाः प्रदीर्णाश्वरथद्विपाः ।
नानाजनपदाश्चोग्राः क्षत्रियाणाममर्षिणाम् ॥ १६ ॥
‘ अमर्षशील क्षत्रियोंके बहुत - से दल थे, जो बड़े भयंकर और अनेक जनपदोंके निवासी थे, वे सब - के - सब नष्ट हो गये, उनके घोड़े, रथ और हाथी भी धूलमें मिल गये ॥ १६ ॥
गोवासदासमीयानां वसातीनां च भारत ।
प्राच्यानां वाटधानानां भोजानां चाभिमानिनाम् ॥ १७ ॥
उदीर्णाश्वगजा सेना सर्वक्षत्रस्य भारत ।
त्वां समासाद्य निधनं गता भीमं च भारत ॥ १८ ॥
‘ भारत! गोवास, दासमीय, वसाति, प्राच्य, वाटधान और भोजदेशनिवासी अभिमानी वीरोंकी तथा सम्पूर्ण क्षत्रियोंकी सेना, जिसमें उद्दण्ड घोड़ों और उन्मत्त हाथियोंकी संख्या अधिक थी, तुम्हारे और भीमसेनके पास पहुँचकर नष्ट हो गयी ॥ १७-१८ ॥
उग्राश्च भीमकर्माणस्तुषारा यवनाः खशाः ।
दार्वाभिसारा दरदाः शका माठरतङ्गणाः ॥ १ ९ ॥
आन्ध्रकाश्च पुलिन्दाश्च किराताश्चोग्रविक्रमाः ।
म्लेच्छाश्च पर्वतीयाश्च सागरानूपवासिनः ॥ २० ॥
संरम्भिणो युद्धशौण्डा बलिनो दण्डपाणयः ।
एते सुयोधनस्यार्थे संरब्धाः कुरुभिः सह ॥ २१ ॥
न शक्या युधि निर्जेतुं त्वदन्येन परंतप । ‘ उग्रस्वभाव, भीषण पराक्रमी एवं भयंकर कर्म करनेवाले तुषार, यवन, खश, दार्वाभिसार, दरद, शक, माठर, तंगण, आन्ध्र, पुलिन्द, किरात, म्लेच्छ, पर्वतीय तथा समुद्रतटवर्ती योद्धा, जो युद्धकुशल, रोषावेशसे युक्त, बलवान् एवं हाथोंमें डंडे लिये हुए हैं, क्रोधमें भरकर कौरव - सैनिकोंके साथ दुर्योधनकी सहायताके लिये आये हैं; शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई इन्हें नहीं जीत सकता ॥ १ ९ –२१३ ॥ धार्तराष्ट्रमुदग्रं हि व्यूढं दृष्ट्वा महद् बलम् ॥ २२ ॥
यदि त्वं न भवेस्त्राता प्रतीयात् को नु मानवः । ‘ यदि तुम रक्षक न होते तो व्यूहाकारमें खड़ी हुई धृतराष्ट्रपुत्रोंकी प्रचण्ड एवं विशाल सेनाको सामने देखकर कौन मनुष्य उसपर चढ़ाई कर सकता था? ॥ २२ ॥
तत् सागरमिवोद्भूतं रजसा संवृतं बलम् ॥ २३ ॥
विदार्य पाण्डवैः क्रुद्धैस्त्वया गुप्तैर्हतं विभो । ‘ प्रभो! तुमसे सुरक्षित रहकर ही क्रोधभरे पाण्डव योद्धाओंने धूलसे आच्छादित और समुद्रके समान उमड़ी हुई कौरव सेनाको छिन्न- भिन्न करके मार डाला है ॥ २३३ ॥
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मगधानामधिपतिर्जयत्सेनो महाबलः ॥ २४ ॥
अद्य सप्तैव चाहानि हतः संख्येऽभिमन्युना । ' अभी सात दिन ही हुए हैं, अभिमन्युने मगधदेशके राजा महाबली जयत्सेनको युद्धमें मार डाला था ॥ २४ ॥
ततो दशसहस्राणि गजानां भीमकर्मणाम् ॥ २५ ॥
जघान गदया भीमस्तस्य राज्ञः परिच्छदम् ।
ततोऽन्येऽभिहता नागा रथाश्च शतशो बलात् ॥ २६ ॥
‘ तत्पश्चात् भीमसेनने राजा जयत्सेनके भयानक कर्म करनेवाले दस हजार हाथियोंको, जो उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़े थे, गदाके आघातसे नष्ट कर दिया । तदनन्तर और भी बहुत - से हाथी तथा सैकड़ों रथ उनके द्वारा बलपूर्वक नष्ट किये गये ॥ २५-२६ ॥
तदेवं समरे पार्थ वर्तमाने महाभये ।
भीमसेनं समासाद्य त्वां च पाण्डव कौरवाः ॥ २७ ॥
सवाजिरथमातङ्गा मृत्युलोकमितो गताः । ‘ पाण्डुनन्दन! पार्थ! इस प्रकार महाभयंकर युद्ध आरम्भ होनेपर तुम्हारे और भीमसेनके सामने आकर बहुत- से कौरव-सैनिक घोड़े, रथ और हाथियोंसहित यहाँसे यमलोक पधार गये ॥ २७३ ॥
तथा सेनामुखे तत्र निहते पार्थ पाण्डवैः ॥ २८ ॥
भीष्मः प्रासृजदुग्राणि शरजालानि मारिष । ‘ माननीय कुन्तीनन्दन! पाण्डववीरोंने जब वहाँ सेनाके प्रमुख भागका विनाश कर डाला, तब भीष्मजी भयंकर बाणसमूहोंकी वृष्टि करने लगे ॥ २८३ ॥
स चेदिकाशिपाञ्चालान् करूषान् मत्स्यकेकयान् ॥ २ ९ ॥ शरैः प्रच्छाद्य निधनमनयत् परमास्त्रवित् । ‘ वे उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता तो थे ही, उन्होंने पाण्डवपक्षके चेदि, काशी, पांचाल, करूष, मत्स्य और केकयदेशीय योद्धाओंको अपने बाणोंसे आच्छादित करके मौतके मुखमें डाल दिया ॥ २ ९ ॥ तस्य चापच्युतैर्बाणैः परदेहविदारणैः ॥ ३० ॥
पूर्णमाकाशमभवद् रुक्मपुङ्खैरजिह्मगैः । ' उनके धनुषसे छूटे हुए बाण शत्रुओंकी कायाको विदीर्ण कर देनेवाले थे, उनमें सोनेके पंख लगे थे और वे लक्ष्यकी ओर सीधे पहुँचते थे । उन बाणोंसे सम्पूर्ण आकाश भर गया ॥ ३०३ ॥
हन्याद् रथसहस्राणि एकैकेनैव मुष्टिना ॥ ३१ ॥
लक्षं नरद्विपान् हत्वा समेतान् समहाबलान् ।
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' वे एक- एक मुट्ठी बाणसे ही युद्धस्थलमें एकत्र हुए लाखों महाबली पैदल मनुष्यों और हाथियोंका संहार करके सहस्रों रथियोंको मार सकते थे ॥ ३१ ॥
गत्या दशम्या ते गत्वा जघ्नुर्वाजिरथद्विपान् ॥ ३२ ॥
हित्वा नवगतीर्दुष्टाः स बाणानाहवेऽत्यजत् । ' भीष्मजी युद्धस्थलमें दोषयुक्त आविद्ध आदि नौ गतियोंको छोड़कर केवल दसवीं गतिसे बाण छोड़ते थे । वे बाण पाण्डवपक्षके घोड़ों, रथों और हाथियोंका संहार करने लगे ॥ ३२ ॥
दिनानि दश भीष्मेण निघ्नता तावकं बलम् ॥ ३३ ॥
शून्याः कृता रथोपस्था हताश्च गजवाजिनः । ‘लगातार दस दिनोंतक तुम्हारी सेनाका विनाश करते हुए भीष्मजीने असंख्य रथोंकी बैठकें सूनी कर दीं, बहुत - से हाथी और घोड़े मार डाले ॥ ३३ ॥
दर्शयित्वाऽऽत्मनो रूपं रुद्रोपेन्द्रसमं युधि ॥ ३४ ॥
पाण्डवानामनीकानि प्रगृह्यासौ व्यशातयत् । ‘ उन्होंने रणभूमिमें भगवान् रुद्र और विष्णुके समान अपना भयंकर रूप दिखाकर पाण्डव- सेनाओंका बलपूर्वक विनाश कर डाला ॥ ३४३ ॥
विनिघ्नन् पृथिवीपालांश्चेदिपाञ्चालकेकयान् ॥ ३५ ॥
अदहत् पाण्डवीं सेनां रथाश्वगजसंकुलाम् ।
मज्जन्तमप्लवे मन्दमुज्जिहीर्षुः सुयोधनम् ॥ ३६ ॥
' मूर्ख दुर्योधन नौकारहित विपत्तिके सागरमें डूब रहा था; अतः भीष्मजी उसका उद्धार करना चाहते थे, उन्होंने चेदि, पांचाल तथा केकयनरेशोंका वध करते हुए, रथ, घोड़ों और रथियोंसे भरी हुई पाण्डवसेनाको भस्म कर डाला ॥ ३५-३६ ॥
तथा चरन्तं समरे तपन्तमिव भास्करम् ।
पदातिकोटिसाहस्राः प्रवरायुधपाणयः ॥ ३७ ॥
न शेकुः सृञ्जया द्रष्टुं तथैवान्ये महीक्षितः ।
विचरन्तं तथा तं तु संग्रामे जितकाशिनम् ॥ ३८ ॥
सर्वोद्यमेन महता पाण्डवाः समभिद्रवन् । ' कोटि सहस्र पैदल तथा हाथोंमें उत्तम आयुध धारण किये हुए संजय - सैनिक और दूसरे नरेश सूर्यदेवके समान ताप देते और समरांगणमें विचरते हुए भीष्मकी ओर आँख उठाकर देखनेमें भी समर्थ न हो सके । उस समय संग्रामभूमिमें विचरते तथा विजयसे उल्लसित होते हुए भीष्मजीपर पाण्डवयोद्धा अपनी सारी शक्ति लगाकर बड़े वेगसे टूट पड़े ॥ ३७-३८ ॥ स तु विद्राव्य समरे पाण्डवान् सृञ्जयानपि ॥ ३ ९ ॥
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एक एव रणे भीष्म एकवीरत्वमागतः । ‘किंतु समरांगणमें भीष्मजी अकेले ही पाण्डवों और सृजयोंको खदेड़कर युद्धमें अद्वितीय वीरके रूपमें विख्यात हुए ॥ ३ ९ ३ ॥ तं शिखण्डी समासाद्य त्वया गुप्तो महाव्रतम् ॥ ४० ॥
जघान पुरुषव्याघ्रं शरैः संनतपर्वभिः ।
स एष पतितः शेते शरतल्पे पितामहः ॥ ४१ ॥
त्वां प्राप्य पुरुषव्याघ्रं वृत्रः प्राप्येव वासवम् । ‘ अर्जुन! तुमसे सुरक्षित हुए शिखण्डीने महान् व्रतधारी पुरुषसिंह भीष्मजीपर चढ़ाई करके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उन्हें मार गिराया, वे ही ये पितामह भीष्म तुम - जैसे पुरुषसिंहको विपक्षमें पाकर धराशायी हो शरशय्यापर सो रहे हैं । ठीक उसी तरह, जैसे वृत्रासुर इन्द्रसे टक्कर लेकर रणशय्यापर सो गया था ॥ ४०-४१३ ॥ द्रोणः पञ्चदिनान्युग्रो विधम्य रिपुवाहिनीम् ॥ ४२ ॥
कृत्वा व्यूहमभेद्यं च पातयित्वा महारथान् ।
जयद्रथस्य समरे कृत्वा रक्षां महारथः ॥ ४३ ॥
अन्तकप्रतिमश्चोग्रो रात्रियुद्धेऽदहत् प्रजाः । ‘तत्पश्चात् उग्रमूर्ति महारथी द्रोणाचार्य पाँच दिनोंतक अभेद्यव्यूहका निर्माण, शत्रुसेनाका विध्वंस, महारथियोंका विनाश तथा समरांगणमें जयद्रथकी रक्षा करनेके अनन्तर रात्रियुद्धमें यमराजके समान प्रजाको दग्ध करने लगे ॥ दग्ध्वा योधान् शरैर्वीरो भारद्वाजः प्रतापवान् ॥ ४४ ॥
धृष्टद्युम्नं समासाद्य स गतः परमां गतिम् । ' प्रतापी भरद्वाजनन्दन वीर द्रोणाचार्य अपने बाणोंद्वारा शत्रुयोद्धाओंको दग्ध करके धृष्टद्युम्नसे भिड़कर परमगतिको प्राप्त हो गये ॥ ४४ ॥
यदि वाद्य भवान् युद्धे सूतपुत्रमुखान् रथान् ॥ ४५ ॥
नावारयिष्यः संग्रामे न स्म द्रोणो व्यनङ्क्ष्यत । ‘ उस समय यदि तुम युद्धस्थलमें सूतपुत्र आदि रथियोंको न रोकते तो रणभूमिमें द्रोणाचार्यका नाश नहीं होता ॥ भवता तु बलं सर्वं धार्तराष्ट्रस्य वारितम् ॥ ४६ ॥
ततो द्रोणो हतो युद्धे पार्षतेन धनंजय । ‘ धनंजय! तुमने दुर्योधनकी सारी सेनाको रोक रखा था, इसीलिये धृष्टद्युम्न संग्राममें द्रोणाचार्यका वध कर सके ॥ एवं वाको रणे कुर्यात् त्वदन्यः क्षत्रियो युधि ॥ ४७ ॥
यादृशं ते कृतं पार्थ जयद्रथवधं प्रति ।
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‘ पार्थ! जयद्रथका वध करते समय युद्धमें तुमने जैसा पराक्रम किया था, वैसा तुम्हारे सिवा दूसरा कौन क्षत्रिय कर सकता है? ॥ ४७ ॥
निवार्य सेनां महतीं हत्वा शूरांश्च पार्थिवान् ॥ ४८ ॥
निहतः सैन्धवो राजा त्वयास्त्रबलतेजसा । ' तुमने अपने अस्त्रोंके बल और तेजसे शूरवीर राजाओंका वध करके दुर्योधनकी विशाल सेनाको रोककर सिन्धुराज जयद्रथको मार गिराया ॥ ४८३ ॥
आश्चर्यं सिन्धुराजस्य वधं जानन्ति पार्थिवाः ॥ ४ ९ ॥ अनाश्चर्यं हि तत् त्वत्तस्त्वं हि पार्थ महारथः । ‘ पार्थ! सब राजा जानते हैं कि सिंधुराज जयद्रथका वध एक आश्चर्यभरी घटना है, किंतु तुमसे ऐसा होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि तुम असाधारण महारथी हो ॥ ४ ९ ॥ त्वां हि प्राप्य रणे क्षत्रमेकाहादिति भारत ॥ ५० ॥
नश्यमानमहं युक्तं मन्येयमिति मे मतिः । ' रणभूमिमें तुम्हें पाकर सारा क्षत्रियसमाज एक दिनमें नष्ट हो सकता है, ऐसा कहना मैं
युक्तिसंगत मानता हूँ । मेरी तो ऐसी ही धारणा है ॥ ५० ॥
सेयं पार्थ चमूर्घोरा धार्तराष्ट्रस्य संयुगे ॥ ५१ ॥
हतसर्वस्ववीरा हि भीष्मद्रोणौ यदा हतौ । ‘ कुन्तीनन्दन! जब भीष्म और द्रोणाचार्य युद्धमें मार डाले गये, तभीसे मानो दुर्योधनकी इस भयंकर सेनाके सारे वीर मारे गये – इसका सर्वस्व नष्ट हो गया ॥ ५१३ ॥
शीर्णप्रवरयोधाद्य हतवाजिरथद्विपा ॥ ५२ ॥
हीना सूर्येन्दुनक्षत्रैद्यरिवाभाति भारती । ‘ इसके प्रधान- प्रधान योद्धा नष्ट हो गये । घोड़े, रथ और हाथी भी मार डाले गये । अब यह कौरवसेना सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्रोंसे रहित आकाशके समान श्रीहीन जान पड़ती है ॥ ५२ ॥
विध्वस्ता हि रणे पार्थ सेनेयं भीमविक्रम ॥ ५३ ॥
आसुरीव पुरा सेना शक्रस्येव पराक्रमैः । ‘ भयंकर पराक्रमी पार्थ! रणभूमिमें विध्वंसको प्राप्त हुई यह कौरव सेना पूर्वकालमें इन्द्रके पराक्रमसे नष्ट हुई असुरोंकी सेनाके समान प्रतीत होती है ॥ ५३ ॥
तेषां हतावशिष्टास्तु सन्ति पञ्च महारथाः ॥ ५४ ॥
अश्वत्थामा कृतवर्मा कर्णो मद्राधिपः कृपः । ‘ इन कौरव - सैनिकोंमेंसे अश्वत्थामा, कृतवर्मा, कर्ण, शल्य और कृपाचार्य — ये पाँच प्रमुख महारथी मरनेसे बच गये हैं ॥ ५४३ ॥
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तांस्त्वमद्य नरव्याघ्र हत्वा पञ्च महारथान् ॥ ५५ ॥
हतामित्रः प्रयच्छोर्वी राज्ञे सद्वीपपत्तनाम् । ‘नरव्याघ्र! आज इन पाँचों महारथियोंको मारकर तुम शत्रुहीन हो द्वीपों और नगरोंसहित यह सारी पृथ्वी राजा युधिष्ठिरको दे दो ॥ ५५३ ॥
साकाशजलपातालां सपर्वतमहावनाम् ॥ ५६ ॥
प्राप्नोत्वमितवीर्यश्रीरद्य पार्थो वसुन्धराम् । ‘ अमित पराक्रम और कान्तिसे सम्पन्न कुन्तीकुमार युधिष्ठिर आज आकाश, जल, पाताल, पर्वत और बड़े - बड़े वनोंसहित इस वसुधाको प्राप्त कर लें ॥ ५६३ ॥
एतां पुरा विष्णुरिव हत्वा दैतेयदानवान् ॥ ५७ ॥
प्रयच्छ मेदिनीं राज्ञे शक्रायैव हरिर्यथा । ‘ जैसे पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने दैत्यों और दानवोंको मारकर यह त्रिलोकी इन्द्रको दे दी थी, उसी प्रकार तुम यह पृथ्वी राजा युधिष्ठिरको सौंप दो ॥ ५७३ ॥
अद्य मोदन्तु पञ्चाला निहतेष्वरिषु त्वया ।
विष्णुना निहतेष्वेव दानवेयेषु देवताः ॥ ५८ ॥
‘ जैसे भगवान् विष्णुके द्वारा दानवोंके मारे जानेपर देवता प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार आज तुम्हारे द्वारा शत्रुओंका संहार हो जानेपर समस्त पांचाल आनन्दित हो उठें ॥ ५८ ॥
यदि वा द्विपदां श्रेष्ठं द्रोणं मानयतो गुरुम् ।
अश्वत्थाम्नि कृपा तेऽस्ति कृपे वाचार्य गौरवात् ॥ ५ ९ ॥
अत्यन्तापचितान् बन्धून् मानयन् मातृबान्धवान् ।
कृतवर्माणमासाद्य न नेष्यसि यमक्षयम् ॥ ६० ॥
भ्रातरं मातुरासाद्य शल्यं मद्रजनाधिपम् ।
यदि त्वमरविन्दाक्ष दयावान् न जिघांससि ॥ ६१ ॥
इमं पापमतिं क्षुद्रमत्यन्तं पाण्डवान् प्रति ।
कर्णमद्य नरश्रेष्ठ जह्याः सुनिशितैः शरैः ॥ ६२ ॥
‘ कमलनयन नरश्रेष्ठ अर्जुन! मनुष्योंमें श्रेष्ठ गुरु द्रोणाचार्यका सम्मान करते हुए तुम्हारे हृदयमें यदि अश्वत्थामाके प्रति दया है अथवा आचार्योचित गौरवके कारण कृपाचार्यके प्रति कृपाभाव है, यदि माता कुन्तीके अत्यन्त पूजनीय बन्धु- बान्धवोंके प्रति आदरका भाव रखते हुए तुम कृतवर्मापर आक्रमण करके उसे यमलोक भेजना नहीं चाहते तथा माता माद्रीके भाई, मद्रदेशीय जनताके अधिपति, राजा शल्यको भी तुम दयावश मारनेकी इच्छा नहीं रखते तो न सही, किंतु पाण्डवोंके प्रति सदा पापबुद्धि रखनेवाले इस अत्यन्त नीच कर्णको तो आज अपने पैने बाणोंसे मार ही डालो ॥ ५ ९ -६२ ॥
एतत् ते सुकृतं कर्म नात्र किंचन युज्यते ।
वयमप्यनुजानीमो नात्र दोषोऽस्ति कश्चन ॥ ६३ ॥
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‘ यह तुम्हारे लिये पुण्य कर्म होगा । इस विषयमें कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है । मैं भी तुम्हें इसके लिये आज्ञा देता हूँ, अतः इसमें कोई दोष नहीं है ॥ ६३ ॥
दहने यत् सपुत्राया निशि मातुस्तवानघ ।
द्यूतार्थे यच्च युष्मासु प्रावर्तत सुयोधनः ॥ ६४ ॥
तस्य सर्वस्य दुष्टात्मा कर्णो वै मूलमित्युत । ‘ निष्पाप अर्जुन! रात्रिके समय पुत्रसहित तुम्हारी माता कुन्तीको जला देने और तुम सब लोगोंके साथ जूआ खेलनेके कार्यमें जो दुर्योधनकी प्रवृत्ति हुई थी, उन सब षड्यन्त्रोंका मूल कारण यह दुष्टात्मा कर्ण ही था ॥ ६४ ॥
कर्णाद्धि मन्यते त्राणं नित्यमेव सुयोधनः ॥ ६५ ॥
ततो मामपि संरब्धो निग्रहीतुं प्रचक्रमे । ‘ दुर्योधनको सदासे ही यह विश्वास बना हुआ है कि कर्ण मेरी रक्षा कर लेगा; इसीलिये वह आवेशमें आकर मुझे भी कैद करनेकी तैयारी करने लगा था ॥ ६५३ ॥
स्थिरा बुद्धिर्नरेन्द्रस्य धार्तराष्ट्रस्य मानद ॥ ६६ ॥
कर्णः पार्थात् रणे सर्वान् विजेष्यति न संशयः । ‘ मानद! धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनका यह दृढ़ विचार है कि कर्ण रणभूमिमें कुन्तीके सभी पुत्रोंको निःसंदेह जीत लेगा ॥ ६६३ ॥
कर्णमाश्रित्य कौन्तेय धार्तराष्ट्रेण विग्रहः ॥ ६७ ॥
रोचितो भवता सार्धं जानतापि बल तव । ' कुन्तीनन्दन! तुम्हारे बलको जानते हुए भी दुर्योधनने कर्णका भरोसा करके ही तुम्हारे साथ युद्ध छेड़ना पसंद किया है ॥ ६७३ ॥
कर्णो हि भाषते नित्यमहं पार्थान् समागतान् ॥ ६८ ॥
वासुदेवं च दाशार्हं विजेष्यामि महारथम् । ‘ कर्ण सदा ही यह कहता रहता है कि ' मैं युद्धमें एक साथ आये हुए समस्त कुन्तीपुत्रों तथा वसुदेवनन्दन महारथी श्रीकृष्णको भी जीत लूँगा ' ॥ ६८३ ॥
प्रोत्साहयन् दुरात्मानं धार्तराष्ट्रं सुदुर्मतिम् ॥ ६ ९ ॥ समितौ गर्जते कर्णस्तमद्य जहि भारत । ‘ भारत! अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले दुरात्मा दुर्योधनका उत्साह बढ़ाता हुआ कर्ण राजसभामें उपर्युक्त बातें कहकर गर्जता रहता है; इसलिये आज तुम उसे मार डालो ॥ ६ ९ ३ ॥ यच्च युष्मासु पापं वै धार्तराष्ट्रः प्रयुक्तवान् ॥ ७० ॥
तत्र सर्वत्र दुष्टात्मा कर्णः पापमतिर्मुखम् ।
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' दुर्योधनने तुमलोगोंके साथ जो- जो पापपूर्ण बर्ताव किया है, उन सबमें पापबुद्धि दुष्टात्मा कर्ण ही प्रधान कारण है ॥ यच्च तद् धार्तराष्ट्रस्य क्रूरैः षड्भिर्महारथैः ॥ ७१ ॥
अपश्यं निहतं वीरं सौभद्रमृषभेक्षणम् ।
द्रोणद्रौणिकृपान् वीरान् कर्षयन्तं नरर्षभान् ॥ ७२ ॥
निर्मनुष्यांश्च मातङ्गान् विरथांश्च महारथान् ।
व्यश्वारोहांश्च तुरगान् पत्तीन् व्यायुधजीविनः ॥ ७३ ॥
कुर्वन्तमृषभस्कन्धं कुरुवृष्णियशस्करम् ।
विधमन्तमनीकानि व्यथयन्तं महारथान् ॥ ७४ ॥
मनुष्यवाजिमातङ्गान् प्रहिण्वन्तं यमक्षयम् ।
शरैः सौभद्रमायान्तं दहन्तमिव वाहिनीम् ॥ ७५ ॥
तन्मे दहति गात्राणि सखे सत्येन ते शपे ।
यत् तत्रापि च दुष्टात्मा कर्णोऽभ्यद्रुह्यत प्रभो ॥ ७६ ॥
' सखे! सुभद्राका वीरपुत्र अभिमन्यु साँड़के समान बड़े -बड़े नेत्रोंसे सुशोभित तथा कुरुकुल एवं वृष्णिवंशके यशको बढ़ानेवाला था । उसके कंधे साँड़के कंधोंके समान मांसल थे । वह द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कृपाचार्य आदि नरश्रेष्ठ वीरोंको पीड़ा दे रहा था । हाथियोंको महावतों और सवारोंसे, महारथियोंको रथोंसे, घोड़ोंको सवारोंसे तथा पैदल सैनिकोंको अस्त्र- शस्त्र एवं जीवनसे वंचित कर रहा था । सेनाओंका विध्वंस और महारथियोंको व्यथित करके वह मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको यमलोक भेज रहा था । बाणोंद्वारा शत्रुसेनाको दग्ध- सी करके आते हुए सुभद्राकुमारको जो दुर्योधनके छः क्रूर महारथियोंने मार डाला और उस अवस्थामें मारे गये अभिमन्युको जो मैंने अपनी आँखोंसे देखा, वह सब मेरे अंगोंको दग्ध किये देता है । प्रभो! मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि उसमें भी दुष्टात्मा कर्णका ही द्रोह काम कर रहा था ॥ ७१–७६ ॥
अशक्नुवंश्चाभिमन्योः कर्णः स्थातुं रणेऽग्रतः ।
सौभद्रशरनिर्भिन्नो विसंज्ञः शोणितोक्षितः ॥ ७७ ॥
'रणभूमिमें अभिमन्युके सामने खड़े होनेकी शक्ति कर्णमें नहीं रह गयी थी । वह सुभद्राकुमारके बाणोंसे छिन्न - भिन्न हो खूनसे लथपथ एवं अचेत हो गया था ॥
निःश्वसन् क्रोधसंदीप्तो विमुखः सायकार्दितः ।
अपयानकृतोत्साहो निराशश्चापि जीविते ॥ ७८ ॥
‘वह क्रोधसे चलकर लंबी साँस खींचता हुआ अभिमन्युके बाणोंसे पीड़ित हो युद्धसे मुँह मोड़ चुका था । अब उसके मनमें भाग जानेका ही उत्साह था । वह जीवनसे निराश हो चुका था ॥ ७८ ॥
तस्थौ सुविह्वलः संख्ये प्रहारजनितश्रमः ।
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अथ द्रोणस्य समरे तत्कालसदृशं तदा ॥ ७९ ॥
श्रुत्वा कर्णो वचः क्रूरं ततश्चिच्छेद कार्मुकम् । ‘ युद्धस्थलमें प्रहारोंके कारण अधिक क्लान्त हो जानेसे वह व्याकुल होकर खड़ा रहा । तदनन्तर समरांगणमें द्रोणाचार्यका समयोचित क्रूर वचन सुनकर कर्णने अभिमन्युके धनुषको काट डाला ॥ ७९ ॥
ततश्छिन्नायुधं तेन रणे पञ्च महारथाः ॥ ८० ॥
तं चैव निकृतिप्रज्ञाः प्राहरञ्छरवृष्टिभिः । ‘ उसके द्वारा धनुष कट जानेपर रणभूमिमें शेष पाँच महारथी, जो शठतापूर्ण बर्ताव करनेमें प्रवीण थे, बाणोंकी वर्षाद्वारा अभिमन्युको घायल करने लगे ॥ ८०३३ ॥
तस्मिन् विनिहते वीरे सर्वेषां दुःखमाविशत् ॥ ८१ ॥
प्राहसत् स तु दुष्टात्मा कर्णः स च सुयोधनः । ‘ उस वीरके इस तरह मारे जानेपर प्रायः सभीको बड़ा दुःख हुआ । केवल दुष्टात्मा कर्ण और दुर्योधन ही जोर- जोरसे हँसे थे ॥ ८१३ ॥
यच्च कर्णोऽब्रवीत् कृष्णां सभायां परुषं वचः ॥ ८२ ॥
प्रमुखे पाण्डवेयानां कुरूणां च नृशंसवत् । ‘ इसके सिवा, कर्णने भरी सभामें पाण्डवों और कौरवोंके सामने एक क्रूर मनुष्यकी भाँति द्रौपदीके प्रति इस तरह कठोर वचन कहे थे ॥ ८२३ ॥
विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः ॥ ८३ ॥
पतिमन्यं पृथुश्रोणि वृणीष्व मृदुभाषिणि ।
एषा त्वं धृतराष्ट्रस्य दासीभूता निवेशनम् ॥ ८४ ॥
प्रविशारालपक्ष्माक्षि न सन्ति पतयस्तव ।
न पाण्डवाः प्रभवन्ति तव कृष्णे कथञ्चन ॥ ८५ ॥
‘ कृष्णे! पाण्डव तो नष्ट होकर सदाके लिये नरकमें पड़ गये । पृथुश्रोणि! अब तू दूसरा पति वरण कर ले । मृदुभाषिणि! आजसे तू राजा धृतराष्ट्रकी दासी हुई; अतः राजमहलमें प्रवेश कर । टेढ़ी बरौनियोंवाली कृष्णे! पाण्डव अब तेरे पति नहीं रहे । वे तुझपर किसी तरह कोई अधिकार नहीं रखते ॥
दासभार्या च पाञ्चालि स्वयं दासी च शोभने ।
अद्य दुर्योधनो ह्येोकः पृथिव्यां नृपतिः स्मृतः ॥ ८६ ॥
‘ सुन्दरी पांचालराजकुमारी! अब तू दासोंकी भार्या और स्वयं भी दासी है । आज एकमात्र राजा दुर्योधन समस्त भूमण्डलके स्वामी मान लिये गये हैं ॥ ८६ ॥
सर्वे चास्य महीपाला योगक्षेममुपासते ।
पश्येदानीं यथा भद्रे विनष्टाः पाण्डवाः समम् ॥ ८७ ॥
अन्योन्यं समुदीक्षन्ते धार्तराष्ट्रस्य तेजसा ।