04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2291–2300

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2291–2300

पृष्ठ 2291

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उन कुलिन्द वीरोंके मारे जानेपर आपके महारथी बड़े प्रसन्न हुए । वे जोर- जोरसे शंख बजाने लगे और हाथमें धनुष - बाण लिये शत्रुओंपर टूट पड़े ॥ ८ ॥

अथाभवद् युद्धमतीव दारुणं पुनः कुरूणां सह पाण्डुसृञ्जयैः । शरासिशक्त्यृष्टिगदापरश्वधै- र्नराश्वनागासुहरं भृशाकुलम् ॥ ९ ॥

तदनन्तर कौरवोंका पाण्डवों तथा सृजयोंके साथ पुनः अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा । वह घमासान युद्ध बाण, खड्ग, शक्ति, ऋष्टि, गदा और फरसोंकी मारसे मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके प्राण ले रहा था ॥ ९ ॥

रथाश्वमातङ्गपदातिभिस्ततः परस्परं विप्रहतापतन् क्षितौ । यथा सविद्युत्स्तनिता बलाहकाः समाहता दिग्भ्य इवोग्रमारुतैः ॥ १० ॥

जैसे बिजलीकी चमक और गर्जनासे युक्त मेघ भयंकर वायुके वेगसे ताड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंसे गिर जाते हैं, उसी प्रकार रथों, घोड़ों, हाथियों और पैदलोंद्वारा परस्पर मारे जाकर वे युद्धपरायण योद्धा धराशायी होने लगे ॥ ततः शतानीकमतान् महागजां- स्तथा रथान् पत्तिगणांश्च तान् बहून् । जघान भोजस्तु हयानथापतन् क्षणाद् विशस्ताः कृतवर्मणः शरैः ॥ ११ ॥

तदनन्तर शतानीकद्वारा सम्मानित विशाल गजराजों, अश्वों, रथों और बहुत - से पैदलसमूहोंको कृतवर्माने मार डाला । वे कृतवर्माके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो क्षणभरमें धरतीपर गिर पड़े ॥ ११ ॥

अथापरे द्रौणिहता महाद्विपा- स्त्रयः ससर्वायुधयोधकेतनाः । निपेतुरुर्व्यां व्यसवो निपातिता- स्तथा यथा वज्रहता महाचलाः ॥ १२ ॥

इसके बाद अश्वत्थामाने सम्पूर्ण आयुधों योद्धाओं और ध्वजाओंसहित अन्य तीन विशाल गजराजोंको मार गिराया । उसके द्वारा मारे गये वे विशाल गजराज वज्रके मारे हुए महान् पर्वतोंके समान प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२ ॥

कुलिन्दराजावरजादनन्तरः स्तनान्तरे पत्रिवरैरताडयत् । तवात्मजं तस्य तवात्मजः शरैः

पृष्ठ 2292

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शितैः शरीरं व्यहनद् द्विपं च तम् ॥ १३ ॥

कुलिन्दराजके छोटे भाईसे भी जो छोटा था, उसने श्रेष्ठ बाणोंद्वारा आपके पुत्रकी छातीमें चोट पहुँचायी । तब आपके पुत्रने अपने तीखे बाणोंसे उसके शरीर और हाथी दोनोंको घायल कर दिया ॥ १३ ॥

स नागराजः सह राजसूनुना पपात रक्तं बहु सर्वतः क्षरन् । महेन्द्रवज्रप्रहतोऽम्बुदागमे यथा जलं गैरिकपर्वतस्तथा ॥ १४ ॥

जैसे वर्षाकालमें इन्द्रके वज्रसे आहत हुआ गेरूका पर्वत लाल रंगका पानी बहाता है, इसी प्रकार वह गजराज अपने शरीरसे सब ओर बहुत-सा रक्त बहाता हुआ कुलिन्दराजकुमारके साथ ही धराशायी हो गया ॥ कुलिन्दपुत्रप्रहितोऽपरो द्विपः क्राथस्य सूताश्वरथं व्यपोथयत् । ततोऽपतत् क्राथशराभिघातितः सहेश्वरो वज्रहतो यथा गिरिः ॥ १५ ॥

अब कुलिन्दराजकुमारने दूसरा हाथी आगे बढ़ाया । उसने क्राथके सारथि, घोड़ों और रथको कुचल डाला, परंतु क्राथके बाणोंसे पीड़ित हो वह हाथी वज्रताड़ित पर्वतके समान अपने स्वामीके साथ ही धराशायी हो गया ॥ १५ ॥

रथी द्विपस्थेन हतोऽपतच्छरैः क्राथाधिपः पर्वतजेन दुर्जयः । सवाजिसूतेष्वसनध्वजस्तथा यथा महावातहतो महाद्रुमः ॥ १६ ॥

तदनन्तर जैसे आँधीका उखाड़ा हुआ विशाल वृक्ष पृथ्वीपर गिर जाता है, उसी प्रकार घोड़े, सारथि, धनुष और ध्वजसहित दुर्जय महारथी क्राथ नरेश हाथीपर बैठे हुए एक पर्वतीय वीरके बाणोंसे मारा जाकर रथसे नीचे जा गिरा ॥ १६ ॥

वृको द्विपस्थं गिरिराजवासिनं भृशं शरैर्द्वादशभिः पराभिनत् । ततो वृकं साश्वरथं महाद्विपो द्रुतं चतुर्भिश्चरणैर्व्यपोथयत् ॥ १७ ॥

तब वृकने उस पहाड़ी राजाको बारह बाण मारकर अत्यन्त घायल कर दिया । चोट खाकर पर्वतीय नरेशका वह विशाल गजराज वृककी ओर झपटा और उसने रथ और घोड़ोंसहित वृकको अपने चारों पैरोंसे दबाकर तुरंत ही उसका कचूमर निकाल दिया ॥ १७ ॥

पृष्ठ 2293

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स नागराजः सनियन्तृकोऽपतत् तथा हतो बभ्रुसुतेषुभिर्भृशम् । स चापि देवावृधसूनुरर्दितः पपात नुन्नः सहदेवसूनुना ॥ १८ ॥

अन्तमें बभ्रुपुत्रके बाणोंसे अत्यन्त आहत होकर वह गजराज भी संचालकसहित धरतीपर लोट गया । फिर वह देवावृधकुमार भी सहदेवके पुत्रसे पीड़ित हो धराशायी हो गया ॥ १८ ॥

विषाणगात्रावरयोधपातिना गजेन हन्तुं शकुनिं कुलिन्दजः । जगा वेगेन भृशार्दयंश्च तं ततोऽस्य गान्धारपतिः शिरोऽहरत् ॥ १ ९ ॥ तत्पश्चात् दूसरे कुलिन्दराजकुमारने शकुनिको मार डालनेके लिये दाँत, शरीर और सूँड़के द्वारा बड़े -बड़े योद्धाओंको मार गिरानेवाले हाथीके द्वारा उसपर वेगपूर्वक आक्रमण किया और उसे अत्यन्त घायल कर दिया । तब गान्धारराज शकुनिने उसका सिर काट लिया ॥ १ ९ ॥ ततः शतानीकहता महागजा

हया रथाः पत्तिगणाश्च तावकाः ।

सुपर्णवातप्रहता यथोरगा- स्तथागता गां विवशा विचूर्णिताः ॥ २० ॥

यह देख शतानीकने आपकी सेनापर आक्रमण किया । जैसे गरुड़के पंखोंकी हवासे आहत हुए सर्प पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, उसी प्रकार शतानीकद्वारा मारे गये आपके विशाल हाथी, घोड़े, रथ और पैदल विवश हो पृथ्वीपर गिरकर चूर- चूर हो गये ॥ २० ॥

ततोऽभ्यविद्ध्यद् बहुभिः शितैः शरैः कलिङ्गपुत्रो नकुलात्मजं स्मयन् । ततोऽस्य कोपाद विचकर्त नाकुलिः शिरः क्षुरेणाम्बुजसंनिभाननम् ॥ २१ ॥

तदनन्तर मुसकराते हुए कलिंगराजके पुत्रने अपने बहुसंख्यक पैने बाणोंद्वारा नकुलके पुत्र शतानीकको क्षत-विक्षत कर दिया । इससे नकुलकुमारको बड़ा क्रोध हुआ और उसने एक क्षुरके द्वारा कलिंगराजकुमारका कमलसदृश मुखवाला मस्तक काट डाला ॥ २१ ॥

ततः शतानीकमविध्यदायसै- स्त्रिभिः शरैः कर्णसुतोऽर्जुनं त्रिभिः ।

त्रिभिश्च भीमं नकुलं च सप्तभि- र्जनार्दनं द्वादशभिश्च सायकैः ॥ २२ ॥

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तत्पश्चात् कर्णपुत्र वृषसेनने लोहेके बने हुए तीन बाणोंसे शतानीकको घायल कर दिया । फिर उसने अर्जुनको तीन, भीमसेनको तीन, नकुलको सात और श्रीकृष्णको बारह बाणोंसे बींध डाला ॥ २२ ॥

तदस्य कर्मातिमनुष्यकर्मणः समीक्ष्य हृष्टाः कुरवोऽभ्यपूजयन् । पराक्रमज्ञास्तु धनंजयस्य ये तोऽयमग्नाविति ते तु मेनिरे ॥ २३ ॥

अलौकिक पराक्रम करनेवाले वृषसेनके इस कर्मको देखकर समस्त कौरव हर्षमें भर गये और उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे; परंतु जो अर्जुनके पराक्रमको जानते थे, उन्होंने निश्चितरूपसे यह समझ लिया कि अब यह वृषसेन आगकी आहुति बन जायगा ॥ २३ ॥

ततः किरीटी परवीरघाती हताश्वमालोक्य नरप्रवीरः । माद्रीसुतं नकुलं लोकमध्ये समीक्ष्य कृष्णं भृशविक्षतं च ॥ २४ ॥

समभ्यधावद् वृषसेनमाहवे स सूतजस्य प्रमुखे स्थितस्तदा । तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मानवलोकके प्रमुख वीर किरीटधारी अर्जुनने समस्त सेनाओंके बीच माद्रीकुमार नकुलके घोड़ोंको वृषसेनद्वारा मारा गया और भगवान् श्रीकृष्णको अत्यन्त घायल हुआ देख युद्धस्थलमें वृषसेनपर धावा किया । वृषसेन उस समय कर्णके सामने खड़ा था ॥ २४ ॥

तमापतन्तं नरवीरमुग्रं महाहवे बाणसहस्रधारिणम् ॥ २५ ॥

अभ्यापतत् कर्णसुतो महारथं यथा महेन्द्रं नमुचिः पुरा तथा । महासमरमें सहस्रों बाण धारण करनेवाले भयंकर नरवीर महारथी अर्जुनको अपनी ओर आते देख कर्णकुमार वृषसेन भी उनकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे पूर्वकालमें नमुचिने देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया था ॥ २५३ ॥

ततो द्रुतं चैकशरेण पार्थं शितेन विद्ध्वा युधि कर्णपुत्रः ॥ २६ ॥

ननाद नादं सुमहानुभावो विद्ध्वेव शक्रं नमुचिः स वीरः ।

पृष्ठ 2295

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फिर महानुभाव कर्णपुत्र वीर वृषसेन युद्धस्थलमें कुन्तीकुमार अर्जुनको तुरंत ही एक तीखे बाणसे घायल करके बड़े जोर- जोरसे गर्जना करने लगा । ठीक वैसे ही, जैसे नमुचिने इन्द्रको बींधकर सिंहनाद किया था ॥ पुनः स पार्थं वृषसेन उग्रै- र्बाणैरविद्ध्यद् भुजमूले तु सव्ये ॥ २७ ॥

तथैव कृष्णं नवभिः समार्दयत् पुनश्च पार्थं दशभिर्जघान । इसके बाद वृषसेनने भयंकर बाणोंद्वारा अर्जुनकी बायीं भुजाके मूलभागमें पुनः प्रहार किया तथा नौ बाणोंसे श्रीकृष्णको भी चोट पहुँचाकर दस बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको फिर घायल कर दिया ॥ २७ ॥

पूर्वं यथा वृषसेनप्रयुक्तै- रभ्याहतः श्वेतहयः शरैस्तैः ॥ २८ ॥

संरम्भमीषद्गमितो वधाय कर्णात्मजस्याथ मनः प्रदध्रे । वृषसेनके चलाये हुए उन बाणोंद्वारा पहले ही आहत होकर श्वेतवाहन अर्जुनके मनमें थोड़ा -सा क्रोध जाग्रत् हुआ । फिर उन्होंने मन- ही- मन कर्णकुमारके वधका निश्चय किया ॥ २८ ॥

ततः किरीटी रणमूर्ध्नि कोपात् कृत्वा त्रिशाखां भ्रुकुटिं ललाटे ॥ २ ९ ॥ मुमोच तूर्णं विशिखान् महात्मा वधे धृतः कर्णसुतस्य संख्ये । तदनन्तर किरीटधारी महात्मा अर्जुनने युद्धस्थलमें कर्णपुत्रके वधका दृढ़ निश्चय करके अपने ललाटमें स्थित भौंहोंको क्रोधपूर्वक तीन जगहसे टेढ़ी करके युद्धके मुहानेपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंका प्रहार आरम्भ किया ॥ आरक्तनेत्रोऽन्तकशत्रुहन्ता उवाच कर्णं भृशमुत्स्मयंस्तदा ॥ ३० ॥

दुर्योधनं द्रौणिमुखांश्च सर्वा- नहं रणे वृषसेनं तमुग्रम् । सम्पश्यतः कर्ण तवाद्य संख्ये नयामि लोकं निशितैः पृषत्कैः ॥ ३१ ॥

उस समय उनके नेत्र रोषसे कुछ लाल हो गये थे । वे यमराज- जैसे शत्रुको भी मार डालनेमें समर्थ थे । उस समय उन्होंने मुसकराते हुए वहाँ कर्ण, दुर्योधन और अश्वत्थामा

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आदि सब वीरोंको लक्ष्य करके कहा– ' कर्ण! आज युद्धस्थलमें मैं तुम्हारे देखते - देखते उस उग्रपराक्रमी वीर वृषसेनको अपने पैने बाणोंद्वारा यमलोक भेज दूँगा ॥ ऊनं च तावद्धि जना वदन्ति सर्वैर्भवद्भिर्मम सूनुर्हतोऽसौ । एको रथो मद्विहीनस्तरस्वी अहं हनिष्ये भवतां समक्षम् ॥ ३२ ॥

संरक्ष्यतां रथसंस्थाः सुतोऽय- महं हनिष्ये वृषसेनमुग्रम् ।

पश्चाद् वधिष्ये त्वामपि सम्प्रमूढ- महं हनिष्येऽर्जुन आजिमध्ये ॥ ३३ ॥

‘ मेरा वेगशाली वीर पुत्र महारथी अभिमन्यु अकेला था । मैं उसके साथ नहीं था । उस अवस्थामें तुम सब लोगोंने मिलकर उसका वध किया था । तुम्हारे उस कर्मको सब लोग खोटा बताते हैं; परंतु आज मैं तुम सब लोगोंके सामने वृषसेनका वध करूँगा । रथपर बैठे हुए महारथियो! अपने इस पुत्रको बचा सको तो बचाओ । मैं अर्जुन आज रणभूमिमें पहले उग्रवीर वृषसेनको मारूँगा; फिर तुझ विवेकशून्य सूतपुत्रका भी वध कर डालूँगा ॥ ३२-३३ ॥ तमद्य मूलं कलहस्य संख्ये दुर्योधनापाश्रयजातदर्पम् । त्वामद्य हन्तास्मि रणे प्रसह्य अस्यैव हन्ता युधि भीमसेनः ॥ ३४ ॥

दुर्योधनस्याधमपूरुषस्य यस्यानयादेष महान् क्षयोऽभवत् । ‘ कर्ण! तू ही इस कलहकी जड़ है । दुर्योधनका सहारा मिल जानेसे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है । आज रणक्षेत्रमें मैं हठपूर्वक तेरा वध करूँगा और जिसके अन्यायसे यह महान् संहार हुआ है, उस नराधम दुर्योधनका वध युद्धमें भीमसेन करेंगे' ॥ ३४३ ॥

स एवमुक्त्वा विनिमृज्य चापं लक्ष्यं हि कृत्वा वृषसेनमाजौ ॥ ३५ ॥

ससर्ज बाणान् विशिखान् महात्मा वधाय राजन् कर्णसुतस्य संख्ये । राजन्! ऐसा कहकर महात्मा अर्जुनने अपने धनुषको पोंछा और कर्णपुत्र वृषसेनका वध करनेके लिये युद्धमें उसीको लक्ष्य बनाकर बाणोंका प्रहार आरम्भ किया ॥ ३५३ ॥

विव्याध चैनं दशभिः पृषत्कै- र्मर्मस्वशङ्कं प्रहसन् किरीटी ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 2297

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चिच्छेद चास्येष्वसनं भुजौ च क्षुरैश्चतुर्भिर्निशितैः शिरश्च । किरीटधारी अर्जुनने हँसते हुए- से दस बाणोंसे उसके मर्मस्थानोंमें निर्भीक होकर आघात किया । फिर चार तीखे छुरोंसे उसके धनुषको, दोनों भुजाओंको तथा मस्तकको भी काट डाला ॥ ३६ ॥

स पार्थबाणाभिहतः पपात रथाद् विबाहुर्विशिरा धरायाम् ॥ ३७ ॥

सुपुष्पितो वृक्षवरोऽतिकायो वातेरितः शाल इवाद्रिशृङ्गात् । अर्जुनके बाणोंसे आहत हो बाहु और मस्तकसे रहित होकर वृषसेन उसी प्रकार रथसे नीचे पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे सुन्दर फूलोंसे भरा हुआ श्रेष्ठ एवं विशाल शालवृक्ष हवाके झोंके खाकर पर्वतशिखरसे नीचे जा गिरा हो ॥ सम्प्रेक्ष्य बाणाभिहतं पतन्तं रथात् सुतं सूतजः क्षिप्रकारी ॥ ३८ ॥

रथं रथेनाशु जगाम रोषात् किरीटिनः पुत्रवधाभितप्तः । शीघ्रतापूर्वक कार्य करनेवाला सूतपुत्र कर्ण अपने बेटेको बाणविद्ध हो रथसे नीचे गिरते देख पुत्रके वधसे संतप्त हो उठा और रोषमें भरकर रथके द्वारा अर्जुनके रथकी ओर तीव्र वेगसे चला ॥ ३८३ ॥

ततः समक्षं स्वसुतं विलोक्य कर्णो हतं श्वेतहयेन संख्ये । संरम्भमागम्य परं महात्मा कृष्णार्जुनौ सहसैवाभ्यधावत् ॥ ३ ९ ॥ अपने पुत्रको अपनी आँखोंके सामने ही युद्धमें श्वेतवाहन अर्जुनद्वारा मारा गया देख महामनस्वी कर्णको महान् क्रोध हुआ तथा उसने श्रीकृष्ण और अर्जुनपर सहसा आक्रमण कर दिया ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि वृषसेनवधे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें वृषसेनका वधविषयक पचासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥

पृष्ठ 2298

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षडशीतितमोऽध्यायः कर्णके साथ युद्ध करनेके विषयमें श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत तथा अर्जुनका कर्णके सामने उपस्थित होना संजय उवाच

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य वेलोद्वृत्तमिवार्णवम् ।

गर्जन्तं सुमहाकायं दुर्निवारं सुरैरपि ॥ १ ॥

अर्जुनं प्राह दाशार्हः प्रहस्य पुरुषर्षभः ।

अयं सरथ आयाति श्वेताश्वः शल्यसारथिः ॥ २ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! सीमाको लाँघकर आगे बढ़ते हुए महासागरके सदृश विशालकाय कर्ण गर्जना करता हुआ आगे बढ़ा। वह देवताओंके लिये भी दुर्जय था । उसे आते देख दशार्हकुलनन्दन पुरुषश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णने हँसकर अर्जुनसे कहा — ‘ पार्थ! जिसके सारथि शल्य हैं और रथमें श्वेत घोड़े जुते हैं, वही यह कर्ण रथसहित इधर आ रहा है ॥ १-२ ॥

येन ते सह योद्धव्यं स्थिरो भव धनंजय ।

पश्य चैनं समायुक्तं रथं कर्णस्य पाण्डव ॥ ३ ॥

श्वेतवाजिसमायुक्तं युक्तं राधासुतेन च । ‘ धनंजय! तुम्हें जिसके साथ युद्ध करना है, वह कर्ण आ गया । अब स्थिर हो जाओ । पाण्डुनन्दन! श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए कर्णके इस सजे - सजाये रथको, जिसपर वह स्वयं विराजमान है, देखो ॥ ३३ ॥

नानापताकाकलिलं किङ्किणीजालमालिनम् ॥ ४ ॥

उह्यमानमिवाकाशे विमानं पाण्डुरैर्हयैः ।

ध्वजं च पश्य कर्णस्य नागकक्षं महात्मनः ॥ ५ ॥

‘ इसपर भाँति- भाँतिकी पताकाएँ फहरा रही हैं तथा वह छोटी-छोटी घंटियोंवाली झालरसे अलंकृत है । ये सफेद घोड़े आकाशमें विमानके समान इस रथको लेकर मानो उड़े जा रहे हैं । महामनस्वी कर्णकी इस ध्वजाको तो देखो, जिसमें हाथीके रस्सेका चिह्न बना हुआ है ॥ ४-५ ॥

आखण्डलधनुःप्रख्यमुल्लिखन्तमिवाम्बरम् ।

पश्य कर्णं समायान्तं धार्तराष्ट्रप्रियैषिणम् ॥ ६ ॥

शरधारा विमुञ्चन्तं धारासारमिवाम्बुदम् ।

पृष्ठ 2299

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वह ध्वज इन्द्रधनुषके समान प्रकाशित होता हुआ आकाशमें रेखा -सा खींच रहा है । देखो, दुर्योधनका प्रिय चाहनेवाला कर्ण इधर ही आ रहा है । वह जलकी धारा गिरानेवाले बादलके समान बाणधाराकी वर्षा कर रहा है ॥ ६३ ॥

एष मद्रेश्वरो राजा रथाग्रे पर्यवस्थितः ॥ ७ ॥

नियच्छति हयानस्य राधेयस्यामितौजसः । ' ये मद्रदेशके स्वामी राजा शल्य रथके अग्रभागमें बैठकर अमित बलशाली इस राधापुत्र कर्णके घोड़ोंको काबू में रख रहे हैं ॥ ७१ ॥

शृणु दुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खशब्दं च दारुणम् ॥ ८ ॥

सिंहनादांश्च विविधान् शृणु पाण्डव सर्वतः । 'पाण्डुनन्दन! सुनो, दुन्दुभिका गम्भीर घोष और भयंकर शंखध्वनि हो रही है । चारों ओर नाना प्रकारके सिंहनाद भी होने लगे हैं, इन्हें सुनो ॥ ८३ ॥

अन्तर्धाय महाशब्दान् कर्णेनामिततेजसा ॥ ९ ॥

दोधूयमानस्य भृशं धनुषः शृणु निःस्वनम् । ‘ अमित तेजस्वी कर्ण अपने धनुषको बड़े वेगसे हिला रहा है । उसकी टंकारध्वनि बड़ी भारी आवाजको भी दबाकर सुनायी पड़ रही है, सुनो ॥ ९ ३ ॥ एते दीर्यन्ति सगणाः पञ्चालानां महारथाः ॥ १० ॥

दृष्ट्वा केसरिणं क्रुद्धं मृगा इव महावने । ‘ जैसे महान् वनमें मृग कुपित हुए सिंहको देखकर भागने लगते हैं, उसी प्रकार ये पांचाल महारथी अपने सैन्यदलके साथ कर्णको देखकर भागे जा रहे हैं ॥ सर्वयत्नेन कौन्तेय हन्तुमर्हसि सूतजम् ॥ ११ ॥

न हि कर्णशरानन्यः सोढुमुत्सहते नरः । ' कुन्तीनन्दन! तुम्हें पूर्ण प्रयत्न करके सूतपुत्र कर्णका वध करना चाहिये । दूसरा कोई मनुष्य कर्णके बाणोंको नहीं सह सकता है ॥ ११३ ॥

सदेवासुरगन्धर्वांस्त्रील्लोँकान् सचराचरान् ॥ १२ ॥

त्वं हि जेतुं रणे शक्तस्तथैव विदितं मम । ‘ देवता, असुर, गन्धर्व तथा चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको तुम रणभूमिमें जीत सकते हो; यह मुझे अच्छी तरह मालूम है ॥ १२३ ॥

भीममुग्रं महात्मानं त्र्यक्षं शर्वं कपर्दिनम् ॥ १३ ॥

न शक्ता द्रष्टुमीशानं किं पुनर्योधितुं प्रभुम् ।

त्वया साक्षान्महादेवः सर्वभूतशिवः शिवः ॥ १४ ॥

युद्धेनाराधितः स्थाणुर्देवाश्च वरदास्तव ।

तस्य पार्थ प्रसादेन देवदेवस्य शूलिनः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2300

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जहि कर्णं महाबाहो नमुचिं वृत्रहा यथा ।

श्रेयस्तेऽस्तु सदा पार्थ युद्धे जयमवाप्नुहि ॥ १६ ॥

‘ जिनकी मूर्ति बड़ी ही उग्र और भयंकर है, जो महात्मा हैं, जिनके तीन नेत्र और मस्तकपर जटाजूट है, उन सर्वसमर्थ ईश्वर भगवान् शंकरको दूसरे लोग देख भी नहीं सकते फिर उनके साथ युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है? परंतु तुमने सम्पूर्ण जीवोंका कल्याण करनेवाले उन्हीं स्थाणुस्वरूप महादेव साक्षात् भगवान् शिवकी युद्धके द्वारा आराधना की है, अन्य देवताओंने भी तुम्हें वरदान दिये है; इसलिये महाबाहु पार्थ! तुम उन देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शंकरकी कृपासे कर्णको उसी प्रकार मार डालो, जैसे वृत्रविनाशक इन्द्रने नमुचिका वध किया था । कुन्तीनन्दन! तुम्हारा सदा ही कल्याण हो । तुम युद्धमें विजय प्राप्त करो ' ॥ १३–१६ ॥ अर्जुनउवाच

ध्रुव एव जयः कृष्ण मम नास्त्यत्र संशयः ।

सर्वलोकगुरुर्यस्त्वं तुष्टोऽसि मधुसूदन ॥ १७ ॥

अर्जुनने कहा- मधुसूदन श्रीकृष्ण! मेरी विजय अवश्य होगी, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्के गुरु आप मुझपर प्रसन्न हैं ॥ १७ ॥

चोदयाश्वान् हृषीकेश रथं मम महारथ ।

नाहत्वा समरे कर्णं निवर्तिष्यति फाल्गुनः ॥ १८ ॥

महारथी हृषीकेश! आप मेरे रथ और घोड़ोंको आगे बढ़ाइये । अब अर्जुन समरांगणमें कर्णका वध किये बिना पीछे नहीं लौटेगा ॥ १८ ॥

अद्य कर्णं हतं पश्य मच्छरैः शकलीकृतम् ।

मां वा द्रक्ष्यसि गोविन्द कर्णेन निहतं शरैः ॥ १ ९ ॥

गोविन्द! आज आप मेरे बाणोंसे भरकर टुकड़े -टुकड़े हुए कर्णको देखिये । अथवा मुझे ही कर्णके बाणोंसे मरा हुआ देखियेगा ॥ १ ९ ॥

उपस्थितमिदं घोरं युद्धं त्रैलोक्यमोहनम् ।

यज्जनाः कथयिष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति ॥ २० ॥

आज तीनों लोकोंको मोहमें डालनेवाला यह घोर युद्ध उपस्थित है । जबतक पृथ्वी कायम रहेगी तबतक संसारके लोग इस युद्धकी चर्चा करेंगे ॥ २० ॥

एवं ब्रुवंस्तदा पार्थः कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ।

प्रत्युद्ययौ रथेनाशु गजं प्रतिगजो यथा ॥ २१ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहते हुए कुन्तीकुमार अर्जुन उस समय रथके द्वारा शीघ्रतापूर्वक कर्णके सामने गये, मानो किसी हाथीका सामना करनेके लिये प्रतिद्वन्द्वी हाथी जा रहा हो ॥ २१ ॥