04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 231–240

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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तस्याभिद्रवतो वाहान् हस्तमुक्तेन वारिणा ॥ ५० ॥

सिक्त्वा व्यत्रासयन्नागस्ते पार्थमहरंस्ततः । उस समय आक्रमण करनेवाले भीमसेनके घोड़ोंपर उस हाथीने सूँड़से जल छोड़कर उन्हें भयभीत कर दिया । फिर तो वे घोड़े भीमसेनको लेकर दूर भाग गये ॥ ५० ॥

ततस्तमभ्ययात् तूर्णं रुचिपर्वाऽऽकृतीसुतः ॥ ५१ ॥

समघ्नञ्छरवर्षेण रथस्थोऽन्तकसंनिभः । तब आकृतीपुत्र रुचिपर्वाने तुरंत ही उस हाथीपर आक्रमण किया । वह रथपर बैठकर साक्षात् यमराजके समान जान पड़ता था । उसने बाणोंकी वर्षासे उस हाथीको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५१३ ॥

ततः स रुचिपर्वाणं शरेणानतपर्वणा ॥ ५२ ॥

सुपर्वा पर्वतपतिर्निन्ये वैवस्वतक्षयम् । यह देख जिनके अंगोंकी जोड़ सुन्दर है उन पर्वतराज भगदत्तने झुकी हुई गाँठवाले बाणके द्वारा रुचिपर्वाको यमलोक पहुँचा दिया ॥ ५२३ ॥

तस्मिन् निपतिते वीरे सौभद्रो द्रौपदीसुतः ॥ ५३ ॥

चेकितानो धृष्टकेतुर्युयुत्सुश्चार्दयन् द्विपम् ।

त एनं शरधाराभिर्धाराभिरिव तोयदाः ॥ ५४ ॥

सिषिचुर्भैरवान् नादान् विनदन्तो जिघांसवः । उस वीरके मारे जानेपर अभिमन्यु, द्रौपदीकुमार, चेकितान, धृष्टकेतु तथा युयुत्सुने भी उस हाथीको पीड़ा देना आरम्भ किया । ये सब लोग उस हाथीको मार डालनेकी इच्छासे विकट गर्जना करते हुए अपने बाणोंकी धारासे सींचने लगे, मानो मेघ पर्वतको जलकी धारासे नहला रहे हों ॥ ५३-५४ ॥ ततः पार्ण्यङ्कुशाङ्गुष्ठैः कृतिना चोदितो द्विपः ॥ ५५ ॥

प्रसारितकरः प्रायात् स्तब्धकर्णेक्षणो द्रुतम् ।

सोऽधिष्ठाय पदा वाहान् युयुत्सोः सूतमारुजत् ॥ ५६ ॥

तदनन्तर विद्वान् राजा भगदत्तने अपने पैरोंकी एँड़ी, अंकुश एवं अंगुष्ठसे प्रेरित करके हाथीको आगे बढ़ाया । फिर तो अपने कानोंको खड़े करके एकटक आँखोंसे देखते हुए सूँड़ फैलाकर उस हाथीने शीघ्रतापूर्वक धावा किया और युयुत्सुके घोड़ोंको पैरोंसे दबाकर उनके सारथिको मार डाला ॥ ५५-५६ ॥

युयुत्सुस्तु रथाद् राजन्नपाक्रामत् त्वरान्वितः ।

ततः पाण्डवयोधास्ते नागराजं शरैर्द्रुतम् ॥ ५७ ॥

सिषिचुर्भैरवान् नादान् विनदन्तो जिघांसवः ।

पृष्ठ 232

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राजन्! युयुत्सु बड़ी उतावलीके साथ रथसे उतरकर दूर चले गये थे । तत्पश्चात् पाण्डव-योद्धा उस गजराजको शीघ्रतापूर्वक मार डालनेकी इच्छासे भैरव- गर्जना करते हुए अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा उसे सींचने लगे ॥ ५७ ॥

पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तः सौभद्रस्याप्लुतो रथम् ॥ ५८ ॥

स कुञ्जरस्थो विसृजन्निषूनरिषु पार्थिवः ।

बभौ रश्मीनिवादित्यो भुवनेषु समुत्सृजन् ॥ ५ ९ ॥

उस समय घबराये हुए आपके पुत्र युयुत्सु अभिमन्युके रथपर जा बैठे । हाथीकी पीठपर बैठे हुए राजा भगदत्त शत्रुओंपर बाण- वर्षा करते हुए सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी किरणोंका विस्तार करनेवाले सूर्यके समान शोभा पा रहे थे ॥ ५८-५९ ॥

तमार्जुनिर्द्वादशभिर्युयुत्सुर्दशभिः शरैः ।

त्रिभिस्त्रिभिर्द्रौपदेया धृष्टकेतुश्च विव्यधुः ॥ ६० ॥

अर्जुनकुमार अभिमन्युने बारह, युयुत्सुने दस और द्रौपदीके पुत्रों तथा धृष्टकेतुने तीन-तीन बाणोंसे भगदत्तके उस हाथीको घायल कर दिया ॥ ६० ॥

सोऽतियत्नार्पितैर्बाणैराचितो द्विरदो बभौ ।

संस्यूत इव सूर्यस्य रश्मिभिर्जलदो महान् ॥ ६१ ॥

अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक चलाये हुए उन बाणोंसे हाथीका सारा शरीर व्याप्त हो रहा था । उस अवस्थामें वह सूर्यकी किरणोंमें पिरोये हुए महामेघके समान शोभा पा रहा था ॥ ६१ ॥

नियन्तुः शिल्पयत्नाभ्यां प्रेरितोऽरिशरार्दितः ।

परिचिक्षेप तान् नागः स रिपून् सव्यदक्षिणम् ॥ ६२ ॥

महावतके कौशल और प्रयत्नसे प्रेरित होकर वह हाथी शत्रुओंके बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी उन विपक्षियोंको दायें - बायें उठाकर फेंकने लगा ॥ ६२ ॥

गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान् वने ।

आवेष्टयत तां सेनां भगदत्तस्तथा मुहुः ॥ ६३ ॥

जैसे ग्वाला जंगलमें पशुओंको डंडेसे हाँकता है, उसी प्रकार भगदत्तने पाण्डव- सेनाको बार- बार घेर लिया ॥ ६३ ॥

क्षिप्रं श्येनाभिपन्नानां वायसानामिव स्वनः ।

बभूव पाण्डवेयानां भृशं विद्रवतां स्वनः ॥ ६४ ॥

जैसे बाज पक्षीके चंगुलमें फँसे हुए अथवा उसके आक्रमणसे त्रस्त हुए कौओंमें शीघ्र ही काँव- काँवका कोलाहल होने लगता है, उसी प्रकार भागते हुए पाण्डव योद्धाओंका आर्तनाद जोर- जोरसे सुनायी दे रहा था ॥ ६४ ॥

स नागराजः प्रवराङ्कुशाहतः पुरा सपक्षोऽद्रिवरो यथा नृप ।

पृष्ठ 233

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भयं तदा रिपुषु समादधद् भृशं वणिग्जनानां क्षुभितो यथार्णवः ॥ ६५ ॥

नरेश्वर! उस समय विशाल अंकुशकी मार खाकर वह गजराज पूर्वकालके पंखधारी श्रेष्ठ पर्वतकी भाँति शत्रुओंको उसी प्रकार अत्यन्त भयभीत करने लगा, जैसे विक्षुब्ध महासागर व्यापारियोंको भयमें डाल देता है ॥ ६५ ॥

ततो ध्वनिर्द्विरदरथाश्वपार्थिवै- र्भयाद् द्रवद्भिर्जनितोऽतिभैरवः । क्षितिं वियद् द्यां विदिशो दिशस्तथा समावृणोत् पार्थिव संयुगे ततः ॥ ६६ ॥

महाराज! तदनन्तर भयसे भागते हुए हाथी, रथ, घोड़े तथा राजाओंने वहाँ अत्यन्त भयंकर आर्तनाद फैला दिया । उनके उस भयंकर शब्दने युद्धस्थलमें पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग तथा दिशा - विदिशाओंको सब ओरसे आच्छादित कर दिया ॥ ६६ ॥

स तेन नागप्रवरेण पार्थिवो भृशं जगाहे द्विषतामनीकिनीम् । पुरा सुगुप्तां विबुधैरिवाहवे विरोचनो देववरूथिनीमिव ॥ ६७ ॥

उस गजराजके द्वारा राजा भगदत्तने शत्रुओंकी सेनामें अच्छी तरह प्रवेश किया । जैसे पूर्वकालमें देवासुर संग्रामके समय देवताओंद्वारा सुरक्षित देव सेनामें विरोचनने प्रवेश किया था ॥ ६७ ॥

भृशं ववौ ज्वलनसखो वियद् रजः समावृणोन्मुहुरपि चैव सैनिकान् । तमेकनागं गणशो यथा गजान् समन्ततो द्रुतमथ मेनिरे जनाः ॥ ६८ ॥

उस समय वहाँ बड़े चोरसे वायु चलने लगी । आकाशमें धूल छा गयी । उस धूलने समस्त सैनिकोंको ढक दिया । उस समय सब लोग चारों ओर दौड़ लगानेवाले उस एकमात्र हाथीको हाथियोंके झुंड- सा मानने लगे ॥ ६८ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि भगदत्तयुद्धे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें भगदत्तका युद्धविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥

पृष्ठ 234

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* हाथीके निचले भागमें कोई ऐसा स्थान होता है, जिसमें दोनों हाथोंके द्वारा थपथपानेसे हाथीको सुख मिलता है । अवस्थामें वह महावतके मारनेपर भी टस से मस नहीं होता । भीमसेन इस कलाको जानते थे । इसीका: ‘ अंजलिकावेध ' है ।

पृष्ठ 235

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सप्तविंशोऽध्यायः अर्जुनका संशप्तक - सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध संजय उवाच

यन्मां पार्थस्य संग्रामे कर्माणि परिपृच्छसि ।

तच्छृणुष्व महाबाहो पार्थो यदकरोद् रणे ॥। १ ॥

संजय कहते हैं — महाबाहो! आप जो मुझसे युद्धमें अर्जुनके पराक्रम पूछ रहे हैं, उन्हें बताता हूँ । अर्जुनने रणक्षेत्रमें जो कुछ किया था, वह सुनिये ॥ १ ॥

रजो दृष्ट्वा समद्भूतं श्रुत्वा च गजनिःस्वनम् ।

भगदत्ते विकुर्वाणे कौन्तेयः कृष्णमब्रवीत् ॥ २ ॥

भगदत्तके विचित्र रूपसे युद्ध करते समय वहाँ धूल उड़ती देखकर और हाथीके चिग्घाड़नेका शब्द सुनकर कुन्तीनन्दन अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा— ॥ २ ॥

यथा प्राग्ज्योतिषो राजा गजेन मधुसूदन ।

त्वरमाणो विनिष्क्रान्तो ध्रुवं तस्यैष निःस्वनः ॥ ३ ॥

‘ मधुसूदन! राजा भगदत्त अपने हाथीपर सवार जिस प्रकार उतावलीके साथ युद्धके लिये निकले थे, उससे जान पड़ता है निश्चय ही यह महान् कोलाहल उन्हींका है ॥ ३ ॥

इन्द्रादनवरः संख्ये गजयानविशारदः ।

प्रथमो गजयोधानां पृथिव्यामिति मे मतिः ॥ ४ ॥

' मेरा तो यह विश्वास है कि वे युद्धमें इन्द्रसे कम नहीं है । भगदत्त हाथीकी सवारीमें कुशल और गजारोही योद्धाओंमें इस पृथ्वीपर सबसे प्रधान हैं ॥ ४ ॥

स चापि द्विरदश्रेष्ठः सदाऽप्रतिगजो युधि ।

सर्वशस्त्रातिगः संख्ये कृतकर्मा जितक्लमः ॥ ५ ॥

‘ और उनका वह गजश्रेष्ठ सुप्रतीक भी युद्धमें अपना शानी नहीं रखता है । वह सब शास्त्रोंका उल्लंघन करके युद्धमें अनेक बार पराक्रम प्रकट कर चुका है । उसने परिश्रमको जीत लिया है ॥ ५ ॥

सहः शस्त्रनिपातानामग्निस्पर्शस्य चानघ ।

स पाण्डवबलं सर्वमद्यैको नाशयिष्यति ॥ ६ ॥

‘ अनघ! वह सम्पूर्ण शस्त्रोंके आघात तथा अग्निके स्पर्शको भी सह सकनेवाला है ।

आज वह अकेला ही समस्त पाण्डव - सेनाका विनाश कर डालेगा ॥ ६ ॥

न चावाभ्यामृतेऽन्योऽस्ति शक्तस्तं प्रतिबाधितुम् ।

पृष्ठ 236

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त्वरमाणस्ततो याहि यतः प्राग्ज्योतिषाधिपः ॥ ७ ॥

'हम दोनोंके सिवा दूसरा कोई नहीं है, जो उसे बाधा देनेमें समर्थ हो । अतः आप शीघ्रतापूर्वक वहीं चलिये, जहाँ प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त विद्यमान हैं ॥ ७ ॥

दृप्तं संख्ये द्विपबलाद् वयसा चापि विस्मितम् ।

अद्यैनं प्रेषयिष्यामि बलहन्तुः प्रियातिथिम् ॥ ८ ॥

' अपने हाथीके बलसे युद्धमें घमंड दिखानेवाले और अवस्थामें भी बड़े होनेका अहंकार रखनेवाले इन राजा भगदत्तको मैं देवराज इन्द्रका प्रिय अतिथि बनाकर स्वर्गलोक भेज दूँगा' ॥ ८ ॥

वचनादथ कृष्णस्तु प्रययौ सव्यसाचिनः ।

दीर्यते भगदत्तेन यत्र पाण्डववाहिनी ॥ ९ ॥

सव्यसाची अर्जुनके इस वचनसे प्रेरित हो श्रीकृष्ण उस स्थानपर रथ लेकर गये, जहाँ भगदत्त पाण्डव - सेनाका संहार कर रहे थे ॥ ९ ॥

तं प्रयान्तं ततः पश्चादाह्वयन्तो महारथाः ।

संशप्तकाः समारोहन् सहस्राणि चतुर्दश ॥ १० ॥

अर्जुनको जाते देख पीछेसे चौदह हजार संशप्तक महारथी उन्हें ललकारते हुए चढ़ आये ॥ १० ॥

दशैव तु सहस्राणि त्रिगर्तनां महारथाः ।

चत्वारि च सहस्राणि वासुदेवस्य चानुगाः ॥ ११ ॥

उनमें दस हजार महारथी तो त्रिगर्तदेशके थे और चार हजार भगवान् श्रीकृष्णके सेवक (नारायणी सेनाके सैनिक ) थे ॥ ११ ॥

दीर्यमाणां चमूं दृष्ट्वा भगदत्तेन मारिष ।

आहूयमानस्य च तैरभवद्धृदयं द्विधा ॥ १२ ॥

आर्य! राजा भगदत्तके द्वारा अपनी सेनाको विदीर्ण होती देखकर तथा पीछेसे संशप्तकोंकी ललकार सुनकर उनका हृदय दुविधामें पड़ गया ॥ १२ ॥

किं नु श्रेयस्करं कर्म भवेदद्येति चिन्तयन् ।

इह वा विनिवर्तेयं गच्छेयं वा युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥

वे सोचने लगे — आज मेरे लिये कौन-सा कार्य श्रेयस्कर होगा । यहाँसे संशप्तकोंकी ओर लौट चलूँ अथवा युधिष्ठिरके पास जाऊँ ॥ १३ ॥

तस्य बुद्धया विचार्यैवमर्जुनस्य कुरूद्वह ।

अभवद् भूयसी बुद्धिः संशप्तकवधे स्थिरा ॥ १४ ॥

कुरुश्रेष्ठ! बुद्धिसे इस प्रकार विचार करनेपर अर्जुनके मनमें यह भाव अत्यन्त दृढ़ हुआ कि संशप्तकोंके वधका ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ १४ ॥

स संनिवृत्तः सहसा कपिप्रवरकेतनः ।

पृष्ठ 237

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एको रथसहस्राणि निहन्तुं वासवी रणे ॥ १५ ॥

श्रेष्ठ वानरचिह्नसे सुशोभित ध्वजावाले इन्द्रकुमार अर्जुन उपर्युक्त बात सोचकर सहसा लौट पड़े । वे रणक्षेत्रमें अकेले ही हजारों रथियोंका संहार करनेको उद्यत थे ॥ १५ ॥

सा हि दुर्योधनस्यासीन्मतिः कर्णस्य चोभयोः ।

अर्जुनस्य वधोपाये तेन द्वैधमकल्पयत् ॥ १६ ॥

अर्जुनके वधका उपाय सोचते हुए दुर्योधन और कर्ण दोनोंके मनमें यही विचार उत्पन्न हुआ था । इसीलिये उसने युद्धको दो भागोंमें बाँट दिया ॥ १६ ॥

स तु दोलायमानोऽभूद् द्वैधीभावेन पाण्डवः ।

वधेन तु नराग्रयाणामकरोत् तां मृषा तदा ॥ १७ ॥

पाण्डुनन्दन अर्जुन एक बार दुविधामें पड़कर चंचल हो गये थे, तथापि नरश्रेष्ठ संशप्तक वीरोंके वधका निश्चय करके उन्होंने उस दुविधाको मिथ्या कर दिया था ॥

ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ।

असृजन्नर्जुने राजन् संशप्तकमहारथाः ॥ १८ ॥

राजन्! तदनन्तर संशप्तक महारथियोंने अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक लाख बाणोंकी वर्षा की ॥ १८ ॥

नैव कुन्तीसुतः पार्थो नैव कृष्णो जनार्दनः ।

न हया न रथो राजन् दृश्यन्ते स्म शरैश्चिताः ॥ १ ९ ॥

महाराज! उस समय न तो कुन्तीकुमार अर्जुन, न जनार्दन श्रीकृष्ण, न घोड़े और न रथ ही दिखायी देते थे । सब- के - सब वहाँ बाणोंके ढेरसे आच्छादित हो गये थे ॥ १ ९ ॥

तदा मोहमनुप्राप्तः सिष्विदे हि जनार्दनः ।

ततस्तान् प्रायशः पार्थो ब्रह्मास्त्रेण निजघ्निवान् ॥ २० ॥

उस अवस्थामें भगवान् जनार्दन पसीने - पसीने हो गये । उनपर मोह-सा छा गया । यह देख अर्जुनने ब्रह्मास्त्रसे उन सबको अधिकांशमें नष्ट कर दिया ॥ २० ॥

शतशः पाणयश्छिन्नाः सेषुज्यातलकार्मुकाः ।

केतवो वाजिनः सूता रथिनश्चापतन् क्षितौ ॥ २१ ॥

सैकड़ों भुजाएँ बाण, प्रत्यंचा और धनुषसहित कट गयीं । ध्वज, घोड़े, सारथि और रथी सभी धराशायी हो गये ॥ २१ ॥

द्रुमाचलाग्राम्बुधरैः समकायाः सुकल्पिताः ।

हतारोहाः क्षितौ पेतुर्द्विपाः पार्थशराहताः ॥ २२ ॥

वृक्ष, पर्वत- शिखर और मेघोंके समान विशाल एवं ऊँचे शरीरवाले, सजे - सजाये हाथी, जिनके सवार पहले ही मार दिये गये थे, अर्जुनके बाणोंसे आहत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २२ ॥

विप्रविद्धकुथा नागाश्छिन्नभाण्डाः परासवः ।

पृष्ठ 238

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सारोहास्तु रणे पेतुर्मथिता मार्गणैर्भृशम् ॥ २३ ॥

उस रणक्षेत्रमें बहुत - से हाथी अर्जुनके बाणोंसे मथित होकर सवारोंसहित प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । उस समय उनके झूल चिथड़े - चिथड़े होकर दूर जा पड़े थे और उनके आभूषणोंके भी टुकड़े - टुकड़े हो गये थे ॥

सर्ष्टिप्रासासिनखराः समुद्गरपरश्वधाः ।

विच्छिन्ना बाहवः पेतुर्नृणां भल्लैः किरीटिना ॥ २४ ॥

किरीटधारी अर्जुनके भल्लनामक बाणोंसे ऋष्टि, प्रास, खड्ग, नखर, मुद्गर और फरसोंसहित वीरोंकी भुजाएँ कटकर गिर गयीं ॥ २४ ॥

बालादित्याम्बुजेन्दूनां तुल्यरूपाणि मारिष ।

संच्छिन्नान्यर्जुनशरैः शिरांस्युर्व्यां प्रपेदिरे ॥ २५ ॥

आर्य! योद्धाओंके मस्तक, जो बालसूर्य, कमल और चन्द्रमाके समान सुन्दर थे, अर्जुनके बाणोंसे छिन्न - भिन्न हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २५ ॥

जज्वालालंकृता सेना पत्रिभिः प्राणिभोजनैः ।

नानारूपैस्तदामित्रान् क्रुद्धे निघ्नति फाल्गुने ॥ २६ ॥

जब क्रोधमें भरे हुए अर्जुन नाना प्रकारके प्राणनाशक बाणोंद्वारा शत्रुओंका नाश करने लगे, उस समय आभूषणोंसे विभूषित हुई संशप्तकोंकी सारी सेना जलने लगी ॥ २६ ॥

क्षोभयन्तं तदा सेनां द्विरदं नलिनीमिव ।

धनंजयं भूतगणाः साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ २७ ॥

जैसे हाथी कमलोंसे भरे हुए सरोवरको मथ डालता है, उसी प्रकार अर्जुनको सारी सेनाका विनाश करते देख सब प्राणी 'साधु-साधु ' कहकर अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे ॥ २७ ॥

दृष्ट्वा तत् कर्म पार्थस्य वासवस्येव माधवः ।

विस्मयं परमं गत्वा प्राञ्जलिस्तमुवाच ह ॥ २८ ॥

इन्द्रके समान अर्जुनका वह पराक्रम देख भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त आश्चर्यमें पड़कर हाथ जोड़े हुए बोले— ॥ २८ ॥

कर्मैतत् पार्थ शक्रेण यमेन धनदेन च ।

दुष्करं समरे यत् ते कृतमद्येति मे मतिः ॥ २ ९ ॥

' पार्थ! मेरा ऐसा विश्वास है कि आज समर--भूमिमें तुमने जो कार्य किया है, यह इन्द्र, यम और कुबेरके लिये भी दुष्कर है ॥ २ ९ ॥

युगपच्चैव संग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः ।

पतिता एव मे दृष्टाः संशप्तकमहारथाः ॥ ३० ॥

‘ इस संग्राममें मैंने सैकड़ों और हजारों संशप्तक महारथियोंको एक साथ ही गिरते देखा है ' ॥ ३० ॥

पृष्ठ 239

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संशप्तकांस्ततो हत्वा भूयिष्ठा ये व्यवस्थिताः ।

भगदत्ताय याहीति कृष्णं पार्थोऽभ्यनोदयत् ॥ ३१ ॥

इस प्रकार वहाँ खड़े हुए संशप्तक योद्धाओंमेंसे अधिकांशका वध करके अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा – ' अब भगदत्तके पास चलिये ' ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि संशप्तकवधे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें संशप्तकोंका वधविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

Fard

पृष्ठ 240

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अष्टाविंशोऽध्यायः संशप्तकोंका संहार करके अर्जुनका कौरव सेनापर आक्रमण तथा भगदत्त और उनके हाथीका पराक्रम संजय उवाच

यियासतस्ततः कृष्णः पार्थस्याश्वान् मनोजवान् ।

सम्प्रैषीद्धेमसंछन्नान् द्रोणानीकाय सत्वरन् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! तदनन्तर द्रोणकी सेनाके समीप जानेकी इच्छावाले अर्जुनके सुवर्णभूषित एवं मनके समान वेगशाली अश्वोंको भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ द्रोणाचार्यकी सेनातक पहुँचनेके लिये हाँका ॥ १ ॥

तं प्रयान्तं कुरुश्रेष्ठं स्वान् भ्रातॄन् द्रोणतापितान् ।

सुशर्मा भ्रातृभिः सार्धं युद्धार्थी पृष्ठतोऽन्वयात् ॥ २ ॥

द्रोणाचार्य सताये हुए अपने भाइयोंके पास जाते हुए कुरुश्रेष्ठ अर्जुनको भाइयोंसहित सुशर्माने युद्धकी इच्छासे ललकारा और पीछेसे उनपर आक्रमण किया ॥ २ ॥

ततः श्वेतहयः कृष्णमब्रवीदजितं जयः ।

एष मां भ्रातृभिः सार्धं सुशर्माऽऽह्वयतेऽच्युत ॥ ३ ॥

तब श्वेतवाहन अर्जुनने अपराजित श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा, ' अच्युत! यह भाइयोंसहित सुशर्मा मुझे पुनः युद्धके लिये बुला रहा है ॥ ३ ॥

दीर्यते चोत्तरेणैव तत् सैन्यं मधुसूदन ।

द्वैधीभूतं मनो मेऽद्य कृतं संशप्तकैरिदम् ॥ ४ ॥

‘ उधर उत्तर दिशाकी ओर अपनी सेनाका नाश किया जा रहा है । मधुसूदन! इन संशप्तकोंने आज मेरे मनको दुविधामें डाल दिया है ॥ ४ ॥

किं नु संशप्तकान् हन्मि स्वान् रक्षाम्यहितार्दितान् ।

इति मे त्वं मतं वेत्सि तत्र किं सुकृतं भवेत् ॥ ५ ॥

‘ क्या मैं संशप्तकोंका वध करूँ अथवा शत्रुओंद्वारा पीड़ित हुए अपने सैनिकोंकी रक्षा करूँ। इस प्रकार मेरा मन संकल्प - विकल्पमें पड़ा है, सो आप जानते ही हैं । बताइये, अब मेरे लिये क्या करना अच्छा होगा ' ॥ ५ ॥

एवमुक्तस्तु दाशार्हः स्यन्दनं प्रत्यवर्तयत् ।

येन त्रिगर्ताधिपतिः पाण्डवं समुपाह्वयत् ॥ ६ ॥

अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अपने रथको उसी ओर लौटाया, जिस ओरसे त्रिगर्तराज सुशर्मा उन पाण्डुकुमारको युद्धके लिये ललकार रहा था ॥ ६ ॥