04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2351–2360
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2351–2360
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नवतितमोऽध्यायः अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना संजय उवाच ततः प्रयाताः शरपातमात्र- मवस्थिताः कुरवो भिन्नसेनाः । विद्युत्प्रकाशं ददृशुः समन्ताद् धंनजयास्त्रं समुदीर्यमाणम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! तदनन्तर भागे हुए कौरव, जिनकी सेना तितर- बितर हो गयी थी, धनुषसे छोड़ा हुआ बाण जहाँतक पहुँचता है, उतनी दूरीपर जाकर खड़े हो गये । वहींसे उन्होंने देखा कि अर्जुनका बड़े वेगसे बढ़ता हुआ अस्त्र चारों ओर बिजलीके समान चमक रहा है ॥ तदर्जुनास्त्रं ग्रसति स्म कर्णो वियद्गतं घोरतरैः शरैस्तत् । क्रुद्धेन पार्थेन भृशाभिसृष्टं वधाय कर्णस्य महाविमर्दे ॥ २ ॥
उस महासमरमें अर्जुन कुपित होकर कर्णके वधके लिये जिस -जिस अस्त्रका वेगपूर्वक प्रयोग करते थे, उसे आकाशमें ही कर्ण अपने भयंकर बाणोंद्वारा काट देता था ॥ उदीर्यमाणं स्म कुरून् दहन्तं सुवर्णपुङ्खैर्विशिखैर्ममर्द । कर्णस्त्वमोघेष्वसनं दृढज्यं विस्फारयित्वा विसृजञ्छरौघान् ॥ ३ ॥
कर्णका धनुष अमोघ था। उसकी डोरी भी बहुत मजबूत थी । वह अपने धनुषको खींचकर उसके द्वारा बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा। कौरव सेनाको दग्ध करनेवाले अर्जुनके छोड़े हुए अस्त्रको उसने सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा धूलमें मिला दिया ॥ ३ ॥
रामादुपात्तेन महामहिम्ना ह्याथर्वणेनारिविनाशनेन ।
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तदर्जुनास्त्रं व्यधमद् दहन्तं कर्णस्तु बाणैर्निशितैर्महात्मा ॥ ४ ॥
महामनस्वी वीर कर्णने परशुरामजी से प्राप्त हुए महाप्रभावशाली शत्रुनाशक आथर्वण अस्त्रका प्रयोग करके पैने बाणोंद्वारा अर्जुनके उस अस्त्रको, जो कौरव - सेनाको दग्ध कर रहा था, नष्ट कर दिया ॥ ४ ॥
ततो विमर्दः सुमहान् बभूव
तत्रार्जुनस्याधिरथेश्च राजन् ।
अन्योन्यमासादयतोः पृषत्कै- र्विषाणघातैर्द्विपयोरिवोग्रैः ॥ ५ ॥
राजन्! जैसे दो हाथी अपने भयंकर दाँतोंसे एक- दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार अर्जुन और कर्ण एक - दूसरेपर बाणोंका प्रहार कर रहे थे । उस समय उन दोनोंमें बड़ा भारी युद्ध होने लगा ॥ ५ ॥
तत्रास्त्रसंघातसमावृतं तदा
बभूव राजंस्तुमुलं स्म सर्वतः ।
तत् कर्णपार्थौ शरवृष्टिसंघै- र्निरन्तरं चक्रतुरम्बरं तदा ॥ ६ ॥
नरेश्वर! उस समय वहाँ अस्त्रसमूहोंसे आच्छादित होकर सारा प्रदेश सब ओरसे भयंकर प्रतीत होने लगा । कर्ण और अर्जुनने अपने बाणोंकी वर्षासे आकाशको ठसाठस भर दिया ॥ ६ ॥
ततो जालं बाणमयं महान्तं सर्वेऽद्राक्षुः कुरवः सोमकाश्च । नान्यं च भूतं ददृशुस्तदा ते बाणान्धकारे तुमुलेऽथ किंचित् ॥ ७ ॥
तदनन्तर समस्त कौरवों और सोमकोंने भी देखा कि वहाँ बाणोंका विशाल जाल फैल गया है । बाणजनित उस भयानक अन्धकारमें उस समय उन्हें दूसरे किसी प्राणीका दर्शन नहीं होता था ॥ ७ ॥
(ततस्तु तौ वै पुरुषप्रवीरी राजन् वरौ सर्वधनुर्धराणाम् । त्यक्त्वाऽऽत्मदेहौ समरेऽतिघोरे प्राप्तश्रमौ शत्रुदुरासदौ हि ॥ दृष्ट्वा तु तौ संयति सम्प्रयुक्तौ परस्परं छिद्रनिविष्टदृष्टी । देवर्षिगन्धर्वगणाः सयक्षाः
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संतुष्टुवुस्ती पितरश्च हृष्टाः ॥ ) राजन्! सम्पूर्ण धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ वे दोनों नरवीर उस भयानक समरमें अपने शरीरोंका मोह छोड़कर बड़ा भारी परिश्रम कर रहे थे, वे दोनों ही शत्रुओंके लिये दुर्जय थे । युद्धमें तत्पर होकर एक- दूसरेके छिद्रोंकी ओर दृष्टि रखनेवाले उन दोनों वीरोंको देखकर देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और पितर सभी हर्षमें भरकर उनकी प्रशंसा करने लगे । तौ संदधानावनिशं च राजन् समस्यन्तौ चापि शराननेकान् । संदर्शयेतां युधि मार्गान् विचित्रान् धनुर्धरौ तौ विविधै कृतास्त्रैः ॥ ८ ॥
राजन्! निरन्तर अनेकानेक बाणोंका संधान और प्रहार करते हुए वे दोनों धनुर्धर वीर सिद्ध किये हुए विविध अस्त्रोंद्वारा युद्धमें अद्भुत पैंतरे दिखाने लगे ॥ ८ ॥
तयोरेवं युद्ध्यतोराजिमध्ये सूतात्मजोऽभूदधिकः कदाचित् । पार्थः कदाचित् त्वधिकः किरीटी वीर्यास्त्रमायाबलपौरुषेण ॥ ९ ॥
इस प्रकार संग्रामभूमिमें जूझते समय उन दोनों वीरोंमें पराक्रम, अस्त्रसंचालन, मायाबल तथा पुरुषार्थकी दृष्टिसे कभी सूतपुत्र कर्ण बढ़ जाता था और कभी किरीटधारी अर्जुन ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा तयोस्तं युधि सम्प्रहारं
परस्परस्यान्तरमीक्षमाणयोः ।
घोरं तयोर्दुर्विषहं रणेऽन्यै- र्योधाः सर्वे विस्मयमभ्यगच्छन् ॥ १० ॥
युद्धस्थलमें एक- दूसरेपर प्रहार करनेका अवसर देखते हुए उन दोनों वीरोंका दूसरोंके लिये दुःसह वह घोर आघात- प्रत्याघात देखकर रणभूमिमें खड़े हुए समस्त योद्धा आश्चर्यसे चकित हो उठे ॥ १० ॥
ततो भूतान्यन्तरिक्षस्थितानि तौ कर्णपार्थी प्रशशंसुनरिन्द्र । भोः कर्ण साध्वर्जुन साधु चेति वियत्सु वाणी श्रूयते सर्वतोऽपि ॥ ११ ॥
नरेन्द्र! उस समय आकाशमें स्थित हुए प्राणी कर्ण और अर्जुन दोनोंकी प्रशंसा करने लगे । ‘ वाह रे कर्ण! ' 'शाबाश अर्जुन! ' यही बात अन्तरिक्षमें सब ओर सुनायी देने लगी ॥ ११ ॥
तस्मिन् विमर्दे रथवाजिनागै-
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स्तदाभिघातैर्दलिते हि भूतले । ततस्तु पातालतले शयानो नागोऽश्वसेनः कृतवैरोऽर्जुनेन ॥ १२ ॥
राजंस्तदा खाण्डवदाहमुक्तो विवेश कोपाद् वसुधातले यः । अथोत्पपातोर्ध्वगतिर्जवेन संदृश्य कर्णार्जुनयोर्विमर्दम् ॥ १३ ॥
राजन्! उस समय घमासान युद्धमें जब रथ, घोड़े और हाथियोंद्वारा सारा भूतल रौंदा जा रहा था, उस समय पातालनिवासी अश्वसेन नामक नाग, जिसने अर्जुनके साथ वैर बाँध रखा था और जो खाण्डवदाहके समय जीवित बचकर क्रोधपूर्वक इस पृथ्वीके भीतर घुस गया था; कर्ण तथा अर्जुनका वह संग्राम देखकर बड़े वेगसे ऊपरको उछला और उस युद्धस्थलमें आ पहुँचा; उसमें ऊपरको उड़नेकी भी शक्ति थी ॥ १२-१३ ॥ अयं हि कालोऽस्य दुरात्मनो वै पार्थस्य वैरप्रतियातनाय । संचिन्त्य तूणं प्रविवेश चैव कर्णस्य राजन् शररूपधारी ॥ १४ ॥
नरेश्वर! वह यह सोचकर कि ' दुरात्मा अर्जुनके वैरका बदला लेनेके लिये यही सबसे अच्छा अवसर है ' बाणका रूप धारण करके कर्णके तरकसमें घुस गया ॥ ततोऽस्त्रसंघातसमाकुलं तदा
बभूव जन्यं विततांशुजालम् ।
तत् कर्णपार्थौ शरसंघवृष्टिभि- र्निरन्तरं चक्रतुरम्बरं तदा ॥ १५ ॥
तदनन्तर अस्त्रसमूहोंके प्रहारसे भरा हुआ वह युद्धस्थल ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो वहाँ किरणोंका जाल बिछ गया हो । कर्ण और अर्जुनने अपने बाणसमूहोंकी वर्षासे आकाशमें तिलभर भी अवकाश नहीं रहने दिया ॥ तद् बाणजालैकमयं महान्तं सर्वेऽत्रसन् कुरवः सोमकाश्च । नान्यत् किंचिद् ददृशुः सम्पतद् वै बाणान्धकारे तुमुलेऽतिमात्रम् ॥ १६ ॥
वहाँ बाणोंका एक महाजाल-सा बना हुआ देखकर कौरव और सोमक सभी भयसे थर्रा उठे । उस अत्यन्त घोर बाणान्धकारमें उन्हें दूसरा कुछ भी गिरता नहीं दिखायी देता था ॥ १६ ॥
ततस्तौ पुरुषव्याघ्रौ सर्वलोकधनुर्धरौ ।
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त्यक्तप्राणौ रणे वीरौ युद्धश्रममुपागतौ ।
समुत्क्षेपैर्वीज्यमानौ सिक्तौ चन्दनवारिणा ॥ १७ ॥
सवालव्यजनैर्दिव्यैर्दिविस्थैरप्सरोगणैः ।
शक्रसूर्यकराब्जाभ्यां प्रमार्जितमुखावुभौ ॥ १८ ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण विश्वके विख्यात धनुर्धर वीर पुरुषसिंह कर्ण और अर्जुन प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते - करते थक गये । उस समय आकाशमें खड़ी हुई अप्सराओंने दिव्य चँवर डुलाकर उन दोनोंको चन्दनके जलसे सींचा । फिर इन्द्र और सूर्यने अपने कर-कमलोंसे उनके मुँह पोंछे ॥ कर्णोऽथ पार्थं न विशेषयद् यदा भृशं च पार्थेन शराभितप्तः । ततस्तु वीरः शरविक्षताङ्गो दधे मनो ह्येकशयस्य तस्य ॥ १ ९ ॥ जब किसी तरह कर्ण युद्धमें अर्जुनसे बढ़कर पराक्रम न दिखा सका और अर्जुनने अपने बाणोंकी मारसे उसे अत्यन्त संतप्त कर दिया, तब बाणोंके आघातसे सारा शरीर क्षत- विक्षत हो जानेके कारण वीर कर्णने उस सर्पमुख बाणके प्रहारका विचार किया ॥ १ ९ ॥ ततो रिपुघ्नं समधत्त कर्णः सुसंचितं सर्पमुखं ज्वलन्तम् । रौद्रं शरं संनतमुग्रधौतं पार्थार्थमत्यर्थचिराभिगुप्तम् ॥ २० ॥
सदार्चितं चन्दनचूर्णशायितं सुवर्णतूणीरशयं महार्चिषम् । आकर्णपूर्णं च विकृष्य कर्णः पार्थोन्मुखः संदधे चोत्तमौजाः ॥ २१ ॥
उत्तम बलशाली कर्णने अर्जुनको मारनेके लिये ही जिसे सुदीर्घकालसे सुरक्षित रख छोड़ा था, सोनेके तरकसमें चन्दनके चूर्णके अंदर जिसे रखता था और सदा जिसकी पूजा करता था, उस शत्रुनाशक, झुकी हुई गाँठवाले, स्वच्छ, महातेजस्वी, सुसंचित, प्रज्वलित एवं भयानक सर्पमुख बाणको उसने धनुषपर रखा और कानतक खींचकर अर्जुनकी ओर संधान किया || प्रदीप्तमैरावतवंशसम्भवं शिरो जिहीर्षुर्युधि सव्यसाचिनः । ततः प्रजज्वाल दिशो नभश्च उल्काश्च घोराः शतशः प्रपेतुः ॥ २२ ॥
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कर्ण युद्धमें सव्यसाची अर्जुनका मस्तक काट लेना चाहता था । उसका चलाया हुआ वह प्रज्वलित बाण ऐरावतकुलमें उत्पन्न अश्वसेन ही था । उस बाणके छूटते ही सम्पूर्ण दिशाओंसहित आकाश जाज्वल्यमान हो उठा । सैकड़ों भयंकर उल्काएँ गिरने लगीं ॥ २२ ॥
तस्मिंस्तु नागे धनुषि प्रयुक्ते हाहाकृता लोकपालाः सशक्राः । न चापि तं बुबुधे सूतपुत्रो बाणे प्रविष्टं योगबलेन नागम् ॥ २३ ॥
धनुषपर उस नागका प्रयोग होते ही इन्द्रसहित सम्पूर्ण लोकपाल हाहाकार कर उठे ।
सूतपुत्रको भी यह मालूम नहीं था कि मेरे इस बाणमें योगबलसे नाग घुसा बैठा है ॥ २३ ॥
दशशतनयनोऽहिं दृश्य बाणे प्रविष्टं निहत इति सुतो मे स्रस्तगात्रो बभूव । जलजकुसुमयोनिः श्रेष्ठभावो जितात्मा त्रिदशपतिमवोचन्मा व्यथिष्ठा जये श्रीः ॥ २४ ॥
सहस्रनेत्रधारी इन्द्र उस बाणमें सर्पको घुसा हुआ देख यह सोचकर शिथिल हो गये कि ' अब तो मेरा पुत्र मारा गया । ' तब मनको वशमें रखनेवाले श्रेष्ठस्वभाव कमलयोनि ब्रह्माजीने उन देवराज इन्द्रसे कहा – ' देवेश्वर! दुःखी न होओ । विजयश्री अर्जुनको ही प्राप्त होगी' ॥ २४ ॥
ततोऽब्रवीन्मद्रराजो महात्मा दृष्ट्वा कर्णं प्रहितेषु तमुग्रम् । न कर्ण ग्रीवामिषुरेष लप्स्यते समीक्ष्य संधत्स्व शरं शिरोध्रम् ॥ २५ ॥
उस समय महामनस्वी मद्रराज शल्यने कर्णको उस भयंकर बाणका प्रहार करनेके लिये उद्यत देख उससे कहा - ' कर्ण! तुम्हारा यह बाण शत्रुके कण्ठमें नहीं लगेगा; अतः सोच - विचारकर फिरसे बाणका संधान करो, जिससे वह मस्तक काट सके ' ॥ २५ ॥
अथाब्रवीत् क्रोधसंरक्तनेत्रो मद्राधिपं सूतपुत्रस्तरस्वी । न संधत्ते द्विः शरं शल्य कर्णो न मादृशा जिह्मयुद्धा भवन्ति ॥ २६ ॥
यह सुनकर वेगशाली सूतपुत्र कर्णके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । उसने मद्रराजसे कहा —‘कर्ण दो बार बाणका संधान नहीं करता । मेरे- जैसे वीर कपटपूर्वक युद्ध नहीं करते हैं ' ॥ २६ ॥
इतीदमुक्त्वा विससर्ज तं शरं
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प्रयत्नतो वर्षगणाभिपूजितम् ।
हतोऽसि वै फाल्गुन इत्यधिक्षिप- नुवाच चोच्चैर्गिरमूर्जितां वृषः ॥ २७ ॥
ऐसा कहकर कर्णने जिसकी वर्षोंसे पूजा की थी, उस बाणको प्रयत्नपूर्वक शत्रुकी ओर छोड़ दिया और आक्षेप करते हुए उच्च स्वरसे कहा ' अर्जुन! अब तू निश्चय ही मारा गया ' ॥ २७ ॥
स सायकः कर्णभुजप्रसृष्टो हुताशनार्कप्रतिमः सुघोरः । गुणच्युतः कर्णधनुःप्रमुक्तो वियद्गतः प्राज्वलदन्तरिक्षे ॥ २८ ॥
अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी वह अत्यन्त भयंकर बाण कर्णकी भुजाओंसे प्रेरित हो उसके धनुष और प्रत्यंचासे छूटकर आकाशमें जाते ही प्रज्वलित हो उठा ॥ तं प्रेक्ष्य दीप्तं युधि माधवस्तु त्वरान्वितं सत्वरयैव लीलया । पदा विनिष्पिष्य रथोत्तमं स प्रावेशयत् पृथिवीं किंचिदेव ॥ २ ९ ॥ क्षितिं गता जानुभिस्तेऽथ वाहा हेमच्छन्नाश्चन्द्रमरीचिवर्णाः । ततोऽन्तरिक्षे सुमहान् निनादः सम्पूजनार्थं मधुसूदनस्य ॥ ३० ॥
दिव्याश्च वाचः सहसा बभूवु- र्दिव्यानि पुष्पाण्यथ सिंहनादाः । तस्मिंस्तथा वै धरणीं निमग्ने रथे प्रयत्नान्मधुसूदनस्य ॥ ३१ ॥
उस प्रज्वलित बाणको बड़े वेगसे आते देख भगवान् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें खेल- सा करते हुए अपने उत्तम रथको तुरंत ही पैरसे दबाकर उसके पहियोंका कुछ भाग पृथ्वीमें धँसा दिया । साथ ही सोनेके साज- बाजसे ढके हुए चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेतवर्णवाले उनके घोड़े भी धरतीपर घुटने टेककर झुक गये । उस समय आकाशमें सब ओर महान् कोलाहल गूँज उठा । भगवान् मधुसूदनकी स्तुति प्रशंसाके लिये कहे गये दिव्य वचन सहसा सुनायी देने लगे । श्रीमधुसूदनके प्रयत्नसे उस रथके धरतीमें धँस जानेपर भगवान्के ऊपर दिव्यपुष्पोंकी वर्षा होने लगी और दिव्य सिंहनाद भी प्रकट होने लगे ॥ २ ९ –३१ ॥ ततः शरः सोऽभ्यहनत् किरीटं तस्येन्द्रदत्तं सुदृढं च धीमतः ।
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अथार्जुनस्योत्तमगात्रभूषणं धरावियद्द्योसलिलेषु विश्रुतम् ॥ ३२ ॥
बुद्धिमान् अर्जुनके मस्तकको विभूषित करनेवाला किरीट भूतल, अन्तरिक्ष, स्वर्ग और वरुणलोकमें भी विख्यात था । वह मुकुट उन्हें इन्द्रने प्रदान किया था । कर्णका चलाया हुआ वह सर्पमुख बाण रथ नीचा हो जानेके कारण अर्जुनके उसी किरीटमें जा लगा ॥ ३२ ॥
व्यालास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभिः शरेण मूर्ध्नः प्रजहार सूतजः । दिवाकरेन्दुज्वलनप्रभत्विषं सुवर्णमुक्तामणिवज्रभूषितम् ॥ ३३ ॥
सूतपुत्र कर्णने सर्पमुख बाणके निर्माणकी सफलता, उत्तम प्रयत्न और क्रोध — इन सबके सहयोगसे जिस बाणका प्रयोग किया था, उसके द्वारा अर्जुनके मस्तकसे उस किरीटको नीचे गिरा दिया, जो सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके समान कान्तिमान् तथा सुवर्ण, मुक्ता, मणि एवं हीरोंसे विभूषित था ॥ ३३ ॥
पुरन्दरार्थं तपसा प्रयत्नतः स्वयं कृतं यद् विभुना स्वयम्भुवा । महार्हरूपं द्विषतां भयंकरं बिभर्तुरत्यर्थसुखं सुगन्धिनम् ॥ ३४ ॥
जिघांसते देवरिपून् सुरेश्वरः स्वयं ददौ यत् सुमनाः किरीटिने । हराम्बुपाखण्डलवित्तगोप्तृभिः पिनाकपाशाशनिसायकोत्तमैः ॥ ३५ ॥
सुरोत्तमैरप्यविषह्यमर्दितुं प्रसह्य नागेन जहार तद् वृषः । स दुष्टभावो वितथप्रतिज्ञः किरीटमत्यद्भुतमर्जुनस्य ॥ ३६ ॥
नागो महाईं तपनीयचित्रं पार्थोत्तमाङ्गात् प्रहरत् तरस्वी ।
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ब्रह्माजीने तपस्या और प्रयत्न करके देवराज इन्द्रके लिये स्वयं ही जिसका निर्माण किया था, जिसका स्वरूप बहुमूल्य, शत्रुओंके लिये भयंकर, धारण करनेवालेके लिये अत्यन्त सुखदायक तथा परम सुगन्धित था, दैत्योंके वधकी इच्छावाले किरीटधारी अर्जुनको स्वयं देवराज इन्द्रने प्रसन्नचित्त होकर जो किरीट प्रदान किया था, भगवान् शिव, वरुण, इन्द्र और कुबेर– ये देवेश्वर भी अपने पिनाक, पाश, वज्र और बाणरूप उत्तम अस्त्रोंद्वारा जिसे नष्ट नहीं कर सकते थे, उसी दिव्य मुकुटको कर्णने अपने सर्पमुख बाणद्वारा बलपूर्वक हर लिया । मनमें दुर्भाव रखनेवाले उस मिथ्याप्रतिज्ञ तथा वेगशाली नागने अर्जुनके मस्तकसे उसी अत्यन्त अद्भुत, बहुमूल्य और सुवर्णचित्रित मुकुटका अपहरण कर लिया था ॥ ३४–३६३ ॥ तद्धेमजालावततं सुघोषं जाज्वल्यमानं निपपात भूमौ ॥ ३७ ॥
तदुत्तमेषून्मथितं विषाग्निना प्रदीप्तमर्चिष्मदथो क्षितौ प्रियम् । पपात पार्थस्य किरीटमुत्तमं दिवाकरोऽस्तादिव रक्तमण्डलः ॥ ३८ ॥
सोनेकी जालीसे व्याप्त वह जगमगाता हुआ मुकुट धमाकेकी आवाजके साथ धरतीपर जा गिरा । जैसे अस्ताचलसे लाल रंगके मण्डलवाला सूर्य नीचे गिरता है, उसी प्रकार पार्थका वह प्रिय, उत्तम एवं तेजस्वी किरीट पूर्वोक्त श्रेष्ठ बाणसे मथित और विषाग्निसे प्रज्वलित हो पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३७-३८ ॥ स वै किरीटं बहुरत्नभूषितं जहार नागोऽर्जुनमूर्धतो बलात् । गिरेः सुजाताङ्कुरपुष्पितद्रुमं महेन्द्रवज्रः शिखरोत्तमं यथा ॥ ३ ९ ॥ उस नागने नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित पूर्वोक्त किरीटको अर्जुनके मस्तकसे उसी प्रकार बलपूर्वक हर लिया, जैसे इन्द्रका वज्र वृक्षों और लताओंके नवजात अंकुरों तथा पुष्पशाली वृक्षोंसे सुशोभित पर्वतके उत्तम शिखरको नीचे गिरा देता है ॥ ३ ९ ॥ महीवियद्द्द्घोसलिलानि वायुना यथा विरुग्णानि नदन्ति भारत । तथैव शब्दं भुवनेषु तं तदा जना व्यवस्यन् व्यथिताश्च चस्खलुः ॥ ४० ॥
भारत! जैसे पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग और जल- ये वायुद्वारा वेगपूर्वक संचालित हो महान् शब्द करने लगते हैं, उस समय वहाँ जगत्के सब लोगोंने वैसे ही शब्दका अनुभव किया और व्यथित होकर सभी अपने - अपने स्थानसे लड़खड़ाकर गिर पड़े ॥ ४० ॥
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विना किरीटं शुशुभे स पार्थः श्यामो युवा नील इवोच्चशृङ्गः ॥ ततः समुद्ग्रथ्य सितेन वाससा स्वमूर्धजानव्यथितस्तदार्जुनः । विभासितः सूर्यमरीचिना दृढं शिरोगतेनोदयपर्वतो यथा ॥ ४१ ॥
मुकुट गिर जानेपर श्यामवर्ण, नवयुवक अर्जुन ऊँचे शिखरवाले नीलगिरिके समान शोभा पाने लगे । उस समय उन्हें तनिक भी व्यथा नहीं हुई । वे अपने केशोंको सफेद वस्त्रसे बाँधकर युद्धके लिये डटे रहे । श्वेत वस्त्रसे केश बाँधनेके कारण वे शिखरपर फैली हुई सूर्यदेवकी किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले उदयाचलके समान सुशोभित हुए ॥ गोकर्णा सुमुखी कृतेन इषुणा गोपुत्रसम्प्रेषिता गोशब्दात्मजभूषणं सुविहितं सुव्यक्तगोऽसुप्रभम् । दृष्ट्वा गोगतकं जहार मुकुटं गोशब्दगोपूरि वै गोकर्णासनमर्दनश्च न ययावप्राप्य मृत्योर्वशम् ॥ ४२ ॥
अंशुमाली सूर्यके पुत्र कर्णने जिसे चलाया था, जो अपने ही द्वारा उत्पादित एवं सुरक्षित बाणरूपधारी पुत्रके रूपमें मानो स्वयं उपस्थित हुई थी, गौ अर्थात् नेत्रेन्द्रियसे कानोंका काम लेनेके कारण जो गोकर्णा (चक्षुःश्रवा ) और मुखसे पुत्रकी रक्षा करनेके कारण सुमुखी कही गयी है, उस सर्पिणीने तेज और प्राणशक्तिसे प्रकाशित होनेवाले अर्जुनके मस्तकको घोड़ोंकी लगामके सामने लक्ष्य करके ( चलनेपर भी रथ नीचा होनेसे उसे न पाकर) उनके उस मुकुटको ही हर लिया, जिसे ब्रह्माजीने स्वयं सुन्दररूपसे इन्द्रके मस्तकका भूषण बनाया था और जो सूर्यसदृश किरणोंकी प्रभासे जगत्को परिपूर्ण ( प्रकाशित ) करनेवाला था । उक्त सर्पको अपने बाणोंकी मारसे कुचल देनेवाले अर्जुन उसे पुनः आक्रमणका अवसर न देनेके कारण मृत्युके अधीन नहीं हुए ॥ ४२ ॥
स सायकः कर्णभुजप्रसृष्टो हुताशनार्कप्रतिमो महाईः । महोरगः कृतवैरोऽर्जुनेन किरीटमाहत्य ततो व्यतीयात् ॥ ४३ ॥
कर्णके हाथोंसे छूटा हुआ वह अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, बहुमूल्य बाण, जो वास्तवमें अर्जुनके साथ वैर रखनेवाला महानाग था, उनके किरीटपर आघात करके पुनः वहाँसे लौट पड़ा ॥ ४३ ॥
तं चापि दग्ध्वा तपनीयचित्रं किरीटमाकृष्य तदर्जुनस्य । इयेष गन्तुं पुनरेव तूणं