04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2361–2370
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2361–2370
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दृष्टश्च कर्णेन ततोऽब्रवीत् तम् ॥ ४४ ॥
अर्जुनका वह मुकुट सुवर्णमय होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करता था । उसे खींचकर अपनी विषाग्निसे दग्ध करके वह सर्प पुनः कर्णके तरकसमें घुसना ही चाहता था
कि कर्णकी दृष्टि उसपर पड़ गयी । तब उसने कर्णसे कहा— ॥ ४४ ॥
मुक्तस्त्वयाहं त्वसमीक्ष्य कर्ण शिरो हृतं यन्न मयार्जुनस्य । समीक्ष्य मां मुञ्च रणे त्वमाशु हन्तास्मि शत्रुं तव चात्मनश्च ॥ ४५ ॥
‘ कर्ण! तुमने अच्छी तरह सोच-विचारकर मुझे नहीं छोड़ा था; इसीलिये मैं अर्जुनके मस्तकका अपहरण न कर सका । अब पुनः सोच-समझकर, ठीकसे निशाना साधकर रणभूमिमें शीघ्र ही मुझे छोड़ो, तब मैं अपने और तुम्हारे उस शत्रुका वध कर डालूँगा' ॥ ४५ ॥
स एवमुक्तो युधि सूतपुत्र- स्तमब्रवीत् को भवानुग्ररूपः । नागोऽब्रवीद् विद्धि कृतागसं मां पार्थेन मातुर्वधजातवैरम् ॥ ४६ ॥
यदि स्वयं वज्रधरोऽस्य गोप्ता तथापि याता पितृराजवेश्मनि । युद्धस्थलमें उस नागके ऐसा कहनेपर सूतपुत्र कर्णने उससे पूछा -' पहले यह तो बताओ कि ऐसा भयानक रूप धारण करनेवाले तुम हो कौन? ' तब नागने कहा — ‘ अर्जुनने मेरा अपराध किया है। मेरी माताका उनके द्वारा वध होनेके कारण मेरा उनसे वैर हो गया है । तुम मुझे नाग समझो । यदि साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी अर्जुनकी रक्षाके लिये आ जायँ तो भी आज अर्जुनको यमलोकमें जाना ही पड़ेगा' ॥ ४६३ ॥
कर्णउवाच नाग कर्णोऽद्य रणे परस्य बलं समास्थाय जयं बुभूषेत् ॥ ४७ ॥
न संदध्यां द्विः शरं चैव नाग यद्यर्जुनानां शतमेव हन्याम् । कर्ण बोला — नाग! आज रणभूमिमें कर्ण दूसरेके बलका सहारा लेकर विजय पाना नहीं चाहता है । नाग! मैं सौ अर्जुनको मार सकूँ तो भी एक बाणका दो बार संधान नहीं कर सकता ॥ ४७ ॥
तमाह कर्णः पुनरेव नागं
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तदाऽऽजिमध्ये रविसूनुसत्तमः ॥ ४८ ॥
व्यालास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभि- र्हन्तास्मि पार्थं सुसुखी व्रज त्वम् । इतना कहकर सूर्यके श्रेष्ठ पुत्र कर्णने युद्धस्थलमें उस नागसे फिर इस प्रकार कहा — ' मेरे पास सर्पमुख बाण है। मैं उत्तम यत्न कर रहा हूँ और मेरे मनमें अर्जुनके प्रति पर्याप्त रोष भी है; अतः मैं स्वयं ही पार्थको मार डालूँगा । तुम सुखपूर्वक यहाँसे पधारो ' ॥ इत्येवमुक्तो युधि नागराजः कर्णेन रोषादसहंस्तस्य वाक्यम् ॥ ४ ९ ॥ स्वयं प्रायात् पार्थवधाय राजन् कृत्वा स्वरूपं विजिघांसुरुग्रः । राजन्! युद्धस्थलमें कर्णके द्वारा इस प्रकार टका- सा उत्तर पाकर वह नागराज रोषपूर्वक उसके इस वचनको सहन न कर सका । उस उग्र सर्पने अपने स्वरूपको प्रकट करके मनमें प्रतिहिंसाकी भावना लेकर पार्थके वधके लिये स्वयं ही उनपर आक्रमण किया ॥ ४ ९ ३ ॥ ततः कृष्णः पार्थमुवाच संख्ये महोरगं कृतवैरं जहि त्वम् ॥ ५० ॥
स एवमुक्तो मधुसूदनेन गाण्डीवधन्वा रिपुवीर्यसाहः । उवाच को ह्येष ममाद्य नागः स्वयं स आयाद् गरुडस्य वक्त्रम् ॥ ५१ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें अर्जुनसे कहा- ' यह विशाल नाग तुम्हारा वैरी है । तुम इसे मार डालो ’ । भगवान् मधुसूदनके ऐसा कहनेपर शत्रुओंके बलका सामना करनेवाले गाण्डीवधारी अर्जुनने पूछा- ' प्रभो! आज मेरे पास आनेवाला यह नाग कौन है? जो स्वयं ही गरुड़के मुखमें चला आया है ' ॥ ५०-५१ ॥ कृष्णउवाच योऽसौ त्वया खाण्डवे चित्रभानुं संतर्पयाणेन धनुर्धरेण । वियद्गतो जननीगुप्तदेहो मत्वैकरूपं निहतास्य माता ॥ ५२ ॥
श्रीकृष्णने कहा- अर्जुन! खाण्डव वनमें जब तुम हाथमें धनुष लेकर अग्निदेवको तृप्त कर रहे थे, उस समय यही सर्प अपनी माताके मुँहमें घुसकर अपने शरीरको सुरक्षित
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करके आकाशमें उड़ा जा रहा था । तुमने उसे एक ही सर्प समझकर केवल इसकी माताका वध किया था ॥ स एष तद् वैरमनुस्मरन् वै त्वां प्रार्थयत्यात्मवधाय नूनम् । नभश्च्युतां प्रज्वलितामिवोल्कां पश्यैनमायान्तममित्रसाह ॥ ५३ ॥
उसी वैरको याद करके यह अवश्य अपने वधके लिये ही तुमसे भिड़ना चाहता है ।
शत्रुसूदन! आकाशसे गिरती हुई प्रज्वलित उल्काके समान आते हुए इस सर्पको देखो ॥
संजय उवाच ततः स जिष्णुः परिवृत्य रोषा- च्चिच्छेद षड्भिर्निशितैः सुधारैः । नागं वियत्तिर्यगिवोत्पतन्तं स च्छिन्नगात्रो निपपात भूमौ ॥ ५४ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! तब अर्जुनने रोषपूर्वक घूमकर उत्तम धारवाले छः तीखे बाणोंद्वारा आकाशमें तिरछी गतिसे उड़ते हुए उस नागके टुकड़े - टुकड़े कर डाले । शरीर टूक- टूक हो जानेके कारण वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ हते च तस्मिन् भुजगे किरीटिना स्वयं विभुः पार्थिव भूतलादथ । समुज्जहाराशु पुनः पतन्तं रथं भुजाभ्यां पुरुषोत्तमस्ततः ॥ ५५ ॥
राजन्! किरीटधारी अर्जुनके द्वारा उस सर्पके मारे जानेपर स्वयं भगवान् पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने उस नीचे धँसते हुए रथको पुनः अपनी दोनों भुजाओंसे शीघ्र ही ऊपर उठा दिया ॥ तस्मिन् मुहूर्ते दशभिः पृषत्कैः शिलाशितैर्बर्हिणबर्हवाजितैः । विव्याध कर्णः पुरुषप्रवीरो धनंजयं तिर्यगवेक्षमाणः ॥ ५६ ॥
उस मुहूर्तमें नरवीर कर्णने धनंजयकी ओर तिरछी दृष्टिसे देखते हुए मयूरपंखसे युक्त, शिलापर तेज किये हुए, दस बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया ॥ ५६ ॥
ततोऽर्जुनो द्वादशभिः सुमुक्तै- र्वराहकर्णैर्निशितैः समर्प्य । नाराचमाशीविषतुल्यवेग-
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माकर्णपूर्णायतमुत्ससर्ज ॥ ५७ ॥
तब अर्जुनने अच्छी तरह छोड़े हुए बारह बराहकर्ण नामक पैने बाणोंद्वारा कर्णको घायल करके पुनः विषधर सर्पके तुल्य एक वेगशाली नाराचको कानतक खींचकर उसकी ओर छोड़ दिया ॥ ५७ ॥
स चित्रवर्मेषुवरो विदार्य प्राणान्निरस्यन्निव साधुमुक्तः । कर्णस्य पीत्वा रुधिरं विवेश वसुन्धरां शोणितदिग्धवाजः ॥ ५८ ॥
भलीभाँति छूटे हुए उस उत्तम नाराचने कर्णके विचित्र कवचको चीर-फाड़कर उसके प्राण निकालते हुए - से रक्तपान किया, फिर वह धरतीमें समा गया । उस समय उसके पंख खूनसे लथपथ हो रहे थे ॥ ५८ ॥
ततो वृषो बाणनिपातकोपितो महोरगो दण्डविघट्टितो यथा । तदाशुकारी व्यसृजच्छरोत्तमान् महाविषः सर्प इवोत्तमं विषम् ॥ ५ ९ ॥ तब उस बाणके प्रहारसे क्रोधमें भरे हुए शीघ्रकारी कर्णने लाठीकी चोट खाये हुए महान् सर्पके समान तिलमिलाकर उसी प्रकार उत्तम बाणोंका प्रहार आरम्भ किया, जैसे महाविषैला सर्प अपने उत्तम विषका वमन करता है ॥ जनार्दनं द्वादशभिः पराभिन- नवैर्नवत्या च शरैस्तथार्जुनम् । शरेण घोरेण पुनश्च पाण्डवं विदार्य कर्णो व्यनदज्जहास च ॥ ६० ॥
उसने बारह बाणोंसे श्रीकृष्णको और निन्यानबे बाणोंसे अर्जुनको अच्छी तरह घायल किया । तत्पश्चात् एक भयंकर बाणसे पाण्डुपुत्र अर्जुनको पुनः क्षत- विक्षत करके कर्ण सिंहके समान दहाड़ने और हँसने लगा ॥ ६० ॥
तमस्य हर्षं ममृषे न पाण्डवो
बिभेद मर्माणि ततोऽस्य मर्मवित् ।
परःशतैः पत्रिभिरिन्द्रविक्रम- स्तथा यथेन्द्रो बलमोजसा रणे ॥ ६१ ॥
उसके उस हर्षको पाण्डुपुत्र अर्जुन सहन न कर सके । वे उसके मर्मस्थलोंको जानते थे और इन्द्रके समान पराक्रमी थे। अतः जैसे इन्द्रने रणभूमिमें बलासुरको बलपूर्वक आहत किया था, उसी प्रकार अर्जुनने सौसे भी अधिक बाणोंद्वारा कर्णके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर दिया ॥ ६१ ॥
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ततः शराणां नवतिं तदार्जुनः ससर्ज कर्णेऽन्तकदण्डसंनिभाम् । तैः पत्रिभिर्विद्धतनुः स विव्यथे तथा यथा वज्रविदारितोऽचलः ॥ ६२ ॥
तदनन्तर अर्जुनने यमदण्डके समान भयंकर नब्बे बाण कर्णपर छोड़े । उन पंखवाले बाणोंसे उसका सारा शरीर बिंध गया तथा वह वज्रसे विदीर्ण किये हुए पर्वतके समान व्यथित हो उठा ॥ ६२ ॥
मणिप्रवेकोत्तमवज्रहाटकै-
रलंकृतं चास्य वराङ्गभूषणम् ।
प्रविद्धमुर्व्यां निपपात पत्रिभि- र्धनंजयेनोत्तमकुण्डलेऽपि च ॥ ६३ ॥
उत्तम मणियों, हीरों और सुवर्णसे अलंकृत कर्णके मस्तकका आभूषण मुकुट और उसके दोनों उत्तम कुण्डल भी अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ महाधनं शिल्पिवरैः प्रयत्नतः कृतं यदस्योत्तमवर्म भास्वरम् । सुदीर्घकालेन ततोऽस्य पाण्डवः क्षणेन बाणैर्बहुधा व्यशातयत् ॥ ६४ ॥
अच्छे - अच्छे शिल्पियोंने कर्णके जिस उत्तम बहुमूल्य और तेजस्वी कवचको दीर्घकालमें बनाकर तैयार किया था, उसके उसी कवचके पाण्डुपुत्र अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा क्षणभरमें बहुत- से टुकड़े कर डाले ॥ ६४ ॥
स तं विवर्माणमथोत्तमेषुभिः शितैश्चतुर्भिः कुपितः पराभिनत् । स विव्यथेऽत्यर्थमरिप्रताडितो यथातुरः पित्तकफानिलज्वरैः ॥ ६५ ॥
कवच कट जानेपर कर्णको कुपित हुए अर्जुनने चार उत्तम तीखे बाणोंसे पुनः क्षत-विक्षत कर दिया । शत्रुके द्वारा अत्यन्त घायल किये जानेपर कर्ण वात, पित्त और कफ सम्बन्धी ज्वर ( त्रिदोष या सन्निपात ) -से आतुर हुए मनुष्यकी भाँति अधिक पीड़ाका अनुभव करने लगा ॥ महाधनुर्मण्डलनिःसृतैः शितैः
क्रियाप्रयत्नप्रहितैर्बलेन च ।
ततक्ष कर्णं बहुभिः शरोत्तमै- र्बिभेद मर्मस्वपि चार्जुनस्त्वरन् ॥ ६६ ॥
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अर्जुनने उतावले होकर क्रिया, प्रयत्न और बलपूर्वक छोड़े गये तथा विशाल धनुर्मण्डलसे छूटे हुए बहुसंख्यक पैने और उत्तम बाणोंद्वारा कर्णके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचाकर उसे विदीर्ण कर दिया ॥ ६६ ॥
दृढाहतः पत्रिभिरुग्रवेगैः पार्थेन कर्णो विविधैः शिताग्रैः । बभौ गिरिर्गैरिकधातुरक्तः क्षरन् प्रपातैरिव रक्तमम्भः ॥ ६७ ॥
अर्जुनके भयंकर वेगशाली और तेजधारवाले नाना प्रकारके बाणोंद्वारा गहरी चोट खाकर कर्ण अपने अंगोंसे रक्तकी धारा बहाता हुआ उस पर्वतके समान सुशोभित हुआ, जो गेरु आदि धातुओंसे रँगा होनेके कारण अपने झरनोंसे लाल पानी बहाया करता है ॥ ६७ ॥
ततोऽर्जुनः कर्णमवक्रगैर्नवैः सुवर्णपुङ्खैः सुदृढैरयस्मयैः । यमाग्निदण्डप्रतिमैः स्तनान्तरे पराभिनत् क्रौञ्चमिवाद्रिमग्निजः ॥ ६८ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने सोनेके पंखवाले लोहनिर्मित, सुदृढ़ तथा यमदण्ड और अग्निदण्डके तुल्य भयंकर बाणोंद्वारा कर्णकी छातीको उसी प्रकार विदीर्ण कर डाला, जैसे कुमार कार्तिकेयने क्रौंच पर्वतको चीर डाला था ॥ ६८ ॥
ततः शरावापमपास्य सूतजो धनुश्च तच्छक्रशरासनोपमम् । ततो रथस्थः स मुमोह च स्खलन् प्रशीर्णमुष्टिः सुभृशाहतः प्रभो ॥ ६ ९ ॥ प्रभो! अत्यन्त आहत हो जानेके कारण सूतपुत्र कर्ण तरकस और इन्द्रधनुषके समान अपना धनुष छोड़कर रथपर ही लड़खड़ाता हुआ मूर्च्छित हो गया । उस समय उसकी मुट्ठी ढीली हो गयी थी ॥ ६ ९ ॥
न चार्जुनस्तं व्यसने तदेषिवा- न्निहन्तुमार्यः पुरुषव्रते स्थितः ।
ततस्तमिन्द्रावरजः सुसम्भ्रमा- दुवाच किं पाण्डव हे प्रमाद्यसे ॥ ७० ॥
राजन्! अर्जुन सत्पुरुषोंके व्रतमें स्थित रहनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य हैं; अतः उन्होंने उस संकटके समय कर्णको मारनेकी इच्छा नहीं की । तब इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीकृष्णने बड़े वेगसे कहा — ' पाण्डुनन्दन! तुम लापरवाही क्यों दिखाते हो? ॥ ७० ॥
नैवाहितानां सततं विपश्चितः
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क्षणं प्रतीक्षन्त्यपि दुर्बलीयसाम् । विशेषतोऽरीन् व्यसनेषु पण्डितो निहत्य धर्मं च यशश्च विन्दते ॥ ७१ ॥
'विद्वान् पुरुष कभी दुर्बल - से- दुर्बल शत्रुओंको भी नष्ट करनेके लिये किसी अवसरकी प्रतीक्षा नहीं करते । विशेषतः संकटमें पड़े हुए शत्रुओंको मारकर बुद्धिमान् पुरुष धर्म और यशका भागी होता है ॥ ७१ ॥
तदेकवीरं तव चाहितं सदा त्वरस्व कर्णं सहसाभिमर्दितुम् । पुरा समर्थः समुपैति सूतजो भिन्धि त्वमेनं नमुचिं यथा हरिः ॥ ७२ ॥
‘ इसलिये सदा तुमसे शत्रुता रखनेवाले इस अद्वितीय वीर कर्णको सहसा कुचल डालनेके लिये तुम शीघ्रता करो । सूतपुत्र कर्ण शक्तिशाली होकर आक्रमण करे, इसके पहले ही तुम इसे उसी प्रकार मार डालो, जैसे इन्द्रने नमुचिका वध किया था' ॥ ७२ ॥
ततस्तदेवेत्यभिपूज्य सत्वरं
जनार्दनं कर्णमविध्यदर्जुनः ।
शरोत्तमैः सर्वकुरूत्तमस्त्वरं- स्तथा यथा शम्बरहा पुरा बलिम् ॥ ७३ ॥
‘ अच्छा, ऐसा ही होगा ' यों कहकर श्रीकृष्णका समादर करते हुए सम्पूर्ण कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष अर्जुन उत्तम बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक कर्णको उसी प्रकार बींधने लगे, जैसे पूर्वकालमें शम्बर- शत्रु इन्द्रने राजा बलिपर प्रहार किया था ॥ ७३ ॥
साश्वं तु कर्णं सरथं किरीटी समाचिनोद् भारत वत्सदन्तैः । प्रच्छादयामास दिशश्च बाणैः सर्वप्रयत्नात्तपनीयपुङ्खैः ॥ ७४ ॥
भरतनन्दन! किरीटधारी अर्जुनने घोड़ों और रथसहित कर्णके शरीरको वत्सदन्त नामक बाणोंसे भर दिया । फिर सारी शक्ति लगाकर सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ७४ ॥
स वत्सदन्तैः पृथुपीनवक्षाः
समाचितः सोऽधिरथिर्विभाति ।
सुपुष्पिताशोकपलाशशाल्मलि- र्यथाचलश्चन्दनकाननायुतः ॥ ७५ ॥
चौड़े और मोटे वक्षःस्थलवाले अधिरथपुत्र कर्णका शरीर वत्सदन्तनामक बाणोंसे व्याप्त होकर खिले हुए अशोक, पलाश, सेमल और चन्दनवनसे युक्त पर्वतके समान
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सुशोभित होने लगा ॥ ७५ ॥
शरैः शरीरे बहुभिः समर्पितै- विभाति कर्णः समरे विशाम्पते । महीरुहैराचितसानुकन्दरो यथा गिरीन्द्रः स्फुटकर्णिकारवान् ॥ ७६ ॥
प्रजानाथ! कर्णके शरीरमें बहुत- से बाण धँस गये थे । उनके द्वारा समरांगणमें उसकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे वृक्षोंसे व्याप्त शिखर और कन्दरावाले गिरिराजके ऊपर लाल कनेरके फूल खिलनेसे उसकी शोभा होती है ॥ स बाणसङ्घान् बहुधा व्यवासृजद् विभाति कर्णः शरजालरश्मिवान् । सलोहितो रक्तगभस्तिमण्डलो दिवाकरोऽस्ताभिमुखो यथा तथा ॥ ७७ ॥
तदनन्तर कर्ण ( सावधान होकर) शत्रुओंपर बहुत- से बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा । उस समय जैसे अस्ताचलकी ओर जाते हुए सूर्यमण्डल और उसकी किरणें लाल हो जाती हैं, उसी प्रकार खूनसे लाल हुआ वह शरसमूहरूपी किरणोंसे सुशोभित हो रहा था ॥ बाह्वन्तरादाधिरथेर्विमुक्तान् बाणान् महाहीनिव दीप्यमानान् । व्यध्वंसयन्नर्जुनबाहुमुक्ताः शराः समासाद्य दिशः शिताग्राः ॥ ७८ ॥
कर्णकी भुजाओंसे छूटकर बड़े -बड़े सर्पोंके समान प्रकाशित होनेवाले बाणोंको अर्जुनके हाथोंसे छूटे हुए तीखे बाणोंने सम्पूर्ण दिशाओंमें फैलकर नष्ट कर दिया ॥ ततः स कर्णः समवाप्य धैर्यं बाणान् विमुञ्चन् कुपिताहिकल्पान् । विव्याध पार्थं दशभिः पृषत्कैः कृष्णं च षड्भिः कुपिताहिकल्पैः ॥ ७ ९ ॥ तदनन्तर कर्ण धैर्य धारण करके कुपित सर्पोंके समान भयंकर बाण छोड़ने लगा । उसने क्रोधमें भरे हुए भुजंगमोंके सदृश दस बाणोंसे अर्जुनको और छः से श्रीकृष्णको भी घायल कर दिया ॥ ७९ ॥
ततः किरीटी भृशमुग्रनिःस्वनं महाशरं सर्पविषानलोपमम् । अयस्मयं रौद्रमहास्त्रसम्भृतं महाहवे क्षेप्तुमना महामतिः ॥ ८० ॥
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तब परम बुद्धिमान् किरीटधारी अर्जुनने उस महासमरमें कर्णपर भयानक शब्द करनेवाले, सर्पविष और अग्निके समान तेजस्वी लोहनिर्मित तथा महारौद्रास्त्रसे अभिमन्त्रित विशाल बाण छोड़नेका विचार किया ॥ ८० ॥
कालो ह्यदृश्यो नृप विप्रकोपा- न्निदर्शयन् कर्णवधं ब्रुवाणः ।
भूमिस्तु चक्रं ग्रसतीत्यवोचत्- कर्णस्य तस्मिन् वधकाल आगते ॥ ८१ ॥
नरेश्वर! उस समय काल अदृश्य रहकर ब्राह्मणके क्रोधसे कर्णके वधकी सूचना देता हुआ उसकी मृत्युका समय उपस्थित होनेपर इस प्रकार बोला - ' अब भूमि तुम्हारे पहियेको निगलना ही चाहती है ' ॥ ८१ ॥
ततस्तदस्त्रं मनसः प्रणष्टं यद् भार्गवोऽस्मै प्रददौ महात्मा । चक्रं च वामं ग्रसते भूमिरस्य प्राप्ते तस्मिन् वधकाले नृवीर ॥ ८२ ॥
नरवीर! अब कर्णके वधका समय आ पहुँचा था । महात्मा परशुरामने कर्णको जो भार्गवास्त्र प्रदान किया था, वह उस समय उसके मनसे निकल गया— उसे उसकी याद न रह सकी । साथ ही, पृथ्वी उसके रथके बायें पहियेको निगलने लगी ॥ ८२ ॥
ततो रथो घूर्णितवान् नरेन्द्र शापात्तदा ब्राह्मणसत्तमस्य । ततश्चक्रमपतत्तस्य भूमौ स विह्वलः समरे सूतपुत्रः ॥ ८३ ॥
नरेन्द्र! श्रेष्ठ ब्राह्मणके शापसे उस समय उसका रथ डगमगाने लगा और उसका पहिया पृथ्वीमें धँस गया । यह देख सूतपुत्र कर्ण समरांगणमें व्याकुल हो उठा ॥ सवेदिकश्चैत्य इवातिमात्रः सुपुष्पितो भूमितले निमग्नः । घूर्णे रथे ब्राह्मणस्याभिशापाद् रामादुपात्ते त्वविभाति चास्त्रे ॥ ८४ ॥
छिन्ने शरे सर्पमुखे च घोरे पार्थेन तस्मिन् विषसाद कर्णः । अमृष्यमाणो व्यसनानि तानि हस्तौ विधुन्वन् स विगर्हमाणः ॥ ८५ ॥
जैसे सुन्दर पुष्पोंसे युक्त विशाल चैत्यवृक्ष वेदीसहित पृथ्वीमें धँस जाय, वही दशा उस रथकी भी हुई। ब्राह्मणके शापसे जब रथ डगमग करने लगा, परशुरामजीसे प्राप्त हुआ
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अस्त्र भूल गया और घोर सर्पमुख बाण अर्जुनके द्वारा काट डाला गया, तब उस अवस्थामें उन संकटोंको सहन न कर सकनेके कारण कर्ण खिन्न हो उठा और दोनों हाथ हिला-हिलाकर धर्मकी निन्दा करने लगा ॥ ८४-८५ ॥ धर्मप्रधानं किल पाति धर्म इत्यब्रुवन् धर्मविदः सदैव । वयं च धर्मे प्रयताम नित्यं चर्तुं यथाशक्ति यथाश्रुतं च । स चापि निघ्नाति न पाति भक्तान् मन्ये न नित्यं परिपाति धर्मः ॥ ८६ ॥
' धर्मज्ञ पुरुषोंने सदा ही यह बात कही है कि ' धर्मपरायण पुरुषकी धर्म सदा रक्षा करता है । हम अपनी शक्ति और ज्ञानके अनुसार सदा धर्मपालनके लिये प्रयत्न करते रहते हैं, किंतु वह भी हमें मारता ही है, भक्तोंकी रक्षा नहीं करता; अतः मैं समझता हूँ, धर्म सदा किसीकी रक्षा नहीं करता है ' ॥ ८६ ॥
एवं ब्रुवन् प्रस्खलिताश्वसूतो विचाल्यमानोऽर्जुनबाणपातैः । मर्माभिघाताच्छिथिलः क्रियासु पुनः पुनर्धर्ममसौ जगर्ह ॥ ८७ ॥
ऐसा कहता हुआ कर्ण जब अर्जुनके बाणोंकी मारसे विचलित हो उठा, उसके घोड़े और सारथि लड़खड़ाकर गिरने लगे और मर्मपर आघात होनेसे वह कार्य करनेमें शिथिल हो गया तब बारंबार धर्मकी ही निन्दा करने लगा ॥ ८७ ॥
ततः शरैर्भीमतरैरविध्यत् त्रिभिराहवे ।
हस्ते कृष्णं तथा पार्थमभ्यविध्यच्च सप्तभिः ॥ ८८ ॥
तदनन्तर उसने तीन भयानक बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें श्रीकृष्णके हाथमें चोट पहुँचायी और अर्जुनको भी सात बाणोंसे बींध डाला ॥ ८८ ॥
ततोऽर्जुनः सप्तदश तिग्मवेगानजिह्मगान् ।
इन्द्राशनिसमान् घोरानसृजत् पावकोपमान् ॥ ८ ९ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने इन्द्रके वज्र तथा अग्निके समान प्रचण्ड वेगशाली सत्रह घोर बाण कर्णपर छोड़े ॥ ८ ९ ॥
निर्भिद्य ते भीमवेगा ह्यपतन् पृथिवीतले ।
कम्पितात्मा ततः कर्णः शक्त्या चेष्टामदर्शयत् ॥ ९ ० ॥
वे भयानक वेगशाली बाण कर्णको घायल करके पृथ्वीपर गिर पड़े । इससे कर्ण काँप उठा । फिर भी यथाशक्ति युद्धकी चेष्टा दिखाता रहा ॥ ९ ० ॥ बलेनाथ स संस्तभ्य ब्रह्मास्त्रं समुदैरयत् ।