04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2441–2450

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2441–2450

पृष्ठ 2441

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एकोऽप्येषां महाराज समर्थः संनिवारणे ।

समरे पाण्डवेयानां संक्रुद्धो ह्यभिधावताम् ॥ २४ ॥

किं पुनः सहिता वीराः कृतवैराश्च पाण्डवैः । ‘ महाराज! मेरे इन सहयोगियोंमेंसे एक-एक वीर भी समरांगणमें कुपित होकर मुझपर आक्रमण करनेवाले समस्त पाण्डवोंको रोकनेमें समर्थ हैं । फिर यदि पाण्डवोंके साथ वैर रखनेवाले ये सारे वीर एक साथ होकर युद्ध करें तब क्या नहीं कर सकते ॥ २४ ॥

अथवा सर्व एवैते पाण्डवस्यानुयायिभिः ॥ २५ ॥

योत्स्यन्ते सह राजेन्द्र हनिष्यन्ति च तान् मृधे । ‘ राजेन्द्र! अथवा ये सभी योद्धा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके अनुयायियोंके साथ युद्ध करेंगे और उन सबको रणभूमिमें मार गिरायेंगे ॥ २५३ ॥

कर्ण एको मया सार्धं निहनिष्यति पाण्डवान् ॥ २६ ॥

ततो नृपतयो वीराः स्थास्यन्ति मम शासने । ‘ अकेला कर्ण ही मेरे साथ रहकर समस्त पाण्डवोंको मार डालेगा । फिर सारे वीर नरेश मेरी आज्ञाके अधीन हो जायँगे ॥ २६३ ॥

यश्च तेषां प्रणेता वै वासुदेवो महाबलः ॥ २७ ॥

न स संनह्यते राजन्निति मामब्रवीद् वचः । ' राजन्! पाण्डवोंके जो नेता हैं, वे महाबली वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण युद्धके लिये कवच नहीं धारण करेंगे । ' ऐसी बात दुर्योधन मुझसे कहता था ॥ २७३ ॥

तस्याथ वदतः सूत बहुशो मम संनिधौ । २८ ॥ शक्तितो ह्यनुपश्यामि निहतान् पाण्डवान् रणे । सूत! मेरे निकट दुर्योधन जब इस तरहकी बहुत- सी बातें कहने लगा तो मैं यह समझ बैठा कि ‘ हमारी शक्तिसे समस्त पाण्डव रणभूमिमें मारे जायँगे ' ॥ २८३ ॥

तेषां मध्ये स्थिता यत्र हन्यन्ते मम पुत्रकाः ॥ २ ९ ॥ व्यायच्छमानाः समरे किमन्यद् भागधेयतः । जब ऐसे वीरोंके बीचमें रहकर भी प्रयत्नपूर्वक लड़नेवाले मेरे पुत्र समरांगणमें मार डाले गये, तब इसे भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है? ॥ २ ९ ३ ॥ भीष्मश्च निहतो यत्र लोकनाथः प्रतापवान् ॥ ३० ॥

शिखण्डिनं समासाद्य मृगेन्द्र इव जम्बुकम् ।

द्रोणश्च ब्राह्मणो यत्र सर्वशस्त्रास्त्रपारगः ॥ ३१ ॥

निहतः पाण्डवैः संख्ये किमन्यद् भागधेयतः ।

पृष्ठ 2442

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जैसे सिंह सियारसे लड़कर मारा जाय, उसी प्रकार जहाँ लोकरक्षक प्रतापी वीर भीष्म शिखण्डीसे भिड़कर वधको प्राप्त हुए, जहाँ सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंकी विद्याके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण द्रोणाचार्य पाण्डवोंद्वारा युद्धस्थलमें मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ३०-३१३ ॥ कर्णश्च निहतः संख्ये दिव्यास्त्रज्ञो महाबलः ॥ ३२ ॥

भूरिश्रवा हतो यत्र सोमदत्तश्च संयुगे ।

बाह्लिकश्च महाराजः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ३३ ॥

जहाँ दिव्यास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाला महाबली कर्ण युद्धमें मारा गया, जहाँ समरांगणमें भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्लिकका संहार हो गया, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण बताया जा सकता है? ॥ ३२-३३ ॥

भगदत्तो हतो यत्र गजयुद्धविशारदः ।

जयद्रथश्च निहतः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ३४ ॥

जहाँ गजयुद्धविशारद राजा भगदत्त मारे गये और सिंधुराज जयद्रथका वध हो गया, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ३४ ॥

सुदक्षिणो हतो यत्र जलसन्धश्च पौरवः ।

श्रुतायुश्चायुतायुश्च किमन्यद् भागधेयतः ॥ ३५ ॥

जहाँ काम्बोजराज सुदक्षिण, पौरव, जलसन्ध, श्रुतायु और अयुतायु मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण हो सकता है? ॥ ३५ ॥

महाबलस्तथा पाण्ड्यः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।

निहतः पाण्डवैः संख्ये किमन्यद् भागधेयतः ॥ ३६ ॥

जहाँ सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबली पाण्ड्यनरेश युद्धमें पाण्डवोंके हाथसे मारे गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण है? ॥ ३६ ॥

बृहद्बलो हतो यत्र मागधश्च महाबलः ।

उग्रायुधश्च विक्रान्तः प्रतिमानं धनुष्मताम् ॥ ३७ ॥

आवन्त्यो निहतो यत्र त्रैगर्तश्च जनाधिपः ।

संशप्तकाश्च निहताः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ३८ ॥

जहाँ बृहद्बल, महाबली मगधनरेश, धनुर्धरोंके आदर्श एवं पराक्रमी उग्रायुध, अवन्तीके राजकुमार, त्रिगर्तनरेश सुशर्मा तथा सम्पूर्ण संशप्तक योद्धा मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ३७-३८ ॥

अलम्बुषो महाशूरो राक्षसश्चाप्यलायुधः ।

आर्ष्यशृङ्ग्श्चि निहतः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ३ ९ ॥

जहाँ शूरवीर अलम्बुष और ऋष्यशृंगपुत्र राक्षस अलायुध मारे गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण बताया जा सकता है? ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 2443

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नारायणा हता यत्र गोपाला युद्धदुर्मदाः ।

म्लेच्छाश्च बहुसाहस्राः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ४० ॥

जहाँ नारायण नामवाले रणदुर्मद ग्वाले और कई हजार म्लेच्छ योद्धा मौतके घाट उतार दिये गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है? ॥ ४० ॥

शकुनिः सौबलो यत्र कैतव्यश्च महाबलः ।

निहतः सबलो वीरः किमन्यद् भागधेयतः ॥ ४१ ॥

जहाँ सुबलपुत्र महाबली शकुनि और उस जुआरीका पुत्र वीर उलूक दोनों ही सेनासहित मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ४१ ॥

एते चान्ये च बहवः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ।

राजानो राजपुत्राश्च शूराः परिघबाहवः ॥ ४२ ॥

निहता बहवो यत्र किमन्यद् भागधेयतः । ये तथा और भी बहुत - से अस्त्रवेत्ता, रणदुर्मद, शूरवीर और परिघ- जैसी भुजाओंवाले राजा एवं राजकुमार अधिक संख्यामें मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण बताया जाय? ॥ ४२३ ॥

यत्र शूरा महेष्वासाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥ ४३ ॥

बहवो निहताः सूत महेन्द्रसमविक्रमाः ।

नानादेशसमावृत्ताः क्षत्रिया यत्र संजय ॥ ४४ ॥

निहताः समरे सर्वे किमन्यद् भागधेयतः । सूत संजय! जहाँ समरभूमिमें नाना देशोंसे आये हुए देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी बहुत- से शूरवीर महाधनुर्धर, अस्त्रवेत्ता एवं युद्धदुर्मद क्षत्रिय सारे के सारे मार डाले गये, वहाँ भाग्यके अतिरिक्त दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ ४३-४४३ ॥ पुत्राश्च मे विनिहताः पौत्राश्चैव महाबलाः ॥ ४५ ॥

वयस्या भ्रातरश्चैव किमन्यद् भागधेयतः । हाय! मेरे महाबली पुत्र, पौत्र, मित्र और भाई-बन्धु सभी मार डाले गये, इसे दुर्भाग्यके सिवा और क्या कहूँ? ॥ भागधेयसमायुक्तो ध्रुवमुत्पद्यते नरः ॥ ४६ ॥

यस्तु भाग्यसमायुक्तः स शुभं प्राप्नुयान्नरः । निश्चय ही मनुष्य अपना- अपना भाग्य लेकर उत्पन्न होता है, जो सौभाग्यसे सम्पन्न होता है, उसे ही शुभ फलकी प्राप्ति होती है ॥ ४६३ ॥

अहं वियुक्तस्तैर्भाग्यैः पुत्रैश्चैवेह संजय ॥ ४७ ॥

कथमद्य भविष्यामि वृद्धः शत्रुवशं गतः । संजय! मैं उन शुभकारक भाग्योंसे वंचित हूँ और पुत्रोंसे भी हीन हूँ । आज इस वृद्धावस्थामें शत्रुके वशमें पड़कर न जाने मेरी कैसी दशा होगी? ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 2444

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नान्यदत्र परं मन्ये वनवासादृते प्रभो ॥ ४८ ॥

सोऽहं वनं गमिष्यामि निर्बन्धुर्ज्ञातिसंक्षये ।

न हि मेऽन्यद् भवेच्छ्रेयो वनाभ्युपगमादृते ॥ ४ ९ ॥

इमामवस्थां प्राप्तस्य लूनपक्षस्य संजय । सामर्थ्यशाली संजय! मेरे लिये वनवासके सिवा और कोई कार्य श्रेष्ठ नहीं जान पड़ता । अब कुटुम्बीजनोंका विनाश हो जानेपर बन्धु - बान्धवोंसे रहित हो मैं वनमें ही चला जाऊँगा । संजय! पंख कटे हुए पक्षीकी भाँति इस अवस्थाको पहुँचे हुए मेरे लिये वनवास स्वीकार करनेके सिवा दूसरा कोई श्रेयस्कर कार्य नहीं है ॥ दुर्योधनो हतो यत्र शल्यश्च निहतो युधि ॥ ५० ॥

दुःशासनो विविंशश्च विकर्णश्च महाबलः ।

कथं हि भीमसेनस्य श्रोष्येऽहं शब्दमुत्तमम् ॥ ५१ ॥

एकेन समरे येन हतं पुत्रशतं मम । जब दुर्योधन मारा गया, शल्यका युद्धमें संहार हो गया तथा दुःशासन, विविंशति और महाबली विकर्ण भी मार डाले गये, तब मैं उस भीमसेनका उच्चस्वरसे कहा गया वचन कैसे सुनूँगा, जिसने अकेले ही समरांगणमें मेरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला है ॥ ५०-५१ ॥ असकृद्वदतस्तस्य दुर्योधनवधेन च ॥ ५२ ॥

दुःखशोकाभिसंतप्तो न श्रोष्ये परुषा गिरः । दुर्योधनके वधसे दुःख और शोकसे संतप्त हुआ मैं बारंबार बोलनेवाले भीमसेनकी कठोर बातें नहीं सुन सकूँगा ॥ ५२३३ ॥

वैशम्पायन उवाच एवं वृद्धश्च संतप्तः पार्थिवो हतबान्धवः ॥ ५३ ॥

मुहुर्मुहुर्मुह्यमानः पुत्राधिभिरभिप्लुतः ।

विलप्य सुचिरं कालं धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ ५४ ॥

दीर्घमुष्णं स निःश्वस्य चिन्तयित्वा पराभवम् ।

दुःखेन महता राजन् संतप्तो भरतर्षभः ॥ ५५ ॥

पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छद् यथातथम् । वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार पुत्रोंकी चिन्तामें डूबकर बारंबार मूर्च्छित होनेवाले, संतप्त एवं बूढ़े भरतश्रेष्ठ राजा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र, जिनके बन्धु - बान्धव मार डाले गये थे, दीर्घकालतक विलाप करके गरम साँस खींचते और अपने पराभवकी बात सोचते हुए महान् दुःखसे संतप्त हो उठे तथा गवल्गणपुत्र संजयसे पुनः युद्धका यथावत् समाचार पूछने लगे ॥ ५३–५५३ ॥ धृतराष्ट्रउवाच

पृष्ठ 2445

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भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा सूतपुत्रं च घातितम् ॥ ५६ ॥

सेनापतिं प्रणेतारं किमकुर्वत मामकाः । धृतराष्ट्रने कहा – संजय! भीष्म और द्रोणाचार्यके वधका तथा युद्ध- संचालक सेनापति सूतपुत्र कर्णके विनाशका समाचार सुनकर मेरे पुत्रोंने क्या किया? ॥ ५६३ ॥

यं यं सेनाप्रणेतारं युधि कुर्वन्ति मामकाः ॥ ५७ ॥

अचिरेणैव कालेन तं तं निघ्नन्ति पाण्डवाः । मेरे पुत्र युद्धस्थलमें जिस-जिस वीरको अपना सेनापति बनाते थे, पाण्डव उस - उसको थोड़े ही समयमें मार गिराते थे ॥ ५७३३ ॥

रणमूर्ध्नि हतो भीष्मः पश्यतां वः किरीटिना ॥ ५८ ॥

एवमेव हतो द्रोणः सर्वेषामेव पश्यताम् । युद्धके मुहानेपर तुमलोगोंके देखते- देखते भीष्मजी किरीटधारी अर्जुनके हाथसे मारे गये । इसी प्रकार द्रोणाचार्यका भी तुम सब लोगोंके सामने ही संहार हो गया ॥ ५८ ॥

एवमेव हतः कर्णः सूतपुत्रः प्रतापवान् ॥ ५ ९ ॥ स राजकानां सर्वेषां पश्यतां वः किरीटिना I इसी तरह प्रतापी सूतपुत्र कर्ण भी राजाओंसहित तुम सब लोगोंके देखते - देखते किरीटधारी अर्जुनके हाथसे मारा गया ॥ ५ ९ ३ ॥ पूर्वमेवाहमुक्तो वै विदुरेण महात्मना ॥ ६० ॥

दुर्योधनापराधेन प्रजेयं विनशिष्यति । महात्मा विदुरने मुझसे पहले ही कहा था कि ' दुर्योधनके अपराधसे इस प्रजाका विनाश हो जायगा' ॥ ६० ॥

केचिन्न सम्यक् पश्यन्ति मूढाः सम्यगवेक्ष्य च ।

तदिदं मम मूढस्य तथाभूतं वचः स्म तत् ॥ ६१ ॥

संसारमें कुछ मूढ़ मनुष्य ऐसे होते हैं, जो अच्छी तरह देखकर भी नहीं देख पाते । मैं भी वैसा ही मूढ़ हूँ। मेरे लिये वह वचन वैसा ही हुआ ( मैं उसे सुनकर भी न सुन सका) ॥ ६१ ॥

यदब्रवीत् स धर्मात्मा विदुरो दीर्घदर्शिवान् ।

तत्तथा समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः ॥ ६२ ॥

दूरदर्शी धर्मात्मा विदुरने पहले जो कुछ कहा था, वह सब उसी रूपमें सामने आया है ।

सत्यवादी महात्माका वचन सत्य होकर ही रहा ॥ ६२ ॥

दैवोपहतचित्तेन यन्मया न कृतं पुरा ।

अनयस्य फलं तस्य ब्रूहि गावल्गणे पुनः ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 2446

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संजय! पहले दैवसे मेरी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये मैंने जो विदुरजीकी बात नहीं मानी, मेरे उस अन्यायका फल जैसे - जैसे प्रकट हुआ है, उसका वर्णन करो ॥ ६३ ॥

को वा मुखमनीकानामासीत् कर्णे निपातिते ।

अर्जुनं वासुदेवं च को वा प्रत्युद्ययौ रथी । ६४ ॥

कर्णके मारे जानेपर सेनाके मुखस्थानपर खड़ा होनेवाला कौन था? कौन रथी अर्जुन और श्रीकृष्णका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा? ॥ ६४ ॥

केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं मद्रराजस्य संयुगे ।

वामं च योद्धुकामस्य के वा वीरस्य पृष्ठतः ॥ ६५ ॥

युद्धस्थलमें जूझनेकी इच्छावाले मद्रराज शल्यके दाहिने या बायें पहियेकी रक्षा किन लोगोंने की? अथवा उस वीर सेनापतिके पृष्ठ - रक्षक कौन थे? ॥ ६५ ॥

कथं च वः समेतानां मद्रराजो महारथः ।

निहतः पाण्डवैः संख्ये पुत्रो वा मम संजय ॥ ६६ ॥

संजय! तुम सब लोगोंके एक साथ रहते हुए भी महारथी मद्रराज शल्य अथवा मेरा पुत्र दुर्योधन दोनों ही तुम्हारे सामने पाण्डवोंके हाथसे कैसे मारे गये? ॥ ६६ ॥

ब्रूहि सर्वं यथातत्त्वं भरतानां महाक्षयम् ।

यथा च निहतः संख्ये पुत्रो दुर्योधनो मम ॥ ६७ ॥

तुम भरतवंशियोंके इस महान् विनाशका सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे बताओ । साथ ही यह भी कहो कि युद्धस्थलमें मेरा पुत्र दुर्योधन किस प्रकार मारा गया? ॥ ६७ ॥

पञ्चालाश्च यथा सर्वे निहताः सपदानुगाः ।

धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ॥ ६८ ॥

समस्त पांचाल - सैनिक अपने सेवकोंसहित कैसे मारे गये? धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंका वध किस प्रकार हुआ? ॥ ६८ ॥

पाण्डवाश्च यथा मुक्तास्तथोभौ माधवौ युधि ।

कृपश्च कृतवर्मा च भारद्वाजस्य चात्मजः ॥ ६ ९ ॥

पाँचों पाण्डव, दोनों मधुवंशी वीर श्रीकृष्ण और सात्यकि, कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा — ये युद्धस्थलसे किस प्रकार जीवित बच गये? ॥ ६ ९ ॥

यद् यथा यादृशं चैव युद्धं वृत्तं च साम्प्रतम् ।

अखिलं श्रोतुमिच्छामि कुशलो ह्यसि संजय ॥ ७० ॥

संजय! जो युद्धका वृत्तान्त जिस प्रकार और जैसे संघटित हुआ हो, वह सब इस समय

मैं सुनना चाहता हूँ । तुम वह सब बताने में कुशल हो ॥ ७० ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

पृष्ठ 2447

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इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें धृतराष्ट्रका विलापविषयक दूसरा अध्याय हुआ ॥ २ ॥

पृष्ठ 2448

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तृतीयोऽध्यायः कर्णके मारे जानेपर पाण्डवोंके भयसे कौरव सेनाका पलायन, सामना करनेवाले पचीस हजार पैदलोंका भीमसेनद्वारा वध तथा दुर्योधनका अपने सैनिकोंको समझा- बुझाकर पुनः पाण्डवोंके साथ युद्धमें लगाना संजय उवाच

शृणु राजन्नवहितो यथावृत्तो महान् क्षयः ।

कुरूणां पाण्डवानां च समासाद्य परस्परम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! कौरवों और पाण्डवोंके आपसमें भिड़नेसे जिस प्रकार महान् जनसंहार हुआ है, वह सब सावधान होकर सुनिये ॥ १ ॥

निहते सूतपुत्रे तु पाण्डवेन महात्मना ।

विद्रुतेषु च सैन्येषु समानीतेषु चासकृत् ॥ २ ॥

घोरे मनुष्यदेहानामाजौ नरवर क्षये ।

यत्तत् कर्णे हते पार्थः सिंहनादमथाकरोत् ॥ ३ ॥

तदा तव सुतान् राजन् प्राविशत् सुमहद् भयम् । नरश्रेष्ठ! महात्मा पाण्डुकुमार अर्जुनके द्वारा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर जब आपकी सेनाएँ बार- बार भागने और लौटायी जाने लगीं एवं रणभूमिमें मानवशरीरोंका भयानक संहार होने लगा, उस समय कर्णवधके पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुनने बड़े जोरसे सिंहनाद किया । राजन्! उसे सुनकर आपके पुत्रोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ॥ २-३३ ॥ न संधातुमनीकानि न चैवाथ पराक्रमे ॥ ४ ॥

आसीद् बुद्धिर्हते कर्णे तव योधस्य कस्यचित् । कर्णके मारे जानेपर आपके किसी भी योद्धाके मनमें न तो सेनाओंको एकत्र संगठित रखनेका उत्साह रह गया और न पराक्रममें ही वे मन लगा सके ॥ ४३ ॥

वणिजो नावि भिन्नायामगाधे विप्लवा इव ॥ ५ ॥

अपारे पारमिच्छन्तो हते द्वीपे किरीटिना ।

सूतपुत्रे हते राजन् वित्रस्ताः शरविक्षताः ॥ ६ ॥

राजन्! जैसे अगाध महासागरमें नाव फट जानेपर नौकारहित व्यापारी उस अपार समुद्रसे पार जानेकी इच्छा रखते हुए घबरा उठते हैं, उसी प्रकार किरीटधारी अर्जुनके द्वारा द्वीपस्वरूप सूतपुत्रके मारे जानेपर बाणोंसे क्षत- विक्षत हो हम सब लोग भयभीत हो गये थे ॥ ५-६ ॥

पृष्ठ 2449

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अनाथा नाथमिच्छन्तो मृगाः सिंहार्दिता इव ।

भग्नशृङ्गा इव वृषाः शीर्णदंष्ट्रा इवोरगाः ॥ ७ ॥

हम अनाथ होकर कोई रक्षक चाहते थे । हमारी दशा सिंहके सताये हुए मृगों, टूटे सींगवाले बैलों तथा जिनके दाँत तोड़ लिये गये हों उन सर्पोंकी तरह हो रही थी ॥ ७ ॥

प्रत्युपायाम सायाह्ने निर्जिताः सव्यसाचिना ।

हतप्रवीरा विध्वस्ता निकृत्ता निशितैः शरैः ॥ ८ ॥

सायंकालमें सव्यसाची अर्जुनसे परास्त होकर हम सब लोग शिबिरकी ओर लौटे । हमारी सेनाके प्रमुख वीर मारे गये थे । हम सब लोग पैने बाणोंसे घायल होकर विध्वंसके निकट पहुँच गये थे ॥ ८ ॥

सूतपुत्रे हते राजन् पुत्रास्ते प्राद्रवंस्ततः ।

विध्वस्तकवचाः सर्वे कांदिशीका विचेतसः ॥ ९ ॥

राजन्! सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके सब पुत्र अचेत हो वहाँसे भागने लगे । उन सबके कवच नष्ट हो गये थे । उन्हें इतनी भी सुध नहीं रह गयी थी कि हम कहाँ और किस दिशामें जायँ ॥ ९ ॥

अन्योन्यमभिनिघ्नन्तो वीक्षमाणा भयाद् दिशः ।

मामेव नूनं बीभत्सुर्मामेव च वृकोदरः ॥ १० ॥

अभियातीति मन्वानाः पेतुर्मम्लुश्च भारत । वे सब लोग एक- दूसरेपर चोट करते और भयसे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए ऐसा समझते थे कि अर्जुन और भीमसेन मेरे ही पीछे लगे हुए हैं । भारत! ऐसा सोचकर वे हर्ष और उत्साह खो बैठते तथा लड़खड़ाकर गिर पड़ते थे ॥ १०३ ॥

अश्वानन्ये गजानन्ये रथानन्ये महारथाः ॥ ११ ॥

आरुह्य जवसम्पन्नाः पादातान् प्रजहुर्भयात् । कुछ महारथी भयके मारे घोड़ोंपर, दूसरे लोग हाथियोंपर और कुछ लोग रथोंपर आरूढ़ हो पैदलोंको वहीं छोड़ बड़े वेगसे भागे ॥ ११३ ॥

कुञ्जरैः स्यन्दना भग्नाः सादिनश्च महारथैः ॥ १२ ॥

पदातिसंघाश्चाश्वौघैः पलायद्भिर्भृशं हताः । भागते हुए हाथियोंने बहुत- से रथ तोड़ डाले, बड़े - बड़े रथोंने घुड़सवारोंको कुचल दिया और दौड़ते हुए अश्वसमूहोंने पैदल सैनिकोंको अत्यन्त घायल कर दिया ॥ व्यालतस्करसंकीर्णे सार्थहीना यथा वने ॥ १३ ॥

तथा त्वदीया निहते सूतपुत्रे तदाभवन् । जैसे सर्पों और लुटेरोंसे भरे हुए जंगलमें अपने साथियोंसे बिछुड़े हुए लोग अनाथके समान भटकते हैं, वही दशा उस समय सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके सैनिकोंकी हुई ॥ १३३ ॥

पृष्ठ 2450

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हतारोहास्तथा नागाश्छिन्नहस्तास्तथापरे ॥ १४ ॥

सर्वं पार्थमयं लोकमपश्यन् वै भयार्दिताः । कितने ही हाथियोंके सवार मारे गये, बहुत- से गजराजोंकी सूँड़ें काट डाली गयीं, सब लोग भयसे पीड़ित होकर सम्पूर्ण जगत्को अर्जुनमय देख रहे थे ॥ तान् प्रेक्ष्य द्रवतः सर्वान् भीमसेनभयार्दितान् ॥ १५ ॥

दुर्योधनोऽथ स्वं सूतं हा हा कृत्वैवमब्रवीत् । भीमसेनके भयसे पीड़ित हुए समस्त सैनिकोंको भागते देख दुर्योधनने ' हाय-हाय! ' करके अपने सारथिसे इस प्रकार कहा- ॥ १५३ ॥

नातिक्रमिष्यते पार्थो धनुष्पाणिमवस्थितम् ॥ १६ ॥

जघने युद्धयमानं मां तूर्णमश्वान् प्रचोदय । ‘ जब मैं सेनाके पिछले भागमें खड़ा हो हाथमें धनुष ले युद्ध करूँगा, उस समय कुन्तीकुमार अर्जुन मुझे लाँघकर आगे नहीं बढ़ सकेंगे; अतः तुम घोड़ोंको आगे बढ़ाओ ॥ १६३ ॥

समरे युद्धयमानं हि कौन्तेयो मां धनंजयः ॥ १७ ॥

नोत्सहेताप्यतिक्रान्तुं वेलामिव महार्णवः । ‘ जैसे महासागर तटको नहीं लाँघ सकता, उसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुन समरांगणमें युद्ध करते हुए मुझ दुर्योधनको लाँघकर आगे जानेकी हिम्मत नहीं कर सकते ॥ अद्यार्जुनं सगोविन्दं मानिनं च वृकोदरम् ॥ १८ ॥

निहत्य शिष्टान् शत्रूंश्च कर्णस्यानृण्यमाप्नुयाम् । ' आज मैं श्रीकृष्ण, अर्जुन, मानी भीमसेन तथा शेष बचे हुए अन्य शत्रुओंका संहार करके कर्णके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा' ॥ १८३ ॥

तच्छ्रुत्वा कुरुराजस्य शूरार्यसदृशं वचः ॥ १ ९ ॥ सूतो हेमपरिच्छन्नान् शनैरश्वानचोदयत् । कुरुराज दुर्योधनके इस श्रेष्ठ वीरोचित वचनको सुनकर सारथिने सोनेके साज- बाजसे ढके हुए अश्वोंको धीरेसे आगे बढ़ाया ॥ १ ९ ३ ॥ गजाश्वरथहीनास्तु पादाताश्चैव मारिष ॥ २० ॥

पञ्चविंशतिसाहस्राः प्राद्रवन् शनकैरिव । माननीय नरेश! उस समय हाथी, घोड़े और रथोंसे रहित पचीस हजार पैदल सैनिक धीरे - ही - धीरे पाण्डवोंपर चढ़ाई करने लगे ॥ २० ॥

तान् भीमसेनः संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २१ ॥

बलेन चतुरङ्गेण परिक्षिप्याहनच्छरैः ।