04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2451–2460
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2451–2460
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तब क्रोधमें भरे हुए भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने अपनी चतुरंगिणी सेनाके द्वारा उन्हें तितर - बितर करके बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल कर दिया ॥ २१३ ॥
प्रत्ययुध्यंस्तु ते सर्वे भीमसेनं सपार्षतम् ॥ २२ ॥
पार्थपार्षतयोश्चान्ये जगृहुस्तत्र नामनी । वे समस्त सैनिक भी भीमसेन और धृष्टद्युम्नका डटकर सामना करने लगे । दूसरे बहुत-से योद्धा वहाँ उन दोनोंके नाम ले - लेकर ललकारने लगे ॥ २२३ ॥
अक्रुद्धयत रणे भीमस्तैर्मृधे प्रत्यवस्थितैः ॥ २३ ॥
सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं गदापाणिरयुध्यत । युद्धस्थलमें सामने खड़े हुए उन योद्धाओंके साथ जूझते समय भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ । वे तुरंत ही रथसे उतरकर हाथमें गदा ले उन सबके साथ युद्ध करने लगे ॥ २३३ ॥
न तान् रथस्थो भूमिष्ठान् धर्मापेक्षी वृकोदरः ॥ २४ ॥
योधयामास कौन्तेयो भुजवीर्यमुपाश्रितः । युद्धधर्मके पालनकी इच्छा रखनेवाले कुन्तीकुमार भीमसेनने स्वयं रथपर बैठकर भूमिपर खड़े हुए पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करना उचित नहीं समझा । वे अपने बाहुबलका भरोसा करके उन सबके साथ पैदल ही जूझने लगे ॥ २४३ ॥
जातरूपपरिच्छन्नां प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ २५ ॥
न्यवधीत् तावकान् सर्वान् दण्डपाणिरिवान्तकः । उन्होंने दण्डपाणि यमराजके समान सुवर्णपत्रसे जटित विशाल गदा लेकर उसके द्वारा आपके समस्त सैनिकोंका संहार आरम्भ किया ॥ २५३ ॥
पदातयो हि संरब्धास्त्यक्तजीवितबान्धवाः ॥ २६ ॥
भीममभ्यद्रवन् संख्ये पतङ्गा इव पावकम् । उस समय अपने प्राणों और बन्धु बान्धवोंका मोह छोड़कर रोष और आवेशमें भरे हुए पैदल सैनिक युद्धस्थलमें भीमसेनकी ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे पतंग चलती हुई अतापर टूट पड़ते हैं ॥ २६ ॥
आसाद्य भीमसेनं ते संरब्धा युद्धदुर्मदाः ॥ २७ ॥
विनेदुः सहसा दृष्ट्वा भूतग्रामा इवान्तकम् । क्रोधमें भरे हुए वे रणदुर्मद योद्धा भीमसेनसे भिड़कर सहसा उसी प्रकार आर्तनाद करने लगे, जैसे प्राणियोंके समुदाय यमराजको देखकर चीख उठते हैं ॥ २७ ॥
श्येनवद् व्यचरद् भीमः खड्गेन गदया तथा ॥ २८ ॥
पञ्चविंशतिसाहस्रांस्तावकानां व्यपोथयत् । उस समय भीमसेन रणभूमिमें बाजकी तरह विचर रहे थे । उन्होंने तलवार और गदाके द्वारा आपके उन पचीस हजार योद्धाओंको मार गिराया ॥ २८३ ॥
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हत्वा तत् पुरुषानीकं भीमः सत्यपराक्रमः ॥ २ ९ ॥ धृष्टद्युम्नं पुरस्कृत्य पुनस्तस्थौ महाबलः । सत्यपराक्रमी महाबली भीमसेन उस पैदल सेनाका संहार करके धृष्टद्युम्नको आगे किये पुनः युद्धके लिये डट गये ॥ २ ९ ३ ॥ धनंजयो रथानीकमन्वपद्यत वीर्यवान् ॥ ३० ॥
माद्रीपुत्रौ च शकुनिं सात्यकिश्च महाबलः ।
जवेनाभ्यपतन् हृष्टा घ्नन्तो दौर्योधनं बलम् ॥ ३१ ॥
दूसरी ओर पराक्रमी अर्जुनने रथसेनापर आक्रमण किया । माद्रीकुमार नकुल- सहदेव तथा महाबली सात्यकि दुर्योधनकी सेनाका विनाश करते हुए बड़े वेगसे शकुनिपर टूट पड़े ॥ ३०-३१ ॥
तस्याश्ववाहान् सुबह्वंस्ते निहत्य शितैः शरैः ।
तमन्वधावंस्त्वरितास्तत्र युद्धमवर्तत ॥ ३२ ॥
उन सबने शकुनिके बहुत- से घुड़सवारोंको अपने पैने बाणोंसे मारकर बड़ी उतावलीके
साथ वहाँ शकुनिपर धावा किया । फिर तो उनमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ ३२ ॥
ततो धनंजयो राजन् रथानीकमगाहत ।
विश्रुतं त्रिषु लोकेषु गाण्डीवं व्याक्षिपन् धनुः ॥ ३३ ॥
राजन्! तदनन्तर अर्जुनने अपने त्रिभुवनविख्यात गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए आपके रथियोंकी सेनामें प्रवेश किया ॥ ३३ ॥
कृष्णसारथिमायान्तं दृष्ट्वा श्वेतहयं रथम् ।
अर्जुनं चापि योद्धारं त्वदीयाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ३४ ॥
श्रीकृष्ण जिसके सारथि हैं, उस श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए रथको और रथी योद्धा अर्जुनको आते देखकर आपके सारे रथी भयसे भाग चले ॥ ३४ ॥
विप्रहीनरथाश्वाश्च शरैश्च परिवारिताः ।
पञ्चविंशतिसाहस्राः पार्थमार्च्छन् पदातयः ॥ ३५ ॥
तब रथों और घोड़ोंसे रहित तथा बाणोंसे आच्छादित हुए पचीस हजार पैदल योद्धाओंने कुन्तीकुमार अर्जुनपर चढ़ाई की ॥ ३५ ॥
हत्वा तत् पुरुषानीकं पञ्चालानां महारथः ।
भीमसेनं पुरस्कृत्य नचिरात् प्रत्यदृश्यत ॥ ३६ ॥
उस पैदल सेनाका वध करके पांचाल महारथी धृष्टद्युम्न भीमसेनको आगे किये शीघ्र ही वहाँ दृष्टिगोचर हुए ॥ ३६ ॥
महाधनुर्धरः श्रीमानमित्रगणमर्दनः ।
पुत्रः पञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नो महायशाः ॥ ३७ ॥
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पांचालराजके पुत्र धृष्टद्युम्न महाधनुर्धर, महायशस्वी, तेजस्वी तथा शत्रुसमूहका संहार करनेमें समर्थ थे ॥ ३७ ॥
पारावतसवर्णाश्वं कोविदारवरध्वजम् ।
धृष्टद्युम्नं रणे दृष्ट्वा त्वदीयाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ३८ ॥
जिनके रथमें कबूतरके समान रंगवाले घोड़े जुते हुए थे तथा रथकी श्रेष्ठ ध्वजापर कचनारवृक्षका चिह्न बना हुआ था, उन धृष्टद्युम्नको रणभूमिमें उपस्थित देख आपके सैनिक भयसे भाग खड़े हुए ॥ ३८ ॥
गान्धारराजं शीघ्रास्त्रमनुसृत्य यशस्विनौ ।
अचिरात् प्रत्यदृश्येतां माद्रीपुत्रौ ससात्यकी ॥ ३ ९ ॥
सात्यकिसहित यशस्वी माद्रीकुमार नकुल और सहदेव शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले गान्धारराज शकुनिका तुरंत पीछा करते हुए दिखायी दिये ॥ ३ ९ ॥
चेकितानः शिखण्डी च द्रौपदेयाश्च मारिष ।
हत्वा त्वदीयं सुमहत् सैन्यं शङ्खानथाधमन् ॥ ४० ॥
माननीय नरेश! चेकितान, शिखण्डी और द्रौपदीके पाँचों पुत्र - आपकी विशाल सेनाका संहार करके शंख बजाने लगे ॥
ते सर्वे तावकान् प्रेक्ष्य द्रवतो वै पराङ्मुखान् ।
अभ्यधावन्त निघ्नन्तो वृषाञ्जित्वा वृषा इव ॥ ४१ ॥
जैसे साँड़ साँड़ोंको परास्त करके उन्हें बहुत दूरतक खदेड़ते रहते हैं, उसी प्रकार उन सब पाण्डववीरोंने आपके समस्त सैनिकोंको युद्धसे विमुख होकर भागते देख बाणोंका प्रहार करते हुए दूरतक उनका पीछा किया ॥
सेनावशेषं तं दृष्ट्वा तव पुत्रस्य पाण्डवः ।
अवस्थितं सव्यसाची चुक्रोध बलवन्नृप ॥ ४२ ॥
नरेश्वर! पाण्डुकुमार सव्यसाची अर्जुन आपके पुत्रकी सेनाके उस एक भागको अवशिष्ट एवं सामने उपस्थित देख अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ४२ ॥
तत एनं शरै राजन् सहसा समवाकिरत् ।
रजसा चोद्गतेनाथ न स्म किंचन दृश्यते ॥ ४३ ॥
राजन्! तदनन्तर उन्होंने सहसा बाणोंद्वारा उस सेनाको आच्छादित कर दिया । उस समय इतनी धूल ऊपर उठी कि कुछ भी दिखायी नहीं देता था ॥ ४३ ॥
अन्धकारीकृते लोके शरीभूते महीतले ।
दिशः सर्वा महाराज तावकाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ४४ ॥
महाराज! जब जगत्में उस धूलसे अन्धकार छा गया और पृथ्वीपर बाण- ही- बाण बिछ गया, उस समय आपके सैनिक भयके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ भज्यमानेषु सर्वेषु कुरुराजो विशाम्पते ।
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परेषामात्मनश्चैव सैन्ये ते समुपाद्रवत् ॥ ४५ ॥
प्रजानाथ! उन सबके भाग जानेपर कुरुराज दुर्योधनने शत्रुपक्षकी और अपनी दोनों ही सेनाओं पर आक्रमण किया ॥
ततो दुर्योधनः सर्वानाजुहावाथ पाण्डवान् ।
युद्धाय भरतश्रेष्ठ देवानिव पुरा बलिः ॥ ४६ ॥
भरतश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें राजा बलिने देवताओंको युद्धके लिये ललकारा था, उसी प्रकार दुर्योधनने समस्त पाण्डवोंका आह्वान किया ॥ ४६ ॥
त एनमभिगर्जन्तं सहिताः समुपाद्रवन् ।
नानाशस्त्रसृजः क्रुद्धा भर्त्सयन्तो मुहुर्मुहुः ॥ ४७ ॥
तब वे पाण्डवयोद्धा अत्यन्त कुपित हो गर्जना करनेवाले दुर्योधनको बारंबार फटकारते और क्रोधपूर्वक नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए एक साथ ही उसपर टूट पड़े ॥
दुर्योधनोऽप्यसम्भ्रान्तस्तानरीन् व्यधमच्छरैः ।
तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् ॥ ४८ ॥
यदेनं पाण्डवाः सर्वे न शेकुरतिवर्तितुम् । दुर्योधन भी बिना किसी घबराहटके अपने बाणोंद्वारा उन शत्रुओंको छिन्न - भिन्न करने लगा । वहाँ हमलोगोंने आपके पुत्रका अद्भुत पराक्रम देखा कि समस्त पाण्डव मिलकर भी उसे लाँघकर आगे न बढ़ सके ॥ ४८ ॥
नातिदूरापयातं च कृतबुद्धिः पलायने ॥ ४ ९ ॥ दुर्योधनः स्वकं सैन्यमपश्यद् भृशविक्षतम् । दुर्योधनने देखा कि मेरी सेना अत्यन्त घायल हो रणभूमिसे पलायन करनेका विचार रखकर भाग रही है, परंतु अधिक दूर नहीं गयी है ॥ ४ ९ ३ ॥ ततोऽवस्थाप्य राजेन्द्र कृतबुद्धिस्तवात्मजः ॥ ५० ॥
हर्षयन्निव तान् योधांस्ततो वचनमब्रवीत् । राजेन्द्र! तब युद्धका ही दृढ़ निश्चय रखनेवाले आपके पुत्रने उन समस्त सैनिकोंको खड़ा करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए कहा - ॥ ५० ॥
न तं देशं प्रपश्यामि पृथिव्यां पर्वतेषु च ॥ ५१ ॥
यत्र यातान्न वो हन्युः पाण्डवाः किं सृतेन वः । ‘ वीरो! मैं भूतलपर और पर्वतोंमें भी कोई ऐसा स्थान नहीं देखता, जहाँ चले जानेपर तुमलोगोंको पाण्डव मार न सकें; फिर तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है? ॥ ५१ ॥
स्वल्पं चैव बलं तेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ ॥ ५२ ॥
यदि सर्वेऽत्र तिष्ठामो ध्रुवं नो विजयो भवेत् ।
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‘ पाण्डवोंके पास थोड़ी - सी ही सेना शेष रह गयी है और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन भी बहुत घायल हो चुके हैं । यदि हम सब लोग यहाँ डटे रहें तो निश्चय ही हमारी विजय होगी ॥ ५२ विप्रयातांस्तु वो भिन्नान् पाण्डवाः कृतकिल्बिषान् ॥ ५३ ॥
अनुसृत्य हनिष्यन्ति श्रेयो नः समरे वधः । ‘यदि तुमलोग पृथक् - पृथक् होकर भागोगे तो पाण्डव तुम सभी अपराधियोंका पीछा करके तुम्हें मार डालेंगे, अतः युद्धमें ही मारा जाना हमारे लिये श्रेयस्कर होगा ॥ ५३ ॥
सुखः सांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम् ॥ ५४ ॥
मृतो दुःखं न जानीते प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते । ‘ क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीरोंके लिये संग्रामभूमिमें होनेवाली मृत्यु ही सुखद है; क्योंकि वहाँ मरा हुआ मनुष्य मृत्युके दुःखको नहीं जानता और मृत्युके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ५४३ ॥
शृण्वन्तु क्षत्रियाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः ॥ ५५ ॥
द्विषतो भीमसेनस्य वशमेष्यथ विद्रुताः । ‘जितने क्षत्रिय यहाँ आये हैं वे सब सुनें – ' तुमलोग भागनेपर अपने शत्रु भीमसेनके अधीन हो जाओगे ॥ ५५३ ॥
पितामहैराचरितं न धर्मं हातुमर्हथ ॥ ५६ ॥
नान्यत् कर्मास्ति पापीयः क्षत्रियस्य पलायनात् । ' इसलिये अपने बाप -दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए धर्मका परित्याग न करो । क्षत्रियके लिये युद्ध छोड़कर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई अत्यन्त पापपूर्ण कर्म नहीं है ॥ ५६ ॥
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् हि पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः ॥ ५७ ॥
सुचिरेणार्जिताँल्लोकान् सद्यो युद्धात् समश्नुते । ' कौरवो! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्गका श्रेष्ठ मार्ग नहीं है । दीर्घकालतक पुण्यकर्म करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यलोकोंको वीर क्षत्रिय युद्धसे तत्काल प्राप्त कर लेता है ' ॥ ५७३ ॥
तस्य तद् वचनं राज्ञः पूजयित्वा महारथाः ॥ ५८ ॥
पुनरेवाभ्यवर्तन्त क्षत्रियाः पाण्डवान् प्रति ।
पराजयममृष्यन्तः कृतचित्ताश्च विक्रमे ॥ ५ ९ ॥
राजा दुर्योधनकी उस बातका आदर करके वे महारथी क्षत्रिय पुनः युद्ध करनेके लिये पाण्डवोंके सामने आये । उन्हें पराजय असह्य हो उठी थी; इसलिये उन्होंने पराक्रम करनेमें ही मन लगाया था ॥ ५८-५९ ॥
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ततः प्रववृते युद्धं पुनरेव सुदारुणम् ।
तावकानां परेषां च देवासुररणोपमम् ॥ ६० ॥
तदनन्तर आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें पुनः देवासुर संग्रामके समान अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ६० ॥
युधिष्ठिरपुरोगांश्च सर्वसैन्येन पाण्डवान् ।
अन्यधावन्महाराज पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ ६१ ॥
महाराज! उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने अपनी सारी सेनाके साथ युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डवोंपर धावा किया था ॥ ६१ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि कौरवसैन्यापयाने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें कौरवसेनाका पलायनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
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चतुर्थोऽध्यायः कृपाचार्यका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना संजय उवाच
पतितान् रथनीडांश्च रथांश्चापि महात्मनाम् ।
रणे च निहतान् नागान् दृष्ट्वा पत्तींश्च मारिष ॥ १ ॥
आयोधनं चातिघोरं रुद्रस्याक्रीड संनिभम् ।
अप्रख्यातिं गतानां तु राज्ञां शतसहस्रशः ॥ २ ॥
विमुखे तव पुत्रे तु शोकोपहतचेतसि ।
भृशोद्विग्नेषु सैन्येषु दृष्ट्वा पार्थस्य विक्रमम् ॥ ३ ॥
ध्यायमानेषु सैन्येषु दुःखं प्राप्तेषु भारत ।
बलानां मथ्यमानानां श्रुत्वा निनदमुत्तमम् ॥ ४ ॥
अभिज्ञानं नरेन्द्राणां विक्षतं प्रेक्ष्य संयुगे ।
कृपाविष्टः कृपो राजन् वयःशीलसमन्वितः ॥ ५ ॥
अब्रवीत् तत्र तेजस्वी सोऽभिसृत्य जनाधिपम् ।
दुर्योधनं मन्युवशाद् वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ ६ ॥
संजय कहते हैं— माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं । सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे । वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था । यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दुःखमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर - जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत -विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी । भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे । उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा- ॥ १-६ ॥
दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
श्रुत्वा कुरु महाराज यदि ते रोचतेऽनघ ॥ ७ ॥
' कुरुवंशी महाराज दुर्योधन! मैं इस समय तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो । अनघ! मेरी बात सुनकर यदि तुम्हें रुचे तो उसके अनुसार कार्य करो ॥ ७ ॥
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् वै पन्था राजेन्द्र विद्यते ।
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यं समाश्रित्य युद्धयन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ॥ ८ ॥
‘ राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है, जिसका आश्रय लेकर क्षत्रिय लोग युद्धमें तत्पर रहते हैं ॥ ८ ॥
पुत्रो भ्राता पिता चैव स्वस्रीयो मातुलस्तथा ।
सम्बन्धिबान्धवाश्चैव योद्धया वै क्षत्रजीविना ॥ ९ ॥
‘ क्षत्रियधर्मसे जीवन- निर्वाह करनेवाले पुरुषके लिये पुत्र, भ्राता, पिता, भानजा, मामा, सम्बन्धी तथा बन्धु - बान्धव - इन सबके साथ युद्ध करना कर्तव्य है ॥ ९ ॥
वधे चैव परो धर्मस्तथाधर्मः पलायने ।
ते स्म घोरां समापन्ना जीविकां जीवितार्थिनः ॥ १० ॥
' युद्धमें शत्रुको मारना या उसके हाथसे मारा जाना दोनों ही उत्तम धर्म है और युद्धसे भागनेपर महान् पाप होता है । सभी क्षत्रिय जीवन- निर्वाहकी इच्छा रखते हुए उसी घोर जीविकाका आश्रय लेते हैं ॥ १० ॥
तदत्र प्रतिवक्ष्यामि किंचिदेव हितं वचः ।
हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णे चैव महारथे ॥ ११ ॥
जयद्रथे च निहते तव भ्रातृषु चानघ ।
लक्ष्मणे तव पुत्रे च किं शेषं पर्युपास्महे ॥ १२ ॥
' ऐसी दशामें मैं यहाँ तुम्हारे लिये कुछ हितकी बात बताऊँगा । अनघ! पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, महारथी कर्ण, जयद्रथ तथा तुम्हारे सभी भाई मारे जा चुके हैं । तुम्हारा पुत्र लक्ष्मण भी जीवित नहीं है । अब दूसरा कौन बच गया है, जिसका हमलोग आश्रय ग्रहण करें ॥ ११-१२ ॥
येषु भारं समासाद्य राज्ये मतिमकुर्महि ।
ते संत्यज्य तनूर्याताः शूरा ब्रह्मविदां गतिम् ॥ १३ ॥
‘जिनपर युद्धका भार रखकर हम राज्य पानेकी आशा करते थे, वे शूरवीर तो शरीर छोड़कर ब्रह्मवेत्ताओंकी गतिको प्राप्त हो गये ॥ १३ ॥
वयं त्विह विना भूता गुणवद्भिर्महारथैः ।
कृपणं वर्तयिष्याम पातयित्वा नृपान् बहून् ॥ १४ ॥
‘ इस समय हमलोग यहाँ भीष्म आदि गुणवान् महारथियोंके सहयोगसे वंचित हो गये हैं - से नरेशोंको मरवाकर दयनीय स्थितिमें आ गये हैं ॥ १४ ॥और बहुत- स
सर्वैरथ च जीवद्भिर्बीभत्सुरपराजितः ।
कृष्णनेत्रो महाबाहुर्देवैरपि दुरासदः ॥ १५ ॥
‘ जब सब लोग जीवित थे, तब भी अर्जुन किसीके द्वारा पराजित नहीं हुए । श्रीकृष्ण-जैसे नेताके रहते हुए महाबाहु अर्जुन देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं ॥ १५ ॥
इन्द्रकार्मुकतुल्याभमिन्द्रकेतुमिवोच्छ्रितम् ।
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वानरं केतुमासाद्य संचचाल महाचमूः ॥ १६ ॥
‘ उनका वानरध्वज इन्द्रधनुषके तुल्य बहुरंगा और इन्द्रध्वजके समान अत्यन्त ऊँचा है । उसके पास पहुँचकर हमारी विशाल सेना भयसे विचलित हो उठती है ॥ १६ ॥
सिंहनादाच्च भीमस्य पाञ्चजन्यस्वनेन च ।
गाण्डीवस्य च निर्घोषात् सम्मुह्यन्ते मनांसि नः ॥ १७ ॥
‘ भीमसेनके सिंहनाद, पांचजन्य शंखकी ध्वनि और गाण्डीव धनुषकी टंकारसे हमारा दिल दहल उठता है ॥ १७ ॥
चरन्तीव महाविद्युन्मुष्णन्ती नयनप्रभाम् ।
अलातमिव चाविद्धं गाण्डीवं समदृश्यत ॥ १८ ॥
‘ जैसे चमकती हुई महाविद्युत् नेत्रोंकी प्रभाको छीनती- सी दिखायी देती है तथा जैसे अलातचक्र घूमता देखा जाता है, उसी प्रकार अर्जुनके हाथमें गाण्डीव धनुष भी दृष्टिगोचर होता है ॥ १८ ॥
जाम्बूनदविचित्रं च धूयमानं महद् धनुः ।
दृश्यते दिक्षु सर्वासु विद्युदभ्रघनेष्विव ॥ १ ९ ॥
‘ अर्जुनके हाथमें डोलता हुआ उनका सुवर्णजटित महान् धनुष सम्पूर्ण दिशाओंमें वैसा ही दिखायी देता है, जैसे मेघोंकी घटामें बिजली ॥ १ ९ ॥
श्वेताश्च वेगसम्पन्नाः शशिकाशसमप्रभाः ।
पिबन्त इव चाकाशं रथे युक्तास्तु वाजिनः ॥ २० ॥
‘ उनके रथमें जुते हुए घोड़े श्वेत वर्णवाले, वेगशाली तथा चन्द्रमा और कासके समान उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित हैं । वे ऐसी तीव्र गतिसे चलते हैं, मानो आकाशको पी जायँगे ॥ २० ॥
उह्यमानांश्च कृष्णेन वायुनेव बलाहकाः ।
जाम्बूनदविचित्राङ्गा वहन्ते चार्जुनं रणे ॥ २१ ॥
‘ जैसे वायुकी प्रेरणासे बादल उड़ते फिरते हैं, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्णद्वारा हाँके जाते हुए घोड़े, जो सुनहरे साजोंसे सजे होनेके कारण अंगोंमें विचित्र शोभा धारण करते हैं, रणभूमिमें अर्जुनकी सवारी ढोते हैं ॥ २१ ॥
तावकं तद् बलं राजन्नर्जुनोऽस्त्रविशारदः ।
गहनं शिशिरापाये ददाहाग्निरिवोल्बणः ॥ २२ ॥
‘ राजन्! अर्जुन अस्त्रविद्यामें कुशल हैं, उन्होंने तुम्हारी सेनाको उसी प्रकार भस्म किया है, जैसे भयंकर आग ग्रीष्म ऋतुमें बहुत बड़े जंगलको जला डालती है ॥ २२ ॥
गाहमानमनीकानि महेन्द्रसदृशप्रभम् ।
धनंजयमपश्याम चतुर्दंष्ट्रमिव द्विपम् ॥ २३ ॥
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‘ देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी अर्जुनको हम चार दाँतवाले गजराजके समान अपनी सेनामें प्रवेश करते देखते हैं ॥ २३ ॥
विक्षोभयन्तं सेनां ते त्रासयन्तं च पार्थिवान् ।
धनंजयमपश्याम नलिनीमिव कुञ्जरम् ॥ २४ ॥
‘ जैसे मतवाला हाथी तालाबमें घुसकर उसे मथ डालता है, उसी प्रकार हमने अर्जुनको तुम्हारी सेनाको मथते और राजाओंको भयभीत करते देखा है ॥ २४ ॥
त्रासयन्तं तथा योधान् धनुर्घोषेण पाण्डवम् ।
भूय एनमपश्याम सिंहं मृगगणानिव ॥ २५ ॥
‘ जैसे सिंह मृगोंके झुंडको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार पाण्डुकुमार अर्जुन अपने धनुषकी टंकारसे तुम्हारे समस्त योद्धाओंको बारंबार भयभीत करते दिखायी दिये हैं ॥ २५ ॥
सर्वलोकमहेष्वासौ वृषभौ सर्वधन्विनाम् ।
आमुक्तकवचौ कृष्णौ लोकमध्ये विचेरतुः ॥ २६ ॥
‘ अपने अंगोंमें कवच धारण किये श्रीकृष्ण और अर्जुन, जो सम्पूर्ण विश्वके महाधनुर्धर और सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ हैं, योद्धाओंके समूहमें निर्भय विचरते हैं ॥ २६ ॥
अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत ।
संग्रामस्यातिघोरस्य वध्यतां चाभितो युधि ॥ २७ ॥
‘ भारत! परस्पर मार- काट मचाते हुए दोनों ओरसे योद्धाओंके इस अत्यन्त भयंकर संग्रामको आरम्भ हुए आज सत्रह दिन हो गये ॥ २७ ॥
वायुनेव विधूतानि तव सैन्यानि सर्वतः ।
शरदम्भोदजालानि व्यशीर्यन्त समन्ततः ॥ २८ ॥
‘ जैसे हवा शरद्-ऋतुके बादलोंको छिन्न -भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनकी मारसे तुम्हारी सेनाएँ सब ओर तितर- बितर हो गयी हैं ॥ २८ ॥
तां नावमिव पर्यस्तां वातधूतां महार्णवे ।
तव सेनां महाराज सव्यसाची व्यकम्पयत् ॥ २ ९ ॥
‘ महाराज! जैसे महासागरमें हवाके थपेड़े खाकर नाव डगमगाने लगती है, उसी प्रकार सव्यसाची अर्जुनने तुम्हारी सेनाको कँपा डाला है ॥ २ ९ ॥
क्व नु ते सूतपुत्रोऽभूत् क्व नु द्रोणः सहानुगः ।
अहं क्व च क्व चात्मा ते हार्दिक्यश्च तथा क्व नु ॥ ३० ॥
दुःशासनश्च ते भ्राता भ्रातृभिः सहितः क्व नु ।
बाणगोचरसम्प्राप्तं प्रेक्ष्य चैव जयद्रथम् ॥ ३१ ॥
‘ उस दिन जयद्रथको अर्जुनके बाणोंका निशाना बनते देखकर भी तुम्हारा कर्ण कहाँ चला गया था? अपने अनुयायियोंके साथ आचार्य द्रोण कहाँ थे? मैं कहाँ था? तुम कहाँ थे?