04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2511–2520
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2511–2520
पृष्ठ 2511
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सब- की - सब चारों ओर बिखरी पड़ती थीं ॥ १५ ॥
मृगाश्च महिषाश्चापि पक्षिणश्च विशाम्पते ।
अपसव्यं तदा चक्रुः सेनां ते बहुशो नृप ॥ १६ ॥
प्रजानाथ! नरेश्वर! उस समय मृग, महिष और पक्षी आपकी सेनाको बारंबार दाहिने करके जाने लगे ॥ १६ ॥
भृगुसूनुधरापुत्रौ शशिजेन समन्वितौ ।
चरमं पाण्डुपुत्राणां पुरस्तात् सर्वभूभुजाम् ॥ १७ ॥
शुक्र और मंगल बुधसे संयुक्त हो पाण्डवोंके पृष्ठभागमें तथा अन्य सब नरेशोंके सम्मुख उदित हुए थे ॥ १७ ॥
शस्त्राग्रेष्वभवज्ज्वाला नेत्राण्याहत्य वर्षती ।
शिरःस्वलीयन्त भृशं काकोलूकाश्च केतुषु ॥ १८ ॥
शस्त्रोंके अग्रभागमें ज्वाला- सी प्रकट होती और नेत्रोंमें चकाचौंध पैदा करके वह पृथ्वीपर गिर जाती थी । योद्धाओंके मस्तकों और ध्वजाओंमें कौए और उल्लू बारंबार छिपने लगे ॥ १८ ॥
ततस्तद् युद्धमत्युग्रमभवत् सहचारिणाम् ।
तथा सर्वाण्यनीकानि संनिपत्य जनाधिप ॥ १ ९ ॥
अभ्ययुः कौरवा राजन् पाण्डवानामनीकिनीम् । नरेश्वर! तत्पश्चात् एक साथ संगठित होकर जूझनेवाले दोनों पक्षोंके वीरोंका वह युद्ध बड़ा भयंकर हो गया । राजन्! कौरव- योद्धाओंने अपनी सारी सेनाओंको एकत्र करके पाण्डव- सेनापर धावा बोल दिया ॥ १ ९ ॥ शल्यस्तु शरवर्षेण वर्षन्निव सहस्रदृक् ॥ २० ॥
अभ्यवर्षत धर्मात्मा कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । धर्मात्मा राजा शल्यने वर्षा करनेवाले इन्द्रकी भाँति कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ भीमसेनं शरैश्चापि रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ २१ ॥
द्रौपदेयांस्तथा सर्वान् माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।
धृष्टद्युम्नं च शैनेयं शिखण्डिनमथापि च ॥ २२ ॥
एकैकं दशभिर्बाणैर्विव्याध स महाबलः ।
ततोऽसृजद् बाणवर्षं घर्मान्ते मघवानिव ॥ २३ ॥
महाबली शल्यने भीमसेन, द्रौपदीके सभी पुत्र, माद्रीकुमार नकुल सहदेव, धृष्टद्युम्न, सात्यकि तथा शिखण्डी – इनमेंसे प्रत्येकको शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले दस - दस बाणोंसे घायल कर दिया । तत्पश्चात् वे वर्षाकालमें जल बरसानेवाले इन्द्रके समान बाणोंकी वृष्टि करने लगे ॥ २१–२३ ॥
पृष्ठ 2512
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ततः प्रभद्रका राजन् सोमकाश्च सहस्रशः ।
पतिताः पात्यमानाश्च दृश्यने शल्यसायकैः ॥ २४ ॥
राजन्! तत्पश्चात् सहस्रों प्रभद्रक और सोमक योद्धा शल्यके बाणोंसे घायल होकर गिरे और गिरते हुए दिखायी देने लगे ॥ २४ ॥
भ्रमराणामिव व्राताः शलभानामिव व्रजाः ।
ह्रादिन्य इव मेघेभ्यः शल्यस्य न्यपतन् शराः ॥ २५ ॥
शल्यके बाण भ्रमरोंके समूह, टिड्डियोंके दल और मेघोंकी घटासे प्रकट होनेवाली बिजलियोंके समान पृथ्वीपर गिर रहे थे ॥ २५ ॥
द्विरदास्तुरगाश्चार्ता: पत्तयो रथिनस्तथा ।
शल्यस्य बाणैरपतन् बभ्रमुर्व्यनदंस्तथा ॥ २६ ॥
शल्यके बाणोंकी मार खाकर पीड़ित हुए हाथी, घोड़े, रथी और पैदल - सैनिक गिरने, चक्कर काटने और आर्तनाद करने लगे ॥ २६ ॥
आविष्ट इव मद्रेशो मन्युना पौरुषेण च ।
प्राच्छादयदरीन् संख्ये कालसृष्ट इवान्तकः ॥ २७ ॥
प्रलयकालमें प्रकट हुए यमराजके समान मद्रराज शल्य क्रोधसे आविष्ट हुए पुरुषकी भाँति अपने पुरुषार्थसे युद्धस्थलमें शत्रुओंको बाणोंद्वारा आच्छादित करने लगे ॥
विनर्दमानो मद्रेशो मेघह्रादो महाबलः ।
सा वध्यमाना शल्येन पाण्डवानामनीकिनी ॥ २८ ॥
अजातशत्रुं कौन्तेयमभ्यधावद् युधिष्ठिरम् । महाबली मद्रराज मेघोंकी गर्जनाके समान सिंहनाद कर रहे थे । उनके द्वारा मारी जाती हुई पाण्डव - सेना भागकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके पास चली गयी ॥ तां सम्मर्द्य ततः संख्ये लघुहस्तः शितैः शरैः ॥ २ ९ ॥ बाणवर्षेण महता युधिष्ठिरमताडयत् । शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले शल्यने युद्धस्थलमें पैने बाणोंद्वारा पाण्डव- सेनाका मर्दन करके बड़ी भारी बाण - वर्षाके द्वारा युधिष्ठिरको भी गहरी चोट पहुँचायी ॥ २ ९ ॥ तमापतन्तं पत्त्यश्वैः क्रुद्धो राजा युधिष्ठिरः ॥ ३० ॥
अवारयच्छरैस्तीक्ष्णैर्महाद्विपमिवाङ्कुशैः । तब क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिरने पैदलों और घुड़सवारोंके साथ आते हुए शल्यको अपने तीखे बाणोंसे उसी प्रकार रोक दिया, जैसे महावत अंकुशोंकी मारसे विशालकाय हाथीको आगे बढ़नेसे रोक देता है ॥ ३० ॥
तस्य शल्यः शरं घोरं मुमोचाशीविषोपमम् ॥ ३१ ॥
सनिर्भिद्य महात्मानं वेगेनाभ्यपतच्च गाम् ।
पृष्ठ 2513
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उस समय शल्यने युधिष्ठिरपर विषैले सर्पके समान एक भयंकर बाणका प्रहार किया ।
वह बाण बड़े वेगसे महात्मा युधिष्ठिरको घायल करके पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥
ततो वृकोदरः क्रुद्धः शल्यं विव्याध सप्तभिः ॥ ३२ ॥
पञ्चभिः सहदेवस्तु नकुलो दशभिः शरैः ।
द्रौपदेयाश्च शत्रुघ्नं शूरमार्तायनिं शरैः ॥ ३३ ॥
यह देख भीमसेन कुपित हो उठे । उन्होंने सात बाणोंसे शल्यको बींध डाला । फिर सहदेवने पाँच, नकुलने दस और द्रौपदीके पुत्रोंने अनेक बाणोंसे शत्रुसूदन शूरवीर शल्यको घायल कर दिया ॥ ३२-३३ ॥
अभ्यवर्षन् महाराज मेघा इव महीधरम् ।
ततो दृष्ट्वा वार्यमाणं शल्यं पार्थैः समन्ततः ॥ ३४ ॥
कृतवर्मा कृपश्चैव संक्रुद्धावभ्यधावताम् ।
उलूकश्च महावीर्यः शकुनिश्चापि सौबलः ॥ ३५ ॥
समागम्याथ शनकैरश्वत्थामा महाबलः ।
तव पुत्राश्च कार्त्स्न्येन जुगुपुः शल्यमाहवे ॥ ३६ ॥
महाराज! जैसे मेघ पर्वतपर पानी बरसाते हैं, उसी प्रकार वे शल्यपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे । शल्यको कुन्तीके पुत्रोंद्वारा सब ओरसे अवरुद्ध हुआ देख कृतवर्मा और कृपाचार्य क्रोधमें भरकर उनकी ओर दौड़े आये । साथ ही महापराक्रमी उलूक, सुबलपुत्र शकुनि, महाबली अश्वत्थामा तथा आपके सम्पूर्ण पुत्र भी धीरे - धीरे वहाँ आकर रणभूमिमें शल्यकी रक्षा करने लगे ॥ ३४–३६ ॥
भीमसेनं त्रिभिर्विद्ध्वा कृतवर्मा शिलीमुखैः ।
बाणवर्षेण महता क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ३७ ॥
कृतवर्माने क्रोधमें भरे हुए भीमसेनको तीन बाणोंसे घायल करके भारी बाण- वर्षाके द्वारा आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ३७ ॥
धृष्टद्युम्नं कृपः क्रुद्धो बाणवर्षैरपीडयत् ।
द्रौपदेयांश्च शकुनिर्यमौ च द्रौणिरभ्ययात् ॥ ३८ ॥
तत्पश्चात् कुपित हुए कृपाचार्यने धृष्टद्युम्नको अपनी बाण-वर्षाद्वारा पीड़ित कर दिया । शकुनिने द्रौपदीके पुत्रोंपर और अश्वत्थामाने नकुल सहदेवपर धावा किया ॥ ३८ ॥
दुर्योधनो युधां श्रेष्ठ आहवे केशवार्जुनौ ।
समभ्ययादुग्रतेजाः शरैश्चाप्यहनद् बली ॥ ३ ९ ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ, भयंकर तेजस्वी और बलवान् दुर्योधनने समरांगणमें श्रीकृष्ण और अर्जुनपर चढ़ाई की तथा बाणोंद्वारा उन्हें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३ ९ ॥
एवं द्वन्द्वशतान्यासंस्त्वदीयानां परैः सह ।
घोररूपाणि चित्राणि तत्र तत्र विशाम्पते ॥ ४० ॥
पृष्ठ 2514
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रजानाथ! इस प्रकार जहाँ - तहाँ आपके सैनिकोंके शत्रुओंके साथ सैकड़ों भयानक एवं विचित्र द्वन्द्वयुद्ध होने लगे ॥ ४० ॥
ऋक्षवर्णाञ्जघानाश्वान् भोजो भीमस्य संयुगे ।
सोऽवतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वात् पाण्डुनन्दनः ॥ ४१ ॥
कालो दण्डमिवोद्यम्य गदापाणिरयुध्यत । कृतवर्माने युद्धस्थलमें भीमसेनके रीछके समान रंगवाले घोड़ोंको मार डाला । घोड़ोंके मारे जानेपर पाण्डुनन्दन भीमसेन रथकी बैठकसे नीचे उतरकर हाथमें गदा ले युद्ध करने लगे, मानो यमराज अपना दण्ड उठाकर प्रहार कर रहे हों ॥ ४१ ॥
प्रमुखे सहदेवस्य जघानाश्वान् स मद्रराट् ॥ ४२ ॥
ततः शल्यस्य तनयं सहदेवोऽसिनावधीत् । मद्रराज शल्यने अपने सामने आये हुए सहदेवके घोड़ोंको मार डाला । तब सहदेवने भी शल्यके पुत्रको तलवारसे मार गिराया ॥ ४२३ ॥
गौतमः पुनराचार्यो धृष्टद्युम्नमयोधयत् ॥ ४३ ॥
असम्भ्रान्तमसम्भ्रान्तो यत्नवान् यत्नवत्तरम् । कृपाचार्य बिना किसी घबराहटके विजयके लिये यत्नशील हो सम्भ्रमरहित और अधिक प्रयत्नशील धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४३३ ॥
द्रौपदेयांस्तथा वीरानेकैकं दशभिः शरैः ॥ ४४ ॥
अविद्धयदाचार्यसुतो नातिक्रुद्धो हसन्निव । आचार्य द्रोणके पुत्र अश्वत्थामाने अधिक क्रुद्ध न होकर हँसते हुए-से दस - दस बाणोंद्वारा द्रौपदीके वीर पुत्रोंमेंसे प्रत्येकको घायल कर दिया ॥ ४४ ॥
पुनश्च भीमसेनस्य जघानाश्वांस्तथाऽऽहवे ॥ ४५ ॥
सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं हताश्वः पाण्डुनन्दनः ।
कालो दण्डमिवोद्यम्य गदां क्रुद्धो महाबलः ॥ ४६ ॥
पोथयामास तुरगान् रथं च कृतवर्मणः ।
कृतवर्मा त्ववप्लुत्य रथात् तस्मादपाक्रमत् ॥ ४७ ॥
( इसी बीचमें भीमसेन दूसरे रथपर आरूढ़ हो गये थे ) कृतवर्माने युद्धस्थलमें पुनः भीमसेनके घोड़ोंको मार डाला । तब घोड़ोंके, मारे जानेपर महाबली पाण्डुकुमार भीमसेन शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और कुपित हो दण्ड उठाये कालके समान गदा लेकर उन्होंने कृतवर्माके घोड़ों तथा रथको चूर- चूर कर दिया । कृतवर्मा उस रथसे कूदकर भाग गया ॥ ४५–४७ ॥
शल्योऽपि राजन् संक्रुद्धो निघ्नन् सोमकपाण्डवान् ।
पुनरेव शितैर्बाणैर्युधिष्ठिरमपीडयत् ॥ ४८ ॥
पृष्ठ 2515
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजन्! इधर शल्य भी अत्यन्त क्रोधमें भरकर सोमकों और पाण्डवयोद्धाओंका संहार करने लगे । उन्होंने पुनः पैने बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको पीड़ा देना प्रारम्भ किया ॥
तस्य भीमो रणे क्रुद्धः संदश्य दशनच्छदम् ।
विनाशायाभिसंधाय गदामादाय वीर्यवान् ॥ ४ ९ ॥
यमदण्डप्रतीकाशां कालरात्रिमिवोद्यताम् ।
गजवाजिमनुष्याणां देहान्तकरणीमपि ॥ ५० ॥
यह देख पराक्रमी भीमसेन कुपित हो ओठ चबाते हुए रणभूमिमें शल्यके विनाशका संकल्प लेकर यमदण्डके समान भयंकर गदा लिये उनपर टूट पड़े। हाथी, घोड़े और मनुष्योंके भी शरीरोंका विनाश करनेवाली वह गदा संहारके लिये उद्यत हुई कालरात्रिके समान जान पड़ती थी ॥
हेमपट्टपरिक्षिप्तामुल्कां प्रज्वलितामिव ।
शैक्यां व्यालीमिवात्युग्रां वज्रकल्पामयोमयीम् ॥ ५१ ॥
चन्दनागुरुपङ्काक्तां प्रमदामीप्सितामिव ।
वसामेदोपदिग्धाङ्गीं जिह्वां वैवस्वतीमिव ॥ ५२ ॥
उसके ऊपर सोनेका पत्र जड़ा गया था । वह लोहेकी बनी हुई वज्रतुल्य गदा प्रज्वलित उल्का तथा छींकेपर बैठी हुई सर्पिणीके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होती थी । अंगोंमें चन्दन और अगुरुका लेप लगाये हुए मनचाही प्रियतमा रमणीके समान उसके सर्वांगमें वसा और मेद लिपटे हुए थे । वह देखनेमें यमराजकी जिह्वाके समान भयंकर थी ॥ ५१-५२ ॥
पटुघण्टाशतरवां वासवीमशनीमिव ।
निर्मुक्ताशीविषाकारां पृक्तां गजमदैरपि ॥ ५३ ॥
त्रासनीं सर्वभूतानां स्वसैन्यपरिहर्षिणीम् ।
मनुष्यलोके विख्यातां गिरिशृङ्गविदारणीम् ॥ ५४ ॥
उसमें सैकड़ों घंटियाँ लगी थीं, जिनका कलरव गूँजता रहता था । वह इन्द्रके वज्रकी भाँति भयानक जान पड़ती थी । केंचुल से छूटे हुए विषधर सर्पके समान वह सम्पूर्ण प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करती थी और अपनी सेनाका हर्ष बढ़ाती रहती थी । उसमें हाथीके मद लिपटे हुए थे । पर्वतशिखरोंको विदीर्ण करनेवाली वह गदा मनुष्यलोकमें सर्वत्र विख्यात है ॥ ५३-५४ ॥
यया कैलासभवने महेश्वरसखं बली ।
आह्वयामास युद्धाय भीमसेनो महाबलः ॥ ५५ ॥
यह वही गदा है, जिसके द्वारा महाबली भीमसेनने कैलासशिखरपर भगवान् शंकरके सखा कुबेरको युद्धके लिये ललकारा था ॥ ५५ ॥
यया मायामयान् दृप्तान् सुबहून् धनदालये ।
जघान गुह्यकान् क्रुद्धो नदन् पार्थो महाबलः ॥ ५६ ॥
पृष्ठ 2516
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
निवार्यमाणो बहुभिर्द्रौपद्याः प्रियमास्थितः । तथा जिसके द्वारा क्रोधमें भरे हुए महाबलवान् कुन्तीकुमार भीमने बहुतोंके मना करनेपर भी द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये उद्यत हो गर्जना करते हुए कुबेरभवनमें रहनेवाले बहुत - से मायामय अभिमानी गुह्यकोंका वध किया था ॥ ५६३ ॥
तां वज्रमणिरत्नौघकल्मषां वज्रगौरवाम् ॥ ५७ ॥
समुद्यम्य महाबाहुः शल्यमभ्यपतद् रणे । जिसमें वज्रकी गुरुता भरी है और जो हीरे, मणि तथा रत्नसमूहोंसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करती है, उसीको हाथमें उठाकर महाबाहु भीमसेन रणभूमिमें शल्यपर टूट पड़े ॥ ५७ ॥
गदया युद्धकुशलस्तया दारुणनादया ॥ ५८ ॥
पोथयामास शल्यस्य चतुरोऽश्वान् महाजवान् । युद्धकुशल भीमसेनने भयंकर शब्द करनेवाली उस गदाके द्वारा शल्यके महान् वेगशाली चारों घोड़ोंको मार गिराया ॥ ५८३ ॥
ततः शल्यो रणे क्रुद्धः पीने वक्षसि तोमरम् ॥ ५ ९ ॥ निचखान नदन् वीरो वर्म भित्त्वा च सोऽभ्ययात् । तब रणभूमिमें कुपित हो गर्जना करते हुए वीर शल्यने भीमसेनके विशाल वक्षःस्थलमें
एक तोमर धँसा दिया । वह उनके कवचको छेदकर छातीमें गड़ गया ॥
वृकोदरस्त्वसम्भ्रान्तस्तमेवोद्धृत्य तोमरम् ॥ ६० ॥
यन्तारं मद्रराजस्य निर्बिभेद ततो हृदि । इससे भीमसेनको तनिक भी घबराहट नहीं हुई । उन्होंने उसी तोमरको निकालकर उसके द्वारा मद्रराज शल्यके सारथिकी छाती छेद डाली ॥ ६०३ ॥
स भिन्नमर्मा रुधिरं वमन् वित्रस्तमानसः ॥ ६१ ॥
पपाताभिमुखो दीनो मद्रराजस्त्वपाक्रमत् । इससे सारथिका मर्मस्थल विदीर्ण हो गया और वह मुँहसे रक्त वमन करता हुआ दीन एवं भयभीतचित्त होकर शल्यके सामने ही रथसे नीचे गिर पड़ा । फिर तो मद्रराज शल्य वहाँसे पीछे हट गये ॥ ६१३ ॥
कृतप्रतिकृतं दृष्ट्वा शल्यो विस्मितमानसः ॥ ६२ ॥
गदामाश्रित्य धर्मात्मा प्रत्यमित्रमवैक्षत । अपने प्रहारका भरपूर उत्तर प्राप्त हुआ देख धर्मात्मा शल्यका चित्त आश्चर्यसे चकित हो उठा । वे गदा हाथमें लेकर अपने शत्रुकी ओर देखने लगे ॥ ६२ ॥
ततः सुमनसः पार्था भीमसेनमपूजयन् ।
ते दृष्ट्वा कर्म संग्रामे घोरमक्लिष्टकर्मणः ॥ ६३ ॥
पृष्ठ 2517
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संग्राममें अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भीमसेनका वह घोर पराक्रम देखकर कुन्तीके सभी पुत्र प्रसन्नचित्त हो उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि भीमसेनशल्ययुद्धे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें भीमसेन और शल्यका युद्धविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
पृष्ठ 2518
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वादशोऽध्यायः भीमसेन और शल्यका भयानक गदायुद्ध तथा युधिष्ठिरके साथ शल्यका युद्ध, दुर्योधनद्वारा चेकितानका और युधिष्ठिरद्वारा चन्द्रसेन एवं द्रुमसेनका वध, पुनः युधिष्ठिर और माद्रीपुत्रोंके साथ शल्यका युद्ध संजय उवाच
पतितं प्रेक्ष्य यन्तारं शल्यः सर्वायसीं गदाम् ।
आदाय तरसा राजंस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! अपने सारथिको गिरा हुआ देख मद्रराज शल्य वेगपूर्वक लोहेकी गदा हाथमें लेकर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ १ ॥
तं दीप्तमिव कालाग्निं पाशहस्तमिवान्तकम् ।
सशृङ्गमिव कैलासं सवज्रमिव वासवम् ॥ २ ॥
सशूलमिव हर्यक्षं वने मत्तमिव द्विपम् ।
जवेनाभ्यपतद् भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ ३ ॥
वे प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्नि, पाशधारी यमराज, शिखरयुक्त कैलास, वज्रधारी इन्द्र, त्रिशूलधारी रुद्र तथा जंगलके मतवाले हाथीके समान भयंकर जान पड़ते थे । भीमसेन बहुत बड़ी गदा हाथमें लेकर वेगपूर्वक उनके ऊपर टूट पड़े ॥ २-३ ॥
ततः शङ्खप्रणादश्च तूर्याणां च सहस्रशः ।
सिंहनादश्च संजज्ञे शूराणां हर्षवर्धनः ॥ ४ ॥
फिर तो शंखनाद, सहस्रों वाद्योंका गम्भीर घोष तथा शूरवीरोंका हर्ष बढ़ानेवाला सिंहनाद सब ओर होने लगा ॥
प्रेक्षन्तः सर्वतस्तौ हि योधा योधमहाद्विपौ ।
तावकाश्चापरे चैव साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ ५ ॥
योद्धाओंमें महान् गजराजके समान पराक्रमी उन दोनों वीरोंको देखकर आपके और शत्रुपक्षके योद्धा सब ओरसे ' वाह- वाह ' कहकर उनके प्रति सम्मान प्रकट करने लगे - ॥ ५ ॥
न हि मद्राधिपादन्यो रामाद् वा यदुनन्दनात् ।
सोढुमुत्सहते वेगं भीमसेनस्य संयुगे ॥ ६ ॥
‘ संसारमें मद्रराज शल्य अथवा यदुनन्दन बलरामजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा योद्धा नहीं है, जो युद्धमें भीमसेनका वेग सह सके ॥ ६ ॥
पृष्ठ 2519
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मनः ।
सोढुमुत्सहते नान्यो योधो युधि वृकोदरात् ॥ ७ ॥
' इसी प्रकार महामना मद्रराज शल्यकी गदाका वेग भी रणभूमिमें भीमसेनके सिवा दूसरा कोई योद्धा नहीं सह सकता' ॥ ७ ॥
तौ वृषाविव नर्दन्ती मण्डलानि विचेरतुः ।
आवर्तितौ गदाहस्तौ मद्रराजवृकोदरौ ॥ ८ ॥
शल्य और भीमसेन दोनों वीर हाथमें गदा लिये साँड़ोंकी तरह गर्जते हुए चक्कर लगाने और पैंतरे देने लगे ॥ ८ ॥
मण्डलावर्तमार्गेषु गदाविहरणेषु च ।
निर्विशेषमभूद् युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः ॥ ९ ॥
मण्डलाकार गतिसे घूमनेमें, भाँति - भाँतिके पैंतरे दिखानेकी कलामें तथा गदाका प्रहार करनेमें उन दोनों पुरुषसिंहोंमें कोई भी अन्तर नहीं दिखायी देता था, दोनों एक- से जान पड़ते थे ॥ ९ ॥
तप्तहेममयैः शुभ्रैर्बभूव भयवर्धिनी ।
अग्निजालैरिवाबद्धा पट्टैः शल्यस्य सा गदा ॥ १० ॥
तपाये हुए उज्ज्वल सुवर्णमय पत्रोंसे जड़ी हुई शल्यकी वह भयंकर गदा आगकी ज्वालाओंसे लिपटी हुई- सी प्रतीत होती थी ॥ १० ॥
तथैव चरतो मार्गान् मण्डलेषु महात्मनः ।
विद्युदभ्रप्रतीकाशा भीमस्य शुशुभे गदा ॥ ११ ॥
इसी प्रकार मण्डलाकार गतिसे विचित्र पैंतरोंके साथ विचरते हुए महामनस्वी भीमसेनकी गदा बिजलीसहित मेघके समान सुशोभित होती थी ॥ ११ ॥
ताडिता मद्रराजेन भीमस्य गदया गदा ।
दह्यमानेव खे राजन् सासृजत् पावकार्चिषः ॥ १२ ॥
राजन्! मद्रराजने अपनी गदासे जब भीमसेनकी गदापर चोट की, तब वह प्रज्वलित-सी हो उठी और उससे आगकी लपटें निकलने लगीं ॥ १२ ॥
तथा भीमेन शल्यस्य ताडिता गदया गदा ।
अङ्गारवर्षं मुमुचे तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १३ ॥
इसी प्रकार भीमसेनकी गदासे ताड़ित होकर शल्यकी गदा भी अंगारे बरसाने लगी ।
वह अद्भुत - सा दृश्य हुआ ॥ १३ ॥
दन्तैरिव महानागी शृङ्गेरिव महर्षभौ ।
तोत्रैरिव तदान्योन्यं गदाग्राभ्यां निजघ्नतुः ॥ १४ ॥
जैसे दो विशाल हाथी दाँतोंसे और दो बड़े - बड़े साँड़ सींगोंसे एक- दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार अंकुशों जैसी उन श्रेष्ठ गदाओं द्वारा वे दोनों वीर एक-दूसरेपर आघात करने
पृष्ठ 2520
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
लगे ॥ १४ ॥
तौ गदाभिहतैर्गात्रैः क्षणेन रुधिरोक्षितौ ।
प्रेक्षणीयतरावास्तां पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ १५ ॥
उन दोनोंके अंगोंमें गदाकी गहरी चोटोंसे घाव हो गये थे । अतः दोनों ही क्षणभरमें खूनसे नहा गये । उस समय खिले हुए दो पलाशवृक्षोंके समान वे दोनों वीर देखने ही योग्य जान पड़ते थे ॥ १५ ॥
गदया मद्रराजस्य सव्यदक्षिणमाहतः ।
भीमसेनो महाबाहुर्न चचालाचलो तथा ॥ १६ ॥
मद्रराजकी गदासे दायें- बायें अच्छी तरह चोट खाकर भी महाबाहु भीमसेन विचलित नहीं हुए । वे पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रहे ॥ १६ ॥
तथा भीमगदावेगैस्ताड्यमानो मुहुर्मुहुः ।
शल्यो न विव्यथे राजन् दन्तिनेव महागिरिः ॥ १७ ॥
इसी प्रकार भीमसेनकी गदाके वेगसे बारंबार आहत होनेपर भी शल्यको उसी प्रकार व्यथा नहीं हुई, जैसे दन्तार हाथीके आघातसे महान् पर्वत पीड़ित नहीं होता ॥
शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तयोः पुरुषसिंहयोः ।
गदानिपातसंह्रादो वज्रयोरिव निःस्वनः ॥ १८ ॥
उस समय उन दोनों पुरुषसिंहोंकी गदाओंके टकरानेकी आवाज सम्पूर्ण दिशाओंमें दो वज्रोंके आघातके समान सुनायी देती थी ॥ १८ ॥
निवृत्य तु महावीर्यौ समुच्छ्रितमहागदौ ।
पुनरन्तरमार्गस्थौ मण्डलानि विचेरतुः ॥ १ ९ ॥
महापराक्रमी भीमसेन और शल्य दोनों वीर अपनी विशाल गदाओंको ऊपर उठाये कभी पीछे लौट पड़ते, कभी मध्यम मार्गमें स्थित होते और कभी मण्डलाकार घूमने लगते थे ॥ १ ९ ॥
अथाभ्येत्य पदान्यष्टौ संनिपातोऽभवत् तयोः ।
उद्यम्य लोहदण्डाभ्यामतिमानुषकर्मणोः ॥ २० ॥
वे युद्ध करते - करते आठ कदम आगे बढ़ आये और लोहेके डंडे उठाकर एक- दूसरेको मारने लगे । उनका पराक्रम अलौकिक था । उन दोनोंमें उस समय भयानक संघर्ष होने लगा ॥ २० ॥
पोथयन्तौ तदान्योन्यं मण्डलानि विचेरतुः ।
क्रियाविशेषं कृतिनौ दर्शयामासतुस्तदा ॥ २१ ॥
वे दोनों युद्धकलाके विद्वान् वीर, एक- दूसरेको कुचलते हुए मण्डलाकार विचरते और अपना- अपना विशेष कार्य- कौशल प्रदर्शित करते थे ॥ २१ ॥
अथोद्यम्य गदे घोरे सशृङ्गाविव पर्वतौ ।