04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2521–2530
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2521–2530
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तावाजघ्नतुरन्योन्यं मण्डलानि विचेरतुः ॥ २२ ॥
तदनन्तर वे पुनः अपनी भयंकर गदाएँ उठाकर शिखरयुक्त दो पर्वतोंके समान परस्पर आघात करने और मण्डलाकार गतिसे विचरने लगे ॥ २२ ॥
क्रियाविशेषकृतिनौ रणभूमितलेऽचलौ ।
तौ परस्परसंरम्भाद् गदाभ्यां सुभृशाहतौ ॥ २३ ॥
युगपत् पेततुर्वीरावुभाविन्द्रध्वजाविव ।
उभयोः सेनयोर्वीरास्तदा हाहाकृतोऽभवन् ॥ २४ ॥
युद्धविषयक कार्यविशेषके ज्ञाता वे दोनों वीर अविचलभावसे रणभूमिमें डटे हुए थे । वे एक- दूसरेपर क्रोधपूर्वक गदाओंका प्रहार करके अत्यन्त घायल हो गये और दो इन्द्रध्वजोंके समान एक ही साथ पृथ्वीपर गिर पड़े । उस समय दोनों सेनाओंके वीर हाहाकार करने लगे ||
भृशं मर्माण्यभिहतावुभावास्तां सुविह्वलौ ।
ततः स्वरथमारोप्य मद्राणामृषभं रणे ॥ २५ ॥
अपोवाह कृपः शल्यं तूर्णमायोधनादथ । भीम और शल्य दोनोंके मर्मस्थानोंमें गहरी चोटें लगी थीं; इसलिये दोनों ही अत्यन्त व्याकुल हो गये थे । इतनेहीमें कृपाचार्य मद्रराज शल्यको अपने रथपर बिठाकर तुरंत ही युद्धभूमिसे दूर हटा ले गये ॥ २५ ॥
क्षीणवद् विह्वलत्वात् तु निमेषात् पुनरुत्थितः ॥ २६ ॥
भीमसेनो गदापाणिः समाह्वयत मद्रपम् । इधर गदाधारी भीमसेन पलक मारते- मारते पुनः होशमें आकर उठ खड़े हुए और विह्वलताके कारण मतवाले पुरुषके समान मद्रराजको युद्धके लिये ललकारने लगे ॥ ततस्तु तावकाः शूरा नानाशस्त्रसमायुताः ॥ २७ ॥
नानावादित्रशब्देन पाण्डुसेनामयोधयन् । तब आपके सैनिक नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र लेकर भाँति- भाँतिके रणवाद्योंकी गम्भीर ध्वनिके साथ पाण्डव - सेनासे युद्ध करने लगे ॥ २७३ ॥
भुजावुच्छ्रित्य शस्त्रं च शब्देन महता ततः ॥ २८ ॥
अभ्यद्रवन् महाराज दुर्योधनपुरोगमाः । महाराज! दुर्योधन आदि कौरववीर दोनों हाथ और शस्त्र उठाकर महान् कोलाहल एवं सिंहनाद करते हुए शत्रुओंपर टूट पड़े ॥ २८३ ॥
तदनीकमभिप्रेक्ष्य ततस्ते पाण्डुनन्दनाः ॥ २९ ॥
प्रययुः सिंहनादेन दुर्योधनपुरोगमान् । उस कौरवदलको धावा करते देख पाण्डव- वीर सिंहके समान गर्जना करके दुर्योधन आदिकी ओर बढ़ चले ॥ २ ९ ३ ॥
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तेषामापततां तूर्णं पुत्रस्ते भरतर्षभ ॥ ३० ॥
प्रासेन चेकितानं वै विव्याध हृदये भृशम् । भरतश्रेष्ठ! आपके पुत्रने तुरंत ही एक प्रासका प्रहार करके उन आक्रमणकारी पाण्डव-योद्धाओंमेंसे चेकितानकी छातीपर गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३० ॥
स पपात रथोपस्थे तव पुत्रेण ताडितः ॥ ३१ ॥
रुधिरौघपरिक्लिन्नः प्रविश्य विपुलं तमः । आपके पुत्रद्वारा ताड़ित होकर चेकितान अत्यन्त मूर्च्छित हो रथकी बैठकमें गिर पड़ा । उस समय उसका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो गया था ॥ ३१ ॥
चेकितानं हतं दृष्ट्वा पाण्डवेया महारथाः ॥ ३२ ॥
असक्तमभ्यवर्षन्त शरवर्षाणि भागशः । चेकितानको मारा गया देख पाण्डव महारथी पृथक्- पृथक् बाणोंकी लगातार वर्षा करने लगे ॥ ३२ ॥
तावकानामनीकेषु पाण्डवा जितकाशिनः ॥ ३३ ॥
व्यचरन्त महाराज प्रेक्षणीयाः समन्ततः । महाराज! विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव आपकी सेनाओंमें सब ओर निर्भय विचरते थे । उस समय वे देखने ही योग्य थे ॥ ३३३ ॥
कृपश्च कृतवर्मा च सौबलश्च महारथः ॥ ३४ ॥
अयोधयन् धर्मराजं मद्रराजपुरस्कृताः । तत्पश्चात् कृपाचार्य, कृतवर्मा और महारथी शकुनि मद्रराज शल्यको आगे करके धर्मराज युधिष्ठिरसे युद्ध करने लगे ॥ ३४३ ॥
भारद्वाजस्य हन्तारं भूरिवीर्यपराक्रमम् ॥ ३५ ॥
दुर्योधनो महाराज धृष्टद्युम्नमयोधयत् । राजाधिराज! आपका पुत्र दुर्योधन अत्यन्त बल- पराक्रमसे सम्पन्न द्रोणहन्ता धृष्टद्युम्नके साथ जूझने लगा ॥ त्रिसाहस्रास्तथा राजंस्तव पुत्रेण चोदिताः ॥ ३६ ॥
अयोधयन्त विजयं द्रोणपुत्रपुरस्कृताः । राजन्! आपके पुत्रसे प्रेरित हो तीन हजार योद्धा अश्वत्थामाको अगुआ बनाकर अर्जुनके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३६३ ॥
विजये धृतसंकल्पाः समरे त्यक्तजीविताः ॥ ३७ ॥
प्राविशंस्तावका राजन् हंसा इव महत् सरः । नरेश्वर! जैसे हंस महान् सरोवरमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार आपके सैनिक समरांगणमें विजयका दृढ़ संकल्प ले प्राणोंका मोह छोड़कर शत्रुओंकी सेनामें जा घुसे ॥
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ततो युद्धमभूद् घोरं परस्परवधैषिणाम् ॥ ३८ ॥
अन्योन्यवधसंयुक्तमन्योन्यप्रीतिवर्धनम् । फिर तो एक- दूसरेके वधकी इच्छावाले उभयपक्षके सैनिकोंमें घोर युद्ध होने लगा । सभी एक- दूसरेके संहारके लिये सचेष्ट थे और वह युद्ध उनकी पारस्परिक प्रसन्नताको बढ़ा रहा था ॥ ३८ ॥
तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे राजन् वीरवरक्षये ॥ ३ ९ ॥ अनिलेनेरितं घोरमुत्तस्थौ पार्थिवं रजः । राजन्! बड़े - बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस घोर संग्रामके आरम्भ होते ही वायुकी प्रेरणासे धरतीकी भयंकर धूल ऊपरको उठने लगी ॥ ३ ९ ३ ॥ श्रवणान्नामधेयानां पाण्डवानां च कीर्तनात् ॥ ४० ॥
परस्परं विजानीमो यदयुद्धयन्नभीतवत् । उस समय उस धूलके अन्धकारमें समस्त योद्धा निर्भय से होकर युद्ध कर रहे थे । पाण्डव तथा कौरव- योद्धा जो अपना नाम लेकर परिचय देते थे, उसे ही सुनकर हमलोग एक- दूसरेको पहचान पाते थे ॥ ४० ॥
तद्रजः पुरुषव्याघ्र शोणितेन प्रशामितम् ॥ ४१ ॥
दिशश्च विमला जातास्तस्मिंस्तमसि नाशिते ।
पुरुषसिंह! उस समय इतना खून बहा कि उससे वहाँ छायी हुई सारी धूल बैठ गयी ।
उस धूलजनित अन्धकारका नाश होनेपर सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं ॥
तथा प्रवृत्ते संग्रामे घोररूपे भयानके ॥ ४२ ॥
तावकानां परेषां च नासीत् कश्चित् पराङ्मुखः । इस प्रकार वह घोर एवं भयानक संग्राम चलने लगा । उस समय आपके और शत्रुपक्षके योद्धाओंमेंसे कोई भी युद्धसे विमुख नहीं हुआ ॥ ४२३ ॥
ब्रह्मलोकपरा भूत्वा प्रार्थयन्तो जयं युधि ॥ ४३ ॥
सुयुद्धेन पराक्रान्ता नसः स्वर्गमभीप्सवः । सबका लक्ष्य था ब्रह्मलोककी प्राप्ति । वे सभी सैनिक युद्धमें विजय चाहते और उत्तम युद्धके द्वारा पराक्रम दिखाते हुए स्वर्गलोक पानेकी अभिलाषा रखते थे ॥ भर्तृपिण्डविमोक्षार्थं भर्तृकार्यविनिश्चिताः ॥ ४४ ॥
स्वर्गसंसक्तमनसो योधा युयुधिरे तदा । सभी योद्धा स्वामीके दिये हुए अन्नके ऋणसे उऋण होनेके लिये उनके कार्यको सिद्ध करनेका दृढ़ निश्चय किये मनमें स्वर्गकी अभिलाषा रखकर उस समय उत्साहपूर्वक युद्ध कर रहे थे ॥ ४४ ॥
नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः ॥ ४५ ॥
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अन्योन्यमभिगर्जन्तः प्रहरन्तः परस्परम् । नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंका प्रयोग करके परस्पर प्रहार करनेवाले महारथी एक-दूसरेको लक्ष्य करके गर्जना करते थे ॥ ४५३ ॥
हत विध्यत गृह्णीत प्रहरध्वं निकृन्तत ॥ ४६ ॥
इति स्म वाचः श्रूयन्ते तव तेषां च वै बले । आपकी और पाण्डवोंकी सेनामें ' मारो, बींध डालो, पकड़ो, प्रहार करो और टुकड़े-टुकड़े कर डालो ' ये ही बातें सुनायी देती थीं ॥ ४६३ ॥
ततः शल्यो महाराज धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ४७ ॥
विव्याध निशितैर्बाणैर्हन्तुकामो महारथम् । महाराज! तदनन्तर राजा शल्यने महारथी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको मार डालनेकी इच्छासे पैने बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ ४७ ॥
तस्य पार्थो महाराज नाराचान् वै चतुर्दश ॥ ४८ ॥
मर्माण्युद्दिश्य मर्मज्ञो निचखान हसन्निव । महाराज! मर्मज्ञ कुन्तीकुमारने शल्यके मर्मस्थानोंको लक्ष्य करके हँसते हुए - से चौदह नाराच चलाये और उनके अंगोंमें धँसा दिये ॥ ४८३ ॥
आवार्य पाण्डवं बाणैर्हन्तुकामो महाबलः ॥ ४ ९ ॥ विव्याध समरे क्रुद्धो बहुभिः कङ्कपत्रिभिः । महाबली शल्य पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको रोककर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे समरांगणमें कंकपत्रयुक्त अनेक बाणोंद्वारा उनपर क्रोधपूर्वक प्रहार करने लगे ॥ अथ भूयो महाराज शरेणानतपर्वणा ॥ ५० ॥
युधिष्ठिरं समाजघ्ने सर्वसैन्यस्य पश्यतः । राजाधिराज! फिर उन्होंने सारी सेनाके देखते-देखते झुकी हुई गाँठवाले बाणसे युधिष्ठिरको घायल कर दिया ॥ धर्मराजोऽपि संक्रुद्धो मद्रराजं महायशाः ॥ ५१ ॥
विव्याध निशितैर्बाणैः कङ्कबर्हिणवाजितैः । तब महायशस्वी धर्मराजने भी अत्यन्त कुपित हो कंक और मोरकी पाँखोंवाले पैने बाणोंसे मद्रराज शल्यको क्षत- विक्षत कर दिया ॥ ५१३ ॥
चन्द्रसेनं च सप्तत्या सूतं च नवभिः शरैः ॥ ५२ ॥
द्रुमसेनं चतुःषष्ट्या निजघान महारथः । इसके बाद महारथी युधिष्ठिरने सत्तर बाणोंसे चन्द्रसेनको, नौ बाणोंसे शल्यके सारथिको और चौंसठ बाणोंसे द्रुमसेनको मार डाला ॥ ५२३ ॥
चक्ररक्षे हते शल्यः पाण्डवेन महात्मना ॥ ५३ ॥
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निजघान ततो राजंश्चेदीन् वै पञ्चविंशतिम् । महात्मा पाण्डवके द्वारा अपने चक्ररक्षकके मारे जानेपर राजा शल्यने पचीस चेदि-योद्धाओंका संहार कर डाला ॥ ५३३ ॥
सात्यकिं पञ्चविंशत्या भीमसेनं च पञ्चभिः ॥ ५४ ॥
माद्रीपुत्रौ शतेनाजौ विव्याध निशितैः शरैः । फिर सात्यकिको पचीस, भीमसेनको पाँच तथा माद्रीके पुत्रोंको सौ तीखे बाणोंसे रणभूमिमें घायल कर दिया ॥ एवं विचरतस्तस्य संग्रामे राजसत्तम ॥ ५५ ॥
सम्प्रैषयच्छितान् पार्थः शरानाशीविषोपमान् । नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार संग्राममें विचरते हुए राजा शल्यको लक्ष्य करके कुन्तीकुमारने विषधर सर्पोंके समान भयंकर एवं तीखे बाण चलाये ॥ ५५३ ॥
ध्वजाग्रं चास्य समरे कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ५६ ॥
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरद् रथात् । कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने समरांगणमें सामने खड़े हुए शल्यकी ध्वजाके अग्रभागको एक भल्लके द्वारा रथसे काट गिराया ॥ ५६३ ॥
पाण्डुपुत्रेण वै तस्य केतुं छिन्नं महात्मना ॥ ५७ ॥
निपतन्तमपश्याम गिरिशृङ्गमिवाहतम् । महात्मा पाण्डुपुत्रके द्वारा कटकर गिरते हुए उस ध्वजको हमलोगोंने वज्रके आघातसे टूटकर नीचे गिरनेवाले पर्वत - शिखरके समान देखा था ॥ ५७ ॥
ध्वजं निपतितं दृष्ट्वा पाण्डवं च व्यवस्थितम् ॥ ५८ ॥
संक्रुद्धो मद्रराजोऽभूच्छरवर्ष मुमोच ह । ध्वज नीचे गिर पड़ा और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर सामने खड़े हैं; यह देखकर मद्रराज शल्यको बड़ा क्रोध हुआ और वे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ५८ ॥
शल्यः सायकवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ ५ ९ ॥ अभ्यवर्षदमेयात्मा क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः । अमेय आत्मबलसे सम्पन्न क्षत्रियशिरोमणि शल्य वृष्टिकारी मेघके समान क्षत्रियोंपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ ५ ९ ३ ॥ सात्यकिं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ६० ॥
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा युधिष्ठिरमपीडयत् । सात्यकि, भीमसेन और माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल सहदेव – इनमेंसे प्रत्येकको पाँच-पाँच बाणोंसे घायल करके वे युधिष्ठिरको पीड़ा देने लगे ॥ ६०३ ॥
ततो बाणमयं जालं विततं पाण्डवोरसि ॥ ६१ ॥
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अपश्याम महाराज मेघजालमिवोद्गतम् । महाराज! तदनन्तर हमलोगोंने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी छातीपर बाणोंका जाल- सा बिछा हुआ देखा, मानो आकाशमें मेघोंकी घटा घिर आयी हो ॥ ६१३ ॥
तस्य शल्यो रणे क्रुद्धः शरैः संनतपर्वभिः ॥ ६२ ॥
दिशः संछादयामास प्रदिशश्च महारथः । रणभूमिमें कुपित हुए महारथी शल्यने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे युधिष्ठिरकी सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंको ढक दिया ॥ ६२३ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा बाणजालेन पीडितः ।
बभूवाद्भुतविक्रान्तो जम्भो वृत्रहणा यथा ॥ ६३ ॥
उस समय अद्भुत पराक्रमी राजा युधिष्ठिर उस बाणसमूहसे वैसे ही पीड़ित हो गये, जैसे इन्द्रने जम्भासुरको संतप्त किया था ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
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त्रयोदशोऽध्यायः मद्रराज शल्यका अद्भुत पराक्रम संजय उवाच
पीडिते धर्मराजे तु मद्रराजेन मारिष ।
सात्यकिर्भीमसेनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १ ॥
परिवार्य रथैः शल्यं पीडयामासुराहवे । संजय कहते हैं — आर्य! जब मद्रराज शल्य धर्मराज युधिष्ठिरको पीड़ा देने लगे, तब सात्यकि, भीमसेन और माद्रीपुत्र पाण्डव नकुल सहदेवने युद्धस्थलमें शल्यको रथोंद्वारा घेरकर उन्हें पीड़ा देना प्रारम्भ किया ॥ तमेकं बहुभिर्दृष्ट्वा पीड्यमानं महारथैः ॥ २ ॥
साधुवादो महाञ्जज्ञे सिद्धाश्चासन् प्रहर्षिताः ।
आश्चर्यमित्यभाषन्त मुनयश्चापि सङ्गताः ॥ ३ ॥
अकेले शल्यको अनेक महारथियोंद्वारा पीड़ित होते देख उनको सब ओरसे महान् साधुवाद प्राप्त होने लगा । वहाँ एकत्र हुए सिद्ध और महर्षि भी हर्षमें भरकर बोल उठे —‘आश्चर्य है ' ॥ २-३ ॥
भीमसेनो रणे शल्यं शल्यभूतं पराक्रमे ।
एकेन विद्ध्वा बाणेन पुनर्विव्याध सप्तभिः ॥ ४ ॥
भीमसेनने रणभूमिमें अपने पराक्रमके लिये कण्टकरूप शल्यको पहले एक बाणसे घायल करके फिर सात बाणोंसे बींध डाला ॥ ४ ॥
सात्यकिश्च शतेनैनं धर्मपुत्रपरीप्सया ।
मद्रेश्वरमवाकीर्य सिंहनादमथानदत् ॥ ५ ॥
सात्यकि भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये मद्रराजको सौ बाणोंसे आच्छादित करके सिंहके समान दहाड़ने लगे ॥ ५ ॥
नकुलः पञ्चभिश्चैनं सहदेवश्च पञ्चभिः ।
विद्ध्वा तं तु पुनस्तूर्णं ततो विव्याध सप्तभिः ॥ ६ ॥
नकुल और सहदेवने पाँच- पाँच बाणोंसे शल्यको घायल करके फिर सात बाणोंसे उन्हें तुरंत ही बींध डाला ॥
स तु शूरो रणे यत्तः पीडितस्तैर्महारथैः ।
विकृष्य कार्मुकं घोरं वेगघ्नं भारसाधनम् ॥ ७ ॥
सात्यकिं पञ्चविंशत्या शल्यो विव्याध मारिष ।
भीमसेनं तु सप्तत्या नकुलं सप्तभिस्तथा ॥ ८ ॥
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माननीय नरेश! समरांगणमें शूरवीर शल्यने उन महारथियोंद्वारा पीड़ित होनेपर भी विजयके लिये यत्नशील हो भार सहन करनेमें समर्थ और शत्रुके वेगका नाश करनेवाले एक भयंकर धनुषको खींचकर सात्यकिको पचीस, भीमसेनको सत्तर और नकुलको सात बाण मारे ॥
ततः सविशिखं चापं सहदेवस्य धन्विनः ।
छित्त्वा भल्लेन समरे विव्याधैनं त्रिसप्तभिः ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् समरभूमिमें एक भल्लके द्वारा धनुर्धर सहदेवके बाणसहित धनुषको काटकर शल्यने उन्हें इक्कीस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ९ ॥
सहदेवस्तु समरे मातुलं भूरिवर्चसम् ।
सज्यमन्यद् धनुः कृत्वा पञ्चभिः समताडयत् ॥ १० ॥
शरैराशीविषाकारैर्ज्वलज्ज्वलनसंनिभैः । तब सहदेवने संग्राममें दूसरे धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर अपने अत्यन्त तेजस्वी मामाको विषधर सर्पोंके समान भयंकर और जलती हुई आगके समान प्रज्वलित पाँच बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ १० ॥
सारथिं चास्य समरे शरेणानतपर्वणा ॥ ११ ॥
विव्याध भृशसंक्रुद्धस्तं वै भूयस्त्रिभिः शरैः । साथ ही अत्यन्त कुपित होकर उन्होंने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे उनके सारथिको भी पीट दिया और उन्हें भी पुनः तीन बाणोंसे घायल किया ॥ ११३ ॥
भीमसेनस्तु सप्तत्या सात्यकिर्नवभिः शरैः ॥ १२ ॥
धर्मराजस्तथा षष्ट्या गात्रे शल्यं समार्पयत् । तत्पश्चात् भीमसेनने सत्तर, सात्यकिने नौ और धर्मराज युधिष्ठिरने साठ बाणोंसे शल्यके शरीरको चोट पहुँचायी ॥ १२३ ॥
ततः शल्यो महाराज निर्विद्धस्तैर्महारथैः ॥ १३ ॥
सुस्राव रुधिरं गात्रैर्गैरिकं पर्वतो यथा । महाराज! उन महारथियोंद्वारा अत्यन्त घायल कर दिये जानेपर राजा शल्य अपने अंगोंसे रक्तकी धारा बहाने लगे, मानो पर्वत गेरु - मिश्रित जलका झरना बहा रहा हो ॥ १३ ॥ तांश्च सर्वान् महेष्वासान् पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥ १४ ॥
विव्याध तरसा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् । राजन्! उन्होंने उन सभी महाधनुर्धरोंको पाँच- पाँच बाणोंसे वेगपूर्वक घायल कर दिया । वह उनके द्वारा अद्भुत - सा कार्य हुआ ॥ १४३ ॥
ततोऽपरेण भल्लेन धर्मपुत्रस्य मारिष ॥ १५ ॥
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धनुश्चिच्छेद समरे सज्यं स सुमहारथः । मान्यवर! तदनन्तर उन श्रेष्ठ महारथी शल्यने समरांगणमें एक दूसरे भल्लके द्वारा धर्मपुत्र युधिष्ठिरके प्रत्यंचासहित धनुषको काट डाला ॥ १५३ ॥
अथान्यद् धनुरादाय धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १६ ॥
साश्वसूतध्वजरथं शल्यं प्राच्छादयच्छरैः । तब धर्मपुत्र युधिष्ठिरने दूसरा धनुष हाथमें लेकर घोड़े, सारथि, ध्वज और रथसहित शल्यको अपने बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १६ ॥
स च्छाद्यमानः समरे धर्मपुत्रस्य सायकैः ॥ १७ ॥
युधिष्ठिरमथाविध्यद् दशभिर्निशितैः शरैः । समरांगणमें धर्मपुत्रके बाणोंसे आच्छादित होते हुए शल्यने युधिष्ठिरको दस पैने बाणोंसे बींध डाला ॥ १७३ ॥
सात्यकिस्तु ततः क्रुद्धो धर्मपुत्रे शरार्दिते ॥ १८ ॥
मद्राणामधिपं शूरं शरैर्विव्याध पञ्चभिः । जब धर्मपुत्र युधिष्ठिर शल्यके बाणोंसे पीड़ित हो गये, तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने शूरवीर मद्रराजपर पाँच बाणोंका प्रहार किया ॥ १८६३ ॥
स सात्यकेः प्रचिच्छेद क्षुरप्रेण महद् धनुः ॥ १ ९ ॥ भीमसेनमुखांस्तांश्च त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् । यह देख शल्यने एक क्षुरप्रसे सात्यकिके विशाल धनुषको काट दिया और भीमसेन आदिको भी तीन - तीन बाणोंसे चोट पहुँचायी ॥ १ ९ ३ ॥ तस्य क्रुद्धो महाराज सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥ २० ॥
तोमरं प्रेषयामास स्वर्णदण्डं महाधनम् । महाराज! तब सत्यपराक्रमी सात्यकिने कुपित हो शल्यपर सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एक बहुमूल्य तोमरका प्रहार किया ॥ २० ॥
भीमसेनोऽथ नाराचं ज्वलन्तमिव पन्नगम् ॥ २१ ॥
नकुलः समरे शक्तिं सहदेवो गदां शुभाम् ।
धर्मराजः शतघ्नीं च जिघांसुः शल्यमाहवे ॥ २२ ॥
भीमसेनने प्रज्वलित सर्पके समान नाराच चलाया, नकुलने संग्रामभूमिमें शल्यपर शक्ति छोड़ी, सहदेवने सुन्दर गदा चलायी और धर्मराज युधिष्ठिरने रणक्षेत्रमें शल्यको मार डालनेकी इच्छासे उनपर शतघ्नीका प्रहार किया ॥ २१-२२ ॥
तानापतत एवाशु पञ्चानां वै भुजच्युतान् ।
वारयामास समरे शस्त्रसङ्घैः स मद्रराट् ॥ २३ ॥
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परंतु मद्रराज शल्यने समरांगणमें अपने शस्त्रसमूहों द्वारा उन पाँचों वीरोंके हाथोंसे छूटे हुए उक्त सभी अस्त्रोंका शीघ्र ही निवारण कर दिया ॥ २३ ॥
सात्यकिप्रहितं शल्यो भल्लैश्चिच्छेद तोमरम् ।
प्रहितं भीमसेनेन शरं कनकभूषणम् ॥ २४ ॥
द्विधा चिच्छेद समरे कृतहस्तः प्रतापवान् । सिद्धहस्त एवं प्रतापी वीर शल्यने अपने भल्लोंद्वारा सात्यकिके चलाये हुए तोमरके टुकड़े - टुकड़े कर डाले और भीमसेनके छोड़े हुए सुवर्णभूषित बाणके दो खण्ड कर डाले ॥ २४ ॥
नकुलप्रेषितां शक्तिं हेमदण्डां भयावहाम् ॥ २५ ॥
गदां च सहदेवेन शरौघैः समवारयत् । इसी प्रकार उन्होंने नकुलकी चलायी हुई स्वर्ण- दण्ड -विभूषित भयंकर शक्तिका तथा सहदेवकी फेंकी हुई गदाका भी अपने बाणसमूहोंद्वारा निवारण कर दिया ॥ शराभ्यां च शतघ्नीं तां राज्ञश्चिच्छेद भारत ॥ २६ ॥
पश्यतां पाण्डुपुत्राणां सिंहनादं ननाद च । भारत! फिर शल्यने दो बाणोंसे राजा युधिष्ठिरकी उस शतघ्नीको भी पाण्डवोंके देखते -देखते काट डाला और सिंहके समान दहाड़ना आरम्भ किया ॥ २६३ ॥
नामृष्यत्तत्र'शैनेयः शत्रोर्विजयमाहवे ॥ २७ ॥
अथान्यद् धनुरादाय सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः ।
द्वाभ्यां मद्रेश्वरं विद्ध्वा सारथिं च त्रिभिः शरैः ॥ २८ ॥
युद्धमें शत्रुकी इस विजयको शिनिपौत्र सात्यकि नहीं सहन कर सके । उन्होंने दूसरा धनुष हाथमें लेकर क्रोधसे आतुर हो दो बाणोंसे मद्रराजको घायल करके तीनसे उनके सारथिको भी बींध डाला ॥ २७-२८ ॥
ततः शल्यो रणे राजन् सर्वांस्तान् दशभिः शरैः ।
विव्याध भृशसंक्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपान् ॥ २९ ॥
राजन्! तब राजा शल्य रणभूमिमें अत्यन्त कुपित हो उठे और जैसे महावत अंकुशोंसे बड़े - बड़े हाथियोंको चोट पहुँचाते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उन सब योद्धाओंको दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २ ९ ॥
ते वार्यमाणाः समरे मद्रराज्ञा महारथाः ।
न शेकुः सम्मुखे स्थातुं तस्य शत्रुनिषूदनाः ॥ ३० ॥
समरांगणमें मद्रराज शल्यके द्वारा इस प्रकार रोके जाते हुए शत्रुसूदन पाण्डव- महारथी उनके सामने ठहर न सके ॥
ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा शल्यस्य विक्रमम् ।
निहतान् पाण्डवान् मेने पञ्चालानथ सृञ्जयान् ॥ ३१ ॥