04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2791–2800
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2791–2800
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तब लोकगुरु ब्रह्माने उनसे कहा – ' देवेन्द्र! अरुणा तीर्थ पाप- भयको दूर करनेवाला है । तुम वहाँ विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणाके जलमें स्नान करो ॥ ३ ९ ॥ एषा पुण्यजला शक्र कृता मुनिभिरेव तु ॥ ४० ॥
निगूढमस्यागमनमिहासीत् पूर्वमेव तु ।
ततोऽभ्येत्यारुणां देवीं प्लावयामास वारिणा ॥ ४१ ॥
‘ शक्र! महर्षियोंने इस अरुणाके जलको परम पवित्र बना दिया है । इस तीर्थमें पहले ही गुप्तरूपसे उसका आगमन हो चुका था, फिर सरस्वतीने निकट आकर अरुणादेवीको अपने जलसे आप्लावित कर दिया ॥
सरस्वत्यारुणायाश्च पुण्योऽयं संगमो महान् ।
इह त्वं यज देवेन्द्र दद दानान्यनेकशः ॥ ४२ ॥
अत्राप्लुत्य सुघोरात् त्वं पातकाद् विप्रमोक्ष्यसे । ‘ देवेन्द्र! सरस्वती और अरुणाका यह संगम महान् पुण्यदायक तीर्थ है । तुम यहाँ यज्ञ करो और अनेक प्रकारके दान दो । फिर उसमें स्नान करके तुम भयानक पातकसे मुक्त हो जाओगे ' ॥ ४२ ॥
इत्युक्तः स सरस्वत्याः कुञ्जे वै जनमेजय ॥ ४३ ॥
इष्ट्वा यथावद् बलभिदरुणायामुपास्पृशत् ।
स मुक्तः पाप्मना तेन ब्रह्मवध्याकृतेन च ॥ ४४ ॥
जगाम संहृष्टमनास्त्रिदिवं त्रिदशेश्वरः । जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सरस्वतीके कुंजमें विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणामें स्नान किया । फिर ब्रह्महत्याजनित पापसे मुक्त हो देवराज इन्द्र हर्षोत्फुल्ल हृदयसे स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ४३-४४३ ॥
शिरस्तच्चापि नमुचेस्तत्रैवाप्लुत्य भारत ।
लोकान् कामदुघान् प्राप्तमक्षयान् राजसत्तम ॥ ४५ ॥
भारत! नृपश्रेष्ठ! नमुचिका वह मस्तक भी उसी तीर्थमें गोता लगाकर मनोवांछित फल देनेवाले अक्षय लोकोंमें चला गया ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच तत्राप्युपस्पृश्य बलो महात्मा दत्त्वा च दानानि पृथग्विधानि । अवाप्य धर्मं परमार्थकर्मा जगाम सोमस्य महत् सुतीर्थम् ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! पारमार्थिक कार्य करनेवाले महात्मा बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान करके नाना प्रकारकी वस्तुओंका दान करके धर्मका फल पाकर सोमके
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महान् एवं उत्तम तीर्थमें गये ॥ ४६ ॥
यत्रायजद् राजसूयेन सोमः साक्षात् पुरा विधिवत् पार्थिवेन्द्रः । अत्रिर्धीमान् विप्रमुख्यो बभूव होता यस्मिन् क्रतुमुख्ये महात्मा ॥ ४७ ॥
जहाँ पूर्वकालमें साक्षात् राजाधिराज सोमने विधिपूर्वक राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया था । उस श्रेष्ठ यज्ञमें बुद्धिमान् विप्रवर महात्मा अत्रिने होताका कार्य किया था ॥ यस्यान्तेऽभूत् सुमहद् दानवानां दैतेयानां राक्षसानां च देवैः । यस्मिन् युद्धं तारकाख्यं सुतीव्रं यत्र स्कन्दस्तारकाख्यं जघान ॥ ४८ ॥
उस यज्ञके अन्तमें देवताओंके साथ दानवों, दैत्यों तथा राक्षसोंका महान् एवं भयंकर तारकामय संग्राम हुआ था, जिसमें स्कन्दने तारकासुरका वध किया था ॥ सैनापत्यं लब्धवान् देवतानां महासेनो यत्र दैत्यान्तकर्ता । साक्षाच्चैवं न्यवसत् कार्तिकेयः सदा कुमारो यत्र स प्लक्षराजः ॥ ४ ९ ॥ उसीमें दैत्यविनाशक महासेन कार्तिकेयने देवताओंका सेनापतित्व ग्रहण किया था । जहाँ वह पाकड़का श्रेष्ठ वृक्ष है, वहाँ साक्षात् कुमार कार्तिकेय इस तीर्थमें सदा निवास करते हैं ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः कुमार कार्तिकेयका प्राकट्य और उनके अभिषेककी तैयारी जनमेजय उवाच
सरस्वत्याः प्रभावोऽयमुक्तस्ते द्विजसत्तम ।
कुमारस्याभिषेकं तु ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा –द्विजश्रेष्ठ! आपने सरस्वतीका यह प्रभाव बताया है । ब्रह्मन्! अब कुमार कार्तिकेयके अभिषेकका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
यस्मिन् देशे च काले च यथा च वदतां वर ।
यैश्चाभिषिक्तो भगवान् विधिना येन च प्रभुः ॥ २ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ! किस देश और कालमें किन लोगोंने किस विधिसे किस प्रकार शक्तिशाली भगवान् स्कन्दका अभिषेक किया? ॥ २ ॥
स्कन्दो यथा च दैत्यानामकरोत् कदनं महत् ।
तथा मे सर्वमाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥
स्कन्दने जिस प्रकार दैत्योंका महान् संहार किया हो, वह सब उसी तरह मुझे बताइये; क्योंकि मेरे मनमें इसे सुननेके लिये बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
कुरुवंशस्य सदृशं कौतूहलमिदं तव ।
हर्षमुत्पादयत्येव वचो मे जनमेजय ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी बोले – जनमेजय! तुम्हारा यह कौतूहल कुरुवंशके योग्य ही है । तुम्हारा वचन मेरे मनमें बड़ा भारी हर्ष उत्पन्न कर रहा है ॥ ४ ॥
हन्त ते कथयिष्यामि शृण्वानस्य नराधिप ।
अभिषेकं कुमारस्य प्रभावं च महात्मनः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! तुम ध्यान देकर सुन रहे हो, इसलिये मैं तुमसे प्रसन्नतापूर्वक महात्मा कुमार कार्तिकेयके अभिषेक और प्रभावका वर्णन करता हूँ ॥ ५ ॥
तेजो माहेश्वरं स्कन्नमग्नौ प्रपतितं पुरा ।
तत् सर्वभक्षो भगवान् नाशकद् दग्धुमक्षयम् ॥ ६ ॥
पूर्वकालकी बात है, भगवान् शिवका तेजोमय वीर्य अग्निमें गिर पड़ा । भगवान् अग्नि सर्वभक्षी हैं तो भी उस अक्षय वीर्यको वे भस्म न कर सके ॥ ६ ॥
तेनासीदतितेजस्वी दीप्तिमान् हव्यवाहनः ।
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न चैव धारयामास गर्भं तेजोमयं तदा ॥ ७ ॥
स गङ्गामभिसंगम्य नियोगाद् ब्रह्मणः प्रभुः ।
गर्भमाहितवान् दिव्यं भास्करोपमतेजसम् ॥ ८ ॥
उस वीर्यके कारण अग्निदेव दीप्तिमान्, तेजस्वी तथा शक्तिसम्पन्न होकर भी कष्टका अनुभव करने लगे । वे उस समय उस तेजोमय गर्भको जब धारण न कर सके, तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन भगवान् अग्निदेवने सूर्यके समान तेजस्वी उस दिव्य गर्भको गंगाजीमें डाल दिया ॥
अथ गङ्गापि तं गर्भमसहन्ती विधारणे ।
उत्ससर्ज गिरौ रम्ये हिमवत्यमरार्चिते ॥ ९ ॥
तदनन्तर गंगाने भी उस गर्भको धारण करनेमें असमर्थ होकर उसे देवपूजित सुरम्य हिमालय पर्वतके शिखरपर सरकण्डोंमें छोड़ दिया ॥ ९ ॥
स तत्र ववृधे लोकानावृत्य ज्वलनात्मजः ।
ददृशुर्ज्वलनाकारं तं गर्भमथ कृत्तिकाः ॥ १० ॥
शरस्तम्बे महात्मानमनलात्मजमीश्वरम् ।
ममायमिति ताः सर्वाः पुत्रार्थिन्योऽभिचुक्रुशुः ॥ ११ ॥
अग्निका वह पुत्र अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके वहाँ बढ़ने लगा । सरकण्डोंके समूहमें अग्निके समान प्रकाशित होते हुए उस सर्वसमर्थ महात्मा अग्निपुत्रको, जो नवजात शिशुके रूपमें उपस्थित था, छहों कृत्तिकाओंने देखा । उसे देखते ही पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली वे सभी कृतिकाएँ पुकार- पुकारकर कहने लगीं ' यह मेरा पुत्र है ' ||
तासां विदित्वा भावं तं मातॄणां भगवान् प्रभुः ।
प्रस्नुतानां पयः षड्भिर्वदनैरपिबत् तदा ॥ १२ ॥
उन माताओंके उस वात्सल्यभावको जानकर प्रभावशाली भगवान् स्कन्द छः मुख प्रकट करके उनके स्तनोंसे झरते हुए दूधको पीने लगे ॥ १२ ॥
तं प्रभावं समालक्ष्य तस्य बालस्य कृत्तिकाः ।
परं विस्मयमापन्ना देव्यो दिव्यवपुर्धराः ॥ १३ ॥
वे दिव्य रूपधारिणी छहों कृत्तिका देवियाँ उस बालकका वह प्रभाव देखकर अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठीं ॥ १३ ॥
यत्रोत्सृष्टः स भगवान् गङ्गया गिरिमूर्धनि ।
स शैलः काञ्चनः सर्वः सम्बभौ कुरुसत्तम ॥ १४ ॥
कुरुश्रेष्ठ! गंगाजीने पर्वतके जिस शिखरपर स्कन्दको छोड़ा था, वह सारा- का - सारा सुवर्णमय हो गया ॥ १४ ॥
वर्धता चैव गर्भेण पृथिवी तेन रञ्जिता ।
अतश्च सर्वे संवृत्ता गिरयः काञ्चनाकराः ॥ १५ ॥
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उस बढ़ते हुए शिशुने वहाँकी भूमिको रंजित ( प्रकाशित ) कर दिया था । इसलिये वहाँके सभी पर्वत सोनेकी खान बन गये ॥ १५ ॥
कुमारः सुमहावीर्यः कार्तिकेय इति स्मृतः ।
गाङ्गेयः पूर्वमभवन्महायोगबलान्वितः ॥ १६ ॥
वह महान् शक्तिशाली कुमार कार्तिकेयके नामसे विख्यात हुआ । वह महान् योगबलसे सम्पन्न बालक पहले गंगाजीका पुत्र था ॥ १६ ॥
शमेन तपसा चैव वीर्येण च समन्वितः ।
ववृधेऽतीव राजेन्द्र चन्द्रवत् प्रियदर्शनः ॥ १७ ॥
राजेन्द्र! शम, तपस्या और पराक्रमसे युक्त वह कुमार अत्यन्त वेगसे बढ़ने लगा । वह देखनेमें चन्द्रमाके समान प्रिय लगता था ॥ १७ ॥
स तस्मिन् काञ्चने दिव्ये शरस्तम्बे श्रिया वृतः ।
स्तूयमानः सदा शेते गन्धर्वैर्मुनिभिस्तथा ॥ १८ ॥
उस दिव्य सुवर्णमय प्रदेशमें सरकण्डोंके समूहपर स्थित हुआ वह कान्तिमान् बालक निरन्तर गन्धर्वों एवं मुनियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ सो रहा था ॥
तथैतमन्वनृत्यन्त देवकन्याः सहस्रशः ।
दिव्यवादित्रनृत्यज्ञाः स्तुवन्त्यश्चारुदर्शनाः ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर दिव्य वाद्य और नृत्यकी कला जाननेवाली सहस्रों सुन्दरी देवकन्याएँ उस कुमारकी स्तुति करती हुई उसके समीप नृत्य करने लगीं ॥ १ ९ ॥
अन्वास्ते च नदी देवं गङ्गा वै सरितां वरा ।
दधार पृथिवी चैनं बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ २० ॥
सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा भी उस दिव्य बालकके पास आ बैठीं । पृथ्वीदेवीने उत्तम रूप धारण करके उसे अपने अंकमें धारण किया ॥ २० ॥
जातकर्मादिकास्तत्र क्रियाश्चक्रे बृहस्पतिः ।
वेदश्चैनं चतुर्मूर्तिरुपतस्थे कृताञ्जलिः ॥ २१ ॥
बृहस्पतिजीने वहाँ उस बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये और चार स्वरूपोंमें अभिव्यक्त होनेवाला वेद हाथ जोड़कर उसकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ २१ ॥
धनुर्वेदश्चतुष्पादः शस्त्रग्रामः ससंग्रहः ।
तत्रैनं समुपातिष्ठत् साक्षाद् वाणी च केवला ॥ २२ ॥
चारों चरणोंसे युक्त धनुर्वेद, संग्रहसहित शस्त्र- समूह तथा केवल साक्षात् वाणी — ये सभी कुमारकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २२ ॥
स ददर्श महावीर्यं देवदेवमुमापतिम् ।
शैलपुत्र्या समासीनं भूतसंघशतैर्वृतम् ॥ २३ ॥
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कुमारने देखा कि सैकड़ों भूतसंघोंसे घिरे हुए महापराक्रमी देवाधिदेव उमापति गिरिराजनन्दिनी उमाके साथ पास ही बैठे हुए हैं ॥ २३ ॥
निकाया भूतसंघानां परमाद्भुतदर्शनाः ।
विकृता विकृताकारा विकृताभरणध्वजाः ॥ २४ ॥
उनके साथ आये हुए भूतसंघोंके शरीर देखनेमें बड़े ही अद्भुत, विकृत और विकराल थे । उनके आभूषण और ध्वज भी बड़े विकट थे ॥ २४ ॥
व्याघ्रसिंहर्क्षवदना विडालमकराननाः ।
वृषदंशमुखाश्चान्ये गजोष्ट्रवदनास्तथा ॥ २५ ॥
उलूकवदनाः केचिद् गृध्रगोमायुदर्शनाः ।
क्रौञ्चपारावतनिभैर्वदनै राङ्कवैरपि ॥ २६ ॥
उनमेंसे किन्हींके मुँह बाघ और सिंहके समान थे तो किन्हींके रीछ, बिल्ली और मगरके समान । कितनोंके मुख वनबिलावोंके तुल्य थे । कितने ही हाथी, ऊँट और उल्लूके समान मुखवाले थे । बहुत - से गीधों और गीदड़ोंके समान दिखायी देते थे । किन्हीं - किन्हींके मुख क्रौंच पक्षी, कबूतर और रंकु मृगके समान थे ॥ २५-२६ ॥
श्वाविच्छल्यकगोधानामजैडकगवां तथा ।
सदृशानि वपूंष्यन्ते तत्र तत्र व्यधारयन् ॥ २७ ॥
बहुतेरे भूत जहाँ - तहाँ हिंसक जन्तु, साही, गोह, बकरी, भेड़ और गायोंके समान शरीर धारण करते थे ॥
केचिच्छैलाम्बुदप्रख्याश्चक्रोद्यतगदायुधाः ।
केचिदञ्जनपुञ्जाभाः केचिच्छ्वेताचलप्रभाः ॥ २८ ॥
कितने ही मेघों और पर्वतोंके समान जान पड़ते थे । उन्होंने अपने हाथोंमें चक्र और गदा आदि आयुध ले रखे थे । कोई अंजनपुंजके समान काले और कोईश्वेत गिरिके समान गौर कान्तिसे सुशोभित होते थे ॥
सप्त मातृगणाश्चैव समाजग्मुर्विशाम्पते ।
साध्या विश्वेऽथ मरुतो वसवः पितरस्तथा ॥ २ ९ ॥
रुद्रादित्यास्तथा सिद्धा भुजगा दानवाः खगाः ।
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् सपुत्रः सह विष्णुना ॥ ३० ॥
शक्रस्तथाभ्ययाद् द्रष्टुं कुमारवरमच्युतम् । प्रजानाथ! वहाँ सात मातृकाएँ* आ गयी थीं । साध्य, विश्व, मरुद्गण, वसुगण, पितर, रुद्र, आदित्य, सिद्ध, भुजंग, दानव, पक्षी, पुत्रसहित स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा, श्रीविष्णु तथा इन्द्र अपने नियमोंसे च्युत न होनेवाले उस श्रेष्ठ कुमारको देखनेके लिये पधारे थे ॥ २ ९ -३० ¾ ॥
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नारदप्रमुखाश्चापि देवगन्धर्वसत्तमाः ॥ ३१ ॥
देवर्षयश्च सिद्धाश्च बृहस्पतिपुरोगमाः ।
पितरो जगतः श्रेष्ठा देवानामपि देवताः ॥ ३२ ॥
तेऽपि तत्र समाजग्मुर्यामा धामाश्च सर्वशः । देवताओं और गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ नारद आदि देवर्षि, बृहस्पति आदि सिद्ध, सम्पूर्ण जगत्से श्रेष्ठ तथा देवताओंके भी देवता पितृगण, सम्पूर्ण यामगण और धामगण भी वहाँ आये थे ॥ ३१-३२ ॥ स तु बालोऽपि बलवान् महायोगबलान्वितः ॥ ३३ ॥
अभ्याजगाम देवेशं शूलहस्तं पिनाकिनम् । बालक होनेपर भी बलशाली एवं महान् योगबलसे सम्पन्न कुमार त्रिशूल और पिनाक धारण करनेवाले देवेश्वर भगवान् शिवकी ओर चले ॥ ३३३ ॥
तमाव्रजन्तमालक्ष्य शिवस्यासीन्मनोगतम् ॥ ३४ ॥
युगपच्छैलपुत्र्याश्च गङ्गायाः पावकस्य च ।
कं नु पूर्वमयं बालो गौरवादभ्युपैष्यति ॥ ३५ ॥
अपि मामिति सर्वेषां तेषामासीन्मनोगतम् । उन्हें आते देख एक ही समय भगवान् शंकर, गिरिराजनन्दिनी उमा, गंगा और अग्निदेवके मनमें यह संकल्प उठा कि देखें यह बालक पिता- माताका गौरव प्रदान करनेके लिये पहले किसके पास जाता है? क्या यह मेरे पास आयेगा? यह प्रश्न उन सबके मनमें उठा ॥ तेषामेतमभिप्रायं चतुर्णामुपलक्ष्य सः ॥ ३६ ॥
युगपद् योगमास्थाय ससर्ज विविधास्तनूः । तब उन सबके अभिप्रायको लक्ष्य करके कुमारने एक ही साथ योगबलका आश्रय ले अपने अनेक शरीर बना लिये ॥ ३६३ ॥
ततोऽभवच्चतुर्मूर्तिः क्षणेन भगवान् प्रभुः ॥ ३७ ॥
तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठतः । तदनन्तर प्रभावशाली भगवान् स्कन्द क्षणभरमें चार रूपोंमें प्रकट हो गये । पीछे जो उनकी मूर्तियाँ प्रकट हुईं, उनका नाम क्रमशः शाख, विशाख और नैगमेय हुआ ॥ एवं स कृत्वा ह्यात्मानं चतुर्धा भगवान् प्रभुः ॥ ३८ ॥
यतो रुद्रस्ततः स्कन्दो जगामाद्भुतदर्शनः ।
विशाखस्तु ययौ येन देवी गिरिवरात्मजा ॥ ३ ९ ॥
इस प्रकार अपने - आपको चार स्वरूपोंमें प्रकट करके अद्भुत दिखायी देनेवाले प्रभावशाली भगवान् स्कन्द जहाँ रुद्र थे, उधर ही गये । विशाख उस ओर चल दिये, जिस ओर गिरिराजनन्दिनी उमा देवी बैठी थीं ।
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शाखो ययौ स भगवान् वायुमूर्तिर्विभावसुम् ।
नैगमेयोऽगमद् गङ्गां कुमारः पावकप्रभः ॥ ४० ॥
वायुमूर्ति भगवान् शाख अग्निके पास और अग्नितुल्य तेजस्वी नैगमेय गंगाजीके निकट गये ॥ ४० ॥
सर्वे भासुरदेहास्ते चत्वारः समरूपिणः ।
तान् समभ्ययुरव्यग्रास्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४१ ॥
उन चारोंके रूप एक समान थे । उन सबके शरीर तेजसे उद्भासित हो रहे थे । वे चारों
कुमार उन चारोंके पास एक साथ जा पहुँचे । वह एक अद्भुत- सा कार्य हुआ ॥ ४१ ॥
हाहाकारो महानासीद् देवदानवरक्षसाम् ।
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यमद्भुतं लोमहर्षणम् ॥ ४२ ॥
वह महान् आश्चर्यमय, अद्भुत तथा रोमांचकारी घटना देखकर देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंमें महान् हाहाकार मच गया ॥ ४२ ॥
ततो रुद्रश्च देवी च पावकश्च पितामहम् ।
गङ्गया सहिताः सर्वे प्रणिपेतुर्जगत्पतिम् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर भगवान् रुद्र, देवी पार्वती, अग्निदेव तथा गंगाजी- इन सबने एक साथ लोकनाथ ब्रह्माजीको प्रणाम किया ॥ ४३ ॥
प्रणिपत्य ततस्ते तु विधिवद् राजपुङ्गव ।
इदमूचुर्वचो राजन् कार्तिकेयप्रियेप्सया ॥ ४४ ॥
राजन्! नृपश्रेष्ठ! विधिपूर्वक प्रणाम करके वे सब कार्तिकेयका प्रिय करनेकी इच्छासे यह वचन बोले— ||
अस्य बालस्य भगवन्नाधिपत्यं यथेप्सितम् ।
अस्मत्प्रियार्थं देवेश सदृशं दातुमर्हसि ॥ ४५ ॥
‘देवेश्वर! भगवन्! आप हमलोगोंका प्रिय करनेके लिये इस बालकको यथायोग्य मनकी इच्छाके अनुरूप कोई आधिपत्य प्रदान कीजिये' ॥ ४५ ॥
ततः स भगवान् धीमान् सर्वलोकपितामहः ।
मनसा चिन्तयामास किमयं लभतामिति ॥ ४६ ॥
तदनन्तर सर्वलोकपितामह बुद्धिमान् भगवान् ब्रह्माने मन- ही- मन चिन्तन किया कि ‘ यह बालक कौन - सा आधिपत्य ग्रहण करे' ॥ ४६ ॥
ऐश्वर्याणि च सर्वाणि देवगन्धर्वरक्षसाम् ।
भूतयक्षविहङ्गानां पन्नगानां च सर्वशः ॥ ४७ ॥
पूर्वमेवादिदेशासौ निकायेषु महात्मनाम् ।
समर्थं च तमैश्वर्ये महामतिरमन्यत ॥ ४८ ॥
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महामति ब्रह्माने जगत्के भिन्न - भिन्न पदार्थोंके ऊपर देवता, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, भूत, नाग और पक्षियोंका आधिपत्य पहलेसे ही निर्धारित कर रखा था । साथ ही वे कुमारको भी आधिपत्य करनेमें समर्थ मानते थे ॥
ततो मुहूर्तं स ध्यात्वा देवानां श्रेयसि स्थितः ।
सैनापत्यं ददौ तस्मै सर्वभूतेषु भारत ॥ ४ ९ ॥
भरतनन्दन! तदनन्तर देवगणोंके मंगल- सम्पादनमें तत्पर हुए ब्रह्माने दो घड़ीतक चिन्तन करनेके पश्चात् सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ कार्तिकेयको सम्पूर्ण देवताओंका सेनापति पद प्रदान किया ॥ ४ ९ ॥
सर्वदेवनिकायानां ये राजानः परिश्रुताः ।
तान् सर्वान् व्यादिदेशास्मै सर्वभूतपितामहः ॥ ५० ॥
जो सम्पूर्ण देवसमूहोंके राजारूपमें विख्यात थे, उन सबको सर्वभूतपितामह ब्रह्माने कुमारके अधीन रहनेका आदेश दिया ॥ ५० ॥
ततः कुमारमादाय देवा ब्रह्मपुरोगमाः ।
अभिषेकार्थमाजग्मुः शैलेन्द्रं सहितास्ततः ॥ ५१ ॥
पुण्यां हैमवतीं देवीं सरिच्छ्रेष्ठां सरस्वतीम् ।
समन्तपञ्चके या वै त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ५२ ॥
तब ब्रह्मा आदि देवता अभिषेकके लिये कुमारको लेकर एक साथ गिरिराज हिमालयपर वहाँसे निकली हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला सरस्वती देवीके तटपर गये, जो समन्त - पंचकतीर्थमें प्रवाहित होकर तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥
तत्र तीरे सरस्वत्याः पुण्ये सर्वगुणान्विते ।
निषेदुर्देवगन्धर्वाः सर्वे सम्पूर्णमानसाः ॥ ५३ ॥
वहाँ वे सभी देवता और गन्धर्व पूर्ण मनोरथ हो सरस्वतीके सर्वगुणसम्पन्न पावन तटपर विराजमान हुए ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने कुमाराभिषेकोपक्रमे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें कुमारके अभिषेककी तैयारीविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
* ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, इन्द्राणी, वाराही तथा चामुण्डा - ये सात मातृकाएँ हैं ।
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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः स्कन्दका अभिषेक और उनके महापार्षदोंके नाम, रूप आदिका वर्णन वैशम्पायन उवाच
ततोऽभिषेकसम्भारान् सर्वान् सम्भृत्य शास्त्रतः ।
बृहस्पतिः समिद्धेऽग्नौ जुहावाग्निं यथाविधि ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर बृहस्पतिजीने सम्पूर्ण अभिषेकसामग्रीका संग्रह करके शास्त्रीय पद्धतिसे प्रज्वलित की हुई अग्निमें विधिपूर्वक होम किया ॥ १ ॥
ततो हिमवता दत्ते मणिप्रवरशोभिते ।
दिव्यरत्नाचिते पुण्ये निषण्णं परमासने ॥ २ ॥
सर्वमङ्गलसम्भारैर्विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ।
आभिषेचनिकं द्रव्यं गृहीत्वा देवतागणाः ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् हिमवान्के दिये हुए उत्तम मणियोंसे सुशोभित तथा दिव्य रत्नोंसे जटित पवित्र सिंहासनपर कुमार कार्तिकेय विराजमान हुए। उस समय उनके पास सम्पूर्ण मांगलिक उपकरणोंके साथ विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक अभिषेकद्रव्य लेकर समस्त देवता वहाँ पधारे ॥
इन्द्राविष्णू महावीर्यौ सूर्याचन्द्रमसौ तथा ।
धाता चैव विधाता च तथा चैवानिलानलौ ॥ ४ ॥
पूष्णा भगेनार्यम्णा च अंशेन च विवस्वता ।
रुद्रश्च सहितो धीमान् मित्रेण वरुणेन च ॥ ५ ॥
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभुः । महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान् रुद्रदेव, एकादश -रुद्रगण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार – ये सब- के - सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए ॥ ४-५३ ॥ विश्वेदेवैर्मरुद्भिश्च साध्यैश्च पितृभिः सह ॥ ६ ॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च यक्षराक्षसपन्नगैः ।
देवर्षिभिरसंख्यातैस्तथा ब्रह्मर्षिभिस्तथा ॥ ७ ॥
वैखानसैर्वालखिल्यैर्वाय्वाहारैर्मरीचिपैः ।
भृगुभिश्चाङ्गिरोभिश्च यतिभिश्च महात्मभिः ॥ ८ ॥