04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2781–2790
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2781–2790
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सैनापत्येन महता सुरारिविनिबर्हणम् ॥ ७ ॥
नरेश्वर! उसी तीर्थमें देवताओंने देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले स्कन्दको महान् सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया था ॥ ७ ॥
तस्मिन् सारस्वते तीर्थे विश्वामित्रो महामुनिः ।
वसिष्ठं चालयामास तपसोग्रेण तच्छृणु ॥ ८ ॥
उसी सारस्वततीर्थमें महामुनि विश्वामित्रने अपनी उग्र तपस्यासे वसिष्ठमुनिको विचलित कर दिया था । वह प्रसंग सुनाता हूँ, सुनो ॥ ८ ॥
विश्वामित्रवसिष्ठौ तावहन्यहनि भारत ।
स्पर्धां तपःकृतां तीव्रां चक्रतुस्तौ तपोधनौ ॥ ९ ॥
भारत! विश्वामित्र और वसिष्ठ दोनों ही तपस्याके धनी थे, वे प्रतिदिन होड़ लगाकर अत्यन्त कठोर तप किया करते थे ॥ ९ ॥
तत्राप्यधिकसंतापो विश्वामित्रो महामुनिः ।
दृष्ट्वा तेजो वसिष्ठस्य चिन्तामभिजगाम ह ॥ १० ॥
उनमें भी महामुनि विश्वामित्रको ही अधिक संताप होता था, वे वसिष्ठका तेज देखकर चिन्तामग्न हो गये थे ॥ १० ॥
तस्य बुद्धिरियं ह्यासीद् धर्मनित्यस्य भारत ।
इयं सरस्वती तूर्णं मत्समीपं तपोधनम् ॥ ११ ॥
आनयिष्यति वेगेन वसिष्ठं तपतां वरम् ।
इहागतं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः ॥ १२ ॥
भरतनन्दन! सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले विश्वामित्र मुनिके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि यह सरस्वती तपोधन वसिष्ठको अपने जलके वेगसे तुरंत ही मेरे समीप ला देगी और यहाँ आ जानेपर तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ विप्रवर वसिष्ठका मैं वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ ११-१२ ॥
एवं निश्चित्य भगवान् विश्वामित्रो महामुनिः ।
सस्मार सरितां श्रेष्ठां क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३ ॥
ऐसा निश्चय करके पूज्य महामुनि विश्वामित्रके नेत्र क्रोधसे रक्तवर्ण हो गये । उन्होंने सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका स्मरण किया ॥ १३ ॥
साध्याता मुनिना तेन व्याकुलत्वं जगाम ह ।
जज्ञे चैनं महावीर्यं महाकोपं च भाविनी ॥ १४ ॥
उन मुनिके चिन्तन करनेपर विचारशीला सरस्वती व्याकुल हो उठी । उसे ज्ञात हो गया कि ये महान् शक्तिशाली महर्षि इस समय बड़े भारी क्रोधसे भरे हुए हैं ॥ १४ ॥
तत एनं वेपमाना विवर्णा प्राञ्जलिस्तदा ।
उपतस्थे मुनिवरं विश्वामित्रं सरस्वती ॥ १५ ॥
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इससे सरस्वतीकी कान्ति फीकी पड़ गयी और वह हाथ जोड़ थर - थर काँपती हुई मुनिवर विश्वामित्रकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ १५ ॥
हतवीरा यथा नारी साभवद् दुःखिता भृशम् ।
ब्रूहि किं करवाणीति प्रोवाच मुनिसत्तमम् ॥ १६ ॥
जिसका पति मारा गया हो उस विधवा नारीके समान वह अत्यन्त दुःखी हो गयी और उन मुनिश्रेष्ठसे बोली — ‘ प्रभो! बताइये, मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ? ' ॥ १६ ॥
तामुवाच मुनिः क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय ।
यावदेनं निहन्म्यद्य तच्छ्रुत्वा व्यथिता नदी ॥ १७ ॥
तब कुपित हुए मुनिने उससे कहा - ' वसिष्ठको शीघ्र यहाँ बहाकर ले आओ, जिससे
आज मैं इनका वध कर डालूँ । ' यह सुनकर सरस्वती नदी व्यथित हो उठी ॥
प्राञ्जलिं तु ततः कृत्वा पुण्डरीकनिभेक्षणा ।
प्राकम्पत भृशं भीता वायुनेवाहता लता ॥ १८ ॥
वह कमलनयना अबला हाथ जोड़कर वायुके झकोरेसे हिलायी गयी लताके समान अत्यन्त भयभीत हो जोर - जोरसे काँपने लगी ॥ १८ ॥
तथारूपां तु तां दृष्ट्वा मुनिराह महानदीम् ।
अविचारं वसिष्ठं त्वमानयस्वान्तिकं मम ॥ १ ९ ॥
उसकी ऐसी अवस्था देखकर मुनिने उस महानदीसे कहा- ' तुम बिना कोई विचार किये वसिष्ठको मेरे पास ले आओ ' ॥ १ ९ ॥
सा तस्य वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा पापं चिकीर्षितम् ।
वसिष्ठस्य प्रभावं च जानन्त्यप्रतिमं भुवि ॥ २० ॥
साभिगम्य वसिष्ठं च इदमर्थमचोदयत् ।
बदुक्ता सरितां श्रेष्ठा विश्वामित्रेण धीमता ॥ २१ ॥
विश्वामित्रकी बात सुनकर और उनकी पापपूर्ण चेष्टा जानकर वसिष्ठके भूतलपर विख्यात अनुपम प्रभावको जानती हुई उस नदीने उनके पास जाकर बुद्धिमान् विश्वामित्रने जो कुछ कहा था, वह सब उनसे कह सुनाया ॥
उभयोः शापयोर्भीता वेपमाना पुनः पुनः ।
चिन्तयित्वा महाशापमृषिवित्रासिता भृशम् ॥ २२ ॥
वह दोनोंके शापसे भयभीत हो बारंबार काँप रही थी । महान् शापका चिन्तन करके विश्वामित्र ऋषिके डरसे बहुत डर गयी थी ॥ २२ ॥
तां कृशां च विवर्णां च दृष्ट्वा चिन्तासमन्विताम् ।
उवाच राजन् धर्मात्मा वसिष्ठो द्विपदां वरः ॥ २३ ॥
राजन्! उसे दुर्बल, उदास और चिन्तामग्न देख मनुष्योंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा वसिष्ठने कहा ॥ २३ ॥
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वसिष्ठउवाच
पाह्यात्मानं सरिच्छ्रेष्ठे वह मां शीघ्रगामिनी ।
विश्वामित्रः शपेद्धि त्वां मा कृथास्त्वं विचारणाम् ॥ २४ ॥
वसिष्ठ बोले — सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती! तुम शीघ्र गतिसे प्रवाहित होकर मुझे बहा ले चलो और अपनी रक्षा करो, अन्यथा विश्वामित्र तुम्हें शाप दे देंगे; इसलिये तुम कोई दूसरा विचार मनमें न लाओ ॥ २४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित् ।
चिन्तयामास कौरव्य किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ॥ २५ ॥
कुरुनन्दन! उन कृपाशील महर्षिका वह वचन सुनकर सरस्वती सोचने लगी, ' क्या करनेसे शुभ होगा?' ॥ २५ ॥
तस्याश्चिन्ता समुत्पन्ना वसिष्ठो मय्यतीव हि ।
कृतवान् हि दयां नित्यं तस्य कार्यं हितं मया ॥ २६ ॥
उसके मनमें यह विचार उठा कि ' वसिष्ठने मुझपर बड़ी भारी दया की है । अतः सदा मुझे इनका हित - साधन करना चाहिये ' ॥ २६ ॥
अथ कूले स्वके राजन् जपन्तमृषिसत्तमम् ।
जुह्वानं कौशिकं प्रेक्ष्य सरस्वत्यभ्यचिन्तयत् ॥ २७ ॥
इदमन्तरमित्येवं ततः सा सरितां वरा ।
कूलापहारमकरोत् स्वेन वेगेन सा सरित् ॥ २८ ॥
राजन्! तदनन्तर ऋषिश्रेष्ठ विश्वामित्रको अपने तटपर जप और होम करते देख सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने सोचा, यही अच्छा अवसर है, फिर तो उस नदीने पूर्व- तटको तोड़कर उसे अपने वेगसे बहाना आरम्भ किया ॥
तेन कूलापहारेण मैत्रावरुणिरौह्यत ।
उह्यमानः स तुष्टाव तदा राजन् सरस्वतीम् ॥ २९ ॥
उस बहते हुए किनारेके साथ मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठजी भी बहने लगे । राजन्! बहते समय वसिष्ठजी सरस्वतीकी स्तुति करने लगे– ॥ २ ९ ॥
पितामहस्य सरसः प्रवृत्तासि सरस्वति ।
व्याप्तं चेदं जगत् सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः ॥ ३० ॥
' सरस्वती! तुम पितामह ब्रह्माजीके सरोवरसे प्रकट हुई हो, इसीलिये तुम्हारा नाम सरस्वती है । तुम्हारे उत्तम जलसे ही यह सारा जगत् व्याप्त है ॥ ३० ॥
त्वमेवाकाशगा देवि मेघेषु सृजसे पयः ।
सर्वाश्चापस्त्वमेवेति त्वत्तो वयमधीमहि ॥ ३१ ॥
‘देवि! तुम्हीं आकाशमें जाकर मेघोंमें जलकी सृष्टि करती हो, तुम्हीं सम्पूर्ण जल हो; तुमसे ही हम ऋषिगण वेदोंका अध्ययन करते हैं ॥ ३१ ॥
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पुष्टिर्द्युतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिर्बुद्धिरुमा तथा ।
त्वमेव वाणी स्वाहा त्वं तवायत्तमिदं जगत् ॥ ३२ ॥
त्वमेव सर्वभूतेषु वससीह चतुर्विधा । ' तुम्हीं पुष्टि, कीर्ति, द्युति, सिद्धि, बुद्धि, उमा, वाणी और स्वाहा हो । यह सारा जगत् तुम्हारे अधीन है । तुम्हीं समस्त प्राणियोंमें चार प्रकारके रूप धारण करके निवास करती हो' ॥ ३२ ॥
एवं सरस्वती राजन् स्तूयमाना महर्षिणा ॥ ३३ ॥
वेगेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति ।
न्यवेदयत चाभीक्ष्णं विश्वामित्राय तं मुनिम् ॥ ३४ ॥
राजन्! महर्षिके मुखसे इस प्रकार स्तुति सुनती हुई सरस्वतीने उन ब्रह्मर्षिको अपने वेगद्वारा विश्वामित्रके आश्रमपर पहुँचा दिया और विश्वामित्रसे बारंबार निवेदन किया कि ‘ वसिष्ठ मुनि उपस्थित हैं ' ॥ ३३-३४ ॥
तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः ।
अथान्वेषत् प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ॥ ३५ ॥
सरस्वतीद्वारा लाये हुए वसिष्ठको देखकर विश्वामित्र कुपित हो उठे और उनके जीवनका अन्त कर देनेके लिये कोई हथियार ढूँढ़ने लगे ॥ ३५ ॥
तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्मवध्याभयान्नदी ।
अपोवाह वसिष्ठं तु प्राचीं दिशमतन्द्रिता ॥ ३६ ॥
उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् । उन्हें कुपित देख सरस्वती नदी ब्रह्महत्याके भयसे आलस्य छोड़ दोनोंकी आज्ञाका पालन करती हुई विश्वामित्रको धोखा देकर वसिष्ठ मुनिको पुनः पूर्व- दिशाकी ओर बहा ले गयी ॥ ३६३ ॥
ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ ३७ ॥
अब्रवीद् दुःखसंक्रुद्धो विश्वामित्रो ह्यमर्षणः ।
यस्मान्मां त्वं सरिच्छ्रेष्ठे वञ्चयित्वा पुनर्गता ॥ ३८ ॥
शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसम्मतम् । मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको पुनः अपनेसे दूर बहाया गया देख अमर्षशील विश्वामित्र दुःखसे अत्यन्त कुपित हो बोले- ' सरिताओंमें श्रेष्ठ कल्याणमयी सरस्वती! तुम मुझे धोखा देकर फिर चली गयी, इसलिये अब जलकी जगह रक्त बहाओ, जो राक्षसोंके समूहको अधिक प्रिय है ' ॥ ३७-३८३ ॥ ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता ॥ ३ ९ ॥ अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ।
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बुद्धिमान् विश्वामित्रके इस प्रकार शाप देनेपर सरस्वती नदी एक सालतक रक्तमिश्रित जल बहाती रही ॥ अथर्षयश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तदा ॥ ४० ॥
सरस्वतीं तथा दृष्ट्वा बभूवुर्भृशदुःखिताः । तदनन्तर ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सरा सरस्वतीको उस अवस्थामें देखकर अत्यन्त दुःखी हो गये ॥ ४० ॥
एवं वसिष्ठापवाहो लोके ख्यातो जनाधिप ॥ ४१ ॥
आगच्छच्च पुनर्मार्गं स्वमेव सरितां वरा ॥ ४२ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार वह स्थान जगत्में वसिष्ठापवाहके नामसे विख्यात हुआ । वसिष्ठजीको बहानेके पश्चात् सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती फिर अपने पूर्व मार्गपर ही बहने लग गयी ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
20 * परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी – यह चार प्रकारकी वाणी ही सरस्वतीका चतुर्विध रूप है ।
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त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ऋषियोंके प्रयत्नसे सरस्वतीके शापकी निवृत्ति, जलकी शुद्धि तथा अरुणासंगममें स्नान करनेसे राक्षसों और इन्द्रका संकटमोचन वैशम्पायन उवाच
सा शप्ता तेन क्रुद्धेन विश्वामित्रेण धीमता ।
तस्मिंस्तीर्थवरे शुभ्रे शोणितं समुपावहत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! कुपित हुए बुद्धिमान् विश्वामित्रने जब सरस्वती नदीको शाप दे दिया, तब वह नदी उस उज्ज्वल एवं श्रेष्ठ तीर्थमें रक्तकी धारा बहाने लगी ॥
अथाजग्मुस्ततो राजन् राक्षसास्तत्र भारत ।
तत्र ते शोणितं सर्वे पिबन्तः सुखमासते ॥ २ ॥
भारत! तदनन्तर वहाँ बहुत- से राक्षस आ पहुँचे । वे सब - के - सब उस रक्तको पीते हुए वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ २ ॥
तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः ।
नृत्यन्तश्च हसन्तश्च यथा स्वर्गजितस्तथा ॥ ३ ॥
उस रक्तसे अत्यन्त तृप्त, सुखी और निश्चिन्त हो वे राक्षस वहाँ नाचने और हँसने लगे, मानो उन्होंने स्वर्गलोकको जीत लिया हो ॥ ३ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य ऋषयः सुतपोधनाः ।
तीर्थयात्रां समाजग्मुः सरस्वत्यां महीपते ॥ ४ ॥
पृथ्वीनाथ! कुछ कालके पश्चात् बहुत - से तपोधन मुनि सरस्वतीके तटपर तीर्थयात्राके लिये पधारे ॥ ४ ॥
तेषु सर्वेषु तीर्थेषु स्वाप्लुत्य मुनिपुङ्गवाः ।
प्राप्य प्रीतिं परां चापि तपोलुब्धा विशारदाः ॥ ५ ॥
प्रययुर्हि ततो राजन् येन तीर्थमसृग्वहम् । पूर्वोक्त सभी तीर्थोंमें गोता लगाकर वे तपस्याके लोभी विज्ञ मुनिवर पूर्ण प्रसन्न हो उसी ओर गये, जिधर रक्तकी धारा बहानेवाला पूर्वोक्त तीर्थ था ॥ ५३ ॥
अथागम्य महाभागास्तत् तीर्थं दारुणं तदा ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्याः शोणितेन परिप्लुतम् ।
पीयमानं च रक्षोभिर्बहुभिर्नृपसत्तम ॥ ७ ॥
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नृपश्रेष्ठ! वहाँ आकर उन महाभाग मुनियोंने देखा कि उस तीर्थकी दारुण दशा हो गयी है, वहाँ सरस्वतीका जल रक्तसे ओतप्रोत है और बहुत- से राक्षस उसका पान कर रहे हैं ॥ ६-७ ॥
तान् दृष्ट्वा राक्षसान् राजन् मुनयः संशितव्रताः ।
परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ॥। ८ ॥
राजन्! उन राक्षसोंको देखकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनियोंने सरस्वतीके उस तीर्थकी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न किया ॥ ८ ॥
ते तु सर्वे महाभागाः समागम्य महाव्रताः ।
आहूय सरितां श्रेष्ठामिदं वचनमब्रुवन् ॥ ९ ॥
उन सभी महान् व्रतधारी महाभाग ऋषियोंने मिलकर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीको बुलाकर पूछा- ॥ ९ ॥
कारणं ब्रूहि कल्याणि किमर्थं ते ह्रदो ह्ययम् ।
एवमाकुलतां यातः श्रुत्वा ध्यास्यामहे वयम् ॥ १० ॥
‘ कल्याणि! तुम्हारा यह कुण्ड इस प्रकार रक्तसे मिश्रित क्यों हो गया? इसका क्या कारण है? बताओ । उसे सुनकर हमलोग कोई उपाय सोचेंगे ' ॥ १० ॥
ततः सा सर्वमाचष्ट यथावृत्तं प्रवेपती ।
दुःखितामथ तां दृष्ट्वा ऊचुस्ते वै तपोधनाः ॥ ११ ॥
तब काँपती हुई सरस्वतीने सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे कह सुनाया । उसे दुःखी देख वे तपोधन महर्षि उससे बोले— ॥ ११ ॥
कारणं श्रुतमस्माभिः शापश्चैव श्रुतोऽनघे ।
करिष्यन्ति तु यत् प्राप्तं सर्व एव तपोधनाः ॥ १२ ॥
‘ निष्पाप सरस्वती! हमने शाप और उसका कारण सुन लिया । ये सभी तपोधन इस विषयमें समयोचित कर्तव्यका पालन करेंगे ' ॥ १२ ॥
एवमुक्त्वा सरिच्छ्रेष्ठामूचुस्तेऽथ परस्परम् ।
विमोचयामहे सर्वे शापादेतां सरस्वतीम् ॥ १३ ॥
सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीसे ऐसा कहकर वे आपसमें बोले— ' हम सब लोग मिलकर इस सरस्वतीको शापसे छुटकारा दिलावें ' ॥ १३ ॥
ते सर्वे ब्राह्मणा राजंस्तपोभिर्नियमैस्तथा ।
उपवासैश्च विविधैर्यमैः कष्टव्रतैस्तथा ॥ २४ ॥
आराध्य पशुभर्तारं महादेवं जगत्पतिम् ।
तां देवीं मोक्षयामासुः सरिच्छ्रेष्ठां सरस्वतीम् ॥ १५ ॥
राजन्! उन सभी ब्राह्मणोंने तप, नियम, उपवास, नाना प्रकारके संयम तथा कष्टसाध्य व्रतोंके द्वारा पशुपति विश्वनाथ महादेवजीकी आराधना करके सरिताओंमें श्रेष्ठ उस
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सरस्वती देवीको शापसे छुटकारा दिलाया ॥
तेषां तु सा प्रभावेण प्रकृतिस्था सरस्वती ।
प्रसन्नसलिला जज्ञे यथापूर्वं तथैव हि ॥ १६ ॥
उनके प्रभावसे सरस्वती प्रकृतिस्थ हुई, उसका जल पूर्ववत् स्वच्छ हो गया ॥ १६ ॥
निर्मुक्ता च सरिच्छ्रेष्ठा विबभौ सा यथा पुरा ।
दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या मुनिभिस्तैस्तथा कृतम् ॥ १७ ॥
तानेव शरणं जग्मू राक्षसाः क्षुधितास्तथा । शापमुक्त हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती पहलेकी भाँति शोभा पाने लगी । उन मुनियोंके द्वारा सरस्वतीका जल वैसा शुद्ध कर दिया गया-यह देखकर वे भूखे हुए राक्षस उन्हीं महर्षियोंकी शरणमें गये ॥ १७ ॥
कृत्वाञ्जलिं ततो राजन् राक्षसाः क्षुधयार्दिताः ॥ १८ ॥
ऊचुस्तान् वै मुनीन् सर्वान् कृपायुक्तान् पुनः पुनः ।
वयं च क्षुधिताश्चैव धर्माद्धीनाश्च शाश्वतात् ॥ १ ९ ॥
राजन्! तदनन्तर वे भूखसे पीड़ित हुए राक्षस उन सभी कृपालु मुनियोंसे बारंबार हाथ
जोड़कर कहने लगे— ' महात्माओ! हम भूखे हैं । सनातन धर्मसे भ्रष्ट हो गये हैं ॥
न च नः कामकारोऽयं यद् वयं पापकारिणः ।
युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा ॥ २० ॥
यत् पापं वर्धतेऽस्माकं ततः स्मो ब्रह्मराक्षसाः । ' हमलोग जो पापाचार करते हैं, यह हमारा स्वेच्छाचार नहीं है । आप- जैसे महात्माओंकी हमलोगोंपर कभी कृपा नहीं हुई और हम सदा दुष्कर्म ही करते चले आये । इससे हमारे पापकी निरन्तर वृद्धि होती रहती है और हम ब्रह्मराक्षस हो गये हैं ॥ २० ॥
योषितां चैव पापेन योनिदोषकृतेन च ॥ २१ ॥
एवं हि वैश्यशूद्राणां क्षत्रियाणां तथैव च ।
ये ब्राह्मणान् प्रद्विषन्ति ते भवन्तीह राक्षसाः ॥ २२ ॥
‘ स्त्रियाँ अपने योनिदोषजनित पाप ( व्यभिचार ) - से राक्षसी हो जाती हैं । इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंमेंसे जो लोग ब्राह्मणोंसे द्वेष करते हैं, वे भी इस जगत्में राक्षस होते हैं ॥ २१-२२ ॥
आचार्यमृत्विजं चैव गुरुं वृद्धजनं तथा ।
प्राणिनो येऽवमन्यन्ते ते भवन्तीह राक्षसाः ॥ २३ ॥
‘ जो प्राणधारी मानव आचार्य, ऋत्विज, गुरु और वृद्ध पुरुषोंका अपमान करते हैं, वे भी यहाँ राक्षस होते हैं ॥
तत् कुरुध्वमिहास्माकं तारणं द्विजसत्तमाः ।
शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे ॥ २४ ॥
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‘ अतः विप्रवरो आप यहाँ हमारा उद्धार करें; क्योंकि आपलोग सम्पूर्ण लोकोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं ' ॥
तेषां तु वचनं श्रुत्वा तुष्टुवुस्तां महानदीम् ।
मोक्षार्थं रक्षसां तेषामूचुः प्रयतमानसाः ॥ २५ ॥
उन राक्षसोंका वचन सुनकर एकाग्रचित्त महर्षियोंने उनकी मुक्तिके लिये महानदी सरस्वतीका स्तवन किया और इस प्रकार कहा— ॥ २५ ॥
क्षुतं कीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाचितं भवेत् ।
सकेशमवधूतं च रुदितोपहतं च यत् ॥ २६ ॥
स्वभिः संसृष्टमन्नं च भागोऽसौ रक्षसामिह ।
तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वानेतान् यत्नाद् विवर्जयेत् ॥ २७ ॥
राक्षसान्नमसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यन्नमीदृशम् । ‘जिस अन्नपर थूक पड़ गयी हो, जिसमें कीड़े पड़े हों, जो जूठा हो, जिसमें बाल गिरा हो, जो तिरस्कारपूर्वक प्राप्त हुआ हो, जो अश्रुपातसे दूषित हो गया हो तथा जिसे कुत्तोंने छू दिया हो, वह सारा अन्न इस जगत्में राक्षसोंका भाग है । अतः विद्वान् पुरुष सदा समझ-बूझकर इन सब प्रकारके अन्नोंका प्रयत्नपूर्वक परित्याग करे । जो ऐसे अन्नको खाता है, वह मानो राक्षसोंका अन्न खाता है ' ॥ २६-२७३ ॥ शोधयित्वा ततस्तीर्थमृषयस्ते तपोधनाः ॥ २८ ॥
मोक्षार्थं राक्षसानां च नदीं तां प्रत्यचोदयन् । तदनन्तर उन तपोधन महर्षियोंने उस तीर्थकी शुद्धि करके उन राक्षसोंकी मुक्तिके लिये सरस्वती नदीसे अनुरोध किया ॥ २८३ ॥
महर्षीणां मतं ज्ञात्वा ततः सा सरितां वरा ॥ २ ९ ॥
अरुणामानयामास स्वां तनूं पुरुषर्षभ ।
तस्यां ते राक्षसाः स्नात्वा तनूस्त्यक्त्वा दिवंगताः ॥ ३० ॥
अरुणायां महाराज ब्रह्मवध्यापहा हि सा । नरश्रेष्ठ! महर्षियोंका यह मत जानकर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती अपनी ही स्वरूपभूता अरुणाको ले आयी । महाराज! उस अरुणामें स्नान करके वे राक्षस अपना शरीर छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये; क्योंकि वह ब्रह्महत्याका निवारण करनेवाली है ॥ २ ९ -३० ॥ एतमर्थमभिज्ञाय देवराजः शतक्रतुः ॥ ३१ ॥
तस्मिंस्तीर्थे वरे स्नात्वा विमुक्तः पाप्मना किल । राजन्! कहते हैं, इस बातको जानकर देवराज इन्द्र उसी श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करके ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हुए थे ॥ ३१ ॥
जनमेजय उवाच
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किमर्थं भगवान् शक्रो ब्रह्मवध्यामवाप्तवान् ॥ ३२ ॥
कथमस्मिंश्च तीर्थे वै आप्लुत्याकल्मषोऽभवत् । जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन्! भगवान् इन्द्रको ब्रह्महत्याका पाप कैसे लगा तथा वे किस प्रकार इस तीर्थमें स्नान करके पापमुक्त हुए थे? ॥ ३२ ॥
वैशम्पायन उवाच शृणुष्वैतदुपाख्यानं यथावृत्तं जनेश्वर ॥ ३३ ॥
यथा बिभेद समयं नमुचेर्वासवः पुरा । वैशम्पायनजीने कहा- जनेश्वर! पूर्वकालमें इन्द्रने नमुचिके साथ अपनी की हुई प्रतिज्ञाको जिस प्रकार तोड़ डाला था, वह सारी कथा जैसे घटित हुई थी, तुम यथार्थरूपसे सुनो ॥ ३३३ ॥
नमुचिर्वासवाद् भीतः सूर्यरश्मिं समाविशत् ॥ ३४ ॥
तेनेन्द्रः सख्यमकरोत् समयं चेदमब्रवीत् ।
न चार्द्रेण न शुष्केण न रात्रौ नापि चाहनि ॥ ३५ ॥
वधिष्याम्यसुरश्रेष्ठ सखे सत्येन ते शपे । पहलेकी बात है, नमुचि इन्द्रके भयसे डरकर सूर्यकी किरणोंमें समा गया था । तब इन्द्रने उसके साथ मित्रता कर ली और यह प्रतिज्ञा की ' असुरश्रेष्ठ! मैं न तो तुम्हें गीले हथियारसे मारूँगा न सूखेसे । न दिनमें मारूँगा न रातमें । सखे! मैं सत्यकी सौगन्ध खाकर यह बात तुमसे कहता हूँ' ॥ ३४-३५३ ॥ एवं स कृत्वा समयं दृष्ट्वा नीहारमीश्वरः ॥ ३६ ॥
चिच्छेदास्य शिरो राजन्नपां फेनेन वासवः । राजन्! इस प्रकार प्रतिज्ञा करके भी देवराज इन्द्रने चारों ओर कुहासा छाया हुआ देख पानीके फेनसे नमुचिका सिर काट लिया ॥ ३६३ ॥
तच्छिरो नमुचेश्छिन्नं पृष्ठतः शक्रमन्वियात् ॥ ३७ ॥
भो भो मित्रघ्न पापेति ब्रुवाणं शक्रमन्तिकात् । नमुचिका वह कटा हुआ मस्तक इन्द्रके पीछे लग गया । वह उनके पास जाकर बारंबार कहने लगा, ‘ ओ मित्रघाती पापात्मा इन्द्र! तू कहाँ जाता है? ' ॥ ३७३ ॥
एवं स शिरसा तेन चोद्यमानः पुनः पुनः ॥ ३८ ॥
पितामहाय संतप्त एतमर्थं न्यवेदयत् । इस प्रकार उस मस्तकके द्वारा बारंबार पूर्वोक्त बात पूछी जानेपर अत्यन्त संतप्त हुए इन्द्रने ब्रह्माजीसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ३८३ ॥
तमब्रवील्लोकगुरुररुणायां यथाविधि ॥ ३ ९ ॥ इष्ट्वोपस्पृश देवेन्द्र तीर्थे पापभयापहे ।