04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2961–2970

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2961–2970

पृष्ठ 2961

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भीष्मे शान्तनवे नाथे कर्णे शस्त्रभृतां वरे ॥ ७ ॥

गौतमे शकुनौ चापि द्रोणे चास्त्रभृतां वरे ।

अश्वत्थाम्नि तथा शल्ये शूरे च कृतवर्मणि ॥ ८ ॥

इमामवस्थां प्राप्तोऽस्मि कालो हि दुरतिक्रमः । ' शान्तनुनन्दन भीष्म, अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण, कृपाचार्य, शकुनि, अस्त्रधारियोंमें सर्वश्रेष्ठ द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, शूरवीर शल्य तथा कृतवर्मा मेरे रक्षक थे तो भी मैं इस दशाको आ पहुँचा । निश्चय ही कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ एकादशचमूभर्ता सोऽहमेतां दशां गतः ॥ ९ ॥

कालं प्राप्य महाबाहो न कश्चिदतिवर्तते । ' महाबाहो! मैं एक दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था; परंतु आज इस दशामें आ पड़ा हूँ। वास्तवमें कालको पाकर कोई उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ ९ ३ ॥ आख्यातव्यं मदीयानां येऽस्मिन् जीवन्ति संयुगे ॥ १० ॥

यथाहं भीमसेनेन व्युत्क्रम्य समयं हतः । ' मेरे पक्षके वीरोंमेंसे जो लोग इस युद्धमें जीवित बच गये हों, उन्हें यह बताना कि भीमसेनने किस तरह गदायुद्धके नियमका उल्लंघन करके मुझे मारा ॥ १०३ ॥

बहूनि सुनृशंसानि कृतानि खलु पाण्डवैः ॥ ११ ॥

भूरिश्रवसि कर्णे च भीष्मे द्रोणे च श्रीमति । ' पाण्डवोंने भूरिश्रवा, कर्ण, भीष्म तथा श्रीमान् द्रोणाचार्यके प्रति बहुत - से नृशंस कार्य किये हैं ॥ ११३ ॥

इदं चाकीर्तिजं कर्म नृशंसैः पाण्डवैः कृतम् ॥ १२ ॥

येन ते सत्सु निर्वेदं गमिष्यन्ति हि मे मतिः । ‘ उन क्रूरकर्मा पाण्डवोंने यह भी अपनी अकीर्ति फैलानेवाला कर्म ही किया है, जिससे वे साधु पुरुषोंकी सभामें पश्चात्ताप करेंगे; ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १२३ ॥

का प्रीतिः सत्त्वयुक्तस्य कृत्वोपधिकृतं जयम् ॥ १३ ॥

को वा समयभेत्तारं बुधः सम्मन्तुमर्हति । ‘ छलसे विजय पाकर किसी सत्त्वगुणी या शक्तिशाली पुरुषको क्या प्रसन्नता होगी? अथवा जो युद्धके नियमको भंग कर देता है, उसका सम्मान कौन विद्वान् कर सकता है? ॥ १३३ ॥

अधर्मेण जयं लब्ध्वा को नु हृष्येत पण्डितः ॥ १४ ॥

यथा संहृष्यते पापः पाण्डुपुत्रो वृकोदरः ।

पृष्ठ 2962

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' अधर्मसे विजय प्राप्त करके किस बुद्धिमान् पुरुषको हर्ष होगा? जैसा कि पापी पाण्डुपुत्र भीमसेनको हो रहा है ॥ १४ ॥

किन्नु चित्रमितस्त्वद्य भग्नसक्थस्य यन्मम ॥ १५ ॥

क्रुद्धेन भीमसेनेन पादेन मृदितं शिरः । ‘ आज जब मेरी जाँघें टूट गयी हैं; ऐसी दशामें कुपित हुए भीमसेनने मेरे मस्तकको जो पैरसे ठुकराया है, इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है? ॥ १५३ ॥

प्रतपन्तं श्रिया जुष्टं वर्तमानं च बन्धुषु ॥ १६ ॥

एवं कुर्यान्नरो यो हि स वै संजय पूजितः । ‘ संजय! जो अपने तेजसे तप रहा हो, राजलक्ष्मीसे सेवित हो और अपने सहायक बन्धुओंके बीचमें विद्यमान हो, ऐसे शत्रुके साथ जो उक्त बर्ताव करे, वही वीर पुरुष सम्मानित होता है ( मरे हुएको मारनेमें क्या बड़ाई है ) ॥ १६३ ॥

अभिज्ञौ युद्धधर्मस्य मम माता पिता च मे ॥ १७ ॥

तौ हि संजय दुःखार्तौ विज्ञाप्यौ वचनाद्धि मे ।

इष्टं भृत्या भृताः सम्यग् भूः प्रशास्ता ससागरा ॥ १८ ॥

‘ मेरे माता- पिता युद्धधर्मके ज्ञाता हैं । वे दोनों मेरी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो जायँगे । तुम मेरे कहनेसे उन्हें यह संदेश देना कि मैंने यज्ञ किये, जो भरण- पोषण करनेयोग्य थे, उनका पालन किया और समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका अच्छी तरह शासन किया ॥ १७-१८ ॥

मूर्ध्नि स्थितममित्राणां जीवतामेव संजय ।

दत्ता दाया यथाशक्ति मित्राणां च प्रियं कृतम् ॥ १ ९ ॥

अमित्रा बाधिताः सर्वे को नु स्वन्ततरो मया । ‘ संजय! मैंने जीवित शत्रुओंके ही मस्तकपर पैर रखा। यथाशक्ति धनका दान और मित्रोंका प्रिय किया । साथ ही सम्पूर्ण शत्रुओंको सदा ही क्लेश पहुँचाया । संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जिसका अन्त मेरे समान सुन्दर हुआ हो? ॥ १ ९ ३ ॥ मानिता बान्धवाः सर्वे वश्यः सम्पूजितो जनः ॥ २० ॥

त्रितयं सेवितं सर्वं को नु स्वन्ततरो मया । ‘ मैंने सभी बन्धु- बान्धवोंको सम्मान दिया । अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले लोगोंका सत्कार किया और धर्म, अर्थ एवं काम सबका सेवन कर लिया । मेरे समान सुन्दर अन्त किसका हुआ होगा? ॥ २०३ ॥

आज्ञप्तं नृपमुख्येषु मानः प्राप्तः सुदुर्लभः ॥ २१ ॥

आजानेयैस्तथा यातं को नु स्वन्ततरो मया ।

पृष्ठ 2963

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‘ बड़े - बड़े राजाओंपर हुक्म चलाया, अत्यन्त दुर्लभ सम्मान प्राप्त किया तथा आजानेय ( अरबी ) घोड़ोंपर सवारी की, मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? ॥ २१३३ ॥

यातानि परराष्ट्राणि नृपा भुक्ताश्च दासवत् ॥ २२ ॥

प्रियेभ्यः प्रकृतं साधु को नु स्वन्ततरो मया । 'दूसरे राष्ट्रोंपर आक्रमण किया और कितने ही राजाओंसे दासकी भाँति सेवाएँ लीं । जो अपने प्रिय व्यक्ति थे, उनकी सदा ही भलाई की । फिर मुझसे अच्छा अन्त किसका हुआ होगा? ॥ २२ ॥

अधीतं विधिवद् दत्तं प्राप्तमायुर्निरामयम् ॥ २३ ॥

स्वधर्मेण जिता लोकाः को नु स्वन्ततरो मया ।

दिष्ट्या नाहं जितः संख्ये परान् प्रेष्यवदाश्रितः ॥ २४ ॥

दिष्ट्या मे विपुला लक्ष्मीर्मृते त्वन्यगता विभो । ‘ विधिवत् वेदोंका स्वाध्याय किया, नाना प्रकारके दान दिये और रोगरहित आयु प्राप्त की । इसके सिवा, मैंने अपने धर्मके द्वारा पुण्यलोकोंपर विजय पायी है । फिर मेरे समान अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? सौभाग्यकी बात है कि मैं न तो युद्धमें कभी पराजित हुआ और न दासकी भाँति कभी शत्रुओंकी शरण ली । सौभाग्यसे मेरे अधिकारमें विशाल राजलक्ष्मी रही है, जो मेरे मरनेके बाद ही दूसरेके हाथमें गयी है ॥ २३-२४३ ॥ यदिष्टं क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ॥ २५ ॥

निधनं तन्मया प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया । ‘ अपने धर्मका पालन करनेवाले क्षत्रिय - बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वैसी ही मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? ॥ २५३ ॥

दिष्ट्या नाहं परावृत्तो वैरात् प्राकृतवज्जितः ॥ २६ ॥

दिष्ट्या न विमतिं कांचिद् भजित्वा तु पराजितः । ' हर्षकी बात है कि मैं युद्धमें पीठ दिखाकर भागा नहीं । निम्नश्रेणीके मनुष्यकी भाँति हार मानकर वैरसे कभी पीछे नहीं हटा तथा कभी किसी दुर्विचारका आश्रय लेकर पराजित नहीं हुआ— यह भी मेरे लिये गौरवकी ही बात है ॥ २६३ ॥

सुप्तं वाथ प्रमत्तं वा यथा हन्याद् विषेण वा ॥ २७ ॥

एवं व्युत्क्रान्तधर्मेण व्युत्क्रम्य समयं हतः । ‘ जैसे कोई सोये अथवा पागल हुए मनुष्यको मार दे या धोखेसे जहर देकर किसीकी हत्या कर डाले, उसी प्रकार धर्मका उल्लंघन करनेवाले पापी भीमसेनने गदायुद्धकी मर्यादाका उल्लंघन करके मुझे मारा है ॥ २७ ॥

अश्वत्थामा महाभागः कृतवर्मा च सात्वतः ॥ २८ ॥

कृपः शारद्वतश्चैव वक्तव्या वचनान्मम ।

पृष्ठ 2964

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‘ महाभाग अश्वत्थामा, सात्वतवंशी कृतवर्मा तथा शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य –इन सबको मेरी यह बात सुना देना ॥ २८३ ॥

अधर्मेण प्रवृत्तानां पाण्डवानामनेकशः ॥ २ ९ ॥ विश्वासं समयघ्नानां न यूयं गन्तुमर्हथ । ‘ पाण्डवोंने अधर्ममें प्रवृत्त होकर अनेकों बार युद्धकी मर्यादा तोड़ी है; अतः आपलोग कभी उनका विश्वास न करें ' ॥ २ ९ ॥ वार्तिकांश्चाब्रवीद् राजा पुत्रस्ते सत्यविक्रमः ॥ ३० ॥

अधर्माद् भीमसेनेन निहतोऽहं यथा रणे ।

सोऽहं द्रोणं स्वर्गगतं कर्णशल्यावुभौ तथा ॥ ३१ ॥

वृषसेनं महावीर्यं शकुनिं चापि सौबलम् ।

जलसन्धं महावीर्यं भगदत्तं च पार्थिवम् ॥ ३२ ॥

सोमदत्तं महेष्वासं सैन्धवं च जयद्रथम् ।

दुःशासनपुरोगांश्च भ्रातॄनात्मसमांस्तथा ॥ ३३ ॥

दौःशासनिं च विक्रान्तं लक्ष्मणं चात्मजावुभौ ।

एतांश्चान्यांश्च सुबहून् मदीयांश्च सहस्रशः ॥ ३४ ॥

पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सार्थहीनो यथाध्वगः । इसके बाद आपके सत्यपराक्रमी पुत्र राजा दुर्योधनने संदेशवाहक दूतोंसे इस प्रकार कहा— ‘ भीमसेनने रणभूमिमें अधर्मसे मेरा वध किया है । अब मैं स्वर्गमें गये हुए द्रोणाचार्य, कर्ण, शल्य, महापराक्रमी वृषसेन, सुबलपुत्र शकुनि, महाबली जलसन्ध, राजा भगदत्त, महाधनुर्धर सोमदत्त, सिंधुराज जयद्रथ, अपने ही समान पराक्रमी दुःशासन आदि बन्धुगण, विक्रमशाली दुःशासनकुमार और अपने पुत्र लक्ष्मण- इन सबके तथा और भी जो बहुत - से मेरे पक्षके सहस्रों योद्धा मारे गये हैं, उन सबके पीछे मैं स्वर्ग जाऊँगा । मेरी दशा उस पथिकके समान है, जो अपने साथियोंसे बिछुड़ गया हो ॥ ३० – ३४३ ॥ कथं भ्रातॄन् हतान् श्रुत्वा भर्तारं च स्वसा मम ॥ ३५ ॥

रोरूयमाणा दुःखार्ता दुःशला सा भविष्यति । ' हाय! अपने भाइयों और पतिकी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो अत्यन्त रोदन करती हुई मेरी बहिन दुःशलाकी क्या दशा होगी? ॥ ३५३ ॥

स्नुषाभिः प्रस्नुषाभिश्च वृद्धो राजा पिता मम ॥ ३६ ॥

गान्धारीसहितश्चैव कां गतिं प्रतिपत्स्यति । ' पुत्रों और पौत्रोंकी बिलखती हुई बहुओंके साथ मेरे बूढ़े पिता राजा धृतराष्ट्र माता गान्धारीसहित किस अवस्थाको पहुँच जायँगे? ॥ ३६३ ॥

नूनं लक्ष्मणमातापि हतपुत्रा हतेश्वरा ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 2965

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विनाशं यास्यति क्षिप्रं कल्याणी पृथुलोचना । ‘ निश्चय ही जिसके पति और पुत्र मारे गये हैं, वह कल्याणमयी विशाललोचना लक्ष्मणकी माता भी सारा समाचार सुनकर तुरंत ही प्राण दे देगी ॥ ३७३ ॥

यदि जानाति चार्वाकः परिव्राड् वाग्विशारदः ॥ ३८ ॥

करिष्यति महाभागो ध्रुवं चापचितिं मम । ‘ संन्यासीके वेषमें सब ओर घूमनेवाले प्रवचनकुशल चार्वाकको* यदि मेरी दशा ज्ञात हो जायगी तो वे महाभाग निश्चय ही मेरे वैरका बदला लेंगे ॥ ३८३ ॥

समन्तपञ्चके पुण्ये त्रिषु लोकेषु विश्रुते ॥ ३ ९ ॥ अहं निधनमासाद्य लोकान् प्राप्स्यामि शाश्वतान् । ‘ तीनों लोकोंमें विख्यात पुण्यमय समन्त - पंचक क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होकर अब मैं सनातन लोकोंमें जाऊँगा' ॥ ३ ९ ३ ॥ ततो जनसहस्राणि बाष्पपूर्णानि मारिष ॥ ४० ॥

प्रलापं नृपतेः श्रुत्वा व्यद्रवन्त दिशो दश । मान्यवर! राजा दुर्योधनका यह विलाप सुनकर हजारों मनुष्योंकी आँखोंमें आँसू भर आये और वे दसों दिशाओंमें भाग चले ॥ ४० ॥

ससागरवना घोरा पृथिवी सचराचरा ॥ ४१ ॥

चचालाथ सनिर्ह्रादा दिशश्चैवाविलाभवन् । उस समय समुद्र, वन और चराचर प्राणियोंसहित यह पृथ्वी भयानक रूपसे हिलने लगी । सब ओर वज्रकी - सी गर्जना होने लगी और सारी दिशाएँ मलिन हो गयीं ॥ ४१३ ॥

ते द्रोणपुत्रमासाद्य यथावृत्तं न्यवेदयन् ॥ ४२ ॥

व्यवहारं गदायुद्धे पार्थिवस्य च पातनम् ।

तदाख्याय ततः सर्वे द्रोणपुत्रस्य भारत ॥

(वार्तिका दुःखसंतप्ताः शोकोपहतचेतसः । ) ध्यात्वा च सुचिरं कालं जग्मुरार्ता यथागतम् ॥ ४३ ॥

उन संदेशवाहकोंने आकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामासे यथावत् समाचार कह सुनाया । भारत! गदायुद्धमें भीमसेनका जैसा व्यवहार हुआ तथा राजाको जिस प्रकार धराशायी किया गया, वह सारा वृत्तान्त द्रोणपुत्रको बताकर दुःखसे संतप्त हो वे बहुत देरतक चिन्तामें डूबे रहे । फिर शोकसे व्याकुलचित्त एवं आर्त होकर जैसे आये थे वैसे चले गये ॥ ४२-४३ ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि दुर्योधनविलापे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥

पृष्ठ 2966

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इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधनका विलापविषयक चौसठ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ४३३ श्लोक हैं । ) * आचार्य नीलकण्ठकी सम्मतिके अनुसार चार्वाक संन्यासी मुनिके वेषमें विचरनेवाला एक नास्तिक राक्षस था ।

पृष्ठ 2967

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पञ्चषष्टितमोऽध्यायः दुर्योधनकी दशा देखकर अश्वत्थामाका विषाद, प्रतिज्ञा और सेनापतिके पदपर अभिषेक संजय उवाच

वार्तिकाणां सकाशात् तु श्रुत्वा दुर्योधनं हतम् ।

हतशिष्टास्ततो राजन् कौरवाणां महारथाः ॥ १ ॥

विनिर्भिन्नाः शितैर्बाणैर्गदातोमरशक्तिभिः ।

अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ॥ २ ॥

त्वरिता जवनैरश्वैरायोधनमुपागमन् । संजय कहते हैं — राजन्! संदेशवाहकोंके मुखसे दुर्योधनके मारे जानेका समाचार सुनकर मरनेसे बचे हुए कौरव महारथी अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा— जो स्वयं भी तीखे बाण, गदा, तोमर और शक्तियोंके प्रहारसे विशेष घायल हो चुके थे, तेज चलनेवाले घोड़ोंसे जुते हुए रथपर सवार हो तुरंत ही युद्धभूमिमें आये ॥ १-२ ॥ तत्रापश्यन् महात्मानं धार्तराष्ट्रं निपातितम् ॥ ३ ॥

प्रभग्नं वायुवेगेन महाशालं यथा वने ।

भूमौ विचेष्टमानं तं रुधिरेण समुक्षितम् ॥ ४ ॥

महागजमिवारण्ये व्याधेन विनिपातितम् ।

विवर्तमानं बहुशो रुधिरौघपरिप्लुतम् ॥ ५ ॥

वहाँ आकर उन्होंने देखा कि महामनस्वी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन मार गिराया गया है, मानो वनमें कोई विशाल शालवृक्ष वायुके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो । खूनसे लथपथ हो दुर्योधन पृथ्वीपर पड़ा छटपटा रहा था, मानो जंगलमें किसी व्याधने बहुत बड़े हाथीको मार गिराया हो । रक्तकी धारामें डूबा हुआ वह बारंबार करवटें बदल रहा था ॥ ३–५ ॥

यदृच्छया निपतितं चक्रमादित्यगोचरम् ।

महावातसमुत्थेन संशुष्कमिव सागरम् ॥ ६ ॥

पूर्णचन्द्रमिव व्योम्नि तुषारावृतमण्डलम् ।

रेणुध्वस्तं दीर्घभुजं मातङ्गमिव विक्रमे ॥ ७ ॥

जैसे दैवेच्छासे सूर्यका चक्र गिर पड़ा हो, बहुत बड़ी आँधी चलनेसे समुद्र सूख गया हो, आकाशमें पूर्ण चन्द्रमण्डलपर कुहरा छा गया हो, वही दशा उस समय दुर्योधनकी हुई थी । मतवाले हाथीके समान पराक्रमी और विशाल भुजाओंवाला वह वीर धूलमें सन गया था ॥ ६-७ ॥

पृष्ठ 2968

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वृतं भूतगणैर्घोरैः क्रव्यादैश्च समन्ततः ।

यथा धनं लिप्समानैर्भृत्यैर्नृपतिसत्तमम् ॥ ८ ॥

जैसे धन चाहनेवाले भृत्यगण किसी श्रेष्ठ राजाको घेरे रहते हैं, उसी प्रकार भयंकर मांसभक्षी भूतोंने चारों ओरसे उसे घेर रखा था ॥ ८ ॥

भ्रुकुटीकृतवक्त्रान्तं क्रोधादुद्वृत्तचक्षुषम् ।

सामर्षं तं नरव्याघ्रं व्याघ्रं निपतितं यथा ॥ ९ ॥

उसके मुँहपर भौंहें तनी हुई थीं, आँखें क्रोधसे चढ़ी हुई थीं और गिरे हुए व्याघ्रके समान वह नरश्रेष्ठ वीर अमर्षमें भरा हुआ दिखायी देता था ॥ ९ ॥

ते तं दृष्ट्वा महेष्वासं भूतले पतितं नृपम् ।

मोहमभ्यागमन् सर्वे कृपप्रभृतयो रथाः ॥ १० ॥

महाधनुर्धर राजा दुर्योधनको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देख कृपाचार्य आदि सभी महारथी मोहके वशीभूत हो गये ॥

अवतीर्य रथेभ्यश्च प्राद्रवन् राजसंनिधौ ।

दुर्योधनं च सम्प्रेक्ष्य सर्वे भूमावुपाविशन् ॥ ११ ॥

वे अपने रथोंसे उतरकर राजाके पास दौड़े गये और दुर्योधनको देखकर सब लोग उसके पास ही जमीनपर बैठ गये ॥ ११ ॥

ततो द्रौणिर्महाराज बाष्पपूर्णेक्षणः श्वसन् ।

उवाच भरतश्रेष्ठं सर्वलोकेश्वरेश्वरम् ॥ १२ ॥

महाराज! उस समय अश्वत्थामाकी आँखोंमें आँसू भर आये । वह सिसकता हुआ सम्पूर्ण जगत्के राजाधिराज भरतश्रेष्ठ दुर्योधनसे इस प्रकार बोला- ॥ १२ ॥

नूनं विद्यते सत्यं मानुषे किंचिदेव हि ।

यत्र त्वं पुरुषव्याघ्र शेषे पांसुषु रूषितः ॥ १३ ॥

‘ पुरुषसिंह! निश्चय ही इस मनुष्यलोकमें कुछ भी सत्य नहीं है, सभी नाशवान् है, जहाँ तुम्हारे जैसा राजा धूलमें सना हुआ लोट रहा है ॥ १३ ॥

भूत्वा हि नृपतिः पूर्वं समाज्ञाप्य च मेदिनीम् ।

कथमेकोऽद्य राजेन्द्र तिष्ठसे निर्जने वने ॥ १४ ॥

' राजेन्द्र! तुम पहले सम्पूर्ण जगत्के मनुष्योंपर आधिपत्य रखकर सारे भूमण्डलपर हुक्म चलाते थे । वही तुम आज अकेले इस निर्जन वनमें कैसे पड़े हुए हो? ॥ १४ ॥

दुःशासनं न पश्यामि नापि कर्णं महारथम् ।

नापि तान् सुहृदः सर्वान् किमिदं भरतर्षभ ॥ १५ ॥

‘ भरतश्रेष्ठ! न तो मैं दुःशासनको देखता हूँ और न महारथी कर्णको । अन्य सब सुहृदोंका भी मुझे दर्शन नहीं हो रहा है, यह क्या बात है? ॥ १५ ॥

दुःखं नूनं कृतान्तस्य गतिं ज्ञातुं कथंचन ।

पृष्ठ 2969

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लोकानां च भवान् यत्र शेषे पांसुषु रूषितः ॥ १६ ॥

' निश्चय ही काल और लोकोंकी गतिको जानना किसी प्रकार भी कठिन ही है, जिसके अधीन होकर आप धूलमें सने हुए पड़े हैं ॥ १६ ॥

एष मूर्धाभिषिक्तानामग्रे गत्वा परंतपः ।

सतृणं ग्रसते पांसुं पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ १७ ॥

' अहो! ये मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे चलनेवाले शत्रुसंतापी महाराज दुर्योधन

तिनकोंसहित धूल फाँक रहे हैं । यह कालका उलट- फेर तो देखो ॥ १७ ॥

क्व ते तदमलं छत्रं व्यजनं क्व च पार्थिव ।

सा च ते महती सेना क्व गता पार्थिवोत्तम ॥ १८ ॥

'नृपश्रेष्ठ! महाराज! कहाँ है आपका वह निर्मल छत्र, कहाँ है व्यजन और कहाँ गयी आपकी वह विशाल सेना? ॥ १८ ॥

दुर्विज्ञेया गतिर्नूनं कार्याणां कारणान्तरे ।

यद् वै लोकगुरुर्भूत्वा भवानेतां दशां गतः ॥ १ ९ ॥

‘ किस कारणसे कौन - सा कार्य होगा, इसको समझ लेना निश्चय ही बहुत कठिन है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्के आदरणीय नरेश होकर भी आज तुम इस दशाको पहुँच गये ॥ १ ९ ॥

अध्रुवा सर्वमर्त्येषु श्रीरुपालक्ष्यते भृशम् ।

भवतो व्यसनं दृष्ट्वा शक्रविस्पर्धिनो भृशम् ॥ २० ॥

' तुम तो अपनी साम्राज्य-लक्ष्मीके द्वारा इन्द्रकी समानता करनेवाले थे । आज तुमपर भी यह संकट आया हुआ देखकर निश्चय हो गया कि किसी भी मनुष्यकी सम्पत्ति सदा स्थिर नहीं देखी जा सकती' ॥ २० ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दुःखितस्य विशेषतः ।

उवाच राजन् पुत्रस्ते प्राप्तकालमिदं वचः ॥ २१ ॥

विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां शोकजं बाष्पमुत्सृजन् ।

कृपादीन् स तदा वीरान् सर्वानेव नराधिपः ॥ २२ ॥

राजन्! अत्यन्त दुःखी हुए अश्वत्थामाकी वह बात सुनकर आपके पुत्र राजा दुर्योधनके नेत्रोंसे शोकके आँसू बहने लगे । उसने दोनों हाथोंसे नेत्रोंको पोंछा और कृपाचार्य आदि समस्त वीरोंसे यह समयोचित वचन कहा— ॥ २१-२२ ॥

ईदृशो लोकधर्मोऽयं धात्रा निर्दिष्ट उच्यते ।

विनाशः सर्वभूतानां कालपर्यायमागतः ॥ २३ ॥

‘ मित्रो! इस मर्त्यलोकका ऐसा ही धर्म ( नियम ) है । विधाताने ही इसका निर्देश किया है, ऐसा कहा जाता है; इसलिये कालक्रमसे एक- न-एक दिन सम्पूर्ण प्राणियोंके विनाशकी घड़ी आ ही जाती है ॥ २३ ॥

पृष्ठ 2970

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सोऽयं मां समनुप्राप्तः प्रत्यक्षं भवतां हि यः ।

पृथिवीं पालयित्वाहमेतां निष्ठामुपागतः ॥ २४ ॥

' वही यह विनाशका समय अब मुझे भी प्राप्त हुआ है, जिसे आपलोग प्रत्यक्ष देख रहे हैं । एक दिन मैं सारी पृथ्वीका पालन करता था और आज इस अवस्थाको पहुँच गया हूँ ॥ २४ ॥

दिष्ट्या नाहं परावृत्तो युद्धे कस्यांचिदापदि ।

दिष्ट्याहं निहतः पापैश्छलेनैव विशेषतः ॥ २५ ॥

'तो भी मुझे इस बातकी खुशी है कि कैसी ही आपत्ति क्यों न आयी, मैं युद्धमें कभी पीछे नहीं हटा । पापियोंने मुझे मारा भी तो छलसे ॥ २५ ॥

उत्साहश्च कृतो नित्यं मया दिष्ट्या युयुत्सता ।

दिष्ट्या चास्मिन् हतो युद्धे निहतज्ञातिबान्धवः ॥ २६ ॥

‘ सौभाग्यवश मैंने रणभूमिमें जूझनेकी इच्छा रखकर सदा ही उत्साह दिखाया है और भाई- बन्धुओंके मारे जानेपर स्वयं भी युद्धमें ही प्राण त्याग कर रहा हूँ, इससे मुझे विशेष संतोष है ॥ २६ ॥

दिष्ट्या च वोऽहं पश्यामि मुक्तानस्माज्जनक्षयात् ।

स्वस्तियुक्तांश्च कल्यांश्च तन्मे प्रियमनुत्तमम् ॥ २७ ॥

‘ सौभाग्यकी बात है कि मैं आपलोगोंको इस नरसंहारसे मुक्त देख रहा हूँ । साथ ही आपलोग सकुशल एवं कुछ करनेमें समर्थ हैं — यह मेरे लिये और भी उत्तम एवं प्रसन्नताकी बात है ॥ २७ ॥

मा भवन्तोऽत्र तप्यन्तां सौहृदान्निधनेन मे ।

यदि वेदाः प्रमाणं वो जिता लोका मयाक्षयाः ॥ २८ ॥

' आपलोगोंका मुझपर स्वाभाविक स्नेह है, इसलिये मेरी मृत्युसे यहाँ आपलोगोंको जो दुःख और संताप हो रहा है, वह नहीं होना चाहिये । यदि आपकी दृष्टिमें वेदशास्त्र प्रामाणिक हैं तो मैंने अक्षय लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया ॥ २८ ॥

मन्यमानः प्रभावं च कृष्णस्यामिततेजसः ।

तेन न च्यावितश्चाहं क्षत्रधर्मात् स्वनुष्ठितात् ॥ २ ९ ॥

स मया समनुप्राप्तो नास्मि शोच्यः कथंचन । ‘ मैं अमित तेजस्वी श्रीकृष्णके अद्भुत प्रभावको मानता हुआ भी कभी उनकी प्रेरणासे अच्छी तरह पालन किये हुए क्षत्रियधर्मसे विचलित नहीं हुआ । मैंने उस धर्मका फल प्राप्त किया है; अतः किसी प्रकार भी मैं शोकके योग्य नहीं हूँ ॥ २ ९ ३ ॥ कृतं भवद्भिः सदृशमनुरूपमिवात्मनः ॥ ३० ॥

यतितं विजये नित्यं दैवं तु दुरतिक्रमम् ।