04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2971–2980

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2971–2980

पृष्ठ 2971

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‘ आपलोगोंने अपने स्वरूपके अनुरूप योग्य पराक्रम प्रकट किया और सदा मुझे विजय दिलानेकी ही चेष्टा की; तथापि दैवके विधानका उल्लंघन करना किसीके लिये भी सर्वथा कठिन है ' ॥ ३० ॥

एतावदुक्त्वा वचनं बाष्पव्याकुललोचनः ॥ ३१ ॥

तूष्णीं बभूव राजेन्द्र रुजासौ विह्वलो भृशम् । राजेन्द्र! इतना कहते - कहते दुर्योधनकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं और वह वेदनासे अत्यन्त व्याकुल होकर चुप हो गया— उससे कुछ बोला नहीं गया ॥ ३१ ॥

तथा दृष्ट्वा तु राजानं बाष्पशोकसमन्वितम् ॥ ३२ ॥

द्रौणिः क्रोधेन जज्वाल यथा वह्निर्जगत्क्षये । राजा दुर्योधनको शोकके आँसू बहाते देख अश्वत्थामा प्रलयकालकी अग्निके समान क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ३२३ ॥

स च क्रोधसमाविष्टः पाणौ पाणिं निपीड्य च ॥ ३३ ॥

बाष्पविह्वलया वाचा राजानमिदमब्रवीत् । रोषके आवेशमें भरकर उसने हाथपर हाथ दबाया और अश्रुगद्गद वाणीद्वारा उसने राजा दुर्योधनसे इस प्रकार कहा- ॥ ३३३ ॥

पिता मे निहतः क्षुद्रैः सुनृशंसेन कर्मणा ॥ ३४ ॥

न तथा तेन तप्यामि यथा राजंस्त्वयाद्य वै । ‘ राजन्! नीच पाण्डवोंने अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मके द्वारा मेरे पिताका वध किया था; परंतु उसके कारण भी मैं उतना संतप्त नहीं हूँ, जैसा कि आज तुम्हारे वधके कारण मुझे कष्ट हो रहा है ' ॥ ३४ ॥

शृणु चेदं वचो मह्यं सत्येन वदतः प्रभो ॥ ३५ ॥

इष्टापूर्तेन दानेन धर्मेण सुकृतेन च ।

अद्याहं सर्वपञ्चालान् वासुदेवस्य पश्यतः ॥ ३६ ॥

सर्वोपायैर्हि नेष्यामि प्रेतराजनिवेशनम् ।

अनुज्ञां तु महाराज भवान् मे दातुमर्हति ॥ ३७ ॥

‘ प्रभो! मैं सत्यकी शपथ खाकर जो कह रहा हूँ, मेरी इस बातको सुनो । मैं अपने इष्ट, आपूर्त, दान, धर्म तथा अन्य शुभ कर्मोंकी शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज श्रीकृष्णके देखते- देखते सम्पूर्ण पांचालोंको सभी उपायोंद्वारा यमराजके लोकमें भेज दूँगा । महाराज! इसके लिये तुम मुझे आज्ञा दे दो ' ॥ ३५–३७ ॥

इति श्रुत्वा तु वचनं द्रोणपुत्रस्य कौरवः ।

मनसः प्रीतिजननं कृपं वचनमब्रवीत् ॥ ३८ ॥

आचार्य शीघ्रं कलशं जलपूर्णं समानय ।

पृष्ठ 2972

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द्रोणपुत्रका यह मनको प्रसन्न करनेवाला वचन सुनकर कुरुराज दुर्योधनने कृपाचार्यसे कहा— ‘ आचार्य! आप शीघ्र ही जलसे भरा हुआ कलश ले आइये' ॥ ३८३ ॥

स तद् वचनमाज्ञाय राज्ञो ब्राह्मणसत्तमः ॥ ३ ९ ॥ कलशं पूर्णमादाय राज्ञोऽन्तिकमुपागमत् । राजाकी वह बात मानकर ब्राह्मणशिरोमणि कृपाचार्य जलसे भरा हुआ कलश ले उसके समीप आये ॥ ३ ९ ३ ॥ तमब्रवीन्महाराज पुत्रस्तव विशाम्पते ॥ ४० ॥

ममाज्ञया द्विजश्रेष्ठ द्रोणपुत्रोऽभिषिच्यताम् ।

सैनापत्येन भद्रं ते मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ ४१ ॥

महाराज! प्रजानाथ! तब आपके पुत्रने उनसे कहा- ' द्विजश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो । यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मेरी आज्ञासे द्रोणपुत्रका सेनापतिके पदपर अभिषेक कीजिये ॥ ४०-४१ ॥

राज्ञो नियोगाद् योद्धव्यं ब्राह्मणेन विशेषतः ।

वर्तता क्षत्रधर्मेण ह्येवं धर्मविदो विदुः ॥ ४२ ॥

‘ ब्राह्मणको विशेषतः राजाकी आज्ञासे क्षत्रिय धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए युद्ध करना चाहिये — ऐसा धर्मज्ञ पुरुष मानते हैं ' ॥ ४२ ॥

राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा कृपः शारद्वतस्तथा ।

द्रौणिं राज्ञो नियोगेन सैनापत्येऽभ्यषेचयत् ॥ ४३ ॥

राजाकी वह बात सुनकर शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने उसकी आज्ञाके अनुसार अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेक किया ॥ ४३ ॥

सोऽभिषिक्तो महाराज परिष्वज्य नृपोत्तमम् ।

प्रययौ सिंहनादेन दिशः सर्वा विनादयन् ॥ ४४ ॥

महाराज! अभिषेक हो जानेपर अश्वत्थामाने नृपश्रेष्ठ दुर्योधनको हृदयसे लगाया और अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वहाँसे प्रस्थान किया ॥

दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र शोणितेन परिप्लुतः ।

तां निशां प्रतिपेदेऽथ सर्वभूतभयावहाम् ॥ ४५ ॥

राजेन्द्र! खूनमें डूबे हुए दुर्योधनने भी सम्पूर्ण भूतोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली वह रात वहीं व्यतीत की ॥ ४५ ॥

अपक्रम्य तु ते तूर्णं तस्मादायोधनान्नृप ।

शोकसंविग्नमनसश्चिन्ताध्यानपराभवन् ॥ ४६ ॥

नरेश्वर! शोकसे व्याकुलचित्त हुए वे तीनों महारथी उस युद्धभूमिसे तुरंत ही दूर हट गये और चिन्ता एवं कर्तव्यके विचारमें निमग्न हो गये ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 2973

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इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि अश्वत्थामसैनापत्याभिषेके पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेकविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥

॥ शल्यपर्व सम्पूर्णम् ॥ कुल अनुष्टुप् बड़े श्लोक बड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपर उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये ३५३१ ( ११५) १५८ = ३६८ ९- दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये ४२ ( ५ ) ६ ॥ - ४८ ॥।- शल्यपर्वकी कुल श्लोकसंख्या ३७३८

पृष्ठ 2974

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्रीमहाभारतम् सौप्तिकपर्व प्रथमोऽध्यायः तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

अन्तर्यामी नारायण भगवान् श्रीकृष्ण, ( उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली ) भगवती सरस्वती और उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत ) -का पाठ करना चाहिये । संजय उवाच

ततस्ते सहिता वीराः प्रयाता दक्षिणामुखाः ।

उपास्तमनवेलायां शिबिराभ्याशमागताः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! दुर्योधनकी आज्ञाके अनुसार कृपाचार्यके द्वारा अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो जानेके अनन्तर वे तीनों वीर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा एक साथ दक्षिण दिशाकी ओर चले और सूर्यास्तके समय सेनाकी छावनीके निकट जा पहुँचे ॥ १ ॥

विमुच्य वाहांस्त्वरिता भीता समभवंस्तदा ।

गहनं देशमासाद्य प्रच्छन्ना न्यविशन्त ते ॥ २ ॥

शत्रुओंको पता न लग जाय, इस भयसे वे सब- के -सब डरे हुए थे, अतः बड़ी उतावलीके साथ वनके गहन प्रदेशमें जाकर उन्होंने घोड़ोंको खोल दिया और छिपकर एक स्थानपर वे जा बैठे ॥ २ ॥

सेनानिवेशमभितो नातिदूरमवस्थिताः ।

निकृत्ता निशितैः शस्त्रैः समन्तात् क्षतविक्षताः ॥ ३ ॥

पृष्ठ 2975

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जहाँ सेनाकी छावनी थी, उस स्थानके पास थोड़ी ही दूरपर वे तीनों विश्राम करने लगे । उनके शरीर तीखे शस्त्रोंके आघातसे घायल हो गये थे । वे सब ओरसे क्षत -विक्षत हो रहे थे ॥ ३ ॥

दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य पाण्डवानेव चिन्तयन् ।

श्रुत्वा च निनदं घोरं पाण्डवानां जयैषिणाम् ॥ ४ ॥

अनुसारभयाद् भीताः प्राङ्मुखाः प्राद्रवन् पुनः । वे गरम - गरम लंबी साँस खींचते हुए पाण्डवोंकी ही चिन्ता करने लगे। इतनेहीमें विजयाभिलाषी पाण्डवोंकी भयंकर गर्जना सुनकर उन्हें यह भय हुआ कि पाण्डव कहीं हमारा पीछा न करने लगें; अतः वे पुनः घोड़ोंको रथमें जोतकर पूर्व दिशाकी ओर भाग चले ॥ ४३ ॥

ते मुहूर्तात् ततो गत्वा श्रान्तवाहाः पिपासिताः ॥ ५ ॥

नामृष्यन्त महेष्वासाः क्रोधामर्षवशं गताः ।

राज्ञो वधेन संतप्ता मुहूर्तं समवस्थिताः ॥ ६ ॥

दो ही घड़ीमें उस स्थानसे कुछ दूर जाकर क्रोध और अमर्षके वशीभूत हुए वे महाधनुर्धर योद्धा प्याससे पीड़ित हो गये । उनके घोड़े भी थक गये । उनके लिये यह अवस्था असह्य हो उठी थी । वे राजा दुर्योधनके मारे जानेसे बहुत दुःखी हो एक मुहूर्ततक वहाँ चुपचाप खड़े रहे ॥ ५-६ ॥ धृतराष्ट्रउवाच

अश्रद्धेयमिदं कर्म कृतं भीमेन संजय ।

यत् स नागायुतप्राणः पुत्रो मम निपातितः ॥ ७ ॥

धृतराष्ट्र बोले- संजय! मेरे पुत्र दुर्योधनमें दस हजार हाथियोंका बल था तो भी उसे भीमसेनने मार गिराया । उनके द्वारा जो यह कार्य किया गया है, इसपर सहसा विश्वास नहीं होता ॥ ७ ॥

अवध्यः सर्वभूतानां वज्रसंहननो युवा ।

पाण्डवैः समरे पुत्रो निहतो मम संजय ॥ ८ ॥

संजय! मेरा पुत्र नवयुवक था । उसका शरीर वज्रके समान कठोर था और इसीलिये वह सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अवध्य था, तथापि पाण्डवोंने समरांगणमें उसका वध कर डाला ॥ ८ ॥

न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक्यं गावल्गणे नरैः ।

यत् समेत्य रणे पार्थैः पुत्रो मम निपातितः ॥ ९ ॥

गवल्गणकुमार! कुन्तीके पुत्रोंने मिलकर रणभूमिमें जो मेरे पुत्रको धराशायी कर दिया है, इससे जान पड़ता है कि कोई भी मनुष्य दैवके विधानका उल्लंघन नहीं कर

पृष्ठ 2976

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सकता ॥ ९ ॥

अद्रिसारमयं नूनं हृदयं मम संजय ।

हतं पुत्रशतं श्रुत्वा यन्न दीर्णं सहस्रधा ॥ १० ॥

संजय! निश्चय ही मेरा हृदय पत्थरके सारतत्त्वका बना हुआ है, जो अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेका समाचार सुनकर भी इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो गये ॥ १० ॥

कथं हि वृद्धमिथुनं हतपुत्रं भविष्यति ।

न ह्यहं पाण्डवेयस्य विषये वस्तुमुत्सहे ॥ ११ ॥

हाय! अब हम दोनों बूढ़े पति- पत्नी अपने पुत्रोंके मारे जानेसे कैसे जीवित रहेंगे? मैं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके राज्यमें नहीं रह सकता ॥ ११ ॥

कथं राज्ञः पिता भूत्वा स्वयं राजा च संजय ।

प्रेष्यभूतः प्रवर्तेयं पाण्डवेयस्य शासनात् ॥ १२ ॥

संजय! मैं राजाका पिता और स्वयं भी राजा ही था । अब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी आज्ञाके अधीन हो दासकी भाँति कैसे जीवननिर्वाह करूँगा? ॥ १२ ॥

आज्ञाप्य पृथिवीं सर्वां स्थित्वा मूर्ध्नि च संजय ।

कथमद्य भविष्यामि प्रेष्यभूतो दुरन्तकृत् ॥ १३ ॥

संजय! पहले समस्त भूमण्डलपर मेरी आज्ञा चलती थी और मैं सबका शिरमौर था; ऐसा होकर अब मैं दूसरोंका दास बनकर कैसे रहूँगा । मैंने स्वयं ही अपने जीवनकी अन्तिम अवस्थाको दुःखमय बना दिया है! ॥

कथं भीमस्य वाक्यानि श्रोतुं शक्ष्यामि संजय ।

येन पुत्रशतं पूर्णमेकेन निहतं मम ॥ १४ ।

ओह! जिसने अकेले ही मेरे पूरे के पूरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला, उस भीमसेनकी बातोंको मैं कैसे सुन सकूँगा? ॥ १४ ॥

कृतं सत्यं वचस्तस्य विदुरस्य महात्मनः ।

अकुर्वता वचस्तेन मम पुत्रेण संजय ॥ १५ ॥

संजय! मेरे पुत्रने मेरी बात न मानकर महात्मा विदुरके कहे हुए वचनको सत्य कर दिखाया ॥ १५ ॥

अधर्मेण हते तात पुत्रे दुर्योधने मम ।

कृतवर्मा कृपो द्रौणिः किमकुर्वत संजय ॥। १६ ॥

तात संजय! अब यह बताओ कि मेरे पुत्र दुर्योधनके अधर्मपूर्वक मारे जानेपर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामाने क्या किया? ॥ १६ ॥

संजय उवाच गत्वा तु तावका राजन् नातिदूरमवस्थिताः ।

पृष्ठ 2977

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2977 का मूल पृष्ठ
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अपश्यन्त वनं घोरं नानाद्रुमलतावृतम् ॥ १७ ॥

संजयने कहा — राजन्! आपके पक्षके वे तीनों वीर वहाँसे थोड़ी ही दूरपर जाकर खड़े हो गये । वहाँ उन्होंने नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे भरा हुआ एक भयंकर वन देखा ॥ १७ ॥

मुहूर्तं तु विश्रम्य लब्धतोयैर्हयोत्तमैः ।

सूर्यास्तमनवेलायां समासेदुर्महद् वनम् ॥ १८ ॥

नानामृगगणैर्जुष्टं नानापक्षिगणावृतम् ।

नानाद्रुमलताच्छन्नं नानाव्यालनिषेवितम् ॥ १ ९ ॥

उस स्थानपर थोड़ी देरतक ठहरकर उन सब लोगोंने अपने उत्तम घोड़ोंको पानी पिलाया और सूर्यास्त होते - होते वे उस विशाल वनमें जा पहुँचे, जहाँ अनेक प्रकारके मृग और भाँति- भाँतिके पक्षी निवास करते थे, तरह- तरहके वृक्षों और लताओंने उस वनको व्याप्त कर रखा था और अनेक जातिके सर्प उसका सेवन करते थे ॥ १८-१९ ॥

नानातोयैः समाकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम् ।

पद्मिनीशतसंछन्नं नीलोत्पलसमायुतम् ॥ २० ॥

उसमें जहाँ -तहाँ अनेक प्रकारके जलाशय थे, भाँति- भाँतिके पुष्प उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे, शत - शत रक्तकमल और असंख्य नीलकमल वहाँके जलाशयोंमें सब ओर छा रहे थे ॥ २० ॥

प्रविश्य तद् वनं घोरं वीक्षमाणाः समन्ततः ।

शाखासहस्रसंछन्नं न्यग्रोधं ददृशुस्ततः ॥ २१ ॥

उस भयंकर वनमें प्रवेश करके सब ओर दृष्टि डालनेपर उन्हें सहस्रों शाखाओंसे आच्छादित एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया ॥ २१ ॥

उपेत्य तु तदा राजन् न्यग्रोधं ते महारथाः ।

ददृशुर्द्विपदां श्रेष्ठाः श्रेष्ठं तं वै वनस्पतिम् ॥ २२ ॥

राजन्! मनुष्योंमें श्रेष्ठ उन महारथियोंने पास जाकर उस उत्तम वनस्पति ( बरगद ) -को देखा ॥ २२ ॥

तेऽवतीर्य रथेभ्यश्च विप्रमुच्य च वाजिनः ।

उपस्पृश्य यथान्यायं संध्यामन्वासत प्रभो ॥ २३ ॥

प्रभो! वहाँ रथोंसे उतरकर उन तीनोंने अपने घोड़ोंको खोल दिया और यथोचितरूपसे स्नान आदि करके संध्योपासना की ॥ २३ ॥

ततोऽस्तं पर्वतश्रेष्ठमनुप्राप्ते दिवाकरे ।

सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी समपद्यत ॥ २४ ॥

तदनन्तर सूर्यदेवके पर्वतश्रेष्ठ अस्ताचलपर पहुँच जानेपर धायकी भाँति सम्पूर्ण जगत्को अपनी गोदमें विश्राम देनेवाली रात्रिदेवीका सर्वत्र आधिपत्य हो गया ॥ २४ ॥

पृष्ठ 2978

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ग्रहनक्षत्रताराभिः सम्पूर्णाभिरलंकृतम् ।

नभोंऽशुकमिवाभाति प्रेक्षणीयं समन्ततः ॥ २५ ॥

सम्पूर्ण ग्रहों, नक्षत्रों और ताराओंसे अलंकृत हुआ आकाश जरीकी साड़ीके समान सब ओरसे देखनेयोग्य प्रतीत होता था ॥ २५ ॥

इच्छया ते प्रवल्गन्ति ये सत्त्वा रात्रिचारिणः ।

दिवाचराश्च ये सत्त्वास्ते निद्रावशमागताः ॥ २६ ॥

रात्रिमें विचरनेवाले प्राणी अपनी इच्छाके अनुसार उछल-कूद मचाने लगे और जो दिनमें विचरनेवाले जीव- जन्तु थे, वे निद्राके अधीन हो गये ॥ २६ ॥

रात्रिंचराणां सत्त्वानां निर्घोषोऽभूत् सुदारुणः ।

क्रव्यादाश्च प्रमुदिता घोरा प्राप्ता च शर्वरी ॥ २७ ॥

रात्रिमें घूमने - फिरनेवाले जीवोंका अत्यन्त भयंकर शब्द प्रकट होने लगा । मांसभक्षी प्राणी प्रसन्न हो गये और वह भयंकर रात्रि सब ओर व्याप्त हो गयी ॥ २७ ॥

तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे दुःखशोकसमन्विताः ।

कृतवर्मा कृपो द्रौणिरुपोपविविशुः समम् ॥ २८ ॥

रात्रिका प्रथम प्रहर बीत रहा था । उस भयंकर वेलामें दुःख और शोकसे संतप्त हुए कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा एक साथ ही आस - पास बैठ गये ॥

तत्रोपविष्टाः शोचन्तो न्यग्रोधस्य समीपतः ।

तमेवार्थमतिक्रान्तं कुरुपाण्डवयोः क्षयम् ॥ २ ९ ॥

निद्रया च परीताङ्गा निषेदुर्धरणीतले ।

श्रमेण सुदृढं युक्ता विक्षता विविधैः शरैः ॥ ३० ॥

वटवृक्षके समीप बैठकर कौरवों तथा पाण्डव- योद्धाओंके उसी विनाशकी बीती हुई बातके लिये शोक करते हुए वे तीनों वीर निद्रासे सारे अंग शिथिल हो जानेके कारण पृथ्वीपर लेट गये । उस समय वे भारी थकावटसे चूर-चूर हो रहे थे और नाना प्रकारके बाणोंसे उनके सारे अंग क्षत -विक्षत हो गये थे ॥ २ ९ -३० ॥

ततो निद्रावशं प्राप्तौ कृपभोजी महारथौ ।

सुखोचितावदुःखार्ही निषण्णौ धरणीतले ॥ ३१ ॥

तदनन्तर कृपाचार्य और कृतवर्मा –इन दोनों महारथियोंको गाढ़ी नींद आ गयी । वे सुख भोगनेके योग्य थे, दुःख पानेके योग्य कदापि नहीं थे, तो भी धरतीपर ही सो गये थे ॥ ३१ ॥

तौ तु सुप्तौ महाराज श्रमशोकसमन्वितौ ।

महार्हशयनोपेतौ भूमावेव ह्यनाथवत् ॥ ३२ ॥

क्रोधामर्षवशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत ।

न वै स्म स जगामाथ निद्रां सर्प इव श्वसन् ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 2979

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महाराज! बहुमूल्य शय्या एवं सुखसामग्रीसे सम्पन्न होनेपर भी उन दोनों वीरोंको परिश्रम और शोकसे पीड़ित हो अनाथकी भाँति पृथ्वीपर ही पड़ा देख द्रोणपुत्र अश्वत्थामा क्रोध और अमर्षके वशीभूत हो गया। भारत! उस समय उसे नींद नहीं आयी । वह सर्पके समान लंबी साँस खींचता रहा ॥ ३२-३३ ॥

न लेभे स तु निद्रां वै दह्यमानो हि मन्युना ।

वीक्षाञ्चक्रे महाबाहुस्तद् वनं घोरदर्शनम् ॥ ३४ ॥

क्रोधसे जलते रहनेके कारण नींद उसके पास फटकने नहीं पाती थी । उस महाबाहु वीरने भयंकर दिखायी देनेवाले उस वनकी ओर बारंबार दृष्टिपात किया ॥ ३४ ॥

वीक्षमाणो वनोद्देशं नानासत्त्वैर्निषेवितम् ।

अपश्यत महाबाहुर्न्यग्रोधं वायसैर्युतम् ॥ ३५ ॥

नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंसे सेवित वनस्थलीका निरीक्षण करते हुए महाबाहु अश्वत्थामाने कौओंसे भरे हुए वटवृक्षपर दृष्टिपात किया ॥ ३५ ॥

तत्र काकसहस्राणि तां निशां पर्यणामयन् ।

सुखं स्वपन्ति कौरव्य पृथक् पृथगुपाश्रयाः ॥ ३६ ॥

कुरुनन्दन! उस वृक्षपर सहस्रों कौए रातमें बसेरा ले रहे थे । वे पृथक् - पृथक् घोंसलोंका आश्रय लेकर सुखकी नींद सो रहे थे ॥ ३६ ॥

सुप्तेषु तेषु काकेषु विश्रब्धेषु समन्ततः ।

सोऽपश्यत् सहसा यान्तमुलूकं घोरदर्शनम् ॥ ३७ ॥

उन कौओंके सब ओर निर्भय होकर सो जानेपर अश्वत्थामाने देखा कि सहसा एक भयानक उल्लू उधर आ निकला ॥ ३७ ॥

महास्वनं महाकायं हर्यक्षं बभ्रुपिङ्गलम् ।

सुदीर्घघोणानखरं सुपर्णमिव वेगितम् ॥ ३८ ॥

उसकी बोली बड़ी भयंकर थी । डील - डौल भी बड़ा था । आँखें काले रंगकी थीं, उसका शरीर भूरा और पिंगलवर्णका था । उसकी चोंच और पंजे बहुत बड़े थे और वह गरुड़के समान वेगशाली जान पड़ता था ॥ ३८ ॥

सोऽथ शब्दं मृदुं कृत्वा लीयमान इवाण्डजः ।

न्यग्रोधस्य ततः शाखां प्रार्थयामास भारत ॥ ३ ९ ॥

भरतनन्दन! वह पक्षी कोमल बोली बोलकर छिपता हुआ- सा बरगदकी उस शाखापर आनेकी इच्छा करने लगा ॥ ३ ९ ॥

संनिपत्य तु शाखायां न्यग्रोधस्य विहङ्गमः ।

सुप्ताञ्जघान सुबहून् वायसान् वायसान्तकः ॥ ४० ॥

कौओंके लिये कालरूपधारी उस विहंगमने वटवृक्षकी उस शाखापर बड़े वेगसे आक्रमण किया और सोये हुए बहुत - से कौओंको मार डाला ॥ ४० ॥

पृष्ठ 2980

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केषांचिदच्छिनत् पक्षान् शिरांसि च चकर्त ह ।

चरणांश्चैव केषांचिद् बभञ्ज चरणायुधः ॥ ४१ ॥

उसने अपने पंजोंसे ही अस्त्रका काम लेकर किन्हीं कौओंके पंख नोच डाले, किन्हींके सिर काट लिये और किन्हींके पैर तोड़ डाले ॥ ४१ ॥

क्षणेनाहन् स बलवान् येऽस्य दृष्टिपथे स्थिताः ।

तेषां शरीरावयवैः शरीरैश्च विशाम्पते ॥ ४२ ॥

न्यग्रोधमण्डलं सर्वं संछन्नं सर्वतोऽभवत् । प्रजानाथ! उस बलवान् उल्लूने, जो- जो कौए उसकी दृष्टिमें आ गये, उन सबको क्षणभरमें मार डाला । इससे वह सारा वटवृक्ष कौओंके शरीरों तथा उनके विभिन्न अवयवोंद्वारा सब ओरसे आच्छादित हो गया ॥ ४२ ॥

तांस्तु हत्वा ततः काकान् कौशिको मुदितोऽभवत् ॥ ४३ ॥

प्रतिकृत्य यथाकामं शत्रूणां शत्रुसूदनः । वह शत्रुओंका संहार करनेवाला उलूक उन कौओंका वध करके अपने शत्रुओंसे इच्छानुसार भरपूर बदला लेकर बहुत प्रसन्न हुआ ॥ ४३ ३ ॥ तद् दृष्ट्वा सोपधं कर्म कौशिकेन कृतं निशि ॥ ४४ ॥

तद्भावकृतसंकल्पो द्रौणिरेकोऽन्वचिन्तयत् । रात्रिमें उल्लूके द्वारा किये गये उस कपटपूर्ण क्रूर कर्मको देखकर स्वयं भी वैसा ही करनेका संकल्प लेकर अश्वत्थामा अकेला ही विचार करने लगा - ॥ ४४३ ॥

उपदेशः कृतोऽनेन पक्षिणा मम संयुगे ॥ ४५ ॥

शत्रूणां क्षपणे युक्तः प्राप्तः कालश्च मे मतः । ' इस पक्षीने युद्धमें क्या करना चाहिये, इसका उपदेश मुझे दे दिया । मैं समझता हूँ कि मेरे लिये इसी प्रकार शत्रुओंके संहार करनेका समय प्राप्त हुआ है ॥ नाद्य शक्या मया हन्तुं पाण्डवा जितकाशिनः ॥ ४६ ॥

बलवन्तः कृतोत्साहाः प्राप्तलक्ष्याः प्रहारिणः । ‘ पाण्डव इस समय विजयसे उल्लसित हो रहे हैं । वे बलवान्, उत्साही और प्रहार करनेमें कुशल हैं । उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त हो गया है । ऐसी अवस्थामें आज मैं अपनी शक्तिसे उनका वध नहीं कर सकता ॥ राज्ञः सकाशात् तेषां तु प्रतिज्ञातो वधो मया ॥ ४७ ॥

पतङ्गाग्निसमां वृत्तिमास्थायात्मविनाशिनीम् ।

न्यायतो युध्यमानस्य प्राणत्यागो न संशयः ॥ ४८ ॥

‘ इधर मैंने राजा दुर्योधनके समीप पाण्डवोंके वधकी प्रतिज्ञा कर ली है । परंतु यह कार्य वैसा ही है, जैसा पतिंगोंका आगमें कूद पड़ना । मैंने जिस वृत्तिका आश्रय लेकर पूर्वोक्त