04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 3041–3050
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 3041–3050
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दिखायी देते थे । उनके स्त्री और पुत्र भी साथ ही थे । वे अत्यन्त क्रूर और निर्दय थे । उनकी ओर देखना भी बहुत कठिन था । वहाँ उन राक्षसोंके भाँति- भाँतिके रूप दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥
पीत्वा च शोणितं हृष्टाः प्रानृत्यन् गणशोऽपरे ।
इदं परमिदं मेध्यमिदं स्वाद्विति चाब्रुवन् ॥ १३८ ॥
कोई रक्त पीकर हर्षसे खिल उठे थे । दूसरे अलग- अलग झुंड बनाकर नाच रहे थे । वे आपसमें कहते थे — ‘' यह उत्तम है, यह पवित्र है और यह बहुत स्वादिष्ट है ' ॥ १३८ ॥
मेदोमज्जास्थिरक्तानां वसानां च भृशाशिताः ।
परमांसानि खादन्तः क्रव्यादा मांसजीविनः ॥ १३ ९ ॥
मेदा, मज्जा, हड्डी, रक्त और चर्बीका विशेष आहार करनेवाले मांसजीवी राक्षस एवं हिंसक जन्तु दूसरोंके मांस खा रहे थे ॥ १३ ९ ॥
वसाश्चैवापरे पीत्वा पर्यधावन् विकुक्षिकाः ।
नानावक्त्रास्तथा रौद्राः क्रव्यादाः पिशिताशनाः ॥ १४० ॥
दूसरे कुक्षिरहित राक्षस चर्बियोंका पान करके चारों ओर दौड़ लगा रहे थे । कच्चा मांस खानेवाले उन भयंकर राक्षसोंके अनेक मुख थे ॥ १४० ॥
अयुतानि च तत्रासन् प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
रक्षसां घोररूपाणां महतां क्रूरकर्मणाम् ॥ १४१ ॥
मुदितानां वितृप्तानां तस्मिन् महति वैशसे ।
समेतानि बहून्यासन् भूतानि च जनाधिप ॥ १४२ ॥
वहाँ उस महान् जनसंहारमें तृप्त और आनन्दित हुए क्रूर कर्म करनेवाले घोर रूपधारी महाकाय राक्षसोंके कई दल थे । किसी दलमें दस हजार, किसीमें एक लाख और किसीमें एक अर्बुद ( दस लाख ) राक्षस थे । नरेश्वर! वहाँ और भी बहुत- से मांसभक्षी प्राणी एकत्र हो गये थे ॥ १४१-१४२ ॥
प्रत्यूषकाले शिबिरात् प्रतिगन्तुमियेष सः ।
नृशोणितावसिक्तस्य द्रौणेरासीदसित्सरुः ॥ १४३ ॥
पाणिना सह संश्लिष्ट एकीभूत इव प्रभो । प्रातःकाल पौ फटते ही अश्वत्थामाने शिविरसे बाहर निकल जानेका विचार किया । प्रभो! उस समय नररक्तसे नहाये हुए अश्वत्थामाके हाथसे सटकर उसकी तलवारकी मूठ ऐसी जान पड़ती थी, मानो वह उससे अभिन्न हो ॥ १४३३ ॥
दुर्गमां पदवीं गत्वा विरराज जनक्षये ॥ १४४ ॥
युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावकः ।
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जैसे प्रलयकालमें आग सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म करके प्रकाशित होती है, उसी प्रकार वह नरसंहार हो जानेपर अपने दुर्गम लक्ष्यतक पहुँचकर अश्वत्थामा अधिक शोभा पाने लगा ॥ १४४३ ॥
यथाप्रतिज्ञं तत् कर्म कृत्वा द्रौणायनिः प्रभो ॥ १४५ ॥
दुर्गमां पदवीं गच्छन् पितुरासीद् गतज्वरः । नरेश्वर! अपने पिताके दुर्गम पथपर चलता हुआ द्रोणकुमार अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार सारा कार्य पूर्ण करके शोक और चिन्तासे रहित हो गया ॥ १४५३ ॥
यथैव संसुप्तजने शिबिरे प्राविशन्निशि ॥ १४६ ॥
तथैव हत्वा निःशब्दे निश्चक्राम नरर्षभः । जिस प्रकार रातके समय सबके सो जानेपर शान्त शिविरमें उसने प्रवेश किया था, उसी प्रकार वह नरश्रेष्ठ वीर सबको मारकर कोलाहलशून्य हुए शिविरसे बाहर निकला ॥ १४६३ ॥
निष्क्रम्य शिबिरात् तस्मात् ताभ्यां संगम्य वीर्यवान् ॥ १४७ ॥
आचख्यौ कर्म तत् सर्वं हृष्टः संहर्षयन् विभो । प्रभो! उस शिविरसे निकलकर शक्तिशाली अश्वत्थामा उन दोनोंसे मिला और स्वयं हर्षमग्न हो उन दोनोंका हर्ष बढ़ाते हुए उसने अपना किया हुआ सारा कर्म उनसे कह सुनाया ॥ १४७ ॥
तावथाचख्यतुस्तस्मै प्रियं प्रियकरौ तदा ॥ १४८ ॥
पञ्चालान् सृञ्जयांश्चैव विनिकृत्तान् सहस्रशः । अश्वत्थामाका प्रिय करनेवाले उन दोनों वीरोंने भी उस समय उससे यह प्रिय समाचार निवेदन किया कि हम दोनोंने भी सहस्रों पांचालों और सृजयोंके टुकड़े- टुकड़े कर डाले हैं ॥ १४८३ ॥
प्रीत्या चोच्चैरुदक्रोशंस्तथैवास्फोटयंस्तलान् ॥ १४ ९ ॥
एवंविधा हि सा रात्रिः सोमकानां जनक्षये ।
प्रसुप्तानां प्रमत्तानामासीत् सुभृशदारुणा ॥ १५० ॥
फिर तो वे तीनों प्रसन्नताके मारे उच्चस्वरसे गर्जने और ताल ठोकने लगे । इस प्रकार वह रात्रि उस जन - संहारकी वेलामें असावधान होकर सोये हुए सोमकोंके लिये अत्यन्त भयंकर सिद्ध हुई ॥ १४ ९ -१५० ॥
असंशयं हि कालस्य पर्यायो दुरतिक्रमः ।
तादृशा निहता यत्र कृत्वास्माकं जनक्षयम् ॥ १५१ ॥
राजन्! इसमें संशय नहीं कि कालकी गतिका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है । जहाँ हमारे पक्षके लोगोंका संहार करके विजयको प्राप्त हुए वैसे- वैसे वीर मार डाले
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गये ॥ १५१ ॥
धृतराष्ट्रउवाच
प्रागेव सुमहत् कर्म द्रौणिरेतन्महारथः ।
नाकरोदीदृशं कस्मान्मत्पुत्रविजये धृतः ॥ १५२ ॥
राजा धृतराष्ट्रने पूछा - संजय! अश्वत्थामा तो मेरे पुत्रको विजय दिलानेका दृढ़ निश्चय कर चुका था । फिर उस महारथी वीरने पहले ही ऐसा महान् पराक्रम क्यों नहीं किया? ॥ १५२ ॥
अथ कस्माद्धते क्षुद्रं कर्मेदं कृतवानसौ ।
द्रोणपुत्रो महात्मा स तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ १५३ ॥
जब दुर्योधन मार डाला गया, तब उस महामनस्वी द्रोणपुत्रने ऐसा नीच कर्म क्यों किया? यह सब मुझे बताओ ॥ १५३ ॥
संजय उवाच
तेषां नूनं भयान्नासौ कृतवान् कुरुनन्दन ।
असांनिध्याद्धि पार्थानां केशवस्य च धीमतः ॥ १५४ ॥
सात्यकेश्चापि कर्मेदं द्रोणपुत्रेण साधितम् । संजयने कहा —कुरुनन्दन! अश्वत्थामाको पाण्डव, श्रीकृष्ण और सात्यकिसे सदा भय बना रहता था; इसीलिये पहले उसने ऐसा नहीं किया । इस समय कुन्तीके पुत्र, बुद्धिमान् श्रीकृष्ण तथा सात्यकिके दूर चले जानेसे अश्वत्थामाने अपना यह कार्य सिद्ध कर लिया ॥ १५४ ॥
को हि तेषां समक्षं तान् हन्यादपि मरुत्पतिः ॥ १५५ ॥
एतदीदृशकं वृत्तं राजन् सुप्तजने विभो । उन पाण्डव आदिके समक्ष कौन उन्हें मार सकता था? साक्षात् देवराज इन्द्र भी उस दशामें उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे । प्रभो! नरेश्वर! उस रात्रिमें सब लोगोंके सो जानेपर यह इस प्रकारकी घटना घटित हुई ॥ ततो जनक्षयं कृत्वा पाण्डवानां महात्ययम् ॥ १५६ ॥
दिष्टया दिष्टयैव चान्योन्यं समेत्योचुर्महारथाः । उस समय पाण्डवोंके लिये महान् विनाशकारी जनसंहार करके वे तीनों महारथी जब परस्पर मिले, तब आपसमें कहने लगे - ' बड़े सौभाग्यसे यह कार्य सिद्ध हुआ है ' ॥ पर्यष्वजत् ततो द्रौणिस्ताभ्यां सम्प्रतिनन्दितः ॥ १५७ ॥
इदं हर्षात् तु सुमहदाददे वाक्यमुत्तमम् । तदनन्तर उन दोनोंका अभिनन्दन स्वीकार करके द्रोणपुत्रने उन्हें हृदयसे लगाया और बड़े हर्षसे यह महत्त्वपूर्ण उत्तम वचन मुँहसे निकाला— ॥ १५७३ ॥
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पञ्चाला निहताः सर्वे द्रौपदेयाश्च सर्वशः ॥ १५८ ॥
सोमका मत्स्यशेषाश्च सर्वे विनिहता मया । ' सारे पांचाल, द्रौपदीके सभी पुत्र, सोमकवंशी क्षत्रिय तथा मत्स्य देशके अवशिष्ट सैनिक ये सभी मेरे हाथसे मारे गये ॥ १५८३ ॥
इदानीं कृतकृत्याः स्म याम तत्रैव मा चिरम् ।
यदि जीवति नो राजा तस्मै शंसमहे वयम् ॥ १५ ९ ॥
‘इस समय हम कृतकृत्य हो गये । अब हमें शीघ्र वहीं चलना चाहिये । यदि हमारे राजा दुर्योधन जीवित हों तो हम उन्हें भी यह समाचार कह सुनावें' ॥ १५ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि रात्रियुद्धे पाञ्चालादिवधेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें पांचाल आदिका वधविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल १५ ९ ३ श्लोक हैं । )
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नवमोऽध्यायः दुर्योधनकी दशा देखकर कृपाचार्य और अश्वत्थामाका विलाप तथा उनके मुखसे पांचालोंके वधका वृत्तान्त जानकर दुर्योधनका प्रसन्न होकर प्राणत्याग करना संजय उवाच
ते हत्वा सर्वपञ्चालान् द्रौपदेयांश्च सर्वशः ।
आगच्छन् सहितास्तत्र यत्र दुर्योधनो हतः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! वे तीनों महारथी समस्त पांचालों और द्रौपदीके सभी पुत्रोंका वध करके एक साथ उस स्थानमें आये, जहाँ राजा दुर्योधन मारा गया था ॥ १ ॥
गत्वा चैनमपश्यन्त किञ्चित्प्राणं जनाधिपम् ।
ततो रथेभ्यः प्रस्कन्द्य परिवव्रुस्तवात्मजम् ॥ २ ॥
वहाँ जाकर उन्होंने राजा दुर्योधनको देखा, उसकी कुछ- कुछ साँस चल रही थी । फिर वे रथोंसे कूद पड़े और आपके पुत्रके पास जा उसे सब ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ २ ॥
तं भग्नसक्थं राजेन्द्र कृच्छ्रप्राणमचेतसम् ।
वमन्तं रुधिरं वक्त्रादपश्यन् वसुधातले ॥ ३ ॥
वृतं समन्ताद् बहुभिः श्वापदैर्घोरदर्शनैः ।
शालावृकगणैश्चैव भक्षयिष्यद्भिरन्तिकात् ॥ ४ ॥
निवारयन्तं कृच्छ्रात्तान् श्वापदांश्च चिखादिषून् ।
विचेष्टमानं मह्यां च सुभृशं गाढवेदनम् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! उन्होंने देखा कि राजाकी जाँघें टूट गयी हैं । ये बड़े कष्टसे प्राण धारण करते हैं । इनकी चेतना लुप्त - सी हो गयी है और ये अपने मुँहसे पृथ्वीपर खून उगल रहे हैं । इन्हें चट कर जानेके लिये बहुत- से भयंकर दिखायी देनेवाले हिंसक जीव और कुत्ते चारों ओरसे घेरकर आसपास ही खड़े हैं । ये अपनेको खा जानेकी इच्छा रखनेवाले उन हिंसक जन्तुओंको बड़ी कठिनाईसे रोकते हैं । इन्हें बड़ी भारी पीड़ा हो रही है, जिसके कारण ये पृथ्वीपर पड़े - पड़े छटपटा रहे हैं ॥
तं शयानं तथा दृष्ट्वा भूमौ सुरुधिरोक्षितम् ।
हतशिष्टास्त्रयो वीराः शोकार्ताः पर्यवारयन् ॥ ६ ॥
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ।
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दुर्योधनको इस प्रकार खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए वे तीनों वीर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा शोकसे व्याकुल हो उसे तीन ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ६३ ॥
तैस्त्रिभिः शोणितादिग्धैर्निःश्वसद्भिर्महारथैः ॥ ७ ॥
शुशुभे स वृतो राजा वेदी त्रिभिरिवाग्निभिः । वे तीनों महारथी वीर खूनसे रँग गये थे और लंबी साँसें खींच रहे थे । उनसे घिरा हुआ राजा दुर्योधन तीन अग्नियोंसे घिरी हुई वेदीके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ते तं शयानं सम्प्रेक्ष्य राजानमतथोचितम् ॥ ८ ॥
अविषह्येन दुःखेन ततस्ते रुरुदुस्त्रयः । राजाको इस प्रकार अयोग्य अवस्थामें सोया देख वे तीनों असह्य दुःखसे पीड़ित हो रोने लगे ॥ ८३ ॥
ततस्तु रुधिरं हस्तैर्मुखान्निर्मृज्य तस्य हि ।
रणे राज्ञः शयानस्य कृपणं पर्यदेवयन् ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् रणभूमिमें सोये हुए राजा दुर्योधनके मुखसे बहते हुए रक्तको हाथोंसे पोंछकर वे तीनों दीन वाणीमें विलाप करने लगे ॥ ९ ॥
कृपउवाच
न दैवस्यातिभारोऽस्ति यदयं रुधिरोक्षितः ।
एकादशचमूभर्ता शेते दुर्योधनो हतः ॥ १० ॥
कृपाचार्य बोले — हाय! विधाताके लिये कुछ भी करना कठिन नहीं है । जो कभी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके स्वामी थे, वे ही ये राजा दुर्योधन यहाँ मारे जाकर खूनसे लथपथ हुए पड़े हैं ॥ १० ॥
पश्य चामीकराभस्य चामीकरविभूषिताम् ।
गदां गदाप्रियस्येमां समीपे पतितां भुवि ॥ ११ ॥
देखो, सुवर्णके समान कान्तिवाले इन गदाप्रेमी नरेशके समीप यह सुवर्णभूषित गदा पृथ्वीपर पड़ी है ॥
इयमेनं गदा शूरं न जहाति रणे रणे ।
स्वर्गायापि व्रजन्तं हि न जहाति यशस्विनम् ॥ १२ ॥
यह गदा इन शूरवीर भूपालका साथ किसी भी युद्धमें नहीं छोड़ती थी और आज स्वर्गलोकमें जाते समय भी यशस्वी नरेशका साथ नहीं छोड़ रही है ॥
पश्येमां सह वीरेण जाम्बूनदविभूषिताम् ।
शयानां शयने हर्म्ये भार्यां प्रीतिमतीमिव ॥ १३ ॥
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देखो, यह सुवर्णभूषित गदा इन वीर भूपालके साथ रणशय्यापर उसी प्रकार सो रही है, जैसे महलमें प्रेम रखनेवाली पत्नी इनके साथ सोया करती थी ॥ १३ ॥
योऽयं मूर्धाभिषिक्तानामग्रे यातः परंतपः ।
स हतो ग्रसते पांसून् पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ १४ ॥
जो ये शत्रुसंतापी नरेश सभी मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे चला करते थे, वे ही आज मारे जाकर धरतीपर पड़े - पड़े धूल फाँक रहे हैं । यह समयका उलट - फेर तो देखो ॥ १४ ॥
येनाजी निहता भूमावशेरत पुरा द्विषः ।
स भूमौ निहतः शेते कुरुराजः परैरयम् ॥ १५ ॥
पूर्वकालमें जिनके द्वारा युद्धमें मारे गये शत्रु भूमिपर सोया करते थे, वे ही ये कुरुराज आज शत्रुओंद्वारा स्वयं मारे जाकर भूमिपर शयन करते हैं ॥ १५ ॥
भयान्नमन्ति राजानो यस्य स्म शतसंघशः ।
स वीरशयने शेते क्रव्याद्भिः परिवारितः ॥ १६ ॥
जिनके आगे सैकड़ों राजा भयसे सिर झुकाते थे, वे ही आज हिंसक जन्तुओंसे घिरे हुए वीर - शय्यापर सो रहे हैं ॥ १६ ॥
उपासत द्विजाः पूर्वमर्थहेतोर्यमीश्वरम् ।
उपासते च तं ह्यद्य क्रव्यादा मांसहेतवः ॥ १७ ॥
पहले बहुत- से ब्राह्मण धनकी प्राप्तिके लिये जिन नरेशके पास बैठे रहते थे, उन्हींके समीप आज मांसके लिये मांसाहारी जन्तु बैठे हुए हैं ॥ १७ ॥
संजय उवाच
तं शयानं कुरुश्रेष्ठं ततो भरतसत्तम ।
अश्वत्थामा समालोक्य करुणं पर्यदेवयत् ॥ १८ ॥
संजय कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर कुरुकुल- भूषण दुर्योधनको रणशय्यापर पड़ा देख अश्वत्थामा इस प्रकार करुण विलाप करने लगा- ॥ १८ ॥
आहुस्त्वां राजशार्दूल मुख्यं सर्वधनुष्मताम् ।
धनाध्यक्षोपमं युद्धे शिष्यं संकर्षणस्य च ॥ १ ९ ॥
कथं विवरमद्राक्षीद् भीमसेनस्तवानघ ।
बलिनं कृतिनं नित्यं स च पापात्मवान् नृप ॥ २० ॥
‘निष्पाप राजसिंह! आपको समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कहा जाता था । आप गदायुद्धमें धनाध्यक्ष कुबेरकी समानता करनेवाले तथा साक्षात् संकर्षणके शिष्य थे तो भी भीमसेनने कैसे आपपर प्रहार करनेका अवसर पा लिया? नरेश्वर! आप तो सदासे ही बलवान् और
गदायुद्धके विद्वान् रहे हैं । फिर उस पापात्माने कैसे आपको मार दिया? ॥ १ ९ -२० ॥
कालो नूनं महाराज लोकेऽस्मिन् बलवत्तरः ।
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पश्यामो निहतं त्वां च भीमसेनेन संयुगे ॥ २१ ॥
‘ महाराज! निश्चय ही इस संसारमें समय महाबलवान् है, तभी तो युद्धस्थलमें हम आपको भीमसेनके द्वारा मारा गया देखते हैं ॥ २१ ॥
कथं त्वां सर्वधर्मज्ञं क्षुद्रः पापो वृकोदरः ।
निकृत्या हतवान् मन्दो नूनं कालो दुरत्ययः ॥ २२ ॥
' आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता थे । आपको उस मूर्ख, नीच और पापी भीमसेनने किस तरह धोखेसे मार डाला? अवश्य ही कालका उल्लंघन करना सर्वथा कठिन है ॥ २२ ॥
धर्मयुद्धे ह्यधर्मेण समाहूयौजसा मृधे ।
गदया भीमसेनेन निर्भग्ने सक्थिनी तव ॥ २३ ॥
‘ भीमसेनने आपको धर्मयुद्धके लिये बुलाकर रणभूमिमें अधर्मके बलसे गदाद्वारा आपकी दोनों जाँघें तोड़ डालीं ॥ २३ ॥
अधर्मेण हतस्याजौ मृद्यमानं पदा शिरः ।
य उपेक्षितवान् क्षुद्रं धिक् कृष्णं धिग् युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥
' एक तो आप रणभूमिमें अधर्मपूर्वक मारे गये । दूसरे भीमसेनने आपके मस्तकपर लात मारी । इतनेपर भी जिन्होंने उस नीचकी उपेक्षा की, उसे कोई दण्ड नहीं दिया, उन श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरको धिक्कार है! ॥
युद्धेष्वपवदिष्यन्ति योधा नूनं वृकोदरम् ।
यावत् स्थास्यन्ति भूतानि निकृत्या ह्यसि पातितः ॥ २५ ॥
‘ आप धोखेसे गिराये गये हैं, अतः इस संसारमें जबतक प्राणियोंकी स्थिति रहेगी, तबतक सभी युद्धोंमें सम्पूर्ण योद्धा भीमसेनकी निन्दा ही करेंगे ॥ २५ ॥
ननु रामोऽब्रवीद् राजंस्त्वां सदा यदुनन्दनः ।
दुर्योधनसमो नास्ति गदया इति वीर्यवान् ॥ २६ ॥
' राजन्! पराक्रमी यदुनन्दन बलरामजी आपके विषयमें सदा कहा करते थे कि ‘ गदायुद्धकी शिक्षामें दुर्योधनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ' ॥
श्लाघते त्वां हि वार्ष्णेयो राजसंसत्सु भारत ।
स शिष्यो मम कौरव्यो गदायुद्ध इति प्रभो ॥ २७ ॥
‘ प्रभो! भरतनन्दन! वे वृष्णिकुलभूषण बलराम राजाओंकी सभामें सदा आपकी प्रशंसा करते हुए कहते थे कि ' कुरुराज दुर्योधन गदायुद्धमें मेरा शिष्य है ' ॥
यां गतिं क्षत्रियस्याहुः प्रशस्तां परमर्षयः ।
हतस्याभिमुखस्याजौ प्राप्तस्त्वमसि तां गतिम् ॥ २८ ॥
' महर्षियोंने युद्धमें शत्रुका सामना करते हुए मारे जानेवाले क्षत्रियके लिये जो उत्तम गति बतायी है, आपने वही गति प्राप्त की है ॥ २८ ॥
दुर्योधन न शोचामि त्वामहं पुरुषर्षभ ।
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हतपुत्रौ तु शोचामि गान्धारीं पितरं च ते ॥ २ ९ ॥ ‘ पुरुषश्रेष्ठ राजा दुर्योधन! मैं तुम्हारे लिये शोक नहीं करता । मुझे तो माता गान्धारी और आपके पिता धृतराष्ट्रके लिये शोक हो रहा है, जिनके सभी पुत्र मार डाले गये हैं ॥ २ ९ ॥
भिक्षुकौ विचरिष्येते शोचन्तौ पृथिवीमिमाम् ।
धिगस्तु कृष्णं वार्ष्णेयमर्जुनं चापि दुर्मतिम् ॥ ३० ॥
धर्मज्ञमानिनौ यौ त्वां वध्यमानमुपेक्षताम् । ‘ अब वे बेचारे शोकमग्न हो भिखारी बनकर इस भूतलपर भीख माँगते फिरेंगे । उस वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण और खोटी बुद्धिवाले अर्जुनको भी धिक्कार है, जिन्होंने अपनेको धर्मज्ञ मानते हुए भी आपके अन्यायपूर्वक वधकी उपेक्षा की ॥ ३० ॥
पाण्डवाश्चापि ते सर्वे किं वक्ष्यन्ति नराधिप ॥ ३१ ॥
कथं दुर्योधनोऽस्माभिर्हत इत्यनपत्रपाः । ' नरेश्वर! क्या वे समस्त पाण्डव भी निर्लज्ज होकर लोगोंके सामने कह सकेंगे कि ‘ हमने दुर्योधनको किस प्रकार मारा था? ' ॥ ३१३ ॥
धन्यस्त्वमसि गान्धारे यस्त्वमायोधने हतः ॥ ३२ ॥
प्रायशोऽभिमुखः शत्रून् धर्मेण पुरुषर्षभ । ‘ पुरुषप्रवर गान्धारीनन्दन! आप धन्य हैं, क्योंकि युद्धमें प्रायः धर्मपूर्वक शत्रुओंका सामना करते हुए मारे गये हैं ॥ ३२ ॥
हतपुत्रा हि गान्धारी निहतज्ञातिबान्धवा ॥ ३३ ॥
प्रज्ञाचक्षुश्च दुर्धर्षः कां गतिं प्रतिपत्स्यते । ‘ जिनके सभी पुत्र, कुटुम्बी और भाई- बन्धु मारे जा चुके हैं, वे माता गान्धारी तथा प्रज्ञाचक्षु दुर्जय राजा धृतराष्ट्र अब किस दशाको प्राप्त होंगे? ॥ ३३ ॥
धिगस्तु कृतवर्माणं मां कृपं च महारथम् ॥ ३४ ॥
ये वयं न गताः स्वर्गं त्वां पुरस्कृत्य पार्थिवम् । ' मुझको, कृतवर्माको तथा महारथी कृपाचार्यको भी धिक्कार है कि हम आप - जैसे महाराजको आगे करके स्वर्गलोकमें नहीं गये ॥ ३४ ॥
दातारं सर्वकामानां रक्षितारं प्रजाहितम् ॥ ३५ ॥
यद् वयं नानुगच्छाम त्वां धिगस्मान् नराधमान् । ‘ आप हमें सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थ देते रहे और प्रजाके हितकी रक्षा करते रहे । फिर भी हमलोग जो आपका अनुसरण नहीं कर रहे हैं, इसके लिये हम- जैसे नराधमोंको धिक्कार है! ॥ ३५३ ॥
कृपस्य तव वीर्येण मम चैव पितुश्च मे ॥ ३६ ॥
सभृत्यानां नरव्याघ्र रत्नवन्ति गृहाणि च ।
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'नरश्रेष्ठ! आपके ही बल- पराक्रमसे सेवकोंसहित कृपाचार्यको, मुझको तथा मेरे पिताजीको रत्नोंसे भरे हुए भव्य भवन प्राप्त हुए थे ॥ ३६३ ॥
तव प्रसादादस्माभिः समित्रैः सह बान्धवैः ॥ ३७ ॥
अवाप्ताः क्रतवो मुख्या बहवो भूरिदक्षिणाः । ‘ आपके ही प्रसादसे मित्रों और बन्धु - बान्धवोंसहित हमलोगोंने प्रचुर दक्षिणाओंसे सम्पन्न अनेक मुख्य - मुख्य यज्ञोंका अनुष्ठान किया है ॥ ३७३ ॥
कुतश्चापीदृशं पापाः प्रवर्तिष्यामहे वयम् ॥ ३८ ॥
यादृशेन पुरस्कृत्य त्वं गतः सर्वपार्थिवान् । ' महाराज! आप जिस भावसे समस्त राजाओंको आगे करके स्वर्ग सिधार रहे हैं, हम पापी ऐसा भाव कहाँसे ला सकेंगे? ॥ ३८३ ॥
वयमेव त्रयो राजन् गच्छन्तं परमां गतिम् ॥ ३ ९ ॥
यद् वै त्वां नानुगच्छामस्तेन धक्ष्यामहे वयम् ।
तत् स्वर्गहीना हीनार्थाः स्मरन्तः सुकृतस्य ते ॥ ४० ॥
' राजन्! परम गतिको जाते समय आपके पीछे - पीछे जो हम तीनों भी नहीं चल रहे हैं, इसके कारण हम स्वर्ग और अर्थ दोनोंसे वंचित हो आपके सुकृतोंका स्मरण करते हुए दिन- रात शोकाग्निमें जलते रहेंगे ॥ ३ ९ -४० ॥
किं नाम तद् भवेत् कर्म येन त्वां न व्रजाम वै ।
दुःखं नूनं कुरुश्रेष्ठ चरिष्याम महीमिमाम् ॥ ४१ ॥
‘ कुरुश्रेष्ठ! न जाने वह कौन- सा कर्म है, जिससे विवश होकर हम आपके साथ नहीं चल रहे हैं । निश्चय ही इस पृथ्वीपर हमें निरन्तर दुःख भोगना पड़ेगा ॥
हीनानां नस्त्वया राजन् कुतः शान्तिः कुतः सुखम् ।
गत्वैव तु महाराज समेत्य च महारथान् ॥ ४२ ॥
यथाज्येष्ठं यथाश्रेष्ठं पूजयेर्वचनान्मम । ‘ महाराज! आपसे बिछुड़ जानेपर हमें शान्ति और सुख कैसे मिल सकते हैं? राजन्! स्वर्गमें जाकर सब महारथियोंसे मिलनेपर आप मेरी ओरसे बड़े - छोटेके क्रमसे उन सबका आदर- सत्कार करें ॥ ४२ ॥
आचार्यं पूजयित्वा च केतुं सर्वधनुष्मताम् ॥ ४३ ॥
हतं मयाद्य शंसेथा धृष्टद्युम्नं नराधिप । ‘ नरेश्वर! फिर सम्पूर्ण धनुर्धरोंके ध्वजस्वरूप आचार्यका पूजन करके उनसे कह दें कि ‘ आज अश्वत्थामाके द्वारा धृष्टद्युम्न मार डाला गया' ॥ ४३३ ॥
परिष्वजेथा राजानं बाह्निकं सुमहारथम् ॥ ४४ ॥
सैन्धवं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ।